प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर'
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| प्रचण्ड प्रवीर |
यह एक विडम्बना ही है कि दुनिया के एक बड़े लोकतन्त्र का राष्ट्रपति आज निरंकुश शासक की भांति व्यवहार कर रहा है। लोकतन्त्र को बचाने के नाम पर किसी भी देश में दखलंदाजी देना उसका शगल है। उसका तकिया कलाम ही है 'थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर'। उसे रोकने टोकने वाला कोई नहीं है। उसके विचारों में प्रायः कोई स्पष्टता नहीं होती लेकिन वह जो कुछ बोलता है लगता है स्पष्ट ही बोल रहा है। वह अपने निर्णयों से अक्सर अपने देश को ही संकट में डाल देता है। लेकिन अब जो युद्ध उसने छेड़ दिया है उसने समूची दुनिया के सामने ऊर्जा का संकट खड़ा कर दिया है। प्रचण्ड प्रवीर अपनी कहानी 'थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर' में बखूबी अपनी बात रख दी है। कहानी की एक पात्र प्रियंवदा भी साधिकार और बेफिक्री से बोलती है। कहानी का एक अंश देखिए - "प्रियंवदा ने कहा, “डेटा एनालिसिस मेँ क्या है? सांख्यिकी! पहले मुझे यह एकदम अच्छा नहीँ लगता था। धीरे-धीरे मैँने इसके बारे मेँ सोचना शुरू किया। आज तो पूरी दुनिया डेटा एनालिसिस मेँ लगी है। पर सोचने वाली बात है कि जहाँ डेटा नहीँ हो, वहाँ एनालिसिस क्या होगा?” आज जब कहानीकार अपनी कहानी में सब कुछ कह देने की चेष्टा करता दिखाईं पड़ता है प्रवीर करीने से अपनी बात कह डालते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर'।
कल की बात – २८७
'थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर'
प्रचण्ड प्रवीर
कल की बात है। जैसे ही मैँने राजबाटी के बगल वाली भूसा गली मेँ कदम रखा, पूरे शहर की बिजली एकबारगी चली गयी। बीस साल पहले बिजली आ जाना आश्चर्य की बात हुआ करती थी, वहीँ अब बिजली कटना आश्चर्य की बात है। गली मेँ कोई चिल्लाया, “अब बिजली रात मेँ नौ बजे आयेगी। गैस की किल्लत की अफवाह के कारण जिसे देखो वह दो-तीन गैस सिलिण्डर ले कर घर भर रहा है। इतना ही नहीँ सारे के सारे मुफ्त बिजली के कारण ‘हीटर’ पर खाना बना रहे हैँ। देखना, खाना बन जाने का समय निकलते ही बिजली आ जायेगी।” अमरीका-ईरान युद्ध के कारण तरह-तरह की समस्याओँ से लेकर अफवाहोँ तक का बाजार गर्म है। लेकिन फिक्र-ए-दुनिया मेँ सर खपाता हूँ, मैँ कहाँ और ये बवाल कहाँ। लिहाजा जब मैँने राजबाटी के दक्षिण मेँ स्थित विशाल मन्दिर के एक कोने मेँ बने सौ साल पुराने छोटे से घर का दरवाजा खटखटाया, बरसोँ पुराना लकड़ी का बदरंग और बेजान नक्काशीदार दरवाजा थोड़ा-सा खुला। धुँधलके मेँ मैँने अर्ज किया, “प्रीति जी?” प्रीति जी ने मेरी आवाज़ पहचान कर किवाड़ का पल्ला पूरा खोला। मैँने अपने झोले से पैकेट निकाल कर उन्हेँ देते हुए कहा, “माँ की कुछ और साड़ियाँ हैँ। इनमेँ भी फॉल लगाना है और पिको करना है। इसके ब्लाउज का कपड़ा निकाल कर दे दीजियेगा।” प्रीति जी ने मेरे हाथोँ से पैकेट ले कर अधिकार से कहा, “तनिक बैठिये।”
मैँ समझ गया था कि उन्हेँ क्या कहना है। छोटे शहर के कुटीर उद्योग मेँ फॉल-पिको लगाने के साथ ब्लॉउज और अन्य सिलाई-कढ़ाई का काम भी होता है। पर जैसे कि गुड़िया कहती थी कि ब्लाउज बुटीक वाले लड़के बेहतर बनाते हैँ, वैसी ही राय अधिकतर महिलाएँ रखती हैँ। सो, मुझे साड़ी मेँ से ब्लाउज का कपड़ा निकलवा कर दूसरे बुटीक वाले दुकान मेँ देना था, जहाँ से फॉल-पिको लगाना थोड़ा महँगा पड़ता है। छोटे कद की समझदार प्रीति जी बिजनेस समझती थीँ। मैँ समझ रहा था कि वे मुझे समझायेँगीँ कि उनके यहाँ भी ब्लाउज का काम अच्छा होता है, पर मुझे समझाने से क्या होता है?
