अनिला राखेचा के कविता संग्रह 'काजल की मेड़' की शैलेश गुप्त द्वारा समीक्षा "सपनों के संरक्षण की संघर्ष गाथा : 'काजल की मेड़'"
प्रेम जीवन का मूल है। प्रेम जीवन की खूबसूरती को कुछ और बढ़ा देता है। लेकिन प्रेम के सामने हजार तरह के खतरे भी होते हैं। प्रेम को हमारा समाज सहज रूप में स्वीकार नहीं कर पाता इसीलिए उसे जद्दोजहद भी करता है। अनिला राखेचा की कविताओं के मूल में यह प्रेम ही है जो मनुष्य को कहीं अधिक उदात्त बनाता है। हाल ही में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से अनिला राखेचा का पहला कविता संग्रह 'काजल की मेड़' प्रकाशित हुआ है। अनिला राखेचा के कविता संग्रह 'काजल की मेड़' की समीक्षा की है शैलेश गुप्त ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अनिला के कविता संग्रह पर शैलेश गुप्त द्वारा लिखी गई समीक्षा "सपनों के संरक्षण की संघर्ष गाथा : 'काजल की मेड़'"।
"सपनों के संरक्षण की संघर्ष गाथा : 'काजल की मेड़'"
शैलेश गुप्त
शब्दों की कूची से कोलकाता की प्रतिष्ठित कवयित्री अनिला राखेचा ने अपने हृदय के विविध मनोभावों को सपनों के इंद्रधनुषी रंगों से रंग कर कल्पना के कैनवास पर जो एक मनोहारी भाव प्रवण पेंटिंग उकेरी है, उस कविता संग्रह का नाम "काजल की मेड़" है।
ये काव्य पेंटिंग जीवन के सभी विविधताओं को निरूपित करती है जिसमें प्रेम, करुणा, वात्सल्य, आध्यात्म और प्रकृति सौंदर्य के रंगों की प्रधानता है। इस संग्रह को पढ़ने से सबसे पहले यही आभास होता है कि कवि के सुकोमल सपनों की फसल को तब तक ये "काजल की मेड़" संजोए रही जब तक वो सपने परिपक्व हो कर कविताओं में नहीं ढल गए जिन्हें इस संग्रह में कवि ने संकलित किया है।
वस्तुतः काजल की मेड़ में कुल 112 कविताएँ संकलित हैं और संग्रह के 210 पृष्ठों में कवि के सारे मनोभावों को संजोए हुए हैं। ये संग्रह दो खंडों में विभक्त है...। पहले खंड का शीर्षक है... 'ख़्वाब जो पलकों पर पले' और दूसरे खंड का नाम कवि ने रखा है... 'अश्क़ जो पलकों ने थामे'। इन संजीदा उन्वानों से अनिला राखेचा ने इंगित करना चाहा है कि उनकी गहरी भावनाओं से ओत-प्रोत कविताओं में सपनों को संजोने की संघर्ष गाथा है जिसे उन्होंने अपने संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त किया है।
गुस्ताव फ़्लॉबेयर मानते हैं कि जीवन का एक भी कण ऐसा नहीं है जिसके भीतर कविता न हो। अनिला राखेचा की कविताओं को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि वो सृष्टि के कण-कण में कविता को तलाश कर लेती हैं। तभी तो अपनी कविता 'पंच भूति प्रेम पुष्प' में लिखती हैं...
"आस्वादना चाहती तुम्हारी वय के तुहिन कणों को
अनुभूत करना चाहती तुम्हारी वेदना के हर मर्म को"
अनिला राखेचा की सृजन यात्रा पर यदि हम दृष्टि डालें तो एक पारंपरिक प्रतिष्ठित परिवार की कुशल गृहिणी के सम्मानित कवि में परिवर्तित होने की यात्रा है। इस संग्रह में संकलित उनकी प्रारंभिक रचनाओं में एक गृहस्थ महिला के मनोभावों की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है जो समाज की मर्यादाओं का अनुपालन करते हुए अपनी वैयक्तिक पहचान के लिए साहित्यिक उर्वर भूमि तलाश करती है। 'गाजर का हलवा' कविता में वो माँ की ममता को अभिव्यक्ति देती हैं तो 'राष्ट्रीय गान' कविता में वो अपने प्रेम के समर्पण को निरूपित करती हैं। एक स्त्री के जीवन में प्रेम का क्या महत्व है वो इन पंक्तियों में देखने योग्य है....
