रवि रंजन का आलेख 'जैव-राजनीति और आत्मीयता का क्षरण'
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| श्रीप्रकाश शुक्ल |
कोरोना महामारी मनुष्यता के समक्ष एक ऐसी विपदा ले कर आई जिसने समूचे प्रतिमानों को बदल कर रख दिया। कोरोना से ग्रसित मनुष्य महज रोगी बन कर रह गया। ऐसा रोगी जिससे सभी को आवश्यक रूप से दूर रहना था। जीवन की क्षणभंगुरता उजागर हो गई। तमाम लोगों की मौतें अस्पतालों में ही हुई। इस दौरान पूँजीवाद की निर्ममता भी स्पष्ट हो गई। रवि रंजन अपने आलेख में लिखते हैं 'महामारी के दौरान पूँजीवाद का एक बड़ा अंतर्विरोध उजागर हुआ। जिन श्रमिकों के श्रम पर पूरी अर्थव्यवस्था निर्भर थी, वही सबसे अधिक असुरक्षित सिद्ध हुए। भारत सहित अनेक देशों में लाखों श्रमिकों का विस्थापन हुआ। वे पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए विवश हुए। यह दृश्य मार्क्सवादी अर्थों में श्रम और पूँजी के संबंधों की नग्न वास्तविकता को सामने लाता है।' इस कोरोना वह आधार बना कर कवि श्री प्रकाश शुक्ला ने एक महत्वपूर्ण कविता लिखी ‘उत्तर- कोरोना...’। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन ने आलोचना की जो नई पद्धति विकसित की है वह अपने आप में एक प्रतिमान है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता को समझने के क्रम में वे दुनिया के कई महत्वपूर्ण आलोचकों और उनकी अवधारणाओं के जरिए जो पड़ताल करते हैं वह मानीखेज है। जाँ-फ़्राँस्वा ल्योतार, ज्याँ बोद्रिया, मार्टिन हाइडेगर, अल्बेर कामू, जॉर्जियो अगाम्बेन, अंतोनियो ग्राम्शी, ज़िग्मुंट बाउमन, ब्रूनो लातूर, जेन बेनेट, सिग्मंड फ्रायड, कार्ल युंग जैसे विचारकों के हवाले से रवि रंजन इस कविता के पद बंधों को समझने की कोशिश करते हैं। इस क्रम में रवि रंजन अमरीकी कवयित्री किटी ओ'मीरा और सिमोन आर्मिटेज की कोरोना पर केन्द्रित कविताओं के जरिए श्री प्रकाश शुक्ल की कविता का तुलनात्मक विश्लेषण करते हैं। कवि व गद्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल की 12 अप्रैल 2020 को लिखी व उनके कविता संग्रह ‘वाया नई सदी’ (2022) में प्रकाशित कविता ‘उत्तर-कोरोना’ पर केन्द्रित यह आलेख प्रतिष्ठित समालोचक व हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त) रवि रंजन ने लिखा है। यह कविता सबसे पहले ‘पहली बार ब्लॉग’ पर 12 जुलाई 2020 को प्रकाशित हुई थी और आलोचक ने यही से सन्दर्भ लिया है। रविरंजन जी ने पाठ आधारित आलोचना के क्रम में इधर के वर्षो किसी विशेष कविता पर केन्द्रित कई महत्वपूर्ण आलेख लिखे हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख 'जैव-राजनीति और आत्मीयता का क्षरण'।
(श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘उत्तर-कोरोना’ कविता का पुनर्पाठ)
'जैव-राजनीति और आत्मीयता का क्षरण'
रवि रंजन
समकालीन हिंदी कविता में श्रीप्रकाश शुक्ल का नाम उन रचनाकारों में प्रमुख है जिन्होंने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और आलोचनात्मक दृष्टि के बल पर विशिष्ट पहचान अर्जित की है। महाकवि निराला से शब्दावली उधार ले कर कहें, तो वे “समधीतशास्त्र काव्यालोचन” रचनाकार हैं। उनकी संवेदना और समझ भारतीय काव्यशास्त्र, काव्य-परंपरा, लोकजीवन और समकालीन यथार्थ के गहरे अंतर्संबंधों से निर्मित हुई है। उनकी कविताएँ एक ओर सांस्कृतिक स्मृतियों और लोक-अनुभवों से संवाद करती हैं, तो दूसरी ओर वर्तमान समय की जटिलताओं को भी गहन मानवीय दृष्टि से अभिव्यक्त करती हैं।
उनके प्रमुख कविता संग्रहों में 'अपनी तरह के लोग', 'जहाँ सब शहर नहीं होता', 'बोली बात', 'रेत में आकृतियाँ', 'ओरहन और अन्य कविताएँ', 'कवि ने कहा' (चयन), 'क्षीरसागर में नींद', ‘वाया नई सदी’ व ‘झुकना किसी को रोपना है’ (चयन) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कविता के साथ-साथ उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में भी महती योगदान दिया है, जिसके तहत उनकी कृतियाँ 'साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौंदर्य', 'नामवर की धरती', राग रविदास व 'भक्ति का लोक वृत्त' और 'रविदास की कविताई' प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'परिचय' का संपादन भी किया है। ‘देस देस परदेस’ नाम से उनके यात्रा संस्मरणों की एक पुस्तक भी प्रकाशित है। उनकी कविताओं पर केन्द्रित ‘कवि की बात’ व ‘असहमतियों के वैभव के कवि श्रीप्रकाश शुक्ल’ जैसी पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उन पर केन्द्रित संस्मरणों की एक पुस्तक बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल भी प्रकाशित हो चुकी है। उनकी साहित्यिक सेवाओं और विशिष्ट रचनात्मकता के लिए उन्हें 'बोली बात' संग्रह पर वर्तमान साहित्य का मलखान सिंह सिसोदिया पुरस्कार, 'रेत में आकृतियाँ' पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का नरेश मेहता कविता पुरस्कार तथा 'ओरहन् और अन्य कविताएँ' पर विजय देव नारायण साही कविता पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान से सम्मानित श्रीप्रकाश शुक्ल वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।
‘उत्तर-कोरोना...’ शीर्षक श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता सिर्फ़ महामारी के अनुभव का काव्यात्मक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह समकालीन सभ्यता की उन गहरी दरारों को उजागर करती है जिन्हें कोरोना ने सिर्फ़ निर्मित नहीं किया, बल्कि दृश्य बना दिया। यह कविता उस ऐतिहासिक क्षण का साक्ष्य है जब मनुष्य की समस्त वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, राजनीतिक संरचनाएँ, आर्थिक व्यवस्थाएँ और सांस्कृतिक निश्चितताएँ एक सूक्ष्म जैविक सत्ता के सामने अस्थिर प्रतीत होने लगीं। महामारी ने केवल शरीरों को संक्रमित नहीं किया; उसने मनुष्य की आत्म-छवि, उसकी सामूहिकता, उसके संबंधों और उसकी स्वतंत्रता-बोध को भी गहरे स्तर पर प्रभावित किया। इसीलिए ‘उत्तर-कोरोना’ का प्रश्न केवल महामारी के बाद की दुनिया का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस मनुष्य का प्रश्न है जो भय, निगरानी, नियंत्रण और अकेलेपन के बीच अपने अस्तित्व को पुनर्परिभाषित करने के लिए विवश है।
आधुनिक सत्ता की कार्यप्रणाली को समझने वाले विचारकों ने बार-बार इस तथ्य की ओर संकेत किया है कि समकालीन शासन-व्यवस्थाएँ केवल कानून और दंड के माध्यम से संचालित नहीं होतीं; वे जीवन की रक्षा, स्वास्थ्य की सुरक्षा और जनकल्याण के नाम पर मनुष्य के शरीर, व्यवहार और संबंधों को भी विनियमित करती हैं। महामारी के दौरान यह प्रक्रिया अभूतपूर्व रूप से दृश्य हुई। मनुष्य का शरीर चिकित्सा, प्रशासन और निगरानी की अनेक संरचनाओं के बीच स्थित हो गया। उसके चलने, मिलने, स्पर्श करने, बोलने और यहाँ तक कि साँस लेने तक के तरीके सार्वजनिक चिंता और नियंत्रण के विषय बन गए। जीवन की रक्षा की यह राजनीति धीरे-धीरे जीवन के प्रबंधन की राजनीति में रूपांतरित होती दिखाई दी। इसी संदर्भ में जैव-राजनीति का प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो उठता है, क्योंकि वह हमें यह समझने का अवसर प्रदान करता है कि आधुनिक सत्ता मनुष्य के जीवन में किस प्रकार प्रवेश करती है और उसे किस प्रकार संचालित करती है।
किन्तु, इस कविता की सबसे गहरी चिंता केवल सत्ता या महामारी नहीं है। उसकी वास्तविक चिंता उस मानवीय संसार के क्षरण से जुड़ी है जिसे आत्मीयता, निकटता, विश्वास और साझेदारी निर्मित करते हैं। कविता की केन्द्रीय पंक्ति—“आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी”—दरअसल समकालीन समय की सबसे बड़ी सांस्कृतिक त्रासदी का उद्घाटन करती है। यहाँ संकट जीवन के नष्ट हो जाने का नहीं, बल्कि जीवन के मानवीय अर्थों के क्षीण हो जाने का है। मनुष्य जीवित रहेगा, परन्तु वह दूसरों से भावनात्मक रूप से दूर होता जाएगा; संबंध बने रहेंगे, लेकिन उनमें ऊष्मा नहीं होगी; संवाद होगा, लेकिन उसमें आत्मीय उपस्थिति का अभाव होगा। महामारी के दौरान अनिवार्य हुई सामाजिक दूरी कविता में एक व्यापक सांस्कृतिक रूपक का रूप ग्रहण कर लेती है, जहाँ मनुष्य का अकेलापन केवल भौतिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत और सामाजिक भी हो जाता है।
‘उत्तर-कोरोना’ इसी बदलती हुई दुनिया का काव्यात्मक मानचित्र है। यह भविष्य की भविष्यवाणी नहीं करती, बल्कि वर्तमान के भीतर सक्रिय उन प्रवृत्तियों को पहचानती है जो मनुष्य को धीरे-धीरे एक निगरानी-नियंत्रित, भय-संचालित और आत्मीयताविहीन संसार की ओर ले जा रही हैं। कविता का महत्त्व इसी में निहित है कि वह महामारी को एक जैविक घटना से आगे बढ़ा कर एक दार्शनिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न में रूपांतरित कर देती है। वह हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि जीवन की रक्षा और जीवन के अर्थ के बीच क्या संबंध है; सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे संभव है; तथा क्या ऐसी दुनिया, जिसमें शरीर सुरक्षित हों लेकिन आत्मीयता अनुपस्थित हो, वास्तव में मानवीय दुनिया कही जा सकती है।
इन्हीं प्रश्नों की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत आलेख श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता ‘उत्तर-कोरोना...’ का पुनर्पाठ करते हुए जैव-राजनीति और आत्मीयता के क्षरण के अंतर्संबंधों की पड़ताल करेगा। साथ ही यह समझने का प्रयास करेगा कि महामारी के अनुभव ने किस प्रकार आधुनिक सत्ता, मानवीय संबंधों और सभ्यतागत मूल्यों के बारे में हमारी स्थापित धारणाओं को चुनौती दी है तथा कविता इन चुनौतियों को किस प्रकार एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक विमर्श में रूपांतरित करती है।
कविता का मूल पाठ नीचे प्रस्तुत है :
उत्तर-कोरोना....
(आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी)!
मैंने तुम्हें फ़ोन किया और तुम मुझसे उत्तर माँग रहे हो
समय सुबह का है
सूरज की चमक थोड़ी गाढ़ी हुई ही थी
कि नदियों के स्वच्छ होते जल और
वातावरण में बढ़ती हुई ऑक्सीजन के बीच
आसमान में निचाट सन्नाटा है
और तुम कहते हो
यह उत्तर-कोरोना तो नहीं है!
कितना विकट समय है कि जब दुनिया का सारा विज्ञान
एक रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है
लगभग एक ब्रह्म की सूक्ष्म सत्ता की तरह वह इधर-उधर छिटक रहा है
अपने स्वरूप को लगातार बदलता हुआ हर क्षण धरती का ख़ून पी रहा है
तुम मुझसे उत्तर की अपेक्षा कर रहे हो
अब जबकि वर्तमान से बाहर आने की उम्मीद कम ही बची है
चिड़ियों की बढ़ती चहचहाहट के बीच
दुनिया के सारे देवता असहाय और असुरक्षित हो गए हैं
अल्लाह, ईसा, मूसा और ईश्वर
सबके सब मुँह बाँध कर अपने-अपने कमरे में क़ैद हैं
और पुतलियों की जाती हुई गति से दुनिया को आते हुए देख रहे हैं
तुम कोरोना के उत्तर से उत्तर कोरोना की बात क्यों कर रहे हो!
क्या तुम जानते हो
यह आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर है
जिसमें संत कवियों की एक बार फिर से वापसी हो रही है
जब उन्होंने कहा था कि इस जगत में एक ही ब्रह्म की सत्ता है
बाक़ी सब मिथ्या है!
ठीक इसी जगह पर दुनिया बदल रही है
और बदलते हुए कोरोना के चरित्र में
ख़ुद के लिए एक उत्तर खोज रही है
शायद उत्तर कोरोना का उत्तर—
जहाँ अभिव्यक्तियाँ होंगी
लेकिन आस्वाद न होगा
लोग लौट रहे होंगे
लेकिन लौटने के लिए कुछ न होगा
आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी
एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी
यह चिंताओं और शंकाओं के संघर्ष का दौर होगा
जिसमें हर कुछ एक भय की तरह समर्पित होगा
जहाँ स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा
और संघर्ष के मोर्चे पर हर बार विवेक ही मारा जाएगा
आदतें कुछ ऐसी होंगी
एक ख़ास जंग के जैसी होंगी
जीवन निर्वात होगा
संघर्ष हवाओं का होगा
सत्ताएँ उदार होंगी
शासन सख़्त होगा
देश का हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर
शासक बहुत उदार होंगे
लेकिन उनमें सब कुछ को पाने की एक जल्दी होगी
लगभग इस समय के वाचाल मीडिया की तरह
जहाँ ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीख़ता है
अद्भुत होगा यह समय कि अद्भुत जैसा कुछ नहीं होगा
केवल एक पुरातन की स्मृति होगी
और सभ्यता के एक वायरल इफ़ेक्ट जैसा
खोने और पाने का संघर्ष होगा
हर नए विकल्प को अनचाही आस्थाओं का आदिम स्वर देता हुआ
यह असहाय कथाओं के सर्जन का समय होगा
जिसमें कथाएँ तो बहुत होंगी
काव्यत्व उतना ही कम होगा
स्मृति में मनोरंजन की सुविधाएँ होंगी
आकांक्षा में ढेर सारी दुविधाओं के बीच
यह एक दूसरे की तारीफ़ का दौर होगा
जिसमें सराहनाएँ भी शातिर होंगी
जहाँ एक ताक़त दूसरे को आज़मा रही होगी
खोए हुए को पाने की ज़िद में
दुनिया दौड़ रही होगी
जिसकी ज़द में आई हुई सभ्यता
अपनी संपूर्णता में कराह रही होगी
यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा
क्या तुम जानते हो
वायरस का कोई पूर्व-काल नहीं होता
उसका सिर्फ़ एक वर्तमान होता है
जो सदा एक उत्तर में बदल रहा होता है
यह विचार नहीं
व्यवहार समझता है
और तुम्हारा व्यवहार है कि
इसकी आकंठ उलाहनाओं के बीच
पूँजी की ताक़त के सामने सदा झुका रहता है
एक स्थायी विनम्रता की तरह!