मैँ अन्दर जाने से झिझक रहा था कि तभी अन्दर से मोमबत्ती की काँपती लौ को हवा से बचाते हुए एक बड़ी दिलकश देवी जी बैठक मेँ आ गयी। सुन्दरता के बारे मेँ मेरी परिकल्पनाएँ इस तरह की हैँ कि यदि किसी के भी चेहरे पे विशेष तरह से प्रकाश डाला जाय तो वह सुन्दर दिखेगा। कुल मिला कर जिसे मैँ सुन्दरता समझता हूँ, वह जर्मन दार्शनिक गेटे के शब्दोँ मेँ रङ्ग की तरह ही अन्धेरे और प्रकाश का खेल है। परन्तु यहाँ मेरी विशिष्ट परिकल्पना की आवश्यकता नहीँ थी। उस सौम्य-सी देवी के चेहरे का नूर बता रहा था कि वह पच्चीस पहुँचने से अभी दूर है। साथ ही बिलाशक चाँद आईना उनका और सितारे नक्श-ए-कदम थे। मैँ स्वयं खिँचा-खिँचा, ऋष्यशृङ्ग की तरह, उनके बैठक मेँ चुपचाप इस आशा से बैठ गया कि सरसराती हवा से थरथराती लौ का प्रकाश मेरे चेहरे पर किसी ऐसे कोण से पड़े कि मैँ भी उन देवियोँ को आकर्षक लगूँ।
प्रीति जी ने मुझसे कहा, “यह मेरी सहेली प्रियंवदा है। दरअसल...।” कुछ और कहने से पहले प्रियंवदा ने टोक कर कहा, “सुना है आप दिल्ली मेँ डेटा एनालिसिस का काम करते हैँ।” मैँने हाँ मेँ सिर हिलाया। प्रियंवदा ने बेफिक्री से कहा, “डेटा एनालिसिस मेँ क्या है? सांख्यिकी! पहले मुझे यह एकदम अच्छा नहीँ लगता था। धीरे-धीरे मैँने इसके बारे मेँ सोचना शुरू किया। आज तो पूरी दुनिया डेटा एनालिसिस मेँ लगी है। पर सोचने वाली बात है कि जहाँ डेटा नहीँ हो, वहाँ एनालिसिस क्या होगा?”
मैँ पहले ही उसके रूप से हतप्रभ था। इतने अधिकार से रूपसी ने अपना बयान रखा तब मैँ हामी भरने के अलावा क्या कर सकता था? प्रियंवदा ने अपनी रौ मेँ कहा, ”पिछली बार, यानी हफ्ता भर पहले आपका काम गड़बड़ हो गया था और आप दुबारा आये थे कि साड़ी का पिको लगाना एक किनारे पर छूट गया था, तब की बात है। तब ही मैँने यह सोचा था डेटा नहीँ हो तो वहाँ एनालिसिस क्या होगा।” आठ दिन पुरानी बात याद कर के मैँने हैरानी से पूछा, “आप पिछली बार यहाँ पर थी?”
