गणेश पाण्डेय की कविताएँ


गणेश पाण्डेय 


गणेश पाण्डेय का संक्षिप्त परिचय:


13 जुलाई 1955 को तेतरी बाजार, सिद्धार्थनगर (तत्कालीन जनपद बस्ती), उत्तर प्रदेश में जन्म। आरंभिक शिक्षा वहीं और आसपास। गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. और यहीं से आठवें दशक की हिन्दी कहानी पर डॉक्टरेट। जीविका की शुरुआत में कुछ वक़्त पत्रकारिता से सम्बद्ध। कुछ समय उद्योग विभाग में सहायक प्रबंधक के रूप में सरकारी नौकरी। सन् 1987 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति, वहीं प्रोफेसर, वहीं से सेवानिवृत्त। साहित्यिक पत्रिका 'यात्रा' का संपादन। इंटरनेट पर अपने ब्लॉग का संचालन।

कृतियाँ : अटा पड़ा था दुख का हाट (कविता-संग्रह) जल में (कविता-संग्रह) अथ ऊदल कथा (उपन्यास) पीली पत्तियाँ (कहानी संग्रह) आठवें दशक की हिन्दी कहानी (शोध) रचना, आलोचना और पत्रकारिता (आलोचना), जापानी बुख़ार (कविता-संग्रह), परिणीता (कविता-संग्रह), आलोचना का सच (आलोचना), नयी सदी की कविता (आलोचना), रीफ़ (उपन्यास), आलोचक के नोट्स (आलोचना) एक अछूत कवि की आत्मकथा (कविता-संग्रह)।


रिश्तों का जीवन में अपना एक विशिष्ट स्थान होता है। ये रिश्ते जीवन को एक नया सन्दर्भ प्रदान करते हैं। जीने की कामना पैदा करते हैं। आज के आपाधापी के जमाने में जब रिश्ते नाते छीजते जा रहे हैं, ऐसे में ये सन्दर्भ मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। दादा-दादी या नाना-नानी बनने के पश्चात एक स्वाभाविक जुड़ाव उस व्यक्ति का अपने पोते पोतियों के साथ होता है। इस तरह किसी भी व्यक्ति के जीवन का उम्र के मुताबिक अलग-अलग चरण होता है। इन अलग-अलग चरणों की अलग-अलग प्राथमिकताएं होती हैं। कवि गणेश पाण्डेय अपनी अलग तरह की कविताओं में इन रिश्तों को करीने से दर्ज करते हैं। देखने में ये कविताएँ जितनी छोटी हैं, उनका अर्थ विस्तार उतना ही व्यापक है। एक तरफ कुछ कविताएं ऐसी हैं जो बढ़ते उम्र के साथ वैराग्य यानी कि जीने की अचाहतों  को दर्ज करती हैं तो दूसरी तरफ सम्बन्धों की कविताएं हैं, जो उन अचाहतों का प्रतिकार करती हैं। अपनी एक कविता नींद में गणेश जी लिखते हैं : 'नातिन/ रात में गा कर न सुलाये/ तो मुझे नींद नहीं आती/ कहीं और जाने पर मुझे/  नींद कैसे आएगी।' यह वह लगाव है जो मनुष्य को अपने लिए नहीं तो रिश्तों के लिए जीना सिखाता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गणेश पाण्डेय की कविताएँ।



