सुप्रिया पाठक का आलेख 'भारत में स्त्री मुक्ति के वादे और इरादे'


सुप्रिया पाठक 

आदर्श किसे अच्छा नहीं लगता। लेकिन आदर्शों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह होती है कि वे इसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं होता। आदर्श सुनी सुनाई बात की तरह होता है जिसका कोई वास्तविक वजूद नहीं होता। इस तरह देखा जाए तो आदर्श बिल्कुल अलग होता है और उसे व्यावहारिक रूप प्रदान करना बिल्कुल अलग बात। स्त्रियों के सन्दर्भ में हमारे समाज का रवैया इस आदर्श और व्यवहार के बीच फर्क को स्पष्ट तौर पर दर्शाने वाला है। एक तरफ मनुस्मृति के अध्याय 3 श्लोक 56 में कहा गया है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।/ यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।' अर्थात 'जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं, जहाँ नारियों की पूजा नहीं होती है वहाँ समस्त (अच्छी से अच्छी) क्रियाएं (कर्म) निष्फल हो जाती हैं।' वहीं दूसरी तरफ हमारे सामाजिक जीवन में स्त्रियों को तमाम किस्म की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है। अनेक नियम कानून के बावजूद स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा लगातार बढ़ी है। सम्पत्ति के मामले में स्त्रियों को अपना हक पाने में तमाम जद्दोजहद करनी पड़ती है। संसद और विधान सभाओं में स्त्रियों को एक तिहाई आरक्षण देने वाला कानून कूड़ेदान में पड़ा हुआ है। हाल फिलहाल इसके लागू होने की संभावना भी नहीं दिखाई पड़ती। स्थानीय पंचायतों में स्त्रियों को जो आरक्षण दिया गया उसके तहत स्त्रियों ने चुनाव लड़ने की आजादी तो पाई लेकिन प्रधान पति, प्रमुख पति, मेयर पति जैसे टर्म भी तत्काल ही अस्तित्व में आ गए। इससे समझा जा सकता है कि निर्णय ले पाने में ये महिलाएं कितनी स्वतन्त्र होती होंगी। स्त्रियों की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए हमें हकीकत से रु ब रु होना ही पड़ेगा। आदर्शों के स्वप्न लोक से बाहर निकल कर यथार्थ लोक में आना होगा। सुप्रिया पाठक अपने आलेख में इसी के मद्देनजर लिखती हैं "सांस्कृतिक जीवन में गहरे जड़ जमाए सामंती-बोध वाले हिन्दी पट्टी में स्त्री प्रश्नों एवं स्त्रीवाद के प्रति संवेदनशील विमर्श की प्रस्थापना किस प्रकार होनी चाहिए क्योंकि स्त्रियों की स्थिति को सर्वकालिक एवं सार्वभौमिक रूप से संतुष्टिप्रद मानने की भूल हमें उनकी वास्तविक स्थिति को जानने से वंचित करती है।" अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम पहली बार पर विशेष प्रस्तुति का आयोजन कर रहे हैं। इस क्रम में पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं सुप्रिया पाठक का आलेख 'भारत में स्त्री मुक्ति के वादे और इरादे'।


'भारत में स्त्री मुक्ति के वादे और इरादे'


सुप्रिया पाठक 


एक आदर्श सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था की संकल्पना में स्त्री-पुरुष जीवन में सहभागी होते हैं जिनके बीच असमानता, शोषण, पराधीनता जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हमारी स्मृतियों में स्त्री-पुरुष प्रेम और सखा भाव के अनेक उदाहरण लोक-परंपरा की विभिन्न विधाओं में जिस रूप में पिरोए गए हैं, वे अनायास ही स्त्रियों में भी छद्म समानता का भाव भरते हैं। हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि तीज-त्यौहार, घर-परिवार, स्त्रियों के बिना कुछ नहीं है। बेटियाँ घर की रौनक होती हैं...। माँ की महानता के बखान से तो पूरा साहित्य और सिनेमा जगत भरा पड़ा है। बिहार के लोक-पर्व छठ के गीतों में तो रूनुकी झुनुकी बेटी का आशीर्वाद भी मांगा जाता रहा है जो हमारे समाज में स्त्री की केंद्रीय भूमिका की स्वीकार्यता को दर्शाता है। कहने का तात्पर्य यह कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ आदर्श रूप में स्त्रियाँ पूजी या सराही न जाती हों परंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हम जिस समाज में रहते हैं, उसका यथार्थ इसके ठीक उलट है। जहाँ स्त्री होते हुए भी नहीं होती, सब कुछ करते हुए भी... कुछ नहीं करती और तो और समाज में घटित होने वाली किसी भी हिंसक घटना या संघर्षपूर्ण स्थिति के लिए स्त्रियों को बिना किसी अपराध-बोध या भय के डंके की चोट पर जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है...। जोरू, जमीन, जर के नहीं तो किसी और के जैसे जुमलों के साथ। इसके बावजूद कि स्त्रियाँ सदियों से अपने प्रति होने वाले उपेक्षित व्यवहार, मार-पीट और मानसिक हिंसा को परिवार, समुदाय और दांपत्य सम्बन्धों में शांति बनाए रखने के लिए चुपचाप सहन करती हैं। जो समाज स्त्रियों को देवी और पूज्या का दर्जा देते हुए भी भावनात्मक तौर पर उन्हे कमजोर, असहाय, चरित्रहीन और मूर्ख साबित करता आया हो, उससे मुक्ति आवश्यक है। ‘स्त्री मुक्ति’ का यह विमर्श सिर्फ स्त्रियों के लिए नहीं, अपितु पूरी मानवता के लिए है जिसे अपनी वैचारिक जड़ता और सामाजिक संरचना में गहरे रूप से जड़ जमाए जाति, वर्ग, धर्म और उन समस्त वर्चस्वशाली सत्ता संस्थानों से मुक्त होना है जो इस समाज के विकास को अवरुद्ध कर रही हैं।  इसलिए स्त्री विमर्श सिर्फ अस्मिता का विमर्श नहीं, अपितु व्यापक अर्थों में मानवता की रक्षा का विमर्श है।


