स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'गोरखपुर; मेरा बंदरगाह'

 

स्वप्निल श्रीवास्तव 


हरेक शहर अपने आप में विशिष्ट होता है। और अगर उस शहर से बचपन या फिर छात्र जीवन की स्मृतियाँ जुड़ी हों तब वह जीवन से कुछ इस तरह जुड़ जाता है कि उसे अलग कर खुद को देख पाना दुष्कर हो जाता है। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने गोरखपुर में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। बाद में वे इस शहर में नौकरी के दौरान भी कार्यरत रहे। पूर्वांचल में गोरखपुर का अपना खास स्थान रहा है। स्वप्निल श्रीवास्तव का आज जन्मदिन है। जन्मदिन पर उन्हें बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'गोरखपुर; मेरा बंदरगाह'।


'गोरखपुर; मेरा बंदरगाह' 

    

स्वप्निल श्रीवास्तव 


इस आलेख का शीर्षक पढ़ कर कोई कह सकता है कि गोरखपुर बंदरगाह कैसे हो सकता है। इस शहर के आसपास कोई समुन्दर नहीं है। लोगों की शिकायत सही है, हम बहुत सी बाते रूपको और प्रतीकों के माध्यम से कहते हैं और उसके भिन्न अर्थ निकलते हैं। जरा सोचिये कि बंदरगाह की क्या उपयोगिता है। जब पानी की जहाजे लंबी यात्रा में थक जाती थी उन्हें विश्राम आराम की जरूरत पड़ती है – वहाँ वे अपना ईधन भरती हैं फिर आगे की यात्रा के लिये रवाना हो जाती हैं। कुछ बंदरगाहों की भौगोलिक स्थिति ऐसी होती कि अधिकांश जहाजों को वहाँ से हो कर गुजरना पड़ता है। गोरखपुर मेरे लिए बंदरगाह है जब मुझे कहीं जाना आना होता था यह बंदरगाह हमारे मार्ग में आ पड़ता है। 

गोरखपुर ऐसे बंदरगाह की तरह है जहां से हर दिशाओं से रेले आती-जाती हैं। ये बैरी रेले कस्बों और गांवों से मुसाफ़िरों को लाद कर कोलकाता, मुबई, गुजरात पहुँचती रहती हैं। कहीं वे भेड़ा बन जाते है तो कही गदहा, घर से बाहर रोजी रोटी की खोज में गया हुआ आदमी पहले जैसा नहीं रह जाता। शहर उसे बदल कर रख देते हैं। वे साल दो साल बाद अपने घर छुट्टी पर आते हैं और कुछ दिनों अपने गाँव में रहते हैं, दोस्तों रिश्तेदारों से मिलते हैं। शहर जाने की तारीख जब नजदीक आती है, वे उदास हो जाते हैं। 

शहर में वे अकेले रहते हैं और घर की याद करते रहते हैं। इस अकेलेपन में वे किसी न किसी स्त्री से जुड़ जाते हैं। कोलकाता के बारे में मशहूर है की वहाँ की औरतें उन्हें भेड़ा बना देती हैं। वे न घर के रहते हैं न घाट के। बाहर कमाने जाने वालों की यही ट्रेजिडी है। भिखारी ठाकुर की विदेसिया में ऐसे कई वृतांत मिल जाएंगे। यह बड़ा सांस्कृतिक संकट है। आदमी को रोजी रोटी के लिये घर के बाहर जाना पड़ता है जिसकी वे बड़ी कीमत चुकाते हैं। 

आज की दुनिया में बिना बेघर हुये कुछ मिल पाता है क्या?  हमारी पीढ़ी के कई लोग कंधे पर झोला और तख्ती लादे हुए गाँव से दूर मिडिल स्कूल में पढ़ने जाते थे। यह दूरी तीन चार किमी से कम नहीं होती थी। अब जगह जगह प्राइवेट स्कूल खुल गये है, सुविधाएं भी बढ़ गयी है। स्कूल जाने आने का रोमांच कम हो गया है। कम लोगों हाई स्कूल/ इंटर के बाद गाँव की सीमाएं लांघ पाते हैं। जिनकी माली हालत ठीक है वे उच्च शिक्षा के लिये शहर जाते हैं और कुछ बेहतर बनने की कोशिश करते है। बेरोजगारी के राक्षस से लड़ते रहते है, कुछ लोग कामयाब हो जाते है और कुछ थक–हार कर बैठ जाते हैं। जिंदगी के फलसफे को पढ़ना आसान नही है, उसके अर्थ समझने में उम्र बीत जाती है। पिता नौकरी न कर रहे होते तो मैं भी अपने गाँव की सीमा नहीं लांघ पाता।  

देवरिया के कस्बे से इंटर करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये मुझे गोरखपुर आना पड़ा था। वहाँ से इंटर के आगे पढ़ने के लिये कॉलेज नहीं थे। मैं शुरू से नाजुक मिजाज था – शहर में कमरा ले कर रहना और सुबह–शाम भोजन बनाना मेरे लिये संभव नहीं था। पिता इस तथ्य को जानते थे। कोशिश करने पर हॉस्टल मिल सकते थे लेकिन मैं वहाँ व्यवस्थित नहीं हो सकता था। पिता भी चाहते थे कि मेरे ऊपर कोई न कोई नियन्त्रण बना रहे। गोरखपुर में पिता रिश्तेदार थे जिसे वे साला बाबू कहते थे, इस रिश्ते से हम उन्हें मामा कहते थे। वे कचहरी में काम करते थे। बखिरा झील के पास बसे अपने गाँव से रोजी–रोटी के खोज में गोरखपुर आ गए थे और वही अपने रहने का ठिकाना बना लिया था।  वे  किराये के मकान में अपने तीन बेटों के साथ रहते थे। पिता ने मेरे बारे में बात की और वे राजी हो गये। पिता ने सोचा कि उनके उपर कोई दबाव न पड़े इसलिये हर माह  निश्चित रकम देते रहने का प्रस्ताव रखा। इस पर मामा ने कहा इसकी क्या जरूरत है। परिवार में चार–पांच सदस्य हैं। एक आदमी बढ़ जायेगा तो क्या फर्क पड़ेगा।  पिता ने उन्हें मना लिया और मामा को एक निर्धारित  रकम देने लगे।   

