मनीष चौरसिया की रपट 'वीथिका का आयोजन : Generation - पीढियां'
इलाहाबाद संग्रहालय प्रयागराज में बीते 15 मार्च 2026 को वीथिका के अन्तर्गत 'Generation-पीढ़ियां' का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ रचनाकार डॉ. सूर्यबाला, नई पीढ़ी की सशक्त रचनाकार आकृति विज्ञा 'अर्पण' के साथ साथ प्रो. बसंत त्रिपाठी, डॉ. शिशिर सोमवंशी, डॉ. जनार्दन, ब्रिगेडियर रजनीश त्रिवेदी, और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री प्रवीण शेखर जैसे चिंतनधर्मी वक्ता शामिल हुए। इस कार्यक्रम की एक रपट हमें लिख भेजी है इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र मनीष चौरसिया। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनीष चौरसिया की रपट 'वीथिका का आयोजन : Generation - पीढियां'।
रपट
'वीथिका का आयोजन : Generation - पीढियां'
मनीष चौरसिया
बात उन दिनों की है जब एम. ए. (2021-23) में प्रो. बसंत त्रिपाठी के कहने पर मनोज रूपड़ा की कहानी 'रद्दोबदल' पढ़ी थी। कहानी यह दिखाती है कि कैसे आधुनिकता की दौड़ में रिश्तों में रद्दोबदल (बदलाव) आ गया है। अब रिश्ते भावों की जगह उपयोगिता (utility) और भौतिक लाभ पर टिके हैं। एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना कम होती जा रही है। लोग स्वार्थी हो गए हैं और संवेदनशीलता समाप्त हो रही है। व्यक्ति अब संवेदनहीनता के उस दौर में पहुँच गया है जहाँ वह अपनों के साथ भी निष्ठावान नहीं रह पा रहा है। इस कहानी ने खासा प्रभावित किया था। कोई लेखक कैसे बेबाकी से अपनी बात लिख सकता है।
उसके बाद एक और घटना घटती है। बात इसी साल जनवरी की है जब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय का एक वायरल वीडियो सामने आया है, जिसमें कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल एक राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान प्रसिद्ध लेखक और साहित्यिक व्यक्तित्व मनोज रूपड़ा के साथ आक्रामक व्यवहार करते दिख रहे थे। यह घटना तब हुई जब रूपड़ा ने कुलपति से अनुरोध किया कि वे अपने निजी जीवन और उपलब्धियों के बारे में बताने के बजाय संगोष्ठी के मुख्य विषय पर केंद्रित रहें। इस टोकने से प्रो. चक्रवाल क्रोधित हो गए और उन्होंने रूपड़ा की योग्यता और हस्तक्षेप करने के अधिकार पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। सत्ता के प्रदर्शन में, कुलपति ने रूपड़ा का नाम पूछा, उन्हें तिरस्कारपूर्वक 'तथाकथित महान लेखक' कहा और उन्हें मंच तथा कार्यक्रम स्थल से बाहर जाने का आदेश दे दिया। कुलपति का व्यवहार यहीं नहीं थमा; उन्होंने अपने सुरक्षाकर्मियों को मनोज रूपड़ा को हटाने के लिए कहा और आयोजकों को निर्देश दिया कि उन्हें दोबारा कभी आमंत्रित न किया जाए। उनका तर्क था कि कुलपति होने के नाते उनसे 'उचित शिष्टाचार' के साथ बात करना उनका अधिकार है। जब अन्य उपस्थित लोगों ने इस कठोर व्यवहार पर आपत्ति जताई, तो प्रो. चक्रवाल ने उनसे कहा कि यदि उन्हें यह पसंद नहीं है, तो वे भी जा सकते हैं।
परिणामस्वरूप, मनोज रूपड़ा कार्यक्रम छोड़ कर चले गए, और उनके पीछे कई अन्य अतिथियों एवं साहित्यकारों ने भी कुलपति के आचरण के विरोध में कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। इस कार्यक्रम में मोहन लाल छीपा, जया जादवानी, मीना गुप्त, मुन्ना तिवारी, जयनंदन और महेश कटारे जैसे कई जाने-माने साहित्यकार भी मौजूद थे।
