कृष्ण मोहन का आलेख 'निर्मल वर्मा का चिंतन'


निर्मल वर्मा 


किसी भी लेखक की पहचान उसके चिन्तनपरक आलेखों से की जा सकती है। इन आलेखों में लेखक अपने हवाले से बात तो करता ही है, अपनी बात के समर्थन में साक्ष्य भी प्रस्तुत करता है। साक्ष्यों का यह प्रस्तुतीकरण भी उस की सोच और अवधारणा को ही स्पष्ट कर देते हैं। निर्मल वर्मा नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकारों में से एक रहे हैं। अगर उनके समूचे चिंतन पर दृष्टिपात किया जाए तो आप पाएंगे कि वह भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या के लिए ही समर्पित है। लेकिन क्या उनकी यह व्याख्या भारतीय परम्परा का समग्र विवेचन कर पाती है या फिर यह विवेचन आपको सोच के किसी पुरातन द्वीप पर ही ले जा कर छोड़ देता है और अन्ततः वर्तमान के धरातल पर आपको निराश करता है। बुद्धिजीवी वर्ग समय समय पर भारतीयता के बारे में अपनी राय व्यक्त करता रहा है। लेकिन मूल रूप से देखा जाए तो यह अवधारणा रैखिक तो कतई नहीं है। बल्कि इसके अनेक आयाम हैं। भारतीयता की अवधारणा को पश्चिम की तुला पर रख कर तो परखा भी नहीं जा सकता। भारतीयता की अवधारणा को ले कर निर्मल जी ने खुल कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इस चिन्तन की आलोचकीय पड़ताल की है कृष्ण मोहन ने। कल 3 अप्रैल को निर्मल वर्मा का जन्मदिन था। उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं कृष्ण मोहन का आलेख 'निर्मल वर्मा का चिंतन'।


'निर्मल वर्मा का चिंतन'


कृष्ण मोहन


निर्मल वर्मा का समूचा चिंतन भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या को समर्पित है। उनके विचारपरक निबन्धों से गुज़रते हुए पहली अनुभूति एक ऐसे लेखक से रू-ब-रू होने की होती है जो अपनी मान्यताओं के आख़िरी छोर तक पहुँच चुका है और अब उस पर पुनर्विचार या बहस-मुबाहसे की कोई ज़रूरत या गुंजाइश नहीं है। ज़रूरत है उसको बार-बार दुहराने की, ताकि तर्क, बुद्धि और इतिहास जैसे 'पश्चिमी' मूल्यों से आक्रांत भारतीय मन को वापस उसकी सहजता प्रदान की जा सके। वैचारिक निष्ठा का यह विरल उदाहरण अपनी मान्यताओं की जाँच-परख के लिए आकर्षित करता है। यहाँ हम उनके वैचारिक लेखन में आई स्थापनाओं के आलोक में उनकी भारतीयता की अवधारणा पर विचार करेंगे।