मेरे पास कोई साज ओ समान नही था। एक होल्डाल और सन्दूक थी। जब मैं उसे हाथ में कर चलता था तो वह झुनझुने की तरह बजने लगता था। उन दिनों ब्रीफकेस और अच्छे किस्म के बैग बाजार में नहीं मिलते थे। लोगों के लिये बड़े झोले मुफीद होते थे। आज उसका चलन नहीं है उसके साथ चलो तो लोग कहते है कहां से एक देहाती शहर में आ गया।  

जब मैं मामा के घर पहुंचा तो लोगों ने मेरा स्वागत किया। मेरे साथ पिता भी थे उन्होंने मामा से कहा – इसे आपके पास सौंप कर जा रहा हूँ। यह बहुत शर्मीला लड़का है पहली बार शहर में आया है। कोई शरारत करे तो आप इसका कान ऐठ सकते हैं।  पिता को जब सड़क पर रिक्शा पर बैठने के लिये तो मेरी आंखे भींग चुकी थी। मैंने बहुत छिपाने की कोशिश की लेकिन उनकी निगाह से बच नहीं सका।  वे बोले – परेशान न हो मैं बीच बीच में आता रहूँगा। उन्होंने कुछ रुपये जेब से निकाल कर दिये और कहा कि कोई जरूरत होगी तो मामा से मांग लेना, मैं उन्हें लौटा दूंगा।  

मकान पुराने ढंग का बना था। आँगन में हैण्ड पंप  लगा था उसी के नीचे नहाना था, हम लोग निर्लज्ज हो कर नहा लेते थे लेकिन जब औरते नहाती थी तो मुख्य दरवाजा भीतर से बंद कर दिया जाता था। मामा के घर में नगरपालिका की पाइप लाइन नहीं लगी थी। मकान मालिक के पास पानी की पाइप लाइन थी। उनके घर के बाहर स्नानघर था। जब तक लोग उठे मैं अल्लसुबह वहाँ जा कर नहा कर फारिग हो जाता था। घर में रहने की पर्याप्त जगह नहीं थी इसलिए एक चारपाई पर दो लोग सो जाते थे। यह स्थिति मुझे असुविधाजनक लगती थी। करवट बदलने में परेशानी होती थी।  

घर के सामने खंडहर था जिसका बरामदा  बचा हुआ था। मुझे लगा कि यही शरण ले लेनी चाहिए, उसके लिये मैंने बंसखट खरीदी। उस पर दरी चादर बिछा कर सो जाता था फिर उसे दीवार के सहारे टिका देता था। मुझे बहुत अच्छी नींद आती थी। खंडहर में कुत्ते और बिल्लियाँ  रहती थी। रात में उनके खेल होते रहते थे। खंडहर में एक दो पेड़ थे जिसमें तोते और अन्य चिड़ियायें रहती थी। सुबह उनकी चहचाहट से भर जाती थी। बारिश के दिन थोड़े कठिन होते थे, बौछारें भिगो देती थी। कभी कभी भीगना अच्छा लगता था।  बचपन के दिन याद आ जाते थे।  

मामा की याद आ गयी तो एक संस्मरण ध्यान में आ गया। एम ए करने के बाद नौकरी की समस्या सामने थी। उन्हीं दिनों टाइम्स आफ इंडिया में ट्रेनी पत्रकारों का विज्ञापन निकला। टाइम्स ने लिखा कि किसी विषय पर लेख भेज दें। उसी के आधार पर मुझे इंटरव्यू के लिये बुलाया जाएगा। मैनें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर लेख भेजा और मुझे बुला लिया गया। दिल्ली मेरी पहली यात्रा थी, सवाल यह था कि कहां रुका जाये। इस समस्या का समाधान मामा ने किया। उस समय वे शहर के आर्य समाज के प्रधान थे। आर्य समाज का कार्यालय चाँदनी चौक में था। उन्होंने अपने लेटर पैड पर मेरे लिये चिट्ठी लिखी और आर्य भवन में मुझे ठहराने का अनुरोध किया।  मैनेजर पर उस चिट्ठी का कोई असर नही हुआ – वह बोला क्या आप दिल्ली में किसी को जानते हैं? मेरा जबाब न में था। उसने तनिक क्रोध में कहा – आपकी यहा कोई चीन्हा पर्ची नही है तो कैसे काम होगा। मैंने उसके शब्द चीन्हा–पर्ची को पकड़ लिया। यह पूर्वी उ प्र के इलाके का शब्द था। उसने स्वीकार किया कि वह देवरिया जिले का रहने वाला है। जब मैंने बताया कि मैं देवरिया से आ रहा हूँ। वह बहुत खुश हुआ और मुझे धर्मशाले में जगह मिल गयी। सोचिये किस तरह शब्द हमारा बेड़ा पार करते हैं।


सेंट एंड्रयूज कालेज


मैंने वहाँ के मशहूर सेंट एंड्रयूज कालेज में एडमिशन लिया। वह शहर का प्रसिद्ध कालेज था। जब तक गोरखपुर विश्वविद्यालय नहीं खुला था, लोग उसी कालेज में पढ़ते थे।  यह कालेज आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। यह कालेज 1828 में मिशनरी स्कूल के रूप में स्थापित हुआ था। कालांतर में यह एक कॉलेज के रूप में सामने आया। इस कॉलेज में चुनिंदा अध्यापक रखे जाते थे। कॉलेज के प्रिंसपल चाको साहब थे। वे दक्षिण भारत के निवासी थे उन्हें हिन्दी बिल्कुल नहीं आती थी। कुछ दुष्ट लड़के जब उनके सामने उन्हें गाली देते थे तो वे उत्तर में ओ के ओ के कहते रहते थे। जाहिर है कि उन्हें उनकी गाली नहीं समझ में आती थी। मैं उन लड़कों से कहता था कि यह अच्छी बात नही है, तुम्हें उनका सम्मान करना चाहिये लेकिन वे मेरी बात को हँसी में उड़ा देते थे। 

