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चौथी राम यादव का आलेख 'अवतारवाद का समाजशास्त्र और लोकधर्म'

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  कल अचानक यह खबर मिली कि प्रोफेसर चौथी राम यादव नहीं रहे। यह खबर स्तब्ध कर देने वाली थी। उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर गांव जाने की तस्वीर लगाई थी। कौन जानता था कि उनकी यह अन्तिम यात्रा साबित होगी। वे जीवन के अंतिम पल तक सक्रिय रहे। उन का मुख्य काम हजारी प्रसाद द्विवेदी और छायावाद पर है। उनकी पुस्तक ‘हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन’ अपने विषय के सम्यक् मूल्यांकन में सक्षम है। उनकी पुस्तक ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण और छायावादी काव्य’ शोध और आलोचना का मिश्रित रूप है। प्रो. चौथीराम यादव ने भारत के बहुसंख्यक समाज के हितों को ध्यान में रखकर दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श और बहुजन समाज के सामाजिक-साहित्यिक-राजनीतिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट पक्षधरता को प्रकट किया। भाषणों के अतिरिक्त इन चार पुस्तकों में उनके ऐसे विचारों को पढ़ा जा सकता है – ‘लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा’, ‘उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज’, ‘लोक और वेद आमने-सामने’, ‘आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य’. उत्पीड़ित समुदायों के प्रतिरोध को साहित्य, संस्कृति, धर्म और राजनीति में चिह्नित करती हुई ये पुस्तकें न्यायपूर्ण समाज की स्थापना...