भारतीय और यूरोपीय संस्कृति की विशेषताओं को चिह्नित करते हुए निर्मल वर्मा लिखते हैं-'संस्कृति का यह भारतीय स्वरूप पश्चिम की सांस्कृतिक धारा से नितांत भिन्न है।... अतः यूरोप में वैयक्तिक चेतना और धार्मिक विश्वासों के बीच एक चौड़ी खाई खुलती गई, अपनी चेतना में मनुष्य अकेला और निस्सहाय पड़ता गया; जबकि दूसरी तरफ धर्म जीवन-धारा से कट कर केवल चर्च की एकाधिकार "सम्पत्ति" बन कर रह गया, जिसके सामने व्यक्ति घुटने टेक कर पीड़ा से छुटकारा तो पा सकता था किंतु इस धरती पर सम्पूर्ण जीवन की उपलब्धि नहीं। इसके विपरीत भारतीय चेतना में इस तरह का कोई विभाजन न था, यह तथ्य उल्लेखनीय है; क्योंकि इसी में भारतीय संस्कृति का विशिष्ट पहलू छिपा है। यहाँ किसी भी समय मनुष्य की धार्मिक अंतर्दृष्टि और सांसारिक (सेक्युलर) अनुभवों के बीच विभाजन-रेखा नहीं खींची गई। मनुष्य अपने सांसारिक कार्यकलापों का अर्थ  धार्मिक प्रतीकों द्वारा उद्घाटित करता था, दूसरी ओर उसके धार्मिक अनुष्ठान उसके दैनिक जीवन के आचार-विचार से जुड़े थे।... भारतीय मनीषा का निर्माण व्यक्ति के ऐतिहासिक बोध द्वारा नहीं, मिथकों, प्रतीकों और संस्कारों के संश्लिष्ट प्रवाह में लक्षित होता है, जो इतिहास को नकारता नहीं, केवल उसकी लहरों को अपनी मूलधारा में समाहित कर लेता हैं। यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि जिस विशिष्ट अर्थ में हम यूरोपीय संदर्भ के "इतिहास" का उल्लेख करते हैं, जहाँ वह जीवन के विभिन्न मोड़ों को इंगित करता है, उस अर्थ में भारत का कोई इतिहास नहीं है। वाह्य परिवर्तनों के बावजूद भारत की मूल जीवन धारा में कोई बुनियादी अंतर नहीं आया है।….. हमारी चेतना की अँधेरी मिथक-जड़ों ने खुद अक्षुण्ण रह कर इतिहास के पानी को अपने ऊपर से बह जाने दिया और दूसरी तरफ व्यावहारिक स्तर पर हमें बराबर बदलते हुए ऐतिहासिक यथार्थ से समझौता भी करना पड़ा है। दरअसल भारतीय "चरित्र" का निर्माण इन दो पाटों के बीच हुआ है।' ('अंतर्यात्रा', भाग एक, सं. नंदकिशोर आचार्य, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 344-5-6)


निर्मल वर्मा के लेखन में कहे हुए से कहीं अधिक महत्त्व अनकहे का है— 'सच पूछें तो मौन के इस अनछुए, अनखोजे संसार के बीच ही एक लेखक, एक कवि, एक कलाकार अपना डेरा, अपना बेसकैंप बनाता है, ताकि एक पर्वतारोही की तरह, वह अपनी रचना में उस समूचे प्रदेश को रूपायित कर सके, जो अब तक अभाषित और अपरिभाषित पड़ा था। मौन को भाषित करने के लिए नहीं, बल्कि भाषित में मौन को उजागर करने के लिए।' (वही, पृ. 474)



इस नज़रिये से अगर देखें तो सबसे पहले जो बात ऊपर दिए अंश से समझ में आती है, वह यह है कि भारतीय राष्ट्र की मूल विशेषता सांस्कृतिक है, उसकी संस्कृति धर्म पर आधारित है तथा धर्म अपने मिथक, प्रतीक, संस्कार, अनुष्ठान और कर्मकांड पर। इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी कह सकते हैं। इस  धर्म का नाम निर्मल वर्मा ने नहीं बताया है, लेकिन पश्चिम की ऐतिहासिक परिवर्तनशीलता के बरक्स इसकी सबसे बड़ी पहचान चेतना के शाश्वत प्रवाह में इसकी निमग्नता है। आधुनिक युग मे आ कर भारत की चेतना में इतिहास ने ख़लल डाल दिया और उसकी यह सनातन नींद उचट गई। 19वीं सदी के पुनर्जागरण और बीसवीं सदी में हुए राष्ट्रीय आंदोलन और स्वाधीनता के यत्किंचित अनुभव भी अपने परंपरागत मार्ग के विपरीत ही था किंतु सौभाग्यवश इतिहासवाद का यह जहाज़ 'शताब्दी के ढलते वर्षों' में ख़ुद ही संकटग्रस्त हो गया और हमें अपनी अँधेरी मिथक-जड़ों की ओर लौटने का मौक़ा मिल गया।


