अमरेन्द्र कुमार शर्मा का आलेख 'सिनेमा की काया का द्रष्टा'


अमरेन्द्र कुमार शर्मा 


कला जीवन की एकरसता को तोड़ती है और मनुष्य को संवेदनशील बनाती है। कला के अनेक माध्यम हैं। इन माध्यमों में सिनेमा वह माध्यम है जिसके दोहरे आयाम हैं। दृश्य के साथ साथ श्रव्य भी। इन दोनों का किसी भी दर्शक के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए मनोरंजन के माध्यम के रूप में सिनेमा अन्य कलाओं से अग्रणी दिखाई पड़ता है। अपनी शुरुआत से ले कर आज तक हिन्दी सिनेमा कई चरणों से हो कर गुजरा है। आजकल यह ओ टी टी स्टेज में है। अमरेन्द्र कुमार शर्मा ने हिन्दी सिनेमा के चरित्र और उसके विकास को ले कर तीन विशेषज्ञ लेखकों से बातचीत किया है। ये विशेषज्ञ लेखक हैं : विजय पाडलकर, विजय शर्मा और मनोज रूपड़ा। अमरेन्द्र शर्मा ने एक ही तरह के कुल आठ सवाल इन तीनों विशेषज्ञों से किए हैं। इन सवालों के जरिए इक्कीसवीं सदी में हिंदी सिनेमा के विभिन्न दृष्टिकोणों को ले कर सिनेमा  लेखन पर गम्भीर विमर्श किया गया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बातचीत पर आधारित अमरेन्द्र कुमार शर्मा का आलेख 'सिनेमा की काया का द्रष्टा'।



'सिनेमा की काया का द्रष्टा' 


अमरेन्द्र कुमार शर्मा 


               

‘कुछ यथार्थ को कुछ और यथार्थ से संवारो।’

‘अपने शुद्धतम रूप में कला कठोर को भंग करती है।’

नोट्स ऑन द सिनेमेटोग्राफर (1975) - रोबर्ट ब्रेसों


‘यथार्थ से बिना एक दूरी बनाए (डिस्टेंसिंग) कोई भी कला अपना काम पूरी तरह नहीं कर सकती।’

लेखक का सिनेमा (2017) 

कुँवर नारायण


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरे कला आंदोलनों में अति सुक्ष्मवादी दृष्टिकोण के साथ फ्रेंच फ़िल्मकार रोबर्ट ब्रेसों (1901-1999) कला के उस रसायन को हमारे समक्ष ला खड़ा कर देने वाले रहे हैं जहाँ यथार्थ के बीच कला रहते हुए उस यथार्थ की स्वायत्ता को भंग कर देती है। कुँवर नारायण (1927-2017) हिंदी की अपनी काव्यात्मक दुनिया के सहारे सिनेमा तक एक गहरे तत्त्व-अन्वेषी की तरह पहुँचते हुए हमारे सामने हिंदी और विश्व सिनेमा की लम्बवत काट के सहारे सिनेमाई कला के रेशे को खोल देते हैं इसलिए वे सिनेमा पर बात करते हुए सिनेमाई कला में यथार्थ के रंग की महीन पहचान करते हैं। रोबर्ट ब्रेसों के सिनेमाई सफ़र की बुनियाद साहित्य पर आधारित रही है जिसमें फ्योदोर दोस्तोवस्की (1821-1881) की कहानियाँ और उपन्यास प्रमुख आधार रहे हैं। कुँवर नारायण के सिनेमाई विश्लेषण का बहुलांश भी साहित्य पर आधारित सिनेमा का रहा है। इसलिए ही रोबर्ट ब्रेसों और कुँवर नारायण के उपर्युक्त कथन की निरंतरता में सिने कला के तीन आस्वादक विजय पाडलकर, विजय शर्मा और मनोज रूपड़ा से कुल आठ सवालों के आधार पर उनके सिने आस्वाद की यात्रा को समझने की कोशिश यहाँ की गई है। 


मूल रूप से मराठी भाषा में, साहित्य पर आधारित सिनेमा पर गंभीरता से लिखने वाले कथाकार विजय पाडलकर लंबे अरसे से मराठी भाषा में विश्व सिनेमा और हिंदी सिनेमा पर लिखते रहे हैं। जिनके बारे में हिंदी सिनेमा के ख्यात फिल्मकार, गीतकार गुलजार ने कहा है, ‘मुझे लगता है, हिंदुस्तान की हर जुबान में, सिनिमा पर लिखने के लिए एक विजय पाडलकर की जरूरत है।’ विजय पाडलकर ने सिनेमा को ‘मात्र मनोरंजन का साधन कभी नहीं माना’ बल्कि ‘उसे एक स्वतंत्र, भावनिक अनुभव की दृष्टि से संजीदगी से देखा’ है। विजय पाडलकर की ‘शेक्सपियर और सिनेमा’, ‘सिनेमा के सात रंग’ जैसी कई किताबें सिनेमा के आस्वाद को समझने में मदद करती है। अभी हाल में सत्यजित राय के संपूर्ण सिनेमाई सफर पर उनकी एक शानदार किताब आयी है। 


