साइना लोफी की कविताएं
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| साइना लोफी |
साइना लोफी (Gcina Mhlophe)
साइना लोफी दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद कार्यकर्ता, अभिनेत्री, कहानीकार, नाटककार और कवयित्री हैं। उनका जन्म 1958 में नाटाल में हुआ था और वे एक होसा माता और जुलू पिता की संतान हैं। उन्होंने अपना कार्यकारी जीवन एक घरेलू नौकर के रूप में प्रारम्भ किया फिर वे प्रेस ट्रस्ट और बी बी सी के लिए समाचार वाचक रहीं। फिर उन्होंने ‘लर्न एंड टीच’ पत्रिका में लेखन का कार्य किया। वर्तमान में वे The International Association for Theatre for Children and Young People के संरक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उनकी कहानियों, नाटकों और कविताओं की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने अनेक फिल्मों में काम किया है और अनेक फिल्मों का निर्देशन किया है। उन्हें मुक्त विश्वविद्यालय, इंग्लैंड, नाटाल विश्वविद्यालय और रोड्स विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया है।
अपने लेखन और अफ़्रीकी महिलाओं की आधुनिक विश्व में भूमिका के सम्बन्ध में हार्वर्ड क्रिमसन को दिए गए एक साक्षात्कार में वे कहती हैं कि “इससे मुझे निश्चय ही अच्छी अनुभूति होती है जब मैं युवा लोगों को उस दृष्टि से जीवन को देखते पाती हूँ जिस तरह से मैं नहीं देख सकी क्योकि मैं एक भिन्न पीढ़ी की हूँ। यह कुछ विशेष है। संयोग से ऐसा सारे विश्व में हो रहा है। हमेशा नयी आवाजें होती हैं और चीजों को देखने की नयी दृष्टि भी और ऐसा दक्षिण अफ्रीका और अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से में भी हो रहा है।"
श्रीविलास सिंह
मनुष्य को सभ्य बनाने में भाषा का सबसे बड़ा योगदान है। भाषा ने एक दूसरे से संवाद का रास्ता खोला। भाषा की खोज से मनुष्य अब किसी भी समस्या पर विचार विमर्श कर उसका सटीक समाधान निकाल सकता था। भाषा को अंकित करने के लिए मनुष्य ने लिपि का आविष्कार किया। और सभ्य बनने की प्रक्रिया में यह एक और महत्त्वपूर्ण कदम था। शब्दों का आविष्कार भी कम अहम नहीं था। शब्दों ही भाषा को जानने की खिड़की खोलते हैं। शब्द अवसाद से बचाते हैं। शब्द नई दिशाएं खोलते हैं और हम कुछ और रचनात्मक होते हैं। पढ़े लिखे वर्ग के लिए शब्दों की अहमियत क्या होती है इसे बताने की जरूरत नहीं। एक अच्छी पंक्ति, एक अच्छी रचना किसी भी व्यक्ति के समूचे जीवन को बदल देती है। गांधी जी ने बचपन में सत्य हरिश्चन्द्र नाटक देखा और सच की उस ताकत से अवगत हुए जिसने उनकी जिन्दगी को बदल कर रख दिया। अफ्रीकी कवयित्री साइना लोफी शब्द की इस महिमा से परिचित हैं अपनी कविता में वे लिखती हैं : 'यदि मुझे चुनना हो रोने और पढ़ने में/ मैं निश्चय ही चुनूंगी पढ़ना/ एक अच्छी किताब/ क्योंकि मेरे पास हैं साक्ष्य कि पीड़ा और तनाव में/ यह देती है आराम/ अनगिनत बार मैंने पीठ फेर ली है पीड़ा की ओर से/ और पाए हैं मित्र सुदूर देशों के अक्षरों में/अनगिनत बार मैंने अवज्ञा की है क्रोध की/ और अपने स्नायुतंत्र को सहलाया है एक पुरानी हास्य पुस्तिका से/ अनगिनत रातों में मैंने पाई है विजय अनिद्रा पर/ और दिल की बात की है अपने कागज़ और कलम से।' अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम पहली बार पर स्त्री स्वर को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस क्रम में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं अफ्रीकी कवयित्री साइना लोफी की कविताएं। कविताओं का उम्दा अनुवाद किया है श्रीविलास सिंह ने।
साइना लोफी की कविताएं
(हिन्दी अनुवाद : श्रीविलास सिंह)
प्रेम को मजबूत करो
प्रेम को मजबूत करो, प्रिय अफ्रीका वासियों!
प्रेम को मजबूत करो
उसे खड़ा होने दो एक चट्टान की भाँति!