ज़ाहिर है, यह चिंतन न केवल चयनधर्मी है, बल्कि पर्याप्त रचनात्मक भी है। इसके मुताबिक़ भारत की परंपरा हमेशा से 'धर्म' के प्रतीकों और बिम्बों से अनुशासित रही है, और अपने मूल रूप में आज भी क़ायम है। इस दृष्टिकोण में न तो भारत की भौगोलिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति कोई सम्मान है, न ही दार्शनिक-धार्मिक बहुलता के लिए कोई जगह। ग़ौरतलब है कि प्राचीन भारत की लोकायत, बौद्ध, जैन, न्याय-वैशेषिक और सांख्य जैसी अधिकांश विचार-परंपराएँ मूलतः पदार्थवादी-निरीश्वरवादी थीं, जिनका सीधा विरोध उन परंपराओं-कर्मकांडों से था जिन्हें निर्मल वर्मा भारतीयता का पर्याय बताते हैं।


दूसरे शब्दों में, भारतीय चिंतन की एक राह बुद्धि, विवेक, तर्क, और औचित्य की ओर जाती थी, तथा दूसरी राह जटिल कर्मकांडों और मूढ़ अंधविश्वासों के प्रचार से जनता की चेतना को कुंद करके कुलीन वर्गों की स्वार्थसिद्धि में सहायक होती थी। दोनों के अलग-अलग सामाजिक आधार रहे हैं और प्राचीन काल से लेकर अब तक उनके बीच भीषण रक्तरंजित संघर्ष छिड़ा हुआ है। जहां तक इतिहास का सवाल है तो उसके विभिन्न चरणों से होकर भारतीय समाज भी गुज़रा है। अगर ऐसा न होता तो एक समय के देवराज इंद्र का यह हश्र न होता कि आज कोई उनका नामलेवा भी नहीं बचा। कोई परम आत्ममुग्ध विचारक ही समस्त ऐतिहासिक साक्ष्यों से आँख मूँद कर ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी में आदिम कबीलों से सामंती राज्यों की तरफ हुए संक्रमण को नकार सकता है। बहरहाल, बेहतर होगा कि निर्मल वर्मा जिस बात का ऐसा एकनिष्ठ आग्रह कर रहे हैं उसे कुछ और करीब से देखा जाए ताकि पता चल सके कि वे ठीक-ठीक क्या चाहते हैं।


निर्मल वर्मा अपने लेखों में धर्म को किसी टेक की तरह दुहराते हैं, पर साथ ही उसे भरसक अमूर्त भी बनाए रखना चाहते हैं, ताकि उसको भारतीयता का पर्याय बनाए रख सकें। एक जगह वे कहते हैं- 'धार्मिक बोध से- मेरा अभिप्राय किसी एक खास धर्म या संस्थान से नहीं है, बल्कि उस धीमी आवाज से है जिसने पहली बार मनुष्य और सृष्टि के बीच फैले अँधेरे मौन को तोड़ा था।" (वही, पृ. 380-1) जर्मनी के हैडिलबर्ग विश्विद्यालय में 'भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र' शीर्षक आलेख पढ़ते हुए वे बताते हैं, 'पिछले तीन हजार वर्षों में शायद ही कोई ऐसा समय रहा हो जब भारत को "यवनों" और "म्लेच्छों" ने न घेरा हो; पहले यूनानियों और हूणों ने, फिर इस्लाम और उसके ठीक बाद ईसाई मिशनरियों और यूरोपीय विजेताओं ने।' (वही, पृ. 385) यहाँ तीन हज़ार वर्षों का कालखंड बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सिर्फ़ 500 वर्ष और पीछे जाने पर आर्यों के भारत आगमन, सिंधु सभ्यता के विनाश, असुरों और दस्युओं द्वारा निर्मित नागर सभ्यता के ध्वंस के लिए 'असुरघ्न' और 'पुरंदर' इंद्र का आह्वान करने वाले ऋग्वेद के 'आध्यात्मिक' श्लोकों की याद आ जाने की संभावना थी। 'धार्मिक बोध' से आच्छादित इस माहौल में यह कहना तो हिमाक़त ही होगी कि किसी देश में रहने के लिए उसकी नागरिकता और राशन कार्ड लेने की अनिवार्यता उसी आधुनिक युग की देन हैं, जिसके निर्मल वर्मा इतने विरोधी हैं। पुराने ज़माने में इंसानी काफ़िले नदियों के किनारे अच्छी जगह देख कर अपनी बस्तियाँ बसा लेते थे। वही उनका देस होता था, और बाक़ी परदेस। आज जिसे हम भारत भूमि कहते हैं, वह अपनी प्रकृति के कारण हमेशा से घना बसेरा रही है, और भारतीयता का विचार अगर सार्थक है तो इसी वजह से, इसके बावजूद नहीं।