इस घटना के बाद देश भर में मनोज रूपड़ा के समर्थन में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और विद्यार्थियों ने व्यापक एकजुटता का प्रदर्शन किया। दुर्ग-भिलाई, रायपुर, अंबिकापुर, धमतरी और बिलासपुर में सक्रिय जन संस्कृति मंच के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों ने इस घटना के विरोध में कुलपति के तानाशाही रवैये की कड़ी भर्त्सना की। उन्होंने मनोज रूपड़ा के अपमान और उनके साथ दुर्व्यवहार को ज्ञान, साहित्य और कला का अपमान बताया था। इस घटना के बाद जिस तरह से उन्होंने कार्यक्रम छोड़ा, उससे यह और भी स्पष्ट हो गया कि यह लेखक न केवल अपनी रचनाओं में बेबाक है, बल्कि अपने निजी जीवन में भी उतना ही निर्भीक और निडर है।
आप सोच रहे होंगे कि मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ। आज इन दबी हुई बातों को फिर से कुरेदने का क्या औचित्य है? दरअसल, आज 15 मार्च, रविवार को वीथिका ने इलाहाबाद संग्रहालय, प्रयागराज में 'जेनरेशन-पीढ़ियां' नामक एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस आयोजन में मनोज रूपड़ा जी अपनी बात रखने आए थे। उन्हें सामने से देखने, सुनने और मिलने के मोह ने मुझे अनायास ही खींच के ले जा कर वहां पटक दिया था। हालांकि उनके साथ, वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ. सूर्यबाला और नई पीढ़ी की सशक्त रचनाकार आकृति विज्ञा 'अर्पण' भी अपने सृजनशील लेखन पर चर्चा करने के लिए उपस्थित थीं। और इसके अलावा प्रो. बसंत त्रिपाठी, डॉ. शिशिर सोमवंशी, डॉ. जनार्दन, ब्रिगेडियर रजनीश त्रिवेदी, और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री प्रवीण शेखर जैसे चिंतनधर्मी वक्ता भी थे तो उन्हें भी सुनने का सुंदर सुयोग था।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई। इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे ब्रिगेडियर रजनीश त्रिवेदी ने "पीढ़ियां" कार्यक्रम का सूत्र वक्तव्य रखते हुए कहा कि - पीढ़ियाँ बेड़ियाँ या रूढ़ियाँ नहीं, बल्कि सीढ़ियाँ हैं। उनका कहना है कि पिछली पीढ़ी अगली पीढ़ी को सहारा देती है और साथ ले कर चलती है। हर व्यक्ति तीन पीढ़ियों से जुड़ा है: वह किसी की संतान, किसी का समकालीन और किसी का पूर्वज है। इस समझ से पीढ़ियों के बीच के विरोधाभास को दूर किया जा सकता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से इलाहाबाद (प्रयागराज) में साहित्य और संस्कृति के एक नए सरोवर का बीज बोया जा रहा है।
इसके बाद, प्रवीण शेखर जी ने स्वागत वक्तव्य के लिए मंच संभाला और एक दिलचस्प किस्सा साझा किया : एक बार, मशहूर लेखक मार्क ट्वेन को एक समारोह में आमंत्रित किया गया और उनसे कहा गया, "आप जितना चाहें उतना बोलें।" मार्क ट्वेन ने जवाब दिया, "मुझे यहां आ कर बहुत खुशी हो रही है। लेकिन इससे भी ज्यादा खुशी मुझे इस बात की है कि अब मुझे कुछ नहीं बोलना।"
शेखर जी ने समझाया कि स्वागत और धन्यवाद ज्ञापन इतने ही संक्षिप्त और सारगर्भित होने चाहिए। उन्होंने मुंबई से पधारीं सूर्यबाला, नागपुर से आए मनोज रूपड़ा, कानपुर से पधारे रजनीश त्रिवेदी, और बनारस से आई आकृति का विशेष स्वागत किया कि वे इतनी दूर से किसी और काम को नजरअंदाज कर के आए हैं। अंत में, उन्होंने सभी वक्ताओं और श्रोताओं का तहे दिल से स्वागत किया।
इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे रजनीश त्रिवेदी जी ने आकृति विज्ञा 'अर्पण' का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताया कि आकृति विज्ञा 'अर्पण' नई पीढ़ी की समर्थ रचनाकार हैं। पेशेवर रूप से वे अध्यापन, प्रशिक्षण, लेखन और बहुआयामी कार्यक्रमों के संचालन व समन्वयन में सक्रिय हैं। साहित्यिक विधाओं में कविता, गीत, ग़ज़ल, कहमकुरी, कहानी, मुहावरे और लोकविधाएँ शामिल हैं, जिनका वे हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी में लेखन करती हैं, साथ ही उर्दू और संस्कृत का भी व्यावहारिक ज्ञान रखती हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में लोकगीत-सी लड़की (साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2025 की सूची में चयनित) और सुनो बसंती (कविता-संग्रह) प्रमुख हैं, जबकि ललमुनिया और वनस्पति विज्ञान पर दो पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं। उन्हें विद्या वाचस्पति मानद उपाधि, भोजपुरी स्नातकोत्तर में स्वर्ण पदक, साहित्य सेतु सम्मान, गीताश्री सम्मान और साइंस एक्सिलेंस अवार्ड सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उन्होंने द राइटर्स अड्डा, अनहद नाद और अंतरा समूह जैसे नवाचारों के माध्यम से साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।
साहित्य के महत्व पर जोर देते हुए आकृति विज्ञा ने बताया कि साहित्य का मूल तत्व 'हित' है, जो विभिन्न कवियों और संतों के कार्यों में परिलक्षित होता है। उन्होंने समकालीन समाज में बढ़ती असहिष्णुता और त्वरित प्रतिक्रियावाद पर चिंता व्यक्त की, खासकर सोशल मीडिया पर, जहां लोग पूरी बात सुने बिना ही प्रतिक्रिया देने को तैयार रहते हैं। आकृति विज्ञा ने संवाद और सहनशीलता की आवश्यकता पर बल दिया, यह कहते हुए कि असहमति के बावजूद बातचीत जारी रहनी चाहिए।
इसके बाद, आकृति विज्ञा ने अपनी कविता 'सेमल का फूल' सुनाई, जिसमें उन्होंने खुद को सेमल के फूल के रूप में वर्णित किया, जो किसी देवता को नहीं चढ़ाया जाता, न ही किसी शुभ अवसर पर उपयोग होता है, बल्कि अपनी सादगी और प्राकृतिक सुंदरता में ही संतुष्ट है। उन्होंने 'सुनो बसंती' नामक कविता भी प्रस्तुत की, जो समाज में लड़कियों पर लगाए गए सौंदर्य और व्यवहार संबंधी दबावों पर टिप्पणी करती है। यह कविता लड़कियों को अपनी स्वाभाविक सुंदरता और व्यक्तित्व को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करती है। अंत में, आकृति विज्ञा ने 'कट गए पेड़ मधुबन के' नामक चैती गीत गाया, जो पर्यावरण विनाश, ग्रामीण जीवन के संघर्षों और किसानों की दुर्दशा को दर्शाता है।
इसके बाद वीथिका के इस कार्यक्रम "जनरेशन - पीढ़ियां "के सूत्रधार डॉ. शिशिर सोमवंशी जी ने आकृति विज्ञा के लेखन पर समीक्षात्मक वक्तव्य देते हुए कहा - इस कार्यक्रम की संकल्पना में हमने तीनों पीढ़ियों को शामिल किया है। आकृति के काव्य की गति और उनका तरीका अद्भुत है। उन्होंने बताया कि जब आकृति का जन्म 1998 में हुआ होगा, तब वे अपनी सेवा करने आ चुके थे। आकृति को मंच पर खड़ा देखकर और इस उम्र में उनके दो काव्य संग्रहों के बाद तीसरा काव्य संग्रह 'ललमुनिया' (भोजपुरी भाषा में) आने पर उन्हें बधाई दी जा सकती है।
डॉ. सोमवंशी ने कहा कि नई पीढ़ी हमसे बहुत तेज चलती है और उन्हें अधिक एक्सपोजर व संसाधन मिलते हैं। उन्हें हर्ष है कि आकृति ने इन संसाधनों का उपयोग किया है। नई पीढ़ी, जिसके बारे में लोग कहते हैं कि वह पुरानी परंपराओं को छोड़ती जा रही है, तो आकृति का लेखन इस दुख को दूर कर सकता है। का
