विनीता बाडमेरा का यात्रा वृत्तांत "यात्रा हवेलियों के शहर जैसलमेर की"



हिन्दुस्तान अपने आप में एक महाद्वीप है। इसीलिए इसे 'देशों का देश' भी कहा जाता है। सचमुच हिन्दुस्तान के अलग अलग राज्य अपने आप में किसी देश से कम नहीं लगते। यहां विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि वाली जगहें हैं जिन्हें देखने के लिए देश विदेश से तमाम पर्यटक वर्ष भर आते रहते हैं। राजस्थान को पहले राजपूताना कहा जाता था। विभिन्न राजपूत राजाओं ने अपने छोटे छोटे राज्यों में मजबूत किलों और भव्य महलों का निर्माण कराया जो आज भी अपने शानदार अतीत की याद दिलाते हैं। राजस्थान का जैसलमेर ऐसी ही जगह है जिसे 'हवेलियों का शहर' ही कहा जाता है। जैसलमेर, उत्तर-पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान का एक शहर है, जो राजधानी जयपुर से 575 किलोमीटर पश्चिम में थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित है। यह एक पूर्व मध्ययुगीन व्यापारिक केंद्र और जैसलमेर राज्य की ऐतिहासिक राजधानी है, जिसकी स्थापना 1156 ई. में भाटी शासक रावल जैसल द्वारा की गई थी। जैसलमेर जिले का भू-भाग प्राचीन काल में ’माडधरा’ अथवा ’वल्लभ मण्डल’ के नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्‍दी के बीच बनाए गए थे। विनीता बाडमेरा ने हाल ही में जैसलमेर की यात्रा की और वहां का एक यात्रा वृत्तांत पहली बार के लिए लिख भेजा है। इस वृत्तांत में राजस्थान की मिट्टी 'धोरे' की खुशबू को सहज ही महसूस किया जा सकता है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विनीता बाडमेरा का यात्रा वृत्तांत "यात्रा हवेलियों के शहर जैसलमेर की"।


"यात्रा हवेलियों के शहर जैसलमेर की"

                

विनीता बाडमेरा 


देह मिट्टी की है और आख़िर इसे मिट्टी में ही मिल जाना है। मिट्टी में मिलने से पहले राजस्थान की मिट्टी जिन्हें मैं 'धोरे' कहती हूं उसे देखने और मिलने के लिए न जाने कब से जाना चाह रही थी! जैसलमेर का थार का मरुस्थल मुझे खींचता है अपनी ओर। शायद इसलिए भी कि इसी धोरे में मूमल बाट जोहती थी अपने महेन्द्र की। अत: राजस्थान के लैला-मजनू की अधूरी प्रेम कहानी वाले शहर को देखने की ख्वाहिश जोर पकड़ने लगी। कुछ ख्वाहिशें इतनी जल्दी पूरी भी तो नहीं होती। मन की साध पूरी करने के लिए बहुत इंतजार करना पड़ता है। मेरा यह इंतजार भी खत्म हुआ। रानीखेत जैसलमेर की ट्रेन में मेरे सफर का साथी था गोपाल माथुर दादा का काव्य संग्रह 'पहाड़ पर बारिशें'। सर्द हवाओं के झोंकों के साथ चुप्पियों की इन कविताओं को पढ़ते सफर कब खत्म हुआ पता ही नहीं चला। रात साढ़े ग्यारह बजे रानीखेत जैसलमेर ट्रेन अपनी मंजिल पर पहुंच गई थी। पीले पत्थरों से बने नए रेलवे स्टेशन पर जैसे-जैसे नजर जाती रही सुनहरी आभा वाले इस शहर को करीब से देखने की हसरत बढ़ती रही। होटल का कर्मचारी जीप ले कर स्टेशन पर आया।  जीप में बैठ कर होटल पहुंचना भी अलग अनुभव था।

  

अंधेरी सर्द रात में होटल ‘पोल हवेली’ के बाहर बने झरोखे और महीन कारीगरी वाली खिड़कियां देखी तो यकीन हो गया कि आखिर  हम पहुंच गए हवेलियों के शहर। अपने कमरे की दीवार पर पेचवर्क से बना वॉल हैंगिंग और नींद के आगोश में जाने के लिए लकड़ी नहीं पत्थर से बना पलंग था। थकी देह बिस्तर पर जाते ही निढाल हुई।  