“उत्तर-कोरोना...” महामारी पर लिखी गई उन श्रेष्ठ कविताओं में है जो किसी तात्कालिक संकट का केवल दस्तावेज़ नहीं बनतीं, बल्कि उस संकट के भीतर छिपे हुए सभ्यतागत, दार्शनिक और राजनीतिक संकेतों को पहचानने का प्रयास करती हैं। यह कविता कोरोना महामारी के दौरान लिखी गई भविष्य-दृष्टि (prophetic vision) की कविता है, किन्तु इसकी वास्तविक रुचि महामारी में नहीं, बल्कि उस मनुष्य में है जो महामारी के बाद बचेगा। इसलिए कविता का केंद्रीय प्रश्न वायरस नहीं, मनुष्य की नियति है; रोग नहीं, उसके बाद निर्मित होने वाली दुनिया है।
कविता की शुरुआत ही एक संवादात्मक संरचना से होती है—“मैंने तुम्हें फ़ोन किया और तुम मुझसे उत्तर माँग रहे हो।” यहाँ ‘उत्तर’ शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह उत्तर एक प्रश्न का जवाब भी है और ‘उत्तर-कोरोना’ अर्थात् पोस्ट-कोविड समय भी। कवि इस शब्द के द्वयर्थ से एक वैचारिक खेल रचता है। मित्र उत्तर चाहता है, लेकिन कवि समझता है कि वास्तविक प्रश्न कोरोना का समाधान नहीं, बल्कि उस भविष्य का स्वरूप है जो कोरोना के बाद जन्म लेने वाला है। इस प्रकार कविता का आरम्भ ही भाषा के भीतर छिपे दार्शनिक अर्थ-संकेतों से होता है।
प्रारम्भिक दृश्य अत्यंत रोचक है। नदियाँ स्वच्छ हो रही हैं, वातावरण में ऑक्सीजन बढ़ रही है, लेकिन आसमान में “निचाट सन्नाटा” है। यहाँ प्रकृति और मनुष्य के बीच का विरोधाभास उपस्थित होता है। मनुष्य घरों में कैद है, इसलिए प्रकृति स्वस्थ हो रही है। आधुनिक सभ्यता जिस विकास पर गर्व करती थी, वही विकास प्रकृति के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। महामारी के दौरान पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि मनुष्य का ठहरना पृथ्वी के लिए राहत है। इस अर्थ में कविता आधुनिकता के मानवकेन्द्रित अहंकार पर एक सूक्ष्म प्रहार करती है।
कवि जब कहता है कि
“दुनिया का सारा विज्ञान
एक रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है”,
तब वह विज्ञान-विरोध नहीं रच रहा होता। वह आधुनिक ज्ञान-व्यवस्था की सीमाओं की ओर संकेत कर रहा है। मनुष्य ने चन्द्रमा तक पहुँचने, परमाणु विभाजन करने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित करने जैसी उपलब्धियाँ अर्जित कीं, किन्तु एक सूक्ष्म जीव ने उसकी सम्पूर्ण शक्ति को चुनौती दे दी। वायरस का वर्णन “एक ब्रह्म की सूक्ष्म सत्ता” के रूप में करना विशेष ध्यान देने योग्य है। यह तुलना वैज्ञानिक नहीं, दार्शनिक है। भारतीय अद्वैत परंपरा में ब्रह्म निराकार, सूक्ष्म और सर्वव्यापी है। वायरस भी अदृश्य है, सर्वत्र फैल रहा है और अपनी उपस्थिति से समस्त जीवन को प्रभावित कर रहा है। कवि यहाँ विडम्बनापूर्ण ढंग से उस सत्ता की तुलना ब्रह्म से करता है जिससे आधुनिक मनुष्य स्वयं को अधिक शक्तिशाली समझने लगा था।
कविता का एक अत्यंत प्रभावशाली बिन्दु वह है जहाँ कवि कहता है कि “दुनिया के सारे देवता असहाय और असुरक्षित हो गए हैं।” अल्लाह, ईसा, मूसा और ईश्वर—सभी अपने-अपने कमरों में कैद हैं। यह दृश्य धार्मिक आस्थाओं के विरुद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा निर्मित उन निश्चितताओं के विरुद्ध है जिन पर वह संकट के समय भरोसा करता रहा है। महामारी ने विज्ञान, धर्म, राजनीति और अर्थव्यवस्था—सभी को एक साथ प्रश्नांकित कर दिया था। कवि इसी सार्वभौमिक असुरक्षा को व्यक्त करता है। देवताओं का मुँह बाँध कर कमरे में बैठना उस मनुष्य का ही रूपक है जिसने स्वयं देवताओं को अपनी असहायता की प्रतिमा में बदल दिया है।
यहीं से कविता एक गहरे दार्शनिक मोड़ पर पहुँचती है। कवि कहता है कि यह “आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर” है और संत कवियों की वापसी हो रही है। कबीर, दादू, रैदास या अन्य निर्गुण संतों की परम्परा संसार की नश्वरता और एकमात्र सत्य की सत्ता पर बल देती रही है। जब कवि कहता है कि “एक ही ब्रह्म की सत्ता है, बाकी सब मिथ्या है”, तब वह महामारी के अनुभव को भारतीय आध्यात्मिक परम्परा से जोड़ देता है। यहाँ संसार की स्थायित्व-कल्पना टूटती है। जो अटल समझा जाता था वह अस्थिर सिद्ध होता है। महामारी ने आधुनिक मनुष्य को पुनः उसकी सीमितता का बोध कराया।
कविता का सबसे मार्मिक और स्मरणीय कथन है—“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी।” यह केवल एक पंक्ति नहीं, पूरी कविता का केन्द्रीय सूत्र है। महामारी ने सामाजिक दूरी को जीवन की अनिवार्यता बना दिया था। मनुष्य जीवित रहेगा, उसकी आत्मा भी रहेगी, लेकिन आत्मीयता—स्पर्श, निकटता, सहज विश्वास और मानवीय ऊष्मा—धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगी। यह भविष्यवाणी आज के डिजिटल युग में और अधिक अर्थपूर्ण प्रतीत होती है। मनुष्य आभासी रूप से पहले से अधिक जुड़ा हुआ है, लेकिन भावनात्मक रूप से अधिक अकेला है। कविता इस विडम्बना को महामारी के बहाने पहचानती है।
“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—यह पंक्ति आधुनिक अस्तित्व की गहन त्रासदी को व्यक्त करती है। सामान्यतः हम कहते हैं कि आत्मा देह में निवास करती है, किन्तु यहाँ आत्मा देह को ढो रही है। जीवन का भार इतना बढ़ गया है कि आत्मा स्वयं बोझ ढोने वाली सत्ता में बदल गई है। यह अस्तित्ववादी निराशा का क्षण है जहाँ जीवन का अर्थ संकटग्रस्त हो जाता है।
कविता में आगे राजनीतिक चेतना तीव्र हो जाती है।
“सत्ताएँ उदार होंगी
शासन सख़्त होगा”
यह पंक्ति आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की विडम्बना को उद्घाटित करती है। सत्ता स्वयं को कल्याणकारी, सहृदय और जनहितैषी घोषित करेगी, लेकिन नियंत्रण और निगरानी की व्यवस्थाएँ अधिक कठोर होती जाएँगी। महामारी के दौरान दुनिया भर में राज्य ने अभूतपूर्व निगरानी और अनुशासनात्मक उपाय अपनाए थे। कवि इसी प्रवृत्ति को भविष्य में और गहरा होते हुए देखता है।
इसी क्रम में
“हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर”
जैसी पंक्तियाँ अत्यंत अर्थगर्भित हैं। नागरिक से अपेक्षा की जाएगी कि वह राष्ट्र, व्यवस्था और संकट के लिए बलिदान दे, लेकिन उसकी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा नहीं होगी। यह आधुनिक राष्ट्र-राज्य की उस संरचना की आलोचना है जिसमें नागरिकता का गौरव तो है, पर नागरिक का संरक्षण नहीं।
मीडिया पर की गई टिप्पणी भी उल्लेखनीय है।
“जहाँ ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है”
यह केवल समाचार चैनलों की आलोचना नहीं, बल्कि सूचना-संस्कृति की आलोचना है। सूचना का प्रवाह तेज़ है, पर अर्थ का उत्पादन नहीं हो रहा। नए संकटों को भी पुराने शोर में बदल दिया जाता है। मीडिया वास्तविक संवाद की जगह निरन्तर उत्तेजना पैदा करता है।
कविता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष उसका सांस्कृतिक अवलोकन है। कवि कहता है कि कथाएँ तो बहुत होंगी, लेकिन काव्यत्व कम होगा। इसका आशय यह है कि अनुभवों का उत्पादन बढ़ेगा, पर उनकी कलात्मक और मानवीय गहराई कम होती जाएगी। स्मृति मनोरंजन में बदल जाएगी और आकांक्षाएँ दुविधाओं में। यह उपभोक्तावादी संस्कृति की आलोचना है जहाँ जीवन के अनुभव भी बाज़ार की वस्तुओं में बदल जाते हैं।
कविता बार-बार यह रेखांकित करती है कि उत्तर-कोरोना संसार में मनुष्य खोए हुए को पाने की ज़िद में भागेगा। यह दौड़ केवल आर्थिक पुनर्निर्माण की नहीं होगी; यह उस सामान्यता को पुनः प्राप्त करने की दौड़ होगी जो पहले ही संकटग्रस्त थी। कवि समझता है कि सभ्यता जिस सामान्य जीवन को पुनः पाना चाहती है, उसी सामान्य जीवन ने इस संकट की भूमि तैयार की थी। इसलिए वापसी की आकांक्षा स्वयं एक समस्या है।
अंतिम अंश में कविता वायरस की प्रकृति पर विचार करती है।
“वायरस का कोई पूर्वकाल नहीं होता
उसका सिर्फ़ एक वर्तमान होता है।”
यह कथन जैविक तथ्य से अधिक दार्शनिक रूपक है। वायरस निरन्तर रूप बदलता है, वर्तमान में जीता है और अनुकूलन करता है। इसके विपरीत मनुष्य स्मृति और भविष्य की योजनाओं में उलझा रहता है। वायरस की शक्ति उसकी वर्तमानता में है। इस प्रकार वायरस यहाँ केवल जैविक सत्ता नहीं, बल्कि परिवर्तन के सिद्धांत का प्रतीक बन जाता है।
कविता का समापन पूँजी और व्यवहार के संबंध पर होता है। कवि का संकेत है कि महामारी ने केवल जैविक संकट उत्पन्न नहीं किया, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था की संरचनात्मक असमानताओं को भी उजागर किया। मनुष्य बार-बार पूँजी की शक्ति के सामने झुकता है और अपनी विनम्रता को नैतिक गुण समझता है। यह “स्थायी विनम्रता” वस्तुतः अधीनता का रूप है। इस प्रकार कविता अंततः महामारी को एक आर्थिक-राजनीतिक प्रश्न में रूपांतरित कर देती है।
यह कविता कोरोना का आख्यान कम और आधुनिक सभ्यता का आलोचना अधिक है। इसमें भविष्यवाणी, व्यंग्य, दार्शनिक चिन्तन, राजनीतिक आलोचना और सांस्कृतिक आत्मपरीक्षण एक साथ उपस्थित हैं। कविता का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह महामारी को केवल चिकित्सा-समस्या के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे मनुष्य, सत्ता, आस्था, स्मृति, आत्मीयता और पूँजी के जटिल संबंधों को समझने के अवसर में बदल देती है। “आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी” केवल उत्तर-कोरोना समय का कथन नहीं, बल्कि उस समूची आधुनिक सभ्यता की त्रासद पहचान है जो तकनीकी रूप से अधिक जुड़ी हुई है, किन्तु मानवीय रूप से लगातार अधिक अकेली होती जा रही है।
इस कविता किसी एक विमर्श या आलोचनात्मक पद्धति में समाहित नहीं होती। इसका पाठ जितना महामारी के अनुभव से जुड़ा है, उतना ही आधुनिकता, सत्ता, पूँजी, आस्था, स्मृति, भाषा और मनुष्य की बदलती हुई नियति से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इसके मूल पाठ पर अनेक आलोचनात्मक और सामाजिक-दार्शनिक दृष्टियों से गंभीर चर्चा संभव है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता “उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” को यदि उत्तर-आधुनिकता (Postmodernism) के परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाए, तो यह केवल महामारी के अनुभव का काव्यात्मक दस्तावेज़ नहीं रह जाती, बल्कि आधुनिक सभ्यता के उन वैचारिक स्तंभों के विघटन की कथा बन जाती है जिन पर पिछले तीन सौ वर्षों से मनुष्य का विश्वास टिका हुआ था।
यह कविता उस ऐतिहासिक क्षण को दर्ज करती है जहाँ ज्ञान, विज्ञान, धर्म, राष्ट्र, विकास, प्रगति और मानव-केन्द्रीयता जैसे आधुनिकता के महान आख्यान (Grand Narratives) अपनी निर्विवाद सत्ता खोने लगते हैं। इस अर्थ में यह कविता महामारी का आख्यान कम और उत्तर-आधुनिक अस्थिरता, संशय और विखंडन का आख्यान अधिक है।
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| Jean-François Lyotard |
उत्तर-आधुनिक विचारक जाँ-फ़्राँस्वा ल्योतार (Jean-François Lyotard) ने उत्तर-आधुनिक स्थिति को "महान आख्यानों के प्रति अविश्वास" (Incredulity toward Metanarratives) कहा था। आधुनिकता ने मनुष्य को यह विश्वास दिलाया था कि विज्ञान मानवता को निरंतर बेहतर भविष्य की ओर ले जाएगा, तर्क अंधविश्वास का अंत कर देगा, विकास जीवन को अधिक सुखी बना देगा और राष्ट्र-राज्य सुरक्षा की गारंटी देगा। महामारी ने इन सभी विश्वासों को एक साथ संकटग्रस्त कर दिया। कविता में जब कवि कहता है कि
"दुनिया का सारा विज्ञान
एक रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है",
तब यह विज्ञान का निषेध नहीं है, बल्कि उसकी सर्वशक्तिमान छवि का विखंडन है। विज्ञान यहाँ असफल नहीं हुआ है; बल्कि विज्ञान के बारे में मनुष्य द्वारा निर्मित सर्वज्ञता के मिथक का पतन हुआ है। यही उत्तर-आधुनिक स्थिति है जहाँ कोई भी ज्ञान-व्यवस्था अंतिम और पूर्ण नहीं रह जाती।
इसी प्रकार धर्म का आख्यान भी कविता में विघटित होता है।
"अल्लाह, ईसा, मूसा और ईश्वर
सबके सब मुँह बाँधकर अपने-अपने कमरे में क़ैद हैं"
यह दृश्य धार्मिक आस्थाओं का उपहास नहीं करता, बल्कि उन आध्यात्मिक निश्चितताओं की सीमाओं को उद्घाटित करता है जिनके सहारे मनुष्य स्वयं को सुरक्षित समझता था। महामारी ने पहली बार वैश्विक स्तर पर यह अनुभव पैदा किया कि संकट के सामने न तो विज्ञान तत्काल उत्तर दे पा रहा है और न ही धर्म। उत्तर-आधुनिकता का मूल आग्रह भी यही है कि कोई एक सत्य, कोई एक केंद्र, कोई एक अंतिम आश्वासन संभव नहीं है। कविता इसी बहुकेंद्रीय और अनिश्चित संसार का निर्माण करती है।
कविता का पूरा विन्यास ही उत्तर-आधुनिक विखंडन का उदाहरण है। इसमें कोई रैखिक कथा नहीं है, कोई व्यवस्थित समाधान नहीं है, कोई आदर्श भविष्य नहीं है। कवि किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता; वह संभावनाओं, आशंकाओं और अनुमानित स्थितियों का एक कोलाज रचता है। यह कोलाज-धर्मिता उत्तर-आधुनिक लेखन की एक विशिष्ट विशेषता है। कविता भविष्य का कोई सुव्यवस्थित नक्शा नहीं देती, बल्कि बिखरे हुए अनुभवों, आशंकाओं और स्मृतियों के माध्यम से एक ऐसे संसार की रचना करती है जहाँ अर्थ लगातार खिसक रहा है।
उत्तर-आधुनिकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है—केंद्र का विघटन। आधुनिकता में मनुष्य स्वयं को सृष्टि का केंद्र मानता था। लेकिन कविता में एक सूक्ष्म वायरस सम्पूर्ण मानव सभ्यता को नियंत्रित करने लगता है। यह स्थिति मनुष्य की केंद्रीयता को नष्ट कर देती है। एक अदृश्य जैविक सत्ता मनुष्य, राज्य, धर्म और अर्थव्यवस्था—सभी को प्रभावित कर रही है। यहाँ मनुष्य अब इतिहास का निर्माता नहीं, बल्कि अनेक शक्तियों के जाल में फँसी हुई एक सत्ता है। यह दृष्टि उत्तर-मानवतावादी (Post-humanist) विमर्श से भी जुड़ती है, जो उत्तर-आधुनिकता की एक महत्त्वपूर्ण परिणति है।
कविता में उपस्थित "उत्तर" शब्द भी उत्तर-आधुनिक अर्थ-बहुलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। "उत्तर" एक जवाब भी है और "उत्तर-कोरोना" भी। भाषा का यही बहुवचनात्मक चरित्र उत्तर-आधुनिक चिंतन का आधार है। शब्द किसी एक निश्चित अर्थ की ओर संकेत नहीं करते; वे अर्थों के एक अंतहीन खेल (Play of Signification) में भाग लेते हैं। कविता इसी भाषिक अनिश्चितता को रचनात्मक शक्ति में बदल देती है। कवि से उत्तर माँगा जा रहा है, लेकिन वह जानता है कि इस समय कोई अंतिम उत्तर संभव नहीं। यही उत्तर-आधुनिक संशय है।
कविता में बार-बार उपस्थित अनिश्चितता भी उल्लेखनीय है। आधुनिकता का संसार भविष्य के प्रति आश्वस्त था; उत्तर-आधुनिक संसार भविष्य के प्रति संशयग्रस्त है।
"यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा"
यह पंक्ति भविष्य के प्रति गहरे अविश्वास को व्यक्त करती है। यहाँ नई शुरुआत का विचार भी अपनी पारंपरिक आशावादिता खो देता है। भविष्य एक वादा नहीं, बल्कि एक प्रश्न बन जाता है। उत्तर-आधुनिक संवेदना में भविष्य का यही संकट उपस्थित रहता है।
कविता में वास्तविकता और आभास के बीच की सीमाएँ भी धुँधली होती दिखाई देती हैं। "केवल एक पुरातन की स्मृति होगी"—यह कथन स्मृति और वर्तमान के बीच के संबंध को जटिल बनाता है। उत्तर-आधुनिक सिद्धांतकार ज्याँ बोद्रिया (Jean Baudrillard) ने जिस 'अनुकरण' (Simulation) और 'अति-यथार्थ' (Hyper-reality) की चर्चा की थी, उसके आलोक में यह कविता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। महामारी के दौरान मनुष्य का अनुभव प्रत्यक्ष जीवन से अधिक मीडिया, आँकड़ों, स्क्रीन और डिजिटल संचार के माध्यम से निर्मित हो रहा था। वास्तविकता स्वयं एक मीडिया-निर्मित अनुभव में बदल रही थी।
"ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है"
यह पंक्ति सूचना-उद्योग द्वारा निर्मित इसी कृत्रिम वास्तविकता की आलोचना है।
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| Jean Baudrillard |
उत्तर-आधुनिकता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष है—विरोधाभासों का सह-अस्तित्व। कविता में भी हम देखते हैं कि सत्ताएँ उदार हैं और शासन सख़्त है; लोग लौट रहे हैं लेकिन लौटने के लिए कुछ नहीं है; आत्माएँ हैं लेकिन आत्मीयता नहीं है; कथाएँ बहुत हैं लेकिन काव्यत्व कम है। ये सभी द्वंद्वात्मक स्थितियाँ किसी तार्किक समाधान तक नहीं पहुँचतीं। वे एक साथ मौजूद रहती हैं। उत्तर-आधुनिक संसार का यही स्वभाव है जहाँ विरोधी सत्य एक साथ जीवित रहते हैं।
विशेष रूप से "आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी" पंक्ति को उत्तर-आधुनिक सामाजिक संरचना की सबसे तीखी आलोचनाओं में पढ़ा जा सकता है। उत्तर-आधुनिक समाज में संचार के साधन बढ़ते जाते हैं, लेकिन संबंधों की ऊष्मा कम होती जाती है। मनुष्य नेटवर्कों से जुड़ा हुआ है, समुदायों से नहीं। वह सूचना से घिरा हुआ है, आत्मीयता से नहीं। महामारी ने इस स्थिति को और अधिक स्पष्ट कर दिया। सामाजिक दूरी एक चिकित्सकीय आवश्यकता थी, लेकिन कविता उसे एक सांस्कृतिक रूपक में बदल देती है। भविष्य का मनुष्य शारीरिक रूप से जीवित रहेगा, पर उसकी आत्मीयता क्षीण हो जाएगी।
कविता में बार-बार लौटती हुई स्मृति भी उत्तर-आधुनिक अनुभव का हिस्सा है। वर्तमान इतना अस्थिर है कि मनुष्य बार-बार अतीत की ओर लौटना चाहता है। लेकिन वह अतीत भी वास्तविक नहीं, बल्कि स्मृति द्वारा निर्मित एक सांस्कृतिक संरचना है। इसलिए कविता में पुरातन की स्मृति मौजूद है, किन्तु उसकी पुनर्प्राप्ति संभव नहीं। यह उत्तर-आधुनिक विषाद (Nostalgia) का रूप है जहाँ अतीत की चाह तो है, पर उसके पुनर्निर्माण की संभावना नहीं।
कविता की संरचना में भविष्यवाणी और विडम्बना का जो सम्मिश्रण है, वह भी उत्तर-आधुनिक है। कवि किसी दार्शनिक ग्रंथ की तरह निष्कर्ष नहीं देता; वह संभावित संसार की झलकियाँ प्रस्तुत करता है। इन झलकियों में भय है, व्यंग्य है, संशय है और आत्मालोचन भी। कविता किसी अंतिम सत्य की घोषणा नहीं करती, बल्कि सत्य की अस्थिरता को उद्घाटित करती है।
