पंकज पराशर का आलेख 'तवाइफ़ और भारतीय राष्ट्रवाद'


पंकज पराशर 


भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन सही मायनों में कहा जाए तो एक समवेत आन्दोलन था जिसमें समाज के उन वर्गों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जिसे हम उपेक्षित नजरिए से देखने के आदी हैं। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन में एक बड़ी भूमिका तवायफों की रही है। पंकज पराशर अपने आलेख में लिखते हैं 'सन् 1857 से ले कर 1947 तक के कालखंड में तवाइफों ने तन, मन और धन के साथ हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए लड़ने वाले काँग्रेस के नेताओं और क्रांतिकारियों के साथ ख़ूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, जिसमें ‘तवाइफ़ संघ’, बनारस की हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई, बड़ी मोती बाई, टामी बाई आदि अनेक तवाइफ़ों के योगदान पर अब तक छिटपुट चर्चा ही हुई है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तवाइफ़ों के योगदान और बलिदान को रेखांकित किये बग़ैर ‘आज़ादी’ के 75वें वर्ष में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर चर्चा एकांगी और अधूरी मानी जाएगी।' इन तवाइफ़ों के अन्दर भी अपने देश के लिए कुछ कर गुजारने का जज्बा था। मुगल काल में इन तवाइफ़ों ने  हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया था। लेकिन बदले हालात में इन्होंने अपनी भूमिका भी बदल ली। सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान कई तवाइफ़ों ने अपने देश हिंदुस्तान के लिए अपनी सारी दौलत लुटा दी और जब वक़्त आया तो अपनी जान तक कुर्बान करने से भी नहीं हिचकिचाईं। लेकिन यह एक कड़वी हकीकत है कि उसका प्रतिदान उन्हें न उनके जीवन काल में मिला, न उनके गुज़र जाने के इतने सालों के बाद। आज भी हमारे इतिहास और संस्कृति के पन्नों से इनके नाम प्रायः नदारद ही मिलते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम कुछ महत्वपूर्ण स्त्री स्वरों को प्रस्तुत कर रहे हैं। आज के आलेख के मूल में भी वे स्त्रियां हैं जिन्हें तवायफ कहा जाता था। इन तवायफों को समाज अच्छी नजरों से नहीं देखता था। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंकज पराशर का आलेख 'तवाइफ़ और भारतीय राष्ट्रवाद'।


'तवाइफ़ और भारतीय राष्ट्रवाद'


पंकज पराशर


भारत की आज़ादी की लड़ाई में अनेक क्रांतिकारियों के नाम से लोग परिचित हैं, लेकिन आज़ादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी अधिकांश आम जन बहुत सारे ऐसे नामों से अब तक अपरिचित हैं, जिनके अमूल्य योगदान को इतिहास और समाज दोनों से ओझल कर दिया गया. आज के भारतीय समाज में तवाइफ़ों को वह सम्मान प्राप्त नहीं, जो अतीत में उनको सहज ही हासिल था। पहले तवाइफ़ का मतलब होता था संगीत, नृत्य, कविता और गद्य लेखन में महारत रखनेवाली और शराफ़त के मुआमले में एकदम बेदाग और प्रभावशाली। लेकिन अँगरेज़ों के भारत आगमन के बाद उनकी परिस्थितियाँ बदल गई और वह ऐसी बदली कि आम घरों की कुलीन स्त्रियों को अपमानित करने के लिए लोग ‘रंडी’ शब्द का इस्तेमाल करने लगे। जबकि अँगरेज़ों के भारत पर कब़्जे से पहले लखनऊ और दिल्ली के रईस अपने पुत्रों को बात करने का सलीक़ा, उर्दू ज़बान और दरबारी शिष्टाचार सीखने के लिए तवाइफ़ों के कोठे पर भेजते थे। रियासत अवध में इसी को ‘अदब’ कहा जाता था। उन दिनों ‘तवाइफ़’ सामाजिक संरचना के शिखर पर होती थीं। उनकी अपनी एक अलग संस्कृति थी, जो सिर्फ़ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की उत्कृष्ट गायकी से रसिकों को रिझाती थी। ऐसे में भारत के भद्र और आम जन दोनों की नज़रों में इस तथ्य को स्थापित कर पाना थोड़ी मेहनत की माँग करता है कि सन् 1857 से लेकर 1947 तक के कालखंड में तवाइफों ने तन, मन और धन के साथ हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए लड़ने वाले काँग्रेस के नेताओं और क्रांतिकारियों के साथ ख़ूब बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिसमें ‘तवाइफ़ संघ’, बनारस की हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई, बड़ी मोती बाई, टामी बाई आदि अनेक तवाइफ़ों के योगदान पर अब तक छिटपुट चर्चा ही हुई है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तवाइफ़ों के योगदान और बलिदान को रेखांकित किये बग़ैर ‘आज़ादी’ के 75वें वर्ष में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर चर्चा एकांगी और अधूरी मानी जाएगी।


इतिहास को आज सिर्फ़ याद करना काफी नहीं है, उस पर अलग नज़रिये से सोचना ज़रूरी है। इतिहास सिर्फ मरने-मारने वालों का नहीं होता। उसमें वह लोग भी होते हैं, जिनको शामिल किये बिना कोई समय पूर्ण नहीं होता। सन् 1857 के बग़ावत के जितने किरदारों को हम जानते हैं, उससे कहीं लंबी है वह फेहरिस्त, जो इस बड़े बग़ावत की तारीख़ का हिस्सा बनीं। आज से डेढ़-दो सौ साल पहले तवाइफ़ का मतलब होता था मौसीक़ी, डांस और उर्दू अदब की जानकार। तमीज़, तहज़ीब और अदब की रवायत में प्रशिक्षित एक ऐसी औरत, जिनके राजा-महाराजा, नबाब और बड़े रईस क़द्रदान हुआ करते थे। दादरा, ठुमरी, कथक, मुजरा मौसीक़ी के वे रंग थे, जिनकी तरक्की में तवाइफों के आला किरदार को कभी भूला नहीं जा सकता। कोठों पर होने वाली उर्दू शायरी और ग़ज़ल की महफ़िलों के चर्चे हिंदुस्तान से ले कर फ़ारस तक थे। मुग़लिया सल्तनत के दौर में तवाइफ़ें अपने सबसे बेहतरीन दौर में थीं। उस दौरान सबसे बेहतरीन तवायफ को 'डेरेदार तवायफ' कहा जाता था और यह माना जाता था कि वह मुगल खानदान से तआल्लुक रखती हैं। उस दौर में तवाइफ़ होना प्रतिष्ठा, संस्कृति और दौलत का पैमाना माना जाता था। उन्हें कोई भी बुरी औरत या किसी की दया पर जीने वाली औरत नहीं समझता था। तवाइफ़ों ने न सिर्फ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया, बल्कि सन् 1857 में अपने देश हिंदुस्तान के लिए सारी दौलत लुटा दी और जब वक़्त आया तो अपनी जान तक कुर्बान करने से भी नहीं हिचकिचाईं। लेकिन उसका प्रतिदान उन्हें न उनके जीवन काल में मिला, न उनके गुज़र जाने के इतने सालों के बाद भी हमारा इतिहास और हमारी संस्कृति उनके बारे में कुछ बताने की ज़हमत उठाती है। इतिहास ने जो सुलूक अकुलीन और अचर्चित हाशिये के नायकों के साथ किया, उससे कहीं बुरा सुलूक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और अपने वतन पर मर मिटने का जज्बा रखने वाली उन तवाइफ़ों के साथ किया; जो समाज के सतह पर दिखती हुई भी हमेशा अदृश्य-सी रहीं!  