"मेरी आत्मा का राशन कार्ड
मेरे व्यक्तित्व का आधार कार्ड
मेरी जीवन यात्रा का ड्राइविंग लाइसेंस
मेरी प्रेमासिक्त अक्षय निधि का पैन कार्ड
यह अच्छी तरह जान लो
कि अपनी अध्यात्म सत्ता की चुनाव प्रक्रिया के लिए
मैंने अपने जीवन के वोटर आई कार्ड पर
खुदवा लिया है बस एक तुम्हारा नाम
हमेशा हमेशा के लिए"
अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए इस कविता में कितने नए और अप्रचलित अनूठे उपमानों का प्रयोग कवि ने किया है। अनिला राखेचा की कविताओं में अक्सर ग़ैर पारंपरिक उपमानों की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। बिजूका, 24 कैरेट प्रेम, दो कटोरी नींद, कवक, दुष्टा कुँजी, पंचांग, टी सेट कविताएँ यदि आप पढ़ें तो अनुभव करेंगे कि अनिला राखेचा अपनी कविताओं में सदैव नए नए उपमानों को प्रस्तुत करने का प्रयास करती हैं।
अनिला राखेचा जीवन के किसी भी क्षेत्र से अपनी कविताओं के लिए विषय चुन लेती हैं और उसे वो अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत कर देती हैं। मूलतः उनकी कविता के विषय एक गृहिणी के आम जीवन के संघर्षों, सपनों, अभिलाषाओं और प्रेम की आध्यात्मिक अनुभूतियों से आते हैं, लेकिन, वे अपने देश काल की परिस्थितियों से भी अवगत हैं, और समयानुकूल अपने शब्दों से सामाजिक विषमताओं पर प्रहार भी करती हैं। उनकी कविताओं में शब्दों की भी मर्यादा है। प्रसिद्ध कवि अरुण कमल संग्रह के ब्लर्ब में अनिला राखेचा के काव्य संसार का जो शब्दचित्र उकेरते हैं, उससे भी ये तथ्य प्रमाणित होता है कि अनिला राखेचा की कविताओं में जीवन के सभी रंगों का समावेश है। वो लिखते हैं....
"हिंदी की प्रख्यात कवयित्री अनिला राखेचा की कविताओं का यह प्रथम संग्रह काजल की मेड़ अनेकानेक भाव, संवेदना और विचारों का अद्भुत स्तवक है। प्रेम, संघर्ष, घर, परिवार, कुटुम्ब और वाह्य समाज के विविध अनुभवों और अंतर्मन की बहुविध तरंगों से संपन्न यह संग्रह कुछ सर्वथा नवीन प्रश्नों और चिंताओं की गहन अभिव्यक्ति करता है। अत्यंत संवेदनशील, भाव प्रवण, ऐन्द्रिक यह रचनाकार अप्रमेय प्रतिभा के ऐश्वर्य से विभूषित है।"
काजल की मेड़ की कविताएँ कहीं यथार्थपरक जीवन की अभिव्यक्ति लगती हैं तो कहीं भावनाप्रधान कल्पनाओं की उड़ान उनमें मिलती है। कहीं उनमें उगते सूरज सा अरुणिमा का मद्धिम उजाला है तो कहीं एक नन्हें दिए की झिलमिलाती लौ सी आभा। उनकी कविताएँ सूक्ष्म मनोभावों की हृदयस्पर्शी किंतु संतुलित और मर्यादित अभिव्यक्ति हैं। अपने इस कथन की पुष्टि हेतु मैं काजल की मेड़ के प्रति वरिष्ठ कवि और आलोचक श्री प्रियंकर पालीवाल के शब्दों को यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ ....
"इस संग्रह की कविताओं में चकाचौंध करने वाला प्रकाश नहीं, अंधियारे को चुनौती देते सैकड़ों जुगनुओं की झिलमिलाहट है। संधिप्रकाशी रागों जैसे झुटपुटेपन की एक व्याप्ति इन कविताओं की विशिष्टता है जिससे एक तरह की रहस्यात्मकता की सृष्टि होती है और एक अनुरागी क़िस्म की स्वप्नशीलता को विस्तार मिलता है।"
उन्होंने अपनी प्रतीकात्मक कविताओं में अभिव्यक्ति के लिए अभिनव प्रयोग किए हैं जो उनकी समृद्ध सृजनशीलता की परिचायक हैं । उनकी रेल शृंखला की कविताएँ इस बात के प्रमाणस्वरूप देखी जा सकती हैं। प्रेम के विभिन्न मनोभावों और अवस्थाओं को प्रकट करने के लिए उन्होंने अपनी रेल कविता में नौ छोटी छोटी कविताओं को शामिल किया है जो न केवल मन को छूती हैं बल्कि गहन चिंतन के लिए भी प्रेरित करती हैं....