यह कविता उत्तर-आधुनिकता की उस केंद्रीय अनुभूति को मूर्त रूप देती है जिसमें मनुष्य अपने ही बनाए हुए ज्ञान, सत्ता, विकास और प्रगति के ढाँचों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश हो जाता है। महामारी यहाँ केवल एक जैविक घटना नहीं है; वह आधुनिकता की वैचारिक संरचनाओं की परीक्षा है। विज्ञान, धर्म, राष्ट्र, मीडिया, पूँजी और आत्मीयता—सभी अपनी-अपनी निश्चितताओं से वंचित हो कर एक अनिश्चित संसार में प्रवेश करते हैं। इसीलिए यह कविता उत्तर-कोरोना समय की भविष्यवाणी भर नहीं, बल्कि उत्तर-आधुनिक स्थिति का काव्यात्मक रूपक है, जहाँ उत्तरों की जगह प्रश्न अधिक हैं, केंद्रों की जगह विखंडन अधिक है, और निश्चितताओं की जगह अनिश्चितता ही नया सत्य बनकर उभरती है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता “उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” का अस्तित्ववादी (Existentialist) पाठ हमें महामारी की सामाजिक या राजनीतिक व्याख्या से आगे ले जाकर मनुष्य की उस मूल स्थिति तक पहुँचाता है जहाँ वह स्वयं को एक ऐसे ब्रह्मांड में खड़ा पाता है जो उसके दुःख, भय और प्रश्नों के प्रति मौन है। यह कविता महामारी की नहीं, बल्कि उस अस्तित्वगत संकट की कविता है जिसे महामारी ने उजागर कर दिया। कोरोना यहाँ एक जैविक घटना भर नहीं है; वह मनुष्य की उन सभी सांत्वनाओं के टूटने का प्रतीक है जिनके सहारे वह अपने जीवन को अर्थवान मानता आया था।
अस्तित्ववाद का मूल प्रश्न यह है कि जब संसार में कोई पूर्वनिर्धारित अर्थ, कोई अंतिम सत्य और कोई सुनिश्चित आश्वासन नहीं है, तब मनुष्य अपने अस्तित्व को कैसे समझे? कविता का आरंभ ही इस प्रश्न से होता है। “मैंने तुम्हें फ़ोन किया और तुम मुझसे उत्तर माँग रहे हो”—यह साधारण-सा संवाद अस्तित्ववादी स्तर पर अत्यंत अर्थपूर्ण हो उठता है। यहाँ मनुष्य उत्तर चाहता है, लेकिन कवि जानता है कि जिस संकट में वे हैं, वहाँ कोई अंतिम उत्तर संभव नहीं। यह स्थिति जाँ-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) के उस विचार की याद दिलाती है कि मनुष्य एक ऐसी दुनिया में फेंक दिया गया है जहाँ उसे अपने प्रश्नों के उत्तर स्वयं गढ़ने पड़ते हैं। संसार उसे कोई तैयार अर्थ नहीं देता।
कविता में बार-बार उपस्थित असुरक्षा का भाव अस्तित्ववादी संवेदना का केंद्रीय तत्व है। आधुनिक मनुष्य ने विज्ञान, धर्म, राष्ट्र और प्रगति की अवधारणाओं के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित समझना शुरू कर दिया था। लेकिन महामारी ने इन सभी संरचनाओं की सीमाएँ उजागर कर दीं। जब कवि कहता है कि “दुनिया का सारा विज्ञान” वायरस के सामने असहाय दिखाई देता है, तब वह केवल वैज्ञानिक संकट की बात नहीं कर रहा होता; वह मनुष्य की उस गहरी असुरक्षा की ओर संकेत कर रहा होता है जिसे आधुनिकता ने लंबे समय तक ढँक रखा था। अस्तित्ववादी चिंतक मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) ने कहा था कि मनुष्य मूलतः “मृत्यु की ओर उन्मुख अस्तित्व” (Being-towards-death) है। महामारी ने इस सत्य को अचानक अत्यंत प्रत्यक्ष बना दिया। मृत्यु कोई दूरस्थ संभावना नहीं रही; वह दैनिक अनुभव का हिस्सा बन गई।
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| Martin Heidegger |
इसी कारण कविता में मृत्यु-बोध एक गहरी अंतर्धारा की तरह उपस्थित है। किंतु यह मृत्यु का प्रत्यक्ष चित्रण नहीं करती; यह उस मानसिक स्थिति को व्यक्त करती है जो मृत्यु की संभावना के तीव्र बोध से उत्पन्न होती है। “चिंताओं और शंकाओं के संघर्ष का दौर होगा”—यह पंक्ति केवल सामाजिक तनाव का वर्णन नहीं है, बल्कि उस अस्तित्वगत चिंता (Existential Angst) का संकेत है जिसे हाइडेगर और सोरेन कीर्केगार्द (Søren Kierkegaard) मनुष्य की मूल अवस्था मानते थे। यह चिंता किसी विशेष वस्तु का भय नहीं है; यह स्वयं अस्तित्व की अनिश्चितता का अनुभव है।
कविता का सबसे मार्मिक और अस्तित्ववादी कथन है—“आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी।” इस एक पंक्ति में आधुनिक मनुष्य की समूची त्रासदी सिमट आती है। अस्तित्ववाद में मनुष्य मूलतः अकेला है। वह दूसरों के बीच रहते हुए भी अपनी आंतरिक सत्ता में अकेला रहता है। महामारी के दौरान यह अकेलापन भौतिक रूप से भी अनुभव किया गया। लेकिन कविता इससे आगे जाकर कहती है कि भविष्य में आत्माएँ तो रहेंगी, पर आत्मीयता नहीं। अर्थात् अस्तित्व तो रहेगा, लेकिन संबंधों का अर्थ क्षीण हो जाएगा। मनुष्य जीवित रहेगा, पर वह उस भावात्मक संसार से कट जाएगा जो उसके जीवन को अर्थ प्रदान करता है।
यह स्थिति अल्बेर कामू (Albert Camus) के ‘अब्सर्ड’ (Absurd) की अवधारणा से गहरे रूप में जुड़ती है। कामू के अनुसार मनुष्य अर्थ की खोज करता है, लेकिन संसार उसे कोई उत्तर नहीं देता। इसी टकराव से अब्सर्ड की स्थिति उत्पन्न होती है। कविता में भी मनुष्य लगातार उत्तर खोज रहा है, लेकिन उत्तर अनुपस्थित हैं। वायरस का प्रसार, देवताओं की असहायता, विज्ञान की सीमाएँ, भविष्य की अनिश्चितता—सब मिलकर एक ऐसे संसार की रचना करते हैं जहाँ मनुष्य के प्रश्नों और संसार की चुप्पी के बीच की दूरी बढ़ती जाती है। यही अब्सर्ड की स्थिति है।
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| Albert Camus |
“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—यह पंक्ति अस्तित्ववादी दृष्टि से अत्यंत गहन है। सामान्यतः हम शरीर को आत्मा का वाहक मानते हैं, लेकिन यहाँ संबंध उलट गया है। आत्मा ही शरीर को ढो रही है। यह उलटाव महज़ काव्यात्मक नहीं है; यह जीवन के बोझिल हो जाने का संकेत है। अस्तित्ववादी साहित्य में जीवन को कई बार एक ऐसे भार के रूप में चित्रित किया गया है जिसे मनुष्य ढोता रहता है। यहाँ आत्मा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शरीर का बोझ उठाने को विवश है। जीवन आनंद या मुक्ति नहीं, बल्कि एक कठिन वहन बन गया है।
कविता में उपस्थित भविष्य-दृष्टि भी अस्तित्ववादी है। सामान्यतः भविष्य आशा का क्षेत्र माना जाता है, लेकिन यहाँ भविष्य एक भयावह अनिश्चितता के रूप में उपस्थित है।
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा।”
यह कथन केवल सामाजिक विघटन का संकेत नहीं है; यह उस अस्तित्वगत शून्यता का बोध है जहाँ संभावनाएँ तो हैं, पर उन्हें अर्थ देने वाला मनुष्य अनुपस्थित है। अस्तित्ववाद में अर्थ कोई बाहरी सत्ता नहीं देती; अर्थ मनुष्य स्वयं निर्मित करता है। यदि मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा, उसकी आत्मीयता और उसकी सृजनात्मकता नष्ट हो जाए, तो नई शुरुआत भी अर्थहीन हो जाती है।
कविता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है—अकेलेपन का सामूहिकीकरण। सामान्यतः अकेलापन एक निजी अनुभव माना जाता है, लेकिन महामारी ने उसे सामूहिक अनुभव बना दिया। पूरी दुनिया एक साथ भय, अनिश्चितता और अलगाव का अनुभव कर रही थी। यह स्थिति अस्तित्ववादी साहित्य की उस दुनिया की याद दिलाती है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने संकट में अकेला है, किंतु उस अकेलेपन की संरचना सार्वभौमिक है। कविता इसी वैश्विक अकेलेपन को दर्ज करती है।
अस्तित्ववादी चिंतन में प्रामाणिकता (Authenticity) और अप्रामाणिकता (Inauthenticity) का प्रश्न भी केंद्रीय है। हाइडेगर के अनुसार अधिकांश मनुष्य भीड़, परंपरा और सामाजिक अपेक्षाओं में खोकर अप्रामाणिक जीवन जीते हैं। महामारी ने अचानक मनुष्य को स्वयं से सामना करने के लिए विवश कर दिया। घरों में बंद मनुष्य पहली बार अपने अस्तित्व, अपने भय और अपनी नश्वरता के साथ अकेला रह गया। कविता इस आत्म-सामना की स्थिति को कई स्तरों पर व्यक्त करती है। देवताओं की असहायता और विज्ञान की सीमाएँ अंततः मनुष्य को अपने भीतर लौटने के लिए बाध्य करती हैं।
कविता में उपस्थित
“वायरस का कोई पूर्वकाल नहीं होता
उसका सिर्फ़ एक वर्तमान होता है”
जैसी पंक्तियाँ भी अस्तित्ववादी अर्थ ग्रहण करती हैं। अस्तित्ववाद वर्तमान क्षण की तीव्रता पर बल देता है। महामारी ने मनुष्य को उसके वर्तमान में लौटा दिया। भविष्य की योजनाएँ और अतीत की उपलब्धियाँ अचानक अप्रासंगिक हो गईं। केवल वर्तमान बचा—और वह भी भय से भरा हुआ वर्तमान। वायरस इसी वर्तमान की सत्ता का प्रतीक बन जाता है।
कविता का सबसे गहरा अस्तित्ववादी पक्ष यह है कि वह किसी समाधान की ओर नहीं जाती। न वह धार्मिक सांत्वना देती है, न वैज्ञानिक आश्वासन, न राजनीतिक मुक्ति का स्वप्न। वह मनुष्य को उसकी असुरक्षा, उसकी नश्वरता, उसके अकेलेपन और उसके अर्थ-संकट के साथ छोड़ देती है। यही अस्तित्ववादी साहित्य की पहचान है। सार्त्र, कामू और कीर्केगार्द के यहाँ भी मनुष्य को अंततः अपने अस्तित्व का भार स्वयं उठाना पड़ता है।
इस प्रकार “उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” को अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता का वास्तविक विषय महामारी नहीं, बल्कि मनुष्य की वह मूल दशा है जो महामारी के कारण उजागर हुई। यह कविता दिखाती है कि सभ्यता की सारी उपलब्धियों के पीछे एक भयभीत, अकेला, नश्वर और अर्थ-खोजी मनुष्य खड़ा है। जब उसके चारों ओर के सभी आश्वासन टूट जाते हैं, तब वह स्वयं अपने अस्तित्व के प्रश्न से सामना करता है। कविता उसी निर्णायक क्षण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है—एक ऐसे क्षण की, जहाँ उत्तर अनुपस्थित हैं, लेकिन प्रश्न पहले से कहीं अधिक तीव्र और अधिक मानवीय हो उठे हैं।
“उत्तर-कोरोना...’ को यदि मिशेल फूको (Michel Foucault) की सत्ता-मीमांसा (Foucauldian Analysis) के आलोक में पढ़ा जाए, तो यह महामारी की काव्यात्मक प्रतिक्रिया भर नहीं रह जाती, बल्कि आधुनिक सत्ता के बदलते हुए स्वरूप, उसके अनुशासनात्मक तंत्रों, निगरानी-व्यवस्थाओं और जैव-राजनीतिक नियंत्रणों की एक अत्यंत सूक्ष्म और दूरदर्शी आलोचना बन जाती है। यह कविता उस ऐतिहासिक क्षण को दर्ज करती है जहाँ सत्ता केवल कानून, दंड और हिंसा के माध्यम से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा, संरक्षण और कल्याण के नाम पर मनुष्य के जीवन के सबसे निजी क्षेत्रों तक प्रवेश करती दिखाई देती है।
फूको के अनुसार आधुनिक सत्ता का चरित्र मध्यकालीन राजसत्ता से भिन्न है। पुरानी सत्ता का अधिकार “मारने” का था, जबकि आधुनिक सत्ता का लक्ष्य “जीवन का प्रबंधन” करना है। वह शरीरों को नियंत्रित करती है, जनसंख्या को व्यवस्थित करती है, स्वास्थ्य को विनियमित करती है और जीवन को उत्पादक बनाए रखने के लिए निरंतर हस्तक्षेप करती है। फूको ने इस प्रक्रिया को जैव-राजनीति (Biopolitics) कहा था। महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने पहली बार इतने व्यापक स्तर पर इस जैव-राजनीतिक सत्ता को सक्रिय रूप में देखा। मनुष्य का शरीर अचानक एक राजनीतिक प्रश्न बन गया। कौन संक्रमित है, कौन स्वस्थ है, कौन बाहर जा सकता है, कौन नहीं जा सकता—ये सब राज्य, प्रशासन और चिकित्सा-तंत्र के नियंत्रण के विषय बन गए। कविता इसी अनुभव को भविष्य की ओर विस्तारित करती है।
कविता की सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्तियों में से एक है
“सत्ताएँ उदार होंगी
शासन सख़्त होगा।”
यह एक साधारण राजनीतिक टिप्पणी नहीं है; यह आधुनिक सत्ता की उस विडम्बनापूर्ण संरचना को उद्घाटित करती है जिसे फूको ने बार-बार रेखांकित किया था। आधुनिक सत्ता स्वयं को क्रूर या दमनकारी के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। वह स्वयं को कल्याणकारी, मानवीय और संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है। वह कहती है कि वह जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा और भलाई के लिए कार्य कर रही है। लेकिन इसी उदारता के भीतर नियंत्रण की एक जटिल व्यवस्था छिपी होती है। महामारी के दौरान लॉकडाउन, क्वारंटीन, स्वास्थ्य-निगरानी, संपर्क-अनुसरण और सार्वजनिक आचरण के नियम इसी प्रक्रिया के उदाहरण थे। सत्ता का चेहरा उदार था, लेकिन उसका संचालन अत्यंत कठोर अनुशासन के माध्यम से हो रहा था। कविता इस विरोधाभास को बहुत तीक्ष्णता से पहचानती है।
फूको की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है—अनुशासनात्मक सत्ता (Disciplinary Power)। यह सत्ता शरीरों को नियंत्रित करती है और उन्हें आज्ञाकारी, उपयोगी तथा व्यवस्थित बनाती है। महामारी के दौरान मनुष्य को सिखाया गया कि कैसे चलना है, कितनी दूरी रखनी है, कब घर से निकलना है, कब नहीं निकलना है, किससे मिलना है, किससे नहीं मिलना है। शरीर का प्रत्येक व्यवहार नियमों के अधीन हो गया। कविता में बार-बार लौटता हुआ भय और नियंत्रण का वातावरण इसी अनुशासनात्मक सत्ता की ओर संकेत करता है। यहाँ मनुष्य केवल वायरस से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार के निरंतर नियमन से भी घिरा हुआ है।
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| Michel Foucault |
फूको के प्रसिद्ध “पैनॉप्टिकॉन” (Panopticon) सिद्धांत के आलोक में भी कविता का पाठ अत्यंत रोचक हो जाता है। पैनॉप्टिकॉन एक ऐसी संरचना है जिसमें व्यक्ति को लगातार यह महसूस होता है कि उस पर निगरानी रखी जा रही है, भले ही वास्तव में कोई उसे देख रहा हो या नहीं। महामारी के दौरान निगरानी का यह भाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ा। स्वास्थ्य-ऐप, यात्रा-इतिहास, संपर्क-अनुसरण, पहचान-परीक्षण और डिजिटल डेटा-संग्रह ने मनुष्य को एक निरंतर दृष्टि के अधीन ला खड़ा किया। कविता भले ही इन तकनीकी माध्यमों का प्रत्यक्ष उल्लेख न करती हो, लेकिन उसका पूरा भविष्य-दर्शन इसी बढ़ती हुई निगरानी-संस्कृति की ओर संकेत करता है।
“देश का हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर”
यह पंक्ति भी फूकोवादी दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक राज्य अपने नागरिकों को संकट के समय सैनिकों की तरह अनुशासित और समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है। उनसे त्याग, अनुशासन और आज्ञाकारिता की अपेक्षा की जाती है। लेकिन वही नागरिक सत्ता की व्यवस्थाओं के भीतर सबसे अधिक असुरक्षित भी रहता है। यहाँ नागरिक एक स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि जनसंख्या का एक प्रबंधित घटक बन जाता है। फूको के अनुसार आधुनिक राज्य नागरिक को अधिकारों के आधार पर नहीं, बल्कि सांख्यिकीय इकाई के रूप में देखने लगता है। कविता इसी विडम्बना को व्यक्त करती है।
कविता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह स्वास्थ्य को भी सत्ता के उपकरण के रूप में देखने की संभावना खोलती है। फूको ने बताया था कि आधुनिक सत्ता चिकित्सा, मनोविज्ञान और स्वास्थ्य-विज्ञान जैसी संस्थाओं के माध्यम से काम करती है। वह सीधे आदेश देने के बजाय विशेषज्ञता के ज्ञान का उपयोग करती है। महामारी के दौरान स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों ने सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करने का काम किया। यहाँ नियंत्रण किसी सैनिक आदेश के माध्यम से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सलाह और चिकित्सकीय निर्देशों के माध्यम से स्थापित हुआ। यही जैव-राजनीति की शक्ति है—वह दमन को संरक्षण के रूप में प्रस्तुत करती है।
“जहाँ स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा”—यह पंक्ति भी फूकोवादी अर्थ ग्रहण करती है। अनुशासनात्मक सत्ता का सबसे सफल रूप वह है जहाँ व्यक्ति बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि भीतर से नियमों को स्वीकार कर लेता है। वह स्वयं अपने ऊपर निगरानी रखने लगता है। महामारी के दौरान लोगों ने केवल सरकारी आदेशों के कारण नहीं, बल्कि स्वयं की सुरक्षा के लिए भी अनेक नियमों का पालन किया। सत्ता का यही आंतरिकीकरण (Internalization) फूको के विश्लेषण का केंद्रीय बिंदु है। कविता भविष्य में इसी स्वीकृत अनुशासन के विस्तार की आशंका व्यक्त करती है।
कविता में उपस्थित मीडिया-संबंधी टिप्पणी भी फूकोवादी विमर्श से जुड़ती है।
“ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है”
यह केवल समाचार-माध्यमों की आलोचना नहीं है। आधुनिक सत्ता केवल पुलिस, प्रशासन और कानून के माध्यम से नहीं चलती; वह ज्ञान-उत्पादन के माध्यम से भी संचालित होती है। कौन-सी सूचना महत्त्वपूर्ण है, किस भय को प्रमुखता दी जानी चाहिए, किस व्यवहार को आदर्श माना जाना चाहिए—इन सबका निर्माण मीडिया करता है। फूको ने ज्ञान और सत्ता के संबंध को अत्यंत गहराई से समझाया था। उनके अनुसार ज्ञान कभी निष्पक्ष नहीं होता; वह सत्ता-संबंधों से जुड़ा होता है। कविता में मीडिया की आलोचना इसी ज्ञान-सत्ता गठजोड़ की आलोचना बन जाती है।
“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी”—इस प्रसिद्ध पंक्ति को भी फूकोवादी संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। आधुनिक सत्ता व्यक्तियों को अलग-अलग इकाइयों में विभाजित करती है ताकि उन्हें अधिक आसानी से नियंत्रित किया जा सके। सामुदायिकता, साझा अनुभव और सामूहिक प्रतिरोध की संभावनाएँ कमज़ोर पड़ती हैं। महामारी ने शारीरिक दूरी को आवश्यक बनाया, लेकिन कविता इसे एक व्यापक सांस्कृतिक रूपक में बदल देती है। भविष्य का मनुष्य जीवित रहेगा, लेकिन उसके संबंधों की संरचना बदल जाएगी। वह दूसरों के साथ रहेगा, पर उनके निकट नहीं रहेगा। इस प्रकार आत्मीयता का क्षय भी सत्ता की सूक्ष्म कार्यप्रणालियों से जुड़ जाता है।
कविता का अंतिम भाग, जहाँ पूँजी और व्यवहार का संबंध सामने आता है, फूको की सरकारिता (Governmentality) की अवधारणा से भी जोड़ा जा सकता है। सरकारिता का आशय केवल शासन नहीं, बल्कि उन समस्त प्रक्रियाओं से है जिनके माध्यम से व्यक्ति स्वयं को संचालित करता है। आधुनिक सत्ता केवल आदेश नहीं देती; वह ऐसी मानसिकता निर्मित करती है जिसमें व्यक्ति स्वयं को सत्ता के अनुकूल ढाल लेता है।
