सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'परसाई का आलेख व्यंग्य क्यों? कैसे? किसलिए : पुनश्च'


हरीशंकर परसाई


सामान्य तौर पर लोगों की यह धारणा है कि व्यंग्य हल्की फुल्की विधा है जिसका काम मनोरंजन करना है। लेकिन वास्तविकता यह है कि व्यंग्य हास्य नहीं है। बल्कि यह तो वह कला है जो मर्म को बेध देती है। महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के व्यंग्य इस धारणा को पुष्ट करते हैं। अपने आलेख में सेवा राम त्रिपाठी लिखते हैं "सबके अपने-अपने व्यंग्य हैं और सबकी अपनी-अपनी समझ के व्यंग्य हैं, जिससे वे धारणाएं बनाते हैं। व्यंग्य के लिए ज़रूरी है अपनी-अपनी समझ और दृष्टि। मैं अनुभव करता हूँ कि व्यंग्य के लिए ज़रूरी है व्यंग्य-बोध, व्यंग्य-दृष्टि और व्यापक व्यंग्य-चेतना का होना। अन्यथा बस बातें हैं। बातों का क्या? ज़ाहिर है कि व्यंग्य पर परसाई जी का कहा अंतिम नहीं समझना चाहिए लेकिन है वह बेहद महत्वपूर्ण। लेकिन किसी भी सूरत में व्यंग्य हास्य नहीं है। न उसे इस पैंतरबाजी में रखा ही जा सकता है।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'परसाई का आलेख व्यंग्य क्यों? कैसे? किसलिए : पुनश्च'।


'परसाई का आलेख व्यंग्य क्यों? कैसे? किसलिए  : पुनश्च'


सेवाराम त्रिपाठी 


परसाई जी का यह आलेख उनकी पुस्तक 'तिरछी रेखाएं' की भूमिका है। जिसमें आत्मकथ्य, उपन्यास अंश, कुछ कहानियाँ, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध और कुछ व्यंग्य शामिल हैं। भले ही पुराना हो, भले ही एक अरसा पहले लिखा गया हो, इससे क्या फर्क पड़ता है? उसमें काफ़ी ज्वलंत और मौजू प्रश्न उठाए गए हैं। मैं केवल इसी भूमिका तक सीमित रहूंगा। जाहिर है कि इसे बहुत बार पढ़ा गया है और कई-कई बार उद्धृत भी किया गया। कहते हैं समय, समाज के गंभीर सवाल हमें बार-बार उद्वेलित और विचलित करते हैं। यह कुछ उसी प्रकार की भूमिका का रूपाकार है,  जो सोचने पर विवश करता है जैसा परसाई जी ने नोटिस लिया था कि व्यंग्य के बारे में (मैं उसे हिंदी पट्टी कह रहा हूँ) उनके आलेख में उठाए प्रश्नों पर बहुत गंभीर प्रश्न रेज किए गए हैं। प्रश्न है कि व्यंग्य के मर्म को कौन कितना समझता है और कौन उसे कितना पकड़ता है? सभी का अपना-अपना मनोजगत होता है। व्यंग्य में हँसी भी आती है और वह सोचने-समझने, विचार करने के लिए उत्प्रेरित भी करता है। एक उदाहरण महाभारत का है। भ्रमवश दुर्योधन फर्श में बने चित्र को पानी वाला समझता है असली पानी के कुंड को चित्रकार का बनाया चित्र समझ कर गिर पड़ता है। इस पर द्रौपदी ने कहा था कि- ‘अंधों के अंधे ही होते हैं‘। यह बात दुर्योधन को लग गई या चुभ गई। व्यंग्य में चुभना एक विशेष महत्वपूर्ण तथ्य है। व्यंग्य में भीतर तक हूल देना भी होता है। यही उसकी आंतरिक शक्ति, संवेदना भी है और मार भी। इसी पर महाभारत हुआ। अपमान का बदला चुकाने के लिए ही महाभारत हुआ और उससे अन्य प्रसंगों के तमाम तार जुड़ते चले गए और कई कड़ियाँ भी संबद्ध होती चली गईं। इस भूमिका में परसाई जी ने मार्क ट्वैन,  चेखव और जोनाथन स्विफ्ट के उदाहरण दिये हैं। असल में व्यंग्य का मर्म समझना अत्यंत महत्वपूर्ण क्रिया है। जो मर्म समझ लेता है वो ही उसकी दिशा-दृष्टि और कहन की व्यापकता को ठीक से थाह पाता है।


