नीलेश रघुवंशी के उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' की अरुण कुमार द्वारा की गई समीक्षा




आज के समय में शहर हर व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इसकी तमाम वजहें होती हैं। हालांकि शहर का तिलिस्म वहां रहने के बाद धीरे धीरे टूटता चला जाता है। शहर का आक्रामक विस्तार आस पास के गांवों कस्बों को तो निगलता ही है साथ ही वह प्राकृतिक परिवेश को भी निगलते हुए आगे बढ़ता जाता है। शहर में सुविधाएं भले ही हों,  लेकिन मनुष्य सामाजिकता से कट कर एकाकी हो जाता है। आस पास के दुख दर्द से किसी का कुछ भी लेना देना नहीं होता। नीलेश रघुवंशी अपने उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' में भोपाल शहर के आस-पास के लोगों के बदलते जीवन और उनकी जद्दोजहद को रेखांकित करता है। लंदन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर फ्रेंसेस्का ऑर्सीन अपने एक इंटरव्यू में नीलेश के इस उपन्यास को हिन्दी के पॉच कालजई उपन्यासों में शुमार करती हैं। इस उपन्यास की एक समीक्षा की है अरुण कुमार ने। अरुण कुमार अपने यात्रा वृत्तान्त के लिए जाने जाते हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीलेश रघुवंशी के उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' की अरुण कुमार द्वारा की गई समीक्षा 'दस किलोमीटर में एक नहीं, अनेक कहानियां'।


'दस किलोमीटर में एक नहीं, अनेक कहानियां' 


अरुण कुमार


किसी रचना से आपका अकस्मात् परिचय होना और धीरे-धीरे उसकी गहराई में डूब जाना ठीक वैसा ही है जैसे किसी अज़नबी से ट्रेन में आपकी मुलाकात एक दोस्ती में बदल जाय। नीलेश रघुवंशी के उपन्यास ‘शहर से दस किलोमीटर’ से मेरे साक्षात्कार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।


पिछले वर्ष अक्टूबर के महीने में लंदन विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर फ्रेंसेस्का ऑर्सीन को मैं एक इंटरव्यू में सुन रहा था। उसके पहले मैंने उनका नाम भी नहीं सुना था। धन्य हो भारत सरकार का जिसके कारण वो उस समय सुर्खियों में थीं। इंटरव्यू में फ़्रेसेस्का के बारे में जान कर और उनके विचारों को सुन कर मैं प्रभावित था। 


उसी इंटरव्यू में जब एंकर अचला श्रीवास्तव ने उनसे हिंदी के पांच चुनिंदा उपन्यासों का नाम पूछा तो उन्होंने रेणु के 'मैला आंचल' वगैरह के साथ-साथ नीलेश रघुवंशी के इस उपन्यास का नाम लिया। नाम सुन कर अचला थोड़ी चौंकी क्योंकि उन्होंने यह नाम पहली बार सुना था। मेरे लिए भी रचना और रचनाकार दोनों के नाम नये थे। उसी वक्त मैंने इस क़िताब को ऑनलाइन मंगवाने का ऑर्डर दे डाला। क़िताब हाथ में आने के बाद मैं धीरे-धीरे उपन्यास में डूबता चला गया। वैसे पढ़ना तो खत्म हो गया। पर आज भी मैं नीलेश रघुवंशी की इस रचना से बाहर नहीं निकला हूं। 


उपन्यास की शुरुआत होती है चांद के वर्णन से। फिर शुरू होती है साईकिल की दुनिया। उपन्यास की वाचक एक महिला है। वह साईकिल के विभिन्न पहलुओं का काव्यात्मक शैली में जिक्र करती है। और साईकिल पर सवार हो कर निकल पड़ती है। शहर के दस किलोमीटर की परिधि में, यात्रा पर। कहानियों को ढूंढ़ती है। और प्रवाहमान गद्य में पाठकों को उनकी दुनिया में बहा ले जाती है। पूरे उपन्यास में यह महिला वाचक कहानी को ‘प्रथम पुरुष’ (हिंदी व्याकरण वाला) में व्यक्त करती है।


शहर से दस किलोमीटर एक ऐसा उपन्यास है जो भोपाल शहर के आस-पास बदलते ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत करता है। यह शहर के राक्षसी विस्तार के दुष्प्रभाव को चित्रित करता है। ख़ासकर गांव के छोटे किसान व मजदूर की दशा को सामने रखता है। नीलेश रघुवंशी ने अपनी इस कृति में विविध किरदारों की कहानियों में छुपे हुए दर्द को उजागर करने की कोशिश की है। 


एक उपन्यास में प्रायः दो चार मुख्य किरदार होते हैं और उनसे जुड़ी होती है एक लम्बी कथा। शहर से दस किलोमीटर में एक नहीं, अनेक कहानियां हैं। उनके किरदार भी अलग-अलग। इन सबको जोड़ती हैं उपन्यास की वो वाचक जो हमें उनके जीवन, उनकी हंसी, उनकी पीड़ा से अवगत कराती है। पर इससे भी महत्वपूर्ण एक और लिंक है जो उन्हें एक लड़ी में पिरोने का काम करती है। और वह है शहर के आस-पास के लोगों का बदलता जीवन और उसकी जद्दोजेहद।