गणेश पाण्डेय की कविताएँ


हमारा प्यार 


तुम चाहती तो 

मेरा घर तोड़ सकती थी 


मैं तो चिता से भी उठ कर 

तुम्हारे साथ भाग सकता था 


मैं चाहता तो 

तुम्हारा घर तोड़ सकता था 

तुम्हारे घर के आसपास

दीवारों पर तुम्हारा नाम लिख कर 


प्यार में कोई किसी को 

नुक़सान कैसे पहुँचा सकता है 


हम तो अपने प्यार को तमाम 

वक़्त के थपेड़ों से बचाते रह गये 


दिल के किसी पोशीदा तहखाने में 

तो कभी यादों की संदूक में रखा 


यही था यही था हमारा प्यार 

राख में बची हुई चिनगारी की तरह।



आह लगेगी 


वे 

अभी-अभी पैदा हुई थीं 

अभी-अभी आँखें खोलीं थीं 

अभी-अभी उन्होंने देखा था 

स्कूल का मुँह 


ज़िन्दगी की किताब को

अभी-अभी हाथों में लिया था 

पहले हरफ़ को

उँगलियों से छुआ ही था 


दुनिया को 

जूते की नोक पर 

रखने वाले अहंकारियों ने 

फूल जैसी बच्चियों पर

अभी-अभी गिराये 

बम


अभी तो उन्होंने 

न जेट उड़ाना सीखा था 

न बम बनाना 


यह बहादुरी का काम नहीं था 

तुमने फूलों की पंखुड़ियों को

बारूद से क्षत-विक्षत किया 

कलियों को 

ताक़त के लोहे के जूते से 

मसला


जिनकी कोख उजड़ी 

उन माँओं की आह लगेगी 

संसार की सभी माँओं की 

आह लगेगी


कवि हूँ 

माँ सरस्वती से पाया है 

नैतिक-विवेक 

मेरी भी आह लगेगी


कोई भी 

देश हो या आदमी 

किसी के पास 

इतनी ताक़त नहीं होनी चाहिए 

कि दूसरे देश का माथा झुका दे

दूसरे की जान ले ले

फूलों के लाल रंग को

सड़कों पर बहते हुए 

ख़ून में बदल दे


ज़ालिमो

आह लगेगी 

आह की आग लगेगी 

ऊँची-ऊँची लपट उठेगी।


पोती पूछेगी 


पूरे तीन दिन 

फोन पर बात नहीं हुई तो 

पोती ने पूछा, बाबा कहाँ चले गये थे

बाबा ने कहा, मेरी तबीयत ख़राब थी 

पोती ने फिर पूछा, तबीयत क्यों ख़राब थी

काश, उसके बाबा की तबीयत 

कभी ख़राब न हो

काश, अपनी पोती की आँखों के सामने से 

उसके बाबा कभी ओझल ही न हों

पोती पूछेगी परेशान होगी।


गंगाजल 


बेटा 

दूसरे देश में नौकरी करता है

बहू और पोतियाँ उसके पास रहती हैं 

बेटे ने चलने के लिए कहा तो गये ही नहीं 


राम अधार 

यहीं पैदा हुए इसी मिट्टी में लोटे

पढ़े-लिखे जवान हुए शादी हुई 

यहीं प्राइमरी स्कूल में पहले मास्टर 

फिर हेडमास्टर और उसके बाद 

रिटायर हुए बूढ़े हुए 

दस बीमारियाँ हुईं 

और अब खाँसते-थूकते 

और जागते बीतती है रात


राम अधार 

अपने बाबूजी की बनवायी 

साखू लकड़ी की पुरानी बेंच पर 

तो कभी जिस आम के पेड़ को

उन्होंने ख़ुद लगाया था 

उसके नीचे बैठ कर अकेले 

रास्ता देखते हैं दिन काटते हैं 

कभी खेत-खलिहान का

चक्कर लगा आते हैं 


बेटा 

विदेश से आता है 

तो कुछ साल और 

बाहर रहने की बात करता है 

मरने के टाइम पर 

यहीं रह कर बिस्तर पर 

गू-मूत साफ़ करने के सपने 

दिखाता है 

राम अधार न कुछ कहते हैं 

न पूछते हैं-

बेटा कब आओगे 

चारोधाम कब कराओगे 


राम अधार को अक्सर 

अपने बचपन की याद आती है 