प्रायः व्यंग्य पर कई प्रकार से चर्चायें होती रहती हैं। इनमें हिस्सा ले रहे लोगों ने परसाई के कहे को अपने-अपने ढंग से विश्लेषित करने की कोशिश भी की है। अब तो यह हो रहा है सबके अपने-अपने व्यंग्य हैं और सबकी अपनी-अपनी समझ के व्यंग्य हैं, जिससे वे धारणाएं बनाते हैं। व्यंग्य के लिए ज़रूरी है अपनी-अपनी समझ और दृष्टि। मैं अनुभव करता हूँ कि व्यंग्य के लिए ज़रूरी है व्यंग्य-बोध, व्यंग्य-दृष्टि और व्यापक व्यंग्य-चेतना का होना। अन्यथा बस बातें हैं। बातों का क्या? ज़ाहिर है कि व्यंग्य पर परसाई जी का कहा अंतिम नहीं समझना चाहिए लेकिन है वह बेहद महत्वपूर्ण। लेकिन किसी भी सूरत में व्यंग्य हास्य नहीं है। न उसे इस पैंतरबाजी में रखा ही जा सकता है। लेकिन अधिकांशतः ऐसा ही हो रहा है। और यदि ऐसा हुआ तो एक धोखा ही होगा।


व्यंग्य बेहद गंभीर किस्म की चीज़ है। उसकी दिशा, दृष्टि, कहन और प्रभाव अकूत होता है। उसकी सच्चाई, प्रतिष्ठा, व्याप्ति और मार भी बहुत है। परसाई जी का मानना है कि- “व्यंग्य लेखन एक गंभीर चीज़ है। कम-से-कम मेरे लिए। सवाल यह है कि कोई लेखक अपने युग की विसंगतियों को कितने गहरे से खोजता है, उस विसंगति की व्यापकता क्या है और वह जीवन में कितनी अहमियत रखती है।”


इस देश-दुनिया में व्यंग्य की स्थितियों के बारे में काफी विचार-मंथन हुआ है,  हो रहा है और आगे भी होगा। और लोगों ने उस व्यंग्य को, अपनी-अपनी समझ के अनुसार बरता भी है। परसाई के समय का व्यंग्य और आज के समय के व्यंग्य में ज़मीन-आसमान का अंतर है। उसी तरह जैसे पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय की आज़ादी और जनतंत्र क्या एकदम बदल नहीं गए हैं? जो नहीं समझना चाहते आख़िर उनको क्या कहा जा सकता है? आज तो असहमति के लिए कोई जगह ही नहीं है? आज के दौर में आज़ादी, जनतंत्र और संवैधानिक स्थितियों को कैसे बरता और साधा जा रहा है, यह सब कुछ हमारे सामने है। और ये बातें किसी अवगुंठन में नहीं हैं, डंके की चोट पर हैं। कभी किसी ने नहीं सोचा होगा कि व्यंग्य भी पुरस्कृत, सम्मानित और अलंकरण की धुरी में ठाठ से पैठ बनाता चला जाएगा। जो हर गलती अंतर्विरोध और विसंगति की धोबिया पछाड़ लगाता है, वह भी पुरस्कृत होगा। क्या समुचित रूपक है। वह मेरी नज़र में ‘औरे कछू जैसा है’। जैसा बिहारी ने लिखा था- वह चितवन औरे कछु जेहिं बस होत सुजान’। अब तो वह हमें घाऊ-घुप्प बना रहा है।



परसाई जी का आलेख या भूमिका पढ़ कर एक बार फिर व्यंग्य पर नए तरह से सोचने समझने पहचानने और विमर्श करने की ओर एक मोड़ आया है। हम सभी चाहते हैं कि व्यंग्य विदूषक की भूमिका से जीवन की जीवंत भूमिका और हस्तक्षेपकारी भूमिका की तरफ लौटे। कह नहीं सकता। क्या ऐसी कोई संभावना दिखाई देती है। लेखक बहुत जेनुइन प्राणी होता है। वह हल्का-फुल्का भी नहीं होता। इस आलेख या टिप्पणी पर जो समवेत विचार हुए हैं इससे शायद व्यंग्य की समझ का विस्तार ही होगा। हाँ, यह तय है कि इस अभागे और कुत्सित दौर में व्यंग्य सही चीज़ों, वस्तुओं और स्थितियों पर विचार प्रायः नहीं करता। जहाँ गलती होगी, विसंगति होगी, अंतर्विरोध होंगे, व्यंग्य की दृष्टि वहीं जाएगी। यही उसकी सक्षम दुनिया और हस्तक्षेपकारी भूमिका है। व्यंग्य प्रशंसा का पैरोकार किसी भी हालत में नहीं है। और किसी भी प्रकार की सत्ताओं (समाज सत्ता, धर्म सत्ता, संस्कृति सत्ता व्यवस्था और राजनीतिक सत्ता) के गठजोड़ से व्यंग्य का जागरण नहीं हो सकता, बल्कि इनसे वह हमेशा एक दूरी बना कर ही चलता है।