नीलबड़ के दादा और अम्मा की कहानी में दादा अधेड़ उम्र के छोटे किसान हैं। खेती उनका पेशा नहीं, एक ज़ुनून है। खेती से आमदनी घटने के बावजूद वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं है। लेकिन पत्नी और बेटे का उन पर दबाव है कि वे खेती छोड़ दें और ज़मीन की बढ़ती कीमत का लाभ उठाएं।


सूरजनगर में चड्डे वाले हरिप्रसाद काका और भूरी काकी दोनों को एक फार्म हाउस में काम करते ज़माना गुज़र गया। एक छोटी सी टपरी में उनका परिवार बढ़ता गया। बच्चे बड़े हुए। उनके भी बच्चे हुए। पर उनकी स्थिति नहीं बदली। दोनों सीधे-सादे इंसान हैं। मासूम भी। बरसों पहले ज़मीन का मालिक पटेल ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे उस ज़मीन पर अपना टपरा बना कर रह सकते हैं। पटेल मर गया। जमीन का मालिक बदल गया। पर वे इस बात से बेखबर हैं कि सड़क का एक हिस्सा अब उनके टपरे से हो कर गुजरता है। उन्हें ख़ुद नहीं पता कि टपरे के टूटने से इक्कीस लोगों के उनके परिवार का क्या होगा?


नीलेश रघुवंशी 


गोरा बिशनखेड़ी की एक कहानी में वाचक एक छोटी लड़की को देखती है कि वह लगातार रोए जा रही है। लड़की का दुपट्टा उसकी अपनी साईकिल के चेन में फंस गया है और उसे डर है कि उसका भैया इसके लिए उसे मारेगा। भैया से उस लड़की का डर। बार-बार उसका रोना और ‘भैया मारेगा’ की रट लगाना वाचक को मर्माहत करता है। लड़की का ‘भैया’ सरकारी स्कूल में बारहवीं का छात्र है और पास में एक बड़े प्राइवेट स्कूल में सफाई कर्मचारी है। वाचक प्राइवेट स्कूल की प्रधान शिक्षक है। वह लड़की को समझाती है कि ‘भैया’ को वह बता दे कि प्रधान शिक्षक ने कहा है कि उसे वह न मारे। वह उसे कुछ पैसे भी देती है।


इस कहानी में नीलेश रघुवंशी ने ‘भैया’ शब्द को पुरुषवादी मानसिकता के प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हुए उसके विभिन्न रूपों को चित्रित किया है। उन्होंने दर्शाया है कि जहां तक लड़कियों की बात है उनके जीवन में कोई विशेष बदलाव नहीं है। परिवार चाहे ग़रीब हो या अमीर, सब जगह ‘भैया’ का वर्चस्व है। साथ ही लेखक ने तेजी से हो रहे आर्थिक बदलाव में समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग स्कूलों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। अमीरों के लिए बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूल और गरीबों के लिए उपलब्ध हैं संसाधनों की कमी वाले सरकारी स्कूल। 


नीलेश रघुवंशी का ये उपन्यास युवकों के एक नये वर्ग की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है। ये युवक पढ़े-लिखे हैं, कम्प्यूटर के काम में दक्ष हैं। पर उनके पास रोजगार के उचित अवसर नहीं है। सरकारी आफिसों में संविदा के तहत् कम सैलरी में काम करने को विवश हैं। उन्हें आशा है कि एक दिन उन्हें स्थाई नौकरी मिल जाएगी। 


उपन्यास के अंतिम हिस्से में ऐसे ही एक युवक की कहानी है। वह अपनी इस नौकरी की मदद से किसी तरह अपने छोटे से परिवार का गुज़ारा कर रहा है। लेकिन अचानक उसके पिता बीमारी के कारण जब अस्पताल में भर्ती होते हैं तब उसकी आर्थिक स्थिति हिल जाती है। उसे लोगों से कर्ज लेना पड़ जाता है। प्राईवेट अस्पताल का खर्च वह वहन नहीं कर पाता है। उपन्यास में ऐसे और कई युवक एवं युवतियां हैं जिनकी आमदनी बस इतनी है कि जिससे ज़िन्दगी किसी तरह चलती रहे। एक खुशहाल जिंदगी उनके लिए मुहाल है। 


संविदा, आउटसोर्सिंग वगैरह जैसी चीजें भारत में 1991 के उदारीकरण की उपज है। उसी के बाद से पढ़े-लिखे, दक्ष मजदूरों के इस वर्ग की शुरुआत हुई। इसकी तादाद अब बढ़ती जा रही है। 


नीलेश रघुवंशी के इस उपन्यास की भाषा में तरलता और प्रवाह है। उनकी शैली काव्यात्मक है। सिद्धांत का कोई छौंक नहीं। बस जो है, जैसा है वैसा ही उसे रख देना है। इस कला में लेखक निपुण हैं। बीच-बीच में हास्य और खिलंदड़ी का पुट है जिससे कहानी कभी उबाऊ नहीं लगती। पात्रों के जीवन की पीड़ा बस रिसती रहती है। धीरे-धीरे। पर किसी खलनायक को स्पष्ट रूप से पेश करने की कोई कोशिश नहीं है। आप पाठक खुद समझदार हैं। आप जानिए, समझिए या खोजने की कोशिश करिये कि आखिर कौन है इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार। कोई व्यक्ति, व्यवस्था या विचार?


अरुण कुमार 


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अरुण कुमार 

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