भारत की आज़ादी से पहले उत्तर भारत की रियासतों में गाना पेश करने वाली स्त्रियों को ‘तवाइफ़’ कहा जाता था। भारतीय कला-संस्कृति में तवाइफ़ों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उत्तर भारत में जिन्हें तवाइफ़ कहा जाता था, दक्षिण भारत में उन्हें ‘देवदासी’, बंगाल में ‘बाईजी’ और देश के कई हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता था। एक ख़ास मत के लोगों की मानें, तो ‘तवाइफ़’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है, जिसका अर्थ है देवस्थान के गर्भगृह के चारों ओर नर्तक-मंडली का नृत्य और गायन. वहीं इसके एकदम उलट विचार रखने वाले लोगों की मानें तो ‘तवाइफ़’ शब्द अरबी के ‘ताइफ़ा’ शब्द का बहुवचन है, जिसका अर्थ है झुंड। ख़ैर, इस शब्द की व्युत्पत्ति चाहे जहाँ से भी हो, लेकिन यह निश्चित है कि भारतीय समाज में ‘तवाइफ़’ को एक अच्छा स्थान हासिल था, जिन्हें ‘वेश्या’ या ‘गणिका’ कहा जाता था। प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों में देवताओं के लिए यज्ञ की आहुति तब तक अपूर्ण मानी जाती थी, जब तक पेशेवर गायिकाओं द्वारा यह विधि संपन्न न की जाती हो। यह सम्मानित पद इन गायिकाओं को इसलिए दिया जाता था, क्योंकि वे एक पुरातन और दैवीय कला की प्रदर्शिका मानी जाती थीं। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अँगरेज़ अधिकारी उन्हें ‘नॉच गर्ल्स’ कहते थे। ‘नॉच’ शब्द दरअसल हिंदी शब्द ‘नाच’ का अँगरेजी रूपांतरण है। इसका अर्थ होता है विभिन्न प्रकार की नाच और गायन करने वाली लड़की। जबकि अँगरेज़ों के भारत आने से पहले हज़ारों वर्ष पहले से भारत में पेशेवर नर्तकियाँ होती आयी थीं। ऋग्वेद में ‘नृतु’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ होता ‘नर्तकी’ होता है। ‘जातकों’ में तवाइफ़ों को उदार बताया गया है और उन्हें आदर की दृष्टि से देखा गया है। ‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार तवाइफ़ों को सम्मानजनक दर्ज़ा हासिल था और राजा द्वारा दिये जाने वाले छत्र, चँवर और स्वर्णघट वह धारण करती थीं। जबकि वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ में तो वेश्याओं के बारे में छह अध्याय लिखे गए हैं। इसलिए यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि ‘नॉच गर्ल’ भारतीय संस्कृति और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के मेल से पैदा हुए एक नया शब्द-युग्म है। भारत की जिन पेशेवर गायिकों को अँगरेज़ों ने ‘नॉच गर्ल’ कहा गया, आइये उसकी थोड़ी पृष्ठभूमि जान लेते हैं।



भारत पर राज करने के लिए इंग्लैंड से लंबी समुद्री यात्रा कर के अकेले आने वाले सिपाहियों, बड़े हाकिमों और शासन व्यवस्था से जुड़े अन्य ब्रिटिश अधिकारियों को उस वक़्त के हिंदुस्तान में प्रायः अँगरेज़ स्त्रियों के बिना जीना पड़ता था। इंग्लैंड से भारत की लंबी और तकलीफदेह यात्रा ने अधिकांश अँगरेज़ औरतों को अपने पतियों और प्रेमियों का साथ देने से रोक दिया। जो अपने पतियों के साथ भारत आयीं भी, वह बड़े शहरों में रहीं। जबकि उनके पतियों की नियुक्ति अविभाजित भारत के दूर-दराज के इलाकों में हुई। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दिये जाने वाले नियुक्ति पत्र में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख रहता था कि वह अपने पतियों के कार्यस्थल पर न जाएँ। 18वीं सदी के एक आँकड़े से उन दिनों भारत में रहने वाले अँगरेज़ स्त्री-पुरुष के बीच की खाई का पता चलता है। कलकत्ता में उस वक़्त चार हज़ार अँगरेज़ पुरुष थे, जबकि अँगरेज़ स्त्रियों की संख्या थी मात्र दो सौ पचास। ऐसी स्थिति कमोबेश सारी बड़ी ब्रिटिश छावनियों में एक जैसी थी, इसलिए अँगरेज़ अधिकारियों और सैनिकों में ही भारतीय पत्नियों को रखने का एक सामान्य रिवाज़ था। जिन अँगरेज़ों ने यूरोपियन पत्नियों को लाने की व्यवस्था की भी, वह उन्हें रख पाने में काफी मुश्किलों का सामना करने लगे। जहाँ एक अँगरेज़ पत्नी को साथ रखने में उन्हें प्रतिमाह पाँच हज़ार रुपये खर्च करने पड़ते थे, वहीं एक भारतीय पत्नी को रखने में महज चालीस रूपये! भारतीय पत्नी को अपने साथ रखने में उन्हें यह आर्थिक सहूलत भी हासिल थी।


भारतीय स्त्रियों की अँगरेज़ों के बीच भारी माँग रहती थी, जो उनकी घर-गृहस्थी कुशल ढंग से चलाती थीं और वह समर्पण भाव से साथ रहती थीं। लेकिन यह देखना थोड़ा अज़ीब है कि जो भारतीय स्त्रियाँ इन अँगरेज़ अधिकारियों और सिपाहियों के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण रखती थीं, उन्हें अपने आवास से अलग परिसर के एक छोटे और असुविधाजनक घर में रहना पड़ता था, जिसे उन दिनों ‘बीवीख़ाना’ अथवा ‘औरत-घर’ कहा जाता था! दिलचस्प यह कि ऐसे संबंधों को भारत के स्थानीय लोग बुरी निगाह से नहीं देखते थे। जिन अँगरेजों के बँगले के ‘बीवीख़ाना’ में उनकी भारतीय स्त्री रहती थी, उस स्त्री को स्थानीय लोग आदर की दृष्टि से देखते थे। इस तरह का संबंध अँगरेज़ अधिकारियों को स्थानीय परंपराओं, रिवाज़ों, संस्कृति और भाषा से परिचित होने में मदद करता था और भारत की देसी स्त्रियों से संबंध एक-दूसरे के लिए परस्पर लाभदायक भी था। बावज़ूद इसके कि दोनों पक्ष यह पहले से जानते थे कि इस संबंध में स्थायित्व नहीं था। फिर भी दोनों के बीच एक अलिखित-सा समझौता था, जो इन अँगरेज़ अधिकारियों के इंग्लैंड लौटते समय स्वतः टूट जाता था। कुछ कवियों और स्थानीय कलाकारों ने अपनी कविताओं और लोक-गीतों में इन अँगरेज़ अधिकारियों की देसी भारतीय पत्नियों का बड़ा करुण चित्रण किया है। पतिविहीन होती हुई देसी स्त्रियाँ समुद्र के किनारे अकेली रोती-चिल्लाती हुई उन पानी के जहाजों को असहाय की तरह देख रही हैं, जो उनके बच्चे के पिताओं को दूर देश ले जाने के लिए रवाना हो रहे हैं। लेकिन इस प्रकार के समझौते के तहत ‘बीवीख़ाना’ में रहने वाली स्त्रियाँ कुछ दिन बाद की इस अनिवार्यता को पहले से जान रही होती थीं।


भारतीय इतिहास के इस पक्ष पर अब तक शायद विचार ही नहीं किया गया कि इन अँगरेज़ सिपाहियों के इंग्लैंड लौट जाने के बाद देसी स्त्रियों से पैदा हुए उनके पिताविहीन बच्चे को भारतीय समाज में कैसा स्थान हासिल हो पाता था? अपने को अतिरिक्त सभ्य कहने वाले अँगरेज़ बाद की ज़िंदगी में कभी पलट कर उन बच्चों की सुध नहीं लेते थे। इसलिए उनके भारतीय प्रवास के पैदावार ये बच्चे ऐसी दारुण ज़िंदगी जीने को अभिशप्त होते थे, जिसके लिए वह बच्चे कहीं से भी ज़िम्मेदार नहीं थे। ठीक उसी तरह जैसे सन् 1971 के मार्च से दिसंबर तक बांग्लादेश के ‘मुक्ति संग्राम’ के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने जिन बंगाली स्त्रियों का बलात्कार किया, उनसे पैदा हुए बच्चे को समाज में ‘अवांछित शिशु’, ‘शत्रु संतान’ और ‘जारज संतान’ कहा जाता था। इन बच्चों को जन्म देने वाली उन बदनसीब माँओं को ‘लांघित नारी’, ‘दुर्भाग्यवती नारी’ और ‘दुष्टा नारी’ तक कहा गया। इसलिए सामाजिक कलंक के साथ जीने से बेहतर अधिकांश पीड़ित स्त्रियों ने आत्महत्या कर लेना उचित समझा। कुछ पीड़ित महिलाओं ने सीमा के इस पार भारत आ कर बच्चों को जन्म दिया और उसके बाद वह गुमनामी के अँधेरे में खो गईं, जैसे ‘बीवीख़ाना’ में रहने वाली भारत की देसी स्त्रियों के विषय में अब कुछ पता नहीं चलता! न इसके बारे में कोई ठोस जानकारी फिलहाल उपलब्ध है कि अँगरेज़ पिता और देसी माँ से पूरे अँगरेज़ी राज के दौरान कितने बच्चे पैदा हुए थे और उनके पिता के इंग्लैंड लौट जाने के बाद उन बच्चों को भारतीय समाज में किन स्थितियों से गुज़रना पड़ा और बाकी बच्चों की तुलना में उन्हें कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा।


