चित्रा वर्मा एवं मदन मोहन वर्मा का आलेख 'देश विभाजन और गांधी'
भारत विभाजन के लिए लोगबाग आजकल सारा दोषारोपण कांग्रेस और गांधी जी पर डाल देते हैं। यह एकांगी और बिना सोचे विचारे बोलने वाले लोग ही ऐसा कह सकते हैं। आज इतिहास ही आसान शिकार है। जिसको जो मन आए बोल सकता है। यह कितना हास्यास्पद है कि जिन्होंने इतिहास का क ख ग़ तक नहीं पढ़ा, वे आज इतिहास बदलने की बातें करते हैं। भारत विभाजन के लिए तमाम परिस्थितियां उत्तरदाई थीं। जो गांधी जी आजादी की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे, 1942 के आंदोलन के पश्चात पार्श्व में चले गए। सांप्रदायिक ताकतें अपना खुला खेल खेलने लगीं। सवाल यह है कि दोषी कौन नहीं था? क्या गांधी जी की ही यह एकल जिम्मेदारी थी कि वे देश को अविभाजित रखें? यह देश तो सबका था और आज भी है। किसी पर दोषारोपण कर आप अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते। जो गांधी जी लगातार यह कहते रहे कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा, उन्हें कितना मजबूर हो कर यह विभाजन स्वीकार स्वीकार करना पड़ा होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। क्या गांधी के अलावा किसी और का इस तरह का बयान मिलता है। गांधी जी के बारे में इधर एक सुविचारित किताब आई है 'गांधी जरूरी हैं'। इसके लेखक चित्रा वर्मा एवं मदन मोहन वर्मा हैं। दोनों रचनाकारों ने गांधी जी के तमाम जाने अनजाने पहलुओं पर महत्त्वपूर्ण बातें की हैं। लेखक द्वय लिखते हैं "मुसलमानों ने कहा कि अंग्रेजों के आने के पूर्व हमारा साम्राज्य था। हमसे हमारा साम्राज्य छीन कर अंग्रेजों ने यहाँ शासन किया। जब अंग्रेज वापस जा रहे हैं, तो हमारा साम्राज्य हमें वापस कर के जायें। देश-विभाजन के लिए ऐसी कई विचारधाराएँ, समस्याएँ, परिस्थितियाँ जिम्मेदार रहीं, न कि गांधी जी। राजा, नवाब, जमींदार सभी तो देश विभाजन की बात कर रहे थे। पूर्वी भारत के लोग अपने हिसाब से माँग रहे थे, दक्षिण भारत के लोग अपने हिसाब से माँग रहे थे, सिक्ख लोग अपने हिसाब से माँग रहे थे, मुस्लिम लोग भी अलग देश की माँग कर रहे थे। पूना पैक्ट भी कुछ हद तक सामाजिक विभाजन की ही बात कर रहा था।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चित्रा वर्मा एवं मदन मोहन वर्मा का आलेख 'देश विभाजन और गांधी'।
'देश विभाजन और गांधी'
चित्रा वर्मा एवं मदन मोहन वर्मा
गांधी जी ने कहा था "भारत के टुकड़े करने से पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने होंगे।" गांधी जी ने यह भी कहा था कि "तैंतीस करोड़ हिन्दू- मुसलमान दोनों अपने-अपने धर्म में पक्के हैं। वे खुदा का नाम लेने वाले हैं, ईश्वर के नाम पर मर मिटने वाले हैं। एक गाय की हत्या पर एक हजार हिन्दू खून लेने वाले और अपना खून बहाने वाले तैयार हैं। एक मुसलमान के अपमान की खातिर अनेक मुसलमान अपना खून देने और खून लेने को तैयार हैं। जब तक देश में ऐसे हिन्दू और मुसलमान मौजूद हैं, तब तक मैं कभी नहीं कहूँगा कि हिन्दुस्तान के लिए स्वराज्य लेना असम्भव है।"
एक पत्र लेखक ने गांधी जी की शिकायत की कि गांधी जी ने पहले ये घोषणा की थी कि भारत के टुकड़े होने से पहले उनके शरीर के टुकड़े करने होंगे। लेकिन अब वे कमजोर पड़ गये हैं।
अपने प्रार्थना-प्रवचन में गांधी जी ने इसका उत्तर देते हुए कहा था कि "जब मैंने वह घोषणा की थी, तब मेरा विश्वास था कि लोकमत मेरे साथ है। लेकिन जब लोकमत मेरे विरुद्ध है, तब क्या मैं उसे दबाऊँ?"