इसके बाद ब्रिगेडियर रजनीश त्रिवेदी जी ने मनोज रूपड़ा जी का संक्षिप्त परिचय दिया - मनोज रूपड़ा हिंदी के समकालीन कथा-साहित्य में एक विशिष्ट और सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी कहानियाँ अक्सर समाज के उपेक्षित वर्गों, हाशिए के जीवन और आधुनिक समय की जटिलताओं को सूक्ष्मता से उकेरती हैं। रूपड़ा की भाषा में एक खास तरह का ठहराव और गहराई है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है। वे जादुई यथार्थवाद और फंतासी का सहारा लिए बिना भी साधारण घटनाओं में गहरा अर्थ भर देते हैं। उनकी कहानियों में बस्तर की धड़कन, वहां का संघर्ष और मानवीय संवेदनाएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में 'दफन तथा अन्य कहानियाँ', 'साज़ना नवाज़ना' और 'डेथ वारंट' जैसे कहानी संग्रह शामिल हैं। उनके उपन्यास 'काले अध्याय' ने साहित्य जगत में उन्हें व्यापक पहचान दिलाई, जिसे समकालीन हिंदी लेखन की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। उनकी कहानियों का विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। अपनी सृजनशीलता के लिए उन्हें 'इन्दु शर्मा कथा सम्मान' और 'वनमाली कथा सम्मान' जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया है। वे आज के दौर के उन विरले लेखकों में से हैं, जो साहित्य में शिल्प और सरोकार के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखते हैं। इसके बाद उन्होंने मनोज जी को "मेरी कहानियां" विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया।
मनोज रूपड़ा जी ने दो कहानियों : ' नाव का गीत' (50 साल पहले लिखी गई) और 'एक टुकड़ा कबाब' (116 साल पहले लिखी गई) का उदाहरण देते हुए कहा - ये कहानियाँ उन्हें आज भी प्रासंगिक लगती हैं क्योंकि वे पीढ़ियों के अंतराल और समय के बदलाव पर केंद्रित हैं। "नाव का गीत'' एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति और एक युवती के प्रेम की कहानी है, जो कला के शीर्ष पर पहुँचने के लिए कलाकार को क्या खोना पड़ता है, इस पर प्रकाश डालती है। यह कहानी पीढ़ियों के बीच के नाजुक और विडंबनापूर्ण स्थान को भी रेखांकित करती है। वहीं, 'एक टुकड़ा कबाब' एक बूढ़े मुक्केबाज की कहानी है, जो अपने परिवार को गरीबी से बचाने के लिए एक युवा मुक्केबाज से लड़ता है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे विवेक और अनुभव ताकत पर भारी पड़ सकते हैं, और कैसे व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं को त्याग कर अपने परिवार के लिए संघर्ष करता है।
इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे रजनीश त्रिवेदी ने "मनोज रूपड़ा के लेखन" पर बात करने के लिए प्रो. बसंत त्रिपाठी को आमंत्रित करने से पहले युवा और वरिष्ठ लेखकों के बीच के अंतर पर चर्चा करते हुए कहा - युवा लेखक सपनों और प्रेरणाओं से भरे होते हैं, विद्रोह, नए विचारों और कल्पना पर लिखते हैं। उनकी भाषा तेज, प्रयोगधर्मी और भावनात्मक होती है। जैसे-जैसे लेखक की उम्र बढ़ती है, वह दुनिया के बारे में अधिक सीखता है और उसे एहसास होता है कि उसका लेखन अधिक विवेक और समझदारी की मांग करता है। इस चरण में, लेखक स्मृति, क्षय, मृत्यु और मानवीय कमजोरियों पर ध्यान केंद्रित करता है। कहानीकार मनोज रूपड़ा भी अपने लेखन में इन विभिन्न चरणों और मानवीय संवेदनाओं को बखूबी दर्शाते हैं।
बसंत त्रिपाठी जी ने अपनी बात शुरू करने से पहले एक महत्वपूर्ण डिस्क्लेमर दिया: "चूँकि मेरा विषय मनोज रूपड़ा है और मैं पहले नागपुर में रहता था, जहाँ मनोज से मेरी गहरी मित्रता थी, इसलिए मेरी प्रस्तुति थोड़ी अनौपचारिक भी हो सकती है।"