कॉलेज के हिन्दी के विभाग के अध्यक्ष  परमानन्द श्रीवास्तव थे जिसके बारे में लोगों ने बताया कि वह हिन्दी के प्रख्यात कवि और आलोचक हैं। वे छोटे कद के थे और कुर्ता पैजामा पहनते थे जिसे हिन्दी के एक पत्रकार उनका ड्रेस कोड बताया था। वह उन दिनों सफ़ेद कुरता पैजामा पहनते थे। वे साधारण ढंग से रहते थे। उनके भीतर कोई बनावट नहीं थी।  वे साहित्य के बारे में बात करते थे। निर्धारित कोर्स के अलावा वे अन्य पुस्तकें पढने की सलाह देते थे। उनकी आवाज बहुत तीक्ष्ण थी उसमें कोई लटपटाहट नहीं थी। उनके एक एक शब्द स्पष्ट थे। शुरू–शुरू में उनकी भाषा समझने में कठिनाई हुई फिर मैनें उनकी लय पकड़ ली।  वे हमे देश दुनिया की नयी नयी बातें बताते थे जिससे हमारा ज्ञानवर्धन होता रहता था। नये क्षितिज खुलते थे। एक साल के बाद वे विश्वविद्यालय चले गये –जैसे कोई बीच मझधार में छोड़ कर चला गया हो। जब मैं विश्वविद्यालय में एम ए करने गया तो मुझे पूर्व परिचय का लाभ मिला। उनके मेरे पारिवारिक संबंध बन गये थे।  मैं उनके घर आने जाने लगा।   

बहरहाल उनकी जगह पर शरतचंद्र अग्रवाल आ गये थे। वे परमानन्द जी की तरह विद्वान नही थे। गीत बहुत अच्छे लिखते थे। उनका व्यवहार बहुत अच्छा था। वे मेरी काव्यात्मक अभिरुचियों से परिचित थे।  

जब क्लास खत्म हुये तो उन्होंने कहा – शाम को मेरे घर आ जाना।  इस बात से मैं परेशान सा हो गया आखिर मैंने कौन सी गलती की है कि वे मुझे अपने घर बुला रहे हैं? मैंने अपने सहपाठियों से यह बात कही तो उन्होंने कहा – यह बात तो उनसे मिलने के बाद पता चलेगी ।  

वे जुबली इंटर कालेज के पास रहते थे। घंटी बजायी तो उनकी पत्नी ने दरवाजा खोला और ड्राइंग रूम में बैठाया। थोड़ी देर में चाय और बिस्कुट का ट्रे रखते हुये कहा – चाय पिओ बेटे।  मैंने उनसे पूछा - मैडम, सर कहां हैं? उन्होंने मुझे बुलाया है।  तुम चाय पियो वे आ जाएंगे। मेरा दिल धकधक कर रहा था। 

जैसे वे आये मैं उठ कर खड़ा हो गया। उन्होंने कहा – बैठो। मैं सोचता रहा कि आखिर क्या बात है जिसके लिये उन्होंने मुझे बुलाया है।  मैं कुछ कहता कि उसके पहले उन्होंने कहा – कॉलेज में मैगजीन निकलने वाली हैं – तुम हिन्दी खंड का सम्पादन संभालो। उनकी इस बात से मेरे सारे संदेह खत्म हुये उनकी जगह मुझे जो खुशी मिली उसे शब्दों में नहीं व्यक्त किया जा सकता। मैंने उनके पाँव छूये और इतराते हुये अपने ठिकाने की तरफ निकल पड़ा। इस घटना से मुझे यह सबक मिला कि चीजों के प्रति सकारात्मक होना चाहिये। मुझे खुशी हुई कि इस उम्र में मैं सम्पादक बन गया हूँ।  


मेरे लिखने की शुरुआत गीतों और गज़लों से हुई थी। कुछ दिनों के बाद पता लगा कि यह मेरे बस का काम नहीं हैं। परमानन्द जी की प्रेरणा से मैंने कल्पना, ज्ञानोदय के साथ अन्य साहित्यिक पत्रिकाओ के अंक पढ़ने शुरू किये और कविता की दुनिया की तरफ प्रवृत्त हुआ।  मेरा यह माना था कि लिखने के पहले पढ़ना आवश्यक हैं। परमानन्द जी सेंट एंड्रूज कालेज में साप्ताहिक गोष्ठियों की शुरुआत कर चुके जिसे अग्रवाल सर से जारी रखा।


रामगढ़ ताल


पढ़ने के बाद सैर सपाटे का समय निकाल लेता था। उसी समय क्लास में एक मित्र बना जिसका गाँव रामगढ़ ताल के पास था। रामगढ़ के आसपास गहन जंगल था। दिन में भी डर लगता था।  वह मुझे अपने गाँव ले गया और हम दोनों ने मिल कर मछली का शिकार किया था। कुछ मछलियों को भून कर खाया उसके अनेक तरह के व्यंजन बनाएं गये।  मित्र माँझी जाति का था, उसके  यहाँ सब्जी की जगह मछली बनती थी। मैं अक्सर उसके साथ उसके गाँव चला जाता था। अब वह इलाका पूरी तरह बदल गया है। जंगल काट दिये गये और आधुनिक भवन बन गये है। यह इलाका शहर के पाश कालोनी में दर्ज हो चुका है। उस क्षेत्र में  तारामंडल है जिसके नाम पर उस पूरे क्षेत्र का नामकरण किया गया था। उस जगह को देख कर मुझे लगा कि किस तरह आधुनिकता लोक संस्कृति को नष्ट कर देती है।  