गांधी जी ने अपनी मन की बात को प्रकट करते हुए कहा कि "मेरे न चाहने पर भी भारत का विभाजन हो गया। इससे मुझे गहरी चोट लगी है। परन्तु जिस ढंग से विभाजन हुआ, उसके कारण मुझे और अधिक चोट लगी है। मैंने प्रतिज्ञा की है कि आज की आग को बुझाने के प्रयत्न में या तो कुछ कर जाऊँगा या मर जाऊँगा। मैं जितना अपने देशवासियों से प्रेम करता हूँ, उतना ही समस्त मानव जाति से प्रेम करता हूँ क्योंकि ईश्वर सभी मानव प्राणियों के हृदयों में निवास करता है और मैं मानव जाति की सेवा द्वारा जीवन के सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त करने की आकांक्षा रखता हूँ।"
गांधी के अतिरिक्त किसी ने यह नहीं कहा कि भारत के टुकड़े करने से पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने होंगे। गांधी जी की इस आवाज में देश के लोग शामिल हो गये होते, तो शायद परिणाम कुछ भिन्न ही होता। लेकिन, उनकी पीड़ा को न तो कोई समझा और न ही कोई उनका समर्थन किया। सिर्फ विभाजन का दोष गांधी जी पर मढ़ दिया।
देश तो सबका था, उत्तरदायित्व भी सभी का था। फिर प्रश्न अकेले गांधी जी से क्यों? कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लिया। गांधी जी कांग्रेस के साथ ही समस्त आन्दोलनों का नेतृत्व करते रहे। कांग्रेस की सहमति के बाद विभाजन के प्रश्न पर आन्दोलन करने का आशय यह होता कि कांग्रेस के विरुद्ध भी आन्दोलन करना होता। अन्य कोई संगठन गांधी जी के समर्थन में पहले भी नहीं था। जब तक देश आज़ाद नहीं था, तब तक गांधी जी आगे थे और देश उनके पीछे था और जैसे ही देश आज़ाद हुआ, देश की आजादी के लिए जेल जाने, लड़ने, संघर्ष करने और मरने के लिए तैयार रहने वाले लोग माउंटबेटन के प्रभाव और पद की दौड़ में गांधी को पीछे छोड़, खुद आगे निकल गये।
विभाजन के सम्बन्ध में दिसम्बर 1945 में पेंडरेल मून की एक टिप्पणी उल्लेखनीय है- 'हिन्दुओं से देश के बँटवारे पर सहमति ले लेना आसान है, लेकिन मुसलमानों से देश की एकता का आश्वासन पाना आसान नहीं है।' अंग्रेजी सरकार के दृष्टिकोण से बिना ताकत इस्तेमाल किए, मुसलमानों की इच्छा के खिलाफ हिन्दुस्तान को एक कर के रखना मुमकिन नहीं था। लेकिन हिन्दुओं की इच्छा के खिलाफ इस देश के बँटवारे में जरूरी नहीं था कि ताकत का इस्तेमाल करना ही पड़े या अगर ऐसा जरूरी भी हुआ तो बहुत कम ताकत का इस्तेमाल करना पड़ेगा। मद्रास, बंबई, यूपी और सेंट्रल प्रोविंस के हिन्दू भले ही पंजाब और बंगाल की अपनी बिरादरियों के इस सुर का समर्थन करते हों कि भारत माता के दो टुकड़े नहीं होने चाहिए, लेकिन एक धर्मयुद्ध की स्थिति में उनके पास शायद ही ये इच्छाशक्ति या ताकत हो कि वे अपने उन भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ सकें।'
देश कैसे बनता? देश को बनाने वाले लोग कहाँ थे? जब देश की आजादी की बात आयी तो सभी राजाओं ने भी अपना एक संगठन बना लिया था और अंग्रेजों से कहा कि हम सब आपके अधीन रहे हैं। आप जा रहे हैं तो हम सबको स्वतंत्र कर के जाइए। सारे राजा स्वतंत्रता की माँग कर रहे थे, परन्तु उन्हें स्वतंत्रता नहीं मिली।
मुसलमानों ने कहा कि अंग्रेजों के आने के पूर्व हमारा साम्राज्य था। हमसे हमारा साम्राज्य छीन कर अंग्रेजों ने यहाँ शासन किया। जब अंग्रेज वापस जा रहे हैं, तो हमारा साम्राज्य हमें वापस करके जायें। देश-विभाजन के लिए ऐसी कई विचारधाराएँ, समस्याएँ, परिस्थितियाँ जिम्मेदार रहीं, न कि गांधी जी। राजा, नवाब, जमींदार सभी तो देश विभाजन की बात कर रहे थे। पूर्वी भारत के लोग अपने हिसाब से माँग रहे थे, दक्षिण भारत के लोग अपने हिसाब से माँग रहे थे, सिक्ख लोग अपने हिसाब से माँग रहे थे, मुस्लिम लोग भी अलग देश की माँग कर रहे थे। पूना पैक्ट भी कुछ हद तक सामाजिक विभाजन की ही बात कर रहा था।
गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी को छोड़ कर कोई भी नेता देश की बात नहीं कर रहा था। सब अपनी-अपनी जाति व धर्म की बात कर रहे थे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश विभाजन के समय किसी भी गली, मुहल्ले या चौराहे पर यह नारा नहीं लगा कि देश नहीं बँटने देंगे।