प्रेम अपनी युवावस्था में सुलगता है
लाल दहकते अंगारों से एहसास लिए
रेल के किसी कोयले वाले इंजन सा
धुँआ छोड़ता है, और अक्सर
अपने आस पास कालिख फैलाता है
इसके विपरीत
प्रौढ़ावस्था का प्रेम
बिजली से संचालित इंजन सा
अपनी यात्रा ज़ारी रखता है
दो दिलों के मध्य
बिना किसी को क्षति पहुँचाए।
आज भी पितृसत्तात्मक समाज में किसी महिला कवि के लिए प्रेम की अभिव्यक्ति करना निस्संदेह एक चुनौतीपूर्ण और दुष्कर कार्य है। किंतु यदि कवि को अपने प्रेम पर और स्वयं पर विश्वास है तो वो मुखर हो कर पूछती है....
"क्यूँ उठाते हैं मेरे प्रेम लिखने पर आप सवाल?
क्यूँ चाहते हैं खोद कर देखना
मेरी कविताओं के अस्थि पिंजर
नहीं देने मुझे जवाब आपके इन वाहियात सवाल के
बने रहिए आप प्रथम श्रेणी के कवि साहित्यकाश के
मैं प्रेम ही लिखूँगी
प्रेम ही पढ़ूंगी
प्रेम ही ढूंढूंगी
प्रेम ही गढ़ूंगी
आदि मेरा प्रेम से ही हुआ है
और इति भी मैं प्रेम से ही करूँगी
कितनी बेबाकी और निडरता से कवि ने इस शाश्वत सत्य को उद्घाटित किया है... आदि मेरा प्रेम से ही हुआ है।
अनिला राखेचा की कविताओं में प्रेम कोई विषयजनित पिपासा नहीं है बल्कि वो शांत मन की शुद्ध चेतना से उपजी मौन प्रार्थना है । उनकी रचनाओं में प्रेम अभिलाषा या उत्कंठा की अभिव्यक्ति नहीं है जो देह की परिधि तक सीमित हो जाए। उनकी कविताओं में प्रेम देहातीत हो कर अंतर्मन की आध्यात्मिक यात्रा करता है। अपनी प्रतिनिधि कविता 'मैं संज्ञा हूँ' में वह प्रेम को व्याख्यायित करते हुए स्पष्ट संदेश देती हैं....
"तुम प्रेम गाथा लिखो, मैं अनुरक्ति हूँ
तुम्हें शब्द चाहिए, मैं मौन गहती हूँ
जिस रोज़ कर लोगे पूरा
तुम अपना दीर्घ ग्रंथ
उसी रोज़ हो जाऊँगी मैं
एक लघु कविता का नन्हा सा मन
अनपढ़ी, अनसुनी, अनबुनी
बस यही फ़र्क है तुममें और मुझमें
तुम प्रेम को क्रिया मानते हो और मैं संज्ञा"
जब कवि अपनी रचना में प्रेम की इतनी उदात्त अभिव्यक्ति करता है तो वो आश्वस्त होता है कि उसकी कविता का प्रेम कल्याणकारी है, जीवन का उत्थान करने वाला है। अनिला राखेचा अपनी 'उत्थान' कविता में लिखती हैं...
"उठ रही मैं -
जैसे उठती है तपती धरती से सौंधी सी ख़ुशबू
बारिश की पहली फुहार पड़ने पर
जैसे उठती है ध्यान में किसी तपस्वी की चेतना
मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र की ओर
अखण्ड अनुष्ठान की ऊपर उठती
अग्नि ध्वजा की तरह
शनैः शनैः प्रेम के आलोक में
प्रेम में उठना तो आत्म प्रक्रिया है!!"
अनिला राखेचा की कविताओं में प्रेम की बहुत व्यापक भाव अभिव्यंजना देखने को मिलती हैं जो ईश्वर के सानिध्य में ले जाती है। उनकी कविता 'प्रेम में होना ईश्वर में होना है' एक ऐसी कविता है जो प्रेम की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है...
"प्रेम तो एक ही है, जैसे ईश्वर एक
प्रेम अपरिमित है, जैसे ईश्वर असीम
प्रेम अदृश्य है, जैसे ईश्वर अगोचर
प्रेम सर्वव्यापी है, जैसे ईश्वर अपरिच्छिन्न
अगर किसी एक से भी शाश्वत प्रेम हो
तो किया जा सकता है प्रेम समस्त जगत से
जैसे ईश्वर अकेला हो कर भी करता है प्रेम
अखिल ब्रह्मांड से, अपने हर उपासक से
प्रेम में होना ईश्वर में होना है
ईश्वर के सानिध्य में होना है।"
अनिला राखेचा की कुछ कविताओं में शुद्ध साहित्यिक हिंदी के शब्दों द्वारा लाक्षणिक भाव अभिव्यंजना इतनी मनोहारी होती है कि शब्दों को पढ़ने से ही मन में शुचिता का बोध होता है, एक मधुरता मन को प्रफुल्लित करती है। ऐसी ही एक कविता 'सार्वभौमिकता' में शब्द विन्यास और भाव अभिव्यंजना का सौंदर्य देखें...