इसका उद्देश्य स्त्री को सिर्फ़ एक श्रेणी के रूप में पहचान दिलाना नहीं, बल्कि समाज में व्यापक बदलाव लाना है। वैश्विक स्तर पर स्त्रीवाद एवं स्त्री-मुक्ति आंदोलनों का इतिहास इस अर्थ में प्रेरणादायी रहा है की उसने दुनिया को स्त्री के मानवाधिकारों की मुश्किलों से रूबरू कराया । भारत की स्थिति ज़रूर भिन्न रही है। यहाँ इस तरह के आंदोलनों को ले कर हमेशा संशय एवं एक कदम बढ़ा कर चार कदम पीछे खींच लेने की दुविधा बनी रही है। हमारे यहां सामाजिक तौर पर यह समझना मुश्किल रहा है कि स्त्री-मुक्ति के मायने पुरुष समाज को दरकिनार रख अपना वर्चस्व स्थापित करना नहीं है, अपितु उन परम्पराओं और रूढ़ियों से निजात पाना है जो हमारे समाज में केवल स्त्रियों के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस तरह स्त्री-मुक्ति की लड़ाई उन बिंबों और रूपकों से है जो सदियों से स्त्रियों को पराधीन और अबला की छवि में ढालते रहे हैं। भारतीय परम्परा और आधुनिकता-बोध पर स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में मुकम्मल बहस करने के लिए इस देश के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों पर भी गौर करना होगा। हालांकि, सामाजिक सैद्धान्तिकी ऐतिहासिक संदर्भों में सार्वभौमिक सी होती है, पर हर देश का देशज सन्दर्भ मुक्ति के विमर्श को अपने साँचे में ढाल कर नूतन सिद्धान्त की सोच समझ विकसित करता है। भारत में स्त्रीवादी विमर्श कभी भी एकरेखीय नहीं रहा; जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्रीयता तथा भाषा के सवालों पर स्त्री समुदाय के समक्ष ‘सार्वभौमिक बहनापे’ की भावना कई स्तरों पर आड़े आती रही। बावजूद अपनी यात्रा में इसने न सिर्फ पाश्चात्य नारीवादी दर्शन के सैद्धान्तिक पक्ष की पुनर्विवेचना की अपितु भारतीय लोक परंपरा एवं आख्यानों के साथ बहनापे का रिश्ता जोड़ते हुए स्त्री-मुक्ति के तीखे प्रतिरोधी स्वर को भी तलाशने और पहचानने की कोशिश शुरू की। 'जाके पाँव नहीं फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई'... यह पंक्तियाँ बचपन से सुनती आई थी। दरअसल यह लोक का मुहावरा था जो आमतौर पर किसी भी दुःख को दूसरे द्वारा न समझे जाने के संदर्भ में दुहराया जाता था और यह कहा जाता था कि तुमने भोगा नहीं ये, तो तुम जान नहीं पाओगे कि असल में तकलीफ क्या है? कुछ हद तक यह बात सही भी थी। हमारे समाज में स्तरीकरण की कई परतें हैं जिनसे होकर शोषण, उत्पीड़न और पराधीनता का पैमाना निर्धारित किया जाता है। जो जितना नीचे होगा, उस पर सामाजिक संरचनाओं के शोषण का भार उतना ही अधिक होगा। यह दुःखद है कि हमारे समाज में स्त्रियाँ सबसे नीचे हैं इसलिए उनकी पीठ पर सबकी मार के निशान बने हुए हैं। रसोई में बैठ घर के सभी लोगों को गरम रोटी का स्वाद चखा कर खुद अंत में, बर्तन के पेंदी की पनियाई रोटी तो अंततः स्त्रियों के हिस्से ही आनी है जो पहले से तय भी है और जिस पर कोई सवाल भी नहीं। इसलिए रोटी की उस सोंधी महक को वह जानती तो है, पर पहचनती कम ही है। 