कश्मीर के महाराजा व हैदराबाद के निजाम, भोपाल के नवाब, जूनागढ़ के नवाब, त्रावणकोर आदि रियासतों ने अपने स्वतंत्र होने की पूर्ण कोशिश की। परन्तु सरदार पटेल आदि नेताओं के संयुक्त प्रयास से ही इनका विलय भारतीय संघ में हो पाया। गोवा का विलय सन् 1961 में हुआ। सिक्किम का विलय सन् 1975 में हुआ। हैदराबाद का भी संघर्ष के बाद ही भारत में विलय हुआ। कश्मीर भी संघर्ष के तहत भारत में सम्मिलित हुआ।
मुस्लिम लीग पाकिस्तान कहाँ बना पायी? कांग्रेस बंगाल और पंजाब छोड़ कर पूरे देश में जीती। गांधी, नेहरू, पटेल की कांग्रेस बंगाल और पंजाब में कमजोर रह गयी। जिन राज्यों ने गांधी और नेहरू के विचारों को नकारा, उन्होंने पाकिस्तान होने की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिए। पाकिस्तान का प्रस्ताव पास होता है, देश में साम्प्रदायिक जहर घुलना शुरू होता है। 1941 के चुनाव में इन इलाकों में कांग्रेस फिर पिछड़ती है। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा हाथ मिलाते हैं और कांग्रेस को सत्ता से दूर कर देते हैं। 1945 का चुनाव होता है। बंगाल, खैबर, सिंध में पिछली बार हिन्दू महासभा को सीढ़ी बना कर सत्ता में आई मुस्लिम लीग खुद के बूते सत्ता में आती है। यही तीनों प्रांत पाकिस्तान के रूप में माँगें जाने लगे। और, अंततः पाकिस्तान बना। जिस जमीन ने गांधी, नेहरू, पटेल की सोच को नकारा। जिस जमीन ने हिन्दू, मुस्लिम या जातीय दल (पंजाब) को प्राथमिकता दी, वहीं पाकिस्तान बना।
9 जून को अपने एक लिखित संदेश में गांधी जी ने कहा कि "हिन्दुस्तान के दो भाग नहीं होने चाहिए, तो उस वक्त मुझे विश्वास था कि आम जनता की राय मेरे पक्ष में है; लेकिन जब आम राय मेरे साथ न हो तो क्या मुझे अपनी राय जबरदस्ती लोगों के गले मढ़नी चाहिए? आज मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर तमाम गैर-मुस्लिम लोग मेरे साथ हों, तो मैं हिन्दुस्तान के दो टुकड़े नहीं होने दूंगा। लेकिन, आज मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि आम राय मेरे साथ नहीं हैं और इस कारण मुझे पीछे हट कर बैठना चाहिए।"
उन्होंने लोगों से बार-बार और लगातार इस बात की गुजारिश की कि जमीन का बँटवारा होने के बावजूद वे अपने दिलों का बँटवारा न होने दें। यदि आज किसी मजबूरी में विभाजन को स्वीकार भी करना पड़ रहा है, तो वे अपने दिलों में दूसरे पक्ष के लिए इतना प्यार और सद्भावना रखें कि एक दिन उन्हें इस विभाजन की व्यर्थता का एहसास हो। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। जैसे ही विभाजन की स्वीकृति की खबर देश में फैली, पूरे देश में खासकर पंजाब, सिंध, बिहार और बंगाल में बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे। प्यार की ताकत के सहारे विभाजन को बेमानी बना देने की गांधी की सीख की जगह न सिर्फ जमीन पर, बल्कि दिलों में भी लोगों के खून से विभाजन की लकीरें खींच दी गई। जब पूरा देश हिंसा की चपेट में धू-धू करके जल रहा था, तब गांधी किसके खिलाफ अनशन करते? यदि जनमत उनके अनुकूल होता, तो वे किसी की भी परवाह न कर के विभाजन के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ाई लड़ते। मगर ऐसा था नहीं।
ऐसे में गांधी जी ने वही किया, जो वे ऐसी स्थिति में सर्वोत्तम ढंग से कर सकते थे। अपनी पूरी क्षमता के साथ जितना संभव हो, आपसी द्वेष और घृणा की इस आग को अपने सत्य और अहिंसा के तपबल से बुझाने की कोशिश की। पहले नोआखली, फिर बिहार, कलकत्ता और अंत में दिल्ली। गांधी जी हर जगह सत्य और अहिंसा पर अपनी असंदिग्ध निष्ठा के सहारे स्थितियों को नियंत्रण में लाने का प्रयास करते रहे। आश्चर्य नहीं कि जिन इलाकों में हिंसा और दंगों पर काबू पाने में सेना और पुलिस पूरी तरह से असफल साबित हुई, वहाँ गांधी जी के प्रेम, सद्भाव और निश्छलता ने अपना असर दिखाया।