  

सुबह जल्दी ही आंख खुल गई। चाय हमने पोल हवेली में नहीं पी। इस हवेली से कुछ ही दूरी पर चाय की गुमटी थी, हम चाय पीने वहां चले गए। साथ वाले जब अदरक ईलायची वाली चाय पी रहे थे तो उस मसालेदार चाय की महक  आहिस्ता-आहिस्ता मेरे नथुने में भी प्रवेश कर रही थी। मैं चूंकि चाय नहीं पीती हूं इसलिए कॉफी मंगवाई। पहला घूंट लेते ही समझ गई कि कॉफी का यह स्वाद कुछ अलग है और यह अलग स्वाद अदरक के कारण है। चाय बनाने वाले भाई साहब बोले कि हम मसालेदार चाय ही नहीं मसालेदार कॉफी भी पिलाते हैं। फरवरी के इस गुलाबी महीने में सुबह-शाम तो ठंड रहती ही है फिर यह तो जैसलमेर है। इस शहर में गर्मी भी खूब है तो सर्दी में भी कमी नहीं है।  फिर दो दिन से गला खराब होने के कारण मेरे लिए तो यह मसाले वाली कॉफी पीना फायदेमंद ही रहा। अब चूंकि शहर देखने की जल्दी थी इसलिए हम  होटल में आकर जल्दी-जल्दी नहाए और तैयार हुए। साथ ही हमने अपने एक स्थानीय परिचित से शहर घूमने के बाबत फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि जिस पोल  हवेली में हम ठहरे हैं वहां से विश्व प्रसिद्ध सोनार किला अधिक दूरी पर नहीं है। उसे देखने के लिए हम पैदल भी जा सकते हैं। बस हमने परिचित की बात मान ली।  पैदल ही वहां से हम निकल पड़े सोने से चमकते किले को देखने के लिए।

  


सोनार किला गौपा चौक के आस-पास ही था और उस परिचित ने ही बताया कि इस गौपा चौक में नाश्ते के लिए बहुत कुछ मिल जाएगा। चूंकि हमने अब तक केवल चाय ही पी थी इसलिए पेट नाश्ते की मांग करने लगा। हमने वहां के प्रसिद्ध दाल पकवान और मिर्ची बड़े का स्वाद लिया। हालांकि जोधपुर के मिर्ची बड़े का मुकाबला जैसलमेर के मिर्ची बड़े नहीं कर सकते फिर भी  वे स्वादिष्ट थे। धूप के तेवर देख कुछ ठंडा पीने की चाहत हुई। हमने कोल्ड ड्रिंक की जगह रबडी वाली दही की लस्सी ही पीना  मुनासिब समझा। अब जब हम देशी नाश्ता कर तृप्त हुए तो समझ गए कि इतनी ऊर्जा तो आ गई है कि हम किले तथा किले के आस-पास के दर्शनीय स्थल भली-भांति देख सकेंगे।

    

गौपा चौक के नजदीक ‘सोनार किला’ था और हम उस विशाल किले के पहले गेट के बाहर खड़े थे। जहां तक हमारी नजर गई  तो देखा कि किले के बाहर खड़े पर्यटक अपने रंग-बिरंगे लिबास में  आस-पास छोटी लुभावनी दुकानों से खरीददारी करने व फोटो खींचने का आनंद ले रहे थे।  ज्यादा देर न करते हुए हम भी किले के पहले दरवाजे से किले के अंदर चले आए। वहां कई गाइड कारोबारी अपने ग्राहक खोज रहे थे। हमने भी एक गाइड कर लिया। मुझे लगता है कि  ऐसी जगह पर गाइड करना फायदेमंद ही रहता है। वे हमें उस जानकारी से परिचित कराते हैं जिन्हें हम नहीं जानते और जानने यहां आए हैं, अतः पांच सौ रुपए की मांग रखने वाले उस गाइड को आख़िरकार हमने तीन सौ रुपए में राजी कर लिया।

 

