गरिमा श्रीवास्तव का श्रद्धांजलि आलेख 'ये कौन लोग हैं जो रूह में उतर जाते हैं'
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| राजी सेठ |
राजी सेठ : न हन्यते
'ये कौन लोग हैं जो रूह में उतर जाते हैं'
(अक्तूबर 1935 – 28 नवम्बर 2025)
गरिमा श्रीवास्तव
यह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एक शाम थी. गहमागहमी हॉलों में बंद हो चुकी थी। कमलादेवी ऑडिटोरियम के सामने ही चाय के सरंजाम पर कुछ लोग फ़िदा हो रहे थे। कुछ ने चीनी मिट्टी के भारी सफेद कपों में ब्रुक बांड की ख़ुशबू बिखेरती चाय उठा रखी थी। मैदे के बिस्कुटों के ऊपर लगी अजवायन को दांतों तले कुटकुटाते हुए एक नवोदित कवयित्री बड़े क़ायदे से हर आते-जाते पर निगाह रख रही थीं, चाय पीते, बिस्कुट काटते हुए लिपस्टिक बिगड़ न जाये इसका पूरा ध्यान था उन्हें। एक ख्यातिलब्ध उपन्यासकार अपनी सावधानी भरी बेपरवाह नज़रों से सुयोग्य आलोचक को ढूँढ रहा था। आसमान में चाँद आधा था, खिला हुआ, चन्द्रपुलि–सा। आह! कितने दिन हो गए चन्द्रपुलि (बंगाली मिष्ठान्न) खाये हुए। यहाँ के थाली भर समृद्ध भोजन के बजाय एक टुकड़ा चन्द्रपुलि ही मिल जाती तो कैसा अच्छा रहता! यही सोचते मैंने हरी घास पर बिछी दिसंबर के महीने की ठंडी ओस को छुआ। हॉल के भीतर जाने का मन नहीं कर रहा था, भाँति- भाँति की गन्ध, ट्रंक से बहुत दिनों के बाद निकले ऊनी कपड़ों की बासी गंध, नेफ़्थिलिन बाल्स की तीखी गंध पर हावी जैस्मिन की गंध वाले शाल ओढ़े मोहतरमाओं की गंध, ठंडी-गर्म हथेलियों के परस्पर मिलने की गंध, सच्चे-झूठे ठहाकों की गंध, रात गहराने पर द्रव्य परिवेशन की बाट जोहती कई जोड़ी आंखों की मदालस गंध, बहुत दिनों बाद बाँधी गई टाई की नॉट से कसते-दुखते नरेटों की सामूहिक गंध, कार्यक्रम के देर तक चलने की ऊब से उपजी उबासी की गंध, बहुत सी मोबाइल स्क्रीन के चमकने की गंध -सब परिचित-अति परिचित... पर वह नहीं इस भीड़ में जिससे मिलने के लिए शाम ढले ही आ गई हूँ इस अहाते में। वही जिसने लिखा था कभी –“मेरे पुरखों, मेरे देवताओं, मुझे शक्ति दो... मुझे एक मनुष्य के स्वीकार के लिए मनुष्य बनना है’।
टोकना ही वाजिब है ‘मैं’ को, वही ‘मैं ‘जो भरी भीड़ में अकेला और जोशीले मेले में निचाट हो जाता है। मुझे रिल्के याद या रहे हैं। वही रिल्के जिनके पास ले गई हैं मुझे राजी सेठ- “प्रिय महोदय, अपने एकांत को प्यार करो और उससे होने वाले दर्द को खुल कर व्यक्त करने का प्रयास करो। क्योंकि जो तुम्हारे निकट हैं, वे दूर हैं... और यह दर्शाता है कि तुम्हारे आस-पास का स्थान विशाल होने लगा है....। अपने विकास पर खुश रहो, जिसमें तुम किसी को अपने साथ नहीं ले जा सकते, और जो पीछे रह जाते हैं उनके साथ सौम्य रहो; उनके सामने आत्मविश्वासी और शांत रहो और उन्हें अपने संदेहों से मत सताओ और उन्हें अपने विश्वास या आनंद से मत डराओ, जिसे वे समझ नहीं पाएँगे। उनके साथ अपनी समानता की एक सरल और सच्ची भावना खोजो, जो ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे बार-बार बदलने पर भी बदल जाए; जब तुम उन्हें देखो, तो जीवन को उस रूप में प्यार करो जो तुम्हारा अपना नहीं है और उन लोगों के प्रति उदार रहो जो बूढ़े हो रहे हैं, जो उस अकेलेपन से डरते हैं जिस पर तुम भरोसा करते हो.... और किसी समझ की अपेक्षा मत करो; बल्कि उस प्रेम में विश्वास रखो जो तुम्हारे लिए एक विरासत की तरह संग्रहीत किया जा रहा है, और विश्वास रखो कि इस प्रेम में एक शक्ति और एक ऐसा आशीर्वाद है जो इतना बड़ा है कि तुम बिना किसी बाधा के जहाँ चाहो वहाँ यात्रा कर सकते हो। इससे बाहर कदम रखो।”
राजी सेठ आती हैं, गाड़ी से। कृष्णा सोबती ने इनसे मेरी तारीफ़ कर रखी है, यह मालूम है मुझे। हल्के क्रीम रंग की रेशमी साड़ी, जिस पर उसी रंग के बूटे उकेरे गए हैं, कोहनी ढँका मोटा ब्लाउज़, साड़ी पहनने का आभिजात्य, कलाई पर पहनी चौड़े पट्टे की घड़ी, काले रंग का खूब बारीक कढ़ाईदार पश्मीना शॉल कंधे पर, बदन ढँका हुआ अच्छी तरह, उन्हें किसी को कुछ नहीं दिखाना। गहरी दार्शनिक आँखें, मोटे फ्रेम का चश्मा और हथेली में मुड़ा सफेद रुमाल, एक बिंदी लगा सौम्य बौद्धिक चेहरा -ज्यों ठहरा हुआ गहरा पानी। सोचती हूँ क्या इसी चेहरे पर न्योछावर हो गई होंगी शाहजहांपुर में निरंजन नाथ सेठ की माँ? क्या उम्र रही होगी राजी की जब लाहौर में बसी-बसाई गृहस्थी को रातों-रात छोड़ कर माता-पिता और परिवार के साथ जालंधर, दिल्ली होते हुए बुआ के घर शाहजहांपुर आई होंगी? शायद बारह! बारह साल की कोमल-मसृण लड़की की छाया देख रही हूँ इस बहत्तर वर्षीया नामचीन लेखिका में। उनके हाथों ने मेरे कंधे पर हौले से छुआ है, यह पहचान की छुअन है, देख रही हूँ उनकी आँखों में, और सन 1947-48 के शाहजहांपुर के स्कूल का चित्र उभर रहा है। स्कूल का वार्षिकोत्सव है, नया एडमिशन है राजी का, बहन जी ने गोरी-चिट्टी मक्खन-सी राजी को नाटक में रानी का रोल दिया है। बड़े से हाल में समूचे शहर के बड़े लोग जमा हैं, स्कूल में उनकी बच्चियाँ पढ़ती हैं, बोर्ड मेंबर और एडवोकेट ने कहा है रानी को सजाने के लिए आभूषण उन्हीं के घर से जाएँगे। नन्हीं राजी को मांगटीका, नथ, चन्द्रहार, सतलड़ा, बाजूबंद, अंगूठड़ा, पायल, कमरबंद सब कुछ पहनना है, सुच्चे गहने साहब! एकदम खालिस सोने के। सुंदर लड़की अनायास ही किशोरी दिखने लगी है, स्वर्ण-मुकुट बार-बार सिर से फिसल जाता है, बहन जी सुनहरे-लाल दुपट्टे को काली हेयरपिनों की सहायता से माथे पर टिकाने को आमादा हैं। होठों पर मिस्सी लगी है, लड़की पहली बार स्त्री बन रही है, आईने में अपने-आप को पहचान नहीं पा रही, और दर्शक ही कहाँ पहचान पाये कि तहदार सफेद दुपट्टा पहने, प्रार्थना की पंक्ति में रोज़ आगे खड़ी रहने वाली लड़की यही है जो नाटक के स्टेज पर हो गई है ‘रानी’ - उफ़्फ़ इतना सौंदर्य, सौंदर्य की चौंध से दर्शक-दीर्घा में खलबली है - कौन लड़की है यह-इतनी सुंदर, इतनी शालीन। सोने के रत्नजटित आभूषण नाटक के बाद भी नहीं