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कृष्ण मोहन का आलेख 'निर्मल वर्मा का चिंतन'

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निर्मल वर्मा  किसी भी लेखक की पहचान उसके चिन्तनपरक आलेखों से की जा सकती है। इन आलेखों में लेखक अपने हवाले से बात तो करता ही है, अपनी बात के समर्थन में साक्ष्य भी प्रस्तुत करता है। साक्ष्यों का यह प्रस्तुतीकरण भी उस की सोच और अवधारणा को ही स्पष्ट कर देते हैं। निर्मल वर्मा नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकारों में से एक रहे हैं। अगर उनके समूचे चिंतन पर दृष्टिपात किया जाए तो आप पाएंगे कि वह भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या के लिए ही समर्पित है। लेकिन क्या उनकी यह व्याख्या भारतीय परम्परा का समग्र विवेचन कर पाती है या फिर यह विवेचन आपको सोच के किसी पुरातन द्वीप पर ही ले जा कर छोड़ देता है और अन्ततः वर्तमान के धरातल पर आपको निराश करता है। बुद्धिजीवी वर्ग समय समय पर भारतीयता के बारे में अपनी राय व्यक्त करता रहा है। लेकिन मूल रूप से देखा जाए तो यह अवधारणा रैखिक तो कतई नहीं है। बल्कि इसके अनेक आयाम हैं। भारतीयता की अवधारणा को पश्चिम की तुला पर रख कर तो परखा भी नहीं जा सकता। भारतीयता की अवधारणा को ले कर निर्मल जी ने खुल कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इस चिन्तन की आलोचकीय पड़ताल ...

कृष्णमोहन का आलेख 'इक़बाल नेहरू और बंटवारा'

इक़बाल, नेहरू और बंटवारा कृष्णमोहन 'समयांतर' के जनवरी 2022 अंक में छपे अपने इस लेख को यहाँ फ़ेसबुक के मित्रों के लिए क्रमशः प्रस्तुत कर रहा हूँ।)    (1)    देश के बंटवारे को गुज़रे एक अर्सा हो गया था, जब विगत सदी के आख़िरी दशक में इसके प्रति नई जिज्ञासा हिंदी-उर्दू भाषी समाज में दिखाई पड़ी थी। संतोष की बात है कि वह सिलसिला आगे बढ़ता रहा। अब हम बंटवारे के इतिहास की छानबीन में कुछ और गहरे उतरने की ज़रूरत महसूस कर रहे हैं। उर्दू के महान शायर मुहम्मद इक़बाल के विचारों की भूमिका इस प्रक्रिया में क्या थी, यह सवाल अक्सर हिंदी समाज के बाशिंदों के दिलो-दिमाग़ में भी उठता रहता है। हाल ही में हिंदी की एक प्रमुख पत्रिका 'आलोचना' ने बंटवारे पर केंद्रित अपने दो अंक 59 और 60 निकाले हैं। इसके पहले भाग यानी 59वें अंक में इसके संपादक आशुतोष कुमार का एक लंबा संपादकीय-लेख छपा है। इस लेख की ख़ासियत यह है कि इसमें बंटवारे, और उसमें इक़बाल की भूमिका के संदर्भ में चली पुरानी बहसों से लेकर नवीनतम रणनीतियों की झलक मिल जाती है। किसी भी समाज में पैदा होने वाले विचारों से जूझे बिना उनमें कोई नया उन्मेष नह...