"पढ़ती हूँ मंत्रमुग्ध हो
स्मृतियों की नदी में प्रवाहित वो कविता
जो लिखती सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां
कल कल बहती मानस लहरों पर
तुम्हारे लिए, मेरी संवेदनाओं से अभिभूत हो कर
सुख और दुःख दोनों ही मौसम में खिली रहती
हरसिंगार बन कर झरते हुए तुम्हारे आँगन में
मूक प्रार्थनाओं के शब्दों की तरह
ताकि कभी तो, कहीं तो, किसी भी रूप में
तुम सहेज लो मेरे बिखरे अस्तित्व को
ओह्ह!!
कितने सार्वभौमिक हो गए हो तुम मेरे लिए...!!!"
अनिला राखेचा की कविताएँ जब अपनी सृजन यात्रा के दूसरे चरण में प्रवेश करती हैं तो वो नारी मन की सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती हैं। वो अपने आत्म विश्वास को बढ़ाते हुए समाज की हर वर्जना को चुनौती देती हैं। उनकी कविता 'विषयगत' में इसी आत्मविश्वास की झलक देखने को मिलती है।
"तुम्हें मेरा गणित कभी
समझ नहीं आएगा
विज्ञान के सूत्रों की तरह
खरे हैं मेरे सारे उसूल
इस बारे में इक दिन
मेरा लिखा बताएगा
कितनी भी कर लो चाहे
मुझ संग राजनीति
वक़्त का अर्थशास्त्र क्रमबद्ध
तुम्हारी हकीक़त दर्शाएगा"
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| अनिला राखेचा |
काजल की मेड़ में नारी विमर्श की कविताएँ भी पढ़ने को मिलती हैं जो पितृसत्ता के दमनकारी प्रयासों के समक्ष दृढ़ता से और विनम्रता से संकल्पित हो कर संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं। अनिला राखेचा की कविता 'पौधे बेशर्म के' से उद्धृत ये पंक्तियां कितनी चेतावनी और अदम्य साहस से भरी हुई हैं....
"हम वो बेशर्म के पौधे हैं जो उगे
बंजर धरा पर भी पूरे आत्मविश्वास से बार बार
चाहे जैसा भी हो मौसम
चाहे न बही सदियों प्रेम रस की फुहार
जानते हो हमारा यूँ बार बार उगना
बार बार तनना, बार बार खिलखिलाना
अपनी लचकती डालियों संग मुस्काना
बार बार मरना और मर मर कर भी जी जाना
यक़ीन मानो कि होगी यही तुम्हारी असली हार"
अनिला राखेचा की कविताओं में स्त्री मन का अंतर्द्वंद भी देखने को मिलता है। उनकी कविता की स्त्री अपने सपनों को साकार तो करना चाहती है लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति सजग और सचेत भी है। अपनी 'गृहिणी' कविता में उन्होंने इसी मनःस्थिति को बहुत संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है....
"पसन्द हैं उसे इंद्रधनुष के सारे रंग
और बनाना चाहती है वो भी
एक रंगोली अपनी इच्छाओं की
मन - देहरी पर जीवन के सारे रंग सजा कर
मगर कहाँ बना पाती है
उसे तो सिन्दूर के लाल रंग के साथ ही मिलते हैं
समर्पण, उदारता, त्याग, कर्तव्य के रंग
बाकी के सारे रंग तो वह ख़ुद बनाती है
अपने सन्तति के लिए
ख़ुश होती है उनके सतरंगी सपनों में
अपने मन का रंग देख कर"
अनिला राखेचा अपनी कविताओं में स्त्रियों की कोमलता और संवेदनशीलता को एक ईश्वरीय वरदान के रूप में प्रस्तुत करती हैं, उसे अपनी कमज़ोरी मानने से इन्कार करती हैं। वो अपनी कविता 'अपराजिता हो तुम' में दूर्वा के माध्यम से महिलाओं को एक सशक्त और सकारात्मक संदेश देती हैं।
"जानती हो
दूर्वा क्यूँ पूजनीय है?
पूजा की थाली में दूर्वा
अक्षत और रोली संग क्यूँ स्थान पाती है?