व्यापार के बहाने भारत आई ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार की अनुमति तो मुग़ल सम्राट जलालउद्दीन मोहम्मद अकबर के ज़माने से माँग रही थी, लेकिन नुरुद्दीन मोहम्मद सलीम उर्फ़ जहाँगीर वह पहले मुग़ल बादशाह थे, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि सर थॉमस रो से मिलने को तैयार हुए। सर थॉमस रो 1615 में हिंदुस्तान की राजधानी आगरा पहुँचे और उन्होंने मुग़ल बादशाह जहाँगीर को बहुमूल्य उपहार भेंट किया, जिनमें शिकारी कुत्ते और उनकी पसंदीदा शराब भी शामिल थी. सन् 1756 में नवाब सिराजुद्दौला भारत के सबसे धनी अर्द्ध-स्वायत्त राज्य बंगाल के शासक बने। मुग़ल शासन के राजस्व का पचास प्रतिशत इसी राज्य से आता था। बंगाल न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में कपड़ा और जहाज़ निर्माण का एक प्रमुख केंद्र था। लेकिन 23 जून, 1757 को पलाशी में कंपनी और नवाब की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। तोपों की अधिकता और सेनापति मीरजाफ़र के विश्वासघात के कारण अँगरेज़ विजयी हुए। उसके बाद मीरजाफ़र को बंगाल के सिंहासन पर बिठा दिया गया। अँगरेज़ अब मीरजाफ़र से मालगुज़ारी वसूलने लगे। इस प्रकार भारत में अँगरेज़ों के लूटपाट का युग आरंभ हुआ। जब ख़ज़ाना ख़ाली हो गया, तो मीरजाफ़र ने कंपनी से पीछा छुड़ाने के लिए डच सेना की मदद ली। 1759 में और फिर 1764 में विजय के बाद कंपनी ने बंगाल का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। तब जा कर भारत के लोगों को ईस्ट इंडिया कंपनी की असली नीयत और भारत में आने के उद्देश्यों के बारे में पता चला। विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताब 'द अनार्की, द रिलेंटलेस राइज़ ऑफ़ द ईस्ट इंडिया कंपनी' में लिखा है कि ये इतिहास का एक अनूठा उदाहरण है, जिसमें अठारहवीं शताब्दी के मध्य में एक निजी कंपनी ने अपनी थल सेना और नौसेना की मदद से 20 करोड़ की आबादी वाले भारत जैसे एक देश को ग़ुलाम बना दिया था,  क्योंकि यह ईस्ट कंपनी व्यापार करने वाली महज एक कंपनी नहीं थी। भारत में इस कंपनी के पास ढाई लाख से ज़्यादा लोगों की फौज थी, जो सिर्फ़ इंग्लैंड ही नहीं, यूरोप के तमाम देशों के लोगों की ज़िंदगियों में दखल रखती थी। ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करने वाले पत्नी और प्रेमिकाविहीन इन्हीं ढाई लाख सैनिकों के कारण किस तरह भारत में ‘तवाइफ़ों’ की स्थिति में परिवर्तन होता गया और अँगरेज़ अधिकारियों, सिपाहियों और उनके भारतीय सहयोगियों ने किस तरह ‘तवाइफ़’ के पेशे और उनकी सम्मानित ज़िंदगी को तबाह किया, आइये अब हम इसकी पड़ताल करते हैं।


ईस्ट इंडिया कंपनी के हिंदुस्तान आने से पहले मुग़ल काल (1526-1857) के दौरान आज के बांग्लादेश से ले कर भारत, पाकिस्तान, बर्मा और अफगानिस्तान तक के तमाम रियासतों के राजदरबार में तवाइफ़ें बहुत प्रभावशाली और आभिजात्य वर्ग में गिनी जाती थीं। लखनऊ की तवाइफ़ें अपनी नफ़ासत, अच्छी उर्दू में महारत और शेर-ओ-शायरी में ख़ास दिलचस्पी के कारण पूरे हिंदुस्तान में एक अलग मुकाम रखती थीं। वह दरअसल कलाकार थीं, जिन्हें कठिन प्रशिक्षण के दौर से गुजरना पड़ा था। एक तरफ़ जहाँ उन्हें उर्दू भाषा के अच्छे शिक्षक भाषा सिखाते थे, वहीं शास्त्रीय संगीत के बड़े उस्ताद संगीत की एक-एक बारीकियों की तालीम देते। नृत्य के विशेषज्ञ कथक सहित अन्य नृत्य शैलियों की बारीकियाँ सिखाते थे। उसके बाद ही वह किसी महफिल में अपना गायन पेश करती थीं। इसके उलट वेश्याएँ कलाकार नहीं होती थीं। उनका वर्ग और पेशा तवाइफ़ से मुख़्तलिफ होता था, लेकिन अँगरेज़ों ने दोनों को एक समान समझा और एक ही डंडे से हाँकने की कोशिश की। ब्रिटिश सरकार ने उस वक़्त हिंदुस्तान में मौज़ूद कोठों के कलात्मक और रचनात्मक तत्वों की अनदेखी की और उन्हें महज ‘वेश्यालय’ समझा। इससे तवाइफ़ों की मूल पहचान बहुत प्रभावित हुई और उनके पेशे पर इसका गहरा असर पड़ा। उन्हें एक ब्रिटिश संक्रामक रोग अधिनियम-1864 (Britain’s Contagious Disease Act of 1864) के दायरे में लाने की कोशिश की गई, ताकि तवाइफ़ों के साथ-साथ ब्रिटिश सैनिकों के बीच यौन रोगों के संक्रमण को रोका जा सके। इस कानून को लागू करने के बाद तत्कालीन हिंदुस्तान के जिन-जिन शहरों में फौजी छावनियाँ थीं, उन शहरों की तवाइफ़ों के लिए पंजीकरण और नियमित चिकित्सा जाँच को अनिवार्य कर दिया गया। लखनऊ के साथ-साथ उस समय भारत के जिन 110 शहरों की सैनिक छावनियों में ब्रिटिश सैनिक तैनात थे, वहाँ तवाइफ़ों और वेश्याओं पर कड़ी निगरानी रखने के ख़्याल से नियमित चिकित्सा जाँच को अनिवार्य बना दिया गया।  ब्रिटिश सरकार द्वारा यह कानून थोपने, तवाइफ़ों को संरक्षण देने के कारण देसी राजाओं और रईसों को इनका शरणदाता मानने और सन् 1857 के बग़ावत में तवाइफ़ों के शामिल होने के शक में उनके ऊपर बड़ा जुर्माना लगाया गया। यही नहीं, तवाइफ़ जैसी सम्मानित और पेशेवर गायिकाओं को सामान्य वेश्या समझ कर उनका अवमूल्यन किया गया। तवाइफ़ों को अँगरेज़ अधिकारी तत्कालीन हिंदुस्तान के कुलीन वर्ग का अभिन्न अंग समझते थे। इसलिए उनके प्रभाव को कम करने के लिए उनके विरुद्ध छेड़े गये अभियान में देसी राजाओं और नवाबों द्वारा तवाइफ़ों को दी गई बड़ी जायदादों पर कब्जा कर लिया और उनके साथ जुड़े रईसों को अय्याश और अनैतिक कह कर बदनाम करने का अभियान चलाया।


