यतीश कुमार की समीक्षा 'जीवन के छायाचित्र श्रृंखला की किताब'



सामान्य तौर पर जब कविता, कहानी, उपन्यास से साहित्य भरा पड़ा है, उस समय में कथेतर गद्य की साहित्य में अपनी एक अलग भूमिका दिखाई पड़ती है। स्वतन्त्र प्रकाशन के तहत कथेतर गद्य की शृंखला के तहत नौ लेखकों नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, प्रताप सहगल, गिरिश पंकज, मीना झा, विभा रानी, संदीप तोमर, रणविजय राव, डॉ. स्वाति चौधरी और सुशील स्वतंत्र की किताबों का प्रकाशन एक नई परिघटना है। हर लेखक ने अपनी किताब में अपनी अनुभूतियों और संवेदनाओं को खुल कर व्यक्त किया है। इस शृंखला की एक किताब सुशील स्वतंत्र की 'इक्कीस मई' की समीक्षा की है कवि कथाकार यतीश कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यतीश कुमार की समीक्षा 'जीवन के छायाचित्र श्रृंखला की किताब'।



'जीवन के छायाचित्र श्रृंखला की किताब'


यतीश कुमार


पिता को अपने आचरण की उपस्थिति में याद करता पुत्र इस रेखाचित्र में समय की घड़ी को ठीक करते हुए रोटी की पतली पपड़ी को अलग से खाने का ज़िक्र करता है।


क्या होते हैं पिता—अबोले हिमोग्लोबिन में लोहा बन जाने वाले या फटकार और दाद का अंतर मिटाने वाले?


संदीप तोमर के संपादन की यह सीरीज़ एक अद्वितीय प्रयोग है, जिसकी शैली में स्मृतियों का मौन संरक्षक बनी यह किताब अपने पंख खोलते हुए आपको अतीत और वर्तमान के बीच की आवाजाही का रास्ता सुगम बनाने में मदद करती है।


स्वयं को केंद्र में न रख कर किसी और व्यक्ति या स्थान को केंद्र में रख कर लिखा जाना—जिसमें आपकी स्मृतियों की महत्ता भी निहित हो—साथ ही कथेतर विद्या में सच्चाई की पूर्ण उपस्थिति बनाती रोचकता, जो लेखक की लेखकीय दृष्टि का भी सुंदर परिचय दे, तो फिर इससे बेहतर क्या।


दादी से दादी माँ का सफ़र एक बच्चे के मन में कैसे अपने रूप गढ़ता है, यह इस किताब के पहले अध्याय ‘चौखवा के लड्डू’ में बहुत अच्छे से रेखांकित किया गया है। इस अध्याय के माध्यम से बचपन की मीठी यादों को बहुत तबीयत से याद किया गया है। उन दिनों नानी या दादी हम लोगों के मुँह में कौर डालते हुए सारे प्रिय लोगों को याद करती थीं और उनके नाम का कौर डालती थीं। दाल-भात और आलू-चोखा का कौर हम सबके बचपन की स्मृतियों का अमिट हिस्सा है। दादी का याददाश्त खोने वाला अंश अत्यंत मार्मिक है।


दूसरे अध्याय में कोलियरी की ज़िंदगी को कैनवास पर उतारा गया है। मज़दूरों के क्रमबद्ध झुंड की पदचाप से उठता संगीत पाठक के कानों तक पहुँचता है। जंगल और खनिज का मिलता रंग देखने को मिलता है। ढाबा, चाय की टपरी, बीड़ी का छल्ला, मशीनों का कर्कश शोर—सबका सजीव चित्रण आपको उस ग्राम में ले जाता है।


माँ लईयो की पहली नर्स थीं। संयोग है कि मेरी माँ भी नर्स रही हैं, तो उस जीवन में आए संघर्ष को समझ सकता हूँ। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं कि आपको ईश्वर के समकक्ष बिठा दिया जाता है और दूसरे ही पल भर-भर कर गालियाँ मिलती हैं। स्वास्थ्य विभाग में काम करने की यह विडंबना आपके साथ हमेशा रहती है।