“पूँजी की ताक़त के सामने सदा झुका रहता है
एक स्थायी विनम्रता की तरह”
यह वही स्थिति है जहाँ नियंत्रण बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक हो चुका है।
इस प्रकार फूकोवादी परिप्रेक्ष्य में यह कविता महामारी के अनुभव का वर्णन भर नहीं करती, बल्कि आधुनिक सत्ता के उस रूप का विश्लेषण करती है जो स्वास्थ्य, सुरक्षा, कल्याण और संरक्षण के नाम पर जीवन के प्रत्येक स्तर में प्रवेश करता है। यह कविता दिखाती है कि भविष्य का संकट केवल वायरस का संकट नहीं होगा; वह स्वतंत्रता और सुरक्षा, आत्मीयता और निगरानी, नागरिकता और अनुशासन, जीवन और उसके प्रबंधन के बीच के तनाव का संकट होगा। इस अर्थ में “उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” आधुनिक जैव-राजनीतिक युग का एक अत्यंत सूक्ष्म काव्यात्मक आख्यान है, जहाँ मनुष्य केवल रोग से नहीं, बल्कि उस सत्ता से भी जूझ रहा है जो उसके जीवन को बचाने के नाम पर उसे निरंतर नियंत्रित करती चली जाती है।
इतालवी दार्शनिक जॉर्जियो अगाम्बेन (Giorgio Agamben) की ‘अपवाद-स्थिति’ (State of Exception) की अवधारणा के आलोक में “उत्तर-कोरोना...” को यदि पढ़ा जाए, तो यह कविता महामारी के सामाजिक प्रभावों का सामान्य विवरण न रह कर आधुनिक सत्ता और नागरिकता के बीच बदलते संबंधों की एक गहरी राजनीतिक-दार्शनिक व्याख्या बन जाती है। यह कविता उस ऐतिहासिक क्षण का दस्तावेज़ है जब जीवन की रक्षा के नाम पर स्वतंत्रता सीमित होती है, सुरक्षा के नाम पर निगरानी बढ़ती है और अस्थायी आपातकाल धीरे-धीरे सामान्य शासन-व्यवस्था का रूप लेने लगता है।
अगाम्बेन के अनुसार अपवाद-स्थिति (State of Exception) वह अवस्था है जिसमें किसी संकट, युद्ध, आतंकवादी खतरे, महामारी या राष्ट्रीय आपदा के नाम पर राज्य सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं को स्थगित कर देता है। नागरिक अधिकारों का आंशिक या पूर्ण निलंबन कर दिया जाता है, लेकिन यह सब कानून के बाहर नहीं, बल्कि कानून की रक्षा के नाम पर किया जाता है। यही इस अवधारणा की सबसे बड़ी विडम्बना है। कानून को बचाने के लिए कानून को ही अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया जाता है। अगाम्बेन का तर्क है कि आधुनिक राज्य बार-बार ऐसी अपवाद-स्थितियाँ निर्मित करता है और धीरे-धीरे उन्हें स्थायी शासन-प्रक्रिया में बदल देता है।
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| Giorgio Agamben |
कोरोना महामारी इस अवधारणा को समझने का सबसे स्पष्ट उदाहरण बनी। लॉकडाउन, कर्फ़्यू, आवागमन पर नियंत्रण, सार्वजनिक स्थलों का बंद होना, सामूहिक आयोजनों पर प्रतिबंध और नागरिकों की गतिविधियों की निगरानी—ये सब ऐसे उपाय थे जिन्हें स्वास्थ्य-सुरक्षा के नाम पर लागू किया गया। कविता इसी ऐतिहासिक अनुभव को केवल दर्ज नहीं करती, बल्कि उसके भविष्यगत परिणामों की भी पड़ताल करती है। इस दृष्टि से कविता महामारी की नहीं, बल्कि महामारी के बहाने निर्मित नई राजनीतिक संस्कृति की कविता है।
कविता की आरंभिक पंक्तियों में ही एक असामान्य संसार उपस्थित हो जाता है। प्रकृति जीवंत हो रही है, नदियाँ स्वच्छ हो रही हैं, ऑक्सीजन बढ़ रही है, लेकिन मनुष्य की दुनिया सन्नाटे में डूब गई है। यह वही क्षण है जहाँ सामान्य सामाजिक जीवन निलंबित हो चुका है। सड़कें खाली हैं, यात्राएँ रुक गई हैं, सार्वजनिक जीवन स्थगित है। यह स्थिति किसी युद्धकाल जैसी है, किंतु यहाँ शत्रु अदृश्य है। अगाम्बेन की दृष्टि से यही वह क्षण है जहाँ समाज एक अपवाद-स्थिति (State of Exception) में प्रवेश करता है। सामान्य जीवन अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया जाता है और असाधारण व्यवस्थाएँ लागू हो जाती हैं।
कविता का एक महत्त्वपूर्ण कथन है—
“सत्ताएँ उदार होंगी
शासन सख़्त होगा।”
यह पंक्ति अगाम्बेन के पूरे राजनीतिक चिंतन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। आधुनिक राज्य स्वयं को दमनकारी के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। वह नागरिकों की सुरक्षा और जीवन-रक्षा का दावा करता है। लेकिन इसी सुरक्षा की प्रक्रिया में वह अभूतपूर्व नियंत्रण स्थापित कर लेता है। महामारी के दौरान लोगों ने अनेक प्रतिबंधों को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि उन्हें बताया गया कि यह उनके जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक है। अगाम्बेन इसी बिंदु पर प्रश्न उठाते हैं—क्या सुरक्षा की माँग अंततः स्वतंत्रता के क्षरण का माध्यम बन सकती है? कविता इस प्रश्न को सीधे न पूछ कर उसके परिणामों की झलक दिखाती है।
“जहाँ स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा”—यह पंक्ति भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अपवाद-स्थिति (State of Exception) का सबसे प्रभावी रूप वह है जहाँ नागरिक स्वयं असाधारण उपायों को स्वाभाविक मानने लगते हैं। वे प्रतिरोध नहीं करते क्योंकि संकट वास्तविक है और भय व्यापक है। परिणामस्वरूप अस्थायी नियंत्रण धीरे-धीरे सामान्य सामाजिक व्यवहार में बदल जाता है। कविता इसी स्वीकृति की संस्कृति को पहचानती है। यहाँ भय केवल एक भावनात्मक स्थिति नहीं है; वह सत्ता का एक राजनीतिक संसाधन बन जाता है।
अगाम्बेन के चिंतन में एक और केंद्रीय अवधारणा है—नग्न जीवन (Bare Life)। इसका आशय ऐसे जीवन से है जो केवल जैविक अस्तित्व तक सीमित कर दिया गया हो। जब राज्य नागरिक को केवल जीवित रखने की चिंता करता है और उसके राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक आयाम गौण हो जाते हैं, तब मनुष्य “नग्न जीवन” में परिवर्तित हो जाता है। कविता की प्रसिद्ध पंक्ति—“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी”—इसी स्थिति की ओर संकेत करती है। मनुष्य जीवित रहेगा, लेकिन उसका सामाजिक जीवन, उसकी निकटता, उसके संबंध और उसका साझा मानवीय संसार क्षीण हो जाएगा। अस्तित्व बचा रहेगा, किंतु जीवन की गुणवत्ता और उसकी आत्मीयता नष्ट हो जाएगी।
इसी संदर्भ में “एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी” पंक्ति भी अत्यंत अर्थपूर्ण हो जाती है। यहाँ मनुष्य का अस्तित्व लगभग जैविक इकाई में बदल गया है। उसकी प्राथमिक चिंता केवल जीवित रहना है। अगाम्बेन के अनुसार आधुनिक सत्ता मनुष्य को धीरे-धीरे ऐसे ही जैविक जीवन में सीमित कर देती है। नागरिक, विचारक, मित्र, प्रेमी या समुदाय का सदस्य होने से पहले वह एक ऐसा शरीर बन जाता है जिसकी सुरक्षा और निगरानी की जानी है। कविता में यह भयावह संभावना भविष्य की छवि के रूप में सामने आती है।
“देश का हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर”
यह पंक्ति भी अपवाद-स्थिति (State of Exception) के संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। संकट के समय राज्य नागरिकों से अनुशासन, त्याग और आज्ञाकारिता की अपेक्षा करता है। उनसे कहा जाता है कि वे सामूहिक सुरक्षा के लिए कुछ अधिकारों का त्याग करें। लेकिन यही प्रक्रिया नागरिकता की वास्तविक शक्ति को कमज़ोर कर सकती है। व्यक्ति को एक सक्रिय नागरिक के बजाय एक आज्ञाकारी प्रजा या सैनिक में रूपांतरित किया जा सकता है। कविता इस अंतर्विरोध को तीक्ष्ण रूप में सामने लाती है।
कविता में बार-बार उपस्थित भय का वातावरण भी अगाम्बेन की अवधारणा से जुड़ता है। भय यहाँ केवल वायरस का भय नहीं है; यह उस सामाजिक संरचना का भय है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति संभावित खतरा बन सकता है। संपर्क, निकटता और सामूहिकता—जो सामान्यतः सामाजिक जीवन के आधार होते हैं—संदेह के विषय बन जाते हैं। परिणामस्वरूप मनुष्य दूसरों से दूर होने लगता है। यह दूरी केवल शारीरिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी है। इसीलिए कविता में आत्मीयता के क्षय का प्रश्न इतना केंद्रीय बन जाता है।
कविता का भविष्य-दर्शन भी अगाम्बेन की चिंता से मेल खाता है। कवि केवल महामारी के वर्तमान को नहीं देख रहा; वह उस संसार की कल्पना कर रहा है जहाँ महामारी के दौरान विकसित हुई नियंत्रण-व्यवस्थाएँ सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाएँगी।
“आदतें कुछ ऐसी होंगी
एक ख़ास जंग के जैसी होंगी”
यह पंक्ति बताती है कि असाधारण परिस्थितियाँ धीरे-धीरे सामान्य सामाजिक व्यवहार का रूप ले सकती हैं। यही अपवाद-स्थिति (State of Exception) का सबसे खतरनाक पहलू है—अपवाद का सामान्यीकरण।
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा”
इस पंक्ति को भी अगाम्बेन की दृष्टि से पढ़ा जा सकता है। यदि मनुष्य केवल सुरक्षा, निगरानी और जैविक अस्तित्व की चिंता तक सीमित हो जाए, तो वह नई सामाजिक और राजनीतिक संभावनाओं का सृजनकर्ता नहीं रह जाता। वह केवल संरक्षित जीवन का वाहक बन कर रह जाता है। कविता इसी संभावना के प्रति गहरी चिंता व्यक्त करती है।
कविता में मीडिया, सत्ता, भय और नागरिकता का जो जटिल संबंध उपस्थित है, वह भी अपवाद-स्थिति (State of Exception) की राजनीति को समझने में सहायक है। संकट की परिस्थितियों में सूचना और भय का प्रसार नियंत्रण की प्रक्रियाओं को वैधता प्रदान करता है। नागरिक सुरक्षा के बदले अधिक नियंत्रण स्वीकार करने लगते हैं। कविता इस पूरी प्रक्रिया को प्रत्यक्ष राजनीतिक भाषा में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय संकेतों के माध्यम से व्यक्त करती है।
इसलिए कहा जा सकता है कि जॉर्जियो अगाम्बेन की अपवाद-स्थिति (State of Exception) की अवधारणा के आलोक में यह कविता महामारी की व्याख्या नहीं करती, बल्कि उस राजनीतिक आधुनिकता की आलोचना करती है जिसमें असाधारण परिस्थितियाँ शासन की स्थायी तकनीक बन सकती हैं। यह कविता दिखाती है कि संकट केवल रोग का संकट नहीं होता; वह स्वतंत्रता, नागरिकता, सामुदायिकता और आत्मीयता का भी संकट होता है। कोरोना यहाँ एक वायरस मात्र नहीं है; वह उस ऐतिहासिक क्षण का रूपक है जहाँ जीवन की रक्षा और जीवन पर नियंत्रण के बीच की सीमा धुँधली होने लगती है। इसीलिए कविता का सबसे बड़ा प्रश्न महामारी का अंत नहीं, बल्कि उस मनुष्य का भविष्य है जो महामारी के बाद बचेगा—क्या वह केवल जीवित रहेगा, या वास्तव में मनुष्य भी बना रहेगा? यही प्रश्न इस कविता को अगाम्बेन के राजनीतिक दर्शन के संदर्भ में असाधारण रूप से प्रासंगिक और विचारोत्तेजक बनाता है।
“उत्तर-कोरोना...” को अगर मार्क्सवादी दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह महामारी के अनुभव की कविता भर नहीं रह जाती, बल्कि वैश्विक पूँजीवाद, उसके अंतर्विरोधों, उसकी वैचारिक संरचनाओं और उसके द्वारा निर्मित मनुष्य की आलोचना में रूपांतरित हो जाती है। पहली दृष्टि में यह कविता महामारी के बाद की दुनिया की कल्पना करती हुई दिखाई देती है, किंतु गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि इसका वास्तविक प्रश्न वायरस नहीं, बल्कि वह सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है जिसके भीतर वायरस एक वैश्विक त्रासदी का रूप ग्रहण करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कविता महामारी को जैविक संकट के रूप में नहीं, बल्कि पूँजीवादी सभ्यता के संकट के रूप में देखने की संभावना प्रस्तुत करती है।
मार्क्सवादी आलोचना का मूल आग्रह यह है कि किसी भी ऐतिहासिक घटना को उसके भौतिक, आर्थिक और वर्गीय संदर्भों में समझा जाए। महामारी स्वयं वर्ग-निरपेक्ष घटना प्रतीत हो सकती है, क्योंकि वायरस अमीर-गरीब का भेद नहीं करता। किंतु महामारी का प्रभाव कभी वर्ग-निरपेक्ष नहीं होता। कौन घर में सुरक्षित रह सकता है और कौन सड़क पर निकलने को विवश है; किसके पास स्वास्थ्य-सुविधाएँ उपलब्ध हैं और कौन अस्पतालों के बाहर दम तोड़ देता है; कौन डिजिटल माध्यमों से काम जारी रख सकता है और कौन अपनी रोज़ी-रोटी खो देता है—ये सभी प्रश्न वर्ग-संबंधों से निर्धारित होते हैं। कविता इसी सामाजिक यथार्थ की ओर संकेत करती है।
कविता की आरंभिक पंक्तियों में जब प्रकृति के स्वस्थ होने और मनुष्य की दुनिया के ठहर जाने का दृश्य उपस्थित होता है, तब वह अप्रत्यक्ष रूप से पूँजीवादी विकास की आलोचना भी रचती है। आधुनिक पूँजीवाद का मूल तर्क निरंतर उत्पादन, निरंतर उपभोग और निरंतर विस्तार का है। महामारी के दौरान पहली बार यह मशीनरी अचानक रुक गई। कारखाने बंद हुए, बाज़ार ठहरे, यातायात रुका और उपभोग की गति कम हुई। परिणामस्वरूप नदियाँ साफ़ हुईं, प्रदूषण घटा और प्रकृति ने राहत की साँस ली। कविता इस विडम्बना को दर्ज करती है कि जिस विकास को सभ्यता अपनी उपलब्धि मानती थी, वही विकास प्रकृति के संकट का कारण भी था। मार्क्सवादी पर्यावरण-चिंतन, विशेषतः जॉन बेलामी फ़ॉस्टर (John Bellamy Foster) द्वारा प्रतिपादित “मेटाबॉलिक रिफ्ट” (Metabolic Rift) की अवधारणा के आलोक में यह कविता मनुष्य और प्रकृति के बीच पूँजीवाद द्वारा उत्पन्न असंतुलन को भी व्यक्त करती है।
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| John Bellamy Foster |
कविता का सबसे प्रत्यक्ष मार्क्सवादी बिंदु उसका अंतिम हिस्सा है, जहाँ कवि कहता है—
“तुम्हारा व्यवहार है कि
इसकी आकंठ उलाहनाओं के बीच
पूँजी की ताक़त के सामने सदा झुका रहता है
एक स्थायी विनम्रता की तरह!”
यहाँ कवि केवल पूँजी की आलोचना नहीं कर रहा, बल्कि पूँजी के वैचारिक प्रभुत्व की आलोचना कर रहा है। मार्क्सवादी परंपरा में यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है कि शोषित वर्ग उन व्यवस्थाओं का समर्थन क्यों करता है जो उसके हितों के विरुद्ध कार्य करती हैं। बाद में इतालवी मार्क्सवादी चिंतक अंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) ने इसे वर्चस्व (Hegemony) की अवधारणा के माध्यम से समझाया। शासक वर्ग केवल आर्थिक शक्ति से शासन नहीं करता; वह लोगों की चेतना को भी इस प्रकार निर्मित करता है कि वे उसके प्रभुत्व को स्वाभाविक और उचित मानने लगते हैं। कविता की “स्थायी विनम्रता” इसी वैचारिक अधीनता का रूपक है।
महामारी के दौरान पूँजीवाद का एक बड़ा अंतर्विरोध उजागर हुआ। जिन श्रमिकों के श्रम पर पूरी अर्थव्यवस्था निर्भर थी, वही सबसे अधिक असुरक्षित सिद्ध हुए। भारत सहित अनेक देशों में लाखों श्रमिकों का विस्थापन हुआ। वे पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए विवश हुए। यह दृश्य मार्क्सवादी अर्थों में श्रम और पूँजी के संबंधों की नग्न वास्तविकता को सामने लाता है। कविता भले ही सीधे श्रमिकों का उल्लेख न करती हो, लेकिन उसका पूरा वातावरण उस सामाजिक विघटन की ओर संकेत करता है जिसमें उत्पादन-व्यवस्था के वास्तविक वाहक सबसे अधिक पीड़ित होते हैं।
“देश का हर आदमी लड़ेगा सिपाही की तरह
लेकिन हर बार मारा जाएगा एक नागरिक के मोर्चे पर”
यह पंक्ति भी मार्क्सवादी दृष्टि से अत्यंत अर्थपूर्ण है। पूँजीवादी राष्ट्र-राज्य संकट के समय नागरिकों से त्याग और अनुशासन की अपेक्षा करता है, लेकिन संकट का वास्तविक बोझ समान रूप से वितरित नहीं होता। श्रमिक, निम्नवर्ग और हाशिए पर स्थित समुदाय सबसे अधिक कीमत चुकाते हैं। यहाँ नागरिकता का आदर्श और वर्गीय यथार्थ परस्पर टकराते दिखाई देते हैं।
मार्क्सवादी आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र वस्तुकरण (Commodification) है। पूँजीवाद जीवन के उन क्षेत्रों को भी वस्तु में बदल देता है जो मूलतः मानवीय और सामुदायिक होते हैं। महामारी के दौरान स्वास्थ्य स्वयं एक वस्तु की तरह व्यवहार किया जाने लगा। अस्पताल, दवाएँ, ऑक्सीजन, टीके और चिकित्सा-संसाधन बाज़ार के तर्क से संचालित होने लगे। कविता जब भविष्य की उस दुनिया की कल्पना करती है जहाँ “आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी”, तब इसे केवल भावनात्मक संकट के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यह उस पूँजीवादी समाज की आलोचना भी है जहाँ संबंधों का स्थान लेन-देन ने ले लिया है और आत्मीयता का स्थान उपयोगिता ने।
मार्क्स ने कहा था कि पूँजीवाद मनुष्यों के बीच के संबंधों को वस्तुओं के बीच के संबंधों में बदल देता है। इसे उन्होंने वस्तु-पूजा (Commodity Fetishism) कहा। कविता की पंक्ति—“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—पूँजीवादी जीवन की इसी त्रासदी को रूपायित करती प्रतीत होती है। यहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व के साथ नहीं जी रहा; वह स्वयं अपने जीवन का भार ढो रहा है। उसका श्रम, उसका समय और उसका शरीर निरंतर उपयोग की वस्तुओं में परिवर्तित होते जा रहे हैं।
कविता में मीडिया की आलोचना भी मार्क्सवादी दृष्टि से पढ़ी जा सकती है। “ब्रेक के बाद भी / एक पुराना ही चीखता है”—यह केवल मीडिया की शैली पर टिप्पणी नहीं है। मार्क्सवादी सांस्कृतिक आलोचना के अनुसार मीडिया शासक वर्ग की वैचारिक संरचनाओं को पुनरुत्पादित करने का काम करता है। वह जनता के ध्यान को वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रश्नों से हटाकर सतही विमर्शों में उलझा सकता है। महामारी के दौरान भी अनेक बार स्वास्थ्य, श्रम, विस्थापन और असमानता जैसे प्रश्नों की तुलना में भय, सनसनी और राष्ट्रवादी भावनाओं को अधिक महत्त्व मिला। कविता का यह व्यंग्य उसी वैचारिक तंत्र की ओर संकेत करता है।
कविता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह भविष्य को ले कर आशंकित है।
“खोए हुए को पाने की ज़िद में
दुनिया दौड़ रही होगी”
यह पंक्ति पूँजीवादी पुनरुत्थान की मानसिकता को समझने में सहायक है। महामारी के बाद सबसे बड़ा लक्ष्य अर्थव्यवस्था को पुनः गति देना था। लेकिन कविता प्रश्न उठाती है कि क्या वही पुरानी व्यवस्था, जिसने संकट को जन्म दिया, वास्तव में समाधान हो सकती है? यह प्रश्न मार्क्सवादी आलोचना का केंद्रीय प्रश्न है। क्या संकट के बाद समाज केवल अपनी पुरानी संरचनाओं को पुनः स्थापित करेगा, या किसी अधिक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की ओर बढ़ेगा?