अब हम गाइड के साथ थे। किले को दिखाते हुए उसने बताया कि यह किला पीले बलुआ पत्थर से बना है। सूरज की रोशनी में सुनहरा दिखाई देता है। इसे 1156 में रावल जैसल ने बनवाया। साथ ही यह दुनिया के सबसे बड़े किलों में  शामिल है और हां सबसे बड़ी बात यह आज भी जीवित है। एकबारगी हमें उसकी जीवित होने की बात समझ नहीं आई। फिर उसने कहा कि  इस किले में काम करने वाले कई कर्मचारियों को यहां के महारावल ने बहुत पहले ही रहने को घर दिए थे। अब उनकी पीढियां यहां बरसों से रह रही है। उनमें से कुछ लोगों ने इस किले में बड़े और आलीशान होटल भी बना लिए हैं। इन होटलों में कई देशी-विदेशी रुकते हैं। तब समझ आया जिंदा किले का मतलब। 


  

किले में गाइड के साथ चलते-चलते ही हमने ऊँट के चमडे से बने कई सामान देखे। किले के बड़े और मजबूत दरवाजे देखे। किन्तु पीले पत्थरों से चमकते इस किले की सुंदरता का वर्णन तो हरगिज नहीं किया जा सकता। गाइड के कहने पर हमने इस किले के महल [संग्रहालय] को देखने के लिए टिकट लिया। एक व्यक्ति का टिकट दो सौ रुपए था। गाइड ने  ही बताया कि यहां के राजा महारावल कहलाते थे। इस  संग्रहालय में हमने जैसलमेर को बसाने वाले पहले महारावल ‘जैसल’ से ले कर अब तक के महारावल के साथ ही वर्तमान के महारावल  चैतन्य राज सिंह की तस्वीरें देखी। यह जानकारी भी मिली कि जैसलमेर के महारावल कृष्ण भगवान के  वंशज है। इसलिए ये लोग ‘श्री नाथ जी’ को भी बहुत मानते हैं तथा यहां के महारावल यदुवंशी कहलाते हैं। इस महल में  महारावल का पलंग भी देखा और उनके चांदी के बरतन भी देखे। राजा का चांदी  के ही  बरतन में खाने (जीमने) का कारण  जाना कि भोजन में यदि विष मिला हो तो चांदी के बरतन में परोसने पर उसका रंग परिवर्तित हो जाता है और राजा  की जान बचाई जा सकती है। ऐसी ही कई दिलचस्प बातें हमारे गाइड ने बताई साथ ही रानियों के होली खेलने का अलग स्थान दिखाया। संग्रहालय है तो प्राचीन अस्त्र-शस्त्र तो निश्चित तौर पर होंगे ही। हमने कई तरह के भाले, तीर-कमान और तलवारें देखी। इन सभी को देखते ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम  राजाओं के उस काल विशेष में ही पहुंच गए हो। तत्पश्चात हम संग्रहालय से बाहर आए। वही पास में जैन मंदिर के अलावा  देवी तथा लोक देवता रामसा पीर का मंदिर भी था। भीड़ होने पर भी देवी-देवता के दर्शन करने में हमें अधिक समय नहीं लगा।


किले में ही रावणहत्था बजाने वाले पगडी बांधे, सफेद बालों और बडी मूंछों वाले लोक कलाकार पर्यटकों के इसरार पर कई फिल्मी गानों की धुन पर रावण हत्था बजा रहे थे। इन लोक कलाकारों के साथ फोटो खिंचवाने वाले भी बड़ी तादाद में थे।


अब हम किले से बाहर आ चुके थे। गाइड का काम यहां खत्म हो गया था। वह अपना मेहनताना लेकर जा चुका था। जाते-जाते उसने बताया कि "किले से कुछ दूर ही सालिम सिंह की हवेली है जो यहां के महारावल के दीवान थे। सालिम सिंह की हवेली की कारीगरी बाहर से देखने पर अद्भुत है।"  

  

