मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएँ
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| मिथिलेश श्रीवास्तव |
रूसो का एक मशहूर कथन है कि जब एक व्यक्ति ने जमीन के एक हिस्से को घेर कर यह कहा कि यह मेरी है तभी से मनुष्यों के बीच विवाद की शुरुआत हुई। राष्ट्रों के बीच विवाद के मूल में भी यही बात है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जर्मनी एक पराजित देश था और विजेता राष्ट्रों ने उसे दो भागों में विभाजित कर दिया पूर्वी जर्मनी एवं पश्चिम जर्मनी। यही नहीं जर्मन अहंकार को कुचलने के उद्देश्य से उसकी राजधानी बर्लिन में एक दीवार खड़ी कर दी गई। जर्मनी और उसकी राजधानी का बंटवारा कृत्रिम था, जिसे जर्मन लोगों ने कभी स्वीकार नहीं किया। आखिरकार 9 नवंबर 1989 को जर्मन लोगों ने ही बर्लिन की दीवार को गिरा दिया। यह विश्व इतिहास की वह महत्वपूर्ण घटना थी जिसने कृत्रिम सीमा को समाप्त कर दिया था। और 1990 में दोनों जर्मनी फिर से मिलकर एक हो गए। भारत और पाकिस्तान के बीच भी 1947 में एक कृत्रिम सीमा खींच दी गई जिसे रेडक्लिफ लाइन का नाम दिया गया। धर्म के नाम पर भारत का बंटवारा हो गया। गांधी जी ने आजादी के बाद पाकिस्तान वाले क्षेत्र में जा कर वहां के लोगों को समझा कर भारत में मिलने के लिए राजी करने के लिए सोचा अलग बात है कि उसके पहले ही उनकी हत्या कर दी गई। कवि मिथिलेश श्रीवास्तव अपनी कविता 'रैडक्लिफ़ रेखा' में लिखते हैं : रैडक्लिफ़ रेखा एक काल्पनिक रेखा है लेकिन वह एक दीवार है एक नागरिकता को/ दो नागरिकताओं में बांटने वाली/ मैंने देखा है बंटते बंटते कितने छोटे हो गए हैं ज़मीन के आकार'। कवि किसी भी तरह के विभाजन के खिलाफ खड़ा होता है और हर तरह की उस दीवार को ढहा देना चाहता है जो मनुष्यता को सीमित करती है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं वरिष्ठ कवि मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएँ।
मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएँ
पंखुड़ियां
खिलते हुए एक ख़ूबसूरत रंगीन फूल को देखा
और रो पड़ा
उसके रंगीन और मुलायम पंखुड़ी को देख
फूल की जैसी अपनी त्वचा की याद आयी
जो अब रूखड़े उत्तकों का समुच्य है
फूल की मासूमियत मेरा स्वभाव था
लाल गाल चमकती आँखें काले बाल,
चिड़चिड़ा नहीं
पूरी दुनिया की हिंसा का विरोध करता हुआ
दुनिया को फूल के जैसा होने का स्वप्न देखता हुआ
कितनी जल्दी फूल की पंखुड़ियां एक एक कर बिखरने लगी हैं।
रैडक्लिफ़ रेखा
पूर्वी और पश्चिमी जर्मिनियों के बीच एक दीवार थी
बर्लिन की दीवार जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद खड़ी की गयी थी
लोगों ने इस दीवार को अपने दिलों में दरार के रूप में महसूस किया
लोगों ने उस दीवार को अपने में दिलों में ढहाया
और एक दिन बर्लिन की दीवार को हमेशा के लिए ढहा दिया
समय लगा, लेकिन अधिक नहीं, चकनाचूर हो गयी दीवार
उन दिनों मैं किशोर था एक भला मनुष्य बनता हुआ
मुझे याद है बर्लिन की दीवार के ध्वस्त होने की ख़बर सुन कर मैं खुश हुआ था
उन दिनों मैं न जर्मनी को जनता था और न बर्लिन की दीवार को
दीवार का ढहाना मैं जानता था
मैं इतना जानता था कि एक दीवार होती है जो एक ज़मीन के दो दुकड़े कर देती है
उस पार, या इस पार
एक आँगन को दो आँगनों में बाँट देती है एक घर से दो नालियां बहने लगती हैं
रैडक्लिफ़ रेखा एक काल्पनिक रेखा है लेकिन वह एक दीवार है एक नागरिकता को
दो नागरिकताओं में बांटने वाली
मैंने देखा है बंटते बंटते कितने छोटे हो गए हैं ज़मीन के आकार
बर्लिन के दीवार गिरने के वक़्त
खुश हुआ था क्योंकि युद्ध के दिनों में खड़ी की गयी दीवार
लोगों से पूछ कर खड़ी नहीं की गयी थी
बाबरी मस्ज़िद ढहाए जाने के समय मैं खुश नहीं हुआ था
क्योंकि लोगों से पूछ कर बाबरी नहीं ढहायी गयी थी
बाबरी मस्ज़िद ढह रही थी लेकिन कई रैडक्लिफ़ रेखाएं खिंची जा रही थीं