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा”
इस पंक्ति को मार्क्सवादी यूटोपिया और उसकी विफलता के संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है। नई शुरुआत की संभावना है, लेकिन उसे साकार करने वाली सामूहिक राजनीतिक चेतना अनुपस्थित है। पूँजीवाद की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह अपने विकल्पों की कल्पना को भी सीमित कर देता है। इसलिए संकट के बाद भी मनुष्य उसी व्यवस्था की ओर लौटना चाहता है जिसने संकट को जन्म दिया था।
कविता में उपस्थित “आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी” का कथन मार्क्स के अलगाव (Alienation) के सिद्धांत के आलोक में विशेष अर्थ ग्रहण करता है। वियोजन केवल श्रम से अलगाव नहीं है; यह मनुष्य का स्वयं से, दूसरों से और अपनी मानवीय संभावनाओं से अलगाव है। महामारी ने इस अलगाव को तीव्रतर बना दिया। सामाजिक दूरी ने उस भावनात्मक दूरी को दृश्य रूप दे दिया जो पूँजीवादी समाज में पहले से मौजूद थी। कविता इस अलगाव को महामारी के बाद की दुनिया की केंद्रीय विशेषता के रूप में देखती है।
इस प्रकार मार्क्सवादी दृष्टि से यह कविता महामारी का वर्णन नहीं, बल्कि पूँजीवादी आधुनिकता की आलोचना है। यह दिखाती है कि वायरस ने किसी नई दुनिया का निर्माण नहीं किया; उसने उस दुनिया की छिपी हुई दरारों को उजागर कर दिया जो पहले से मौजूद थीं—वर्गीय असमानता, श्रम का शोषण, स्वास्थ्य का बाज़ारीकरण, मीडिया का वैचारिक नियंत्रण, संबंधों का वस्तुकरण और मनुष्य का वियोजन। कविता का अंतिम प्रश्न वायरस से नहीं, पूँजी से है; महामारी से नहीं, उस व्यवस्था से है जो हर संकट को लाभ और हर मनुष्य को संसाधन में बदल देने की क्षमता रखती है। इसी कारण यह कविता मार्क्सवादी आलोचना के लिए अत्यंत समृद्ध पाठ सिद्ध होती है, क्योंकि इसके भीतर महामारी के अनुभव के साथ-साथ पूँजीवादी सभ्यता की गहरी ऐतिहासिक और वैचारिक आलोचना भी निहित है।
नवउदारवाद (Neoliberalism) की आलोचना के परिप्रेक्ष्य में “उत्तर-कोरोना...” को पढ़ने पर यह कविता महामारी के बाद की दुनिया का पूर्वानुमान भर नहीं रह जाती, बल्कि समकालीन वैश्विक व्यवस्था द्वारा निर्मित मनुष्य की एक गहरी सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक आलोचना बन जाती है। इस दृष्टि से कविता का वास्तविक विषय कोरोना नहीं, बल्कि वह मनुष्य है जो नवउदारवादी व्यवस्था के भीतर धीरे-धीरे समुदाय से कट कर एक अकेली, भयग्रस्त, प्रतिस्पर्धी और आत्मकेन्द्रित इकाई में बदलता जा रहा है। महामारी यहाँ उस प्रक्रिया को तीव्र और दृश्य बनाने वाली ऐतिहासिक घटना है जो पहले से जारी थी।
नवउदारवाद केवल एक आर्थिक नीति नहीं है; वह जीवन-दृष्टि भी है। उसका मूल विश्वास यह है कि समाज से अधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है, समुदाय से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा है, सहयोग से अधिक महत्त्वपूर्ण आत्मनिर्भरता है और नागरिकता से अधिक महत्त्वपूर्ण उपभोक्तावाद है। इस व्यवस्था में मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र, स्वायत्त और आत्म-उत्तरदायी उद्यमी (entrepreneurial self) के रूप में देखा जाता है। उसकी सफलताएँ उसकी अपनी हैं और उसकी असफलताएँ भी उसकी अपनी। परिणामस्वरूप सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।
कविता का सबसे प्रसिद्ध कथन—“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी”—नवउदारवादी समाज की इसी त्रासदी का सबसे सघन काव्यात्मक रूपक है। यहाँ आत्मा का बने रहना और आत्मीयता का नष्ट हो जाना अत्यंत अर्थपूर्ण है। मनुष्य जीवित रहेगा, उसकी व्यक्तिगत पहचान भी बनी रहेगी, लेकिन उसके संबंधों की ऊष्मा समाप्त हो जाएगी। वह दूसरों के साथ रहेगा, पर उनके लिए नहीं रहेगा। यह वही स्थिति है जिसे अनेक समकालीन समाजशास्त्री नवउदारवादी व्यक्तिवाद की परिणति मानते हैं। समुदायों का विघटन, पारस्परिक विश्वास का क्षरण और संबंधों का उपयोगितावादी हो जाना—कविता इन्हीं प्रक्रियाओं को भविष्य की दुनिया की पहचान के रूप में देखती है।
महामारी ने इस विघटन को अचानक दृश्य बना दिया। संकट के समय सामूहिकता की आवश्यकता सबसे अधिक होती है, लेकिन नवउदारवादी समाज ने मनुष्य को इस तरह प्रशिक्षित किया है कि वह अपने अस्तित्व की लड़ाई व्यक्तिगत स्तर पर लड़ता है। कविता में बार-बार लौटता हुआ भय इसी मानसिकता को व्यक्त करता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुरक्षा, अपने स्वास्थ्य और अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित है। सामूहिक मुक्ति का कोई स्वप्न नहीं है; केवल व्यक्तिगत बचाव की रणनीतियाँ हैं। यह नवउदारवादी चेतना का मूल चरित्र है।
“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—इस पंक्ति को भी नवउदारवादी संदर्भ में पढ़ना अत्यंत सार्थक है। नवउदारवादी व्यवस्था मनुष्य को लगातार स्वयं में निवेश करने, स्वयं को अधिक उत्पादक बनाने और अपने जीवन को एक परियोजना की तरह संचालित करने के लिए प्रेरित करती है। परिणामस्वरूप जीवन एक बोझ में बदलने लगता है। व्यक्ति स्वयं को निरंतर सुधारने, सुरक्षित रखने और प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के दबाव में जीता है। यहाँ आत्मा किसी आध्यात्मिक मुक्ति का प्रतीक नहीं रह जाती; वह अपने ही अस्तित्व का भार ढोने वाली सत्ता बन जाती है। कविता इस गहरे मानसिक और अस्तित्वगत थकान को अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त करती है।
नवउदारवाद की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह सामूहिक संकटों को भी व्यक्तिगत उत्तरदायित्व में बदल देता है। महामारी इसका स्पष्ट उदाहरण थी। संक्रमण से बचना, स्वास्थ्य बनाए रखना, मानसिक संतुलन बनाए रखना, आर्थिक संकट का सामना करना—इन सबका भार अंततः व्यक्ति पर डाल दिया गया। राज्य और समाज की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित होती गई। कविता में उपस्थित यह भाव कि “जहाँ स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा” इसी स्थिति का संकेत देता है। व्यक्ति परिस्थितियों को बदलने की सामूहिक शक्ति नहीं रखता; वह केवल उनके साथ समायोजन करना सीखता है। यह नवउदारवादी अनुकूलनशीलता (adaptability) का काव्यात्मक रूप है।
कविता में भविष्य का जो संसार उभरता है, उसमें संबंधों की जगह व्यवहार ले लेता है। यह परिवर्तन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नवउदारवादी संस्कृति में संबंध भी धीरे-धीरे लेन-देन की संरचना ग्रहण करने लगते हैं। मित्रता, प्रेम, सहयोग और आत्मीयता जैसी मानवीय अवस्थाएँ भी उपयोगिता और लाभ के तर्क से प्रभावित होने लगती हैं। कविता जब आत्मीयता के लोप की बात करती है, तो वह केवल भावनात्मक क्षरण की बात नहीं कर रही होती; वह उस सामाजिक संरचना की आलोचना कर रही होती है जिसमें मनुष्य का मूल्य उसकी उपयोगिता से निर्धारित होने लगता है।
“यह एक दूसरे की तारीफ़ का दौर होगा
जिसमें सराहनाएँ भी शातिर होंगी”
यह पंक्ति नवउदारवादी संस्कृति की एक और विशेषता को उजागर करती है। समकालीन समाज में प्रशंसा भी अक्सर प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ की संरचनाओं के भीतर संचालित होती है। सहयोग का प्रदर्शन बना रहता है, लेकिन उसके भीतर हितों की जटिल राजनीति काम करती रहती है। नवउदारवादी समाज में संबंध पारदर्शी नहीं रहते; वे रणनीतिक हो जाते हैं। कविता इस सांस्कृतिक परिवर्तन को बहुत सूक्ष्मता से पहचानती है।
कविता में बार-बार लौटता हुआ अकेलापन भी नवउदारवादी समाज की एक केंद्रीय विशेषता है। समाजशास्त्री ज़िग्मुंट बाउमन (Zygmunt Bauman) ने आधुनिक जीवन को “तरल आधुनिकता” (Liquid Modernity) कहा था, जहाँ संबंध अस्थायी, पहचानें अस्थिर और समुदाय क्षीण होते जाते हैं। कविता का उत्तर-कोरोना संसार इसी तरलता का संसार है। लोग हैं, लेकिन उनके बीच स्थायी संबंध नहीं हैं; आत्माएँ हैं, लेकिन आत्मीयता नहीं है; कथाएँ हैं, लेकिन काव्यत्व नहीं है। सब कुछ उपस्थित है, लेकिन अपने गहरे मानवीय अर्थ से रिक्त है।
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| Zygmunt Bauman |
“खोए हुए को पाने की ज़िद में
दुनिया दौड़ रही होगी”
यह पंक्ति नवउदारवादी जीवन की गति को समझने की कुंजी प्रदान करती है। नवउदारवाद मनुष्य को लगातार गतिशील बनाए रखता है। वह कभी संतुष्ट नहीं होता; वह हमेशा कुछ और पाने की आकांक्षा में दौड़ता रहता है। महामारी ने इस दौड़ को क्षणिक रूप से रोक दिया था, लेकिन कविता को आशंका है कि संकट समाप्त होते ही वही दौड़ और अधिक तीव्रता से शुरू होगी। इस प्रकार कविता केवल महामारी के अनुभव को दर्ज नहीं करती, बल्कि उस आर्थिक-सांस्कृतिक तर्क की आलोचना भी करती है जो मनुष्य को निरंतर उपभोग और उपलब्धि की ओर धकेलता है।
कविता का मीडिया-विमर्श भी नवउदारवादी संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हो उठता है।
“ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है”
यह पंक्ति उस सूचना-संस्कृति की आलोचना है जहाँ ध्यान (attention) स्वयं एक वस्तु बन चुका है। नवउदारवादी मीडिया का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि दर्शक का ध्यान बनाए रखना भी है। परिणामस्वरूप शोर बढ़ता है, लेकिन संवाद कम होता है। सूचना बढ़ती है, लेकिन समझ कम होती है। कविता इस विरोधाभास को पहचानती है।
विशेष रूप से यह ध्यान देने योग्य है कि कविता का सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, नैतिक और सांस्कृतिक है। नवउदारवाद की आलोचना प्रायः असमानता, निजीकरण और बाज़ारवाद तक सीमित रह जाती है, लेकिन कविता उससे आगे जाती है। वह दिखाती है कि इस व्यवस्था का सबसे गंभीर प्रभाव मनुष्य की संवेदना पर पड़ता है। जब आत्मीयता समाप्त होती है, जब संबंध उपयोगितावादी हो जाते हैं, जब सामूहिकता विघटित हो जाती है और जब प्रत्येक व्यक्ति अपने अस्तित्व की लड़ाई अकेले लड़ने को विवश हो जाता है, तब समाज केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी संकटग्रस्त हो जाता है।
नवउदारवाद की आलोचना के आलोक में यह कविता एक ऐसे भविष्य का चित्र प्रस्तुत करती है जहाँ मनुष्य पहले से अधिक सुरक्षित हो सकता है, पहले से अधिक तकनीकी रूप से जुड़ा हुआ हो सकता है, लेकिन वह पहले से अधिक अकेला, अधिक भयभीत और अधिक असंबद्ध भी होगा। “आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी” इसलिए केवल महामारी के बाद की दुनिया का वर्णन नहीं है; यह नवउदारवादी सभ्यता का सबसे सटीक और मार्मिक निदान है। कविता का मूल आग्रह यही है कि यदि समाज केवल व्यक्तियों का समूह बनकर रह जाएगा और समुदाय, साझेदारी तथा आत्मीयता के मूल्य नष्ट हो जाएँगे, तो मनुष्य का अस्तित्व तो बचा रहेगा, लेकिन उसकी मनुष्यता संकट में पड़ जाएगी। यही इस कविता की सबसे गहरी नवउदारवाद-विरोधी अंतर्ध्वनि है।
“उत्तर-कोरोना...” को मानवतावाद (Humanism) और उत्तर-मानवतावाद (Post-humanism) के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह कविता महामारी की प्रतिक्रिया भर नहीं रह जाती, बल्कि मनुष्य की सत्ता, उसकी सीमाओं और ब्रह्मांड में उसके स्थान को लेकर आधुनिक सभ्यता की मूल धारणाओं की पुनर्समीक्षा में बदल जाती है। यह कविता उस ऐतिहासिक क्षण को दर्ज करती है जहाँ मनुष्य पहली बार अपने बारे में निर्मित उस महान मिथक से बाहर निकलने को विवश होता है जिसके अनुसार वह सृष्टि का स्वामी, प्रकृति का नियंता, इतिहास का निर्माता और ज्ञान का अंतिम केन्द्र है। महामारी यहाँ केवल एक स्वास्थ्य-संकट नहीं है; वह मानव-केन्द्रित विश्वदृष्टि के संकट का भी उद्घाटन है।
मानवतावाद की पूरी परंपरा, पुनर्जागरण (Renaissance) से लेकर प्रबोधन (Enlightenment) तक, मनुष्य को विश्व के केन्द्र में स्थापित करती रही है। इस परंपरा में मनुष्य विवेकशील है, स्वतंत्र है, आत्मनिर्णायक है और प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करने में सक्षम है। विज्ञान, तकनीक, आधुनिक राज्य और विकास की पूरी परियोजना इसी विश्वास पर आधारित रही कि मनुष्य अपने ज्ञान और तर्क के बल पर संसार को समझ सकता है और नियंत्रित कर सकता है। लेकिन कविता का आरंभिक परिदृश्य ही इस विश्वास को अस्थिर कर देता है। “दुनिया का सारा विज्ञान” एक ऐसे वायरस के सामने असहाय दिखाई देता है जो “रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटा” है। यहाँ आकार और प्रभाव के बीच का विरोधाभास अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जो सत्ता नगण्य प्रतीत होती है, वही समूची मानव-सभ्यता को ठहरा देती है। यह दृश्य मानवतावादी अहंकार के विघटन का दृश्य है।
कविता का एक केंद्रीय संकेत यह है कि मनुष्य अब घटनाओं का एकमात्र नियंता नहीं रह गया है। मानवतावाद का विश्वास था कि इतिहास मनुष्य की इच्छाशक्ति और बुद्धि द्वारा निर्मित होता है। लेकिन कविता दिखाती है कि इतिहास की दिशा एक सूक्ष्म जैविक सत्ता भी बदल सकती है। एक वायरस अचानक अर्थव्यवस्था, राजनीति, धर्म, संस्कृति, शिक्षा और वैश्विक संबंधों को प्रभावित करने लगता है। इससे मनुष्य का केन्द्रीय स्थान डगमगाने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ कविता उत्तर-मानवतावादी चिंतन के निकट पहुँचती है।
उत्तर-मानवतावाद का मूल आग्रह यह है कि मनुष्य को विश्व का एकमात्र केन्द्र मानने वाली धारणाएँ अब पर्याप्त नहीं हैं। मनुष्य अनेक जैविक, तकनीकी, पर्यावरणीय और भौतिक शक्तियों के जटिल नेटवर्क का एक हिस्सा है। वह उनसे ऊपर नहीं, बल्कि उनके बीच स्थित है। कविता इस तथ्य को अत्यंत मार्मिक रूप से व्यक्त करती है। वायरस यहाँ केवल एक रोगजनक तत्व नहीं है; वह इस बात का स्मरण है कि जीवन की संरचना मनुष्य से कहीं अधिक व्यापक और जटिल है। मनुष्य स्वयं जैविक संसार का एक घटक है, उसका स्वामी नहीं।
कविता की शुरुआती पंक्तियों में नदियों का स्वच्छ होना, वातावरण में ऑक्सीजन का बढ़ना और प्रकृति का पुनर्जीवित होना भी इसी उत्तर-मानवतावादी संवेदना को व्यक्त करता है। मानवतावादी दृष्टि में प्रकृति प्रायः मनुष्य के उपयोग की वस्तु रही है। लेकिन कविता दिखाती है कि जैसे ही मनुष्य की गतिविधियाँ रुकती हैं, प्रकृति स्वयं को पुनर्संतुलित करने लगती है। यहाँ प्रकृति निष्क्रिय पृष्ठभूमि नहीं है; वह अपनी स्वतंत्र सत्ता रखती है। वह मनुष्य पर निर्भर नहीं है। उलटे, मनुष्य की अनुपस्थिति उसके लिए लाभकारी सिद्ध होती है। यह दृष्टि मनुष्य और प्रकृति के संबंध को पुनर्परिभाषित करती है।
कविता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बिंदु है—“दुनिया के सारे देवता असहाय और असुरक्षित हो गए हैं।” पहली दृष्टि में यह धार्मिक आस्था पर टिप्पणी प्रतीत हो सकती है, लेकिन उत्तर-मानवतावादी दृष्टि से यह मनुष्य द्वारा निर्मित सभी केंद्रीयताओं के विघटन का संकेत है। देवता भी मनुष्य की सांस्कृतिक कल्पना के विस्तार हैं। जब देवता, विज्ञान और राज्य—सभी एक साथ संकटग्रस्त दिखाई देते हैं, तब मनुष्य को यह स्वीकार करना पड़ता है कि वास्तविकता किसी एक केन्द्र द्वारा नियंत्रित नहीं होती। संसार अनेक शक्तियों का अंतर्संबंधित तंत्र है।
विशेष रूप से
“वायरस का कोई पूर्वकाल नहीं होता
उसका सिर्फ़ एक वर्तमान होता है”
जैसी पंक्तियाँ उत्तर-मानवतावादी दृष्टि से अत्यंत अर्थपूर्ण हो जाती हैं। यहाँ वायरस केवल जैविक सत्ता नहीं है; वह एक सक्रिय एजेंसी (agency) है। उत्तर-मानवतावादी चिंतन, विशेषकर ब्रूनो लातूर (Bruno Latour) और जेन बेनेट (Jane Bennett) जैसे विचारकों के यहाँ, मनुष्येतर सत्ता को भी क्रियाशीलता प्रदान की जाती है। वस्तुएँ, जीव, तकनीकें और पर्यावरणीय शक्तियाँ केवल निष्क्रिय पदार्थ नहीं हैं; वे इतिहास और समाज को प्रभावित करती हैं। कविता में वायरस इसी सक्रिय एजेंसी का प्रतिनिधि बन जाता है।
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| Bruno Latour |
“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी”—इस पंक्ति को भी उत्तर-मानवतावादी संदर्भ में नए अर्थ मिलते हैं। महामारी के दौरान मनुष्य की पारंपरिक सामाजिक संरचनाएँ टूटती हुई दिखाई दीं। संपर्क, निकटता और सामूहिकता पर प्रश्नचिह्न लग गया। मनुष्य को अपनी जैविक असुरक्षा का नया बोध हुआ। वह केवल सांस्कृतिक या राजनीतिक प्राणी नहीं रहा; वह एक संवेदनशील जैविक शरीर भी है जो दूसरे शरीरों से प्रभावित होता है। इस प्रकार कविता मनुष्य की उस भंगुरता को सामने लाती है जिसे मानवतावाद अक्सर छिपा देता था।
“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—यह पंक्ति मानवतावादी आत्मविश्वास के संकट का अत्यंत प्रभावशाली रूपक है। मानवतावाद में मनुष्य अपनी चेतना और विवेक के कारण विशिष्ट माना जाता है। लेकिन यहाँ चेतना स्वयं शरीर के भार से दब गई है। मनुष्य का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व उसकी जैविक सीमाओं से मुक्त नहीं रह पाता। महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि सबसे विकसित चेतना भी एक नश्वर शरीर में निवास करती है। उत्तर-मानवतावाद इसी तथ्य पर बल देता है कि मनुष्य की चेतना को उसकी जैविकता से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
कविता का भविष्य-दर्शन भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा”
यह कथन मानवतावादी प्रगति-बोध पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है। आधुनिक मानवतावाद इतिहास को निरंतर प्रगति की यात्रा के रूप में देखता था। लेकिन कविता का भविष्य आश्वस्त नहीं है। यहाँ भविष्य अनिश्चित है, विखंडित है और भय से भरा हुआ है। इसका कारण यह है कि अब मनुष्य इतिहास का एकमात्र निर्माता नहीं रहा। वह अनेक अनियंत्रित शक्तियों के बीच स्थित है।
उत्तर-मानवतावादी दृष्टि से कविता का सबसे बड़ा अवदान यह है कि वह मनुष्य की सीमाओं को स्वीकार करने का नैतिक साहस दिखाती है। वह मनुष्य को अपमानित नहीं करती, बल्कि उसे उसके वास्तविक संदर्भ में स्थापित करती है। कविता यह नहीं कहती कि मनुष्य महत्वहीन है; वह केवल यह कहती है कि मनुष्य अकेला निर्णायक नहीं है। उसकी नियति जैविक प्रक्रियाओं, पर्यावरणीय परिवर्तनों, तकनीकी संरचनाओं और वैश्विक अंतर्संबंधों से गहराई से जुड़ी हुई है।
यहीं कविता का संबंध समकालीन मानवोत्तर युग (Post-human Age) की बहसों से स्थापित होता है। महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि मनुष्य की सुरक्षा केवल उसकी तकनीकी शक्ति पर निर्भर नहीं है। उसे प्रकृति, अन्य जीवों और वैश्विक पारिस्थितिकी के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से समझना होगा। कविता इसी नई चेतना की ओर संकेत करती है।
अंततः मानवतावाद और उत्तर-मानवतावाद के संदर्भ में यह कविता मानव-केन्द्रीयता के विघटन और अंतर्संबद्ध जीवन-जगत की स्वीकृति का काव्यात्मक दस्तावेज़ है। यह दिखाती है कि मनुष्य न तो प्रकृति से बाहर है, न इतिहास का एकमात्र निर्माता, न ही जीवन का सर्वोच्च नियंता। वह अनेक दृश्य और अदृश्य शक्तियों के जाल में स्थित एक संवेदनशील, भंगुर और सीमित सत्ता है। कोरोना का वायरस इस सत्य का सबसे तीखा स्मरण बन कर उपस्थित होता है। इसलिए यह कविता महामारी का आख्यान होने के साथ-साथ उस क्षण का भी आख्यान है जब मनुष्य स्वयं को सृष्टि के केन्द्र से हटा कर जीवन के व्यापक ताने-बाने के भीतर एक सहभागी सत्ता के रूप में देखना शुरू करता है। यही इसकी गहन उत्तर-मानवतावादी अंतर्ध्वनि है।
श्री प्रकाश शुक्ल की कविता “उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” को पारिस्थितिकी-विमर्श (Ecocriticism) और पर्यावरणीय मानविकी (Environmental Humanities) के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह कविता केवल महामारी के सामाजिक और राजनीतिक परिणामों का आख्यान नहीं रह जाती, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के संबंधों पर पुनर्विचार का एक गहरा दार्शनिक दस्तावेज़ बन जाती है। इस दृष्टि से कविता का वास्तविक प्रश्न कोरोना नहीं, बल्कि वह सभ्यता है जिसने प्रकृति को अपने अधीन संसाधन मान लिया था और जो महामारी के दौरान पहली बार अपनी सीमाओं से परिचित हुई। कविता इस ऐतिहासिक क्षण को दर्ज करती है जब मनुष्य की गतिविधियाँ ठहर जाती हैं और प्रकृति एक नए ढंग से दिखाई देने लगती है।
कविता की आरंभिक पंक्तियाँ ही इसके पारिस्थितिक अर्थ-संसार को खोल देती हैं—
“नदियों के स्वच्छ होते जल और
वातावरण में बढ़ती हुई ऑक्सीजन के बीच
आसमान में निचाट सन्नाटा है।”
इन पंक्तियों में एक गहरी विडम्बना निहित है। सामान्यतः मनुष्य की सक्रियता को जीवन का संकेत माना जाता है, किंतु यहाँ मनुष्य की निष्क्रियता प्रकृति के पुनर्जीवन का कारण बन रही है। नदियाँ स्वच्छ हो रही हैं, हवा शुद्ध हो रही है, लेकिन मनुष्य का संसार ठहर गया है। यह दृश्य आधुनिक विकास की उस अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाता है जो मनुष्य की निरंतर सक्रियता, उत्पादन और विस्तार को प्रगति का पर्याय मानती रही है। कविता अप्रत्यक्ष रूप से यह पूछती है कि यदि मनुष्य की उपस्थिति प्रकृति के लिए संकट और उसकी अनुपस्थिति राहत का कारण बन जाती है, तो विकास की हमारी अवधारणाओं की नैतिक वैधता क्या है?