यह देखना आश्चर्यजनक है कि जो अँगरेज़ अधिकारी हिंदुस्तान के देसी राजाओं को अय्याश और अनैतिक कह रहे थे, वही इन तवाइफ़ों को अपने बँगले, अपने ऐशगाहों में ले जा कर यौन-सुख प्राप्त करते थे। जब इनसे आयकर की वसूली करनी होती, तो अति व्यावहारिक अँगरेज़ इन मालदार तवाइफों से एक बड़ी रकम आयकर के रूप में वसूलने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते थे। मनमानेपन की इंतहा यह कि कोठे पर जा कर स्वस्थ और सुंदर तवाइफ़ों को चुन लेना और यूरोपीय सैनिक छावनियों में भेज देना, अँगरेज़ सरकार की आधिकारिक नीति बन चुकी थी। अँगरेज़ों की इस चतुराई और पाखंड भरी नीति ने तवाइफ़ के पेशे को यातनामय बना दिया। ऊपर से अँगरेज़ सिपाहियों के बीच यौन संक्रामक रोगों के फैलने का ज़िम्मेवार भी उन्हीं को कहा जाने लगा। 1857 के बग़ावत को क्रूरतापूर्वक दबाने के क्रम में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने तत्कालीन हिंदुस्तान के नवाबों, राजाओं और किसानों का दमन किया, तो धीरे-धीरे तवाइफ़ों को संरक्षण देने वालों की कमी होती गई. कई तवाइफ़ों ने अपना मूल पेशा त्याग करके किसी से शादी करके अपना शेष जीवन और सम्मान बचाया, तो तवाइफ़ों को जीने के लिए कुछ और तरीके ढूँढने को मजबूर होना पड़ा। कई ‘नॉच गर्ल’ को सचमुच ‘सेक्स वर्कर’ के धंधे में जाना पड़ा। तवाइफ़ों के साथ जब अँगरेज़ों ने ऐसा दमनकारी और अपमानजनक रवैया अपनाया, तो उनके भीतर प्रतिशोध और बग़ावत की ज्वाला भड़क उठी। इसलिए यह अकारण नहीं कि सन् 1857 के विद्रोह में तवाइफ़ों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, क्योंकि वह नवाबों के संरक्षण में थीं। हालाँकि नवाबों के संरक्षण में होने के बावजूद तवाइफ़ों के लिए बग़ावत में शामिल होना अनिवार्य नहीं था। राजा और नवाब तो इस वज़ह से अँगरेज़ों के खिलाफ थे, क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने उनकी शक्ति और वैभव को बहुत नुकसान पहुँचाया था और तवाइफ़ों के सम्मान और पेशे के साथ अँगरेज़ों ने बहुत ज़्यादती की थी।


असगरी बेगम 


हिंदुस्तान की आज़ादी के इतिहास में एक ऐसी ही अद्भुत किरदार हैं, लखनऊ से कानपुर आ कर बसी अज़ीज़ुन्निसा उर्फ अज़ीज़न बाई। उनकी ख़ूबसूरती की पूरे अवध में चर्चा थी। उनकी हनक अँगरेज हुक्मरानों के यहाँ भी महसूस की जाती थी। वह दिल की बहुत उदार और अपने वतन से बेहद मोहब्बत करने वाली थी। जितना बढ़िया गाती थीं, उतना ही उम्दा नृत्य भी करती थी। जब वह अपने किरदार में होतीं, तो लगता चाँद झील में तैर रहा हो। मगर एक वक़्त ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि मुल्क ख़तरे में है। तब उन्होंने अपने पैरों के घुंघरू तोड़ कर, गले से ठुमरी की तान छोड़ कर बग़ावत की आवाज़ बुलंद कर दी। अज़ीज़ुन्निसा एक कोठे वाली तवाइफ़ थी, जिसके पास जंग से थके-हारे सिपाही आते और कोठे पर होने वाले मुजरे-महफ़िलों से अपना दिल बहलाते थे। लेकिन बग़ावत की आग जब हिंदुस्तानी फौज़ियों के बीच पनपनी शुरू हुई, तो अज़ीज़न ने अपने ज़ेवर और गाना-नाचना छोड़ कर हाथ में तलवार उठा ली। अज़ीज़न ने अँगरेज़ों का ख़ून बहाने से गुरेज़ नहीं किया। कानपुर शहर के कई तवाइफ़ों के कोठे बाग़ियों के मिलने की जगह बन चुकी थी। सन् 1857 के बाद अँगरेज़ी हुकूमत ने इन कोठों पर अपनी पूरी ताक़त से हमला किया और उनकी जायदाद पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। अज़ीजुन्निसा के अलावा आशा देवी, बख्तावरी देवी, भगवती देवी त्यागी, इंद्र कौर, जमीला ख़ान, मन कौर, रहीमी, राज कौर, शोभना देवी और उम्दा ऐसी तवाइफ़ें हैं, जिन्होंने हाथ में तलवार ले कर अँगरेज सिपाहियों से लड़ते हुए अपनी क़ुर्बानी दे दी। इनमें असग़री बेग़म को छोड़ कर सारी औरतें अपनी उम्र के बीस से तीस वर्ष के बीच की थीं, जिन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया। सन् 1811 में पैदा हुई सैंतालिस साल की असग़री बेगम को घात लगा कर गोरे सिपाहियों ने पकड़ा और सन् 1858 में सरेआम जिंदा जला दिया। यही नहीं, सन् 1858 में ही हबीबा सहित 11 और औरतों को बर्बर अँगरेजों ने फाँसी पर लटका दिया। आप इनके नामों पर ग़ौर करें, तो 1857 की इन बाग़ी हिंदुस्तानी औरतों में जहाँ आशा देवी, बख्तावरी देवी, भगवती देवी त्यागी, शोभना देवी हिंदू थीं, वहीं अज़ीज़ुन्निसा, जमीला खान, असग़री बेगम, हबीबा, रहीमी मुसलमान और इंदर कौर, मन कौर और राज कौर का तआल्लुक सिख कौम से था। हर कौम की औरत ने इस बग़ावत में अपनी जान दी। हिंदुस्तान की आम औरतों की इसी राष्ट्रीय एकता और चेतना से गोरे घबरा गए थे।  लेकिन अफ़सोस की बात यह है इनके बारे में हमारे इतिहास में ज़्यादा नहीं लिखा गया।


अज़ीजुन निसा


सन् 1999 में प्रकाशित त्रिपुरारी शर्मा के नाटक ‘सन् सत्तावन का किस्साः अज़ीजुन निसा’ के हवाले से लिखते हुए अपने एक आलेख में प्रो. लता सिंह लिखती हैं, ‘कानपुर की तवाइफ़ अज़ीज़ुननिसा कुछ भी कर सकती थी। विद्रोह में भाग लेना या न लेना उसका नितांत निजी फैसला था, क्योंकि सामूहिक वज़हों के लिए लड़ना और अपनी जान देना एक दुर्लभ बात है। अज़ीजुन्निसा के ऊपर किसी का कोई दबाव नहीं था कि वह उस विद्रोह में भाग ले। न उसके सामने ऐसी कोई बाध्यता थी। सच तो यह है कि अज़ीज़ुन्निसा किसी के संरक्षण में भी नहीं थी। वह कानपुर शहर में रहती थी और अपना 'कोठा' चलाती थी। उसकी माँ लखनऊ की एक जानी-मानी तवाइफ़ थी। अज़ीज़ुन्निसा ने लखनऊ शहर छोड़ा होगा, जो उन दिनों तहज़ीब का एक बड़ा केंद्र था। वहाँ तवाइफ़ किसी की सरपरस्ती में रह कर ज़िंदगी के मज़े लेती थीं। अज़ीजुन्निसा के कानपुर आने का कारण शायद आज़ादी के लिए उसका प्रबल जुनून रहा होगा और शायद वह किसी की सरपरस्ती में नहीं रहना चाहती थी। लखनऊ के मुक़ाबले कानपुर दरअसल 'बाज़ारों' का शहर था और यह शहर तवाइफ़ों को पसंद नहीं था। अज़ीजुन्निसा ने महसूस किया कि कानपुर के ग्राहकों में लखनऊ के ग्राहकों की तुलना में शाही ज़ायका, तहज़ीब और वैसी नफ़ासत नहीं थी।  इसकी पुष्टि के लिए आइये अज़ीजुन्निसा का अपनी सखी आदिला के साथ यह संवाद देखते हैं, “मैं लखनऊ रह जाती आदिला, पर किसी शाहज़ादे की जी-हुज़ूरी मेरे बस की बात नहीं... और उन्हें इनकार करना भी नामुमकिन हो चला था। शीशमहल के सौ चराग़ों में एक नहीं तो क्या...।”  इससे यह अनुमान होता है कि विद्रोही स्वभाव की अज़ीजुन्निसा ने लखनऊ की बजाए कानपुर शहर को क्यों चुना। लेकिन इसके बाद उसकी सखी आदिला के एक संवाद से आम जनमानस में अँगरेज़ अधिकारियों की क्या छवि बनी थी, इसकी भी एक बानगी देखते चलें, “महाजन और सिपाही तो आएँगे ही तुम्हारी महफिल में, उनका रुतबा बढ़ता है इससे। हाथ में चंद सिक्के आए नहीं कि सोचते हैं शाहाना फितरत के मालिक हो गये. पर उनमें अदब और तहज़ीब कहाँ? जो सिर्फ ख़ानदानी रवायत दे सकती है और तुम उन पर अपना ख़जाना लुटाये जा रही हो- इस मुग़ालते में कि वे क़द्र करना सीख जाएँगे। मगर वह फिरंगियों के इख़्तियार में हैं और फिरंगियों ने क़द्र और लिहाज के मायने भी नहीं जाना है। अंगरेज़ों को देखो, नाना साहेब की मेहमाननवाज़ी के बावज़ूद उन्हें जायदाद से बेदख़ल करने पर आमादा हैं और उनके कहने पर तुम्हारे ये सिपाही हमीं पर चढ़ बैठेंगे- इतने खूँखार और बेउसूल हैं ये.”  इसलिए सन् 1857 के विद्रोह में तवाइफ़ों की भागीदारी के कारणों की जाँच करने के लिए ऐतिहासिक संदर्भों को देखने की जरूरत है, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि उस बग़ावत में तवाइफ़ों की क्या भूमिका थी?