इस अफ़साने में एक दो अध्याय अभी बाकी हैं। उस समय त्रिभाषा फार्मूला पर जोर था।  यानी हिन्दी भाषी लोग दक्षिण की किसी भाषा को पढे और वे हिन्दी की तरफ आकर्षित हो।  मेरे बगल में एक लड़की गीता रहती थी जिसके घर मेरा आना–जाना था। वह सेंट एंड्रयूज में पढ़ती थी लेकिन वह विज्ञान की विद्यार्थी थी। एक दिन मेरे पास एक फार्म ले कर आयी और कहा –इसे भर दे। मैंने पूछा यह कौन सा फार्म है? उसने बताया तेलगु का एक साल का कोर्स है उसके बाद तीन सौ रुपये मिलेंगे। मेरी रूचि तीन सौ रुपये में नही उसकी संगत में थी। एक साल तक रोज साथ आना जाना था। हम लोगों के साथ एक और लड़की स्वर्णलता थी  जो उसकी दोस्त थी।  जब हम तीनों जुबली कालेज में तेलुगू पढ़ने जाते थे, लोग हमें हसरत के साथ देखते थे। गोरखपुर आज की तरह आधुनिक नहीं हुआ था इसलिये अगर कोई लड़की किसी लड़के के साथ जाती थी, लोग उन्हें घूरते रहते थे। मैं रेती चौक के पास एक उप मुहल्ले मुफ़तीपुर में रहता था। वहाँ से हम बक्शीपुर होते हुये शाम को जुबिली कॉलेज जाते थे। एक घंटे के बाद जब लौटते हुये रात हो जाती थी। तेलगु के सर को ठीक से हिन्दी नहीं आती थी जैसे हम तेलगु नहीं समझ पाते थे।  

एक दिन मैं तुम्हें भीगता हुआ 

देखना चाहता हूँ प्रिये 

बारिश हो और हवा भी हो झकझोर  

तुम जंगल का रास्ता भूल कर 

भींग रही हो 

यह कविता उस बंगाली लड़की के लिए लिखी गयी हैं  जो मामा के घर अक्सर आती रहती थी। इस कविता का भाव मेरे दिमाग में था लेकिन यह कविता उससे बिछुड़ने के बाद लिखी गयी थी। हमारी स्मृतियाँ जीवन भर हमारा पीछा करती रहती हैं। वह गोरखपुर की रहने वाली थी। उसका बचपन और शिक्षा काल कोलकाता में बीता था। उसके बनाव शृंगार में बंगाली संस्कृति की छाया दिखाई देती थी। उसका रंग सांवला था और नाक–नक्स तीखे थे।  उसके चलने की अदा खूबसूरत थी। उससे मुझे बहुत कुछ जानने और सीखने को मिला। वह मुझसे रबीन्द्र ठाकुर, शरत चंद, सत्यजित राय, ऋत्विक घटक आदि बारे में  की बात करती थी। वह मुझे बताती थी कि बंगाली लड़कियों को बारिश का मौसम बहुत पसंद है। जब आकाश में बादल छा जाते थे तो लड़कियां जंगल के किसी इलाके में अपने गेसू खोल कर नाचने लगती थी।  

संयोग देखिये बारिश मेरा भी मनपसंद मौसम था। गाँव में कभी मैं छाते का उपयोग नही करता था। मेरे भीतर यह कल्पना थी कि काश मैं उसे भीगता हुआ देख पाता। उसने मुझसे कहा था कि मुझे घर पहुंचा दो। बारिश के दिन थे कि अचानक तेज बारिश होने लगी। हमारे बीच एक ही छाता था जिसके भीतर हम दोनों भींग रहे थे। वह बारिश से तर-बतर हो चुकी थी। उसके देह की एक एक धारियाँ अंग प्रत्यंग साफ दिखाई दे रहे थे। जब बारिश आती है यह दृश्य मेरे भीतर कौध जाता है।  


गोरखनाथ मंदिर 


शहर में कई जगहें थीं जिसे मुझे देखना था जैसे कि गोरखनाथ मंदिर। पिता के लिये मुझे मानस और गीता की टीका खरीदनी थी इसलिये गीता प्रेस भी जाना था। पहली जगह गोरखनाथ मंदिर था। गोरखनाथ के नाम पर इस शहर का नाम पड़ा। गोरखनाथ केवल दर्शनीय स्थल नही बल्कि वहाँ धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे।  वहाँ विवाह के पूर्व लड़कियों को देखने और चयन करने का कार्यक्रम चलता था। आज की तरह उस समय गोरखनाथ इतना भव्य नहीं था।  मंदिर में दर्शन करने के बाद मैंने उस स्थान को देखा कि वहाँ कई महन्तों की समाधियाँ बनी हुई थी। उस पर उनके नाम और प्रयाण की तारीख दर्ज थी। उन्हें पढ़ने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। 

गोरखनाथ मंदिर का इतिहास बहुत पुराना था।वह मछेन्द्रनाथ से शुरू होता है गोरखनाथ उनके शिष्य थे। गोरख जाग मछन्दर आया। इसका एक रोचक संदर्भ है – जब मछन्दर मोह माया में डूब गए थे तो उन्हें जगाने के लिये गोरखनाथ ने इस युक्ति का प्रयोग किया था। 

इस मठ की कीर्ति को गोरखनाथ ने स्थापित किया।  मठ के प्रधान हिन्दू धर्म से जुड़े हुये थे – यह परंपरा दिग्विजयनाथ से शुरू होती है। अवैद्यनाथ के बाद आदित्यनाथ उसे शिखर तक पहुंचाया है। आदित्यनाथ आजकल सूबे के मुख्यमंत्री हैं। दिग्विजय नाथ हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे। उनका नाम गांधी की हत्या के साथ जुड़ा हुआ था। इसके साथ हनुमान दास पोद्दार को भी गांधी हत्या के कटघरे में खड़ा किया गया था। इतिहासकार बताते है कि देश के विभाजन के पीछे हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की मुख्य भूमिका थी। बहरहाल यह विवादस्पद विषय है। उसके बारे में विचार व्यक्त करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। 

मंदिर के परिसर में एक बड़ा तालाब है जिसके बारे में कहा जाता है कि महाभारत के भीम गोरखनाथ से मिलने आए थे लेकिन गोरखनाथ साधना में लीन थे। इसलिये उन्होंने एक जगह विश्राम करना पड़ा। उनके भार से जमीन धँस गयी थी। उसी जगह तालाब बना दिया गया था।  

