ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य आलेख 'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'
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| ललन चतुर्वेदी |
किसी भी पुरुष के लिए जीवन का सुखद क्षण होता है उसका प्रेम में पड़ जाना। लेकिन जो परंपरावादी हैं उनके लिए तो यह प्रेम सारी व्यवस्था को तहस नहस करने वाला होता है। इसलिए प्रेम पर पहरे बिठा दिए जाते हैं। लेकिन प्रेमी भी कम जिद्दी नहीं होते। वे हर रास्ते की काट निकाल लेते हैं और प्रेम की पींगे मारते रहते हैं। कवि ललन चतुर्वेदी अपने व्यंग्य आलेख में लिखते हैं : 'प्रेम कोई हँसी-मजाक या दिल्लगी का विषय नहीं है- यह दिल लगाने का पुनीत काम है। प्रेम और प्यार में थोड़ा-बहुत या यूँ कहें कि मार्जिनल अंतर हो सकता है लेकिन मेरी दृष्टि से दोनों एक ही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। बहुधा ऐसा होता नहीं है। सब कुछ चरणबद्ध तरीके से होता है। मान लीजिए कोई बहुमंजिली इमारत हो और लिफ्ट की व्यवस्था नहीं हो तो सीढ़ियों से ही आप ऊपरी मंजिल तक पहुँच सकते हैं। प्रेम में स्टेप-बाय-स्टेप बढ़ना होता है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य आलेख 'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'।
व्यंग्य
'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'
ललन चतुर्वेदी
मैं विनोदप्रिय हूँ। मेरी बातों को सुन कर किसी के चेहरे पर चमक आ जाए तो इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। हो सकता है कुछ लोग मेरे इस स्वभाव को पसंद नहीं करते हों। लेकिन क्या करूँ? यह तो बदलने से रहा। मेरा एक सहपाठी कहा करता था- "नेचर और सिग्नेचर नहीं बदलता।" मैं मानता हूँ कि बदलना भी नहीं चाहिए। अपना गुण-धर्म क्यों छोडूं? सिग्नेचर नहीं मिले तो कैशियर पैसा नहीं देगा। खैर, एक दिन मैंने अपने एक संपन्न सहकर्मी से यूँ ही अचानक पूछ लिया- "आपने कभी प्रेम किया?" उसने विनम्रतापूर्वक शांत स्वर में दृढ़ उत्तर दिया- "नहीं"। मेरे पास आगे बढ़ने का कोई स्कोप नहीं था। मैं समझ सकता हूँ प्रेम सबके भाग्य में नहीं होता। मेरा सहकर्मी संपन्न है। उसके पास एक न्यारा बंगला है, चार पहिया वाहन और सुख-सुविधा के तमाम संसाधन हैं। उसने सही समय पर अर्धांगिनी के सहयोग से देश को दो अदद नागरिक दिए हैं जो विधिवत अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। हममें से अधिकांश यही करते हैं। पढ़ते हैं, डिग्री लेते हैं। नौकरी करते हैं, घर बनाते हैं। बच्चे पैदा करते हैं और इसके बाद पूर्ण विराम। मतलब जिन्दगी का यही फार्मूला है। इन सबके बीच जो सबसे जरूरी काम है वह छूट जाता है। वह काम है- प्रेम करना। मेरा मानना है कि इश्क आदमी को निकम्मा नहीं करता। दुनिया में प्रेमी से ज्यादा कोई व्यस्त नहीं होता। प्रेमी बेरोजगार हो ही नहीं सकता। उसके लिए चौबीस घंटे के दिन-रात छोटे पड़ जाते हैं। अब प्रेम किससे करना है और कैसे करना है, इसके लिए व्यक्ति को स्वयं अपनी मोडेलिटी तय करनी होती है। प्रेम करना कोई नहीं सिखा सकता है। प्रेम स्वयं सीखना होता है। मेरे एक मित्र ने कहा - "मैं प्रेम करना चाहता हूँ। संभावित प्रेयसी से थोड़ा-बहुत परिचय है, आपकी भाषा साहित्यिक है। आप एक अच्छा सा पत्र लिख दीजिए। मैंने कहा - "प्रेम-पथ पर तुम्हारा हार्दिक स्वागत.! इस नेक इरादे में कामयाबी के लिए मैं दुआ कर सकता हूँ। पर तुम मुझसे चिट्ठी मत लिखवाओ।" वह जिद करने लगा तो मैंने कहा- "भाई! दिल की भाषा किसी पाठशाला में नहीं सिखाई जा सकती है। आँखों का इसमें कमांड है। एक बार यदि नजरों में चढ़ गए तो दुनिया की कोई शक्ति तुम्हें महबूबा के हृदय के सिंहासन से उतार नहीं सकता। और यदि नजरों से उतर गए तो रसातल में भी तुम्हे जगह नहीं मिलेगी। इतना पर भी तुम नहीं मानते हो तो मैं लिख दूंगा लेकिन काम बिगड़ जाए तो दोष मत देना।" महबूब को मेरा मजमून तो अच्छा लगा लेकिन महबूबा भड़क गयी। कुछ चीजें ऐसी होती है जिन्हें स्वयं करना चाहिए। कवि गलत नहीं कहता है-
खेती, पाती, बिनती औ घोड़े का तंग।
अपने हाथ संभालिए तब जीने का ढंग।।
एक ज़माना था जब प्रेम में मीडिएटर की भूमिका होती थी। अब कनेक्ट होने के लिए डायरेक्ट लिंक स्थापित करना होता है। कोई थर्ड पार्टी एश्योरेंस काम नहीं आता है। यहाँ दो को एक करने वाली बात होती है। एक कवि तो ख़त-ओ-किताबत को भी बेकार समझता है। इसमें रिस्क भी है। मोबाइल भी सर्विलेंस पर रखा जा सकता है। कवि संभावित खतरे से पहले ही वाकिफ था। उसने उपाय निकाला-