अज़ीजन बाई सन् 1832 में लखनऊ में पैदा हुई थीं। उनकी माँ भी एक तवाइफ थीं और वह बेटी को कम उम्र में ही छोड़ कर चल बसीं। उसके बाद वह कानपुर के ऊमराव बेगम के लूरकी महल में चली गईं, जहाँ उनकी परवरिश हुई। यह वह दौर था जब मुग़ल पूरी तरह खोखले हो चुके थे और तवायफें भी ढलान पर थीं। जिस उम्मीद में तवाइफ़ों ने दिल्ली छोड़ कर अवध का रुख किया था, वह अवध रियासत भी कमज़ोर होने लगी थी। उन दिनों तवायफ़ें नवाबों या ज़मीदारों की दौलत के सहारे अपना गुज़ारा चलाती थीं। अज़ीज़ुन्निसा लखनऊ छोड़ कर कानपुर आई थी और यहाँ सिपाहियों और बाग़ियों के सहारे ही उसका कोठा चलता था। पूरे हिंदुस्तान में अँगरेज़ों के ख़िलाफ़ नाराज़गी थी। तवाइफ़ों के कोठे भी इससे बचे नहीं रहे। मौसीक़ी की महफिलों के बीच ही बग़ावत के मंसूबे बनने लगे। तवाइफ़ों के यहाँ बाग़ियों को छिपने की जगह मिल जाती और साथ ही वह गुप्त सूचनाएँ भी, जो गोरे सिपाही शराब के नशे में वहाँ उगल जाते थे। अज़ीज़न का कोठा भी आज़ादी के दीवानों का ठिकाना बन गया। उनके यहाँ कानपुर में तैनात घुड़सवारों की एक टुकड़ी के सिपाही अक्सर आया करते थे। उन्हीं में एक सिपाही था शमसुद्दीन, जो अज़ीज़न के काफी क़रीब था। अज़ीज़न की आदत थी कि वह सिपाहियों के जत्थे के साथ घुड़सवारी करतीं। उन्हें अक्सर मर्दों के लिबास में मेडल और पिस्तौल लिए घुड़सवारी करते हुए देखा गया था। आज़ादी की लड़ाई में भी उन्होंने यह भूमिका नहीं छोड़ी और ख़बरी होने के साथ-साथ सिपाहियों के साथ बग़ावत में बिल्कुल सामने से हिस्सा लिया।


पहली जून, 1857 को नाना फड़नवीस की अगुआई में गंगा नदी के किनारे एक अहम बैठक हुई। इसमें सभी ने गंगाजल हाथ में ले कर इस योजना को गुप्त रखने और देश को आज़ाद कराने की लड़ाई में हिस्सा लेने की कसम खायी। हालाँकि अगले दिन ही शमसुद्दीन ने अज़ीज़न को बता दिया कि दो दिनों में ही फिरंगियों का ख़ात्मा हो जाएगा और मुल्क आज़ाद हो जाएगा। अज़ीज़न ने नाना फड़नवीस और उनके जनरल तात्या टोपे के तमाम क़िस्से सुने थे। वह भी इस जंग में कूद पड़ीं, जबकि उनको पता था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों से सीधी टक्कर में जीत पाना मुश्किल है। लेकिन अज़ीज़न ने आस-पास के इलाक़ों की कई तवाइफ़ों को एकजुट किया और उनको नाम दिया ‘मस्तानी टोली’। यह महिलाएँ सिपाहियों तक रसद और हथियार पहुँचातीं और जख़्मी सिपाहियों की सेवा करती थीं। अज़ीज़न ने हथियार चलाना सीखा और बाकी तवाइफ़ों को भी इसकी ट्रेनिंग दी। जब नाना फड़नवीस की फ़ौज ने मेजर जनरल ह्यू वीलर के ठिकाने का घेराव किया, तो वह वहाँ पहले से मौजूद थीं। कई सिपाहियों ने उन्हें मर्दाना लिबास में बंदूक चलाते हुए देखा। इक्कीस दिनों तक चली लड़ाई में पूरी हिम्मत से वह डटी रहीं। अँगरेज़ सैनिकों के ठिकाने के पास ही अज़ीज़न ने अपना मोर्चा खोल रखा था, जहाँ से सिपाहियों तक गोला-बारूद पहुँचाया जाता। पहली जीत के बाद जब नाना फड़नवीस ने विजय जुलूस निकाला, तो वहाँ भी अज़ीज़न मौज़ूद थीं। कानपुर की सड़कों पर गोरे सिपाहियों ने जो हिंदुस्तानियों के ऊपर फायरिंग की थी, उसके कारतूस के खोखे और लहू से सड़कें रँगी हुई और वीरान दिखती थीं। अवध का शायद ही कोई कोठा रहा होगा, जहाँ 1857 के बाग़ियों को पनाह न मिली हो।


लखनऊ की बेगम हज़रत महल और कानपुर में जंगे-आज़ादी में तलवार ले कर लड़ने वाली अज़ीज़न बाई। ग़ौरतलब है कि अँगरेज़ों की मौज़ूदगी से हिंदुस्तानी सिपाही और तवाइफ़ों को सीधे-सीधे फायदा था, लेकिन दोनों ने ही अपने फायदे को ताक पर रख कर ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ बग़ावत कर के अपनी जिंदगी का दाँव खेला। भूख, गर्मी और ऊपर से भारतीयों की आग उगलती बंदूकें। आख़िर कब तक टिके रह पाते अँगरेज़। अफ़गान जंग के हीरो मेजर जनरल ह्यू वीलर को सफेद झंडा उठाना पड़ा। कानपुर में गोरों का सबसे मजबूत क़िला ढह चुका था। नाना साहेब ने उनके सामने एक ही रास्ता छोड़ा, शहर से भागने का। जब हार से झुके कंधे और थके क़दमों से अँगरेज़ अफ़सर और सैनिक गंगा किनारे की ओर बढ़ रहे थे, तो यह नज़ारा देखने को पूरा कानपुर घरों से बाहर निकल आया। अँगरेज़ों के गुरूर का ऐसा ज़नाजा निकलेगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। सत्तीचौरा घाट पर दसियों हज़ार लोग जमा थे, जहाँ से ईस्ट इंडिया कंपनी की विदाई होनी थी। चारों ओर नारों का शोर और गोरों से मुक्ति का उत्साह। इस जीत के पीछे थे वे सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानी, जिनकी चमकती तलवारों ने अंग्रेज़ों को घुटनों पर ला दिया, आज वे बाग़ी सिपाही पूरी अवाम के हीरो थे।