‘सालिम सिंह’ की हवेली चूंकि किले से अधिक दूरी पर नहीं थी इसलिए हम पैदल ही वहां पहुंच गए। हम चार जन में से तीन जन ने इस हवेली को देखने का मानस बनाया। हवेली में प्रवेश करते ही वहां दरवाजे पर टेबल लगा कर बैठे व्यक्ति ने टिकट लेने की बात कही। एक जन का टिकट सौ रुपए और एक मोबाइल से फोटो खींचने के बीस रुपए अतिरिक्त। हमने तीन जन के  तीन सौ बीस रुपए दिए। "जब ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना" मुझे यह कहावत अनायास ही याद आई। मैने गाइड के बारे में पूछा तो जवाब मिला कि हवेली की सीढियां चढ़ कर ऊपर जाने पर आपको गाइड मिल जाएगा। हम सीढियां चढ़ ऊपर गए तो देखा एक गाइड था जो वहां आए किसी  विदेशी पर्यटक को हवेली दिखाते हुए अंग्रेजी में कुछ समझा रहा था। दिखने में यह गाइड बहुत पढा लिखा नहीं लग रहा था लेकिन पापी पेट बहुत कुछ सीखा देता है। फिर यहां तो काम ही गाइड करना है तो उसका अंग्रेजी बोलना कोई बडी बात नहीं थी। गाइड को हमने टिकट दिखाया। उसने टिकट देखा और फिर से अंग्रेजी में उन  विदेशियों को हवेली दिखा कुछ बताने के काम में लग गया। मैंने उससे कहा कि कृपया अंग्रेजी के साथ ही इस हवेली का इतिहास हिन्दी में बताते जाएं तो हमें भी कुछ जानकारी लेने में आसानी होगी। उसने तुरन्त टिकट मेरे हाथों में पकड़ा दिया और मेरी भांजी की तरफ देख कर गुस्से में  हिन्दी में कहा कि विदेशियों संग हो रही उसकी यह बातें इस लड़की से समझ लें। हमें हैरानी थी कि कोई ऐसा कैसा कर सकता है! उसे अंग्रेजी में समझाने में कोई तकलीफ नहीं है! हिन्दी में समझाने में तकलीफ है! बहुत देर तक हम खड़े रहे लेकिन उस गाइड का नजरअंदाज करना नहीं रुका। यहां तक वे विदेशी भी इस स्थिति को कुछ-कुछ समझ रहे थे लेकिन वे कर ही क्या सकते थे! हम बहुत निराशा के साथ बिना फोटो खींचे, बिना कुछ हवेली में देखे, समझे बाहर आ गए। ये तीन सौ बीस रुपए खर्च करने का मुझे मलाल हुआ। कोई बाहर से आए लोगों के सामने घर वालों का जिस तरह अपमान करता है वैसे ही अपमान सरीखी यह घटना थी।


मेरे परिचित अब तक  सालिम सिंह की हवेली के बाहर आ चुके थे। हमने इस घटना का जिक्र उनसे किया। इस घटना के लिए उन्होंने खेद जताते हुए उन्होंने बताया कि सालिम सिंह जो कि राजा का दीवान था, वह हवेली की छत से ही किले में जाने का रास्ता बनवाना चाहता था क्योंकि वह अपनी हवेली से नीचे ही नहीं उतरना चाहता था। आखिर में जब महारावल को छत से बनने वाले रास्ते के बारे में पता चला तो उन्होंने सालिम सिंह को ही मरवा दिया। कहते हैं कि सालिम सिंह की यह हवेली शापित हो गई। मेरे होंठ सालिम सिंह का नाम जालिम सिंह बुदबुदाए। 


  

हवेलियों के इस शहर में सबसे प्रसिद्ध थी ‘पटवों की हवेली’। हमारे परिचित का मानना था कि अधिक दूरी पर यह हवेली नहीं है इसलिए यहां भी पैदल जाया जा सकता है। हमें भी कोई एतराज़ नहीं था, फिर पैदल जाने के भी अलग  फायदे हैं। आप रास्ते में अपने आस-पास को भी भली प्रकार से देखते हुए चल सकते हैं। हमने रास्ते में कई घर देखे। सभी पीले बलुआ पत्थर से बने थे। सभी घरों की बालकनी में झरोखे बने थे। नक्काशी की गई थी। और अधिकांश घरों के बाहर गणेश जी का चित्र बना था। कोई भी मांगलिक कार्य हुआ हो तो उसका संक्षिप्त  विवरण लिखा था जैसे शादी ब्याह व जनेऊ संस्कार या घर का गृह प्रवेश इत्यादि कब हुआ!घरों के बाहर इस तरह का विवरण लिखा देखना वाकई दिलचस्प था क्योंकि इससे पहले न तो कभी किसी और शहर में और न ही खुद के शहर में ऐसा देखा। यादगार के लिए मैंने ऐसे घरों की तस्वीरे खींच ली।

 