क्यूँकि वो प्रतीक है अदम्य जिजीविषा की
फैलती जाती है धरती पर बिना किसी अभिमान के
कुचली जाती है पाँवों तले फिर भी
अपनी कोमलता और नमी बचाए रखती है
सृष्टि की हरियाली के लिए"
कहीं न कहीं वो मानती हैं कि अन्याय को सहने की मानसिकता ही स्त्रियों की प्रगति में बाधक है। अपनी कविता 'विद्रोह' में वो आह्वान करती हैं....
"यदि तुम्हारा अर्धचेतन ये मानता है कि
कहीं न कहीं तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है
दमन हो रहा है तुम्हारी भावनाओं का
अभिलाषाओं, संवेदनाओं का
तो मैं चाहती हूँ लड़कियों, तुम करो विद्रोह
किसी और के प्रति नहीं स्वयं के प्रति"
उनकी कविताओं में नारी विमर्श की चेतना पुरुषों के ख़िलाफ़ बगावत का बिगुल नहीं बजाती है बल्कि वो स्त्रियों को स्वयं सशक्त, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती है। काजल की मेड़ की अंतिम कविता 'एक लोहार की' में उन्होंने विभिन्न बिंबों के माध्यम से महिलाओं को संघर्ष करने के लिए अनुप्राणित किया है...
"लड़कियों....
तुम फूल बनने की बजाय बनना पत्थर
ताकि तुम्हारी छाती पर उकेरी जा सके
सभ्यता-संस्कृति-मानवता की आयतें
किसी भी सदी में न मिटने वाली
बनना कभी अगर दीपक
राहगीर को राह दिखाने के लिए
तो आकाश दीप बनना"
काजल की मेड़ में बहुत सी ऐसी कविताएँ हैं जो कवि की समग्र काव्यात्मक चेतना को प्रतिबिंबित करती हैं। इस संग्रह की कई कविताएँ ये प्रमाणित करती हैं कि कवि को अपने देश के भविष्य की चिंता है और मुल्क़ के मौजूदा हालात पर उसकी पैनी नज़र है। अपनी छोटी सी कविता 'टी सेट' के माध्यम से देश की वर्तमान परिस्थिति के संदर्भ में सांकेतिक भाषा में अनिला राखेचा गहरी बात कहती हैं।
"टूट जाने पर चीज़ें पहली सी नहीं रहतीं
बहुत सम्भाल कर थामो
यह देश है
बोन चाइना का कोई टी सेट नहीं
कि टूट कर बिखर गया और
हम शोक मना कर रह गए!!"
अपनी 'नागरिक' कविता में उन्होंने एक आम नागरिक के व्यक्तित्व का जो ख़ाका खींचा है वो बहुत हद तक किसी भी भी गाँव देहात में रहने वाले मज़बूर व्यक्ति का चेहरा हमारे सामने रख देता है जिसे हम देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। 'काबिल लोग' कविता में उन्होंने आज के समय का मानवीकरण करते हुए जो एक तानाशाह का चित्र प्रस्तुत किया है, वह हमें आने वाले भविष्य के लिए सचेत करता है।
"वक़्त अपनी मस्तानी चाल से चलता आ रहा है
धारण कर रखी है उसने अनीति की वर्दी
जातिवाद, धर्मवाद, पूँजीवाद, सांप्रदायिकता के
तमगों से सजा रखा है ख़ुद को
धोखे, मक्कारी, बेईमानी, भ्रष्टाचार के
सभी हथियारों को थामें बढ़ रहा है अहर्निश"
एक सुभाषित है— 'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, अर्थात कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। अनिला राखेचा अपनी कविताओं के रस माधुर्य की बहुत सूक्ष्म मनोभावों के साथ अत्यंत संवेदनशील तरीके से भाव अभिव्यंजना करती हैं जो हृदयस्पर्शी भी होती है और सारगर्भित भी। काजल की मेड़ की बहुत सी कविताओं का काव्य शिल्प बेहद ख़ूबसूरत है जो कवि की अद्भुत कल्पनाशीलता की परिचायक है। कुछ पंक्तियां विभिन्न कविताओं से उद्धृत कर रहा हूँ जिन्हें पढ़ कर आप स्वयं मेरी बात से सहमत होंगे।
"कुछ हर्फ़
शिशु सी किलकारियाँ भरते
दौड़ते भागते, कूदते फांदते
चले आ रहे हैं ज़ेहन की सीढ़ियाँ चढ़ते"
"आराधना नहीं की जाती
खंडित प्रतिमाओं की
खंडित प्रतिमाएँ गुनाहों के देवी देवताओं सी
रहती हैं अभिशापित गुम रहने के लिए
मौन के शिलाखण्डों में
प्रेम का अनुनाद बन कर
उन्हें सिर्फ़ सिराया जा सकता है
अधूरे प्रेम की तरह"
"वैसे तो मैं बजती रहती हूँ हरदम
ज़ाकिर हुसैन के तबले पे बजते
कहरवा ताल की तरह
भागते... दौड़ते... सोते... जागते
ज़िंदगी के थपेड़े खाते हुए"
काजल की मेड़ की कुछ एक कविताओं में विज्ञान, भूगोल और गणित पर आधारित बिंबों का प्रयोग किया गया है जो कवि की बहुआयामी सृजनात्मकता और व्यापक कल्पनाशीलता को दर्शाता है। 'कड़ा सवाल' कविता में अनिला राखेचा ने गणित के समीकरणों को जीवन के संबंधों से किस तरह जोड़ा है, ये देखने योग्य है...