किशोर जीवन की याद आती है 

पिता की याद आती है 

याद आता है

पिता का हाथ-पैर दबाना 

उनकी पीठ खुजलाना

उन्हें नल के नीचे बैठा कर

नहलाना 


राम अधार पूरे जवार में 

बेटे की बड़ाई करते नहीं थकते 

बाहर रहता है दिरहम कमाता है 

बेटे की बुराई तो किसी से

कभी करते ही नहीं 


जब कोई आसपास नहीं होता है 

आसमान में चिरई-चिरगुन को

उड़ते हुए देख कर कहते हैं-

मरते समय गू-मूत नहीं उठाओगे 

तो भी मर जाऊँगा बेटा 

कोई नहीं रोक पाएगा मरने से 

मरते समय क्या गू-मूत 

क्या गंगाजल 


जीते जी 

थोड़ा सा सुख मिल जाता तो

शायद थोड़ा और जी जाते।



मुझे छू कर पत्थर से पानी बना दो


न चम्पा न चमेली न गुलाब 

मेरे जीवन में कोई फूल क्यों नहीं है 

कोई सुगंध कोई नरमाई क्यों नहीं है 

ओह यह जीवन पहाड़ जैसा क्यों है 


जीवन की उतराई में 

ये आग की ख़ूब ऊँची-ऊँची लपटें 

धधकता हुआ ज्वालामुखी क्यों है

न बादल है न समुद्र न आँखों में नमी 

क्या जीवन में आग ही सब कुछ है 

और पानी कुछ नहीं है 


यह मुझमें कैसी कमी आ गयी है

क्या मैं मनुष्य नहीं रह गया हूँ 

क्या इस बचे हुए जीवन को 

साधारण जीवन की तरह 

जी नहीं सकता 

किसी पर्वत से झरने की तरह 

बह नहीं सकता 


ओ मेरे बच्चो आओ मेरे पास आओ 

मुझे छू कर पत्थर से पानी बना दो।



फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 


मैं इसी महीने में 

उस नदी के पास गया था 

नदी उसी तरह बह रही थी 

नदी वही थी पानी नया था 


नये लड़के और लड़कियाँ 

तट पर हूबहू उसी तरह बैठे थे 

एक पैर जल में था एक तट पर


सूरज की किरणों से उनका 

चेहरा उसी तरह दमक रहा था 


सूरज डूब रहा है डूब जाएगा 

उन्हें पता नहीं था जैसे हमें 

पता नहीं था 


सूरज डूब जाएगा 

नदी का पानी बह जाएगा 

फूल मुरझा जाएगा 

कौन बताए उन्हें 


जीवन में 

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 

बीत जाएगा।



जगह वही है 


यह पेड़ वह पेड़ नहीं है 

यह हरा है वह सूख गया था 

जगह वही है 

यह गुलमोहर नया है 

यह अमलतास नया है फूल नये हैं 

उस पर बैठी कोकिला नयी है 

उसका कंठ नया है 

उसकी पुकार नयी है 

दोनों का साहचर्य नया है 

यह फ़रवरी नयी है।



मेरी जान


पार्क में सीमेंट की बेंच वही है 

कुर्ती उसी तरह लाल है छींटदार है 

और सलवार उतनी ही सफ़ेद 

लड़की नयी है लड़का नया है 

और बगल में खड़ी लाल बाइक 

नयी है 


सीमेंट की बेंच भी 

हमें कहाँ अलग होने से बचा पायी 

वह जगह भी हमें नहीं रोक पायी 

वह घास भी कहाँ हमें बाँध पायी 

जिस पर हम नंगे पैर चलते थे 

बिना कुछ बिछाये लेट जाते थे 

आसमान को निहारा करते थे 

आसमान भी हमें बचा नहीं पाया।


समय का चाकू 

मज़बूत से मज़बूत जोड़ को

एक झटके में अलग कर देता है 

कोई नहीं बचा पाता है फ़रवरी भी

हम बचने के लिए बने ही नहीं थे 

हमें इसी तरह टूट-फूट जाना था

मिट्टी के राजा

और मिट्टी की रानी की तरह।




हे मन


बादल तो बादल हैं 