उतरते, लड़की को बोर्ड मेंबर के घर ले जाया जाता है, आख़िर गहनों की असल मालकिन का हक भी तो बनता है - देखें तो सही किस सुपात्र पर रत्न न्यौछारे गए हैं, मालकिन अन्तःपुर से निकलती हैं और देखती रह जाती हैं-एकटक उसी सुंदर बालिका छवि को, जिसने उनकी सहेजी आभूषण-पोटली को एक क्षण में ही सार्थकता दे दी है। नज़र हट ही नहीं रही, बालिका राजी गहनों के बोझ और संकोच से नतशिर है, मालकिन उसकी कलाई पकड़ कहती हैं – ‘अब जाने न दूँगी’।
लाहौर की मार-काट, दंगों से चोटिल, विस्थापित परिवार देश विभाजन के बाद किसी तरह शाहजहांपुर में अपना खर्च चला रहा है कि ऐसे में समाज के उच्चपदस्थ जमींदार ख़ानदान से उनके पुत्र के लिए राजी का रिश्ता आ जाता है। रिश्ता अस्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं है। राजी और निरंजन, निरंजन और राजी - प्रेम हो गया है, किशोर राजी सपनों के अर्थ समझने लगी है और यह रिश्ता अगले सत्तर वर्षों तक चलता है - नित-नूतन प्रेम-दांपत्य की बेल परवान चढ़ी, लेकिन दोनों के बौद्धिक-आध्यात्मिक विकास की गति क्षीण न हुई। निरंजन नाथ ने फाइनेंस की पढ़ाई की, राजी ने दर्शन और अंग्रेजी साहित्य की, दोनों के प्रेम की निशानी के तौर पर आया राहुल सेठ - उनका इकलौता पुत्र।
राजी ने पति-परिवार का खूब ध्यान रखा, खूब पढ़ा और लगभग चालीस वर्ष की उम्र में लिखना -छपना शुरू किया, पहली कहानी अज्ञेय ने ही छापी ‘नया प्रतीक’ में, तब से दोनों की साहित्यिक मित्रता अज्ञेय की मृत्युपर्यन्त चली। कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी दोनों से बौद्धिक, संवेदनात्मक मैत्री ने सबको जोड़े रखा। अज्ञेय गए, कृष्णा जी और मन्नू जी भी दोस्ती निभाती चली गईं- परलोक में, जिसे कृष्णा सोबती कहा करतीं ‘परलोक यानी दूसरों का लोक। 2025 का नवम्बर माह इसलिए याद रहेगा कि हिंदी के महत्वपूर्ण साहित्यकारों की एक कड़ी -दुनिया जिसे राजी सेठ के नाम से जानती थी, अपनी रचनात्मकता के प्रमाण दे कर हमारे बीच से हमेशा के लिए चली गई, चुपचाप बिना किसी बीमारी, बिना किसी शोर के। जाते वक्त भी वे पूरी तरह चैतन्य थीं। मन्नू जी को स्मृतिदोष हो गया था, कृष्णा जी को श्वास कष्ट था, बीमारी चली आ रही थी, रात ही उनके लिए दिन हुआ करता लेकिन राजी सेठ! अंतिम क्षण तक स्मृति बिल्कुल चाक-चौबंद! बेटे को बाँह उठा कर असीसा। ऐसी संतान हर साहित्यकार को मिले। राहुल ने राजी की तीन सौ से अधिक अब तक अप्रकाशित कविताएँ चार खंडों में छपवाईं। पिता की तरह वे फाइनेंस से जुड़े रहे पर राजी ने उन्हें साहित्यिक संस्कार दिए, वे पहचानते हैं माँ के लिखे हर शब्द का मर्म। वाशिंगटन डी. सी. छोड़ कर भारत आए सन 2012 में ताकि माँ -पापा के साथ रह सकें। राजी दुबली हो चली हैं, बुढ़ापे ने ऊर्जा छीन ली है, झुर्री भरे हाथों से घर -परिवार, परिचारक को आशीर्वाद दे रही हैं- काल ने किसको छोड़ा है, राजी भी राजी हैं जाने को, खुले मन से। तन का पिंजरा तोड़ कर मन उड़ने को व्याकुल है। एक लंबी गहरी साँस और सब कुछ शांत। जीवन में कोई जोड़-तोड़ नहीं, किसी से कोई सिफारिश नहीं। कई भाषाओं के अकूत ज्ञान के साथ हमारे बीच से चली ही गई हैं। उनका जाना, उनकी विदाई सिर्फ़ एक लेखिका की विदाई नहीं है; यह एक पूरी सृजन-संवेदना की विदाई है जिसने हिन्दी को भीतर से इतना समृद्ध किया कि उसकी गहराई को मापना मुश्किल है।