ऊपर दिए उद्धरण के तुरंत बाद निर्मल वर्मा लिखते हैं- 'भारतीय संस्कृति का अद्वितीय लक्षण यह नहीं है कि कैसे वह शताब्दियों से होने वाली निरन्तर और हिंस्र विदेशी घुसपैठों में जीवित रही आई, बल्कि यह है कि वह उनकी प्रभुसत्ता के बावजूद किस तरह अपने को अक्षत रख सकी। यहाँ तक कि सिकंदर की प्रसिद्ध जीवन-गाथा जो एशिया के तमाम भागों में प्रसिद्ध हुई, हिन्दू भारत द्वारा पूरी तरह उपेक्षित रही।' इसके बाद वे यूनानी, चीनी, और मुसलमान यात्रियों का हवाला देते हैं जिनसे हमें भारतीयों के बारे में पता चलता है, लेकिन भारतीय इन आगंतुकों के बारे में क्या सोचते थे इसका कोई साक्ष्य नहीं मिलता। यहाँ तक आते-आते लेखक भारतीयों को हिन्दू के पर्याय के रूप में चिह्नित कर लेता है, और दोनों शब्द एक-दूसरे के विकल्प के रूप में आने लगते हैं। इस पद्धति पर अगर ग़ौर करें तो पाएंगे कि भारतीयों की 'अद्वितीयता' 'दूसरे धर्मों और संस्कृतियों के प्रति चुप्पी और उदासीनता' है, जिसके चलते वे 'उनकी प्रभुसत्ता के बावजूद अपने को अक्षत रख सके'। स्पष्ट है कि इस 'अद्वितीयता' के लिए दूसरों का सन्दर्भ अनिवार्य है, लेकिन भूलभुलैया से आती-सी लगती आवाज में लेखक उसी पृष्ठ पर घोषणा करता है- ' "अन्य" संस्कृतियों के प्रति उनकी उदासीनता का एक अधिक गंभीर कारण भी था; वह यह कि उनके लिए अपनी अस्मिता को परिभाषित करने का सन्दर्भ कभी "अन्य" रहा ही नहीं जैसा वह यूरोपियों के लिए था।'


बहरहाल, इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं है, क्योंकि दोमुंहापन भी उस परंपरा की एक अद्वितीय विशेषता रही है, जिसे निर्मल वर्मा भारतीयता के नाम पर स्वीकार्य बनाना चाहते हैं। यह परंपरा हिन्दू धर्म की नहीं है जिसे यह नाम बहुत बाद में समस्त ग़ैरमुस्लिम (यानी अन्य ही के संदर्भ में) भारतीय धर्मों के लिए दिया गया था। यह परंपरा उस वर्णाश्रमवाद की है, जो 'हिंदुत्व' की खाल ओढ़ कर समूची भारतीय परंपरा पर अपना दावा जताने निकला है। भारत से ज्ञान, विवेक, तर्क, और मनुष्यता का समूल उच्छेद करने का अपना पुराना सपना पूरा करने यह फिर आया है। भारत ही की तरह पश्चिम की भी सभी मानववादी परंपराएँ इसके निशाने पर रही हैं और हर तरह की मनुष्य-विरोधी शक्तियाँ इस पर आँख मूँद कर भरोसा करती आई हैं।


रिनेसाँयुगीन मानववाद के बारे में निर्मल वर्मा के विचार उल्लेखनीय हैं- 'किसी हिन्दू की अस्मिता यूरोपीय के बरक्स आत्म की स्वायत्त सत्ता में नहीं बल्कि विश्वासों, अनुष्ठानों और जातिगत दायित्वों की उस वृहत्तर बनावट में वास करती थी जिससे उसके धर्म का गठन होता था।… उन्होंने मनुष्य की उस आदर्श छवि को (यहाँ "को" की जगह "का" होना चाहिए, "को" अंग्रेज़ी वाक्य रचना के प्रभाव में आया है---लेखक) आयात करने से इन्कार कर दिया जो पश्चिम के मानवतावादी आदर्शों के साँचे में तैयार की गई थी, जहाँ मनुष्य ही विकास का अंतिम चरण है और इसलिए वही सारी चीजों को परखने का आधार है। यह उसी विश्वास की तार्किक परिणति है जिसमें पृथ्वी को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा जाता था।' (वही, पृ. 396) 