घर की थाली से ले कर कार्यस्थल पर बड़े-बड़े निर्णायक क्षणों में स्त्री के ‘होने’ को जैसे जान-बूझ कर नज़रअंदाज़ कर दिए जाने की मौन सहमति रही है। श्रम बल के रूप में स्त्रियों की शारीरिक क्षमता का उपयोग नियोक्ताओं द्वारा तयशुदा मानक से अधिक घंटों तक किया जाता है परंतु उनकी बौद्धिकता को गौण मान लिया जाता है। उनके लिए स्त्रैण भूमिकाएँ चुनी जाती हैं जिसके आधार पर आंकड़ों एवं दस्तावेजों में श्रम बल में समान लिंगानुपात का दावा पेश कर संस्थाएं अपनी पीठ थपथपा लेती हैं। साथ ही, स्त्री सापेक्ष सुविधाएं प्रदान कर जेंडर संवेदनशील दिखने के तमाम प्रयासों की खानापूर्ति भी हो जाती है परंतु इस सबके बावजूद स्त्रियों को कमतर समझने का सामाजिक मनोभाव ज्यों का त्यों बना रहता है। इसकी वजह को समझना आवश्यक है। मानव विकास के प्रारम्भिक चरण के यदि कुछ कालों को छोड़ दिया जाए जिसकी ऐतिहासिक पुष्टि भी होती है कि प्रारम्भ में स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं था, दोनों शारीरिक-मानसिक धरातल पर समान थे, परंतु मानव विकास के क्रम में धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष के बीच विभेद गहराता चला गया। 


यदि एंगल्स की व्याख्याओं को मानें तो जैसे-जैसे समाज में उत्पादन के साधनों एवं अधिशेष पर पुरुषों का नियंत्रण होता गया, वैसे-वैसे पुरुष उत्पादक एवं स्त्रियाँ अनुत्पादक होती चली गईं और उनकी भूमिका प्रजनन तक सिमटती चली गई। जीवन का दायरा घरों तक सीमित होने कारण धीरे-धीरे स्त्रियाँ सार्वजनिक विमर्श से अदृश्य होने लगीं। उनके अनुभव, स्मृतियाँ, उदाहरण, इतिहास, संबंध, सभी की परिधि सिमटने लगी। फलस्वरूप, समाज में जेंडर की संरचना का विरोधाभासी स्वरूप आकार ग्रहण करने लगा। पुरुष बुद्धिमान, गंभीर, तार्किक, कर्ता और गृहस्थी का स्वामी हुआ और स्त्रियों को चंचल, वाचाल, बुद्धिहीन, पराश्रित और गृहस्वामिनी का दर्जा मिला। समाज मंथर गति से चलता हुआ ‘आधुनिक’ तो हुआ पर स्त्री पुरुष को समान मान कर उनके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करने एवं स्त्रियों की बौद्धिक क्षमताओं पर विश्वास करने का जनमानस पूरी ईमानदारी से पुनः तैयार न हो सका। नतीजा यह निकाला कि वर्तमान चुनौतीपूर्ण आर्थिक व्यवस्था में, जहाँ रोजगार के अवसर निरंतर कम हो रहे हैं। लोग बेरोजगारी और भुखमरी के शिकार हो रहे हैं, वहाँ स्त्रियों का घरों से निकाल कर, पढ़-लिख कर, एक बेहतर रोजगार पाने का दावा करना दरअसल सीमित अवसरों में हिस्सेदारी की दावेदारी है। इस स्थिति को संयमित हो कर निर्णय लेने की बजाए अवसरों में सभी की भागीदारी सुनिश्चित न हो, इस पर अधिक ध्यान दिया गया। इसके लिए आवश्यक था कि स्त्रियाँ अपने साथ घटने वाली यौन हिंसाओं के डर से या कार्यस्थल पर अक्षम साबित हो जाने के संभावित भय से अपना आत्मविश्वास खोती रहें और कम वेतन पर निम्न श्रेणी लिपिकों, परिचारिकाओं, रिसैप्शनिस्ट या हद से हद औसत माने जाने वाले पदों पर सिर झुका कर कार्य करती रहें। यह विचार वर्तमान पूंजवादी व्यवस्था एवं पितृसत्तात्मक सत्ता दोनों के लिए स्वागत योग्य है। स्त्री विमर्श की लड़ाई इन विचारों से है जो मनुष्य होने के नाते उनकी गरिमा और मानवाधिकारों को प्रभावित करते हैं। इसलिए यह सिर्फ स्त्री अस्मिता का प्रश्न नहीं, अपितु आदर्श मानव समाज के लिए अपेक्षित न्यूनतम अहर्ताएं हैं। 