महाभारत का युद्ध 3100-3139 ईसा पूर्व हुआ था और गोरखनाथ ग्यारहवी शताब्दी में पैदा हुये थे। इस दोनों घटनाओं के बीच समय का बड़ा अंतर है। आस्थाएं इन सबसे ऊपर होती हैं। इस विषय पर कोई बात करना अनुचित है। गोरखनाथ मठ मंदिर नहीं सत्ता का केंद्र माना जाता था।  दो शीर्ष जातियों के बीच के संघर्ष से लोग परिचित हैं। वह उस समय का रक्तरंजित समय था जब दिन दहाड़े हत्याएं होती थी। लोग देखते रहते थे लेकिन उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नही करते थे। बी बी सी में गोरखपुर के दिन दहाड़े हुई हत्याएं सुर्खियां बनती थी। लोग डर के मारे शाम को घर से बाहर नहीं निकलते थे। शहर में सन्नाटा छा जाता था। 

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अविभाजित गोरखपुर परिक्षेत्र में तीन विशिष्ट जगहें हैं। कुशीनगर, मगहर (संत कबीर नगर) और गोरखनाथ। बुद्ध, गोरख, कबीर इस धरती के मुख्य गौरव हैं। बुद्ध तो विश्व में बुद्ध धर्म के कारण प्रसिद्ध हैं। कबीर आज सबसे ज्यादा प्रासंगिक हैं लेकिन गोरखनाथ के उपदेशों को पहचानने का कोई प्रयास नही किया गया। गोरखनाथ मठ इस मामले में उदासीन रहा। अगर गोरखनाथ को ठीक से पढा जाय तो वह कबीर से कम महत्वपूर्ण नही हैं। वे कुरीतियों के खिलाफ रहे हैं। उनका जाति प्रथा पर कोई यकीन नही था। यह बिडम्बना ही है कि हमारे प्राचीन ग्रंथ मठ मंदिरों से बाहर नहीं आ सके है। उनकी व्याख्या को संकुचित दायरे में कैद कर दिया गया है ताकि साधु संत उससे लाभ अर्जित कर सके।


गोरखपुर विश्वविद्यालय 


अब इस गूढ विषय से थोड़ा दूर हो जाते हैं। बी ए पास करने के बाद विश्वविद्यालय में जाने की बारी आयी। विश्वविद्यालय बड़ी जगह थी, उसका परिसर बड़ा था। जैसे जनपद का रामकोला कस्बा गाँव से बड़ा था उसी तरह विश्वविद्यालय सेंट एंड्रयूज से बड़ा था। उसमें बहुत से विषय पढ़ाये जाते थे। अध्यापक भी बहुत योग्य थे। मुझे लगा कि कुएं का मेढक समुन्दर में पहुंच गया हो। किन्हीं कारणों से हिन्दी में मेरा एडमिशन थोड़ा बिलंब से हुआ। मुझे डी सेक्सन में दाखिला मिला जिसमें सिर्फ लडके थे, लडकियाँ नहीं थीं। दोस्तों ने मेरा मजाक उड़ाते हुये कहा – तुम क्या खाक हिन्दी साहित्य पढ़ोगे बिना लड़कियों के साहित्य में रस कैसे  मिलेगा।  उनकी यह शिकायत  नाजायज नहीं थी। इस समस्या का समाधान मित्रों ने किया। लंबी जद्दोजहद के बात बन गयी, मेरा प्रवेश ए सेक्सन में हो गया जिसमें लड़कियों की अच्छी तादाद थी ।  

उस समय हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डा रामचन्द्र तिवारी थे। वे हिन्दी के प्रमुख आलोचक थे। परमानन्द जी सेंट एंड्रयूज कालेज से विश्वविद्यालय में आ चुके थे।  इस सूत्र का मुझे लाभ मिला।  परमानन्द जी के अलावा विश्वनाथ प्रसाद तिवारी थे जो बाद में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बने।  रंगमंच में मैडम गिरीश रस्तोगी का बड़ा नाम था उन्होंने रूपांतर नाट्य संस्था का गठन किया था। मैंने सावधान अदालत जारी है (विजय तेंडुलकर) आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस (मोहन राकेश) सूर्य की पहली किरण से अंतिम किरण तक (सुरेन्द्र वर्मा) शतरंज के खिलाड़ी, सदगति (प्रेमचंद) राग दरबारी (श्रीलाल शुक्ल) जिसे रंगनाथ की वापसी नाम से प्रदर्शित किया गया था। वहाँ हिन्दी के अनेक लेखकों और नाटककारों से मुलाकात हुई थी।  

हिन्दी विभाग में रामदेव शुक्ल थे जिन्होंने लोकजीवन को केंद्र में रख कर कई उपन्यास लिखे हैं।  कृष्ण चंद्र लाल भी इस विभाग में थे – वे 'सहचर' नाम की पत्रिका निकालते थे। इस पत्रिका का एक अंक परमानन्द श्रीवास्तव पर केंद्रित था जिसमें मेरा लेख कठिन  समय में कविता – शामिल था।  

गोरखपुर विश्वविद्यालय में अधिकांश छात्र देहाती इलाके से आते थे। वे स्नान के बाद अपने सर पर महकौआ तेल चुभेड़े रहते थे। उस समय आंवले और चमेली का तेल लोकप्रिय था।  उनमें से मैं भी एक था था जब मेरी एक सहपाठिन ने बताया कि तेल नहाने के पहले सर लगाया जाता है बाद में नहीं।  उसके बाद मैनें उसकी बात  पर अमल करना शुरू कर दिया था। बालों को दिलफरेब बनाने के लिए शिकाकाई साबुन से बाल धोता था और आधुनिक होने की कोशिश करता था। लड़कियां सज धज के साथ आती थीं। उन्हें प्रभावित करने के लियें लड़के अपने पहनावे पर अतिरिक्त ध्यान देते थे और छैला बने रहते थे। यह उम्र ही ऐसी थी जिसमें लड़कियों के प्रति लड़कों का आकर्षण बना रहता था। उन दिनों धर्मवीर भारती का उपन्यास बहुत प्रिय था – लोग सुधा और चन्दर जैसा बनना चाहते थे। अपनी जोड़ी की खोज में लगे रहते थे। हर सप्ताह में काव्य गोष्ठियाँ होती रहती थी।  इसके आयोजक परमानन्द श्रीवास्तव होते थे। उन्होंने कविता लिखने में मेरी रुचि को परिष्कृत किया।  