हिंदी में स्त्री संदर्भों से सिनेमा को देखने, परखने और कई महत्वपूर्ण किताबें लिखने वालीं विजय शर्मा की किताब ‘नाजी यातना शिविरों की त्रासद गाथा’, जिसके बहुलांश में साहित्य का संदर्भ है, एक ऐसी किताब है जिसमें फासीवादी संरचना के भीतर का समाज, परिवार, लोग के साथ संपूर्ण पारिस्थितिकी की अटकी हुई साँसे है। वे अश्वेत साहित्य और सिनेमा, मृत्यु और सिनेमा, नोबल पुरस्कार और सिनेमा, स्त्री और सिनेमा जैसे अलहदा विषयों पर लगातार लिखती रहीं है। उनकी जीवटता ही है कि, कठिन बीमारी के दिनों में भी रचनात्मक ऊर्जा से लैस रहती आईं हैं। सृजनात्मकता का शानदार मंच ‘सृजन-संवाद’ संचालित करती हैं जिसके माध्यम से सिनेमा सहित तमाम कला मध्याओं पर चर्चा के लिए देश-विदेश से विद्वान जुड़ते रहते हैं। अभी जब मैं यह लिख रहा हूँ, वे सिनेमा पर कुछ नया सोच और लिख रही होंगी।    

हिंदी के ख्यात कथाकार मनोज रूपड़ा अपनी विलक्षण कथा दृष्टि के लिए जाने-माने जाते हैं। उनमें भाषा की तराश की एक सुंदर दुनिया रहती है। उनकी किताब ‘कला का आस्वाद’ सिनेमा देखने की निजता और सामाजिकता को रचती है। मनोज रूपड़ा की किताब ‘कला का आस्वाद’ को मनुष्य-जीवन के मनोविज्ञान और उसके पैराडोक्स को सिनेमाई संदर्भ से प्रस्तुत करने की एक शानदार पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। यह किताब लेखक के द्वारा देखी गई फ़िल्मों के निरे निजी आस्वादन की तरह नहीं लगता बल्कि यह बहुत ही महीन तरीके से सिनेप्रेमी पाठक के आस्वाद से आ मिलता है। इस किताब में लेखक के सिनेमा देखने में शामिल तकनीक द्वारा मात्र निजी स्तर पर ग्रहण किए का विभिन्न परिपेक्ष्य नहीं आता बल्कि साहित्य अनुशासन के भीतर एक सिनेमाई समझ को विकसित किये जाने की कोशिश की तरह आता है। इस बातचीत में साहित्य पर आधारित सिनेमा का संदर्भ तो है लेकिन सिर्फ यही संदर्भ मात्र नहीं आया है। 


विजय पाडलकर, विजय शर्मा और मनोज रूपड़ा से मैंने कुल आठ सवाल किए हैं। यह सवाल एक ही तरह के हैं। आठ सवाल और उन सवालों के आलोक में इक्कीसवीं सदी में हिंदी सिनेमा के विभिन्न दृष्टिकोणों को ले कर सिनेमा पर लिखने और सिनेमा में दिलचस्पी रखने वाले तीन सिने आस्वादक के विचार जिसे मैं ख्याल कहना चाहूँगा, यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ -    


1. हिंदी में सिनेमा पर लेखन का क्या कोई सैद्धांतिक आधार या कोई सैद्धांतिक विकास क्रम है? हिंदी सिनेमा का क्या कोई अकादमिक चरित्र भी है ?  या हिंदी सिनेमा में लेखन केवल निजी रुचियों का विस्तार भर है? आप अपने सिनेमा लेखन को किस रूप में देखते/देखती हैं।


2. क्या, हिंदी सिनेमा का चरित्र और उसका अस्तित्व भी, ‘मनोरंजन प्रदान करने’ के पदबंध और ‘बाजार के दवाब’ से बाहर है? सिनेमा, समाज की बेहतरी और प्रतिगामी पाखंडों के प्रतिपक्ष में कोई भूमिका निभाती है/ निभानी चाहिए भी? क्या यह निभा रही है?


3. इक्कीसवीं सदी में हिंदी सिनेमा में दूसरी भाषाओं के सिनेमा का हिंदी भाषा में अनुवाद इन दिनों बड़े पैमाने पर हो रहा है, क्या इससे हिंदी सिनेमा का विकास, हिंदी सिनेमा में चरित्र का विस्तार या बदलाव आया है?


4. सिनेमा, मनुष्य की दुनिया की अपनी विशेषता है। कला के तमाम माध्यमों में सिनेमा का रूपबंध संप्रेषण की बुनियाद पर सबसे अधिक प्रभावी माना जाता है। लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास के दौर में क्या सिनेमा लोकतांत्रिक मूल्यों की चेतना के निर्माण में कोई भूमिका निभा सकती है? इस निकष पर हिंदी सिनेमा सहित अन्य भारतीय भाषाओं के सिनेमा का स्वरूप क्या है?


5. क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा का विस्तार, हिंदी सिनेमा के विस्तार को और अधिक ताकतवर बनाती है या कमज़ोर? या फिर सिनेमा की भारतीय समझ (सांस्कृतिक,राजनीतिक आदि) के लिए क्षेत्रीय भाषाओँ के सिनेमा का विस्तार आवश्यक है?


6. ‘कला के रूप में’ और मात्र ‘मनोरंजन के माध्यम के रूप में’ सिनेमा का भविष्य क्या है?