पारिस्थितिकी-विमर्श का एक केंद्रीय प्रश्न यह रहा है कि आधुनिक सभ्यता ने प्रकृति को किस प्रकार केवल संसाधन के रूप में देखा। औद्योगिक आधुनिकता में नदियाँ जल-स्रोत बन गईं, जंगल लकड़ी का भंडार, पर्वत खनिजों का भंडार और जीव-जंतु उपभोग की वस्तुएँ। प्रकृति को एक जीवंत साझेदार के बजाय उपयोग की वस्तु समझा गया। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ इस मानव-केन्द्रित दृष्टि के विघटन का संकेत देती हैं। महामारी के दौरान पहली बार दुनिया ने देखा कि मनुष्य की गतिविधियों में कमी आने पर प्रकृति स्वयं को पुनर्संतुलित करने लगती है। कविता इसी अनुभव को एक सांस्कृतिक और दार्शनिक प्रश्न में बदल देती है।
पर्यावरणीय मानविकी का एक महत्त्वपूर्ण आग्रह यह है कि प्रकृति और संस्कृति को एक-दूसरे से पृथक नहीं समझा जा सकता। मनुष्य प्रकृति से बाहर खड़ी हुई सत्ता नहीं है; वह स्वयं पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। कविता में वायरस का प्रवेश इसी सत्य का उद्घाटन करता है। आधुनिक मनुष्य ने स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझ लिया था, लेकिन एक सूक्ष्म जैविक सत्ता उसकी समूची सभ्यता को चुनौती दे देती है। यहाँ वायरस केवल रोग का कारण नहीं है; वह मनुष्य की पारिस्थितिक निर्भरता का स्मरण भी है। वह यह याद दिलाता है कि मनुष्य प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करने का दावा चाहे जितना करे, वह अंततः उसी जैविक संसार का हिस्सा है जिससे वह स्वयं को अलग समझने लगा था।
कविता में प्रकृति और मनुष्य के संबंध को लेकर एक गहरा नैतिक तनाव उपस्थित है। एक ओर नदियाँ स्वच्छ हो रही हैं, दूसरी ओर मनुष्य भय और असुरक्षा में जी रहा है। यह द्वंद्व पर्यावरणीय मानविकी की उस बहस से जुड़ता है जिसमें पूछा जाता है कि क्या मनुष्य और प्रकृति के हित हमेशा एक-दूसरे के पूरक होते हैं? महामारी ने पहली बार यह अनुभव दिया कि मनुष्य की गति का रुकना प्रकृति के लिए लाभकारी हो सकता है। कविता इस असुविधाजनक सत्य से आँख नहीं चुराती। वह उसे दर्ज करती है और पाठक को उसके नैतिक निहितार्थों पर विचार करने के लिए बाध्य करती है।
“दुनिया का सारा विज्ञान
एक रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है”
यह पंक्ति भी पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक विज्ञान ने प्रकृति को नियंत्रित करने और उसके रहस्यों को समझ लेने का दावा किया था। किंतु महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रकृति का संसार मानव ज्ञान से कहीं अधिक जटिल है। यहाँ कविता विज्ञान का निषेध नहीं करती, बल्कि मनुष्य की उस अहंमन्यता की आलोचना करती है जो विज्ञान को प्रकृति पर पूर्ण प्रभुत्व का साधन मानती रही है। पारिस्थितिकी-विमर्श इसी बिंदु पर मानव-केन्द्रित ज्ञान की सीमाओं को रेखांकित करता है।
कविता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें प्रकृति किसी निष्क्रिय पृष्ठभूमि की तरह उपस्थित नहीं है। वह सक्रिय है, प्रभावकारी है और मानव जीवन की दिशा को बदलने की क्षमता रखती है। पर्यावरणीय मानविकी में इसे मानवेतर एजेंसी (Non-human Agency) कहा जाता है। नदियाँ, वायरस, वातावरण, जैविक प्रक्रियाएँ—ये सभी केवल पृष्ठभूमि नहीं हैं; ये इतिहास के सक्रिय घटक हैं। कविता में वायरस इसी मानवेतर एजेंसी का सबसे सशक्त प्रतीक बनकर सामने आता है। वह यह सिद्ध करता है कि इतिहास केवल मनुष्यों द्वारा नहीं बनाया जाता; उसमें प्रकृति की शक्तियाँ भी निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
कविता में बार-बार लौटने वाला “सन्नाटा” भी पारिस्थितिक अर्थ ग्रहण करता है। यह केवल सामाजिक गतिविधियों के ठहरने का संकेत नहीं है। यह उस मानव-शोर के क्षणिक अवसान का संकेत है जिसने प्रकृति की आवाज़ों को दबा दिया था। चिड़ियों की बढ़ती चहचहाहट का उल्लेख इसी संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हो जाता है। सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य की गतिविधियाँ इतनी तीव्र होती हैं कि प्रकृति की उपस्थिति हाशिए पर चली जाती है। महामारी के दौरान पहली बार अनेक लोगों ने अपने आस पास के प्राकृतिक संसार को नए ढंग से अनुभव किया। कविता इस अनुभव को सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बना देती है।
पर्यावरणीय मानविकी के संदर्भ में कविता की सबसे गहरी अंतर्ध्वनि उसके भविष्य-दर्शन में निहित है। कवि बार-बार संकेत करता है कि यदि मनुष्य अपनी सभ्यता की संरचनाओं पर पुनर्विचार नहीं करेगा, तो संकट समाप्त होने के बाद भी संकट की परिस्थितियाँ बनी रहेंगी।
“खोए हुए को पाने की ज़िद में
दुनिया दौड़ रही होगी”
यह पंक्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ खोया हुआ क्या है? केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि वही जीवन-शैली भी है जिसने पर्यावरणीय संकटों को जन्म दिया। कविता इस पुनरावृत्ति के प्रति चिंतित है। उसे भय है कि मनुष्य महामारी से कोई पारिस्थितिक शिक्षा ग्रहण करने के बजाय उसी विनाशकारी विकास-दृष्टि की ओर लौट जाएगा।
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा”
इस कथन को भी पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जा सकता है। नई शुरुआत केवल आर्थिक पुनर्निर्माण नहीं हो सकती; उसे मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की नई समझ पर आधारित होना होगा। यदि सभ्यता अपनी पुरानी मानव-केन्द्रित धारणाओं को बनाए रखेगी, तो नई शुरुआत वास्तव में नई नहीं होगी। कविता इसी बौद्धिक और नैतिक चुनौती की ओर संकेत करती है।
कविता का शीर्षक—“उत्तर-कोरोना”—भी पर्यावरणीय अर्थों से भरा हुआ है। यह केवल महामारी के बाद का समय नहीं है; यह उस प्रश्न का नाम भी है कि महामारी के बाद मनुष्य प्रकृति के साथ कैसा संबंध स्थापित करेगा। क्या वह स्वयं को पुनः सृष्टि का स्वामी मानेगा, या जीवन-जगत के व्यापक ताने-बाने का एक हिस्सा? कविता इस प्रश्न का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देती, लेकिन उसकी पूरी संरचना पाठक को इसी दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती है।
वस्तुत: पारिस्थितिकी-विमर्श और पर्यावरणीय मानविकी के आलोक में यह कविता मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की पुनर्समीक्षा का एक गहरा काव्यात्मक दस्तावेज़ है। यह दिखाती है कि महामारी केवल एक चिकित्सकीय संकट नहीं थी; वह एक पारिस्थितिक घटना भी थी जिसने मानव सभ्यता की सीमाओं को उजागर किया। स्वच्छ होती नदियाँ, बढ़ती हुई ऑक्सीजन, चिड़ियों की चहचहाहट और एक सूक्ष्म वायरस की सर्वव्यापी उपस्थिति—ये सभी संकेत मिलकर उस सत्य को उद्घाटित करते हैं कि पृथ्वी केवल मनुष्यों की दुनिया नहीं है। मनुष्य जीवन-जगत के विशाल पारिस्थितिक समुदाय का एक सदस्य मात्र है। कविता का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संदेश यही है कि यदि मनुष्य इस बुनियादी सत्य को नहीं समझेगा, तो कोरोना जैसी घटनाएँ अपवाद नहीं, बल्कि भविष्य की सामान्य वास्तविकता बन सकती हैं। इस प्रकार यह कविता महामारी के अनुभव को पारिस्थितिक आत्मालोचन में रूपांतरित कर देती है और आधुनिक सभ्यता से उसके पर्यावरणीय विवेक का पुनर्निर्माण करने की माँग करती है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता “उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” को सभ्यता-विमर्श (Civilizational Critique) के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कविता केवल कोरोना महामारी की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि आधुनिक सभ्यता के आत्मविश्वास, उसके विकास-मॉडल, उसकी प्रगति-धारणा, उसके तकनीकी अहंकार और उसकी मानवीय विफलताओं की गहन समीक्षा है। यह कविता वस्तुतः उस सभ्यता की आत्मालोचनात्मक कथा है जिसने स्वयं को इतिहास की सबसे विकसित, सबसे वैज्ञानिक और सबसे शक्तिशाली सभ्यता मान लिया था, लेकिन एक सूक्ष्म वायरस ने उसके आत्मविश्वास की नींव को हिला दिया।
सभ्यता-विमर्श का मूल प्रश्न यह होता है कि किसी सभ्यता की उपलब्धियों और उसकी मानवीय परिणतियों के बीच क्या संबंध है। क्या तकनीकी प्रगति वास्तव में मानवीय प्रगति भी है? क्या आर्थिक वृद्धि मनुष्य को अधिक सुखी, अधिक सुरक्षित और अधिक नैतिक बनाती है? क्या सूचना का विस्तार बुद्धिमत्ता का विस्तार भी है? श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता इन्हीं प्रश्नों के इर्द-गिर्द अपनी वैचारिक संरचना निर्मित करती है।
आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा आख्यान “प्रगति” का आख्यान है। अठारहवीं शताब्दी के प्रबोधन (Enlightenment) के बाद से यह विश्वास विकसित हुआ कि विज्ञान, तकनीक और तर्कशीलता के माध्यम से मनुष्य निरंतर बेहतर भविष्य की ओर बढ़ रहा है। महामारी ने पहली बार इस विश्वास को गहरे स्तर पर चुनौती दी। कवि का यह कथन—
“दुनिया का सारा विज्ञान
एक रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है”
केवल वैज्ञानिक संकट का उल्लेख नहीं है। यह आधुनिक सभ्यता के उस दावे की आलोचना है जिसके अनुसार विज्ञान मनुष्य को लगभग सर्वशक्तिमान बना चुका है। यहाँ कविता विज्ञान-विरोधी नहीं है; बल्कि वह वैज्ञानिक उपलब्धियों के इर्द-गिर्द निर्मित उस सभ्यतागत अहंकार की आलोचना करती है जो यह मान बैठा था कि प्रकृति अब मनुष्य के पूर्ण नियंत्रण में है।
सभ्यता-विमर्श की दृष्टि से कविता की शुरुआती पंक्तियाँ अत्यंत अर्थपूर्ण हैं। नदियाँ स्वच्छ हो रही हैं, वातावरण में ऑक्सीजन बढ़ रही है और प्रकृति स्वस्थ हो रही है, लेकिन मनुष्य का संसार संकट में है। यह दृश्य आधुनिक विकास-दृष्टि पर एक गहरा व्यंग्य है। जिस विकास को मानव सभ्यता अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती थी, वही विकास प्रकृति के विनाश का कारण सिद्ध हुआ। महामारी के दौरान जैसे ही औद्योगिक गतिविधियाँ रुकीं, प्रकृति ने स्वयं को पुनर्जीवित करना शुरू कर दिया। कविता इस विडम्बना को दर्ज करती है कि सभ्यता का विकास और पृथ्वी का स्वास्थ्य अनेक बार परस्पर विरोधी दिशाओं में खड़े दिखाई देते हैं।
सभ्यता की एक दूसरी केंद्रीय धारणा है—नियंत्रण। आधुनिक मनुष्य मानता है कि वह प्रकृति, समय, शरीर और इतिहास को नियंत्रित कर सकता है। लेकिन कविता दिखाती है कि नियंत्रण का यह विश्वास कितना नाजुक है। एक अदृश्य वायरस पूरी दुनिया को ठहरा देता है। हवाई अड्डे बंद हो जाते हैं, अर्थव्यवस्थाएँ रुक जाती हैं, धार्मिक स्थल खाली हो जाते हैं और विश्व-शक्तियाँ असहाय दिखने लगती हैं। यह दृश्य केवल महामारी का दृश्य नहीं है; यह आधुनिक सभ्यता के नियंत्रण का भ्रम (illusion of control) के टूटने का दृश्य है।
“दुनिया के सारे देवता असहाय और असुरक्षित हो गए हैं”—इस पंक्ति को भी सभ्यता-विमर्श के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। आधुनिक सभ्यता ने धर्म को पूरी तरह समाप्त नहीं किया; उसने उसके स्थान पर विज्ञान, राष्ट्र, विकास और तकनीक जैसे नए देवताओं की स्थापना की। महामारी ने इन सभी देवताओं की सीमाएँ उजागर कर दीं। धार्मिक आस्थाएँ भी संकट का समाधान नहीं दे सकीं और आधुनिक संस्थाएँ भी तत्काल सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकीं। कविता इस प्रकार आधुनिक और पारंपरिक दोनों प्रकार की निश्चितताओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
कविता का सबसे गहरा सभ्यतागत हस्तक्षेप “आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी” जैसी पंक्तियों में दिखाई देता है। सभ्यता का मूल्यांकन केवल उसकी तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा निर्मित मानवीय संबंधों से भी किया जाना चाहिए। आधुनिक सभ्यता ने संचार के अभूतपूर्व साधन विकसित किए, लेकिन क्या उसने आत्मीयता को भी बढ़ाया? कविता का उत्तर नकारात्मक है। यहाँ मनुष्य जीवित रहेगा, लेकिन उसके संबंध क्षीण हो जाएँगे। आत्मा होगी, लेकिन आत्मीयता नहीं होगी। यह कथन आधुनिक सभ्यता की उस त्रासदी को उजागर करता है जहाँ तकनीकी संपर्क बढ़ता है, लेकिन भावनात्मक निकटता घटती जाती है।
इसी प्रकार “एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी” आधुनिक जीवन की गहरी थकान का रूपक है। सभ्यता ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन क्या उसने उसे अर्थपूर्ण भी बनाया है? कविता संकेत करती है कि सुविधा और अर्थ एक ही चीज़ नहीं हैं। आधुनिक मनुष्य पहले से अधिक सुविधासंपन्न हो सकता है, लेकिन वह भीतर से अधिक अकेला, अधिक भयभीत और अधिक थका हुआ भी हो सकता है।
सभ्यता-विमर्श में सूचना-संस्कृति की आलोचना भी महत्त्वपूर्ण है। कविता की पंक्ति—
“जहाँ ब्रेक के बाद भी
एक पुराना ही चीखता है”
समकालीन मीडिया-संस्कृति पर तीखा व्यंग्य है। आधुनिक सभ्यता स्वयं को सूचना-समृद्ध सभ्यता मानती है। लेकिन कविता प्रश्न उठाती है कि क्या सूचना की अधिकता वास्तव में समझ की अधिकता है? क्या लगातार बोलते रहने से संवाद भी उत्पन्न होता है? यहाँ मीडिया ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि शोर का उत्पादक बन जाता है। यह आधुनिक सूचना-सभ्यता की विडम्बना है कि संचार के साधन बढ़ते जाते हैं, लेकिन सार्थक संवाद कम होता जाता है।
कविता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथन है—“अद्भुत होगा यह समय कि अद्भुत जैसा कुछ नहीं होगा।” यह पंक्ति पूरी कविता की सभ्यतागत आलोचना का केन्द्र है। आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को निरंतर नवीनताओं, आविष्कारों और तकनीकी चमत्कारों से घेर दिया है। हर दिन कुछ नया है, कुछ अभूतपूर्व है, कुछ अद्भुत है। लेकिन इस निरंतर अद्भुतता के बीच अद्भुत का अनुभव ही समाप्त हो गया है। चमत्कार सामान्य हो गए हैं और संवेदना कुंद हो गई है। यह कथन आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति की भी आलोचना है जहाँ नवीनता का उत्पादन तो लगातार होता है, लेकिन विस्मय और आश्चर्य की मानवीय क्षमता क्षीण होती जाती है।
सभ्यता-विमर्श की दृष्टि से कविता का भविष्य-दर्शन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। वह किसी आदर्श भविष्य की कल्पना नहीं करती।
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा”
यह कथन आधुनिक सभ्यता के संकट की गहराई को व्यक्त करता है। समस्या केवल संस्थाओं की नहीं है; समस्या मनुष्य की भी है। यदि मनुष्य की संवेदना, उसकी सामूहिकता और उसकी आत्मीयता क्षीण हो जाए, तो नई शुरुआत भी अर्थहीन हो जाती है। सभ्यता केवल तकनीकी संरचनाओं से नहीं बनती; वह मनुष्यों की साझा नैतिक कल्पना से भी बनती है। कविता को इसी कल्पना के क्षरण की चिंता है।
“खोए हुए को पाने की ज़िद में
दुनिया दौड़ रही होगी”
यह पंक्ति आधुनिक सभ्यता की गति की आलोचना है। आधुनिकता का पूरा तर्क निरंतर दौड़ पर आधारित है—अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग, अधिक विकास, अधिक विस्तार। महामारी ने इस दौड़ को रोक दिया था, लेकिन कविता को भय है कि संकट के बाद मनुष्य उसी दौड़ में और अधिक तीव्रता से लौटेगा। यहाँ कविता विकास के विचार का निषेध नहीं करती; वह विकास की उस अवधारणा पर प्रश्न उठाती है जो आत्मालोचन से रहित है।
कविता का अंतिम हिस्सा, जहाँ पूँजी की शक्ति का उल्लेख आता है, सभ्यता-विमर्श को और व्यापक बना देता है। आधुनिक सभ्यता केवल वैज्ञानिक या तकनीकी संरचना नहीं है; वह पूँजी द्वारा संचालित सभ्यता भी है। इसलिए उसका संकट केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि मूल्य-व्यवस्था का संकट भी है। मनुष्य का व्यवहार पूँजी के सामने झुका हुआ है और यही झुकाव सभ्यता की नैतिक पराजय का संकेत बन जाता है।
समग्रतः सभ्यता-विमर्श के आलोक में यह कविता आधुनिक सभ्यता की उपलब्धियों का उत्सव नहीं मनाती, बल्कि उनकी आलोचनात्मक समीक्षा करती है। यह पूछती है कि यदि विकास के बावजूद मनुष्य असुरक्षित है, यदि तकनीक के बावजूद वह अकेला है, यदि सूचना के बावजूद वह भ्रमित है, यदि समृद्धि के बावजूद आत्मीयता नष्ट हो रही है, तो क्या वास्तव में सभ्यता आगे बढ़ी है? “अद्भुत होगा यह समय कि अद्भुत जैसा कुछ नहीं होगा” इसी प्रश्न का सबसे सघन काव्यात्मक रूप है। यह पंक्ति आधुनिक सभ्यता के उस अंतर्विरोध को उजागर करती है जिसमें बाहरी उपलब्धियाँ बढ़ती जाती हैं, लेकिन आंतरिक मानवीय संसार सिकुड़ता जाता है। इस अर्थ में यह कविता महामारी का आख्यान होने से कहीं अधिक आधुनिक सभ्यता के आत्मपरीक्षण और आत्मालोचन का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज़ है।