रिनेसाँ (या पुनर्जागरण) युग ने मनुष्य को अपने चिंतन के केंद्र में रखा इसलिए उसे लेखक का कोपभाजन बनना पड़ा। इसका आरंभ पृथ्वी केन्द्रिकता के बीच हुआ था लेकिन इसकी 'तार्किक परिणति' तो इस रूढ़ि के ख़िलाफ़ जीवन-मरण के संघर्ष में हुई। क्या निर्मल वर्मा ब्रूनो, कापरनिकस और गैलीलियो के प्रयासों को रिनेसाँ से अलग या उसके विरुद्ध साबित करना चाहते हैं। ऐसे कुतर्कों को महज़ लापरवाह वक्तव्य मान कर छोड़ देना भूल होगी। कोई भी देख सकता है कि इसके पीछे सामाजिक विषमता का पक्षधर एक निहायत पिछड़ा हुआ दिमाग़ है, जो मनुष्य-मात्र को महत्व देने के कारण रिनेसाँ को उस ईसाइयत में गर्क कर देना चाहता है जिसके अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ लड़ते हुए वह विकसित हुआ था। इशारों इशारों में ऐसा विषवमन निर्मल वर्मा के चिंतन की सहज विशेषता है। यहाँ सिर्फ़ एक उदाहरण पर्याप्त होगा। हिंदू धर्म के बारे में बताने के लिए हमेशा की तरह एक बार फिर ईसाई धर्म का संदर्भ लेते हुए कहते हैं— 'वहाँ मनुष्य का जीवन सेक्युलर और धार्मिक खंडों में विभाजित नहीं है, जो सप्ताह में रविवार की सुबह कुछ घंटों के लिए समन्वित है और बाकी दिनों में एक-दूसरे को छूता भी नहीं।' (वही, पृष्ठ 38)



मानववाद पर हमले की अगली खेप में उनके चिंतन का सारतत्व छिपा हुआ है- 'अगर एक बार हम मनुष्य को पृथ्वी पर रहने वाले अन्य प्राणियों से उच्चतर मान लेते हैं तब हमें तार्किक रूप से किसी एक तरह के मनुष्य को शेष मानव जाति से उच्चतर मानने से और फिर यूरोपीय सभ्यता के ढाँचे में यूरोपीय मनुष्य की किसी एक छवि या विचारधारा को, फ़ासिज़्म या साम्यवाद को अन्य विचारधाराओं से उच्चतर मानने से कोई नहीं रोक सकेगा।' (वही, पृ. 396) 


देखा आपने, निर्मल भी तर्क दे सकते हैं। इस वक्तव्य में वर्णाश्रमवादी विचारधारा के चरित्र के अनुरूप ही बाक़ायदा धमकी दी गई है, अगर मानववाद को नहीं छोड़ा गया तो फ़ासीवाद का परचम उठा लेना पड़ेगा। कहने को साम्यवाद का भी नाम ले लिया है, लेकिन वह तो मानववाद पर ही आधारित है, इसलिए उसको 'उच्चतर' मानने का प्रश्न कम से कम निर्मल वर्मा के लिए नहीं उठ सकता।