हमने विगत कुछ वर्षों में वैचारिक आधुनिकता का सफर तय किया है और स्त्री सशक्तीकरण के संदर्भ में कई दावे पेश किए जा रहे हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि स्त्रियों ने पहले की अपेक्षा अब अधिक स्वतन्त्रता हासिल कर ली है, वे ज्यादा सशक्त हुई हैं। उन्होने जमीन से ले कर आसमान तक का सफर तय कर लिया है। जबकि कुछ लोगों ने इस बात को बहुत गहराई से महसूस किया है कि पिछले कुछ सालों में विकास के तमाम दावों के बावजूद आर्थिक संरचनाओं में बदलाव, भूमंडलीकरण एवं मुक्त बाज़ार की अवधारणा ने स्त्रियों के सशक्तिकरण के नाम पर उनका पण्यीकरण अधिक किया है। आज स्त्री की कोख भी बाज़ार में उपलब्ध है। सेरोगेसी की शर्तों से बंधी हुई आर्थिक तौर पर कमजोर स्त्री अपने गर्भ से ही विलगित की जा रही है। 'माई बॉडी, माइ च्वाइस' के स्त्रीवादी विमर्श को भी इस पूंजीवादी बाज़ार व्यवस्था ने अपने निहितार्थों के लिए दिग्भ्रमित किया है। इसके परिणाम अंततः स्त्री समुदाय की गरिमा एवं सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति को भयावह ढंग से प्रभावित कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों के राष्ट्रीय आपराधिक ब्यूरो के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि स्त्रियों के साथ यौन अपराध के बाद उनकी निर्मम हत्या कर देने की घटनाएँ एवं प्रवृतियाँ लगातार बढ़ी हैं। हम एक ऐसे समाज में रहने को अभिशप्त हैं जहाँ ओटीटी प्लेटफार्म के ज़रिए घरों में हिंसा के क्रूरतम रूप को सामान्य घटना के रूप में परोसा जा रहा है। विशेषकर स्त्रियों के प्रति होने वाली हिंसा को। हम सभी जाने-अनजाने एक अदृश्य आनंद की अनुभूति के लिए क्रूरतम हिंसा को न्यू नार्मल मानने लगे हैं। 'एनिमल' और उसके जैसी कई फिल्में इसका जीवंत उदाहरण हैं।  प्रश्न यह है कि स्वतंत्र जीवन और विचारधारा की आकांक्षा रखने वाली स्त्री या कोई भी सामान्य व्यक्ति आज के हिंसक दौर में इतने असामान्य व्यक्ति के रूप में क्यों देखे जा रहे हैं? जातिगत, धार्मिक अथवा लैंगिक हिंसा का जश्न मनाने वाला समुदाय अंततः इसी सामाजिक व्यवस्था की देन हैं जिसे मीडिया ने निर्मित एवं प्रशिक्षित किया है। इस समाज को सुंदर और रहने योग्य बनाने के लिए अहिंसा को चुनना होगा। यह सिर्फ स्त्रियों का नहीं बल्कि सबके सरोकार का विषय है। 



वर्तमान दौर में हिन्दी समाज की स्त्रियाँ घर और बाहर के दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वाहन रही हैं। उनसे परिवार एवं समाज को बहुत अपेक्षाएं हैं परंतु स्त्रियों द्वारा की गई अनगिनत कोशिशों के बावजूद भी वे समाज में अपना अपेक्षित स्थान हासिल नहीं कर पाई हैं। वे अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद से लगातार गुजर रही हैं। आज भी, उन्हें निजी संबंधों, पारिवारिक दायित्वों तथा कार्य-स्थल पर स्वयं को प्रमाणित करने की आवश्यकता पड़ती है। हम उनकी केंद्रीय भूमिकाओं के साथ उन्हें स्वीकार तो करते हैं पर उनकी सामाजिक स्थिति को परिधि पर ही बनाए रखते हैं। स्त्रियों को उनकी संपूर्णता में स्वीकार न कर पाने के पीछे मनोवैज्ञानिक आधार एवं उभरते हुए स्त्रीवादी हस्तक्षेप की पड़ताल आवश्यक है। भारत में स्त्रीवादी चिंतन के मूल्यांकन की कोई सम्यक कसौटी अभी भी  हमारे पास उपलब्ध नहीं है और  गंभीर अकादमिक चिंतन के रूप में भारतीय स्त्रीवाद का इतिहास तलाशने का प्रयास अपेक्षित रूप से नहीं हुआ है। आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि इस प्रकार के अस्मितामूलक विमर्शों की भारत में कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि हमारी संस्कृति में स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान दिया जाता है। भारतीय संदर्भों में स्त्रियों के लिए अधिकार, समानता, समता, संघर्ष एवं शोषण जैसे शब्दों का प्रयोग प्रासंगिक नहीं माना जाता है। कई बार इसके प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी उभरता है जो मानता है कि स्त्रीवाद समग्र एवं समावेशी समाज की संकल्पना के विपरीत एकांगी विमर्श को स्थापित करने का विखंडनवादी प्रयास है। विचारणीय प्रश्न यह है कि सांस्कृतिक जीवन में गहरे जड़ जमाए सामंती-बोध वाले हिन्दी पट्टी में स्त्री प्रश्नों एवं स्त्रीवाद के प्रति संवेदनशील विमर्श की प्रस्थापना किस प्रकार होनी चाहिए क्योंकि स्त्रियों की स्थिति को सर्वकालिक एवं सार्वभौमिक रूप से संतुष्टिप्रद मानने की भूल हमें उनकी वास्तविक स्थिति को जानने से वंचित करती है।