जैसे कि दीवार हिंदुस्तान के कौमों के बीच चुनी जा रही है
ढहाने से उठते धूल के गुबार में आग और धुंआ की लपटें थीं
वह आग अमेरिका तक फ़ैल गयी है और भारतीयों को झुलसा रही है
हिन्दू हिन्दू हो गए हैं और विश्वविजय पर निकल गए हैं
इस आग में हिन्दू झुलस रहे हैं
रोज़ हैवानियत की दीवारें हमारे बीच खड़ी हो रही हैं
इन दीवारों के बीच क़ैद की जा रही है मनुष्यता
मनुष्यता घिर गई है चारों तरफ़ से दीवारों से
हमें बहुत संभल संभल के चलना पड़ता है मेड़ों पर
संतुलन किसी भी वक़्त बिगड़ सकता है।
ट्यूबिंग
अज़ीब खेल है मृत्युबोध का ट्यूबिंग
टायर के ट्यूब में बैठ कर बर्फीली ढलुवा सतह पर फिसलना
मैं बैठ गया हूँ ट्यूब में संचालक ने रस्सी ढील दी है
ट्यूब फिसलने लगता है रफ़्तार पकड़ता हुआ
चक्राकार ट्यूब चरखी की तरह नाचने लगता है फिसलता हुआ
अचानक मुझे लगा मेरी लीला समाप्त हो चुकी है
तभी ट्यूब का फिसलना और चक्कर लगाना रुक गया
मैं लौटा अपने आप में
लोगों ने कहा फिर चलो
मृत्युबोध के खेल में शामिल होने फिर पहुंचा
सोच कर कि मेरा डर कम हो चुका है
रफ़्तार से फिसलते और नाचते ट्यूब में बैठा हुआ अचानक
अपने होने की अनुभूति खो बैठा
मंज़िल तक पहुँच कर बाहर आया
सोच कर कि दोबारा इस खेल में शामिल नहीं होना है
तीबारा चला गया
लेकिन ढलान के उसी बिंदु पर पहुँच कर उसी मृत्युबोध से सामना
मृत्युबोध और मृत्यु में कोई फ़र्क नहीं
लोगों ने कहा आप मज़बूत दिल इंसान हैं
फिर से इस खेल में आपको होना चाहिए शामिल
वह ढलान मुझे सुरंग जैसा लगने लगा
मेरा डर बहुत कम हो गया था
लेकिन मृत्युबोध से हर बार गुजरना और बच जाना अच्छा नहीं लगा
ट्यूबिंग के लिए चौथी बार नहीं गया।
ढलानों पर बहुत से लोग खड़े थे
बर्फ़ की सफ़ेद सी ताज़ी चादर पर फिसलने के लिए
इससे अनजान कि कितनी गहरी मृत्युबोध होने वाली है
मृत्युबोध मृत्यु से कम नहीं
इसी बोध के दरम्यान किसी रोज़ घटित होती है मृत्यु
यह एक खेल है खेल में मृत्यु नहीं होती है
हार होती है या जीत
हार भी मृत्युबोध है
हारते हारते एक दिन हम हारना छोड़ देते हैं।
मुझे लगता है हमें लोकतंत्र के ट्यूब में बैठा कर
लोकतंत्र की सतह पर फिसलने के लिए छोड़ दिया गया है।
कई नींदों के बाद
देर रात तक नींद की प्रतीक्षा में लेटा रहता हूँ
रात गहरी हो जाती है नींद नहीं
एक के बाद एक विचार आता है अनवरत अनियंत्रित
एक अधिकारी का चेहरा आकार लेता है
जिसके हर ईशारे पर नतमस्तक होता रहा
लोगों के चेहरे आते हैं मस्तिष्क के परदे पर
ख़ामोश और गिड़गिड़ाते हुए
उनकी ख़मोशी बोलती हुई
उनकी गिड़गिड़ाहट मुझे गालियां देती हुई
एक चेहरा मुझे चिढ़ाता है कहता हुआ
'तुम एक अन्यायी हो' 'भ्रष्टाचारी हो'
सुख और सुविधा के लिए
एक नौकरी बचाने के लिए
'नतमस्तक होते रहे'
एक चेहरा उभरता है शायद वह मेरी मां है
कहती हुई बहुएं गली देती हैं
मुझे ले चलो अपने साथ
मैं कह देता जनवरी बीतने दो
इस बीच कई बार नींद आई, टूटी
चेहरे उभरते रहे कहते हुए
'चलो सो जाओ। तुम्हें अब
मुक्त करते हैं डरावनी शक्लों से
नतमस्तकता एक बुरा विचार है।'
रात बीत गयी नींद झलमलाती रही मेरी आंखों में
कई नींदों के बाद भी।
दुरुस्त कविताएं
तुम्हारी जर्जर जिंदगी को देखता हूँ
और कविताएं ठीक करता हूँ
अपनी जिंदगी के कुछ हसीन पलों को याद करता हूँ
और कविताएं ठीक करता हूँ
सरकार की पसंदगी को याद करता हूँ
और कविताएं ठीक करता हूँ
संपादकों को याद करता हूँ
और अपनी कविताएं ठीक करता हूँ
मां को याद करता हूँ और सोचता हूँ
उसके बारे में ठीक से कभी नहीं सोचा
तो कविताएं ठीक नहीं की
कविताएं दुरुस्त हो गई हैं
लेकिन दिक़्क़त यह है कि इन कविताओं में
तुम्हारी जिंदगी नहीं है, ना मां झलक रही है
ठीक होते होते कविताएं
इतनी ठीक हो गई हैं
कि मेरी नहीं रह गई हैं।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 9868628602



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