जब कानपुर में 1857 की क्रांति की सबसे बड़ी जंग चल रही थी, तब मैदान में अज़ीज़न भी थीं. मर्दाना वेश में घोड़े पर सवार, कमर में लटकती म्यान और हाथों में पिस्टल. एक हाथ से लगाम थामे वह दुश्मन पर मौत बन कर टूटतीं। अज़ीज़न ने यह भूमिका इसलिए चुनी, क्योंकि वह नाना फड़नवीस से बेहद प्रभावित थीं। कानपुर की यह लड़ाई 5 जून, 1857 से शुरू हो कर 25 जून, 1857 तक चली, लेकिन बहुत मुश्किल से हाथ आया कानपुर शहर ज़्यादा दिनों तक आज़ाद नहीं रह सका। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरी ताकत से कानपुर पर हमला बोला। बिठूर की हार के बाद नाना साहब के नेपाल जाने की ख़बर आई, जबकि तात्या टोपे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से जा मिले। क्रांति के जो नेता उभरे थे, उनमें से पीछे रह गईं अज़ीज़न। पूरी अँगरेज़ फ़ौज क्रांतिकारियों की तलाश में घर-घर छापे मार रही थी। जिस पर भी थोड़ा शक होता, उसे बुरी तरह मारा जाता। हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। आख़िरकार एक दिन अज़ीज़न भी पकड़ी गईं। उन्हें मेजर जनरल हेनरी हैवलॉक के सामने पेश किया गया। अज़ीज़न की सुंदरता और बहादुरी ने हैवलॉक को मुग्ध कर दिया। उसने अज़ीज़न से कहा कि अगर वह अपना ज़ुर्म कुबूल कर के माफी माँग ले और बग़ावत में शामिल लोगों के नाम बता दे, तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा। साथ ही उन्हें इजाज़त मिल जाएगी फिर से अपना कोठा चलाने की। अज़ीज़न ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘भले तुम मेरी ज़बान खींच लो, मगर ख़ूबसूरत ग़ज़लें गाने वाली यह ज़ुबान उफ भी नहीं करेगी। मेरी खाल खींच लो, यह ख़ूबसूरत खाल जिस पर ज़माना आहें भरता है, उसे इसकी ज़रा भी फ़िक्र नहीं होगी। भले तुम मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दो, हर टुकड़ा जो कुदरत के दिये नायाब हुनर की गवाही है, वह शिकवा भी नहीं करेगा। मगर तुम जान लो कि अज़ीज़ुन्निसा जान से भले चली जाए, पर अपनी ज़ुबान से उन पाक शफ़्फाक बाग़ियों का नाम तुम्हें नहीं बताएगी। वे मेरे बहादुर भाई मेरे मुल्क को तुम्हारी घिनौनी साजिशों से आज़ाद करके रहेंगे।’ मेजर जनरल हेनरी हैवलॉक, अज़ीज़ुन्निसा की ऐसी ग़ुस्ताख़ी से तिलमिला गया। उसने गुस्से से काँपते हुए गोरे सिपाहियों को हुक़्म दिया कि अज़ीज़न को तोप के मुँह से बाँध दिया जाए। सिपाहियों ने फौरन उनके हुक़्म की तामील की। उसके बाद हेनरी हैवलॉक ने तोप के मुँह से बँधी अज़ीजुन्निसा के मुँह पर कई थप्पड़ मारे और हिंदुस्तान की औरतों पर बहुत बेहूदी टिप्पणियाँ की और उसी वक़्त तोप से बँधी अज़ीज़ुन्निसा को उड़ा दिया गया। एक तवाइफ़ जिसे हमारा समाज ज़लील करने से कभी बाज नहीं आता, उस तवाइफ़ अज़ीज़न ने मुआफ़ी की जगह शहादत चुनी थी।


विद्याधरी बाई 


बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में बनारस के कई चौराहे और गलियों में तवाइफ़ों की महफिल सजती थी। बनारस के राज दरबार और रईसों की कोठियों के अलावा मंदिरों और मठों में भी तवाइफों की महफिलें जमती थी। विद्याधरी बाई की महफिल अक्सर शाम छह बजे के बाद शुरू होती, जिसमें मिलने वाले पैसे वह चुपचाप क्रांतिकारियों को दे देती थीं। कई बार ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत की आज़ादी की माँग करने वाले क्रांतिकारियों को गिरफ़्तार करने के लिए विद्याधरी के कोठे पर छापा भी मारा, लेकिन उन क्रांतिकारियों को वह अपना साजिंदा बता कर अपने कोठे पर छिपा लेती थीं। पुलिस के चले जाने के बाद अच्छे कपड़े-लत्ते और पर्याप्त पैसे दे कर वह क्रांतिकारियों को विदा करती थीं। दौलत और शोहरत विद्याधरी को ऐसे मिलती थी कि उनके कोठे पर अक्सर ‘खड़ी महफिल’ लगा करती! ‘खड़ी महफिल’ यानी ऐसी महफ़िल जहाँ भीड़ ज़्यादा होने की वज़ह से किसी तरह खड़े होने भर को जगह मिल जाए। फिर जब महफिल जमती तो विद्याधरी की ठुमरी, चैती, टप्पा और ख्याल की बंदिशों को लोग घंटों सुध-बुध खो कर सुनते रहते। सन् 1930 में जब हिंदुस्तान में आज़ादी की जंग तेज़ होने लगी, तो विद्याधरी बाई ने महात्मा गांधी के कहने पर ब्रिटेन में बने कपड़ों का बहिष्कार कर दिया और अच्छे कपड़ों का बेहद शौक होने के बावज़ूद देशी कपड़े पहनने लगीं। 



हिंदी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार अमृत लाल नागर ने पचास के दशक में एक किताब लिखी थी ‘ये कोठेवालियाँ’। इस किताब में उन्होंने साहित्य-सदन, अमृतसर से ‘वारवधू विवेचन’ (सन् 1929 में प्रकाशित) के हवाले से लिखा है कि सन् 1921 में बनारस में महात्मा गांधी ने ‘तवाइफ़ संघ’ की एक सभा में भाषण देते हुए बनारस की तवाइफों से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की अपील की थी। महात्मा गांधी के इस ऐतिहासिक भाषण को ‘वारवधू विवेचन’ में देख सकते हैं। ‘तवाइफ सभा’ के इस जलसे की अध्यक्षता बनारस में ‘सरकार’ कही जाने वाली मशहूर तवाइफ़ हुस्ना बाई उर्फ हुस्ना जान ने की थी। इस मौके पर हुस्ना बाई ने एक शानदार भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने तवाइफ़ों के बारे में भारतीय समाज के नज़रिये और उसकी हक़ीकत के साथ-साथ अपने समाज की समस्याओं को भी सिलेसिलेवार तरीके से बयान किया था। उनकी एक-एक बात को बहुत ध्यान से महात्मा गांधी सुनते रहे और कहा कि यह देश उतना ही तवाइफ़ों को भी है, जितना किसी दीगर हिंदुस्तानी का। इस जलसे के तमाम इंतज़ाम का जिम्मा विद्याधरी बाई ने किया था। गांधी जी ने अपने भाषण में बनारस की तवाइफ़ों से कहा कि आप लोग ब्रिटिश सरकार के विरोध के गीत गाएँ और वैसे गीतों का अगर अभाव महसूस हो, तो आप लोग खुद देशभक्ति के गीत लिखें। इन गीतों को तमाम रियासतों में जा कर जनता के बीच गाएँ। विद्याधरी बाई ने गांधी जी की इन बातों को दिल से सुना और और निभाया। सन् 1929 में विद्याधरी बाई ने एक गीत लिखा, 


चुन चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए 

ये हिन्द का बगीचा गुलज़ार रह न जाए 


ये वो चमन नहीं है लेने से वो उजाड़ 

उल्फत का जिसमें कुछ भी एहसान रह ना जाए 

भर दो जवान बन्दों जेलों में चाहे भर दो 

माता पे कोई होता कुर्बान रह न जाए 

छल को फरेब से तुम भारत का माल लूटो 

इसके लिए यहाँ कोई सामान रह न जाए 


चुन चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए 

ये हिन्द का बगीचा गुलज़ार रह न जाए 


भारत न रह सकेगा हरगिज़ गुलामख़ाना 

आज़ाद होगा, होगा आया है वो ज़माना 

खूँ खौलने लगा है अब हिंदुस्तानियों का 

कर देंगे ज़ालिमों का बंद बस जुर्म ढाना 

कौमी तिरंगे झंडे पे जान निसार उनकी 

हिन्दू मसीह मुस्लिम गाते हैं ये तराना 

परवाह अब किसे है इस जेल-ओ-दमन की 

इक खेल हो रहा है फाँसी पे झूल जाना

भारत वतन हमारा भारत के हम हैं बच्चे 

माता के वास्ते है मंज़ूर सिर कटाना 


चुन चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए 

ये हिन्द का बगीचा गुलज़ार रह न जाए 


विद्याधरी बाई ने यह गीत न सिर्फ लिखा, बल्कि ख़ुद इसे सुरों में भी पिरोया और गाया। उनकी आवाज़ में ऐसी खनक थी कि राहगीरों के पाँव खुद-ब-खुद रुक जाते थे। इस गीत को वह किस धुन में गाती थीं, यह बताने के लिए कोई रिकॉर्डिंग मौज़ूद नहीं है। इधर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी गायिका शुभा मुद्गल ने इस गीत को अनीस प्रधान की बनायी धुन पर गाया है। यहाँ यह भी बताते चलें कि देशभक्ति का पहला मुजरा विद्याधरी बाई ने गाया था और मुजरे से जो उन्हें आमदनी होती थी, उसे वह बिना आगा-पीछे सोचे, क्रांतिकारियों को दे देती थीं।