7. सिनेमा और सरकार के रिश्तों को आप किस रूप में देखते हैं? वर्तमान समय की राजनीति को देखते हुए हिंदी सिनेमा से आप क्या उम्मीद करेंगे/करेंगी?


8. आप सिनेमा पर अपनी हालिया प्रकाशित किताब को सिनेमा की समझ और समझ के विस्तार के दृष्टिकोण से किस रूप में देखते/देखतीं हैं?  


विजय पाडलकर 


‘सिनेमा की अद्भुत क्षमता को सिनेमा वालों ने भी बहुत कम समझा है'


विजय पाडलकर


सबसे पहले मैं ये बताना चाहूँगा कि, यद्यपि मैं हिंदी अच्छी समझता हूँ, पढ लेता हूँ और बोलता हूँ, फिर भी हिंदी में लिखने का कभी प्रसंग ही नहीं आया। इसलिए मन में संदेह है कि मैं आपके सवालों के ‘समाधानकारक’ जवाब दे सकूँगा या नहीं। फिर भी कोशिश कर रहा हूँ। 


हिंदी में सिनेमा पर क्या और कौन से दर्जे का लेखन हुआ है इसकी मुझे कल्पना नही है। हालाँकि मेरे कुछ हिंदी भाषिक मित्रों का कहना है कि वे हिंदी में सिनेमा पर लिखे गये साहित्य से संतुष्ट नहीं हैं। हिंदी के एक समीक्षक श्री अजय शर्मा, साहित्य अकादमी, दिल्ली, ने मेरी किताबो की आलोचना करते हुए 5 फरवरी के ‘इंडिया टुडे’ में लिखा है - ‘हाल के वर्षों में हिंदी में सिनेमा पर छोटे-बड़े प्रकाशनों से लगातार किताबें छप रही है। इनमें से ज्यादातर पुस्तकें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे आलेखों का संकलन या संपादन मात्र है। मौलिक रूप से लिखी गयी कोई बेहतर किताब याद नही आती।’


मैं सिनेमा संबंधी लेखन को साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समझता हूं। आज भी बहुसंख्यक प्रेक्षक ‘सिनेमा साक्षर’ नही है। वे इस कला को सिर्फ ‘मनोरंजन प्रदान करने वाली’ मानते है।  और इस ‘बाजार के दबाव’ से हिंदी सिनेमा मुक्त नहीं है। पर यह आज की बात नही है। यह कला जब से पैदा हुई तब से ‘व्यवसाय के शिकंजे में’ फंसी है। प्रत्येक सिनेमा समाज को कोई शिक्षा दे ऐसी तो हम अपेक्षा नहीं कर सकते, और ना ही यह उचित है। फिर भी समाज की बेहतरी के लिये, कम से कम सिनेमा के एक छोटे हिस्से को, एक निश्चित भूमिका निभानी चाहिए। सिने कलाकारों का एक छोटा सा हिस्सा यह करते आ रहा है लेकिन इतना काफी नहीं है। 


सिनेमा पर लिखने वाले लेखक के लिए जरूरी है कि एक तरफ वह इस कला की बारीकियों को लोगों के सामने लाए और दूसरी तरफ यह कला क्या करके दिखा सकती है यह भी समझाए। कलात्मक सिनेमा में आम दर्शक की दिलचस्पी बढ़ाने में सिने-समीक्षा बहुत कुछ कर सकती है। अच्छी फिल्में और दर्शक, इन के बीच का अंतर लेखक कम कर सकता है। दुर्भाग्यवश मराठी में ऐसी समीक्षा बहुत कम लिखी जाती है। और एक बात है – मैं पच्चीस साल से सिनेमा पर लिख रहा हूँ लेकिन आज तक मराठी के एक भी आलोचक ने मेरे काम का जिक्र भी नहीं किया। मुझे खुशी है कि कम से कम हिंदी में मेरी किताबों की चर्चा हो रही है।


इस सदी में हिंदी सिनेमा में दूसरी भाषाओं के सिनेमा का अनुवाद हो रहा है। लेकिन इस से हिंदी सिनेमा का विकास होगा ऐसा मैं नहीं मानता। क्यूँकि, जो सिनेमा अनुवादित हो रहे हैं वे प्राय: कमर्शियल सिनेमा ही है।  प्रख्यात दिग्दर्शक लुई ब्युनुएल ने लिखा है, ‘किसी कला की अंगभूत क्षमता और प्रत्यक्ष में उस कला ने जो ऊँचाई हासिल की है उसकी तुलना यह निकष अगर लगाया जाय तो सिनेमा बाकी कलाओं के बहुत पीछे है।’ सिनेमा की अद्भुत क्षमता को सिनेमा वालों ने भी बहुत कम समझा है। सक्षम सिने-समीक्षा यह बात सिनेमा निर्माण करने वालों के सामने ला सकती है।


क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा का विस्तार हिंदी सिनेमा को ताकतवर बना सकता है। शर्त यह है कि  हिंदी सिनेमा क्षेत्रीय भाषाओँ के सिनेमा को अपना प्रतिस्पर्धी नहीं मानना चाहिए। सिनेमा की भारतीय समझ के लिए क्षेत्रीय सिनेमा का विकास और विस्तार आवश्यक है।