अब ज़रा सिक्के के दूसरे पहलू पर ग़ौर करें। मनुष्य को भी दूसरे जीव-जंतुओं की श्रेणी में रख देने पर मानव समाज में भी जंगल का कानून अथवा 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' के नियम के लागू होने से इन्कार करना संभव नहीं होगा। जार्ज ऑरवेल की एक यादगार अभिव्यक्ति का असर लेते हुए कहा जा सकता है कि जहाँ मनुष्य और पशु एक नज़र से देखे जाएंगे, वहाँ कोई पशु तो मनुष्य नहीं बन सकेगा, अनेक मनुष्य ज़रूर पशु की हालत में पहुँच जाएंगे। इसे ही 'सामाजिक डार्विनवाद' कहते हैं, जो हर फ़ासीवाद समर्थक चिंतन का अनिवार्य घटक होता है। निर्मल वर्मा की मूल चेतना वर्णाश्रमवादी है, भारतीय फ़ासीवाद जिससे नाभिनालबद्ध है। अपनी तथाकथित भारतीयता को यथासंभव रहस्यमय और आदर्शीकृत रूप देने के बावजूद यह सत्य उनके अपने वक्तव्यों से ही उजागर हो जाता है। विश्वासों, अनुष्ठानों, और जातिगत दायित्वों में इसके धार्मिक गठन का प्रसंग हम देख चुके हैं। अब ज़रा वर्णव्यवस्था को इसमें मिलने वाली केंद्रीय हैसियत पर ग़ौर करें- 'हिंदुओं के लिए जब तक "अन्य" किसी तरह अपने या अपने आंतरिक तंत्र में समाविष्ट न हो, वह एक ऐसा संबोधी हो ही नहीं सकता, जिससे अर्थपूर्ण संवाद किया जा सके। अगर अस्पृश्यता की समस्या हिन्दू समाज में विवादास्पद हो सकी तो इसका कारण यह है कि शूद्र वर्ण-व्यवस्था में समाविष्ट हैं लेकिन वे तब भी समाज की परिधि पर बने रहे। वे म्लेच्छों की तरह पराए तो नहीं, लेकिन वे पूरी तरह भीतर के भी नहीं थे।' (वही, पृ. 387)


सवाल यह है कि 'शूद्र' 'म्लेच्छों' की तरह नहीं तो क्या अनार्यों की तरह 'पराए' थे। जाति, वर्ण, और नस्ल के गंदे घोल से बनी यह तस्वीर आख़िर किस भारत की है।  शूद्र अपने होते तो यही तो होता कि अस्पृश्यता निर्विवाद रहती। इसी विवाद का निर्मल वर्मा को दुख है। दलितों के प्रतिरोध को पचाने में उन्हें कामयाबी नहीं मिली। हालांकि, जहाँ कामयाबी मिल गई वहाँ उनकी ख़ुशी भी छिपाए नहीं छिपती, जैसे कि बौद्ध धर्म के मामले में- 'वे पराये होते हुए भी अपने थे और अन्ततः वे बिल्कुल अपने हो गए, औए बौद्ध धर्म भारत मे लुप्त नहीं, लीन हो गया। दूसरी ओर इस्लाम और ईसाई धर्म अपने असंदिग्ध पराएपन के कारण आज तक संस्थाबद्ध रूप में भारत में अस्तित्वमान हैं।' (वही)



निर्मल वर्मा को बताना चाहिए कि उनके भारत का असली बाशिंदा कौन है। सच तो यह है कि उनकी बाजी हमारे समाज मे पाए जाने वाले भाँति-भाँति के अंधविश्वासों, रूढ़ियों और कुरुचिपूर्ण रिवाजों पर लगी हुई है। इनका आदर्शीकरण कर के, इन्हें जनसमुदाय की चेतना को कुंद करने वाले औजार में बदलते हुए भारतीयता का उनका विचार देश में फ़ासीवादियों के एजेंडे पर ही आधारित है।


जिन मुद्दों पर हमारा लिबरल तबक़ा निर्मल वर्मा पर फ़िदा होता है, उनकी 'आध्यात्मिकता' उनमें से एक है। इलाहाबाद में 1976 में लगे कुंभ पर अपने बहुचर्चित संस्मरण 'सुलगती टहनी' में निर्मल वर्मा ने अपने 'आध्यात्मिक' विचारों को व्यावहारिक धरातल पर प्रस्तुत किया है। विशुद्ध चिंतन के स्तर पर जो विचार कुछ गरिमामय होने का भ्रम पैदा करते थे, व्यवहार के तल पर उतरते ही वे अचानक हास्यास्पद और बचकाने लगने लगते हैं। कुंभ में आए साधुओं को नशे में ब्रह्मानंद की खोज करते देख कर उनकी प्रतिक्रिया कुछ यूँ होती है--- 'चरस और गांजे की तीखी गंध साँप की तरह डोलती है- उठती है- फुत्कारती हुई मेरी देह को भेद जाती है, बैठो, इन्हीं के साथ बैठ जाओ। भूल जाओ, तुम मनुष्य हो, दिल्ली से आए हो, कहानियाँ गढ़ते हो, यूरोप घूमे हो- बैठ जाओ, इस धुएँ में देह और आत्मा अलग-अलग नहीं हैं- दोनों के बीच कोई परदा नहीं, कोई दीवार नहीं- एक-दूसरे की प्रतिच्छाया हैं।'