अब हम पटवो की हवेली पहुंचे। ये संख्या में पांच थी। इसका संरक्षण राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग कर रहा है। इसलिए इसके रखरखाव के लिए भी टिकट था। एक टिकट पचास रुपए का था।  इस भव्य और नक्काशीदार हवेली को गुमान चंद पटवा ने बनाया।  भीतर कई झरोखे  थे। हमने  बहुत सी फोटो खींची। पांच हवेलियां पास-पास थी। हमने एक ही हवेली देखी और दिन का खाना खाने ‘श्री जी रेस्टोरेंट’ चले गए। जैसलमेर आए हैं तो खाने में कैर-सांगरी की सब्जी खाना तो भूलना था ही नहीं। पेट भरा लेकिन दिन भर घूमने से थकान का अहसास भी होने लगा किन्तु हमारे पास  दो ही दिन  थे और अभी बहुत कुछ देखना बाकी था इसलिए हमने खुद से ही कहा 'थकना मना है।'



जैसलमेर  में ही 'कुलधरा' नामक स्थान के बारे में मैंने सुन रखा था। हमारे परिचित ने भी हमें वहीं चलने के लिए कहा। जैसलमेर से लगभग बीस बाइस किलोमीटर दूर यह गांव था। कार के माध्यम से हम वहां पहुंचे। यह गांव पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा बसाया गया था। हमने वहां कई खंडहर मकान देखे। खंडहर मकानों  की कहानी के बारे में पूछने पर पता चला कि गांव में पालीवाल ब्राह्मण परिवारों के मकान थे। पास ही कुंआ था जहां गांव की बेटियां और बहुएं पानी भरने जाती थी। एक रोज महारावल का अत्याचारी दीवान सालिम सिंह गांव आया और उसकी नजर गांव की एक बहुत खूबसूरत बेटी पर गई। उसने कहा कि दूसरे दिन वह गांव की इस बेटी को उठा ले जाएगा। लोग घबराए। गांव की बेटी की इज्जत हैं। सालिम सिंह शक्तिशाली था। उसका दबदबा था। इसलिए  उस लड़की के परिवार के साथ ही 84 गांवों के लोग रातो रात अपना घर छोड़ कर चले गए। मकान खाली रह गए। जाते-जाते लोगों ने इस जगह के लिए श्राप दिया कि यहां कोई बस नहीं सकेगा। अंधेरा  होने के बाद कोई व्यक्ति इस जगह पर नहीं रुक सकेगा। शाम हो रही थी। हम खंडहर घरों को देख रहे थे। गांव की बेटी की इज्जत बचाने के लिए सामूहिक रुप से उठाए उन लोगों के फैसले के बारे में सोच रहे थे, कैसे वे लोग थे जिनके लिए बेटी की इज्जत इतना मायने रखती थी किन्तु आज किसी की बेटी के साथ गलत होने पर कौन साथ होता है! तभी हमारे परिचित ने आवाज लगाई। अंधेरा फैल रहा था। कोई डर वहां से जाने के लिए हमें कह रहा था। हम कार में बैठ गए। मैं एक बार फिर सालिम सिंह का नाम जालिम सिंह बुदबुदाई।

     

जोधपुर के फतेह सिंह भाटी जी की पुस्तक ‘मूमल महेन्द्रा’ जब से पढी मुझे तब से ही मूमल  और महेन्द्र की प्रेमकथा में रस आने लगा। देखना चाहती थी कि जैसलमेर में ‘मूमल की मेड़ी’ जहां मूमल महेन्द्र की प्रतीक्षा करती थी। परिचित ने मन की बात जैसे सुन ली। हम जैसलमेर के लोद्रवा गांव पहुंचे और मूमल की वह मेड़ी देखी जहां बैठ मूमल अपने प्रेमी महेन्द्र का इंतजार करती थी। उसका वह प्रेमी भी तो हर रोज अमरकोट (अब पाकिस्तान) से ऊंट पर  बैठ कर आता था। बहुत देर तक मैं उस मेड़ी जो अब खंडहर बन चुकी थी  उसे देखती  रही। ऐसा लग रहा था मूमल आज भी यही कहीं है। महेन्द्र आज भी आता है। पढा था कि उनका प्रेम भी अधूरा ही रहा। इतिहास गवाह है कि हर किसी के नसीब में सच्चा प्रेम नहीं  होता। मन अजीब-सा हो  गया। पास ही गांव में जैन मंदिर और स्वर्णकारों की कुल देवी के मंदिर में धोक दी और हम हमारी पोल हवेली लौट आएं। रात भर कुलधरा गांव का खाली होना जैसे सपने में आया। और अल सुबह मूमल अपनी मेड़ी पर बैठी महेन्द्र का इंतजार करती  दिख रही थी। मैं इस मौसम में पसीने-पसीने हो रही थी। चौंक कर उठी और मोबाइल में समय देखा तो सुबह के छः बजे थे। तनोट माता के दर्शन के लिए जल्दी निकलना था इसलिए  हम फिर तैयार होने लगे।