"निकालना होता है मान
'क' 'ख' 'ग' संबंधों के समीकरण में
अज्ञात अनुराग का मूल्य "क" मान कर,
प्रगाढ़ रिश्तों का समीकरण हल करने हेतु"
'दर्पण सूत्र' कविता में प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन नियमों को आधार बना कर जो भाव अभिव्यंजना की गई है वो अत्यंत हृदयस्पर्शी है....
"सूक्ष्मतम स्तर पर तुम्हारा मन भी तो चिकना है
नहीं ठहरती जहाँ मेरी
डाँट-फटकार-दुत्कार
उसे तुम अवशोषित कर लेते हो ख़ुद में
परावर्तित करते हो सिर्फ़ मेरा
स्नेह-सम्मान-सखा भाव
और बन जाते हो जीवन दर्पण
देखती हूँ जहाँ मैं अपना प्रतिबिंब"
'भूमध्य रेखा' कविता में कवि ने प्रेम की विवशता और विकलता का भाव प्रवण निरूपण पृथ्वी की भौगोलिक दशा को बिंब बना कर किया है जिसमें कविता एक सार्वभौमिक विस्तार प्राप्त करती है....
"चेतना की इस भू-मध्य रेखा के
इस छोर पर खड़ी हूँ मैं और उस छोर पर तुम
दक्षिणी और उत्तरी गोलार्धों की तरह
बाँट लिया है हमने अपना सब कुछ आधा आधा
ठीक विषुवत रेखा पर बाँटे गये दिन - रात की तरह"
अनिला राखेचा की कविताओं में तार्किकता, आध्यात्मिकता और जीवन दर्शन तीनों का समावेश समय समय पर देखने को मिलता है । उनकी कविता 'तीन बातें' मार्क ट्वेन की कही गई तीन बातों के समक्ष अपना स्त्री पक्ष रखती हैं जो तर्कसंगत भी है और यथार्थपरक भी। मार्क ट्वेन के अनुसार यदि पुरुष किसी स्त्री के साथ तीन बातें कर सकता है कि उसे वो प्यार करे, प्रताड़ित करे या उसे साहित्य में ढाल दे तो उसी प्रकार अनिला राखेचा अपनी कविता में लिखती हैं...
एक स्त्री भी पुरुष के साथ तीन बातें ही करती है मगर इस तरह...
(1) वह 9 महीने उसे अपनी कोख में रख सकती है
(2 ) अपने पूरे अस्तित्व को आधा कर
उसकी अर्धांगिनी बन सकती है
(3) अपनी आख़िरी धड़कन तक
अपने प्रेम को ज़िंदा रखते हुए
अपनी साँसों से महाकाव्य लिख सकती है।
यहाँ अनिला राखेचा ने मार्क ट्वेन की पितृसत्तात्मक सोच को बहुत सहजता से अपनी पंक्तियों द्वारा चुनौती दी है।
अनिला राखेचा अपनी कविताओं में कोरा आदर्शवाद नहीं प्रस्तुत करतीं वरन वो आध्यात्मिक दृष्टिकोण का व्यावहारिक पक्ष प्रस्तुत करती हैं जो जीवन में सकारात्मकता और सहजता दोनों का संचार करे। जीवन सिर्फ़ किताबी ज्ञान की धरोहर न बने बल्कि अपने संचित अनुभवों से स्वयं को परिमार्जित करता रहे।
अपनी कविता 'आत्माष्टकम' में नश्वर शरीर से कहीं ज़्यादा महत्व आत्मा को दिया है जिसकी शुचिता कभी भी मलिन नहीं होती। जीवन के प्रति अपना आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए वो लिखती हैं...
