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दिनेश कर्नाटक की कहानी 'मियाँ बस्ती'

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  दिनेश कर्नाटक राज्य का कार्य होता है जनता को बेहतर सुविधाएं प्रदान करना। शासक यह काम करते भी हैं। लेकिन लोकतंत्रात्मक प्रणाली में इन शासकों को चुनाव भी जीतना होता है। इसके लिए वे ऐसे सारे लोकलुभावन काम करते हैं जिनसे बहुसंख्यक जनता उनके पक्ष में बनी रहे। यह लोकतन्त्र की सबसे बड़ी कमजोरी है और यह व्यवस्था इस कमजोरी से आज तक उबर नहीं पाई है। लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में शासक  जाति, धर्म, भाषा जैसे मुद्दों को हवा दे कर अपना पलड़ा भारी रखना चाहता है। समाज तक में आपसी दरार पड़ जाती है।  'मियाँ बस्ती' दिनेश कर्नाटक की ऐसी ही कहानी है जिसमें धर्म के घातक प्रभाव को साफगोई से व्यक्त करते हैं। यहां लम्बे समय से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द रहा है लेकिन कुछ कट्टर लोग इस आपसी सद्भाव को बिगाड़ने में लगे हुए हैं। देश को विभाजित हो कर एक बार इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब हमें ऐसी परिस्थिति नहीं बनने देनी है जिससे देश एक बार फिर आहत हो। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  दिनेश कर्नाटक की कहानी 'मियाँ बस्ती'। कहानी 'मियाँ बस्ती' दिनेश कर्नाटक  उस दिन जब उसकी बस...

दिनेश कर्नाटक की कहानी 'खोज'

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दिनेश कर्नाटक     सोशल मीडिया आज का एक बड़ा सच है। कहने के लिए यह दुनिया आभासी जरूर है लेकिन इसके प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता। फेसबुक की लाइक्स और कमेंट्स ने भी लोगों के जीवन व्यवहार और सोच को बदला है। हालांकि इस लाईक और कमेंट्स में बड़ा लोचा होता है। दिनेश कर्नाटक ने इस सोशल मीडिया को केन्द्र में रख कर ही एक कहानी 'खोज' लिखी है। तो आइए आज आज पहली बार पर पढ़ते हैं दिनेश कर्नाटक की कहानी 'खोज'।     खोज   दिनेश कर्नाटक     राजधानी का पत्रकार अपनी खबरें निपटा कर जब शाम के धुंधलके में घर की ओर लौटता तो उसका ध्यान दीगर चीजों के बजाय समय से घर पहुंचने पर होता। न तो कहीं पर बाइक रोक कर कुछ खरीदने और न ही किसी से बातचीत का मन करता। थकान इस कदर हावी होती कि घर पहुंच कर एक बढ़िया सी चाय की बात उसके दिमाग में रहती। लोगों की ओर देखने के बजाय तेजी से घोंसले की ओर लौट रही चिड़िया की तरह उसका ध्यान घर पर होता। मगर गांव को राजधानी से विभाजित करने वाले पुल पर आ कर उसकी नजरें महेश को ढूंढने लगती। उसे पता था , यह महेश के दिखाई देने का समय नहीं है , फ...