सिनेमा अभी तो बस 125 साल का हुआ है। उसमें विकास की अनेक शक्यताएँ हैं। मुझे भरोसा है कि यह कला और नए नये रूप आत्मसात करेगी। ‘मनोरंजन के माध्यम के रूप में’ भी वह अन्य कलाओं से आगे ही रहेगी।


सिनेमा और राजनीति का रिश्ता सौ साल पहले जैसा था वैसा ही आज है। राजनीति हमेशा स्वतंत्र विचारों को दबाने की चेष्टा करती है। करती रहेगी। सिनेमा बनाने वालों को चुनना पड़ेगा कि उस दबाव का विरोध करें या झुक जाएँ।


हिंदी में मेरी जिन किताबों का अनुवाद हुआ है उनके अलावा मेरी सिनेमा पर और आठ किताबें प्रकाशित है। ज्यादातर ‘अभिजात साहित्य कृति और उस पर बनी फिल्म का तुलनात्मक अभ्यास’ इसी विषय पर मैं लिखता हूँ। मेरा हमेशा यह प्रयास रहा है कि आम दर्शक की सिनेमा की समझ बढ़े। ‘संवाद’ से मेरी और तीन किताबें इस साल प्रकाशित होगी। इन दिनों मैं सत्यजित राय का जीवन और कार्य के बारे में एक विस्तृत किताब लिख रहा हूँ। (अब यह किताब संवाद प्रकाशन से प्रकाशित हो गई है।)



विजय शर्मा


‘वही सिनेमा सार्थक है जो दर्शक को संवेदनशील बनाता है’


विजय शर्मा


हमारे यहाँ फ़िल्म पर गंभीरता से कम ही विचार होता है। इसकी भाषा पर तो न के बराबर। हिंदी  सिनेमा लेखन निजी रूचियों का विस्तार अधिक नजर आता है। हिंदी में सिनेमा लेखन की व्यावहारिक आलोचना प्रणाली दीखती है मगर सैद्धांतिक आधार शायद ही पढ़ने को मिलता है। अगर कभी छिटपुट सैद्धांतिक लेखन देखने में आता है तो वह दूसरे देशों में विकसित सिनेमा सिद्धांत को पोषित करता नजर आता है। जैसे ‘ओटूर थ्योरी’ या ‘लौरा मुल्वे’ के सिद्धांत पर हिंदी  सिनेमा को आँकना। अधिकाँश तो फ़ौरी लेखन अथवा पत्रकारिता लेखन ही है। आज फ़िल्म रिलीज हुई और कल अखबार में समीक्षा यू कहें परिचय छप गया। हिंदी  सिनेमा में सैद्धांतिक लेखन नहीं मिलता है, सैद्धांतिक विकास तो दूर की कौड़ी है। अक्सर केवल कथानक और अभिनय की बात से इतिश्री हो जाती है, सिनेमा की भाषा पर शायद ही बात होती है। हमारे यहाँ बहुत कम कॉलेज-यूनिवर्सिटी में इसका अध्ययन-अध्यापन होता है। बहुत कम शिक्षा संस्थानों में फ़िल्म अध्ययन के स्वतंत्र विभाग हैं। अभी हम सिनेमा के विषय में बहुत कम जानते हैं।

                     

सिनेमा मनोरंजन का सबसे बड़ा और सार्वभौमिक तथा सस्ता साधन है। जिस दिन वह मनोरंजन करना बंद कर देगा उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जैसे बहुत पहले साहित्य का उद्देश्य मम्मट ने बता दिया, 


‘काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।

सद्य: परिनिर्वृतये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे॥’ 


मुझे लगता है सिनेमा के लिए भी यह सटीक है । अगर सिनेमा सीधे-सीधे नैतिक शिक्षा देने लगेगा तो दर्शक उसके निकट शायद ही जाएगा। संवेदनशीलता मुझे मनुष्य का एक सबसे बड़ा गुण लगता है। सिनेमा दर्शक को संवेदनशील बनाए तो दर्शक के दृष्टिकोण में स्वत: परिवर्तन होगा। सिनेमा बनाने में एक बड़ी पूँजी लगती है। साहित्य के उलट सिनेमा बनाने में कई लोग जुड़े होते हैं, यह एक टीम वर्क है। कोरा यथार्थ न तो साहित्य होता है और न ही सिनेमा हो सकता है। जिंदगी भी कहाँ कोरा यथार्थ होती है उसमें भी स्वप्न होते हैं, आशा-आकांक्षाएँ होती हैं। यथार्थ बहुआयामी होता है। वह मात्र कटु और गरीब ही क्यों हो?  वह किसी एक वाद, सिद्धांत में क्यों बँधा हो ? जीवन के उत्सव पर भी फ़िल्में बननी चाहिए/बनती हैं, मुझे ‘उत्सव’ और ‘रेड बलून’ फ़िल्म याद आ रही है । मात्र यथार्थ चित्रण के लिए डॉक्यूमेंट्री है न। वहाँ भी अब उसे रोचक बनाने के लिए ‘डॉक्यू-ड्रामा’ का सहारा लिया जा रहा है।