अक्तूबर 1935 में नौशेरा छावनी, अविभाजित भारत में जन्मी राजी सेठ का बचपन विभाजन की आग में झुलसा हुआ था। घर छूटा, ज़मीन छूटी, पहचान छूटी, अस्तित्व की चोट का वह दर्द कभी चीख बन कर नहीं निकला; वह एक रुद्ध श्वास-सा उनकी हर रचना में बसा रहा। लिखना उन्होंने बहुत देर से शुरू किया – पहली कहानी 1975 में लिखी, जब वे चालीस पार कर चुकी थीं। उससे पहले अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. और भारतीय दर्शन और तुलनात्मक धर्म में गहरा अध्ययन किया था। जब लिखा तो जैसे साठ वर्ष का संचित मौन एक साथ बोल उठा। उनकी कहानी का नैरेटर कहता है – “अभी चार साल पहले इसका आदमी मरा है। यह बुढ़िया इस धक्के को नहीं भूलती। पार्टीशन के दंगों में कहाँ तो बारह घंटे की प्रचंड गोलीबारी से बच निकला और कहाँ इसकी बगल में सोता-सोता मर गया।” राजी सेठ अपने इतिहास-बोध के लिए जानी जाएंगी। कलाकार कैसे किसी नैरेशन को बिंब में ढाल कर पाठक के लिए ग्राह्य बना देता है, राजी सेठ से यह कला सीखने की है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘इतिहास को मनुष्य की तीसरी आँख’ कहा था। राजी ने वह तीसरी आँख पा ली थी स्वानुभव से, स्वाध्याय से और दुनिया-धंधे को गौर से देखते रहने से। 1960 के दशक के स्त्री लेखन के प्रतिनिधि स्वर के रूप में राजी सेठ के लेखन को पहचाना जा सकता है जब भारतीय स्त्री बहुत-से सवालों के जवाब ढूँढ रही थी, वही उनके प्रतिबद्ध होने का एक संकेत भी था। कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी की तर्ज़ पर वे स्त्रीत्व के सार्वभौमिक सवालों से टकराती हैं लेकिन उनके निजी अनुभव, विभाजन के इतिहास का चश्मदीद गवाह होने को एक ऐसे प्रस्थान बिंदु की तरह देखा जा सकता है जिसने उनकी विशिष्ट लेखन-शैली को आकार दिया। उत्तर प्रदेश के एक बड़े सामंती परिवार की बड़ी बहू के रूप में उन्हें कई पारंपरिक स्त्री- ‘भूमिकाओं’ को लाँघने के लिए जाहिरा तौर पर ही बहुत साहस की आवश्यकता रही होगी—ऐसा साहस जिसने एक ओर सर्जक की रक्षा की और दूसरी ओर उसे निरंतर पोषित भी किया।
राजी ने दो ही उपन्यास लिखे - ‘तत्-सम’ (1983) और ‘निष्कवच’ (1995)। लेकिन अपने उपन्यासों में वे अनेक सीमाएँ पार करती हैं। जीवन और संबंधों के संजाल में जकड़ी स्त्री की वह छवि, जो अनेक भूमिकाओं—अक्सर परस्पर विरोधी—के बीच संघर्ष करती हुई अलगावपूर्ण स्थितियों से गुजरती है, अपने आप में अद्वितीय है। उनका दृष्टिकोण उस कथन में सर्वश्रेष्ठ रूप से प्रकट होता है जो डोरिस लेसिंग ने 2007 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद लंदन में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे स्त्रीवादी हैं, तो उन्होंने कहा—“कोई भी स्त्री लेखक कैसे स्त्री की तरह सोचे और लिखे बिना रह सकती है?” राजी सेठ का लेखन इसे प्रमाणित करता है।