 

जैसलमेर से एक सौ बीस किलोमीटर दूर है ‘तनोट माता’ का मंदिर। इस मंदिर में स्थापित देवी को सैनिकों की देवी भी कहा जाता है। सुबह  लगभग सात बजे तनोट माता के मंदिर के लिए निकले। रास्ते में रामगढ के आस-पास चाय पी। परिचित ने दूर से रामगढ का एक टावर  दिखाया और बताया कि यह भारत के सबसे  ऊंचे  टीवी  टावर में से एक  है। 


तनोट के  रास्ते में थार का रेगिस्तान था। दूर- दूर तक रेत के धोरे ही धोरे। धोरे जिन्हें देखने मैं आई थी। उन धोरों को देख न जाने कितनी ही फिल्में ध्यान में आई। राजस्थान की हूं लेकिन  पहले कभी ऐसे धोरे नहीं देखे थे इसलिए मन का मयूर नाच उठा। कुछ पलों में ही हम रेत के धोरे पर पहुंच गए थे। रेत पर कदम रखना आसान  नहीं था। तभी वहां एक आठ-नौ साल का बच्चा अपना ऊंट सजा कर ले आया। मैं सोचने लगी कि जाने कैसे उसे हमारे आने की खबर हुई! पास ही रेत के धोरे पर बकरियां चर रही थी। क्या चर रही थी, पता नहीं। मन ने कहा, इन धोरों पर उनके लिए भी कुछ तो होगा ही। उस बच्चे ने बताया कि बकरियों और रेगिस्तान के जहाज ऊंट को मालूम है इन धोरों का  चप्पा-चप्पा। मैं तो उसकी बातों पर ही मंत्र मुग्ध हुई जा रही थी। बच्चा भी समझ गया कि उसके ग्राहक उससे प्रभावित हो रहे हैं। वह हमें ऊंट की सवारी करने के लिए मीठी बोली में उकसाने लगा। वह कह रहा था कि 'अब बहुत दिन लोग यहां नहीं आएंगे। थोड़े दिन पहले तो यहां बहुत भीड़ थी। इसलिए आप तो सवारी कर लो। मैं दो सवारी के बस सौ रुपए लूंगा।’ मैं समझ गई थी कि दिसम्बर जनवरी इस शहर को घूमने के लिए सबसे उपयुक्त है। उन दिनों यहां बहुत भीड़ रहती है अब मौसम बदलने और गर्मी बढने पर धीरे-धीरे लोगों का आना कम हो जाएगा और फिर पांच-छः महीने पर्यटकों का आना लगभग बंद ही हो जाएगा। बच्चे की मासूमियत पर प्रेम उमड़ आया। ऊंट के साथ उसका याराना  काबिलेतारीफ था।  ऊंट उसकी बात मान नीचे बैठा। हमने कुछ देर ऊंट की सवारी का आनंद लिया। बच्चे को ऊंट की सवारी का किराया दिया तो वह मुस्कुराया और बोला, 'आना और।' मैने उसके बालों पर हाथ फेरा। हम रेत के इस समुद्र में फोटो खिंचवाने लगे और हमारे देखते-देखते लड़का ऊंट पर बैठ बहुत तेजी से आंखों से ओझल हो गया। ऊंट को इतनी तेज गति से जाते देखना भी हैरान करने वाला था।

    

