श्रीकान्त पाण्डेय का आलेख ‘मरघट में तूं साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार?’
श्रीकान्त पाण्डेय राजनीतिज्ञों के लिए साहित्य और संस्कृति हमेशा एक टेढ़ीखीर होती है । शौकिया तौर पर वे इसे आजमा कर मुसीबत को आमंत्रण दे देते हैं । हमारे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को बिहार के चुनावों के समय दिनकर की याद आई है । अब साहब को यह याद क्यों आयी है इसे समझना थोडा भी मुश्किल नहीं । भाई, जाति-धर्म का मामला है । सामने पहाड़ सा खड़ा बिहार का चुनाव है । ऐसे में उन्हें लगता है कि दिनकर के हवाले से इन जातियों को सहज ही साधा जा सकता है । लेकिन उन्हें शायद यह नहीं पता कि साहित्य संकीर्णताओं से मुक्त करने का काम करता है । न केवल उस रचनाकार को बल्कि समकालीन समाज को भी । और साहित्य भी वही कालजयी साबित होता है जो समय की सरहदों को लांघ कर लम्बे समय तक अपनी उपादेयता बनाए रखता है । कबीर, तुलसी और रहीम जैसे मध्ययुगीन रचनाकार आज भी अगर प्रासंगिक बने हुए हैं तो यह उनकी रचनाओं की ही ताकत है । प्रधानमन्त्री मोदी के इस दिनकर-प्रेम को विश्लेषित करने का प्रयास किया है युवा आलोचक श्रीकान्त पाण्डेय ने । तो आइए पढ़ते हैं श्रीकान्त का यह आलेख ‘मरघट में तूं साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार?’ ...