हाँ, इधर धड़ल्ले से दूसरी भाषाओं यहाँ तक कि हॉलीवुड की फ़िल्मों का भी हिंदी करण हुआ है। इसके पीछे बाजार है। हिंदी के पास एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है और कौन फ़िल्मकार उस तक न पहुँचना चाहेगा? डब्ड फ़िल्में खूब देखी जाती हैं। टीवी पर खूब प्रसारित होती हैं । असर तो होता है। चीनी फ़िल्मों के प्रभाव से हमारा हीरो भी मार्शल आर्ट का विशेषज्ञ बन बैठा है । एक साथ पचास-पचास लोगों को पछाड देता है । अभी हाल में आई ‘बाहुबली’ हॉलीवुड से पूरी तरह प्रभावित फ़िल्म है। तकनीकि ने सुविधा प्रदान की है भाषांतरण आसान हो गया है। भारत की अन्य भाषाओं की -खासकर दक्षिण की फ़िल्में भी डब्ड हो कर या रिमेक के रूप में हिंदी  में उपलब्ध हैं। इससे इन प्रदेशों की संस्कृति को जानने-समझने का अवसर मिलता है। संस्कृति का मिश्रण भी होता है। तमिल और तेलगु फ़िल्मों की हिंदी डबिंग खूब होती है। मगर अक्सर केवल सस्ती फ़िल्मों की ही डबिंग होती है। बाजार के दबाव के कारण गंभीर फ़िल्म की डबिंग देखने में कम आती है। मैंने किसी उड़िया, मणिपुरी, गुजराती आदि फ़िल्मों को हिंदी  में डब होते नहीं देखा है। ट्रांसक्रियेशन, रिटेलिंग हमारे यहाँ प्राचीनकाल से होता आ रहा है। हर व्यक्ति को अपने ढ़ंग से कहानी कहने की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। 


नि:संदेह सिनेमा संप्रेषण का सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम है। सिनेमा समाज की प्रवृति को परिलक्षित करता है। एक समय जब लोगों का सिस्टम से मोहभंग हुआ तो हिंदी  सिनेमा में ‘एंग्री यंगमैन’ का जन्म हुआ जिससे समाज का और अधिक नुकसान हुआ । ऐसी फ़िल्में हमें भावात्मक रूप से भले तुष्टि दें, समस्या का वास्तविक हल नहीं सुझाती हैं। हिंदी  सिनेमा के साथ जब मैं विश्व सिनेमा पर दृष्टि डालती हूँ तो सिनेमा कदाचित मूल्य निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाता नजर आता है। ले-दे कर मेरे सामने फ़्रेंच भाषा में बनी एक बेल्जियम फ़िल्म ‘रोजेटा’ का उदाहरण है जिसने उस देश को कानून में बदलाव लाने के लिए मजबूर किया और वहाँ कुछ कानून में परिवर्तन हुआ।

                    

हिंदी  फ़िल्में दिखाती हैं जब न्याय फ़ेल हो जाता है तो कानून अपने हाथ में लेना होता है जैसा ‘एन एच 10’ में दिखाया गया है मुझे नहीं लगता है यह कोई सही दिशा है, इससे तो अराजकता और फ़ैलेगी। जैसा मैंने ऊपर मम्मट के माध्यम से कहा है फ़िर कहूँगी, सिनेमा का काम कांता सम्मित उपदेश देना हो सकता है। उसका मुख्य ध्येय मनोरंजन है, दर्शक को संवेदनशील बना कर वह चेतना का निर्माण करता है, उसे बेहतर मनुष्य बनाने का प्रयास कर सकता है। मगर राजनैतिक या सामाजिक सुधार की अपेक्षा उससे करना न तो आवश्यक है और न ही अपेक्षित होना चाहिए। अगर ऐसा होता तो हमारे देश में दहेज प्रथा कब की समाप्त हो गई होती, खाप पंचायतें न होतीं, आज जाति प्रथा नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि ‘अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ बने कई दशक बीच चुके हैं। ‘पिपली लाइव’ के बाद किसानों की दशा सुधर जाती । लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जमाखोरी-कालाबाजारी पर न जाने कितनी फ़िल्में बनी हैं क्या समाज में ये कुप्रवृतियाँ खत्म हुई हैं? 


अच्छा होगा हम क्षेत्रीय के स्थान पर भाषा पद का प्रयोग करें। ऐसे देखा जाए तो हिंदी  सिनेमा भी क्षेत्रीय सिनेमा है भले ही इसका क्षेत्र बड़ा हो। दूसरी भाषाओं के सिनेमा को क्षेत्रीय कहने से लगता है हिंदी  सिनेमा ही भारतीय सिनेमा है और बाकी सब दोयम दर्जे का सिनेमा है। भारत विविधताओं का देश है। भारतीयता एक समुच्य है। हर प्रांत की भाषा, रीति-रिवाज-रहन-सहन भिन्न है। कई बार उनकी समस्याएँ भी भिन्न हैं। फ़िल्म एक प्रभावकारी माध्यम है इसलिए मुझे लगता है विभिन्न भाषाओं के सिनेमा का विकास और विस्तार होना चाहिए। इससे हमारी सांस्कृतिक समझ बढ़ेगी। अभी हम हिंदी  वाले भारत के अहिंदी  प्रदेशों के बारे में कितना कम जानते हैं। कई राज्यों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, कई के विषय में मात्र सतही जानकारी है और कई के विषय में मात्र पूर्वाग्रह हैं। मैं झारखंड में तब से रह रही हूँ जब यह बिहार का अंग था। फ़िर भी झारखंड की संस्कृति की कितनी कम जानकारी है। साहित्य और सिनेमा विभिन्न समाज-संस्कृति को समझने में हमारी सहायता करते हैं। अभी हाल में कुछ फ़िल्मों के माध्यम से यहाँ के आदिवासी समाज के विषय में कई नई बातों की जानकारी प्राप्त हुईं। पहले केरल के विषय में कुछ नहीं जानती थी, वहाँ के निवासी मेरे लिए मद्रासी हुआ करते थे। अब चूँकि मलयालम फ़िल्में खूब देखती हूँ अत: वहाँ की संस्कृति की कई बातों से परिचित हूँ। इसी तरह जब पूर्वोत्तर की विभिन्न भाषाओं का सिनेमा हम तक पहुँचेगा तो हम उनके साथ जुड़ाव अनुभव करेंगे। शक नहीं इससे भारतीयता की हमारी समझ का विस्तार होगा। अत: मुझे लगता है भारत की विभिन्न भाषाओं के सिनेमा का खूब विस्तार होना चाहिए। खूब आदान-प्रदान होना चाहिए।