गरज जाएँगे बरस जाएँगे 

छँट जाएँगे 


आसमान हो धरती हो सूरज हो 

चंदा हो सबको पता है 

मुझे भी पता है 


यह जो दुखी मन है

इसे कौन समझाए कौन कहे

थोड़ा सब्र करो 


समय के बादल छँट जाएँगे 

सूर्य और चंद्रमा खिल जाएँगे।



अब मुझे सो जाना चाहिए 


समय का क्या

पल में कुछ था छिन में कुछ 

अभी-अभी राग अहीर था 

अभी-अभी भीमपलासी 

जीवन में राग बहुत थोड़े से थे 

झंझावात बहुत-बहुत-बहुत 

दुख इतने थे कि न गिन पाया 

न ठीक से देख पाया न सुन

चिड़ियों की चहचहाहट के बीच 

मेरे जीवन के ठूँठ पर कब आ कर

चुपके से बैठ गयी शाम 

और कैसे जीवन की चारपाई पर

सेकेंड के हज़ारवें हिस्से में 

करवट बदल कर 

मेरे जीवन की सबसे लंबी 

और सबसे भारी रात हो गयी 

मुझे पता ही नहीं चला 

किसी और को भी कानों-कान 

ख़बर नहीं हुई 

कि कब हो गयी मेरे जीवन की रात 

और मैंने कब फ़ैसला कर लिया 

कि दुनिया की फ़िक्र छोड़ कर 

अब मुझे सो जाना चाहिए।



उड़ान संख्या जी पी 1955


मेरी प्यारी घड़ी 

तुम मुझे कितनी प्यारी हो

तुम्हारी जगह कलाई पर नहीं 

मेरे दिल में है 

तुम घड़ी नहीं मेरा दिल हो 


ऐसे ही अंत तक 

टिक-टिक करती रहना

मुझे बीच रास्ते में अकेला मत छोड़ना 

ऐसे ही मेरा साथ देती रहना 

ऐसी ही धड़कती रहना

तब तक जब तक 

उड़ने का समय न हो जाए 


कोई नहीं है जो मुझे 

मेरी बाँह पकड़ कर रोक ले

हृदय में जादुई हवा फूँक दे

टूट रही जीने की आस को जोड़ दे

सब छूट रहा है 

मेरा प्यार मुझसे छूट रहा है 

वह नदी वह किनारा वह नाव 

वह कविता वह कहानी वह नायिका 

सब छूट रहा है यह संसार छूट रहा है 


मेरा समय हो गया है 

यही समय है सही समय है

मेरा विमान उड़ने को तैयार है 

हवाई-पट्टी ख़ाली है 

न कोई और मुसाफ़िर न विमान 


मैं जानता हूँ 

मेरे साथ टिक-टिक करती हुई घड़ी 

उसकी सुइयाँ उतनी ही थक गयी है 

जितनी मेरी साँसे मेरे फेफड़े 

जितने मेरे पैर मेरे कंधे मेरी पीठ

मेरी आँखें और आँखों में बसी दुनिया 

सबकी एक उम्र होती है 

सबका एक सफ़र होता


मुझे साफ़-साफ़ सुनायी दे रही है 

कहीं से आती हुई एक आवाज़ 

उड़ान संख्या जी पी 1955 

अपने समय से उड़ने को तैयार है 


मेरे पास 

न कोई बैग है न काग़ज़-पत्तर

बिल्कुल अकेला हूँ 

विमान में घुसते ही ये पैर भी 

मेरा साथ छोड़ देंगे 

सीट तक पहुँचते-पहुँचते 

मैं निढाल हो जाऊँगा 

फिर कभी न उठ पाने के लिए 

फिर कभी न उड़ पाने के लिए 


इस हवाई-पट्टी पर दोबारा 

नहीं आऊँगा

यह मेरी पहली और आख़िरी 

उड़ान है।



ट्रेन से धक्का


जैसे गाँधी को

पीटरमैरिट्जबर्ग में धक्का दे कर

ट्रेन से उतार दिया गया था


मुझे भी हिन्दी के नस्ली लेखकों ने

दिल्ली जाने वाली ट्रेन से

गोरखपुर में धक्का दे कर 

उतार दिया था


फिर मैं कहीं नहीं गया जहाँ भी गया 

मेरा नाम गया।





होना


मेरे कहने से 

कुछ नहीं होगा 

लेकिन इस कहने में ही

मेरा होना शामिल है


कल कोई कब्र में 