कुछ भी नहीं है अर्थ क्रिसमस का
यदि हम नहीं करते प्रेम एक दूसरे को
यदि नहीं है हमें सहानुभूति आपस में
कुछ सोते हैं खाली पेट
जबकि दूसरों के पास है सब कुछ
असंख्य बच्चे खो चुके हैं अपने माँ बाप
दूसरे खाते हैं उनकी कसमें, और करते हैं उनसे घृणा
हम कैसे बनेंगे मजबूत
जब है ऐसी दशा
हम कैसे करेंगे विकास और होंगे समृद्ध?
हम कैसे होंगे सफल
जब हम नहीं करते सम्मान एक दूजे का
कहाँ से आएंगे आशीष हमारे लिए?
हम कहाँ जा रहे हैं?
जब हम में नहीं है कोई निष्ठा अथवा सहयोग?
हमें है आवश्यकता दर्शाने की प्रेम और मानवता एक दूजे के प्रति
प्रेम को मजबूत करो, प्रिय अफ्रीका वासियों!
हमें चाहिए प्रेम और सामंजस्य
प्रेम को मजबूत करो, प्रिय अफ्रिका वासियों!
इतिहास है एक भारी चीज
इतिहास है एक भारी चीज
यह है एक कई सिरों वाला विचित्र पशु
रंग हैं इसके अनेक कभी गिनो तो
इस प्राणी के अद्वितीय रंग हैं सक्षम
जगा सकने में सर्वाधिक अवर्णनीय गर्व
किन्तु इसके दूसरे रंग वापस ला देते है दुखद स्मृतियाँ
स्मृतियाँ सबसे निकृष्ट
उन घटनाओं की जिनसे हमारे पूर्वज
रह गए थे स्तंभित, खामोश
और फिर यह करता है तुम्हें कितना आनंदित
तुम सुनते हो विशाल नगाड़ों की आवाज़
बजती हुई तुम्हारे हृदय में, अदृश्य हाथों से
थाप देती धम धम, फिर और धम धम
और फिर धम धम, एक और धम धम
याद दिलाती तुम्हें कि ये रंग, चेहरे और आँखें
दाय हैं एक गर्वीले राष्ट्र की
वे चमक रही हैं, जगमगाती हुई शानदार
और जब कोई एक कहता है स्पष्टतः
पास आओ, और छुओ मुझे
और निश्चिंत हो मुझे भर लो आलिंगन में यदि करे तुम्हारा मन
हाँ, तुम जाओ, दिखा दो, और कहो दुनिया से
तुम हो कितने सफल
केवल ले लेने भर से मेरा नाम
फिर याद रखो कि कौन हो तुम
आये हो कहाँ से और कहाँ जा रहे हो।
प्रसन्नता की गर्म चमक करती है अभिभूत
फैली है मुस्कुराहट तुम्हारे नख शिख तक!
और इतना अविश्वसनीय गर्व अपने इतिहास के प्रति
किन्तु तभी इस प्राणी का एक सिर मुड़ता है चीखता हुआ
रुको, वहीं रुक जाओ!
याद रखो केवल महान घटनाओं से बनता नहीं
तुम्हारा इतिहास या फिर किसी भी राष्ट्र का
अपना दिमाग लगाओ, याद करो वे पीड़ादायक अत्याचार
और भयानक गलतियाँ
सीखो, आगे बढ़ो, निश्चित करो कि न पड़े लौटना फिर से उस समय में
जो कष्ट देता है तुम्हारी आत्मा को
यह है स्पष्ट कि हृदय चाहता है दबाना और छिपाना अच्छे से
वह चाहता है बचाना व्यर्थ जाने से कीमती आँसुओं को
ओह, कैसे बहते हैं वे, बिना रुके, जब हृदय हो जाता है टुकड़े टुकड़े
जब वह देखता है घृणा के भाव चेहरे पर
अनेक सिरों वाले इस पशु के
जिसका सिर है ऊंचा उठा हुआ, भय जगाता, उधेड़ता
सबसे खराब और गहरे ज़ख्म
मजबूर करता हमें कहने को जोर दे कर
निश्चय ही इतिहास है एक भारी चीज
कुमारियाँ जिनका हम यहाँ आज कर रहे है सम्मान
मरी थी पीड़ा में, युद्धरत अपने अधिकारों हेतु
समय नहीं था तब बिलकुल भी आज जैसा
नहीं देते थे देश के कानून उन्हें अनुमति
अपना मुँह खोलने देने को भी
तैयार न थे राजा चेश्वायो जो कुछ हुआ उसके लिए
उन कुमारियों ने मानी नहीं आज्ञा विवाह की बूढ़े योद्धाओं से