अस्मिता का विमर्श दरअसल आत्म या स्व के बोध का विमर्श है। अभाव से भाव पैदा होता है जिसकी परिणति स्व की प्राप्ति के प्रयत्नों के रूप में होती है और आंदोलनों का स्वरूप ग्रहण करती है। बचपन में सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से संस्कारित होता ‘स्त्रीत्व’ एवं ‘पुरुषत्व’ के भाव से भरा हुआ मन अपने मनमाफिक से ‘वंचित’ हो जाने की टीस को आजीवन अपने अंतःस्थल में छुपाए अपनी अस्मिता का गुपचुप संधान करता है। यह भाव ही समाज में लैंगिक जड़ताओं एवं पूर्वाग्रहों के खांचे को तोड़ कर ट्रांसजेंडर पहचानों को भी स्वीकार्यता दिलाने की लड़ाई लड़ता है। 


मैं जिंदगी का जश्न मनाता चला गया, 

हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया... 


का फकीराना अंदाज भी तो आत्म के संधान एवं मुक्ति के विमर्श का ही आख्यान है। अस्मिता का यह आंदोलन सिर्फ स्व तक ही सीमित नहीं होता। यहाँ यह प्रश्न भी समीचीन है कि स्व की चेतना का विकास कैसे हो? स्व और पर के बीच के तारों को उलझाए बिना एक मुकम्मल ‘आत्म’ का निर्माण कैसे हो जो अपनी मूल चेतना में ‘अस्मिता विमर्श’ को मानवीयता के विमर्श तक विस्तारित कर सके। गर्डा लर्नर ने 1993 में अपनी पुस्तक 'द क्रिएशन ऑफ़ फेमिनिस्ट कॉन्शसनेस' में यह तर्क दिया कि स्त्रियों में अपनी अधीनता के प्रति चेतना का भाव कई सदियों में धीरे-धीरे विकसित हुआ और  उन्होंने पितृसत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध दर्ज करना प्रारम्भ किया । स्त्रियों को स्वतन्त्रता और समानता पाने के लिए अपने इतिहास को पुनःसृजित करना पड़ा और बाइबिल जैसे पितृसत्तात्मक ग्रंथों को चुनौती देनी पड़ी। उन्होंने मध्य युग से ले कर 19वीं सदी के आखिर तक के इस 1200 साल के संघर्ष का विस्तार से वर्णन किया और यह समझने का प्रयास किया कि महिलाओं की अधीनता स्वाभाविक नहीं थी, बल्कि यह इंसान द्वारा निर्मित ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा थी। पितृसत्तात्मक विचारों से अपने अन्तर्मन को चेतस करने और स्त्रियों के बारह सौ वर्षों के संघर्ष का दस्तावेजीकरण करने वाली यह शानदार रचना स्त्रीवादी सिद्धांत, वैचारिक इतिहास और हमारी बौद्धिक परंपरा में स्त्रियों के स्थान के संदर्भ में नई दृष्टि प्रदान करती है। 