उस समय विश्वविद्यालय में दो मुख्य ब्लाक थे, मजीठिया ब्लाक और पंत ब्लाक। मजीठिया ब्लाक में विज्ञान  और पंत ब्लाक में अन्य विषयों की कक्षाएं चलती थीं। मजीठिया ब्लाक के मुख्य द्वार पर चबूतरे थे जहां छात्र-छात्राएं खाली समय में बैठा करती थी। उसे लोग मजनूँ चौक कहते थे। वहाँ प्रेमी लोगों की जमघट लगी रहती थी।  पंत ब्लाक के उत्तर तरफ गोल्फ ग्राउंड था जो देखने में बहुत खूबसूरत था। घास के हरे मैदानों के बीच यूकेलिप्टस के पेड़ थे – वहाँ छोटे–छोटे पुल बने हुये थे। पहले वहाँ अंग्रेज गोल्फ खेलने आते थे अब उनकी जगह रेलवे के आला अफसरों ने ले ली थी। उनका  गोल्फ बैग लेकर नौकर–चाकर चलते थे। अफसर नफासत के साथ गोल्फ खेलते थे। हम इस खेल के बारे में कुछ नहीं जानते थे। यह अभिजात्य वर्ग का खेल था।  हमारा तो प्रिय खेल कबड्डी और ओल्हा –पाती था जिसका अभ्यास हम गाँव में करते थे। 


ब्रिटिश कब्रिस्तान, गोरखपुर


जब अंग्रेजों की बात चली तो विश्वविद्यालय से सटे हुए ब्रिटिश कब्रिस्तान की याद कर ले जहाँ मैं अक्सर जाया करता था। यह दो सौ साल पुराना कब्रिस्तान था जिसकी कब्रे बेहद उदास दिखती थी। इस कब्रिस्तान में कम्पनी या ब्रिटिश सेना में काम करने वालों को दफनाया गया था।  यहाँ कोई फूल चढाने नहीं आता था। हर कब्र पर  मृतक के नाम ओहदों और दुनिया से जाने की तारीख शिलापट्ट पर लिखी हुई थी।  कब्रिस्तान पर लिखी हुई इबारते बेहद मार्मिक है  - एक कब्र की यह इबारत देखें –blessed are the dead which die in the lord ,

इसके अलावा इस इबारत को देखिए जो जीवन और मृत्यु पर गहरी टिप्पणी है। इन पंक्तियों को देखे जिसके गहरे निहितार्थ है –

Strenger, pause as you pass by : as you are now, so once i was –as i am now , so you will be prepare for death and follow 

(अजनवी –कुछ देर के लिये रुको – जैसे आज तुम हो कभी मैं भी वैसा था। जैसे आज मैं कब्र में हूँ, एक दिन आएगा तुम भी वैसे हो जाओगे इसलिए मृत्यु के लिये तैयार हो जाओ और मेरा अनुसरण करो ) 

इस शिलालेख को पढ़ कर मुझे यक्ष प्रश्न की याद आती है। युधिष्ठिर से जब यक्ष ने पूछा – दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है – तो उन्होंने से जबाब दिया –“प्रतिदिन हम प्राणियों की मृत्यु देखते हैं लेकिन जो जीवित हैं वे सोचते है कि वे अमर रहेंगे –इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है।"

कब्रिस्तान ऐसी जगह है, जहां पहुंच कर आदमी दार्शनिक होने लगता है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि ब्रिटिश कब्रिस्तान में रात के सन्नाटे में मृतको की आत्मायें यहाँ उतरती हैं और अपने कब्रों के आसपास घूमती रहती हैं। इस ब्रिटिश कब्रिस्तान में ऐसी कई कहानियाँ सुनने को मिलती हैं। 

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यह मेरे जीवन का उर्वर समय था। इसी समय मेरी मुलाकात सुमन से हुई जो बाद में मेरी जीवनसंगिनी बनी। उस दौर में हमारा प्रेम प्रसंग बहुत मशहूर था। एम ए करने के बाद मैं मोहन राकेश पर शोध करना चाहता था लेकिन संभव नहीं हुआ। यह काम सुमन ने किया। उसने मैडम गिरीश रस्तोगी के निर्देशन में शोध पूरी कर ली थी और मैं इलाहाबाद में अफसर बनने के लिये संघर्ष करता रहा। एक ओर प्रेम था तो दूसरी तरफ बेरोजगारी, उसी के बीच से समय गुजर रहा था। 

पिता मुझे ले कर बहुत महत्वाकांक्षी थे वे मुझे आई ए एस/ पी सी एस अधिकारी बनाना चाहते थे। इस क्षेत्र में मेरी कोई गति नहीं थी। मैं सोचता था कि मैं और सुमन किसी कालेज में पोस्ट हो जाएं तो यह जीवन सफल हो जाये। जीवन ऐसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं। समय और संयोग जीवन के रास्ते निर्धारित करते हैं। मेरा चुनाव पी सी एस एलाइड में हो गया, अब हुकूमत के घोड़े की तरह जनपद दर जनपद भटकना था। इस नौकरी में साहित्य का कोई काम नहीं था। बेकार में वक्त बर्बाद हुआ। यह तो जोड़ने–घटाने की नौकरी थी जो कम पढ़ा–लिखा आदमी कर सकता है। यह मुहावरा याद आया – पढे फारसी बेचे तेल। साहित्य का रोग पहले लग चुका था, वह लगातार बढ़ता जा रहा था।  बाद में असाध्य रोग बन गया।  


गीता प्रेस गोरखपुर 


पिता के पास मेरा जाना–जाना बना रहा।  उन्होंने कहा था कि जब मैं आऊ उनके लिये रामचरितमानस और गीता जरूर लाऊँ। गीता प्रेस मेरे आवास के करीब था। एक दो किलोमीटर की दूरी थी। गीता प्रेस का भवन भव्य था। एक बहुत बड़े हाल में किताबें सजी हुई थी। मानस के अलावा वेद पुराण के भी ग्रंथ थे। उनकी कीमत बहुत मामूली थी। जिल्द मजबूत थी। गीता प्रेस से कल्याण नाम की पत्रिका छपती थी जिसकी लाखों प्रतियां देश – विदेश में बिकती थी ।  दाम्पत्य जीवन पर लिखी किताब –नारी अंक आज भी लोकप्रिय किताब है, इसकी खूब  मांग है। यह एक तरह से बेस्ट सेलर है । 