आजादी से पूर्व पंजाब के मुख्यमंत्री मलिक खिजर हयात खान थे। मुस्लिम लीग वैधानिक तरीके से इनके ऊपर दबाव नहीं बना पा रही थी, तो उसने हिंसा का आश्रय लिया। मुस्लिम लीग ने प्रांतीय संघर्ष समिति बनायी और सेना को बेकार समझ कर बेच दी जाने वाली फौलाद की वर्दियां खरीद कर दीं। वर्दियां पहना कर फौजी कवायद सिखायी गयी। बहुतों को तमंचों और बन्दूकें भी दी गयीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी सैनिक ढंग का अपना संगठन शुरू किया।
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| जवाहर लाल नेहरू |
इन गैर सरकारी संगठनों के अनैतिक कार्यों को देखते हुए सरकार ने दोनों संगठनों (मुस्लिम लीग और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) को अवैध घोषित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उक्त आदेश का पालन करते हुए अपनी गतिविधि बन्द कर दी। जबकि मुस्लिम लीग ने पुलिस को तलाशी लेने से मना कर दिया और अपनी गतिविधियों में संलिप्त रही। मुस्लिम लीग ने पंजाब में भयंकर आन्दोलन शुरू कर दिया। फरवरी के अंतिम सप्ताह में पंजाब सरकार और मुस्लिम लीग के बीच समझौता हो जाने के कारण प्रतिबन्ध हटा लिया गया।
मुस्लिम लीग की तरफ से कानून की खुली अवज्ञा की जाती रही। लीगी गुंडागिरी को मजबूती से दबा देने की मिश्रित सरकार की असमर्थता ने पंजाब की गैर-मुस्लिम जनता में इतनी कटुता पैदा कर दी थी कि मंत्रिमंडल के यूनियनिस्ट मुस्लिमों और हिन्दू सिक्ख समर्थकों में फूट पड़ गई। लीग यही चाहती थी। चार दिन बाद पंजाब के मुख्यमंत्री ने लीग के बढ़ते हुए दबाव का प्रतिकार न कर सकने के कारण और शायद इस डर से कि अब उनका मंत्रिमंडल हिन्दू और सिक्ख समर्थन पर भरोसा नहीं रख सकता, 2 मार्च को त्यागपत्र दे दिया। लीग ने इस अवसर पर रोशनी कर के खुशियाँ मनायी।
3 मार्च को पंजाब के गवर्नर सर इवान जैन्किन्स ने पंजाब विधानसभा में मुस्लिम लीगी दल के नेता ममदोत खां को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर लिया। एक ऐसे दल के द्वारा जिसने बलपूर्वक पाकिस्तान की स्थापना करने का इरादा खुले तौर पर जाहिर कर दिया था, पंजाब में सरकार बनाने की संभावना से पंजाब के गैर मुस्लिम वर्गों में आतंक फैल गया। परिणामस्वरूप पंथिक अकाली दल ने एक प्रस्ताव पारित किया कि जब तक मुस्लिम लीग का उद्देश्य सिक्खों की मातृभूमि पंजाब पर मुसलमानों का प्रभुत्व या पाकिस्तान स्थापित करना है, तब तक प्रांत में मुस्लिम लीगी सरकार की स्थापना का 'तमाम संभव साधनों द्वारा प्रतिकार' किया जाए।
4 मार्च को हिन्दू और सिक्खों ने लाहौर में 'पाकिस्तान विरोधी दिवस' मनाया। निषेधाज्ञा तोड़ कर गैर मुस्लिम विद्यार्थियों ने जुलूस निकाला। पुलिस ने उन पर गोली चलायी और परिणामस्वरूप अनेक लोग हताहत हुए।
5 मार्च को मलिक खिजर हयात खान की सरकार ने इस्तीफा दे दिया। मुस्लिम लीग अब भी सदन में आवश्यक बहुमत नहीं बना सकी, इसलिए गवर्नर ने भारतीय शासन-विधान की 93वीं धारा लागू कर दी। विधान सभा की बैठक अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी और प्रांत के शासन की बागडोर स्वयं संभाल ली। इसने अमृतसर, रावलपिंडी और मुल्तान शहर में, पंजाब के रावलपिंडी, मुल्तान और झेलम के ग्रामीण भागों में और उत्तर पश्चिम सीमाप्रान्त के एबोटाबाद जिले में भी मुसलमानों की तरफ से व्यापक दंगे छेड़ दिये जाने के संकेत देने का काम किया। दंगाइयों ने इन सब स्थानों में एक ही तरह की पद्धति अपनाई, इससे भी पता चलता था कि उसके पीछे कोई सुनिश्चित और सुनियोजित योजना थी।
पंजाब सरकार के मुख्य सचिव श्री मैकडॉनल्ड के वक्तव्य के अनुसार 19 मार्च 1947 की दोपहर तक मुस्लिम लीग की छेड़ी हुई मुहिम ने 2049 हिन्दुओं और सिक्खों को मौत के घाट उतार दिया था और 1103 लोगों को बुरी तरह घायल कर दिया।
यह सब देख कर पंडित नेहरू ने कहा कि इन दुःखद घटनाओं ने इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया है कि हिंसा और दबाव से पंजाब की समस्या का निपटारा नहीं हो सकता और दबाव पर आधारित कोई व्यवस्था स्थाई नहीं हो सकती। इसलिए कोई ऐसा रास्ता निकालना जरूरी है, जिसमें जबरदस्ती की मात्रा कम से कम हो। इसके लिए पंजाब को दो प्रांतो में बाँट देने की जरूरत होगी। ताकि मुख्यतः मुस्लिम भाग को मुख्यतः गैर मुस्लिम भाग से अलग किया जा सके।