मुझे हिला-डुला कर 


पूछ सकता है-

अपने ज़माने में तुमने तो

कुछ कहा ही नहीं


मरने के बाद शर्म से 

दोबारा मर नहीं जाऊँगा 

मर जाऊँगा मर जाऊँगा 


सब कह जाऊँगा 

कह जाऊँगा।



भरोसा 


कहूँगा नहीं तो जी कैसे पाऊँगा 

कोई नहीं सुनेगा तो पेड़ से कहूँगा 

नदी के पास जाऊँगा


कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाऊँगा 

राजा के जनता दरबार में पहुँचूँगा 

थानेदार के पैर पकड़ लूँगा 

फिर भी कोई नहीं सुनेगा तो 

पानी की टंकी पर चढ़ जाऊँगा 

पर्वत से कूद जाऊँगा 

आग लगा लूँगा


उसके बाद भी कोई नहीं सुनेगा तो

मंदिर जाऊँगा भगवान के सामने 

दुख का भरा कटोरा रख दूँगा 

आँसुओं का समुद्र उड़ेल दूँगा 

चरणों में लेट जाऊँगा


कोई तो सुनेगा 

यह भरोसा भी साथ नहीं होगा 

तो मर नहीं जाऊँगा।



पिछड़ना मंजूर था 


पिछड़ना मंज़ूर था

पीछे चलना नहीं


उम्र हुई अकेले 

चलते-चलते 


थक गया हूँ 

रुक जाना चाहता हूँ।



मोतियाबिंद 


जो चीज़ें कभी

बहुत सुंदर दिखती हैं 

जिनके दिख भर जाने से 

उन पर बहुत-बहुत प्यार आता है 

एक दिन ऐसी सारी सुंदर चीज़ें

सुंदर दिखते-दिखते 

कम सुंदर दिखने लगती हैं 

एक समय तो बिल्कुल धुँधली 

दिखने लगती हैं 

कविता नहीं है 

अनुभव की बात है 


बायीं आँख से 

आजीवनप्रिया का सुंदर मुख 

बहुत मलिन दिखने लगता है 

विशालाक्षीप्रिया की आँखों का

आभास होता है अपनी जगह पर है

लेकिन वह पुतली नहीं दिखती है 

जिसमें मेरा प्रफुल्लित मुख दिखता था

चश्मे का नंबर भी साथ छोड़ देता है 

और सभी चीज़ें बायीं आँख से

बहुत धुँधली दिखने लगती हैं 

दायीं से बहुत धुँधली 

शायद इसे ही 

आँखों का बुढ़ापा कहते हैं 

लेकिन यह बुढ़ापा तो ऐसा है 

जो किसी को बूढ़ा होने पर आता है 

तो किसी की आँखें छत्तीस साल की 

भरी जवानी में बूढ़ी हो जाती हैं 

ओह इनकी मृगनयनीप्रियाओं पर 

क्या बीतती होती

कितना हलकान होती होंगी 


मोतियाबिंद से डरो मत

आँखों के मोती की चमक 

फीकी हो जाती है तो चिकित्सक 

उसे बदल देते हैं फिर से 

जवान बना देते हैं 

प्रिया फिर से 

जवान दिखने लगती है 

हर मुलाक़ात 

पहली मुलाक़ात लगने लगती है 

धरती नयी हो जाती है झरना नया 

जी करता है हर चीज़ चूम लो

जिन्हें पहले हज़ार बार चूमा हो

उन्हें फिर से लाख बार चूम लो 

प्रिया को देखने चूमने और छूने की 

कोई सीमा नहीं हो सकती है 

दिल ही तो है कभी बूढ़ा नहीं होता 

पुराने से पुराने दिल में हज़ारों 

नयी हसरतें पैदा होती रहती हैं 

प्रिय के लिए मचलता रहता है 

जो प्रिय के प्रिय हैं उनके लिए 

तो ख़ूब मचलता है


बस दो मिनट 

डॉक्टर की टेबल पर

चुपचाप लेट जाओ और दूसरे दिन 

अपनी ही आँख पर सहसा 

यक़ीन नहीं कर पाओगे 

कि आँखें झूठ बोल रही हैं 

कि दुनिया सचमुच इतनी सुंदर है 

सुंदरतम है 

यह डाक्टर के 

हाथों का कमाल है जादू है

विज्ञान का वरदान है


संसार के बड़े से बड़े 