“ये लो प्रीति। इनको कुछ याद नहीँ है।” प्रियंवदा ने प्रीति की तरफ देखा। मैँने सकपका कर कहा, “वो ध्यान नहीँ दिया होगा। अब याद रहेगा।” प्रियंवदा ने डपट कर कहा, “थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर! अब ऐसा है कि जब से मुझे ‘नियर डेथ एक्पीरियेंस’ हुआ है, तब से मुझे ‘डेटा एनालिसिस’ मेँ बहुत रुचि हो गयी है।” यह सुनते के साथ मुझे झटका लगा। अविश्वास से मैँने दुहराया, “नियर डेथ एक्पीरियेंस?” प्रियंवदा ने प्रीति जी की तरफ देख कर कहा, “उस शाम को जब मैँ बेहोश हुई, तो मुझे क्या सबको यही लगा कि मैँ स्वर्ग सिधार गयी। पर मैँ भी ऐसी सख्तजान हूँ, जिसको मारने के लिए मौत को भी कई-कई बार सोचना पड़ता है।”
“क्या हुआ था?” घबराहट मेँ मैँने कुर्सी का हत्था मजबूती से पकड़ लिया। प्रियंवदा कहती रही, “पहले बहुत प्रकाश था। एकदम श्वेत। माहौल एकदम शान्त। जब रोशनी कुछ कम हुई तो मैँ एक विशाल हॉल मेँ अकेली खड़ी थी। सामने यमराज का खाली पड़ा सिंहासन था और बगल मेँ चित्रगुप्त महाराज बायेँ हाथ मेँ टैबलेट लिये फटाफट दाहिने हाथ की तर्जनी से उसे लगातार स्क्रॉल किये जा रहे थे। मैँ सख्तजान निडर हो कर चित्रगुप्त भगवान् से बोली – ‘महाराज, मुझ भाग्यहीना को यहाँ क्योँ लाया गया है?’ भक्तवत्सल चित्रगुप्त भगवान् ने टैबलेट से एक क्षण के लिये निगाह हटा कर के मुझसे कहा, ‘गलती हो गई।‘ वे वापस अपना टैबलेट देखने लगे। मैँने पूछा, ‘क्या हुआ? आपने डेटा क्लाउड मेँ स्टोर नहीँ किया था?’ चित्रगुप्त भगवान् ने कहा, ‘क्लाउड मेँ ही डेटा स्टोर था पर उसमेँ किसी मरदूद यमदूत से डेटा एन्ट्री मेँ गलती हो गई थी। तुम ठहरी पवनपुत्र हनुमानभक्त। जब बजरंगबली को यह खबर हुई कि तुम यहाँ आ रही हो तो उन्होँने फूँक मार के समूचा क्लाउड ही द्युलोक मेँ उड़ा दिया है। इसीलिये, सब ठीक करने मेँ देर लग रही है। रुको मैँ सिस्टम रिबूट करता हूँ।' मैँने सोचा कि हर मङ्गलवार को बारह रूपये का दो लड्डू चढाना आज काम आ ही गया। यहाँ तक आना हो ही गया है तो यमराज के आने से पहले कुछ डेटा एनालिसिस करवा लिया जाय। मैँने उनको टोका, ‘नहीँ नहीँ भगवान्। रुक जाइये। सिस्टम रिबूट करने से पहले मेरे कुछ साधारण प्रश्नोँ को उत्तर दे दीजिये।' भगवान् चित्रगुप्त ने खाली पड़े सिंहासन पर नजर फेरते हुए कहा, ‘यमराज के आने से पहले पूछ लो। एक बार वो आ गये तो इस गलती पर मुझे बड़ी डाँट सुननी पड़ेगी।' मैँने उनसे कहा, ‘थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर! और फिर वे प्रश्न पूछे जिसे जानना मेरी बचपन की ख्वाहिश थी। पहला सवाल, भगवान यह बताइए कि मैँ हर दिन औसत कितने घण्टे सोती रही। चित्रगुप्त भगवान् ने बताया, ‘अब तक तुम आठ हजार नौ सौ बहत्तर दिन जी चुकी हो। तुम्हारे सवाल के लिये उसमेँ बचपन के चार सौ चौँसठ दिन हटा कर बताना ठीक रहेगा। साथ ही बीमारी वाले दो सौ तेरह दिन हटा कर औसत आता है - सात घण्टे तेरह मिनट।‘ अब देखिये करुणानिधान भगवान् चित्रगुप्त को पता था कि कौन-सा डेटा हटा देना चाहिये वरना एनालिसिस का मतलब क्या रह जायेगा।”