गाँजे और चरस के सहारे तथाकथित आध्यात्मिक साधना में रत रहने वाले इन परजीवियों को तनिक भी नज़दीक से जानने वाला व्यक्ति इनके कुंठित, आपराधिक और विमानवीकृत जीवन से भली-भाँति वाक़िफ़ होगा। संगठित रूप में वे पतन के उस रसातल तक पहुँच चुके हैं जहाँ से अब कभी वापस नहीं आ सकते। उनका नैतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान असम्भव है। इसका पता उनकी जीवन-शैली, उनके सरोकारों तथा उनके बीच छिड़ने वाले आपसी विवादों के स्तर से लगाया जा सकता है। हाँ, समाज में बर्बरता का नंगा नाच करने की ताक़त अभी उनमें बाक़ी है। लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों में यक़ीन करने वाले प्रत्येक भारतीय को अभी उनके उन्मादी आंदोलनों का सामना करना है। इसीलिए विचार के क्षेत्र में उनका आदर्शीकरण करके उन्हें शह देने चाली प्रवृत्तियों को जवाब देने में कोई कोताही करना हमारे लिए अक्षम्य है।


बहरहाल, इन विचारशून्य बाबाओं के बीच कुंभ में घूमते हुए निर्मल वर्मा को अनेक अटपटे अनुभव होते हैं लेकिन वे उनसे प्रभावित होने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं। घूमते-घूमते वे एक पड़ाव के अंदर गुरु जी के निजी तम्बू तक पहुँच जाते हैं। ये गुरु जी हाल ही में चले सत्ता संघर्ष के परिणामस्वरूप, सम्भवतः, समझौते के उम्मीदवार के बतौर इस पद तक पहुंचे हैं। उनका विरोधी चेला उन्हें 'मिट्टी का माधो' बताता है जो 'एक चोट में ढेर हो जाएगा', और बदले में समर्थक चेला ललकारता है; 'हमारे महाराज ऊपर से भोले दीखते हैं—भीतर से बम के गोले हैं। सारी माया देखे हैं— कोई हाथ तो लगाए भला।' अचानक गुरु जी की नजर लेखक पर पड़ती है और स्वभावतः किसी आगंतुक के सामने इस चर्चा से बचने के लिए वे उन्हें ले कर बाहर चले आते हैं। निर्मल वर्मा को उनके दर्शन से अत्यधिक शांति मिलती है— 'एक ऐसा सकून जो शायद केवल उन लोगों को मिल पाता है, जिनके माँ-बाप पहले गुजर चुके हों।' अंततः बूढ़े गुरु जी उन्हें तल्सताय जैसे दिखने लगते हैं, जैसा कि सागर तट पर उन्हें गोर्की ने देखा था। संवाद कुल इतना है कि एक अजनबी के सामने अपनी पोल खुलने के डर से अचकचाए गुरु जी दो बार पूछते हैं, 'कभी मुझे पहले देखा है', और एक बार पूछते हैं?, 'कहाँ से आ रहे हो?' और अंत में शिविर से बाहर जाने के रास्ते के बाबत पूछते हैं, 'अकेले चले जाओगे या तुम्हारे साथ आऊँ।' इन्हीं निरर्थक संवादों और बाबाओं की वेशभूषा से निर्मल वर्मा अभिभूत हो जाते हैं।