उनकी कहानी अपने विरुद्ध (1981) में रुचि का चरित्र है, जिसकी सृजनात्मक आकांक्षा दाम्पत्य संबंधों में दरार पैदा कर देती है। श्याम भी एक महत्वाकांक्षी लेखक है और उसने कहा था कि वह कभी किसी लेखक की मृत्यु देख नहीं सकता। विडम्बना यह कि वही रुचि की रचनात्मक आकांक्षा को स्वीकार नहीं कर पाता। उसका पुरुष-अहंकार ही अपनी ही पत्नी को आत्म-अभिव्यक्ति का कोई मार्ग देने से इंकार करता है।
‘अच्छी पत्नी’ की भूमिका और अपनी रचनात्मक इच्छाओं को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रही लेखिका—इन दोनों के बीच रुचि द्वंद्वग्रस्त है। क्या यह द्वंद्व गृहस्थी करती हर रचनाकार का नहीं है? स्त्री की दोनों भूमिकाएं आपस में टकराती हैं। पति का अहं तुष्ट करे कि उन सीमाओं का उल्लंघन करे, जो उसके लिए तय कर दी गई हैं। वह अपनी सभी कविताएँ जला देती है—मानो स्व से प्रतिरोध करते हुए—ताकि वह अपने पति को स्वीकार्य सामाजिक रूप से निर्धारित भूमिका में सुरक्षित रह सके। इस प्रकार संबंध बचा रहता है और बना रहता है दाम्पत्य। कहानी का शीर्षक राजी देती हैं - ‘अपने विरुद्ध’।
तत्सम (1983) उपन्यास में वसुधा की धार्मिक, आदर्श विधवा से एक पूर्ण-संगिनी बनने की विकास यात्रा किसी भी प्रकार की आलोचना या आरोप की सबसे हल्की छाया से भी मुक्त है। वसुधा अपने बहुविध एकाकीपन के लिए किसी को दोष नहीं देती जिसे उस स्त्री को झेलना पड़ता है जो तयशुदा राह से हट कर चलती है। एक स्त्री अपनी नियति को अपनी व्यक्तिगत और अस्तित्वगत रुचियों के सहारे नियंत्रित कर सकती है—न कि समाज द्वारा निर्धारित भूमिकाओं से। उसका जीवन उसके अपने नियमों पर चलना चाहिए और चल सकता है। परम्परागत और तयशुदा भूमिकाओं को तोड़ कर कुछ महत्त्वपूर्ण हासिल करने की उसकी आकांक्षा एक ऐसे मार्ग पर ले जाती है जो जटिलताओं से भरा है। उपन्यास में लेखिका कोई ठोस समाधान नहीं देतीं, क्योंकि उनकी कथा-रचना यथार्थ की ज़मीन से खाद-पानी लेती है—कोई कल्पना नहीं, वे जानती हैं जीवन के गुणा-गणित में सभी समीकरण सीधे सरल-नहीं होते, सबका समाधान संभव नहीं है।
“मैंने सारे कवच उतार दिए। अब घाव लगने की जगह ही नहीं बची” – भारतीय स्त्री के लिए यह पंक्ति हिन्दी की सबसे मुक्तिदायी पंक्तियों में से एक है।
उनकी कहानियाँ भी कम प्रभावशाली नहीं रहीं – ‘तीसरी हथेली’, ‘ख़ाली लिफ़ाफ़ा’, ‘गमे-हयात ने मारा’, ‘मार्फ़ा का देश’ – हर कहानी में एक पूरा उपन्यास समाया हुआ है।
कविताएँ सबसे निजी हैं – बहुत कम, बहुत सघन।
“मैंने अपना नाम खो दिया है
अब सिर्फ़ साँसें हैं मेरे पास
और एक खिड़की
जो हमेशा खुली रहती है”
या
“मौत कोई सज़ा नहीं
वह तो बस एक पुराना कोट उतारना है
जो बहुत तंग हो गया था.”