इस तरह कांग्रेस की तरफ से पंजाब के विभाजन की माँग की गयी। कांग्रेस को उम्मीद थी कि इस माँग से लीग के सामने "कटे-छटे, कीड़ों के खाये हुए जैसे" पाकिस्तान के मिलने की ही सम्भावना खड़ी होगी, जिसके बारे में कांग्रेस यह मान कर चल रही थी कि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की माँग पर जोर नहीं देगी। संयोगवश कांग्रेस कार्य समिति द्वारा किया गया स्थिति का अध्ययन बिल्कुल गलत निकला।
पंजाब में जो कार्य पद्धति इतनी सफल सिद्ध हुई, वहीं उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त में भी काम में ली गई और वहाँ भी वह उतनी ही सफल सिद्ध हुई।
जब नोआखली में दंगा हुआ, तो पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं ने सोचा कि पूरा पश्चिम बंगाल बांग्लादेश में चला जायेगा। पश्चिम बंगाल में कलकत्ता के लोगों ने कहा कि हम बांग्लादेश नहीं जायेंगे। हम तो भारत में ही रहेंगे। इसलिए इसका विभाजन हो।
फरवरी 1947 के अंतिम सप्ताह में नोआखली में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम कर रहे गांधी जी का ध्यान डॉ. अमिय चक्रवर्ती ने बंगाल विभाजन योजना की ओर दिलाया। बंगाल विभाजन की बात सुन कर गांधी जी को अत्यधिक दुःख हुआ। जो बात अभी तक कानाफूसी तक सीमित थी, उसकी अब लोग खुलेआम चर्चा कर रहे थे।
4 अप्रैल को केन्द्रीय विधानसभा के बंगाली हिन्दू सदस्यों के हस्ताक्षर से एक निवेदन वायसराय के सामने प्रस्तुत किया गया। उसमें भारतीय संघ (इण्डियन यूनियन) के भीतर पश्चिम बंगाल का एक अलग स्वायत्त प्रांत बनाने की माँग की गयी। इसके अनुसार बंगाल के जो भाग भारतीय संघ के भीतर रहना चाहते हैं, उन्हें वहीं रहने देना चाहिए और भारतीय संघ के भीतर उनका एक अलग प्रांत बना देना चाहिए।
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| खान अब्दुल गफ्फार खान |
गांधी जी और बादशाह खान अंग्रेजों की छत्रछाया में किसी भी तरह के विभाजन के विरोधी थे। गांधी जी के अनुसार अगर कांग्रेस, पंजाब और बंगाल का विभाजन करने के लिए अंग्रेजों का सहारा लेती है, तो यह हार स्वीकार करने के समान होगा।
गांधी जी को विभाजन का कोई भी तर्क स्वीकार्य नहीं था। उनका कहना था कि विभाजन से हमारी कठिनाइयाँ हल नहीं होंगी। बल्कि पहले से मौजूद कठिनाइयाँ तो बढ़ेंगी ही, साथ ही और नई पैदा हो जायेंगी। परन्तु न तो गांधी जी इस बात को कांग्रेस कार्यकारिणी को समझा सके और न ही कांग्रेस कार्यकारिणी गांधी जी को समझा सकी।
गांधी जी ने वायसराय को सूचना दे दी कि कांग्रेस कार्यकारिणी को अपने मत के अनुसार बनाने में मुझे सफलता नहीं मिली है। उनका (गांधी) और उनके साथियों का मार्ग अलग-अलग होने का समय आ गया है। इस संबन्ध में गांधी जी ने लार्ड माउंटबेटन को पत्र लिखा-
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| लार्ड माउंटबेटन |
गांधीजी का पत्र लॉर्ड माउंटबेटन को
11 अप्रैल 1947
"पंडित नेहरू के साथ थोड़ी-थोड़ी देर के लिए कई बार और एक बार एक घंटे तक मेरी अकेले में बातें हुई हैं और फिर कल रात को कांग्रेस कार्यसमिति के कई सदस्यों के साथ उस योजना के बारे में मेरी चर्चा हुई, जिसकी रूपरेखा मैंने आपके सामने रखी थी और जिसके समस्त गूढ़ार्थ मैंने उन्हें समझा दिये थे। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि बादशाह खान के सिवा मैं उनमें से किसी को भी अपनी बात समझाने में सफल नहीं हुआ।"
13 अप्रैल को गांधी जी ने चलती गाड़ी में से सरदार पटेल को पत्र लिखा-
"मैं आपसे एक बात पूछना चाहता था, परन्तु समय न होने के कारण नहीं पूछ सका। मैं देखता हूँ कि हमारे विचारों में व्यापक और बार-बार मतभेद पैदा होता है, ऐसी स्थिति में क्या यह उचित है कि मैं अपनी व्यक्तिगत हैसियत में भी वायसराय से मिलूँ?