सिद्धेश्वरी बाई 


‘तवाइफ़ संघ’ की सभा में दिये गये महात्मा गांधी के भाषण से प्रभावित हो कर भारत की आज़ादी के आंदोलन में हुस्ना बाई, धनेसरा बाई, बड़ी मैनाबाई, विद्याधरी बाई, बड़ी मलका जान, गौहर जान, जानकी बाई, बड़ी कनीज़, मोती बाई, जद्दन बाई, काशी बाई, अख्तरी बाई, केसरबाई, ज़ोहरा बाई, दुलारीबाई, हीराबाई, राजेश्वरी बाई, टामी बाई, सृजन बाई, तोखी बाई, अल्लाहजिलाई बाई और सिद्धेश्वरी देवी तक ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। भारतीय समाज के संकीर्ण सोच के कारण तवाइफ़ों को भेदभाव का शिकार भी होना पड़ा। राष्ट्रवादी आंदोलन की सार्वजनिक बैठकों में तवाइफ़ों की उपस्थिति को भद्र महिलाएँ बर्दाश्त करने को तैयार न हुईं। कांग्रेस के एक सत्र में तवाइफ़ गौहर जान का उपस्थित होना तत्कालीन भद्र महिलाओं को इतना नागवार लगा कि गौहर जान से कहा गया कि वह कांग्रेस के अधिवेशन से बाहर ही रहें। धारवाड़-हुबली की किराना घराने की सुप्रसिद्ध गायिका गंगू बाई हंगल को देवदासी की पुत्री होने के कारण सन् 1924 में कर्नाटक के बेलगाम में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में अलग सबसे अलग खाना खाने के लिए कहा गया था। भारतीय समाज से इस तरह के व्यवहार का प्रतिदान मिलने के बावज़ूद अपने वतन के लिए कुछ करने के जज्बा तवाइफ़ों के भीतर कम न हुआ. वर्ष 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान बनारस में गठित ‘तवाइफ़ संघ’ के जलसे की कमान संभाल चुकी हुस्ना बाई ने अपने साथी तवाइफ़ों के साथ-साथ देश के आम जन से विदेशी चीज़ों का बहिष्कार करने और गहनों की जगह लोहे की हथकड़ी पहनने का आह्वान किया था। ठुमरी की बेहतरीन गयिका राजेश्वरी बाई अपनी हर महफिल में अंतिम बंदिश ‘भारत कभी न बन सकेला गुलाम’ गाना नहीं भूलती थीं। बनारस की एक और चर्चित तवाइफ़ दुलारी बाई के ललकारने पर उसके सबसे चहेते नन्‍हकू ने कई अँगरेज़ों के सिर धड़ से अलग कर दिए और कजरी की सुरीली गायिका सुंदरी के प्रेमी नागर को तो अँगरेज़ी सेना से मोर्चा लेने के ज़ुर्म में कालेपानी की सज़ा दी गई थी। आज़ादी के इस मुहिम में सिद्धेश्‍वरी देवी की भूमिका को भी रेखांकित किया जाना जरूरी है, जो अपनी तमाम महफिलों में देशभक्ति के गीत जरूर गाती थीं। दालमंडी में कोठों पर क्रांति की कहानियाँ लिखने वाली तवाइफ़ों की सूची में दुलारी बाई का नाम सबसे अव्वल है। इतिहासकार वीना तलवार ओल्डनबर्ग ने करीब 35 तवाइफ़ों के साक्षात्कार के जरिए उनकी ज़िंदगी में झाँकने की कोशिश की। अपनी पुस्तक ‘द मेकिंग आफ कोलोनियल लखनऊ, 1856-1877’ में वह लिखती हैं, ‘भारत की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में तवायफों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बागियों का दमन करने के बाद अंग्रेजों ने जो संपत्ति जब्त की, उस सूची में इनके नाम प्रमुख थे।


रसूलन बाई


रसूलन बाई ने महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित हो कर गहने पहनना छोड़ दिया था। उन्होंने गहने तभी पहने, जब देश आज़ाद हो गया। अपने प्रण के मुताबिक रसूलन बाई ने देश के आज़ाद होने के बाद ही शादी भी की। ‘तवाइफ़नामा’ नामक चर्चित किताब की लेखिका सबा दीवान ने रसूलन बाई के जीवन-संघर्ष और संगीत की साधना को केंद्र में रख कर एक लघु फिल्म बनायी है, ‘द अदर्स सौंग’ जिससे उन अध्यायों से परदा हटता है, जिसके बारे में जान कर अनेक संगीत-प्रेमियों को बहुत दुःख और अफ़सोस होता है। ग़ुलाम भारत में सन् 1916 से ले कर 1946 तक स्थिति यह थी कि रसूलन बाई की गायिकी के क़द्रदान उन्हें अपने पलकों पर बिठाते थे। रियासत रामपुर, रतलाम, दरभंगा, इंदौर, रीवा और पन्ना से उन्हें बार-बार बुलावा आता। लेकिन ठीक एक बरस बाद जब हिंदुस्तान को आज़ादी मिली, तो देश भर की तवाइफ़ों के लिए एक नई मुसीबत शुरू हो गई। संस्कृति की रक्षा करने को तत्पर स्वयंभू शुचितावादियों ने कोठों के बहिष्कार की मुहिम छेड़ दी। नतीज़ा यह हुआ कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रसिक जन तवाइफ़ों के कोठे की ओर जाने से परहेज़ करने लगे। उसके बाद सरकार ताबूत में आख़िरी कील ठोकते हुए एक सरकारी आदेश के तहत ऑल इंडिया रेडियो में उन महिलाओं के गाने पर पाबंदी लगा दी गई, जिनका संबंध किसी कोठे से रहा हो और जिनकी शादी न हुई हो। इसी वज़ह से जो रसूलन बाई सन् 1946 तक अपने पेशे में शोहरत की बुलंदियों पर थी, उन्हें 1947-48 में ही मुजरे की कुर्बानी देने के लिए मज़बूर होना पड़ा। सामाजिक और सरकारी दबाव का ये आलम था कि आज़ादी से पहले जहाँ तवाइफ़ें अपने नाम में ‘जान’ लगाती थीं, वही आज़ादी के बाद ‘जान’ को त्याग कर के अपने नाम के बाद ‘देवी’ या ‘बेगम’ लगाने लगीं।


अपने को ‘बाई’ से ‘बेगम’ में बदलने का दबाव रसूलन बाई पर इतना अधिक था कि 44 साल की उम्र में आ कर सन् 1946 में रसूलन ने बनारसी साड़ी के एक व्यापारी सुलेमान मियाँ के साथ निकाह पढ़वा लिया। सुलेमान मियाँ भी संगीत में थोड़ी रुचि रखते थे और रसूलन बाई की महफ़िलों में पहले से आते-जाते रहे थे। आज़ादी के बाद कुछ समय तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन उसके बाद हिंदुस्तान का बँटवारा हुआ और लोग इंसान से ज़्यादा हिंदू-मुसलमान हो गए, तो बनारस से भी बहुत सारे लोग पाकिस्तान जाने लगे। रसूलन बाई के शौहर सुलेमान मियाँ भी पाकिस्तान जाने के लिए नीयत और सामान दोनों बाँधने लगे। रसूलन के मियाँ सुलेमान को नये मुल्क पाकिस्तान के आकर्षण ने अपनी तरफ़ खींच लिया था, जबकि रसूलन बाई को नये बने पाकिस्तान से ज़्यादा पुराने बनारस से लगाव था। रसूलन बी ने सुलेमान मियाँ को समझाने कि बारहा कोशिशें की, लेकिन सुलेमान मियाँ चूँकि सफ़र के लिए नीयत और सामान बाँध चुके थे, लिहाजा उनके ऊपर रसूलन बाई की बातों का कोई असर न हुआ। तब रसूलन बी को बनारस में ही छोड़ कर सुलेमान मियाँ पाकिस्तान चले गए। जबकि रसूलन बाई ने यह फैसला कर लिया था कि वह हिंदुस्तान में ही रहेंगी। जिस हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए रसूलन बाई ने महात्मा गाँधी के आह्वान पर गहने-जेवर का त्याग कर दिया, विदेशी कपड़े पहनना छोड़ दिया, उस अज़ीम गायिका रसूलन को आज़ादी के एक साल बाद ही अपने पेशे को छोड़ने पर मज़बूर होना पड़ा। अकेलेपन और ग़रीबी के इस दौर में साल 1968 में उन्हें लकवा मार गया और अगले बरस 1969 में बनारस में हिंदू-मुस्लिम के बीच हुए भयानक सांप्रदायिक दंगे में रसूलन बाई का घर जला दिया गया। भले ही भारतीय समाज ने इतिहास में रसूलन बाई जैसी शख्सियतों को वह जगह नहीं दी, जिनकी वह हकदार थीं, लेकिन लोग उनकी आवाज़ के जादू और रागों पर बेहतरीन पकड़ को नज़रअंदाज़ नहीं कर सके।  प्रख्यात शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने रसूलन बाई से संगीत की जिन बारीकियों को सीखा, उसके लिए उन्होंने कई बार रसूलन बाई के प्रति अपना आभार व्यक्त किया था। यही नहीं, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ का कहना था कि अगर कोठे नहीं होते और तवाइफ़ें न हुई होतीं, तो आज बिस्मिल्लाह भी बिस्मिल्लाह खाँ न हुआ होता। बिस्मिल्ला खाँ के नाम में ‘उस्ताद’ और ‘भारत रत्न’ की महानता जुड़ जाने के बाद इस तथ्य की ओर लोगों को ध्यान शायद ही कभी जाता है कि वह बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर की एक तवाइफ़ बृजबाला बाई के साथ रियाज़ करते थे। खाँ साहब यह मानते थे कि थे की ‘पक्की गायकी’ यानी असल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत तो कोठे पर थी। इस संदर्भ में यहाँ यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है कि हिंदी फिल्म गूँज उठी शहनाई, जिसके संगीतकार वसंत देसाई कहे जाते हैं, उसमें शहनाई उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने बजायी है, जिसने खाँ साहब को तो अमर कर दिया, लेकिन इस गाने की धुन असल में तवाइफ़ बृजबाला बाई ने बनायी थी। लेकिन दुनिया आज बिस्मिल्ला खाँ और वसंत देसाई को जानती है, बृजबाला बाई को कोई नहीं जानता।