उस माहौल का विवरण बहुत बारीकी से किया गया है। पहाड़ों की छुपी और रात की आवाज़ें सब दर्ज हैं। लुगु बुरु जैसे पठार को मिथकीय दैत्य का रूपक एक बालमन की स्मृति को पुनर्जीवित करता है। इसी पठार को जीवित पुरखा की संज्ञा दी गई है। महुआ के पेड़ से त्याग के संस्कार की सीख और पेड़ के प्रति आदर भाव से उपजा अनुशासन हम सबके लिए भी एक सीख है। पत्तों की राख में महुए का पकना—यह सोच कर ही रोमांच उभर आता है। मन करता है दौड़ कर पहुँच जाऊँ, मैं भी धरती पर बिखरे पके मोतियों को बीनने।


सुशील स्वतंत्र 


सामाजिक ताना-बाना, भाषाई विविधता, संस्कृति में एकजुटता का राग, त्योहारों का अपना आकर्षण—सब यहाँ बहुत अच्छे से दर्ज है।


“आदमी से बड़ा उसका किरदार होना चाहिए”—मीनू भाई एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो रिश्तेदार नहीं हैं, पर उनसे ज़्यादा हैं। आजकल ऐसे व्यक्तित्व के लोग कम ही दिखते हैं। लेखक खुद को उनके बेहद क़रीब पाता है और उनकी हर अदा का दीवाना भी है। उनके संवाद हों या उनके गुण—जैसे किसी भी व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ गुण बाहर निकाल देना, उदास को हँसा देना इत्यादि। आनंद जैसे किरदार अब सच में नहीं मिलते; यहाँ तो आनंद के साथ विजय के किरदार का मिश्रण है।


इस अध्याय का क्लाइमेक्स नज़ीर अहमद कुरैशी और शब्बीर अहमद कुरैशी भाइयों की अद्भुत मिसाल दर्ज करता है। लगभग असंभव-सा प्रतीत होता है उनका फानी होने का तरीका और अंत में मीनू भाई का मार्मिक अंत। सब कुछ एक फ़िल्म की टाइट स्क्रिप्ट की तरह है। चूँकि मैं ऐसे ही इलाक़ों में पला-बढ़ा हूँ, ऐसे व्यक्तित्वों से राब्ता रहा है, इसलिए ऐसी लेखनी से एक अलग तरह का जुड़ाव महसूस कर सकता हूँ। सबसे मार्मिक हिस्सा मीनू भाई की क़ब्र का किसी को पता न होना है।


‘इक्कीस मई’ अध्याय इस किताब की आत्मा है। एक सच्चे, समर्पित कम्युनिस्ट के जीवन को एक सुंदर फ़्रेम में सजाया गया है। बद्री जी—यानी लेखक के पिता—का नौकरी से हट कर खदान के मज़दूरों और फिर पूरे बिहार के लिए काम करना और पार्टी के शीर्षस्थ नेतृत्व तक पहुँचना कोई सामान्य कहानी नहीं, बल्कि प्रेरणा से ओत -प्रोत सच्ची कथा है। चूँकि इस सफ़र को मैंने भी बहुत नज़दीक से देखा है और मुझे भी उनका आवश्यक सानिध्य व समय पर मार्गदर्शन मिला है, इसलिए इस अध्याय को पढ़ते हुए मैं अत्यंत भावुक हो गया। इक्कीस मई के दिन का वृत्तांत बहुत मार्मिक है। एक बेटे की क़लम से उस दिन को लिखना—उस दर्द को, उस न जाने वाले, न भूलने वाले स्पर्श को—बार-बार जीना है। आशा है लेखक एक दिन इस अध्याय को अंततः एक स्वतंत्र किताब का रूप अवश्य देंगे।