इसलिए राजा ने आज्ञा दी थी उन सब को मार डालने की
आज हम कर रहे हैं सम्मानित इंगुसे रेजिमेंट की कुमारियों को
उन वीरांगनाओं को, जब हम कहते हैं मन से
उन्होंने गंवाई नहीं अपनी जान व्यर्थ ही
उनकी स्मृतियाँ प्रेरित करती हैं हमें अपनी आँखें खोलने को
सामना करने को आज की चुनौतियों का।
बूढ़ों और जवानों, यह समय है हमारे लिए
एक दूजे की शक्ति बढ़ाने का, राष्ट्र के निर्माण हेतु।
मथानिया की भूमि में अपने पूर्वजों को गौरवान्वित करने हेतु
हाँ, निश्चय ही, इतिहास है एक भारी चीज
लेकिन है यह एक महान शिक्षक भी
साहस रखो, अफ्रीका के लाडलों, साहस रखो।
अकेले बैठ कर सोचते हुए
आजकल कई बार
पाया मैंने स्वयं को अकेले बैठी, सोचते हुए
ऐसा नहीं कि मेरे पास है इफरात समय
केवल बैठने और सोचने के लिए
मैं हूँ एक व्यस्त स्त्री, ढेर सारे कामों के साथ
मुझे कोशिश करनी है और बने रहना है
मेरे आसपास की तेज दुनिया के साथ
लेकिन फिर भी किसी भाँति यह होता है
ठीक सारी व्यस्तताओं के मध्य
बस रुक जाती हैं सारी चीजें
और मैं पाती हूँ स्वयं को अकेले बैठी, सोचते हुए
क्या राष्ट्रपति महोदय होंगे एक बेहतर आदमी
यदि उन्हें भी हो एक गर्भाशय और दूध से भरे वक्ष?
क्या वे प्रभावित होंगे जेल में ठुंसे बच्चों की संख्या से
सारे के सारे ही शांति और कानून, व्यवस्था के नाम पर
यदि उनका भी एक बच्चा, बस दस साल का, हो जेल में?
क्या आँसू गैस की गंध और खूनी गोलियों के घाव
होंगे उतने ही आकर्षक, लाने को
वह परिचित मुस्कान राष्ट्रपति महोदय के चेहरे पर
यदि उन्हें भी हो एक गर्भाशय और दूध से भरे वक्ष
सारा परिदृश्य हो गया स्पष्ट मेरे समक्ष
जब मैं बैठी थी अकेली सोचते हुए
सोचते हुए अपनी घनिष्ठ मित्र के बारे में
जब वह बैठी होगी जेल की कोठरी में
तरसती अपने नन्हें बच्चे के लिए
अपनी दूध से भरी पीड़ा देती छातियों संग।
नर्तकी
मम्मा
वे कहते हैं मुझसे तुम थी एक नर्तकी
वे कहते हैं मुझसे तुम्हारे थे
लंबे खूबसूरत पाँव तुम्हारे शानदार शरीर के लिए
वे कहते हैं मुझसे तुम थी एक नर्तकी।
मम्मा
वे कहते हैं मुझसे तुम गाती थी सुंदर एकल गीत
वे कहते हैं मुझसे कि कर लेती थी बंद तुम आँखें
सदैव, जब गीत के भाव होते थे अच्छे
और उठा लेती थी अपना चेहरा आकाश की ओर
वे कहते हैं मुझसे तुम थी एक सम्मोहक नर्तकी
मम्मा
वे कहते हैं मुझसे तुम हमेशा थी बहुत सज्जन
वे बात करते हैं लहराते विलो के वृक्ष की
मोहक अंदाज में बहते हुए निर्मल जल पर
वसंत की शुरुआत में जब वे करते थे तुम्हारी बातें
वे कहते हैं मुझसे तुम थी एक धीमी नर्तकी
मम्मा
वे कहते है मुझसे
तुम थी शादियों में नाचने वाली
वे कहते हैं मुझसे
तुम मुस्कुराती थी और बंद कर लेती थी अपनी आँखें
तुम्हारी बांहें होती थी ऊपर को उठी और बाहर को झुकी हुई थोड़ा सा
और तुम्हारे पांव चलते थे रेत हुए में
त्शि त्शि तिष्तिष्ठा त्शित्शि तिष्तिष्ठा
ओह मैं कितना चाहती हूँ कि मैं भी होती वहाँ देखने को तुम्हें
वे कहते थे मुझसे कि तुम्हें देखना था एक आनंददायक अनुभव
मम्मा
वे कहते हैं मुझसे कि मैं भी हूँ एक नर्तकी
पर मुझे नहीं पता….