इस पर अनासक्त हो कर आप विचार करें और अपने सामने देश का हित ही रखें। चाहें तो दूसरों से भी इस बारे में चर्चा कर लें। आपके मन में इस बात की जरा भी शंका नहीं होनी चाहिए कि मैं कोई शिकायत कर रहा हूँ। मैं तो यही सोचता हूँ कि देश के सर्वोच्च कल्याण की दृष्टि से मेरा क्या कर्तव्य है। संभव है कि करोड़ों लोगों के कामकाज की व्यवस्था करते हुए आप वह चीज देख सके हों, जो मैं नहीं देख पाता। मैं आपकी जगह होऊँ तो शायद मैं भी वही करूँ और कहूँ जो आप करते और कहते हैं।"
कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने गांधी जी से सलाह लिये बिना मार्च 1947 के पहले सप्ताह में पंजाब को मुस्लिम बहुमत वाले और हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्रों में बाँट देने का अपना प्रस्ताव पास किया। बिहार में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयास कर रहे गांधी जी को पंजाब विभाजन की सूचना अखबारों के माध्यम से मिली, तो उन्हें ऐसा लगा कि उनके पाँव तले से जमीन खिसक गई हो।
प्रस्ताव पास होने के लगभग एक पखवाड़े तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की ओर से कोई समाचार नहीं आया। 20 मार्च को एक पत्र में गांधी जी ने पं. नेहरू को लिखा "मैं बहुत दिनों से तुम्हें पत्र लिख कर पूछना चाह रहा था कि पंजाब के विभाजन पर कार्यसमिति के प्रस्ताव का क्या हुआ? मैं उसके पीछे का कारण जानना चाहता हूँ।"
पंडित नेहरू ने गांधी जी को उत्तर देते हुए पत्र लिखा- "हमें तुरन्त इस विभाजन पर जोर देना चाहिए, ताकि मुस्लिम लीग की वास्तविकता सामने आ जाये। असल में जिन्ना के माँगे हुए विभाजन का यही एकमात्र उत्तर है। पंजाब में मुसलमानों के सिवा सब लोग इस प्रस्ताव के अनुकूल हैं। अभी तो कानून में कोई परिवर्तन किये बिना यह एक प्रशासनिक निर्णय है।"
ऐसी बात की पहले के जमाने में तो कभी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। जब गांधी जी भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक यात्रा कर रहे होते, तब भी कांग्रेसी नेता कोई महत्वपूर्ण निर्णय करने से पहले गांधी जी की सलाह लिये बिना नहीं रहते थे।
इस प्रकार माउंटबेटन, कांग्रेस कार्य समिति और मुस्लिम लीग-सब अलग-अलग कारणों से और एक-दूसरे से मतभेद रखते हुए भी, सब मिल कर एक ही नारा (विभाजन) लगाने लगे और "राष्ट्र की आवाज" गांधी जी की जन्मभूमि की ऊँची राजनीति के पटांगण में "अरण्य की आवाज" बन गई।
क्रांति के बलबूते अगर इस देश को आजादी मिलती, तो यह देश कम से कम बीस खंडों में बँटा होता। एक गांधी ही थे, जिन्होंने पूरे देश को एक सूत्र में तथा एक आंदोलन में बांध लिया। गांधी नहीं होते, तो जो-जो प्रांत जहाँ-जहाँ बगावत कर रहे थे, वहाँ-वहाँ अपना देश बना कर रहते। जैसे यूरोप में छोटे-छोटे देश हैं, वैसे ही भारत में अलग-अलग, छोटे-छोटे देश होते।
गांधी जी का मानना था कि अंग्रेजों को भारत का विभाजन करने का कोई अधिकार नहीं है। उनके अनुसार दो भाइयों की लड़ाई में तीसरे को निर्णायक बनाना आत्मघाती है। उन्हें उम्मीद थी कि यदि एक बार देश स्वतंत्र हो गया, तो उसके बाद विभाजन का मुद्दा धीरे-धीरे अपनी धार खो देगा। लेकिन मुस्लिम लीग विभाजन पर अड़ी हुई थी। केन्द्र की मिलीजुली सरकार में मुस्लिम लीग के मंत्रियों के अड़ियल और असहयोगात्मक रवैये के कारण कांग्रेस के नेता बुरी तरह परेशान थे। उन्हें लगता था कि इस परेशानी से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय विभाजन ही है।
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| सरदार वल्लभ भाई पटेल |
सरदार पटेल ने अपने एक भाषण में कहा था कि "हमने हिंदुस्तान के टुकड़े किए जाना कबूल कर लिया। कई लोग कहते हैं कि हमने ऐसा क्यों किया, यह गलती थी। मैं अभी तक नहीं मानता कि हमने कोई गलती की। साथ ही यह मानता हूँ कि अगर हमने हिंदुस्तान के टुकड़े मंजूर नहीं किए होते तो आज जो हालत है, उससे भी बहुत बुरी हालत होने वाली थी। तब हिंदुस्तान के दो टुकड़े नहीं, बल्कि अनेक टुकड़े हो जाने वाले थे। मैं आपको इस बात की गहराई में नहीं ले जाना चाहता हूँ, लेकिन यह बात मैं अनुभव के आधार पर बताना चाहता हूँ। मेरे सामने वह सारी तस्वीर है कि हम किस तरह एक साल सरकार चला पाए थे और अगर हमने यह चीज कबूल न की होती तो क्या होता?"