गर्डा लर्नर के पूर्व भारत में ‘स्वराज’ प्राप्ति के लिए संघर्षरत अहिंसक सत्याग्रही महात्मा गांधी बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में यह मानते हैं कि भारतीय समाज में स्त्रियों की लड़ाई न तो पुरुषों के विरुद्ध है और न ही किसी अन्य वर्चस्वशाली सत्ता के विरुद्ध। उनकी पहला ‘अन्य’ उनका ‘स्व’ है जिसके प्रति चेतनाशील हुए बिना वे अपनी अस्मिता के प्रति कभी सजग नहीं होंगी। अपने स्व को प्राप्त किए बिना स्त्रियाँ न तो पराधीनता को समझ पाएँगी और न ही उससे स्वतंत्र होने का प्रयास करेंगी, इसलिए स्त्रियों के संदर्भ में अपने होने को महसूस कर लेना और उसकी गरिमा की रक्षा हेतु उठ खड़े होना ही ‘स्वराज’ प्राप्ति का पहला कदम है। गांधी इसे ‘आध्यात्मिक नारीवाद’ कहते हैं जो आत्मसंधान की प्रक्रिया है। आत्मसंधान का रास्ता उनकी दृष्टि में आध्यात्मिक होना है। जो सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक है, वह स्वराज का वास्तविक हकदार है। इसलिए स्त्रियों को उनके हिस्से का स्वराज मिलना ‘मानवता’ के मूल्य की प्रतिष्ठा हैl। यह आदर्श और समावेशी समाज का यूटोपिया है जो जाति, वर्ग, धर्म, लिंग और देश की सीमाओं के पार जाता है और विश्वव्यापी अस्मिता का विमर्श बन जाता है। 


भारत जैसे विविधता से भरे देश में महिला सशक्तिकरण एक अत्यंत जटिल, बहुआयामी और ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान में महिलाओं को समान अधिकार, शिक्षा, मतदान का अधिकार, संपत्ति में भागीदारी और जीवन की गरिमा का वचन दिया गया। इसके बावजूद, व्यावहारिक धरातल पर यह स्पष्ट होता है कि महिलाएँ आज भी कई स्तरों पर संघर्षरत हैं। भारतीय लोकतंत्र ने संविधान में समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के जो आदर्श स्थापित किए, वे स्त्री सशक्तिकरण की बुनियादी आधारशिला हैं, लेकिन आधुनिक संदर्भ में यह दावे, वादे और इरादों के जटिल जाल में उलझा हुआ है। एक ओर सरकारें और समाज महिलाओं की समानता, सशक्तिकरण और अधिकारों की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर वास्तविकता में पितृसत्तात्मक संरचनाएं, हिंसा और असमानता की दीवारें खड़ी हैं । मुक्ति का अर्थ केवल कानूनी सुधार या आर्थिक भागीदारी नहीं, बल्कि महिलाओं की स्वायत्तता, शारीरिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय है । 21वीं सदी के भारत में स्त्री सशक्तिकरण केवल नीतिगत कार्यक्रम नहीं, बल्कि राजनीतिक भाषण, चुनावी घोषणापत्र, अंतरराष्ट्रीय मंचों और सामाजिक अभियानों का केंद्रीय विषय बन चुका है। राज्य, बाज़ार और नागरिक समाज तीनों स्तरों पर स्त्री सशक्तिकरण के दावे किए जा रहे हैं। संसद में पारित कानूनों से लेकर विज्ञापनों में उभरती ‘आत्मनिर्भर स्त्री’ की छवि तक, हर जगह मुक्ति का भाष्य उपस्थित है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या ये दावे वास्तविक मुक्ति की ओर संकेत करते हैं, या वे केवल प्रतीकात्मक उपलब्धियों का उत्सव हैं?


भारत सरकार ने पिछले दशकों में कई वादे किए हैं जो स्त्री मुक्ति की दिशा में प्रगति का दावा करते हैं। उदाहरण के लिए, 2023 में पारित महिला आरक्षण बिल जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का वादा करता है। यह दावा है कि इससे महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण होगा और निर्णय-प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं के लिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कोटा का एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान भारतीय लोकतंत्र में हाशिए के समूह के लिए गुणात्मक परिवर्तन ला सकता है। यह हाशिए के समूहों की राजनीतिक संस्कृति पर पितृसत्तात्मक सामाजिक समूहों द्वारा प्रभुत्व बनाए रखने की प्रवृति को कम करेगा जिससे भारत में एक नई राजनीति का भी प्रारम्भ होगा। महिलाओं की चुनावी भागीदारी में उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति का विशेष प्रभाव होता है। उच्च वर्ग की महिलाओं में राजनीतिक भागीदारी अधिक पाई जाती है, जबकि निम्न सामाजिक-आर्थिक तबके की महिलाओं में यह भागीदारी कम देखी जाती है। हालाँकि,  पिछले कुछ वर्षों में सम्पन्न हुए चुनावों में मतदाता के रूप में महिलाओं की भूमिका बढ़ी है। अनेक राज्यों में विभिन्न चुनावों में महिलाएँ पुरुषों के समान मतदान कर रही हैं, जबकि कई स्थानों पर वे पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान कर रही हैं। इसके अलावा महिलाएँ अपनी राजनीतिक पार्टी एवं उम्मीदवार की पसंद को लेकर भी स्वायत्त हो रही हैं, किंतु अभी भी यह प्रवृति शहरी तथा शिक्षित महिलाओं में अधिक देखी गई। महिला आरक्षण अधिनियम अभी भी एक अधूरा सपना है। यह कानून संसद और विधानसभाओं में 33% सीटों का वादा करता है, किंतु कार्यान्वयन 2026 के बाद की जनगणना और परिसीमन पर टिका हुआ है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह 2029 चुनावों में भी लागू नहीं हो पाएगा। राजनीतिक सशक्तिकरण का यह वादा, जो एक क्रांति का बीज था, आज विलंब की धुंध में खोया हुआ लगता है। संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 13.8% तक गिर गया है। यह गिरावट बताती है कि वादे कितने भी भव्य हों, बिना ठोस समय-सीमा और इच्छा-शक्ति के वे हवा में तैरते रहते हैं। 