मैं निश्चय ही जानती नहीं
होती हैं कैसी शादियों में नाचने वालियां
अब होते ही नहीं विवाह
बस होती हैं बहुत, बहुत सारी अंत्येष्टि
जहाँ हम नाचते और गाते हैं
तेज तेज दौड़ते हुए
किसी होने वाली दुल्हन या दूल्हे के ताबूत के साथ
विचित्र सी मुस्कुराहटों ने ले लिया है स्थान हमारे आंसुओं का
हमारी आँखे हैं भरी हुई प्रतिशोध से, मम्मा
प्यारी, प्यारी मम्मा
वे कहते हैं मुझसे मैं हूँ अंत्येष्टि में नाचने वाली।
शब्दों के सान्निध्य में
यह है सच में शानदार, आश्चर्यजनक और सुखदायक
यह जानना कि मेरे हैं आँखें पढ़ने को
हाथ जो लिख सकते हैं
और शब्दों के लिए असीम प्रेम
मैं भाग्यशाली हूँ कि बोल सकती हूँ कुछ निहायत खूबसूरत भाषाएँ
क्योंकि मैं प्रेम करती हूँ शब्दों से - भाषाओं के पूर्वज
जब होती हमें प्रसन्न, परिभाषित मेरे प्रसन्नता को
जब मैं होती हूँ दुखी और भ्रमित
शब्द बदल जाते हैं मिट्टी में मुझे अनुमति देते
बार बार गढ़ने को मेरे अस्त व्यस्त विचारों को
जब मुझे मिल नहीं जाती शांति मेरी आत्मा की
यदि मुझे चुनना हो रोने और पढ़ने में
मैं निश्चय ही चुनूंगी पढ़ना
एक अच्छी किताब
क्योंकि मेरे पास हैं साक्ष्य कि पीड़ा और तनाव में
यह देती है आराम
अनगिनत बार मैंने पीठ फेर ली है पीड़ा की ओर से
और पाए हैं मित्र सुदूर देशों के अक्षरों में
अनगिनत बार मैंने अवज्ञा की है क्रोध की
और अपने स्नायुतंत्र को सहलाया है एक पुरानी हास्य पुस्तिका से
अनगिनत रातों में मैंने पाई है विजय अनिद्रा पर
और दिल की बात की है अपने कागज़ और कलम से
मैं आती हूँ अपनी मेज तक रात्रि के सूने पहर में
मैं बैठती हूँ बिना किसी सूत्र के कि कैसे मैं चाहती हूँ करना प्रारम्भ
किन्तु तब, इसके पूर्व कि मैं जान पाऊँ, विभिन्न आकार और प्रकार के शब्द
आते हैं तीव्रता से मेरी उंगलियों तक
मैं महसूस करती हूँ अपनी पूरी देह को मुस्कुराते
मैं स्वागत करती हूँ उनका, एक एक का
पुराने मित्रों की भांति जो कि वे हैं भी
जब वे नाचने लगते हैं एक बड़े बड़े वृत्तों में मेरे चारो ओर
फेंकते शरारत वश गोले मेरी दीवारों पर
मैं हो जाती हूँ आश्वस्त कि मैं नहीं हुई हूँ पैदा बोर होने को
भला कैसे प्रवेश कर सकती हैं बोरियत
मेरे शब्दों के वृत्त में
अब देख सकते हो तुम, मैं क्यों हूँ इतनी संतुष्ट
अपने शब्दों के सानिध्य में।
सफलता के लिए हथियारबंद
अपनी युवावस्था के वर्षों में
मैंने स्वप्न देखे और बड़े स्वप्न देखे
किन्तु कुछ पता न था मुझे कि क्या है ईश्वर की योजना मेरे लिए
यदाकदा कठिन समय लगता था अधिक ही लम्बा
किन्तु फिर मैं तो हुई थी पैदा एक प्रफुल्लित हृदय के साथ
इसलिए हँसी ने कभी न छोड़ा साथ मेरे हृदय का
और आशा हमेशा रही मेरे लिए सहारे की लाठी
“मुर्गे के न बोलने पर भी सुबह होगी” मेरे लोग सही कहते हैं
उन मूल्यों ने, जिनसे हुई थी मेरी परवरिश
किया मेरा निर्माण और राह दिखाई जीवन में
युवावस्था में नहीं जानती थी मैं
कि मेरे माता पिता दे रहे हैं मुझे आयुध सफलता के लिए
अब जानती हूँ मैं कि कड़ी मेहनत और सम्मान खोलते हैं द्वार
वहाँ जहाँ तुम्हें उनके होने भान तक नहीं होता।
जहाँ नहीं ले जा सकती तुम्हें बेहतरीन शिक्षा भी
मैंने सीखा है कि तब तक जब तक तुम चाहते हो शिक्षित किया जाना
सम्पूर्ण सृष्टि सिखायेगी तुम्हें
जब तक तुम इच्छुक रहोगे प्राप्त करने हेतु
जीवन के उपहार ढूंढ ही लेंगे तुम्हें।
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| श्रीविलास सिंह |
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
श्रीविलास सिंह
मोबाइल : 8851054620




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