“उत्तर-कोरोना : आत्माएँ होंगी, आत्मीयता न होगी!” को मनोविश्लेषणात्मक (Psychoanalytic) दृष्टि से पढ़ने पर यह कविता महामारी के सामाजिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक प्रभावों का मात्र विवरण नहीं रह जाती, बल्कि मनुष्य के सामूहिक अवचेतन, उसके आदिम भय, उसकी मृत्यु-चेतना, उसकी असुरक्षाओं और उसकी दमित इच्छाओं के उद्भासन का एक गहन काव्यात्मक आख्यान बन जाती है। यह कविता उस मनोवैज्ञानिक क्षण को दर्ज करती है जब सभ्यता द्वारा निर्मित सुरक्षा, नियंत्रण और स्थायित्व के आवरण अचानक टूट जाते हैं और मनुष्य स्वयं को अपने सबसे मूलभूत भय—मृत्यु के भय—के सामने खड़ा पाता है।
सिग्मंड फ्रायड (Sigmund Freud) का मानना था कि सभ्यता मनुष्य की अनेक आदिम आशंकाओं और इच्छाओं को नियंत्रित कर के ही संभव होती है। मनुष्य अपने भीतर मृत्यु, हिंसा, असुरक्षा और विनाश की अनेक संभावनाएँ लिए हुए जीता है, लेकिन सभ्यता उसे यह विश्वास दिलाती है कि वह सुरक्षित है, संरक्षित है और भविष्य पर उसका नियंत्रण है। महामारी ने इस सभ्यतागत आश्वासन को अचानक भंग कर दिया। कविता का पूरा वातावरण इसी टूटे हुए मनोवैज्ञानिक संतुलन का वातावरण है।
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| Sigmund Freud |
कविता की शुरुआत में ही जो संवाद उपस्थित है—“मैंने तुम्हें फ़ोन किया और तुम मुझसे उत्तर माँग रहे हो”—वह मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। संकट के समय मनुष्य उत्तर खोजता है क्योंकि उत्तर उसे मानसिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन महामारी ऐसी स्थिति थी जहाँ किसी के पास निश्चित उत्तर नहीं थे। इसीलिए कविता का संवाद केवल बौद्धिक संवाद नहीं है; वह चिंताग्रस्त मन की आवाज़ है। मनुष्य उत्तर नहीं, आश्वासन चाहता है। लेकिन कवि के पास आश्वासन नहीं है। यही स्थिति सामूहिक मनोवैज्ञानिक संकट की शुरुआत है।
फ्रायड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक सभ्यता और उसकी असंतुष्टियाँ (Civilization and Its Discontents) में लिखा था कि सभ्यता मनुष्य को सुरक्षा तो देती है, लेकिन उसकी गहरी असुरक्षाओं को कभी पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। महामारी ने इस सत्य को अत्यंत स्पष्ट रूप में सामने ला दिया। कविता में जब कहा जाता है—
“दुनिया का सारा विज्ञान
एक रोएँ के हज़ारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है”
तो यह केवल वैज्ञानिक असफलता का कथन नहीं है; यह मनुष्य के सामूहिक आत्मविश्वास के टूटने का क्षण है। आधुनिक मनुष्य ने विज्ञान को अपने मानसिक संरक्षण के सबसे बड़े साधन के रूप में विकसित किया था। जब वही विज्ञान तत्काल समाधान देने में असमर्थ दिखाई देता है, तो अवचेतन में दबा हुआ भय सतह पर आ जाता है।
मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से कविता का सबसे केंद्रीय तत्व उसका मृत्यु-बोध है। उल्लेखनीय है कि कविता मृत्यु का प्रत्यक्ष चित्रण नहीं करती, लेकिन उसकी उपस्थिति हर जगह महसूस होती है। यह वही स्थिति है जिसे फ्रायड ने मृत्यु-प्रवृत्ति (Death Drive/ Thanatos) के संदर्भ में समझाया था। मृत्यु का भय सामान्य जीवन में दबा रहता है, लेकिन संकट के समय वह अचानक चेतना पर अधिकार कर लेता है। महामारी के दौरान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी नश्वरता का तीव्र बोध हुआ। कविता इसी सामूहिक मृत्यु-चेतना को अभिव्यक्त करती है।
“चिंताओं और शंकाओं के संघर्ष का दौर होगा”—यह पंक्ति विशेष रूप से मनोविश्लेषणात्मक अर्थ ग्रहण करती है। यहाँ चिंता (anxiety) और शंका (uncertainty) केवल सामाजिक परिस्थितियाँ नहीं हैं; वे मानसिक अवस्थाएँ हैं। फ्रायड और बाद में जैक लाकाँ (Jacques Lacan) दोनों ने चिंता को ऐसी स्थिति माना जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व की स्थिरता खोने लगता है। महामारी ने मनुष्य को ठीक इसी स्थिति में पहुँचा दिया। भविष्य अनिश्चित हो गया, संबंध अनिश्चित हो गए, शरीर की सुरक्षा अनिश्चित हो गई और जीवन की निरंतरता भी अनिश्चित हो गई। कविता इस सामूहिक चिंता को केवल दर्ज नहीं करती; उसे भविष्य की दुनिया की मूल संवेदना के रूप में पहचानती है।
मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से कविता का सबसे मार्मिक कथन है—“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी।” यह पंक्ति केवल सामाजिक दूरी का वर्णन नहीं है। यह उस मानसिक विखंडन की ओर संकेत करती है जिसमें व्यक्ति दूसरों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता खोने लगता है। मनुष्य मूलतः संबंधपरक प्राणी है। उसका आत्मबोध भी दूसरों के साथ उसके संबंधों से निर्मित होता है। महामारी ने दूसरों को संभावित खतरे में बदल दिया। निकटता भय का कारण बन गई। इस प्रकार सामाजिक दूरी धीरे-धीरे मनोवैज्ञानिक दूरी में बदलने लगी। कविता इसी गहरे मानसिक परिणाम को पहचानती है।
“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—यह पंक्ति भी मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य अपने शरीर को स्वाभाविक रूप से जीता है। लेकिन बीमारी और मृत्यु का भय शरीर को अत्यधिक सचेत अनुभव में बदल देता है। महामारी के दौरान प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर को लगातार देख रहा था—उसका तापमान, उसकी साँसें, उसका स्वास्थ्य, उसकी प्रतिरोधक क्षमता। शरीर अचानक चिंता का केन्द्र बन गया। इसीलिए कविता में आत्मा शरीर को ढो रही है; अस्तित्व का भार असहनीय हो गया है।
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| Carl Jung |
कार्ल युंग (Carl Jung) के सामूहिक अवचेतन (Collective Unconscious) की अवधारणा के आलोक में भी यह कविता अत्यंत अर्थपूर्ण हो जाती है। महामारी ने केवल व्यक्तिगत भय उत्पन्न नहीं किया; उसने एक वैश्विक सामूहिक भय का निर्माण किया। पूरी मानवता एक साझा आशंका, एक साझा असुरक्षा और एक साझा मृत्यु-बोध का अनुभव कर रही थी। कविता में बार-बार लौटता हुआ “दुनिया” का बिंब इसी सामूहिक मनोवैज्ञानिक अनुभव का संकेत है। यहाँ भय निजी नहीं रह जाता; वह सभ्यता की सामूहिक मानसिक अवस्था बन जाता है।
कविता में देवताओं की असहायता का प्रसंग भी मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
“अल्लाह, ईसा, मूसा और ईश्वर
सबके सब मुँह बाँध कर अपने-अपने कमरे में क़ैद हैं।”
फ्रायड ने धर्म को कई बार मनुष्य की मानसिक सुरक्षा-व्यवस्था के रूप में देखा था। संकट के समय मनुष्य किसी ऐसी शक्ति की कल्पना करता है जो उसे सुरक्षा प्रदान कर सके। लेकिन कविता में देवता भी असहाय हैं। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के पारंपरिक स्रोत भी विफल हो गए हैं। जब देवता भी रक्षा नहीं कर सकते, तब व्यक्ति स्वयं को एक गहरे मानसिक रिक्ति-बोध के भीतर पाता है।
लाकाँ के मनोविश्लेषण में यथार्थ (The Real) की अवधारणा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यथार्थ वह है जिसे हमारी प्रतीकात्मक संरचनाएँ पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकतीं। महामारी ठीक ऐसे ही यथार्थ की तरह प्रकट हुई। विज्ञान, राजनीति, धर्म और मीडिया—सभी उसे पूरी तरह अर्थ नहीं दे सके। वह बार-बार हमारी समझ से बाहर चली जाती थी। कविता में वायरस का निरंतर रूप बदलना इसी यथार्थ का संकेत है। वह मनुष्य की अर्थ-निर्माण प्रक्रियाओं को चुनौती देता है।
“वायरस का कोई पूर्वकाल नहीं होता
उसका सिर्फ़ एक वर्तमान होता है”
यह पंक्ति भी मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय है। भय हमेशा वर्तमान में घटित होता है। स्मृति अतीत की हो सकती है और आशा भविष्य की, लेकिन भय वर्तमान को घेर लेता है। महामारी ने मनुष्य को एक ऐसे वर्तमान में कैद कर दिया था जहाँ भविष्य की कल्पना कठिन हो गई थी। कविता इसी मनोवैज्ञानिक संकुचन को व्यक्त करती है।
कविता में भविष्य का जो चित्र उपस्थित है, वह भी गहरे स्तर पर मनोवैज्ञानिक है। “सराहनाएँ भी शातिर होंगी”, “हर कुछ एक भय की तरह समर्पित होगा”, “लोग लौट रहे होंगे लेकिन लौटने के लिए कुछ न होगा”—ये सभी कथन उस मानसिक संरचना की ओर संकेत करते हैं जिसमें विश्वास की जगह संदेह, आत्मीयता की जगह दूरी और आशा की जगह आशंका ने ले ली है। महामारी ने केवल बाहरी संसार को नहीं बदला; उसने मनुष्य की मानसिक संरचना को भी बदल दिया।
विशेष रूप से यह ध्यान देने योग्य है कि कविता में भय कभी प्रत्यक्ष रूप से चीखता नहीं है। वह एक अंतर्धारा की तरह पूरे पाठ में बहता रहता है। यही उसकी मनोवैज्ञानिक शक्ति है। भय यहाँ घटना नहीं, वातावरण है; अनुभव नहीं, संरचना है। वह हर संबंध, हर संभावना और हर भविष्य-दृष्टि को प्रभावित करता है।
मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से यह कविता महामारी की नहीं, बल्कि मनुष्य के सामूहिक अवचेतन की कविता है। यह उस क्षण को पकड़ती है जब सभ्यता द्वारा दबा दिया गया मृत्यु-बोध पुनः जागृत हो जाता है, जब सुरक्षा के भ्रम टूट जाते हैं, जब देवता और विज्ञान दोनों सीमित सिद्ध होते हैं, और जब मनुष्य अपने भीतर छिपी हुई असुरक्षा, अकेलेपन और नश्वरता का सामना करने के लिए विवश हो जाता है। “चिंताओं और शंकाओं के संघर्ष का दौर” इसलिए केवल महामारी का वर्णन नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की सामूहिक मानसिक अवस्था का निदान है। इस दृष्टि से यह कविता एक गहरी मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक कृति है, जो वायरस से अधिक उस भय का आख्यान लिखती है जो वायरस ने मानव-चेतना के भीतर उजागर कर दिया।
अगर यूटोपिया–डिस्टोपिया अध्ययन (Utopia–Dystopia Studies) के परिप्रेक्ष्य में “उत्तर-कोरोना...” कविता को पढ़ा जाए, तो यह कविता महामारी की तात्कालिक प्रतिक्रिया से कहीं आगे जाकर भविष्य की सांस्कृतिक, नैतिक और राजनीतिक संरचना पर विचार करने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आती है। यह कविता भविष्य की कल्पना अवश्य करती है, किंतु वह भविष्य किसी आदर्श समाज (यूटोपिया) का भविष्य नहीं है; वह एक ऐसे संसार की छवि प्रस्तुत करती है जहाँ मनुष्य जीवित रहेगा, तकनीक विकसित होगी, व्यवस्थाएँ चलती रहेंगी, लेकिन जीवन के वे मानवीय मूल्य, जो सभ्यता को अर्थ प्रदान करते हैं, धीरे-धीरे क्षीण होते जाएँगे। इस अर्थ में यह कविता मूलतः एक डिस्टोपियन (Dystopian) कल्पना का निर्माण करती है। परंतु इसकी विशिष्टता यह है कि यह डिस्टोपिया भय पैदा करने के लिए नहीं रचा गया; यह वर्तमान की उन प्रवृत्तियों को उजागर करने के लिए रचा गया है जो भविष्य में भयावह रूप ग्रहण कर सकती हैं।
यूटोपिया की अवधारणा मूलतः एक आदर्श समाज की कल्पना से जुड़ी है। पुनर्जागरण काल से लेकर आधुनिक युग तक अनेक विचारकों और लेखकों ने ऐसे समाजों की कल्पना की जहाँ न्याय, समानता, स्वतंत्रता और सामूहिक सुख की स्थापना हो चुकी हो। इसके विपरीत डिस्टोपिया उस भविष्य की कल्पना है जहाँ वर्तमान की समस्याएँ चरम रूप धारण कर लेती हैं। डिस्टोपियन साहित्य का उद्देश्य भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि वर्तमान के भीतर छिपे हुए संकटों को अधिक स्पष्ट रूप में दिखाना होता है। इस दृष्टि से श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता एक विशुद्ध डिस्टोपियन पाठ के रूप में पढ़ी जा सकती है।
कविता का शीर्षक ही इस दिशा में संकेत करता है—“उत्तर-कोरोना”। यह केवल महामारी के बाद का समय नहीं है; यह उस भविष्य की कल्पना है जो कोरोना के अनुभवों से निर्मित होगा। लेकिन कवि इस भविष्य को आशावादी दृष्टि से नहीं देखता। वह उसमें एक ऐसी सभ्यता का उदय देखता है जहाँ जीवन तो होगा, लेकिन जीवन की ऊष्मा नहीं होगी; संबंध होंगे, लेकिन आत्मीयता नहीं होगी; कथाएँ होंगी, लेकिन काव्यत्व नहीं होगा। यह डिस्टोपिया की वही संरचना है जहाँ बाहरी व्यवस्था बनी रहती है, पर भीतर से मानवीय संसार रिक्त हो जाता है।
कविता की सबसे मार्मिक, चिन्ताजनक केन्द्रीय पंक्ति—“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी”—पूरे डिस्टोपियन संसार का केन्द्रीय सूत्र बन जाती है। डिस्टोपियन साहित्य में अक्सर यह दिखाया जाता है कि भविष्य में मनुष्य की जैविक उपस्थिति तो बनी रहती है, लेकिन उसकी संवेदनात्मक और नैतिक क्षमताएँ क्षीण हो जाती हैं। यहाँ भी वही स्थिति है। मनुष्य जीवित रहेगा, लेकिन वह उस आत्मीय संसार से कट जाएगा जो उसके अस्तित्व को अर्थ देता है। यह किसी महामारी से उत्पन्न तात्कालिक संकट का चित्र नहीं है; यह उस दीर्घकालिक सांस्कृतिक विघटन की ओर संकेत है जिसमें मनुष्य धीरे-धीरे दूसरों से भावनात्मक रूप से अलग होता जाता है।
इसी प्रकार—“एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी”—डिस्टोपियन भविष्य की एक अत्यंत भयावह छवि निर्मित करती है। यहाँ जीवन केवल जैविक अस्तित्व में सिमट गया है। मनुष्य जी रहा है, लेकिन जीवन का उत्सव समाप्त हो गया है। यह आधुनिक डिस्टोपियाओं की एक प्रमुख विशेषता है कि वे मृत्यु का नहीं, बल्कि अर्थहीन जीवन का भय उत्पन्न करती हैं। कविता में भी संकट यह नहीं है कि मनुष्य नष्ट हो जाएगा; संकट यह है कि वह अपनी मनुष्यता खो देगा।
कविता में बार-बार लौटने वाली अनिश्चितता और भय की भावना भी डिस्टोपियन संवेदना का निर्माण करती है—“यह चिंताओं और शंकाओं के संघर्ष का दौर होगा।”यहाँ भविष्य का मूल भाव आशा नहीं, बल्कि असुरक्षा है। डिस्टोपियन साहित्य का संसार सामान्यतः भय द्वारा संचालित होता है। लोग जीवित रहते हैं, लेकिन उनका जीवन आशंका से घिरा रहता है। कविता इसी मनोवैज्ञानिक वातावरण की रचना करती है। भविष्य का मनुष्य केवल रोग से नहीं, बल्कि संबंधों, व्यवस्थाओं और स्वयं अपने अस्तित्व को लेकर भी आशंकित रहेगा।
कविता का राजनीतिक आयाम भी डिस्टोपियन संरचना को पुष्ट करता है। जब कवि कहता है
—“सत्ताएँ उदार होंगी
शासन सख़्त होगा”,
तो वह एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत कर रहा है जहाँ नियंत्रण और स्वतंत्रता का संबंध जटिल हो चुका है। डिस्टोपियन साहित्य में सत्ता अक्सर प्रत्यक्ष हिंसा से नहीं, बल्कि सुरक्षा, सुविधा और कल्याण के नाम पर काम करती है। यहाँ भी वही स्थिति दिखाई देती है। शासन स्वयं को उदार घोषित करेगा, लेकिन नागरिकों का जीवन अधिक नियंत्रित और अनुशासित होता जाएगा। इस प्रकार कविता भविष्य की राजनीतिक संरचनाओं के भीतर छिपी हुई अधिनायकवादी संभावनाओं को पहचानती है।
कविता का मीडिया-संबंधी व्यंग्य भी डिस्टोपियन संसार का हिस्सा है—“जहाँ ब्रेक के बाद भी/एक पुराना ही चीखता है।”
डिस्टोपियन समाजों में सूचना का प्रवाह रुकता नहीं, बल्कि इतना अधिक हो जाता है कि वास्तविक संवाद असंभव हो जाता है। शोर बढ़ता है, लेकिन अर्थ कम हो जाता है। कविता इसी सूचना-अधिभार की संस्कृति की आलोचना करती है। भविष्य का समाज संचार-संपन्न होगा, किंतु संवाद-विहीन।
विशेष रूप से यह पंक्ति—“अद्भुत होगा यह समय कि अद्भुत जैसा कुछ नहीं होगा”—पूरे डिस्टोपियन अनुभव का सार प्रस्तुत करती है। आधुनिक सभ्यता निरंतर नवीनता और चमत्कारों का उत्पादन करती है। लेकिन इस निरंतर नवीनता के बीच मनुष्य की विस्मय-बोध की क्षमता समाप्त हो जाती है। सब कुछ उपलब्ध है, लेकिन कुछ भी सार्थक नहीं है। यह स्थिति आधुनिक डिस्टोपियाओं का एक केंद्रीय तत्व है—समृद्धि के भीतर रिक्तता, उपलब्धियों के भीतर अर्थहीनता।
कविता का भविष्य केवल तकनीकी या राजनीतिक संकट का भविष्य नहीं है; वह नैतिक संकट का भविष्य भी है—
“यह एक दूसरे की तारीफ़ का दौर होगा
जिसमें सराहनाएँ भी शातिर होंगी।”
यहाँ मानवीय संबंधों की प्रामाणिकता संदिग्ध हो चुकी है। प्रशंसा भी रणनीति बन गई है। विश्वास का स्थान संदेह ने ले लिया है। डिस्टोपियन समाजों में संबंध अक्सर उपयोगितावादी हो जाते हैं। कविता इसी सांस्कृतिक विघटन को दर्ज करती है।
लेकिन यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि कविता का उद्देश्य केवल भय उत्पन्न करना नहीं है। यही उसे साधारण डिस्टोपियन कल्पना से अलग बनाता है। श्रेष्ठ डिस्टोपियन साहित्य भविष्य की भयावहता का चित्रण इसलिए नहीं करता कि पाठक निराश हो जाए, बल्कि इसलिए करता है कि वह वर्तमान की संरचनाओं को अधिक स्पष्ट रूप में पहचान सके। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता भी यही करती है। वह भविष्य के नाम पर वर्तमान की आलोचना करती है। उत्तर-कोरोना संसार वास्तव में उत्तर-कोरोना संसार से अधिक वर्तमान सभ्यता का दर्पण है।