गौहर जान


सन् 1920 में मशहूर तवाइफ़ गौहर जान का पहली बार महात्मा गांधी से सामना हुआ। गांधी जी उन दिनों स्वराज फंड के लिए कलकत्ता शहर में चंदा वसूल रहे थे। गौहर जान उन दिनों 24, चितपुर रोड, कलकत्ता स्थित अपने कोठे में रहती थीं। गांधी ने हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए किए जा रहे आंदोलन में गौहर जान से भी मदद करने का आग्रह किया। गांधी पूरे देश में गौहर जान के बारे में सुना था। उन्हें लगा कि गौहर जान चाहे तो वह आज़ादी की मुहिम में बहुत सहयोग कर सकती है। गांधी जी के आग्रह करने पर गौहर जान वाकई तुरंत राजी हो गईं और गौहर ने गांधी जी को एक चिट्ठी में लिखा कि हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए कांग्रेस के संघर्ष में अपना योगदान दे कर उसे बहुत खुशी होगी और स्वराज फंड के लिए चंदा उगाहने के लिए वह संगीत के कार्यक्रम में अवश्य भाग लेगी। इतना लिखने के बाद गौहर ने गांधी जी के सामने एक शर्त रखते हुए लिखा कि वह ऐसा सहयोग तभी करेगी जब उसकी प्रस्तुति के दौरान गांधी जी उस महफिल में ख़ुद उपस्थित होंगे। गांधी जी मदद करने के एवज में गौहर जान की यह शर्त दिलचस्प लगी और उन्होंने खुशी-खुशी गौहर के इस शर्त को मान लिया। जिस दिन गौहर जान के गाने की महफ़िल सजी और गौहर ने अपना गाना पेश करते हुए भीड़ में इधर-उधर नज़र दौड़ायी, तो उसे दर्शकों के बीच कहीं भी महात्मा गांधी नज़र नहीं आए, जो कि सच था। असल में हुआ यह था कि जिस दिन गौहर जान को अपनी प्रस्तुति देनी थी, उसी दिन देश में कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएँ हो गईं, जिसके कारण गांधी जी उस कार्यक्रम में नहीं जा सके। बावज़ूद इसके उन्होंने अपने प्रतिनिधि के रूप में गौहर के कार्यक्रम में मौलाना शौक़त अली को भेजा।


यह गौहर की लोकप्रियता ही थी कि उस कार्यक्रम के सारे टिकट बिक गए थे और उस एक प्रदर्शन से चौबीस हज़ार रुपये इकट्ठा हुए थे। जब मौलाना शौक़त अली चंदे का पैसा लेने के लिए गौहर जान से मिले, तो गौहर ने आधा पैसा अपने आप रख कर महज बारह हज़ार रुपये उन्हें दिया। इस पर मौलाना ने जब हैरत से गौहर की ओर देखा, तो गौहर मुस्कुराती हुई वह बोली, ‘मौलाना साहब, बराए-मेहरबानी आप यहाँ से तशरीफ़ ले जाएँ और अपने महात्मा गाँधी से जा कर कहें कि वह ईमानदारी और वफादारी की बात तो करते हैं, लेकिन एक तवाइफ़ से किया हुआ अपना वादा भूल जाते हैं। चूँकि वह मेरे प्रोग्राम में तशरीफ़ नहीं लाए और ख़ुद को ग़ैरहाज़िर कर लिया। इस तरह उन्होंने सिर्फ अपना आधा वचन निभाया, लिहाजा, दान देने के वचन के बावजूद मैं भी उन्हें आधा पैसा ही दूंगी।’ गौहर की इस दलील पर मौलाना शौक़त अली कुछ नहीं बोल सके और मुस्कुराते हुए उन्होंने पैसे लिए और चले गए। हिंदुस्तान की आज़ादी अपनी जगह, लेकिन गांधी जी का उस कार्यक्रम में नहीं जाना उसे अखर गया। न जाने की वज़ह चाहे जो भी हो, लेकिन जब गांधी जी अपने वचन को पूरा नहीं  कर सके, तो गौहर ने अपना वचन पूरा नहीं किया और उस कार्यक्रम में अपना योगदान आधा कर दिया. चूँकि इससे पहले गौहर इस बात को भुगत चुकी थी कि महज तवाइफ़ होने के कारण उसे कांग्रेस की भद्र महिला कार्यकर्ताओं ने अधिवेशन में आने की अनुमति नहीं दी थी और उसके बाद वादा करने के बावजूद उस कार्यक्रम में गांधी जी नहीं आए, इसलिए तवाइफ़ गौहर जान के आत्मसम्मान को इससे बड़ी ठेस लगी। जिसकी वज़ह से गौहर ने गांधी को भी नहीं बख़्शा।


आज़ादी के बाद धीरे-धीरे जिस ‘राष्ट्रवाद’ की हवा ज़ोर पकड़ने लगी और आज जो आँधी का रूप लेती जा रही है, उसमें बहुत सारे वंचित और उपेक्षित समुदाय को ओझल करने की शुरू से ही कोशिश रही है। सन् 1900 के बाद पटना के चौहट्टा के आस पास जब बहुत तेज़ी से आबादी बढ़नी शुरू हुई, तो पटना कॉलेज और उसके आस पास रहने वाले लोगों ने इस इलाके में तवाइफ़ों के घर होने पर एतराज़ करना शुरू कर दिया। तवाइफ़ों को इस इलाके से हटवाने के लिए लोग पटना हाईकोर्ट चले गये। अदालत में ज़िरह के मैदान में नामी वकील उतारे गए. महीनों तक लंबी बहसें चली और आख़िरकार सन् 1935 में तवाइफ़ें अपना मुकद्दमा हार गईं। उसके बाद उनको इस इलाके से हटा कर पटना सिटी भेज दिया गया। जिन तवाइफ़ों के रहने से इस इलाके की आलीशान इमारतें कोठे के रूप में जानी जाती थीं, वे तमाम इमारतें अब फिर से कोठी में तब्दील की जाने लगीं। फिर से शरीफ़ज़ादों और नवाबज़ादों के रहने के लायक होने लगीं. सन् 1800 में जो बाज़ार-ए-हुश्न पटना में बसा था, वह 1935 तक आते-आते उजड़ गया। हिंदुस्तान को आज़ादी मिलने के साथ ही देश को ‘राष्ट्र’ में तब्दील करने के लिए प्रतिबद्ध शुचितावादियों ने उन तवाइफ़ों को राष्ट्र की नैतिकता और उत्थान के लिए ख़तरा मान लिया, जिन्होंने अपने प्यारे वतन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने से पहले एक पल भी नहीं सोचा था।


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