मुद्रा योजना के तहत 69% लोन महिलाओं को दिए गए हैं, जिससे 2024 तक लगभग 480 मिलियन लोन महिलाओं को संवितरित किए गए, जो महिलाओं की उद्यमिता को बढ़ावा देने का दावा करता है। इसके अलावा, मिशन शक्ति जैसी योजनाएं महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण पर केंद्रित हैं, जिसमें वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पडेस्क और डिजिटल शिकायत प्रणाली शामिल हैं। 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान ने लड़कियों की शिक्षा में वृद्धि का दावा किया है। ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध और सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसे कदम धार्मिक और कानूनी समानता के वादे को मजबूत करते हैं। ये वादे बताते हैं कि भारत महिलाओं के नेतृत्व वाली विकास (women-led development) की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जैसा कि G20 की न्यू दिल्ली घोषणा में भारत ने वैश्विक स्तर पर जोर दिया। ग्रामीण भारत, जहाँ देश की आधी से अधिक आबादी निवास करती है, वहाँ स्त्री स्वतंत्रता की अवधारणा अब केवल एक आदर्श नहीं रह गई है, बल्कि एक जीवंत वास्तविकता बन रही है। 2026 में, जब भारत 'विकसित भारत@2047' की दिशा में तेजी से अग्रसर है, ग्रामीण महिलाएँ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की नई ऊँचाइयों को छू रही हैं। सरकारी योजनाएँ जैसे 'लखपति दीदी', 'एसएचई-मार्ट्स' और 'मुद्रा योजना' ने उन्हें क्रेडिट से उद्यमिता की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, फिर भी, पितृसत्तात्मक बंधन, असमानता और हिंसा की छाया अभी भी लंबी है । 2026 में ग्रामीण भारत में स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ अब केवल घर की चारदीवारी से बाहर निकलना नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक सम्मान प्राप्त करना है।


इरादे और वास्तविकता: दावों की सच्चाई


हालांकि ये वादे सुनने में आकर्षक हैं, लेकिन इरादे अक्सर सतही साबित होते हैं। ये दावे पितृसत्ता को चुनौती देने की बजाय उसे मजबूत करते हैं, क्योंकि वे महिलाओं को 'सुरक्षा' या 'सशक्तिकरण' के नाम पर नियंत्रित रखते हैं। उदाहरण के लिए, 2025 के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 131वें स्थान पर है, जहां आर्थिक भागीदारी में मामूली सुधार हुआ है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी ने रैंकिंग को नीचे खींचा। महिलाएं कार्यबल का 41% हैं, लेकिन मैनेजरियल भूमिकाओं में केवल 24%। महिला श्रम भागीदारी दर 2024 में 21% तक पहुंची, जो वैश्विक स्तर पर कम है । 2013 का क्रिमिनल लॉ (संशोधन) अधिनियम यौन हिंसा के विरुद्ध कठोर प्रावधान ले कर आया। इसके अतिरिक्त, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम (POSH Act) भी स्त्री सुरक्षा के दावे को सुदृढ़ करता है। न्यायिक प्रक्रियाएँ लंबी और पीड़ित-प्रताड़क हो सकती हैं। ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र में जागरूकता का अभाव है। इस प्रकार, कानून मुक्ति का वादा तो करता है, पर उसका सामाजिक क्रियान्वयन अभी भी संघर्षशील है।


‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान ने बालिका शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया। विश्वविद्यालयों में छात्राओं की संख्या बढ़ी है। किन्तु STEM क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी अभी भी सीमित है। उच्च शिक्षा तक पहुँच जाति, वर्ग और क्षेत्रीय असमानताओं से प्रभावित है। महानगरों में निजी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली युवतियाँ आत्मनिर्भरता का दावा करती हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों का विद्यालय से ड्रॉप-आउट विवाह और श्रम के कारण बढ़ता है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में ‘लीडरशिप में महिलाएँ’ अभियान, स्टार्टअप संस्कृति में महिला उद्यमिता ये सब मुक्ति के नए प्रतीक हैं। परंतु राष्ट्रीय आँकड़े बताते हैं कि महिला श्रमबल सहभागिता दर अभी भी निम्न है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाएँ घरेलू कामगार, कृषि श्रमिक, आशा कार्यकर्ता असुरक्षित और कम वेतन वाली परिस्थितियों में काम करती हैं। 'वर्क फ्रॉम होम' को स्त्री-हितैषी विकल्प कहा गया, परंतु इससे घरेलू और पेशेवर श्रम का दोहरा बोझ बढ़ा।