स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी हनुमान दास पोद्दार की लिखी किताब है। यह किताब दाम्पत्य विरोधी पुस्तक है।  दुनिया इतनी बदल चुकी है लेकिन गीता प्रेस से प्रकाशित किताबों की धारणायें नही बदली हैं। मुझे लगातार महसूस होता रहा है कि गीता प्रेस से प्रकाशित पुस्तके मनुष्य को भाग्य और भगवान के सहारे छोड़ देती है – वे वैज्ञानिक सोच के विरुद्ध हैं।  

गीता प्रेस की पृष्ठभूमि अलग है। गीता प्रेस की स्थापना 29 अप्रेल 1923 में हुई थी जिसके कर्णधार जयदयाल गोयनका, हनुमान दास पोद्दार थे। याद किया जाना चाहिये कि आर एस एस की स्थापना 1925 में हुई थी। दोनों का उदेश्य भारत में सनातन धर्म को स्थापित करना था। वे अल्प मूल्य में किताबें उपलब्ध करवाते थे। यही काम सोवियत रूस ने सोवियत लेखकों की किताबें छाप कर किया था और हमारे भीतर चेतना जागृत हुयी थी। गीता प्रेस की किताबे लोगों को धर्मभीरु बना रही थी। वहीं पर सोवियत संघ की किताबें मनुष्य के भीतर चेतना जगाने का काम कर रही थी। प्रगति प्रेस से पुश्किन, टालस्टाय, चेखव, गोर्की, गोगोल की विश्वप्रसिद्ध किताबें हमारे सोच को बदल रही थीं। हमारी पीढ़ी के लोग वैज्ञानिक समझ से परिचित हो रहे थे।  

हनुमान दास पोद्दार असुरन चौक के पास गीत – बाटिका में रहते थे। उसे उन्होंने आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया था। श्री राधाकृष्ण मंदिर बहुत ख्यात है। इस विराट मंदिर में राधा कृष्ण सीता और राम और शिव पार्वती के विग्रह मौजूद है। पोद्दार का अध्यात्म विवेकानंद के अध्यात्म से भिन्न था। वहाँ पर  राधा बाबा रहते थे जो राधा कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उस आश्रम के अंत :पुर में आम आदमी को प्रवेश वर्जित था।  वे दूर से हाथ जोड़ कर चले जाते थे। उस आश्रम में व्यवसायी और वे नौकरशाहो की आवाजाही लगी रहती जो अपनी नौकरी और भौतिक विलासिता से खूब अघा चुके थे। उन्होंने अकूत संपत्ति अर्जित कर ली थीं और  परिवार तथा बच्चों से धोखा खाने के बाद बीतरागी हो गये  थे।  वे गीता बाटिका  में धन न्योछावर करते थे और संतों का सान्निध्य प्राप्त करते थे। मैं वहाँ इस उद्देश्य के साथ गया ताकि मैं उस रहस्यमयी दुनिया को देख सकूँ ।   

      

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बस्ती बस्ती ठोकर जाने क्या अहसास हुआ 

अपने शहर में पाँव जो रक्खा लिपट गये दीवारों से 

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जब भी गोरखपुर जाता हूँ, एक अनाम शायर का यह शेर याद आता है। इस शहर के प्रति अपनी दीवानगी छिपा नहीं पाता।  कुछ जगहें जीवन से अभिन्न हो जाती हैं। गोरखपुर में शुरुआती दिन पढ़ाई–लिखाई में व्यतीत हुए। दूसरा दौर नौकरी का शुरू हुआ, जब सूबे के कई जिलें धाँगते के बाद गोरखपुर और महराजगंज में मेरी पोस्टिंग हुई। एक समय में महराजगंज गोरखपुर में शामिल था। जब गोरखपुर आया तो लगा कि एक विजेता जंग जीत कर अपने शहर में लौट आया हो। गोरखपुर और उसके आसपास छ : साल का समय गुजरा, तब कवि के रूप में मेरी पहचान बन चुकी थी। 1986 में मुझे भारत भूषण अग्रवाल का कविता सम्मान मिला।कविता की दुनिया में लोग मुझे जानने लगे थे लेकिन अपने विभाग में मेरी छवि इसके विरुद्ध थी। आला बास कहते थे नौकरी करना है तो कविताई से दूर रहो।  यह ऐसी सलाह थी जिसे मैं मान ही नहीं सकता था।  

उन्हीं दिनों मुझे 'ईश्वर बाबू' कविता पर भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला। मेरे परिचय के साथ ईश्वर बाबू कविता धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और अन्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थी।  

इसी दौरान विभाग के आयुक्त दौरे पर गोरखपुर आये थे। मैंने धर्मयुग का अंक अपने बैग में छिपाया हुआ था। आयुक्त के साथ आये सहयोगी को वह अंक दिखाया। उसे पढ़ कर उन्होंने मुझे बधाई दी और कहा कि यह अंक सर को दिखा दो। मैंने उनसे कहा कि वह तो मुझसे खफा रहते हैं। कई बार मुझे अपमानित कर चुके थे।  मैं नही चाहता कि इसमें कोई इजाफा हो। मेरे मना करने के बावजूद वे बास के कमरे में पत्रिका के साथ चले गये। मेरा दिल धड़कने लगा। थोड़ी देर के बाद उन्होंने मुझे तलब किया। उनके तेवर नर्म थे। उन्होंने मुझे बधाई देते हुये कहा – राज काज में डाँट फटकार चलती रहती है। इसे अन्यथा मत लिया करो। कविता लिखने का काम जारी रखो। इस कविता ने मेरे प्रति उनकी धारणा बदल दी थी। मैं पूरे दिन खुश रहा जैसे मेरे पाप नष्ट हो गये हो। किसी गुनाह के लिये मुझे माफ कर दिया गया हो। 