"कीचड़ में गिरी स्वर्ण मुद्रा को अशुद्ध नहीं माना जाता
उसे उठा निर्मल जल से धो दिया जाता है
चमकने लगती है वो फिर से
नेह का पवित्र नीर भी ऐसे ही प्रक्षालन करता है
मन को, आत्मा को"
उनकी कविताओं में कहीं भी निराशा नहीं झलकती है बल्कि आशा की पराकाष्ठा देखने को मिलती है जब वो अपनी 'आना' कविता में लिखती हैं...
"जाना कभी भी कोई दर्दनाक या
डरावनी क्रिया नहीं है
"ज" वर्ण में "आ" की मात्रा और
"न" वर्ण में "आ" मात्रा लगाने पर ही
जाना शब्द बनता है
जिस शब्द में दो आ लगे हों
वहाँ तो लौट कर आना ही होता है न"
सामान्यतः देखा गया है कि पुरूष कवि पुरुषों के दृष्टिकोण से कविता लिखते हैं और महिला कवि महिलाओं की भावना को अभिव्यक्त करती हैं। लेकिन, यदि कवि लिंग भेद से ऊपर उठ कर विपरीत लिंग की भावनाओं का निरूपण करता है तो निश्चित तौर पर ये कहा जा सकता है कि उसकी कविताओं में भावों की प्रचुरता के साथ साथ परिपक्वता भी समाहित हो गई है। वो अपनी अभिव्यक्ति में विपरीत लिंग के प्रति भी सहज और संवेदनशील हो गया है।
काजल की मेड़ में अनिला राखेचा ने कुछ एक कविताएँ ऐसी भी प्रस्तुत की हैं जो पुरूषवाचक संज्ञा में लिखी गई हैं और बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ी हैं। 'और मैं' कविता में एक प्रेमी कितने सुंदर और मनोहारी शब्दों में अपनी प्रेयसी के विषय में बता रहा है....
"उसकी आस इस तरह
पलकों पे उतरती है
जैसे तप्त दोपहरी के अंबर से
हौले हौले सांझ उतरती है
........ और मैं,
शुद्ध सारंग की बंदिशें साधता उसे लिए
अचानक आहिस्ता से उतर आता हूँ
भीम पलासी के अवरोह में"
डब्ल्यू. एच. ऑडेन कहते हैं ... एक कवि सबसे पहले वह व्यक्ति होता है जो भाषा से बेहद प्यार करता है। अनिला राखेचा की कविताओं को पढ़ने से आभास होता है कि उन्हें अपनी भाषा से बेहद प्यार है। वो अपनी कविता 'हिन्दी मेरे लिए' में लिखती हैं...
"खिलखिलाते हैं शब्द हिन्दी में ही जब मैं हँसती हूँ
माधुर्य छलकाते हैं शब्द हिन्दी में ही जब मैं बोलती हूँ
हिन्दी शब्दपर्णों से ही मैं अपनी साहित्य कुटीर सजाती हूँ"
भाषा के दृष्टिकोण से अनिला राखेचा की कविताएँ बहुत समृद्ध हैं। भावों की अभिव्यक्ति के अनुरूप उनकी रचनाओं में संस्कृतनिष्ठ शुद्ध हिंदी के परिमार्जित और परिष्कृत शब्दों का प्रयोग भी देखने को मिलता है और ज़रूरत होने पर उर्दू के लफ़्ज़ों का भी बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। उनकी कविताओं में ओषजन, विथावन, शुभंकर, अर्गलाएं जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं तो वहीं कहीं बिस्मिल कामिल, ग़ार, बरकत, मौसिकी जैसे लफ़्ज़ों को भी शामिल किया गया है। उनकी कविताओं में किसी भी भाषा के शब्दों का प्रयोग वर्जित नहीं है।
काजल की मेड़ में कविताओं की विविधता कवि के बहुआयामी दृष्टिकोण की परिचायक है। किसी भी कवि की रचनाओं में उसके जीवन शैली का भी प्रभाव देखने को मिलता है। अनिला राखेचा की कविताओं में जो सहजता और मधुरता देखने को मिलती है, वो उनके सहज और मृदुल स्वभाव को उजागर करती है। उनकी सृजन यात्रा में कविताएँ प्रारंभ में "स्वांतः सुखाय" होते हुए धीरे धीरे "बहुजन हिताय" होती गईं। अनिला राखेचा का सृजन "सत्यं शिवं सुंदरम" की अवधारणा से प्रतिपादित होता है। अपनी कविता के अंत में वो अपनी व्यथा, प्रेम, अभिलाषा को सारी सृष्टि के कल्याण का हेतु बना देती हैं जो उनकी कविता सबसे प्रमुख मानवीय पक्ष है। अपनी इस बात की पुष्टि करने के लिए मैं कुछ उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूँ...