इन काव्य-पंक्तियों से गुज़रते हुए ‘गीता’ के एक सुप्रसिद्ध श्लोक
‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥’
की याद न आए, यह मुमकिन नहीं।
2024 में प्रकाशित राजी सेठ की समग्र कविताएँ उनकी सृजन-यात्रा का सबसे सुन्दर और अंतिम पड़ाव हैं। गत वर्ष जब उनके पुत्र राहुल सेठ ने मुझसे वाणी प्रकाशन द्वारा उनकी समग्र कविताओं की पुस्तक का ब्लर्ब लिख देने का अनुरोध किया तो उस क्रम में मेरे सामने उनके रचनाकार-व्यक्तित्व का नया आयाम खुला। मैंने लिखा था -
“राजी सेठ के कवि व्यक्तित्व को परत दर परत खोलने वाली इन कविताओं से गुजरना उनके रचना कर्म की मुकम्मिल समझ के लिए अनिवार्य ही नहीं, अपरिहार्य है। शब्द-चेतन मनुष्य की अंतरात्मा को जगाने में समर्थ इस शब्द कर्म में आम पाठकों को सहृदय बनाने और सहृदय पाठकों को और अधिक संवेदनक्षम बनाने की अन्तर्निहित क्षमता है। मनुष्यता की विकास यात्रा में गहरी आस्था से लैस राजी सेठ का कवि-कर्म उनके रचनाकार के अंत:करण की व्यापकता और गहराई का पता देता हुआ विनम्रतापूर्वक उस शाश्वत सत्य को स्वीकार करता है कि दुनिया में किसी व्यक्ति के सशरीर न रहने के बावजूद प्रकृति का कार्य व्यापार कदापि बाधित नहीं होता :
“हम नहीं रहेंगे
यह पेड़ तब भी खड़े रहेंगे
...हिमखण्ड उसी तरह पिघलेंगे
भोले खग चहकेंगे
प्रकाश अन्धेरा चीरेगा उसी तरह
सौरभ-सुत महकेंगे
नदी निर्झर तब भी झरेंगे
उर्मिल लय के आरोह अवरोह पर
सागर-पग बहकेंगे।”
कहने की ज़रूरत नहीं कि अहम्मन्यता से भरे उत्तर-आधुनिक कहे जाने वाले हमारे समय में ऐसी स्वीकारोक्ति दुर्लभ है।
सुविस्तृत फलक वाली बौद्धिक संवेदना तथा संवेदनशील बौद्धिकता से परिपूर्ण इन आवेगमयी कविताओं में अभिव्यक्ति की नक्काशी हो न हो, अनुभूति की प्रामाणिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। स्वप्न के बहाने अपने समय के तेज़ाबी यथार्थ को व्यक्त करने वाली कवि राजी सेठ द्वारा किए गये भय के चित्रण में भी एक नैतिक साहस है। यह साहस उनके रचना कर्म का प्राण तत्त्व है, तभी वे तुलसीदास की “कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥“ की तरह स्पष्ट लिखती हैं :
“कवि होने का दावा कभी नहीं किया है
कुछ टूटे गद्य से लिखा है -
शिल्प होता तो
...तुम्हें ही न गढ़ लेता.”
कविता में धार्मिकता के बगैर यह आध्यात्मिक स्वर आज दुर्लभ है।”
किन्तु, राजी सेठ का एक और रूप है जो अक्सर हिन्दी के पाठकों की आँखों से ओझल हो जाता है – वह है उनका अनुवादक रूप। वे बड़ी अनुवादक भी थीं और शायद अनुवाद में उनका व्यक्तित्व और भी ज़्यादा खुल कर सामने आता है। उनका सबसे बड़ा और सबसे प्रेमपूर्ण अनुवाद है रिल्के के पत्र। ‘पत्र युवा कवि के नाम’ (1994) और ‘रिल्के के प्रतिनिधि पत्र’ (1999, साहित्य अकादमी) – इनमें सौ से ज़्यादा पत्रों का हिंदी अनुवाद शामिल है। यह अनुवाद शब्दशः नहीं है; यह दिनकर द्वारा रिल्के की कविताओं के अनुवाद की तरह ही मूल रचनाकार की आत्मा की प्रतिध्वनि का अनुवाद है। रिल्के की जर्मन भाषा की ठंडक, उसकी गहनता, उसकी पारदर्शिता – सब हिन्दी में इस तरह उतरा कि लगा रिल्के ने हिन्दी में ही लिखा हो। एक जगह रिल्के लिखते हैं – “धैर्य रखो उन सबके प्रति जो अनसुलझा है तुम्हारे हृदय में…।” – राजी सेठ ने इसे इतनी शिद्दत से अनूदित किया कि हिन्दी पाठक की आँखें भर आती हैं। रिल्के के पत्रों का यह अनुवाद आज भी हिन्दी के युवा लेखकों के लिए प्रेरक है।