आप इतना भरोसा रखें कि जब मैंने और मेरे भाई पं. नेहरू ने यह कबूल किया कि अच्छा ठीक है, अगर बँटवारा जरूरी है और इसके बिना मुसलमान नहीं मानते, तो हम इसके लिए भी तैयार हैं। जब तक हम परदेशियों को न हटा दें, विदेशी हुकूमत न हटा दें, तब तक रोजाना ऐसी हालत होती जाती थी। हमें साफ तौर से दिखाई पड़ रहा था कि हिंदुस्तान का भविष्य नहीं रहेगा और परिस्थिति काबू से बाहर चली जाएगी। इसलिए हमने सोचा कि अभी दो टुकड़े करने से काम ठीक हो जाता है, तो वैसा ही कर लो।
हमने मान लिया कि ठीक है, अगर अलग घर ले कर ही अपना भाई शांत हो जाता है और अपना घर संभाल लेता है, तो हम भी अपना घर संभाल लेंगे। हमने यह बात इसी उम्मीद से मानी थी कि हम शांति से अपना काम करेंगे। उसमें हमारी गलती हुई। मैं यह नहीं कहता कि टुकड़े करने में हमारी गलती हुई, गलती इसमें हुई कि टुकड़े करने के बाद हमने वह काम किया, जो नहीं करना था। आजादी के बाद दुनिया में हमारी इज्जत बढ़ी थी और 15 अगस्त के बाद दुनिया में हमारी एक जगह बन गई थी।
दूसरे देशों के लोग यह शक करने लगे कि हम लोग हुकूमत करने के लायक भी हैं या नहीं? कई अंग्रेज ऐसे भी थे, जो समझते थे कि जब वे हिन्दुस्तान का किनारा छोड़ कर जाएँगे, तो मुंबई (तब बंबई) के बंदरगाह पर लोग आएँगे और कहेंगे कि तुम इस देश से मत जाओ, यहीं रहो। वे मानते थे कि हम अपना राज नहीं चला सकेंगे। हमने एक तरह से तो हिन्दुस्तान को ठीक कर लिया।
जब बंगाल अलग हुआ, तो बंगाल में गांधी जी बैठे थे, इसलिए उन्होंने वहाँ की हालत को संभाल लिया। उम्मीद से भी कहीं अच्छी तरह संभाला। उससे दुनिया पर बहुत असर पड़ा। हम पर भी असर पड़ा। लेकिन पंजाब में जो हुआ, वह बहुत ही बुरा हुआ। पंजाब और उत्तर पश्चिम के सरहदी प्रांत में जो अत्याचार हुआ, उसे बयान करने में दिल फट जाता है। पंजाब तो हिन्दुस्तान का सिर है। इस तरह जख्मी देश को उठाने के लिए हम सबने बहुत कोशिश की और हिन्दुस्तान को संगठित कर लिया।
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| मुहम्मद अली जिन्ना |
जब तक हिन्दुस्तान का पूरी तरह से हृदय परिवर्तन न हो जाए और जैसे देश को काम करना चाहिए वैसे वह न करे, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। तब तक गांधी जी को चैन नहीं आएगा, वह बेचैन हैं। उनको दिल्ली में छोड़ कर आया हूँ, तो मुझे भी बहुत दर्द हुआ है। (उन दिनों गांधी जी दिल्ली में अपने जीवन का अंतिम उपवास कर रहे थे।) लेकिन यहाँ न आता, तो भी मुसीबत थी। जो बात दिल से निकलनी चाहिए, जल्दी से वह निकलती भी नहीं, उसमें इतना दर्द भरा है।
गांधी जी की अवस्था देश विभाजन के समय 79 वर्ष की थी। इस अवस्था में पूरे देश के विरुद्ध बिना किसी सहयोग से लड़ने की परिकल्पना करना बेमानी है। इस अवस्था में तो लोग ठीक से चल फिर भी नहीं पाते और गांधी जी से लोग पूरे देश के विरुद्ध आन्दोलन करने की उम्मीद कर रहे थे। जबकि उनकी निगाह में गांधी जी की योग्यता कुछ थी ही नहीं।
सरदार पटेल ने पं. नेहरू की बात का समर्थन किया और कहा कि हमें विभाजन स्वीकार करना पड़ा, क्योंकि हमारे सामने प्रशासन के भीतर अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के गुट की अड़ंगेबाजी से छुटकारा पाने का कोई और रास्ता नहीं रह गया था। यह गुट देश के तोडफोड़ की धमकी दे रहा था। मैं अपने सिंधी भाईयों के डर को पूरी तरह समझता हूँ।