"कहिहें सब तोरे हिय, मोरे हिय की बात।"
यह शानदार नेटवर्क है-दो दिलों का हॉट लाइन पर सीधे संपर्क। नए-नकोरे प्रेमियों के लिए जो प्यार की दुनिया में पहला कदम रख रहे हैं ये सब टिप्स बड़े उपयोगी हैं। मैं परमार्थी काम में पीछे नहीं रहता।
कुछ विचारक प्रेम की तुलना में कर्तव्य को अधिक महत्व देते हैं। मैं तो प्रेम को ही कर्तव्य मानता हूँ। यदि आप प्रेम नहीं करते हैं तो आप अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाह है। प्रेमी तो प्रेम को ही पूजा समझते हैं। प्रेम कोई हँसी-मजाक या दिल्लगी का विषय नहीं है- यह दिल लगाने का पुनीत काम है। प्रेम और प्यार में थोड़ा-बहुत या यूँ कहें कि मार्जिनल अंतर हो सकता है लेकिन मेरी दृष्टि से दोनों एक ही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। बहुधा ऐसा होता नहीं है। सब कुछ चरणबद्ध तरीके से होता है। मान लीजिए कोई बहुमंजिली इमारत हो और लिफ्ट की व्यवस्था नहीं हो तो सीढ़ियों से ही आप ऊपरी मंजिल तक पहुँच सकते हैं। प्रेम में स्टेप-बाय-स्टेप बढ़ना होता है। अब सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए नेत्रों की ज्योति ठीक होनी चाहिए। नहीं तो थोड़ा भी पैर इधर-उधर हुआ तो हड्डी-पसली चूर होना तय है। प्रेम किसी से भी हो - इंसान से हो या भगवान् से हो, सब जगह यही सिस्टम है। कोई रियायत नहीं है, कोई शार्टकट नहीं है। इंसान के यहाँ तो फिर भी कुछ सुविधा है पर वह जो ऊपर वाला है, बड़ा निर्मम और बेदर्दी भी है। उसने न सीढ़ी रखी है न लिफ्ट। मैं जो कहता हूँ, प्रामाणिक बात कहता हूँ- कबीर की तरह आँखों देखी। प्रमाण लीजिए-
साहेब का घर दूर है, जैसे पेड़ खजूर
चढ़े तो चाखे प्रेम रस, गिरे तो चकनाचूर
दुनिया में हम आते हैं और आदमी मुसाफिर है गाते हुए चले जाते हैं। जो जीवन का मकसद है वही नहीं कर पाते हैं। वस्तुतः स्वयं को पहचानना है। मूलतः हम प्यार के राही हैं। दुःख है कि गुमराह हो गए हैं। पत्रकार को कवर स्टोरी करनी पड़ती है। उसी तरह जो सच्चे अर्थों में मनुष्य है उसके लिए लव स्टोरी है। जिन्दगी और जवानी को मान्यता तब मिलती है जब उसकी कोई कहानी हो।
अब आइए, अपने देश पर नजर डालिए. विकसित बनने के लिए छटपटा रहा है। आँखों में विश्वगुरु का सपना भी पल रहा है। इन सब के लिए जरूरी है प्रेम। प्रेम के मामले में हम फिसड्डी देश है। लाखों की संख्या में इंजीनियर-डॉक्टर का प्रोडक्शन हो रहा है लेकिन पिछले कुछ सौ वर्षों में दर्जन भर प्रेमी भी हम विश्व को नहीं दे सके। कुछ विदेशी प्रेमियों को भी स्वदेशी बना कर पेश करें तो भी प्रेमी जोड़ों को हम अँगुलियों पर गिन सकते हैं। प्रेम के क्षेत्र में हमारा प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। भारत को हैप्पी इंडेक्स में अगर ऊपरी पायदान पर लाना है तो इस क्षेत्र में तहेदिल से हमें विनिवेश करना होगा। इसमें लाभ ही लाभ है। रिटर्न भी अच्छा मिलता है। यह थोड़ा लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है। प्रेम और इन्वेस्टमेंट में थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे होता रहता है. इसमें घबराने जैसी कोई बात नहीं है। इन दोनों क्षेत्रों में धैर्य की जरूरत होती है -धीरज धरिये तो पाइए पारु। और पार जाने की कामना क्यों? इसमें डूबने में ही सफलता है। थोड़ी सी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। यही कि विनिवेश करने के पहले कागजात को ध्यान से पढ़ना पढ़ता है। आप जानते ही हैं - बीमा आग्रह की विषयवस्तु है। उसी तरह प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है। इसमें कोई दुराग्रह नहीं होना चाहिए, नहीं तो भारत में अदालतों और वकीलों की संख्या कम नहीं है। एक महत्वपूर्ण बात यह कि धन को छिपाना और प्यार को जतलाना जरूरी होता है। जब एक जरूरी काम कर ही रहे हैं तो औरों को भी बतलाना चाहिए ताकि वे भी इससे प्रेरित हो सकें। बतलाइए कि सोच-समझ के आपने सौदा किया है। मतलब प्यार किया, प्यार किया, प्यार किया है। डंके की चोट पर कहिए। आप मेरी बातों से अवश्य सहमत होंगे कि इस समय पूरी दुनिया को प्रेम की आवश्यकता है। दिल बड़ा कीजिए और जोखिम उठाइए। फुरसत तो मिलने से रही। इसलिए इस जरूरी काम में अनावश्यक विलम्ब मत कीजिए।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)
सम्पर्क
ई मेल : lalancsb@gmail.com


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