"जिसे भर देना चाहते हैं हम
शास्त्रीय संगीत सा सृष्टि के कण कण में
ताकि गा सके दे दे ताल धरा का हर प्राणी
हमारी इस जुगलबंदी को समवेत सुर में"
(कविता - जुगलबंदी)
"आओ पास आओ, ऐसा कोई हल चलाओ
बोएं हम एक दूजे के अधरों पर मुस्कानों के बीज
उगाएँ फ़सल खुशियों की फिर
परचम सा लहराएं उसे सारे जहान में"
(कविता - आओ के पास बैठें)
जिस प्रकार मनुष्य का चेहरा उसके व्यक्तित्व का परिचायक होता है उसी प्रकार किसी भी क़िताब का मुखपृष्ठ उस किताब का परिचय कराता है। काजल की मेड़ का मुखपृष्ठ भी किसी ख़ूबसूरत पेटिंग सा है जो मन को आकर्षित करता है। मुखपृष्ठ को ध्यान से देखने पर हरीतिमा के मध्य एक नीली सी आँख वाली झील दिखती है जिसमें चाँद की परछाईं है,
कमल के फूल और पत्ते एक अर्ध वृत्ताकार में खिले हैं। नीली आँख की पुतलियों पर एक उड़ते हुए बालों वाली बच्ची फूलों की डोलची लिए खड़ी है। झील के किनारे कुछ दूरी पर हरी झाड़ियां हैं जो आँखों की भौं सदृश दिखती हैं। मुखपृष्ठ की साज सज्जा और डिज़ाइन न केवल संग्रह में संकलित कविताओं की सुकोमलता की परिचायक हैं बल्कि कवि की काव्यात्मकता में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का भी बोध कराती हैं। सच कहूँ तो संग्रह का मुखपृष्ठ स्वयं में एक सचित्र मूक कविता है जो बिना कुछ कहे पूरे संग्रह में निहित भावों का सार प्रस्तुत करता है।
जितना आकर्षक इस संग्रह का मुखपृष्ठ है उतना ही सारगर्भित और मोहक इसका शीर्षक भी है। नारी सौंदर्य में काजल का एक विशिष्ट स्थान है जो जलते दिए की कालिख से बनता है, फिर भी आँखों में लगाया जाता है। जिस तरह दीपक के जलने से दीपशिखा के ऊपर एक काला धुँआ सा उठता है वैसे ही मन में अभिलाषाओं का दीपक जलने से भी अप्रत्यक्ष प्रतिरोध की कालिमा उपजती है। उस प्रतिरोध की कालिमा को ही अपनी रचनाओं में समेट कर कवि ने अपने लिए काजल बनाया है और फिर उस काजल से आँखों के लिए एक मेड़ तैयार कर के अपने स्वप्नों को अश्क़ों में बहने से रोका है। काजल की मेड़ शीर्षक पुरुष प्रधान समाज में एक नारी के सुकोमल मन के मर्यादित संघर्ष का प्रतीक है। ये शीर्षक सौंदर्यप्रधान भी है और विचार प्रधान भी जो अनिला राखेचा की कविताओं में स्वप्न और यथार्थ के सामंजस्य को निरूपित करता है। यहाँ काजल की मेड़ का अभिप्राय किसी एक आँख से नहीं है अपितु वो दुनिया की असंख्य आँखों में पलने वाले सपनों को संजोने का काव्यात्मक प्रयत्न है।
कविता संग्रह : काजल की मेड़
कवयित्री - अनिला राखेचा
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष - 2025
कवयित्री अनिला राखेचा का परिचय :
कोलकाता में रहने वाली युवा कवयित्री अनिला राखेचा का पहला कविता संग्रह है 'काजल की मेड़' जो वाणी प्रकाशन से अभी हाल में प्रकाशित हुआ है। हिंदी के प्रतिष्ठित अख़बारों के अलावा वागर्थ, मधुमती, क़िस्सा, पुस्तक संस्कृति, वनमाली, अभिनव प्रयास, पहला अंतरा, अनुकृति,छत्तीसगढ़ मित्र, साहित्यांचल, राजस्थली, प्रतिमान आदि प्रमुख पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां एवं समीक्षाओं का प्रकाशन हो चुका है।
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन
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ई मेल - anila.rakhecha@gmail.com
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| शैलेश गुप्त |
सुपरिचित ग़ज़लकार एवं कवि शैलेश गुप्ता का एक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है। कविताएं एवं ग़ज़लें प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। शैलेश गुप्ता अभी दामोदर घाटी निगम की मैथन परियोजना के अंतर्गत वरिष्ठ महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।
सम्पर्क -
मोबाइल : 8825279189



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