यही उनकी पद्धति है, ऐसे प्रसंगों की उनके लेखन में भरमार है। एक और देख लें, जिससे वे सर्वाधिक प्रभावित हुए थे। मेले में एक छप्पर तले उन्हें चिलम खींचता एक युवा साधु मिलता है जो 'बिलकुल रामकृष्ण परमहंस की तरह' दिखता है। वह उन्हें बुलाता है और पास आने पर 'दुतकारता' है, 'जूते उतार कर आओ'। चिलम से मुँह हटा कर अगली बात वह कहता है, 'तुम्हें कुछ ले कर आना चाहिए था।' निर्मल वर्मा कुछ नहीं समझ पाते तो वह सामने जल रही आग में से कुरेद कर एक अधजली लम्बी सूखी डंडी बाहर निकालता है और कहता है, 'तुम्हें इस लकड़ी को अपने कंधे पर रख कर चलना चाहिए।' उसकी चिलम और उसके सवाल उसकी पोल खोलने के लिए काफ़ी है। एक अपटूडेट आदमी को अपनी डॉट खा कर नंगे पाँव आते देख वह मन ही मन मुसकराया होगा, क्योंकि इसकी उसे आदत पड़ चुकी होगी। कुछ लाने वाली बात पर अगर वे अधिक कुछ नहीं, एक पुड़िया गाँजा निकाल कर अर्पित कर देते तो 'सुलगती टहनी' की नौबत ही न आती। हो सकता है कि एक नया और अनाड़ी चेला पा कर वह जाड़े की रात में उससे अपने अलाव के लिए कुछ लकड़ी ही मँगाना चाहता हो, इसलिए उसने अधजली लकड़ी की बात की हो। पर यह सुनते ही निर्मल वर्मा वहाँ से भाग खड़े होते हैं। इस प्रकरण का वे जो मतलब निकालते हैं वह उनकी मनोदशा की मिसाल है-


'मैं चला आया। पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा। मैं कतरा गया था। ऐन मौके पर किसी विराट चमत्कार से वंचित रह गया था। बहुत देर तक राख और लपटों के बीच उनका स्वर मेरे कानों में गूंजता रहा, जैसे वह बार-बार मुझसे कह रहे हों, लो यह लकड़ी, पेड़ की एक शाख, जिसे सलीब बना कर जीसस अपने कंधे पर ढोते हुए गोलगोथा के टीले पर चढ़े थे। यह वही टहनी है... जिस पर कृष्ण बैठे थे, पैर तीर बिंधे हुए, लहूलुहान, क्षत-विक्षत, हवा में झूलती अनेक शाखाओं के बीच समूची गीता का मर्म खून के कतरों में बूँद-बूँद टपक रहा था...'


हो भी क्यूँ न! एक विवेकानंद अपने रामकृष्ण से, एक गोर्की अपने तल्सताय से बिछड़ जो गया था।


सच तो यह है कि निर्मल वर्मा की बाजी हमारी जनता में पाए जाने वाले भाँति-भाँति के अंधविश्वासों, रूढ़ियों, कर्मकाण्डों और भाग्यवादी विश्वासों पर लगी हुई है। इनका आदर्शीकरण करके, इन्हें उनकी चेतना को कुन्द करने वाले कारगर औजार में बदलते हुए वे इस देश में अंग्रेज़ों के ही एजेंडे को पूरा कर रहे हैं। जिन संकीर्ण वर्णाश्रमवादी विश्वासों की वकालत वे इतने विश्वास के साथ भारतीयता के रूप में करते हैं उसकी भी यह भारतव्यापी, एकीकृत और वर्चस्वशाली हैसियत अंग्रेज़ों द्वारा निर्मित भारत के वैचारिक 'स्टोरियोटाइप' की देन है जो ब्रिटिश नौकरशाही के माध्यम से फलीभूत हुई थी। उपनिवेशवादियों की मानस-संतान यह वर्णाश्रमवाद इसीलिए अपने मूल संस्करण के मुकाबले अधिक जड़ और हिंस्र तथा कम परिष्कृत है। पिछले दो सौ बरसों में इसने एक भी ऐसा दिमाग़ नहीं पैदा किया जिसने भारतीय सभ्यता के किसी भी क्षेत्र में कुछ जोड़ा हो। रहा सवाल वर्तमान का तो इसके एक प्रतिनिधि निर्मल वर्मा का पिलपिला चिंतन हमारे सामने है, जिसका आलम यह है कि जहाँ हाथ रख दीजिए वहीं काई की तरह फटता चला जाता है।


कृष्ण मोहन 


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