मनोरंजन के लिए बनाए गए कलात्मक सिनेमा का भविष्य बहुत उज्जवल है। मात्र कला के लिए बनाया गया सिनेमा अध्ययन-अध्यापन के लिए प्रयोग हो सकता है, अन्यथा दर्शक पैसे देने पर भी शायद ही उसे देखे, पैसे दे कर तो कदापि नहीं। यथार्थवादी कहानी को जब कल्पना के रंग में रंग कर प्रस्तुत किया जाता है तब वह दर्शक को आकर्षित करती है। सिनेमा तो जादू है, जादू जो दर्शकों के सिर चढ़ कर बोलेगा वैसा सिनेमा सदा रहेगा।


इसका कुछ उत्तर मैं ऊपर दे आई हूँ। एनएफ़डीसी और सेंसरबोर्ड सरकार के सिनेमा से जुड़े अंग हैं। सेंसरबोर्ड की उपादेयता क्या है बताना कठिन है। आज के डिजिटल युग में जहाँ तमाम बेव सिरीज फ़िल्में चल रही हैं। ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर इनफ़िल्मों/वेब सिरीज में क्या-क्या नहीं दिखाया जा रहा है। ये लोग अपनी मनमर्जी की फ़िल्म बना रहे हैं, ऊलजुलूल चीजें परोस रहे हैं। हिंसा, फ़ूहड़ता, जुगुप्सा, अपशब्दपूर्ण भाषा और अश्लीलता खुल कर परोसी जा रही है। इन माधय्मों से अपनी-अपनी विचारधारा का प्रचार/कुप्रचार किया जा रहा है। ओवर द टॉप प्लेटफ़ॉर्म पर दिखाई जाने वाली फ़िल्मों/वेब सिरीज पर सरकार चर्चा कर रही है मगर कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठा पाई है। इनके कंटेंट पर नियंत्रण की आवश्यकता है। अन्यथा ऐसे कार्यक्रम समाज में अराजकता फ़ैलाएँगे ऐसा मेरा मानना है। 


  सिनेमा पर अब तक मेरी चार पुस्तकें आ चुकी हैं, दो इसी वर्ष और आने की आशा है। एक सत्यजित राय की फ़िल्मों पर है जिनका यह शताब्दि वर्ष है, दूसरी विश्व के महान निर्देशक ऑर्सन वेल्स के जीवन और उसकी फ़िल्मों पर है। जैसा मैंने ऊपर बताया है मेरा कार्य व्यवहारिक समीक्षा से जुड़ा है। पहली पुस्तक जिसका आपने जिक्र किया है, ‘नाजी यातना शिविरों की त्रासद गाथा’ हिटलरकालीन अत्याचार और यातना पर बनी फ़िल्मों पर केंद्रित है। मैंने जब इन फ़िल्मों का विश्लेषण किया तो मेरे मन में पाठकों की संवेदनशीलता को जाग्रत करना था। ताकि वे स्वयं ऐसे क्रूर अत्याचार करने से बचें और अन्य लोगों को ऐसे अत्याचार न करने दें। ये विभाजन और विस्थापन के खिलाफ़ बनी फ़िल्में हैं जो दिखाती हैं कि जब किसी को अन्य मान लिया जाता है तो समाज का कितना नुकसान होता है, मानवता की हत्या होती है। इस दौरान न मालूम कितने प्रतिभाशाली लोग गैस चैम्बर में झोंक दिए गए, संभावनाशील बच्चों पर क्रूरतम प्रयोग कर उन्हें नष्ट कर दिया गया। ये फ़िल्में एक तरह से इतिहास का दस्तावेजीकरण भी करती हैं। ये इतिहास के यथार्थ पर पॉवरफ़ुल फ़िल्में हैं। ये फ़िल्में आदमी के श्याम पक्ष और उज्जवल पक्ष दोनों पक्षों से हमें परिचित कराती हैं। मुझे लगता है, पुस्तक पढ़ कर पाठक की सिनेमाई समझ का विस्तार होगा और कहीं-न-कहीं उनके दृष्टिकोण में भी परिवर्तन होगा । सबका दृष्टिकोण बदलेगा ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखती हूँ।हाँ, कुछ का अवश्य बदलेगा।

                        