गोरखपुर मेरे जीवन के अनेक संस्मरणों से भरा हुआ था।  नौकरी के साथ लेखन भी जारी था। शहर के मित्र मुझसे मिलने आते थे। खूब गोष्ठियाँ होती। बेरोजगारी में छात्र जीवन के दोस्त मिलते ही थे लेकिन रिश्तेदारों ने दूरी बना रखी थी। एक अच्छे पर पहुँचने के बाद उनकी भी आवाजाही होने लगी थी। शहर के कवि –लेखक मित्र मिलते रहते थे जिसमें देवेन्द्र कुमार बंगाली, बादशाह हुसेन रिजवी, नवनीत मिश्र, देवेन्द्र आर्य, मदन मोहन, महेश अश्क का नाम मुख्य है। शहर से बाहर के मित्रों के आने से खुशी मिलती थी। भारत यायावर और अनिल जनविजय आते रहते थे। प्रिय कवि केदारनाथ सिंह जब भी दिल्ली से आते थे तो मेरे आवास पर कोई न कोई शाम जरूर बिताते थे। उनके आने पर परमानन्द जी आते थे। एकाध बार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की आमद हो जाती थी।  

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जीवन का एक वृत बीत चुका था। बीती बातों को याद करूं तो एक महाकाव्य तैयार हो सकता है। सेवानिवृत होने के बाद यह सवाल मेरे पास मौजूद था कि अपना आशियाना कहां बनाऊँ? नौकरी किराये के मकान में गुजरी। अपने कंधों पर घर ढोता रहा अब इत्मीनान की सांस लेना चाहता था। मेरे दिमाग में दो जगहें थी – गोरखपुर या लखनऊ। संयोग यह था कि फैजाबाद में आवास विकास की कालोनी बन रही थी और किस्तों में मकान मिल रहा था। फैजाबाद में मेरे रिश्तेदार रहते थे।  उन्होंने मुझसे कहा कि वे भी एक मकान आवंटित करा लें।  मैंने इनकार कर दिया था।  फिर उन्होंने कहा – कौन कह रहा है कि आप यहाँ सेटल हो। आप जब भी चाहे उसे बेच कर जिस शहर में चाहे रह सकते हैं।  दस–पंद्रह वर्षों में उसकी कीमत बढ जाएगी।  यह बात मेरे समझ में आ गयी।  

देवरिया से मेरा ट्रांसफर गोंडा हो गया था। मेरे लिये यह सुविधा थी कि मैं फैजाबाद से गोंडा बस से जा आ सकता था। गोंडा से फिर अंबेडकर नगर से फिर फैजाबाद आ गया था। वह मेरे जीवन का अंतिम जनपद था। यही से मुझे सेवानिवृति मिली थी। इस क्षेत्र में आठ – दस साल विचारने के बाद यह जगह अच्छी लगने लगी थी। अयोध्या में सरयू नदी थी, उसके तट पर बैठना अच्छा लगता था – इस नदी के दूसरे छोर पर गुप्तार घाट था, जहां राम ने जल समाधि ली थी। छोटे शहर की अपनी सहूलियते होती हैं। उनकी दूरी पैदल ही तय की जा सकती हैं। यह शहर बड़े शहरों की हायतोबा से अलग था – गोरखपुर इतनी दूर नहीं था। वहाँ सुबह जा कर रात में लौटा जा सकता था। मेरे सभी रिश्तेदार गोरखपुर में रहते थे – बहन भी वही रहती थी। वहाँ रुकने की कोई समस्या नही थी ।    

यह जीवन भी अजीब है। हम कहां पैदा होते हैं। कहाँ–कहाँ नौकरी के लिये भटकना पड़ता है, इस पर हमारा कोई बस नही है। तबादले वाली नौकरी और किरायों के मकानों में उम्र का बड़ा हिस्सा गुजर जाता है। एक दिन किसी अजनवी शहर में मकान बनवा कर बस जाते हैं। जीवन में  बहुत कुछ अनिश्चित रहता है, हमारे जीवन में संयोगों की महती भूमिका है। यह संयोग मेरे साथ भी घटित हुआ है। 

मैंने अपने साथ कई  मित्रों का जीवन देखा है, वे अपने शहर से दूर चले गये हैं। उनसे कभी कभार मिलन संभव हो पाता है। फिलहाल फैजाबाद से गोरखपुर दूर नहीं है – कोई मुझे दिल से पुकारे तो दौड़ा चला जाता हूँ। मेरी इस दीवानगी में कोई कमी नहीं आयी हैं। जब भी जाता हूँ तो वे लोग नहीं मिलते जिनके बीच जीवन के खूबसूरत दिन गुजरे थे। परमानन्द श्रीवास्तव, देवेन्द्र कुमार बंगाली, बादशाह हुसेन रिजवी और सुरेन्द्र काले इस दुनिया से रुखसत हो चुके है। शहर पहले जैसा नहीं रह गया है, उसके रास्ते और गलियाँ बदल चुकी है। रामगढ़ ताल को विकसित कर दिया गया है, वहाँ तैरते हुए रेस्तरा है, नौका बिहार का सुख है। 1998 में यह इलाका बाढ़ में डूब चुका था। कई गाँव जलमग्न हो चुके थे –शहर के कई इलाके बाढ़ की जद में थे। राजमार्ग बंद हो गये थे, लोगों की आवाजाही रुक गयी थी। लोग अपने अपने मकान को बेच कर सुरक्षित जगहों पर बस रहे थे। 

कुछ दिनों बाद यह इलाका पुनः बसने लगा। बड़ी बड़ी इमारते और कालोनियाँ अपार्टमेंट बनने लगे। शहर के पुराने सिनेमहालों को ध्वस्त कर नये नये माल, सुपर मार्केट बना दिये गये है। इस आधुनिक शहर में मेरा पुराना शहर खो गया है, वहाँ मैं अपने आपको खोजने चला जाता हूँ। अपनी स्मृतियों के सहारे पुराने शहर  में दाखिल होने की कोशिश करता हूँ।  


सम्पर्क 


स्वप्निल श्रीवास्तव 

510- अवधपुरी कालोनी 

अमानीगंज 

फैजाबाद – 224001 

  

मोबाइल – 9415332326

टिप्पणियाँ

  1. स्वप्निल जी के संस्मरण बहुत ही तरल होते हैं। इसके पहले कि आप भावुक हों उनका स्वर बदल जाता है। उनसे मैं कुछ सीखता रहता हूं

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