इसके अलावा क्लैरिस लिस्पेक्टर की कहानियाँ और उपन्यास के अंश, गार्सिया मार्केज़ की कुछ लघुकथाएँ, फ्रांज़ काफ्का की डायरियों के कुछ भाग, सिमोन द बोउवार के निबंध, टोनी मॉरिसन के साक्षात्कार – सबको उन्होंने हिन्दी में इस तरह उतारा कि मूलपाठ की आत्मा की जीवंतता के साथ ही हिन्दी भाषा की आंतरिक लय भी बनी रहे। क्लैरिस लिस्पेक्टर को उन्होंने जैसे अपनी बहन बना लिया था। क्लैरिस की जटिल, लगभग असम्भव वाक्य-रचना को हिन्दी में इस तरह ढाला कि वह और भी ज़्यादा ख़तरनाक और और भी ज़्यादा कोमल लगने लगी। मार्खेज़ की जादुई यथार्थवाद की चमक को उन्होंने हिन्दी की मिट्टी में इस तरह मिलाया कि वह हमारी अपनी हो गई। काफ़्का की अँधेरी गलियों में वे खुद चलती हुई लगती थीं और पाठक को हाथ पकड़ कर ले जाती थीं। टोनी मॉरिसन के दर्द को उन्होंने हिंदुस्तान की औरत के दर्द से इस तरह जोड़ा कि दोनों एक ही हो गए।
जापानी चिंतक डाइसाकु इकेदा का बाल-उपन्यास ‘राजकुमार और मूंगो का संसार’ (नेशनल बुक ट्रस्ट) का उन्होंने बच्चों के लिए अनुवाद किया, पर उसमें भी वही गहनता है। तमिल लेखिका लक्ष्मी कण्णन के लघु उपन्यास ‘आकाश ही आकाश’ का भी उन्होंने अनुवाद किया – तमिल की संवेदना को हिन्दी में इस तरह ढालना अपने आप में विरल था।
उनके अनुवादों ने हिन्दी को अकेला होने से बचा लिया। जब हिन्दी का साहित्यिक संसार संकुचित हो रहा था, तब उन्होंने अकेले ही सारी दुनिया की खिड़कियाँ खोल दीं। जर्मन, पुर्तगाली, स्पेनिश, फ्रेंच, अंग्रेजी, जापानी, तमिल – सबकी आवाज़ें हिन्दी में गूँजने लगीं, और वह आवाज़ राजी सेठ की आवाज़ थी – कोमल, गहरी, सच्ची और ईमानदार।
आज जब हम रिल्के पढ़ते हैं, तो राजी सेठ को भी पढ़ते हैं.जब क्लैरिस पढ़ते हैं, तो राजी सेठ की साँसें भी महसूस करते हैं। जब मार्खेज़ की उनके द्वारा अनूदित कोई कहानी हिन्दी में पढ़ते हैं, तो लगता है कि कोई अपनी ही कहानी सुना रहा है।
राजी सेठ चली गईं, पर उनके शब्द कर्म और अनुवादों में सारी दुनिया अभी भी हिन्दी में साँस ले रही है। जब भी कोई युवा लेखक रिल्के का पत्र खोलेगा, राजी सेठ वहाँ मौजूद होंगी।
निर्मला जी, प्रिय कथाकार मन्नू जी, कृष्णा जी और उनके बाद राजी सेठ का जाना मेरी निजी क्षति है। फ़िलवक़्त बेसाख़्ता अहमद फ़राज़ याद आ रहे हैं :
ये कौन लोग हैं जो रूह में उतर जाते हैं
मरें तो दर्द हमारी रगों में भर जाते हैं।
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| गरिमा श्रीवास्तव |
सम्पर्क
गरिमा श्रीवास्तव
प्रोफ़ेसर, भारतीय भाषा केंद्र,
जे.एन.यू, नई दिल्ली
ई-मेल: drsgarima@gmail.com








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