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लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम की असमिया कविताएं

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लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम    गम्भीरता से देखा जाए तो हर कवि का कविता लिखने का अपना अलग तरीका होता है। कवि की संवेदनशीलता, समझ, सूक्ष्म दृष्टि, विषय को बरतने का तरीका जैसे कई एक ऐसे कारक होते हैं जो एक कवि को और कवियों से अलग करता है। मनुष्य प्रकृति से ही सामूहिक होता है। हालांकि तमाम ऐसे काम होते हैं जिसे वह अकेले निबटा लेता है।  हानूम सेलिमा बेगम अपनी एक कविता में लिखती हैं एक कप चाय अकेले पी जा सकती है। उसी तरह से तमाम और काम भी अकेले किए जा सकते हैं ' पैदल टहला जा सकता है/ किताब की दुकान तक जाया जा सकता है/ खरीददारी की जा सकती है/ मंदिर-मजार तक भी जाया जा सकता है अकेले/ ... श्मशान यात्रा ही नहीं की जा सकती अकेले/ ले जाना होगा चार लोगों को मिल कर'। दुःख की घड़ी में मनुष्य के लिए सामूहिकता बहुत जरूरी होती है।  सामूहिकता के बल पर ही हम किसी प्रिय जन के बिछोह से ऊबर पाते हैं।  कवयित्री लुत्फा हानूम सेलिमा बेगम असमिया कविता के क्षेत्र में अपनी अलग ढर्रे वाली कविताओं के लिए ख्यात हैं। असमिया कविता में उनका एक विशिष्ट स्थान है। उनके सात कविता...

दिनकर कुमार की कविताएँ

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एकबारगी सब कुछ बदल गया है अपने यहाँ. रियल स्टेट का आतंक. आवारा पूँजी की रक्तरंजित अभिलाषा. धन पिशाचों की अनन्त महत्वाकांक्षाएँ अपने इर्द-गिर्द इस तरह मंडरा रही हैं जिससे यह झूठा लगने लगा है कि भारत गाँवों का देश है. राजनीति अब सेवा नहीं लूट-खसोट का जरिया बन गयी है. लोकतन्त्र जिस पर हम गर्व करते नहीं अघाते, अब छद्म राजतन्त्र के रूप में परिवर्तित हो चुका है. अपने आज की इन सच्चाईयों को कहने का साहस भी कौन करे आखिर? यहीं पर हमें साहित्य की तरफ देखने की जरुरत पड़ती है, जो हमेशा एक सशक्त प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते नजर आ जाता है. हमारे आज के कवि दिनकर कुमार ने अपनी कविताओं में ये सच्ची बातें कहने का जोखिम उठाया है, ये जानते हुए भी कि सच बोलना अराजकता के दौर में अक्सर खौफनाक होता है. तो आईये पढ़ते हैं कवि दिनकर कुमार की ये कविताएँ            दिनकर कुमार अपनी आवाज में अपनी आवाज में चाहता हूं कुछ असर पैदा हो जो कहूं तुम्हारे दिल को छू जाए मेरी भर्राई आवाज की अनकही पीड़ा तुम्हारे कलेजे तक संप्रेषित हो जाए। चाहता हूं थोड़ी सी करुणा तुलसीदास जैसी मेरी आवाज में ...