प्रेमियों को मोतियाबिंद होता है 

न प्रेम रुकता है न मोतियाबिंद 

न जीवन न तुम रुकोगे 

अस्पताल से 

जैसे ही घर आओगे छोटी नातिन 

आँख पर पट्टी देखते ही 

हक्का-बक्का हो जाएगी

हाथ उठा कर पूछेगी ये क्या नानू

कैसा सफ़ेद स्टीकर लगा कर आये हो


(उसके इस तरह कहने पर तुम 

हँसना तो चाहोगे फिर भी 

एहतियातन नहीं हँसोगे 

बाक़ी लोग हँस पड़ेंगे 

तुम सिर्फ़ हल्का सा मुस्कुराओगे 

लेकिन तुम्हारा दिल ख़ूब मुस्कुराएगा 

नातिन पर ख़ूब प्यार आएगा)


अगले कुछ दिनों में देखोगे 

नातिन को तुम्हारे काले चश्मे से 

प्यार हो गया है

उसे छूना चाहेगी चूमना चाहेगी 

निकालेगी फिर लगाएगी 

और कहेगी- गुड जॉब।




जाना होगा तो 


नातिन 

मेरी थाली में न खाये

तो खा नहीं पाता 

मेरे गिलास को जूठा न करे 

तो एक घूँट पानी पी नहीं पाता 

कहीं जाना होगा तो

कितनी मुश्किल से इन्हें छोड़ कर 

जा पाऊँगा।



नींद 

 

नातिन

रात में गा कर न सुलाये

तो मुझे नींद नहीं आती

कहीं और जाने पर मुझे 

नींद कैसे आएगी।



जाते-जाते 


मैं जाते-जाते 

रोती हुई ईशू के लिए 

तरबूज़ बन जाना चाहता हूँ

उँगली पकड़ कर 


सुबक रही आशू के लिए 

आइसक्रीम बन जाना चाहता हूँ

अद्दू बड़ी हो रही है बहुत रो रही है 

उसके लिए प्रेम की सबसे ऊँची

मूरत 

बन जाना चाहता हूँ 


लंबे सफ़र में खर्च करने के लिए 

ओ भव्या तुम्हारी एक करोड़ पप्पी

ले जाना चाहता हूँ।



सोना


थक गया हूँ

बहुत थक गया हूँ 

सो जाना चाहता हूँ।



दृश्य 


पलकें मुँद रही हैं 

दृश्य छूट रहा है

समय का दरवाज़ा 

बंद हो रहा है।



तुम


जाते-जाते 

याद आ रही है 

कैसी हो तुम

मैं ठीक हूँ और तुम!




लौ


आख़िरी लौ है

बस थोड़ी देर और

बुझ जाएगी।



सब कुछ 


सब कुछ थम जाएगा 

सब कुछ ख़त्म हो जाएगा।

मैं चला जाऊँगा।



गाड़ी 


गाड़ी 

छूट रही है 

हे मन

जल्दी करो।



फिर नहीं आऊँगा 


मैं चला जाऊँगा 

तो फिर नहीं आऊँगा

मेरे बच्चो जो भी करना 

बहुत सँभल कर करना

यहाँ दो अच्छे मिलेंगे 

तो चार बुरे 

यह दुनिया है

न चैन से रहने देगी

न चैन से मरने देगी।



दिन


दिन 

डूब रहा है 

जाल 

समेट रहा हूँ।



जाता हूँ 


सारे इम्तिहान दे चुका 

जाता हूँ


सबको जवाब दे चुका 

जाता हूँ


फिर नहीं आऊँगा 

जाता हूँ।



कहीं और


मेला उजड़ रहा है 

मुझे जाना होगा

कहीं और।



काम


काम ख़त्म हो गया है 

दुकान बंद करो 

जाने का समय 

हो गया है।



उम्रक़ैद 


बर्छी जैसी तमाम कविताएँ 

जी-जी जी मैंने ही लिखी हैं

और उम्रक़ैद की सज़ा 

भुगत रहा हूँ।



कुछ बूँदें


इस लड़ाई में

जख़्म ही जख़्म मिले

बहुत ख़ून बहाया है अपना

नसों से एक-एक बूँद निचोड़ा है

हिन्दी के माथे पर तिलक करने के लिए

उन्हीं में से कुछ बूँदें यहीं-कहीं

रह जाएंगी।



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क 


मोबाइल : 8318991953

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