कहते है जैसलमैर के पास ‘तनोट माता का मंदिर’ एक ऐसा मंदिर है जहां देवी हमारे देश की रक्षा करती है। पाकिस्तान की सीमा से जुड़ा है यह तनोट गांव। रात और दिन यहां बी एस एफ की सेना हमारी रक्षा करने के लिए तैनात रहती हैं। सुना यह भी था कि 1971 के भारत पाकिस्तान के युद्ध के समय इसी तनोट माता ने हमारे जवानों की  रक्षा की थी। मां की कृपा से ही पाकिस्तान की सेना द्वारा फेंके बम मंदिर के अहाते में गिरे जरुर थे लेकिन फटे नहीं। आज वहां मंदिर का पुजारी भी बीएसएफ का जवान ही है। और साफ सफाई व संरक्षण का कार्य भी यही जवान लोग देखते हैं। हम मंदिर पहुंचे और  मां तनोट से प्रार्थना की कि वह अपनी कृपा हम सब पर बनाए रखे। मंदिर में ये फौजी काजवान  तनोट माता के सच्चे भक्त बन हर तरह की सेवाएं  दे रहे थे। मंदिर में हमने वे बम भी देखे जो फटे नहीं थे। मां के आगे एक बार फिर सिर झुकाया और मंदिर से आगे बढ़े ।

 

अब तक 'जीरो लाइन' के बारे में केवल पढ़ा और सुना था। अब जब जैसलमेर आए ही है तो  इसे भी देखना का मन हो आया। तनोट मंदिर के पास ही  बीएसएफ के सुरक्षा कर्मियों से इस स्थान को देखने के लिए आधार कार्ड दिखा पास बनवाया। कुछ देर बाद ही हम तनोट मंदिर से बीस-बाइस किलोमीटर दूर जीरो लाइन वाली जगह पहुंचे। यह जीरो लाइन  भारत पकिस्तान की सीमा रेखा थी। यहां तार बंदी देखी। जीरो लाइन लिखा देखा। बीएसएफ की कड़ी सुरक्षा देखी। भारत का लहराता तिरंगा देखा।



ऐसा ही  एक और स्थान 'लोंगेवाला' था जहां 1971 में  भारत  पाकिस्तान का  युद्ध हुआ था। उस स्थान पर तो उत्सव का वातावरण था। देशभक्ति के गीत गूंज रहे थे। उस युद्ध के दौरान ही  पाकिस्तानी सेना द्वारा अपने टैंक छोड़ कर भाग जाने के कारण आज भी इस स्थान पर युद्ध के वे  टैंक रखे हैं। हमने उन टैंकों को और युद्ध से संबधित अन्य हथियार देखे।  मन कह रहा था कि हम आज सुरक्षित हैं क्योंकि हमारे जवान सीमा पर तैनात हैं। हमारे परिचित ने भारत माता का जयकारा लगाया तो हमने और वहां आए अन्य पर्यटकों ने भरपूर उनका साथ दिया।  तभी किसी पर्यटक ने बीएसएफ के सैनिकों संग फोटो खिंचवाने का आग्रह किया जिसके लिए उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। वे लोग मायूस हुए तो एक फौजी ने समझाया कि वे ऐसा नहीं कर सकते। इस जगह के अपने कायदे हैं। हमारे परिचित ने 'जयहिन्द' कहा। फौजी ने मुस्कुरा कर ‘जयहिन्द’ कहा। 

    

हम जैसलमेर लौट रहे थे और लौटते में हमने  गढीसर झील देखी। कुछ देर वहां पानी  में उठती तरंगे देखते रहे। आस-पास पर्यटकों को लुभाती दुकानें देखते रहे। सहसा मोबाइल उठाया तो समय देख चौंके और न चाहते हुए भी हमें वहां से उठना पड़ा। हमारी शाम की ट्रेन थी। पोल हवेली से सामान लिया। रात के लिए खाना  पैक कराया। इस बलुई मिट्टी के पत्थर वाले  खुबसूरत शहर से विदा मांगी और ट्रेन पकड़  ली।  हम लौट रहे हैं घर। अपने शहर। मैंने मन ही मन में फतह सिंह जी भाटी की ‘मूमल महेन्द्रा’ को एक  बार  फिर पढ़ने  का  निश्चय  किया।


विनीता बाडमेरा 



सम्पर्क : 


पता-

विनीता बाडमेरा 

बाडमेरा स्टोर 

कमल मेडिकल के सामने 

नगरा, अजमेर 

राजस्थान 305001


मोबाइल -9680571640

ईमेल-vbadmera4@gmail.com


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