“दिल्ली सबको दिखती है, यमुना पुश्ता कितनों को दिखता है?”—यह प्रश्न इस अध्याय का मूल प्रश्न है। अध्याय का शीर्षक है ‘शहर का हाशिया’। इस जीते-जागते इतिहास से रूबरू होना यथार्थ के शूलों पर चलने जैसा है। दिल्ली की धारावी को दिल्ली में कितने लेखकों ने देखा है—यह प्रश्न पढ़ते हुए न जाने क्यों कौंध गया। कभी न सोने वाली इस बस्ती का सजीव चित्रण आपको इस विभीषिका से बखूबी परिचित कराता है। इस अध्याय को पढ़ते हुए नेपथ्य का संगीत सुनाई पड़ता है—जहाँ नमाज़ और कीर्तन के सुर मिलते हैं, रिक्शों की घंटियों के साथ हथौड़ी की पिटन, सिलबट्टे और ओखली की धुनें गूँजती हैं। दिन के कोलाहल और रात की उनींद का अद्भुत मेल है। यह उचाट उनींद ही यहाँ की रात का काला सच है, जिसकी व्याख्या लेखक बहुत संजीदगी से करता है। इसी अध्याय की एक पंक्ति पर मैं ठहर गया—


“चेहरे पर एक उन्मुक्त हँसी धारण किए रहमतुल्लाह दरवाज़े पर खड़े थे।” और वह दरवाज़ा था अनौपचारिक शिक्षा केंद्र का। यह पंक्ति कितना कुछ कह जाती है।


झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के साथ तैयार किया गया नुक्कड़ नाटक बनने की कहानी भी दिलचस्प और प्रेरक है। कीचड़ में कमल खिलाना आसान नहीं होता।


इसके साथ ही पूरी बस्ती के उजड़ने की कथा भी कम मार्मिक नहीं है। यमुना पुश्ता ऐसे गुम हो गई जैसे कभी थी ही नहीं—सरस्वती नदी जैसी हालत। उजड़ती बस्ती का अपना संघर्ष होता है और इस संघर्ष के साथ रहते हुए, अपने रोल को बदलते हुए, लेखक मानो खुद को भविष्य के लिए तैयार कर रहा था।


अगले अध्याय में ‘चुप्पी’ को लेखक ने समय की पक्की और सबसे पुरानी सहेली का दर्जा दिया है। लेखक के शब्दों में काव्यमयता का प्रवाह है


“ए चुप्पी! तुम्हारी देह नहीं होती, पर तुम्हारी उपस्थिति देह से अधिक गहन होती है। तुम हवा में घुली वह अनकही लय हो, जो चटकने की आवाज़ से हल्की, पर अंतरतम को भेदने में बिजली-सी तीव्र हो।”


‘चुप्पी’ की परतों को इस तरह खोलना दुर्लभ है। साधु की चुप्पी और बिहूला की चुप्पी में कितना अंतर है। चुप्पी को महसूसते हुए लेखक का दृष्टा पक्ष असाधारण रूप से प्रबल हो उठता है। जल में काँपती किरणों की चुप्पी का उल्लेख चकित करता है। यह अध्याय—‘चुप्पी, तुम इतनी ज़िद्दी क्यों हो’—मुझे कई कारणों से अत्यंत प्रिय है। इसमें शब्दों की तारतम्यता, वाक्यों की लयात्मकता, गूढ़ आत्मचिंतन का सार और गद्य में काव्य-सा प्रवाह है। जीवन और मृत्यु—दोनों को एक ही शब्द से माप लेना आसान नहीं। ऐसे गद्य में अभ्यास और चिंतन-मनन का संतुलन निहित होता है।


“तुम अकेली रहती हो, लेकिन अकेलापन तुम्हारा दुःख नहीं, वैभव है।”


ऐसी पंक्तियाँ सहजता से कह देना असाधारण है। इतिहास और वर्तमान—दोनों की स्थिति को एक ही शब्द के भाव से व्यक्त कर देना लेखक की सामर्थ्य को दर्शाता है।


आगे के दोनों अध्याय पढ़ कर लगता है कि बलराम सर और उदय भाई जैसे लोग ही इस भ्रांत जीवन की असल उपलब्धि हैं।


डॉ. स्वाति चौधरी और संदीप तोमर जी के संपादन में यह श्रृंखला अपनी गति बनाए रखे।


लेखक को ढेर सारी शुभकामनाएँ—क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर मुझे भी उनकी अगली किताब का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।


इक्कीस मई – सुशील स्वतंत्र

स्वतंत्र प्रकाशन


यतीश कुमार 


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मोबाइल : 8420637209


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