मनोज रूपड़ा 



‘कला के साथ मनोरंजन ही हिंदी सिनेमा की बुनियाद है’


मनोज रूपड़ा


किसी भी तरह के लेखक का कोई न कोई सैद्धांतिक आधार तो होता ही है। सिनेमा पर भी जब कुछ लिखा जाता है तो उसके दो पक्ष होते हैं एक तो उसमें जो बात कही गई है और दूसरा यह कि वह किस ढंग से कही गई है। अगर वह जो बात कही गई है यानी उसकी मूल कथा में किसी सामाजिक पहलू को उभारा गया है तो उसे देखते हुए लेखक अपना नजरिया जाहिर करता है, कि वह किस कोण से उसे देख रहा है और यहाँ फ़िल्म के बारे में लेखक का अपना पक्ष सामने आता है। फिर अपनी बात को कहने में निर्देशक ने किन युक्तियों को अपनाया है और वह अपनी बात को कलात्मक रूप में किस तरह ढाल पाया है, उसे व्याख्यायित करते समय लेखक की अपनी कला दृष्टि भी सामने आती है। 

                  

तमाम विधाओं में लेखन ही सिर्फ ऐसी विद्या है, जो किसी भी विद्या में किये गए सृजन को शब्दों में परिभाषित करती है। किसी चित्र या किसी चल-चित्र या किसी संगीत रचना या किसी नृत्य रचना के बारे में हम जो महसूस करते हैं, उसे व्यक्त करने के लिए शब्दों के अलावा और क्या विकल्प हो सकता है? 

              

कला की किसी भी विद्या की जो शाब्दिक परिभाषा है उसका अगर अकादमिक रूप से पुनर्गठन होता है तो उसका शास्त्र बनता है और अगर उस परिभाषा में गहराई नहीं है, अंतर्दृष्टि नहीं है, तो वह सिर्फ निजी रुचियों का मामला हो जाएगा।  


मैं इसे हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा योगदान मानता हूँ। हिंदी सिनेमा ने गीत- संगीत, नृत्य और बहुत से लोक-कलाओं को मिलाकर भारतीय जन-मन का जो मनोरंजन किया है, वैसा मनोरंजन किसी भी देश के सिनेमा ने नहीं किया है। 

                          

दूसरी बात बाजार के दबाव की है तो यह तो बिलकुल साफ़ है कि हमारे यहाँ फ़िल्म के साथ दो शब्द शुरू से जुड़े हैं “फ़िल्म-कला” और “फ़िल्म- व्यवसाय”। तो यहाँ भी आप बनी बनाई धारणाओं से हटकर देखेंगे तो दिखाई देगा कि फ़िल्म-व्यवसाय से जुड़े लोग अपने व्यावसायिक निहितार्थ के बावजूद कला के कई उत्कृष्ट रूपों को उभारने में सफ़ल रहे हैं जबकि फ़िल्म-कला से जुड़े लोग फ़िल्म की व्यावसायिक शर्तों को पूर्ण नहीं करते। ज्यादातर कला फ़िल्में पहले फ़िल्म विकास निगम के आर्थिक सहयोग से बनती थी फिर फ़िल्म विकास निगम ने फिल्मों से मुँह मोड़ लिया तो कला फिल्मकारों ने ‘क्राउड फंडिग’ का रास्ता अपनाया , लेकिन वह भी ज्यादा दूर तक नहीं जा पाए घुम-फिर का व्यावसायिक शर्तें सामने आ गई क्योंकि फ़िल्म में जो लागत लगती है , उसका एक आर्थिक पहलू भी है । मुझे यह लगता है कि अगर मुख्यधारा के सिनेमा में किसी को अपनी बात करनी है तो उसे व्यावसायिक रूप से भी प्रशिक्षित होना चाहिए। यह जरुरी नहीं है कि अगर आप व्यवसाय के लिए फ़िल्म बना रहे हैं तो वह खरब फ़िल्म मानी जाएगी और अगर आप सिर्फ कला के लिए फ़िल्म बना रहे तो वह अनिवार्य रूप कलात्मक और उत्कृष्ट होगी। कलात्मकता सिर्फ किसी के ऊँचे आदर्शों और सिद्धांतों के कारण नहीं होती, वह किसी भी रूप में प्रकट की जा सकती है। 


हिंदी सिनेमा का बाजार बहुत बड़ा है। इसमें दूसरी भाषाओं के अनुवाद भी आसानी से खप सकते हैं। यह सिर्फ व्यावसायिक जरूरतों के लिए होता है, इससे कोई विकास या बदलाव नहीं आएगा, दक्षिण भारत की कई फिल्मों का हिंदी अनुवाद हुआ है लेकिन हिंदी की फिल्मों का दूसरी भाषाओं में कोई अनुवाद क्यों नहीं होता?