प्रोफेसर बसंत त्रिपाठी ने मनोज रूपड़ा के बारे में बताया कि वे एक प्रसिद्ध कथाकार हैं जो अपनी चिंतनशीलता और जीवन के प्रति लोकतांत्रिक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। वे अपनी रचनात्मकता में विश्वास और संशय का अद्भुत समन्वय रखते हैं, और बातचीत में अपनी उपलब्धियों के बजाय दूसरों की कला और जीवन से जुड़ी घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक और राजनीतिक सच्चाइयों का गहरा चित्रण होता है, जिसमें स्वाभाविकता और अतींद्रियता का पंचमेल देखने को मिलता है। मनोज रूपड़ा निजी अनुभवों को कला के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं और उनकी संवाद यात्रा विभिन्न देशों और संस्कृतियों से होते हुए बस्तर के जंगलों तक पहुंचती है। वे अपने पाठकों की प्रतिक्रियाओं को महत्व देते हैं और अपनी कहानियों में हमेशा कुछ नयापन लाने का प्रयास करते हैं, जिससे उनकी रचनात्मकता हमेशा विकसित होती रहती है।
इसके बाद पीढ़ियां कार्यक्रम की सबसे वरिष्ठ वक्ता डॉ. सूर्यबाला को बुलाने से पहले रजनीश त्रिवेदी जी ने उनका संक्षेप में परिचय देते हुए बताया कि - डॉ. सूर्यबाला प्रख्यात उपन्यासकार, कहानीकार और व्यंग्यकार हैं। उनकी लेखन शैली की मुख्य विशेषता मध्यवर्गीय जीवन, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक विडंबनाओं का सजीव चित्रण है। वे अपनी रचनाओं में विशेष रूप से नारी संवेदनशीलता और समाज के विभिन्न वर्गों के द्वंद्व को सहज भाषा में उकेरती हैं। उनकी कहानियों में मानवीय, सामाजिक, पारिवारिक और विशेष रूप से नारी संवेदना के विविध रूप मिलते हैं। वे नारी को मात्र पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील और आत्म-सम्मान के लिए लड़ने वाले व्यक्तित्व के रूप में पेश करती हैं। सूर्यबाला की लेखनी मध्यवर्गीय समाज के भीतर के खोखलेपन, रिश्तों के तनाव और आधुनिकता बनाम परंपरा के द्वंद्व को बहुत सूक्ष्मता से पकड़ती है। उनकी भाषा सहज है, लेकिन उसमें सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करने की अद्भुत क्षमता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में वृद्धों की उपेक्षा और बच्चों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी विस्तार से लिखा है। उनके साहित्य में व्यंग्य की धार तीखी होती है, जो समाज की आधुनिकता और परंपरा के बीच के संघर्ष को दर्शाती है।
आपके चर्चित उपन्यासों में 'मेरे संधिपत्र', 'अग्निपंखी', 'यामिनी कथा', 'लौटना नहीं है' शामिल हैं। 'लक्ष्य तथा अन्य कहानियाँ', 'बाज़ार में रामधन', 'थाली भर चाँद' और 'मुंडेर पर' उनके महत्वपूर्ण संग्रह हैं। वहीं 'अजगर करे न चाकरी' और 'धृतराष्ट्र टाइम्स' जैसी रचनाओं ने उन्हें एक सशक्त व्यंग्यकार के रूप में स्थापित किया। हाल ही में उन्हें उनके उपन्यास 'कौन देस को वासीः वेणु की डायरी' के लिए वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित 34वें व्यास सम्मान से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त उन्हें 'भारत-भारती पुरस्कार' और 'व्यंग्य श्री पुरस्कार' जैसे अनेक सम्मान मिले हैं। उनके नाटक जैसे 'पलाश के फूल' और 'निर्वासित' दूरदर्शन पर प्रसारित हो कर अत्यंत लोकप्रिय हुए हैं।
वीथिका के इस कार्यक्रम में डॉ. सूर्यबाला जी ने खुद को बुलाए जाने के लिए इसके आयोजकों को सहर्ष धन्यवाद देते हुए कहा कि - "उन्हें (वीथिका) को शायद नहीं पता था उन्होंने मुझे मेरे मायके बुलाया है। वाराणसी और इलाहाबाद दोनों के बीच काफी कुछ मथुरा और गोकुल-वृंदावन जैसी बातें हैं।" उन्होंने यह भी बताया कि जब 'भारत-भारती पुरस्कार' उन्हें मिला था तो उन्होंने लिखा था कि "भारत भारती ऐसे आई जैसे मायके से कोई चिट्ठी आई है।"
डॉ. सूर्यबाला ने अपने वक्तव्य में कई महत्त्वपूर्ण बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी किसी पुरस्कार के लिए अपनी कोई पुस्तक नहीं दी, क्योंकि उनके लिए हर वह पाठक जो उनकी रचनाओं को पढ़ता है, अपने आप में एक बहुत बड़ा पुरस्कार है।