अतः आवश्यक है कि स्त्री मुक्ति को केवल 'वादे' के रूप में नहीं, बल्कि 'इरादे' और 'कार्यान्वयन' की ठोस प्रक्रिया के रूप में देखा जाए जहाँ स्त्री अपने शरीर, श्रम, समय और निर्णय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करे। जैसे कोई पुरानी लोककथा जो आज भी गूंजती है, स्त्री मुक्ति का यह विमर्श 2026 के भारत में और अधिक तीव्र हो उठा है। वादे अभी भी चांदी-सी चमक बिखेरते हैं: महिला आरक्षण का कानून, मिशन शक्ति की छत्रछाया, डिजिटल युग में सुरक्षा के नए वादे किंतु इरादे की परीक्षा आज और कठिन हो गई है। वर्तमान समय में, जब विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 भारत को 148 देशों में 131वें स्थान पर रखती है (स्कोर मात्र 64.4%), जब अपराध की काली छायाएं अभी भी महिलाओं की सांसों को घेरती हैं, और जब डिजिटल हिंसा एक नई महामारी की तरह फैल रही है। वादे कितने भी ऊंचे क्यों न हों, यदि इरादे कमजोर हैं, तो मुक्ति एक अधूरी कविता बनी रहती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के 2022 आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 4,45,256 मामले दर्ज हुए, जो पिछले वर्ष से 4% अधिक हैं, यानी हर घंटे 51 शिकायतें। राष्ट्रीय अपराध दर प्रति लाख महिलाओं पर 66.4 है, और दिल्ली, हरियाणा, तेलंगाना जैसे राज्यों में यह दोगुनी से अधिक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-21 के अनुसार, 32% विवाहित महिलाओं ने जीवन में शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा का अनुभव किया है। ये आंकड़े बताते हैं कि कानूनी वादे जैसे मिशन शक्ति के बावजूद, रिपोर्टिंग की कमी और सांस्कृतिक वर्जनाएँ हिंसा को छिपाती हैं। इरादे सवालों के घेरे में आते हैं क्योंकि ये नीतियां अक्सर व्यक्तिगत निहितार्थों के लिए बनाई जाती हैं, न कि जड़ से पितृसत्ता को उखाड़ने के लिए।


उदाहरण के रूप में, निर्भया केस (2012) के बाद निर्भया फंड बनाया गया, लेकिन 2023 तक इसके उपयोग में कमी आई, और अपराध दरें बढ़ती रहीं। #MeToo आंदोलन ने 2018 में महिलाओं की आवाज को मजबूत किया, लेकिन कई मामलों में आरोपी बरी हो गए या कोई कार्रवाई नहीं हुई, जो दर्शाता है कि सिस्टम महिलाओं की बजाय शक्तिशाली पुरुषों की रक्षा करता है। आदिवासी महिलाओं के मामले में, उत्तराधिकार अधिकारों पर प्रथा-आधारित कानून महिलाओं को संपत्ति से वंचित रखते हैं, और हाल के बहसों में भी कोई ठोस बदलाव नहीं आया। पेंशन नियमों में 2024 के बदलाव ने महिलाओं को परिवार पेंशन में बच्चों को नामांकित करने की अनुमति दी, लेकिन यह महिलाओं को 'पीड़ित' के रूप में देखता है, न कि स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में। 2025-2026 में टेक्नोलॉजी-फेसिलिटेटेड जेंडर-बेस्ड वायलेंस एक भयावह वास्तविकता बन गई है। Breakthrough और Equality Now की रिपोर्ट (नवंबर 2025) में सर्वाइवर्स की कहानियां डॉक्सिंग, डीपफेक, इमेज-बेस्ड अब्यूज, स्टॉकिंग दिखाती हैं कि ऑनलाइन हिंसा ऑफलाइन जीवन को कैसे निगल जाती है। महिलाएं, विशेषकर दलित, LGBTQI और विकलांग इससे अधिक प्रभावित हैं। यह नई चुनौती पुराने पितृसत्ता को डिजिटल रूप दे रही है वादे 'सुरक्षित डिजिटल स्पेस' के हैं, किंतु इरादे अभी भी सतही। जरूरत है वादों को ठोस धरातल पर इरादों में बदलने की।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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