भारत का विभाजन किसी को पसन्द नहीं है और मुझे इसके लिए गहरा दुःख है। परन्तु हमारे सामने स्पष्ट वास्तविकताएँ थीं, जिन पर हमें ध्यान देना पड़ा। हमें यह चुनाव करना था कि भारत का एक ही विभाजन हो या अनेक हो। कांग्रेस के लिए तथ्यों का सामना करना जरूरी था। वह भावुकता में नहीं बह सकती थी। उसे पक्ष और विपक्ष की बातों का ठंडे दिमाग से हिसाब लगा कर किसी निर्णय पर पहुँचना था।
सरदार पटेल ने इस बात से इनकार किया कि कांग्रेस कार्यसमिति ने डर के मारे इस योजना को स्वीकार किया है। डर तो हमने कभी जाना ही नहीं। परन्तु मुझे एक बात का डर है और वह यह कि हमारा इतने वर्षों का परिश्रम और कार्य कहीं व्यर्थ न हो जाये या असफल सिद्ध न हो। हमने स्वाधीनता के लिए काम किया है और हमें यह देखना चाहिए कि देश का अधिक से अधिक और बड़ा भाग स्वतंत्र और बलवान बने।
स्पष्ट है कि कांग्रेस ने बिना गांधी को बताये पंजाब, बंगाल व भारत के विभाजन का प्रस्ताव पास किया। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को पास करने से पहले गांधी जी से कोई राय नहीं ली, बल्कि तथ्यों को छुपा कर व अँधेरे में रख कर कांग्रेस कार्य समिति ने विभाजन का प्रस्ताव पास किया, जिसकी सूचना गांधी जी को समाचार पत्रों के माध्यम से मिली। विभाजन की सूचना पर गांधी जी अत्यंत व्यथित हुए। विभाजन के विरुद्ध देश की भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए अंततः निराश होकर गांधी जी शांत हो गये। देश विभाजन के लिए जिम्मेदार गांधी जी नहीं हैं।
गांधी जी के संपूर्ण जीवन में कोई ऐसा वक्तव्य या कार्य नहीं ढूँढ़ा जा सकता, जो दो व्यक्तियों, समाज, धर्म और देश में विभाजन की बात किया हो। गांधी जी के जीवन में एक भी शब्द ऐसा नहीं मिलता, जो देश विभाजन की उनकी इच्छा को इंगित करता हो। गांधी जी तो संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए आजीवन संघर्षरत और प्रयत्नशील रहे। सही मायने में विचार किया जाय तो शायद विभाजन शब्द उनके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत शब्द है।
कुछ आवाज आती है कि गांधी जी की हत्या देश-विभाजन के कारण हुई है। यह असत्य प्रतीत होता है। अगर देश-विभाजन से दुःखी हो कर किसी की हत्या करनी थी, तो जिन्ना या मुस्लिम लीग के किसी नेता की करते, जो इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार थे। देश विभाजन से दुःखी थे, तो उसके खिलाफ लड़ना चाहिए था? वास्तव में, गांधी जी तो विभाजन के किसी फ्रेम में नहीं थे। वे तो विभाजन के सख्त खिलाफ थे। 80 वर्ष के वृद्ध गांधी को हत्या के लिए क्यों चुना? गांधी तो कोई सुरक्षा भी नहीं लेते थे, वे मानते थे कि उनका रखवाला राम है। अंग्रेज तो गांधी को नहीं मार पाये, उन्हें हमने मारा। मारा ही नहीं अट्टाहास भी किया। मारने के बाद खुशियाँ मनायी, मिठाइयाँ बाँटी। यह बात सत्य है कि गांधी विभाजन नहीं रोक पाये। देश विभाजन रोकने में कोई उनका सहयोग भी नहीं किया। उन्हें मारे जाने का किसी को अपराध बोध तक नहीं है।







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