इस दृष्टि से कविता में एक छिपा हुआ यूटोपियाई तत्व भी मौजूद है। यद्यपि कवि किसी आदर्श समाज की प्रत्यक्ष कल्पना नहीं करता, लेकिन जिस चीज़ के लोप पर वह शोक व्यक्त करता है—आत्मीयता, सामूहिकता, काव्यत्व, विश्वास, मानवीय ऊष्मा—वह अप्रत्यक्ष रूप से उन मूल्यों की ओर संकेत करती है जिन्हें वह बचाए रखना चाहता है। डिस्टोपिया यहाँ यूटोपिया की अनुपस्थिति से निर्मित होता है। आत्मीयता के अभाव का वर्णन तभी संभव है जब आत्मीयता को एक मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया हो। इस अर्थ में कविता का डिस्टोपियन संसार एक निहित यूटोपियाई आकांक्षा को भी अपने भीतर सँजोए हुए है।
“यह एक नई शुरुआत होगी / लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा”—यह पंक्ति इसी द्वंद्व को सबसे मार्मिक रूप में व्यक्त करती है। नई शुरुआत की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उसे संभव बनाने वाली मानवीय चेतना संकट में है। इसलिए कविता भविष्य को बंद नहीं करती; वह उसे प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करती है।
अंततः यूटोपिया–डिस्टोपिया अध्ययन के आलोक में यह कविता एक ऐसे भविष्य का आख्यान है जहाँ सभ्यता बची रहती है, लेकिन उसके मानवीय आधार क्षीण हो जाते हैं। यह भयावह भविष्य की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि वर्तमान की आलोचनात्मक पहचान है। कविता दिखाती है कि यदि आत्मीयता की जगह दूरी, समुदाय की जगह अकेलापन, संवाद की जगह शोर, और मानवीय मूल्यों की जगह केवल अस्तित्व की चिंता ले लेगी, तो मनुष्य जीवित तो रहेगा, पर उसका जीवन डिस्टोपियन अनुभव में बदल जाएगा। इसलिए यह कविता भविष्य का चित्रण करते हुए भी मूलतः वर्तमान का नैतिक और सांस्कृतिक परीक्षण करती है। यही इसकी सबसे बड़ी वैचारिक और कलात्मक उपलब्धि है।
वस्तुत: ‘उत्तर-कोरोना...’ ऐसी कविता है जो महामारी को एक व्यापक मानवीय और सभ्यतागत रूपक में रूपांतरित कर देती है। इसके भीतर उभरती हुई दुनिया में भय, नियंत्रण, दूरी और असुरक्षा केवल परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि बदलती हुई सामाजिक चेतना के संकेत हैं। कविता हमें यह समझने का अवसर देती है कि किसी भी संकट की सबसे गहरी चोट केवल शरीर पर नहीं, बल्कि संबंधों, मूल्यों और सामूहिक जीवन-बोध पर पड़ती है। इसी कारण यह रचना कोरोना-काल की स्मृति भर नहीं, बल्कि समकालीन मनुष्य की नियति, उसकी संवेदना और उसके भविष्य को लेकर एक गंभीर आत्मचिंतन के रूप में पढ़ी जानी चाहिए।
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| Kitty O'Meara |
श्रीप्रकाश शुक्ल की “उत्तर-कोरोना...” कविता के साथ किसी समकालीन वैश्विक कविता का तुलनात्मक संदर्भ ढूँढने पर समकालीन अमेरिकी स्त्री-कवि किटी ओ'मीरा (Kitty O'Meara) की कविता ‘एंड द पीपल स्टेड होम’ (And the People Stayed Home, 2020) एक बेहतर उदाहरण प्रतीत होती है। दोनों रचनाओं को साथ रखकर पढ़ना वास्तव में महामारी-साहित्य की दो भिन्न और लगभग विपरीत वैचारिक दिशाओं का अध्ययन करना है। दोनों कविताएँ एक ही ऐतिहासिक अनुभव—कोविड-19 महामारी—से जन्म लेती हैं, दोनों मनुष्य और सभ्यता के भविष्य को ले कर चिंतित हैं, दोनों वर्तमान के संकट से आगे बढ़कर एक उत्तर-कोरोना संसार की कल्पना करती हैं; किंतु जहाँ किटी ओ'मीरा की कविता संकट के भीतर पुनर्जन्म, उपचार और सामूहिक पुनर्निर्माण की संभावना खोजती है, वहीं श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता उसी संकट के भीतर आधुनिक सभ्यता के गहरे अंतर्विरोधों, संबंधों के क्षरण और भविष्य की डिस्टोपियन संभावनाओं को देखती है। एक कविता आशा की दिशा में खुलती है, दूसरी चेतावनी की दिशा में।
उस कविता का सबसे मार्मिक अंश है—
“और लोग अपने घरों में रहे।
उन्होंने सुना, पढ़ा, विश्राम किया और सोचा।
और जब संकट बीत गया,
उन्होंने नए ढंग से जीना शुरू किया।”
(“And the people stayed home.
And listened, and read books, and rested, and exercised, and made art.
And when the danger passed,
and the people joined together again,
they grieved their losses, and made new choices,
and dreamed new images, and created new ways to live...”
इस अंश का मूल भाव यह है कि महामारी मनुष्य के लिए आत्मावलोकन का अवसर बन सकती है। संकट के दौरान मनुष्य रुकता है, स्वयं को सुनता है, अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करता है और अंततः एक अधिक संवेदनशील, अधिक संतुलित तथा अधिक मानवीय संसार की रचना करता है। यह दृष्टि मूलतः यूटोपियाई (Utopian) है। यहाँ महामारी विनाश नहीं, बल्कि रूपांतरण का अवसर है।
इसके विपरीत श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता का केंद्रीय स्वर है—
“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी।”
यहाँ महामारी मनुष्य को बेहतर नहीं बनाती; वह उसकी पहले से मौजूद सभ्यतागत समस्याओं को और अधिक तीव्र तथा स्पष्ट कर देती है। किटी ओ'मीरा जहाँ संकट के बाद पुनर्मिलन (the people joined together again) की कल्पना करती हैं, वहीं श्रीप्रकाश शुक्ल संबंधों के विघटन की आशंका व्यक्त करते हैं। वहाँ समुदाय का पुनर्जन्म है, यहाँ समुदाय का क्षरण।
दोनों कविताओं के बीच सबसे बड़ा अंतर मनुष्य की प्रकृति को लेकर उनकी बुनियादी मान्यता में है। किटी ओ'मीरा का विश्वास है कि मनुष्य संकट से सीखता है। वह अपने दुःखों से गुज़रकर अधिक परिपक्व और अधिक संवेदनशील बन सकता है। इसलिए उनकी कविता में महामारी आत्म-शिक्षा और आत्म-परिवर्तन की प्रक्रिया बन जाती है। यह दृष्टि जाँ-जाक रूसो (Jean-Jacques Rousseau) से ले कर समकालीन पारिस्थितिक मानवीयता तक फैली उस परंपरा से जुड़ती है जो मनुष्य में सुधार की संभावना पर विश्वास करती है।
इसके विपरीत श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता मनुष्य और सभ्यता दोनों के प्रति अधिक संशयशील है। उन्हें भरोसा नहीं कि संकट अपने आप मनुष्य को बेहतर बना देगा। वे देखते हैं कि महामारी के दौरान भय बढ़ा, निगरानी बढ़ी, नियंत्रण बढ़ा, पूँजी का प्रभाव बढ़ा और आत्मीयता कम हुई। इसलिए उनके यहाँ उत्तर-कोरोना संसार एक चेतावनी है। यदि किटी ओ'मीरा की कविता में महामारी एक नैतिक अवसर है, तो श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में वह एक सभ्यतागत परीक्षा है, जिसमें मनुष्य के असफल होने की संभावना भी उतनी ही प्रबल है।
प्रकृति के प्रश्न पर भी दोनों कविताएँ रोचक संवाद करती हैं। किटी ओ'मीरा लिखती हैं कि जब लोग घरों में रहे, तब पृथ्वी ने स्वयं को ठीक करना शुरू किया। वहाँ प्रकृति उपचार और पुनर्जन्म का प्रतीक है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता भी स्वच्छ होती नदियों और बढ़ती ऑक्सीजन का उल्लेख करती है। किंतु दोनों के निष्कर्ष अलग हैं। ओ'मीरा के लिए यह प्रकृति और मनुष्य के बीच नए सामंजस्य का संकेत है; श्रीप्रकाश शुक्ल के लिए यह एक विडम्बनापूर्ण सत्य है कि प्रकृति का स्वास्थ्य कई बार मनुष्य की अनुपस्थिति से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। इसलिए जहाँ एक कविता पुनर्संतुलन देखती है, दूसरी आत्मालोचन की आवश्यकता पर बल देती है।
राजनीतिक दृष्टि से भी दोनों कविताएँ भिन्न हैं। किटी ओ'मीरा की कविता मूलतः नैतिक और मानवीय है; उसमें सत्ता, निगरानी, जैव-राजनीति या पूँजीवाद के प्रश्न लगभग अनुपस्थित हैं। उसके केंद्र में व्यक्ति की आंतरिक यात्रा और सामूहिक पुनर्संधान है। इसके विपरीत श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता आधुनिक सत्ता की संरचनाओं को लेकर अत्यंत सजग है।
“सत्ताएँ उदार होंगी
शासन सख़्त होगा”
जैसी पंक्तियाँ महामारी के भीतर छिपी राजनीतिक प्रक्रियाओं की ओर संकेत करती हैं। इस दृष्टि से उनकी कविता अधिक वैचारिक और अधिक आलोचनात्मक है।
दोनों कविताओं के भविष्य-दर्शन की तुलना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। किटी ओ'मीरा लिखती हैं—
“उन्होंने नए चुनाव किए,
नए सपने देखे,
और जीने के नए तरीके बनाए।”
यह भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ है। इसके विपरीत श्रीप्रकाश शुक्ल लिखते हैं—
“यह एक नई शुरुआत होगी
लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा।”
यहाँ “नई शुरुआत” की संभावना तो है, लेकिन उसे साकार करने वाली मानवीय ऊर्जा संदिग्ध है। यही दोनों कविताओं का मूल अंतर है। एक भविष्य को अवसर के रूप में देखती है, दूसरी प्रश्न के रूप में।
साहित्यिक संरचना की दृष्टि से भी दोनों में अंतर है। “एंड द पीपल स्टेड होम” लगभग एक सांत्वना-कविता (consolation poem) है। उसकी भाषा सरल और आश्वस्तिपूर्ण है। वह पाठक को भय से बाहर निकालना चाहती है। इसके विपरीत “उत्तर-कोरोना” एक चिंतनपरक और भविष्यसूचक कविता है। वह पाठक को सांत्वना नहीं देती; वह उसे असुविधाजनक प्रश्नों के सामने खड़ा करती है। उसकी भाषा में भविष्यवाणी, व्यंग्य, संशय और दार्शनिक बेचैनी का सम्मिश्रण है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि दोनों कविताएँ महामारी की दो परस्पर विरोधी कल्पनाएँ प्रस्तुत करती हैं। किटी ओ'मीरा की कविता महामारी को मानवता के नैतिक पुनर्जन्म की संभावना के रूप में देखती है, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता उसे आधुनिक सभ्यता की अंतर्निहित समस्याओं के उद्घाटन के रूप में। एक कविता उपचार की भाषा बोलती है, दूसरी आत्मालोचन की। एक यूटोपियाई क्षितिज रचती है, दूसरी डिस्टोपियाई संभावनाओं को सामने लाती है। फिर भी दोनों का साझा बिंदु यह है कि वे महामारी को केवल चिकित्सकीय घटना नहीं मानतीं; वे उसे मनुष्य, समाज और भविष्य के बारे में सोचने का अवसर बनाती हैं।
यदि एक वाक्य में दोनों का अंतर व्यक्त करना हो, तो कहा जा सकता है—किटी ओ'मीरा की “एंड द पीपल स्टेड होम” कविता महामारी के बाद एक अधिक मानवीय दुनिया का स्वप्न देखती है, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल की “उत्तर-कोरोना...” यह पूछती है कि क्या मनुष्य उस दुनिया को बनाने के लिए पर्याप्त आत्मीयता और विवेक बचा पाएगा।
स्मरणीय है कि अमरीकी स्त्री-कवि किटी ओ'मीरा (Kitty O'Meara) द्वारा रचित कविता “एंड द पीपल स्टेड होम” (And the People Stayed Home,2020) कोविड-19 महामारी के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में चर्चित हुई। यह कविता किसी पारंपरिक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित न हो कर मार्च 2020 में कवयित्री द्वारा ऑनलाइन साझा किए गए पाठ के रूप में प्रसारित हुई और बाद में महामारी-साहित्य की प्रतिनिधि रचनाओं में गिनी जाने लगी।
एक बात और उल्लेखनीय है। “एंड द पीपल स्टेड होम” की लोकप्रियता असाधारण रही, किंतु साहित्यिक आलोचना की दुनिया में इसे उतनी केंद्रीय मान्यता नहीं मिली जितनी महामारी पर लिखी गई कुछ अन्य कविताओं—जैसे आर्मिटेज (Simon Armitage) की ‘लॉकडाउन’ (Lockdown)—को प्राप्त हुई। इसलिए तुलनात्मक संदर्भ स्थापित कर है, तो किटी ओ'मीरा के साथ आर्मिटेज (Simon Armitage) की ‘लॉकडाउन’ (Lockdown) कविता का उल्लेख भी ज़रूरी है।
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| Simon Armitage |
सिमोन आर्मिटेज (Simon Armitage) की ‘लॉकडाउन’ (Lockdown) कविता मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान ‘द गार्जियन’ में प्रकाशित हुई थी। यह कविता इंग्लैंड के ऐतिहासिक प्लेग-ग्राम (Eyam) की स्मृति को वर्तमान महामारी से जोड़ती है और अलगाव, दूरी तथा मानवीय संबंधों के संकट को केंद्र में रखती है। कविता के एक अत्यंत मार्मिक अंश का हिन्दी रूपान्तरण प्रस्तुत है—
“और जब हम एक-दूसरे से दूर रहने के लिए विवश थे,
तब प्रेम ने बादलों को अपना दूत बना लिया।”
(मूल अंग्रेज़ी से उद्धृत अंश:)
“Love lettered on a cloud.”
यद्यपि यह बहुत छोटा अंश है, पर पूरी कविता का भाव-सार इसी में निहित है। महामारी ने मनुष्यों को एक-दूसरे से अलग कर दिया है; ऐसे में प्रेम और आत्मीयता को नए माध्यम खोजने पड़ते हैं। दिलचस्प है कि आर्मिटेज अपनी कविता में कालिदास के मेघदूत की स्मृति का भी उपयोग करते हैं।
अब यदि इसकी तुलना श्रीप्रकाश शुक्ल की “उत्तर-कोरोना..” से की जाए, तो एक अत्यंत रोचक वैचारिक अंतर सामने आता है।
दोनों कविताओं का आरंभिक बिंदु महामारी है, दोनों मनुष्यों के बीच बढ़ी हुई दूरी को पहचानती हैं, और दोनों इस बात को स्वीकार करती हैं कि महामारी केवल चिकित्सकीय घटना नहीं, बल्कि संबंधों और संवेदनाओं का भी संकट है। किंतु यहीं से दोनों की दिशाएँ अलग हो जाती हैं।
आर्मिटेज की कविता में अलगाव के बीच भी संबंध की संभावना बची रहती है। वहाँ दूरी है, पर संवाद की इच्छा भी है; एकांत है, पर प्रेम का अवशेष भी है। महामारी मनुष्यों को अलग करती है, किंतु आत्मीयता को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाती। इसीलिए बादल अभी भी संदेशवाहक बन सकता है। लॉकडाउन में संकट के भीतर मानवीय जुड़ाव की संभावना संरक्षित है।
इसके विपरीत श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता महामारी को भविष्य की एक व्यापक सांस्कृतिक संरचना के रूप में देखती है। उनके यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि लोग एक-दूसरे से दूर क्यों हैं; प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में निकटता की इच्छा भी बची रहेगी। इसीलिए वे लिखते हैं—“आत्माएँ होंगी आत्मीयता न होगी।” यहाँ आत्मीयता केवल बाधित नहीं हुई है; उसके क्षरण की आशंका व्यक्त की गई है। आर्मिटेज के यहाँ दूरी अस्थायी है, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ दूरी एक सभ्यतागत नियति में बदलती दिखाई देती है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि लॉकडाउन मूलतः मानवीय करुणा और स्मृति की कविता है, जबकि उत्तर-कोरोना सत्ता, जैव-राजनीति, पूँजी, निगरानी, भय और उत्तर-मानवतावादी संकट तक फैली हुई कविता है। आर्मिटेज का ध्यान मुख्यतः मनुष्यों के बीच बिछोह पर है; श्रीप्रकाश शुक्ल का ध्यान उस समूची दुनिया पर है जो महामारी के बाद निर्मित होगी।
यदि तुलनात्मक अध्ययन की भाषा में कहा जाए, तो—साइमन आर्मिटेज की लॉकडाउन महामारी के भीतर आत्मीयता को बचाए रखने की कविता है, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘उत्तर-कोरोना ...’ महामारी के बाद आत्मीयता के भविष्य पर उठाया गया एक दार्शनिक प्रश्न है।यही कारण है कि लॉकडाउन कारुणिक पाठ है, जबकि ‘उत्तर-कोरोना ...’ सभ्यता की समीक्षा का पाठ बन जाती है।
सन्दर्भ:
बुनियादी पाठ
शुक्ल, श्रीप्रकाश. ‘उत्तर-कोरोना’ (कविता) http://pahleebar.blogspot.com/2020/07/blog-post_12.html
अन्य ग्रन्थ:
Agamben, Giorgio. State of Exception. Translated by Kevin Attell, University of Chicago Press, 2005.
Armitage, Simon. “Lockdown.” The Guardian, March 2020.
Bauman, Zygmunt. Liquid Modernity. Polity Press, 2000.
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Foucault, Michel. The History of Sexuality, Volume 1: An Introduction. Translated by Robert Hurley, Pantheon Books, 1978.
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Latour, Bruno. We Have Never Been Modern. Translated by Catherine Porter, Harvard University Press, 1993.
Lyotard, Jean-François. The Postmodern Condition: A Report on Knowledge. Translated by Geoff Bennington and Brian Massumi, University of Minnesota Press, 1984.
Marx, Karl. Capital: A Critique of Political Economy, Volume 1. Translated by Ben Fowkes, Penguin Books, 1990.
O’Meara, Kitty. “And the People Stayed Home.” 2020.
Sartre, Jean-Paul. Being and Nothingness: An Essay on Phenomenological Ontology. Translated by Hazel E. Barnes, Washington Square Press, 1956.
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| रवि रंजन |
सम्पर्क
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (से. नि.),
हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय
हैदराबाद
संपर्क :
ई मेल : raviranjan@uohyd.ac.in















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