“और कुछ नहीँ पूछा?” मेरे सवाल पर बेफिक्र प्रियंवदा बोली, “थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर! पूछा न। पता चला कि औसतन मैँ साढ़े सात बजे तक नहा लेती हूँ। गर्मियोँ मेँ सुबह सात बज कर बारह मिनट पर और सर्दियोँ मेँ आठ बज कर नौ मिनट पर। और पूछा छुट्टी के दिन ...पता चला कि साल मेँ छुट्टियाँ मुझे मिलती ही नहीँ है क्योँकि छुट्टियोँ के दिन मैँ कुछ-न-कुछ काम ही कर रही होती हूँ। और पूछा.. हस साल मेरी खुशियोँ का पल धीमे-धीमे बढ़ रहा है। मैँने खुशी के बढ़ने की पिछले पाँच साल की ‘कम्पाउण्ड एनुअल ग्रोथ रेट’ (CAGR) पूछ ली। भगवान् चित्रगुप्त ने कहा कि एक दशमलव दो तीन प्रतिशत प्रतिवर्ष की रफ्तार से खुशियाँ साल-दर-साल बढ़ रही है। मैँने फिर दुख-दर्द की ट्रेण्डलाइन के बारे मेँ पूछा। उन्होँने कहा कि तुम्हारा दुख तो औसत भारतीय की तरह ‘एक्पोनेंशियल ग्राफ’ जैसा है। पर मैँ ठहरी सख्तजान ... मैँने पूछ लिया कि मेरे दोस्तोँ का मुझ पर भरोसे का बबल चार्ट बना कर दिखाइये। ‘एक्स-एक्सिस’ पर हो ‘स्नेह’ और ‘वाइ-एक्सिस’ पर हो ‘मिलते-जुलते विचार’। जितना बड़ा बबल, उतने भरोसेमन्द दोस्त। भगवान् चिढ़ कर बोले कि लड़की, तुम हमारी परीक्षा लेना चाहती हो? फिर उन्होँने मेरी उम्र के टाइमलाइन पर डायनमिक बबल चार्ट दिखाया कि कैसे दोस्तोँ के नाम के बबल बनते-बिगड़ते हैँ। मैँने देखा कि जीवन के सफर मेँ कितने नये दोस्त आते हैँ और कितने दोस्त सचमुच मेँ बुलबुले जैसे जाने कहाँ एकदम से फूट कर हवा मेँ विलीन हो जाते हैँ।”
मैँने चिढ़ कर पूछा, “अच्छा आपने ह्वाट-इफ एनालिसिस नहीँ पूछा। मेरा मतलब है कि ‘यूँ होता तो क्या होता’?”
“थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर!” प्रियंवदा मुझे देख कर मुस्कुरा कर बोली, “पूछा न। मैँने कहा, ‘भगवन्, अभी तो मैँ वापस मृत्युलोक पर भेजी जा रही हूँ, लेकिन अगर मैँ मरती नहीँ तो क्या होता?” उसकी चञ्चल चितवन से कुछ घबरा कर मैँने धड़कते दिल से पूछ लिया, “तो क्या होता?”
तभी एकदम से बिजली आ गयी। “थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर! आठ दिन पहले जिस शाम को मैँ किसी को देख कर बेहोश हो गयी थी, जिसने मेरे होश-ओ-हवास छीन लिये थे, भगवान् के दरबार मेँ उसी से बिना किसी रोक-टोक के मिला दी जाती। लेकिन... लेकिन मेरे लिये कोई बदनसीब क्योँ खामखाँ मर जाये?” कह कर हँसती हुई प्रियंवदा एकदम से उठी और बाहर निकल कर अपनी जूतियाँ पहन कर नौ-दो ग्यारह हो गयी। प्रीति जी ने मुझसे कहा, “देखिये ...।” मैँने मुद्दे की बात कही, “ब्लाउज का नाप नहीँ है मेरे पास।” प्रीति जी ने कहा, “मैँ वो नहीँ कह रही। प्रियंवदा मुम्बई मेँ किसी कंस्लटेंसी कम्पनी मेँ काम करती है। कल उसने ‘नियर डेथ एक्पीरियंस’ मेँ अमरीका-ईरान का युद्ध अगले आठ दिन मेँ रुक जाने की भविष्यवाणी कर दी थी।” फिर मेरी बदहवासी पर मुस्कुराते हुए उसने मुझसे कहा, “घबराइये नहीँ। बहुत लम्बी उमर है आपकी। थैंक यू फॉर योर अटेंशन टू दिस मैटर!”
ये कौन आ गया दिल को करता इशारे [१]
के महकी फ़ज़ा, मुस्कुराए नज़ारे
क़दम बढ़के तू चूम ले ऐ मोहब्बत
दिल को बहुत, उन पे प्यार आ रहा है
सबा से ये कह दो के कलियाँ बिछाए
वो देखो, वो जान-ए-बहार आ रहा है
ये थी कल की बात!
दिनाङ्क: १९/०३/२०२६
सन्दर्भ:
१. गीतकार – जलील मलीहाबादी, चित्रपट- बैंक मैनेजर (१९६०)
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


अत्याधिक हास्यपूर्ण
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