यह भी समझना ज़रूरी है कि व्यंग्य काफ़ी गंभीर किस्म की चीज़ है। वह काफ़ी संगीन भी होता है। व्यंग्य थोड़ा टेढा सोचता है और कभी-कभी बहुत ज़्यादा टेढ़ा। व्यंग्य की नज़र तिर्यक होती है। जहाँ ग़लती होगी व्यंग्य की वहीं नज़र जाती है या जहाँ गड़बड़ी है वह वहीं अपनी दृष्टि केंद्रित करता है। यही उसका संसार है। व्यंग्य प्रशंसा का पैरोकार कत्तई नहीं है और न आगे होगा। जैसा व्यंग्य इस दौर में प्रशंसा ही नहीं पुन्नेठी झाड़ रहा है। वह कुछ अलग ही कहानी कहता है। यह व्यंग्य की व्याप्ति, प्रतिष्ठा और स्वाभाविक प्रकृति से बिल्कुल भिन्न है। व्यंग्य किसी भी प्रकार की सत्ता के रहमो-करम से नहीं चल सकता।


व्यंग्य को ठीक से परिभाषित भी नहीं किया जा सकता। व्यंग्य के बारे में कुछ बहुत अच्छी बातें रेखांकित की जाती हैं। व्यंग्य के बारे में जिनकी दृष्टि का विस्तार हुआ है उन्होंने गंभीरतापूर्वक अच्छी बातें संकेतित की हैं। कुछ ने अच्छे सुझाव दिए हैं। व्यंग्य अंतःकरण की शल्य-चिकित्सा करता है। हमें परसाई के प्रस्थान बिंदुओं से भली-भांति अवगत होना है और उनके सोच से बहुत आगे जाने की ज़रूरत है। व्यंग्य को हँसी, विनोद, मसखरी से बाहर आना ही होगा, तभी वह अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह कर सकेगा। समय-समझ की बात है। सहानुभूति का फैक्टर बहुत बड़ा क्षेत्र है व्यंग्य के लिए। परसाई ने व्यंग्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है। और सोच को स्पष्ट करने की कोशिश की है। उनके शब्द हैं- “व्यंग्य का संसार बहुध्रुवीय है जहाँ हँसी, करुणा, क्रोध, विडंबना और विद्रोह सभी एक  साथ अस्तित्व में आते हैं।” व्यंग्य यहीं ठहर नहीं जाता। वह इतिहास, वर्तमान, समय-समाज के अति गूढ़ प्रश्नों को संवेदना के धरातल पर लाता है और जीवन के हर पक्ष पर सतत निगाह भी रखता है। वह आम जन के चतुर्दिक विकास और कल्याण पर निगाहें रखते हुए आम जन के चतुर्दिक विकास और कल्याण पर निग़ाह और बर्ताव करता है। साथ ही सच्चा प्रतिरोध भी करता है।


अच्छा हो कि हम दलीय ध्रुवों से ऊपर उठ कर, अपने चश्मों से बाहर जा कर, व्यंग्य की भूमिका को सातत्य में तलाशें। व्यंग्य किसी भी सूरत में संकीर्णता की दुनिया नहीं है। देखिए व्यंग्य जिस पर चोट करेगा, प्रहार करेगा वो अंदर ही अंदर से तिलमिलाएगा। लहूलुहान होगा। संबंधित की हस्ती मिटाने की कोशिश भी करेगा। इसलिए कहना ज़रूरी है व्यंग्य की समझ और दुनिया कहीं भी ठहरी हुई नहीं है। परसाई जी का कहा याद रखना लाज़िमी होगा कि - “परंपरा से हर समाज की कुछ संगतिया होती है, सामंजस्य होते हैं, अनुपात होते हैं। वे व्यक्ति और समाज दोनों के होते हैं। जब यह संगति गड़बड़ होती है तब चेतना में चमक पैदा होती है। इस चमक से हँसी भी आ सकती है और चेतना में हलचल भी पैदा हो सकती है।”


भूमिका यूँ तो छोटी है लेकिन उसके फ़ोकस बहुत दूर तक जाते हैं। इस भूमिका के उद्देश्य गहन और गंभीर हैं जिनके निष्कर्षों में हमें आज के दौर में लिखे जा रहे व्यंग्यों को भी खोजना चाहिए। मुझे लगता है कि इस समय व्यंग्य की जमकर घेराबंदी कर दी गई है। व्यंग्य का परिदृश्य बदल रहा है और उसका जाप बढ़ गया है। लेकिन उसका आयतन और अनुपात दिन-ब-दिन घटता जा रहा है। परसाई का एक व्यंग्य स्मरण कर रहा हूँ पगडंडियों का ज़माना। उसका एक अंश है- “लगता है, आम सड़कें अब भविष्य के पुरातत्ववेत्ता को ही मिलेंगी। वही इन्हें खोजेगा। वह निष्कर्ष निकाल कर बताएगा कि उस जमाने में इस देश में आम सड़के तो थीं, पर कोई उन पर चलता नहीं था। जब पगडंडी पकड़ते थे।” इसी तरह व्यंग्य लेखन की पगडंडियाँ राजमार्ग में कन्वर्ट हो गईं हैं। व्यंग्य के चला-चली के दिन आ गए हैं।


(15/4/2026)


सेवा राम त्रिपाठी 


सम्पर्क


मोबाइल : 7987921206

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

कुँवर नारायण की कविताएँ