 

हाँ, बिलकुल निभा रहा है। भारत जैसे बहुलतावादी और अतिधार्मिक देश में धर्म के पाखंड को उजागर करने में सिनेमा की बड़ी भूमिका है। कई बार उसने राजनीति और सत्ता में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी रेखांकित किया है और मौजूदा हालात में जब हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने का पूरी तरह से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो गया है, और दूसरे तमाम सूचना माध्यम किसी न किसी रूप में इसकी लपेट में आ गए हैं, तब सिर्फ हिंदी सिनेमा ही है, जिसने धार्मिक सद्भाव को बनाये रखा है और उसने लोकतंत्र को ख़त्म करने वाली शक्तियों के साथ अपनी तमाम व्यावसायिक मजबूरियों के बावजूद समझौता नहीं किया है।


मैं खुद भी इस बात को ठीक से समझ नहीं पाता कि हिंदी सिनेमा के बरक्स प्रादेशिक भाषा के सिनेमा को सेकेंडरी क्यों माना जाता है जबकि हमारे यहाँ प्रादेशिक भाषाओं में बनी फ़िल्में कई बार अन्तर्राष्ट्रीय फलक तक पहुँच चुकी है, जहाँ हिंदी की मुख्यधारा की फ़िल्में कभी पहुँच नहीं पाई। जाहिर है उन प्रादेशिक भाषाओं के फिल्मकारों को यह समझ थी कि फ़िल्म की भी अपनी एक भाषा होती है। यह फ़िल्म की भाषा के फ़िल्मकार थे और उन्हें विश्व सिनेमा की भी समझ थी। हिंदी सिनेमा ने कभी नीचे झुक कर यह नहीं देखा कि इन क्षेत्रीय फिल्मों में ऐसा क्या था कि वे अपने क्षेत्र से निकलकर वैश्विक हो गई। दरअसल हिंदी सिनेमा को आस्कर में नामांकित होने की ललक तो रहती है लेकिन वह विश्व सिनेमा के फिनोमिना के बारे में कुछ नहीं जानता। विश्व सिनेमा तो दूर अगर वह सिर्फ सत्यजित राय की बंगाली, जॉन बरुआ की असमिया, गिरीश कासरबल्ली की कन्नड़ और अडूर गोपालकृष्णन की मलयालम भाषा में बनी फिल्मों को भी ठीक से देख समझ ले तो वह और कारगर और ताकतवर बन सकती है। 


सिनेमा के यह दोनों रूप शुरू से चोली-दामन के रिश्ते से जुड़े हैं। मनोरंजन के साथ कला और कला के साथ मनोरंजन ही हिंदी सिनेमा की बुनियाद है। जब भी इस रिश्ते में दरार आती है तो सिनेमा बिगड़ जाता है। कला और व्यवसाय दोनों को यह मालूम है कि भारतीय समाज के सामूहिक अवचेतन में भी कला और मनोरंजन आपस में गुंथे हुए हैं। 


वर्तमान समय की राजनीति को देखते हुए आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि कोई मुखर स्वर सिनेमा में सुनाई देगा। फ़िलहाल इमरजेंसी जैसे हालात हैं। सोशल मीडिया में कोई कुछ भी कह सकता है। सत्ता को और सत्ता से जुड़े लोगों को गालियाँ भी दे सकता है, लेकिन सिनेमा के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता। उसे सेंसर से भी गुजरना पड़ता है और बॉक्स ऑफिस से भी। यह सेंसर और बॉक्स ऑफिस दोनों सिनेमा के लिए कठिन चुनौतियाँ हैं। 


सिर्फ मेरी किताब पढ़ लेने से किसी की सिनेमा की समझ का विस्तार नहीं होगा। सिनेमा की भाषा को समझने के लिए सिनेमा के पास जाना पड़ेगा। सिनेमा के पास जाने का तात्पर्य है कि  आपको सिनेमा को समझने का प्रशिक्षण लेना पड़ेगा जैसे मैंने लिया था। मैं पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट में फ़िल्म एप्रिसिएशन का कोर्स करने के लिए जाना चाहता था लेकिन शैक्षणिक योग्यता न होने के कारण मुझे उसमें एडमिशन नहीं मिला। बाद में मैंने पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट के एक बड़े शिक्षक सतीश बहादुर को अपना गुरु बनाया और उनसे अनौपचारिक शिक्षा लेता रहा। मेरी तरह प्रकाश झा भी गए तो थे डायरेक्शन में डिप्लोमा करने लेकिन उन्हें भी वहाँ जाकर मालूम पड़ा कि वे शैक्षणिक रूप से डायरेक्शन में एडमिशन लेने के लिए योग्य नहीं हैं तो उन्होंने डायरेक्शन के बजाय एडिटिंग विभाग में एडमिशन ले लिया और बाद में अपने उसी संपादन कौशल से उन्होंने निर्देशन की तरफ कदम बढ़ाये। 


खैर मैं कहना यह चाहता हूँ कि फ़िल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया को आत्मसात किए बगैर उसके ग्रामर को आप समझ नहीं सकते। फ़िल्म शॉट दर शॉट जो बात कहती है उसके हरेक फ्रेम को कैमरे ने  किस कोण से उभारा है यह समझना जरुरी है। दर्शक की आँख और कैमरे की आँख के बीच जो ‘स्पेस’ है उस स्पेस में ही सिनेमा के मूल तत्व छिपे होते हैं।



अमरेन्द्र कुमार शर्मा 

कवि और आलोचक,

‘आपातकाल : हिंदी साहित्य और पत्रकारिता’ एवं ‘आलोचना का स्वराज’ पुस्तक के लेखक।

भारतीय साहित्य और सिनेमा तथा विश्व साहित्य और सिनेमा की एक विस्तृत परियोजना पर कार्य। 



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