उन्होंने पीढ़ियों के विभाजन पर बात करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसी पीढ़ियां देखी हैं जहाँ बच्चे अपने भाई-बहनों को गोद में लिए रहते थे, जो उस समय के पारिवारिक सौहार्द को दर्शाता है। स्त्री के संदर्भ में, डॉ. सूर्यबाला ने कहा कि स्त्री को प्रकृति प्रदत्त गुणों को नहीं छोड़ना चाहिए और पुरुष के गुणों की ओर नहीं बढ़ना चाहिए।
उन्होंने अपनी पोती को कहानियाँ सुना कर हिंदी सिखाने का अनुभव साझा किया और इस बात पर जोर दिया कि यह कहानी की शक्ति है। आज के लेखकों में धैर्य की कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए, उन्होंने कहा कि पाठक भी फास्ट फूड की तरह तुरंत परिणाम चाहते हैं। डॉ. सूर्यबाला ने यह भी कहा कि भारत बहुत जल्दी ही बूढ़ों का देश बन जाएगा, लेकिन उन्हें इस बात की खुशी है कि छोटे शहरों (जैसे इलाहाबाद और वाराणसी) ने आज भी अपने में भारतीय मूल्यों को समेट कर रखा है।
इसके बाद डॉ. सूर्यबाला के सृजनधर्मी लेखन पर वक्तव्य देने के लिए मंच पर आए डॉ. जनार्दन ने डॉ. सूर्यबाला जी की कृतियों पर विस्तार से चर्चा की, जिनमें उनके उपन्यास, व्यंग्य और कहानियाँ शामिल हैं। उन्होंने डॉ. सूर्यबाला को एक स्त्रीवादी लेखिका के रूप में वर्णित किया, जो स्त्री विमर्श के विषयों पर गहराई से लिखती हैं। लेकिन कभी घोषित रूप से कभी खुद को स्त्रीवादी नहीं कहतीं। उन्होंने कहा - डॉ. सूर्यबाला के लेखन में स्त्री के मन के विकास को बखूबी दर्शाया गया है, जो भारतीय महिलाओं की यात्रा को प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने डॉ. सूर्यबाला की लेखन शैली का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिसमें व्यंग्य, हास्य और चरित्रों की चुटकी लेने की अद्भुत क्षमता शामिल है। उनकी भाषा में बहुलतावाद है, जो विभिन्न पात्रों और स्थितियों को जीवंत रूप से दर्शाती है।
उनके लेखन में पीढ़ियों के संवाद और सभ्यताओं के द्वंद्व को भी सशक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है। डॉ. जनार्दन ने सूर्यबाला जी की कहानी 'बाऊजी और बंदर' का उदाहरण देते हुए समझाया कि कैसे उनकी कृतियाँ 'पोस्ट ट्रुथ' (उत्तरसत्य) के गहन अनुभवों को दर्शाती हैं। 'पोस्ट ट्रुथ' उस स्थिति को कहते हैं जब ज्ञान मानवीय संवेदनाओं पर हावी हो जाए और हर वस्तु को केवल उपयोगितावादी दृष्टिकोण से देखा जाने लगे। आज के समय में, जब मानव-संबंधों में खटास आ रही है और संवादहीनता बढ़ रही है, यह कहानी मनुष्य और जानवर के बीच के अनूठे रिश्ते को मार्मिकता से उजागर करती है। इसी कारण, डॉ. सूर्यबाला का लिखा पढ़ा जाना चाहिए।
अब कार्यक्रम अपने समापन की ओर था। अंत में कार्यक्रम के संचालक ब्रिगेडियर रजनीश त्रिवेदी जी ने कहा - पीढ़ियों को जोड़ने के लिए संवाद, समन्वय और साहित्य महत्वपूर्ण हैं। साहित्य ऐसा होना चाहिए जो हर पीढ़ी को अपनी कहानी लगे। उसके बाद उन्होंने अपनी एक कविता पढ़ी -
बदलते रहना तुम
कभी लिबास
कभी आवास
कभी उजास
कभी प्रदेश
और अंततः देश
जब तक नहीं
बदलेगा विचार
भागते रहेंगे
समुदाय व कुनबे
दबते रहेंगे
पीसते रहेंगे लोग
और बनते रहेंगे
ढेरों नए मलबे
उम्मीद व सपनों के
कई पीढ़ी के
बगैर संघर्ष भागना
समाधान नहीं है
वजूद के होने
ना होने का
अंत में कार्यक्रम का समापन वक्ताओं के सम्मान के साथ हुआ। और सबसे जरूरी मेरे और मुझ जैसे और श्रोताओं के लिए घंटों धैर्य के साथ सुनने के लिए का उनका इनाम - मिठाई का डब्बा भी अंत में ही मिला।
सम्पर्क
मोबाइल - 9792787475
ई मेल - manishlpt420@gmail.com


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