जयंत जिज्ञासु का आलेख 'अपने पैमाने वाले चंद्रशेखर जी'
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| चंद्रशेखर |
चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के कुछ उन पुरोधाओं में से एक रहे हैं जिनका सम्मान हर पार्टी के लोग किया करते थे। उन्होंने कांग्रेस तब छोड़ी जब वे कोई बेहतर पद प्राप्त कर सकते थे। उन्होंने जेल जाना पसंद किया लेकिन नैतिकता से समझौता करना उनका उसूल था ही नहीं। उस समय जनता पार्टी का गठन करने में उनकी भूमिका अग्रणी थी। चंद्रशेखर जी को नवगठित जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया।पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्ध आज भी अच्छे नहीं हैं और उसके साथ हमेशा एक युद्ध उन्माद जैसी स्थिति बनी रहती है। चंद्रशेखर जी ने तब भी पाकिस्तान के साथ युद्ध का विरोध किया। यही नहीं परमाणु बम बनाने के पक्ष में भी वे नहीं रहे। आज युद्ध के उन्माद में डूबी हुई दुनिया के लिए उनके सन्देश कारगर साबित हो सकते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के वे हमेशा समर्थक रहे। प्रधानमंत्री बनने के पश्चात एक अवसर पर उन्होंने कहा "मैं उन नौजवानों से कहना चाहता हूं, उनके विचारों से मैं असहमत हो सकता हूं, उनकी मांगों को मानने में शायद मैं असमर्थ हो सकता हूं। लेकिन मैं उनको न्योता देता हूं, अपनी बातों को रखने के लिए पूरे आज़ाद हैं। प्रतिरोध का हर आंदोलन चलाने की इस देश में सबको छूट है। लेकिन, दोस्तो याद रखो, जिस तरह मैं समझता हूं, सरकार बंदूक की गोली पर लोगों की भावनाओं को नहीं बदल सकती, उसी तरह से देश के नौजवानो याद रखो, कोई भी सरकार जो बंदूक की गोली के सामने झुक जाएगी, वो सरकार अपने कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकती। हम गोली चलाने के ख़िलाफ़ हैं चाहे गोली सरकारी पुलिस चलाए चाहे गोली कोई और अत्युत्साह में चलाए। मैं गोली के ख़िलाफ़ हूं।" बहुत कम दिनों तक वे प्रधानमंत्री रहे। चाहते तो वे प्रधानमंत्री बने रह सकते थे। लेकिन यहाँ भी उनका उसूल आड़े आ गया और प्रधानमंत्री पद से तत्काल ही इस्तीफा दे दिया। 'युवा तुर्क' का उनका तेवर आजीवन बना रहा। सत्रह सितम्बर को चंद्रशेखर जी की जयन्ती थी। इस अवसर पर उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं! आइए इस मौके पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जयंत जिज्ञासु का आलेख 'अपने पैमाने वाले चंद्रशेखर जी'।
'अपने पैमाने वाले चंद्रशेखर जी'
जयंत जिज्ञासु
चंद्रशेखर जी का अपना पैमाना है, वो मेयारे-ज़माना से कभी घबराए नहीं। मैत्री निभाने में कर्ण के बाद मैं उन्हें सबसे ऊपर रखता हूं। कर्ण ने समझौते का संदेशा ले कर आईं कुन्ती को जो जवाब दिया था, वह विह्वल कर देता है:
दें छोड़ भले ही कभी कृष्ण अर्जुन को
मैं नहीं छोड़ने वाला दुर्योधन को।
वैसे ही प्रधानमंत्री रहते हुए जब कोयला माफिया सूरजदेव सिंह के यहां दही-चूड़ा खाने चंद्रशेखर चले गए और लोगों ने आपत्ति की, तो चंद्रशेखर जी का जवाब था, "हां, दुनिया जिस सूरजदेव सिंह को माफिया कहती है, वे मेरे मित्र हैं। और, मैं अपने मित्र से मिलने आया था"।
जब लालू जी बेऊर जेल में बंद थे, तो चंद्रशेखर जी उनसे मिलने पटना आए थे। इस पर भी लोगों ने उन्हें घेरना शुरू किया, तब लोकसभा में उन्होंने कहा था, "जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कह कर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता। यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है"।
कल्पनाथ राय टाडा में बंद थे, ख़ुद उनकी पार्टी ने उनसे मुंह चुराना शुरू कर दिया, पर चंद्रशेखर जी न सिर्फ़ उनसे मिलने गए, बल्कि सदन के अंदर भी उन पर की जा रही हल्की बातों का प्रतिकार किया।
शुरू में मैं उन्हें बहुत पसंद नहीं करता था, वजह मंडल कमीशन लागू होने के बाद जनता दल का तोड़ा जाना। पर, 2015 में जैसे-जैसे उन्हें सुना, पढ़ा, उनके प्रति मेरे विचार बदले। क्या ज़रूरी कि सब कुछ एक ही शख़्स में मिल जाए!
चंद्रशेखर जी से मैंने साहस के साथ अपनी बात कहना, स्वाभिमान के साथ जीना, भले तन्हा पड़ जाएं, पर जो अपना विवेक व जीवन-मूल्य कहे, उस पर अडिग, अविचल रहना सीखा! और, यह मेरे जीवन में उनका सबसे बड़ा योगदान है! कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं खोता, और अनावश्यक कभी किन्हीं को स्पष्टीकरण नहीं देता। भ्रम पलता रहे, अफ़वाहें तैरती रहें, तो भी सेहत पर फ़र्क नहीं पड़ता। यह मुझ पर उनके व्यक्तित्व का प्रभाव है। उनका अनुसरण करते हुए स्पष्टवादिता के चलते नुक़सान भी झेलता आया हूं। पर, कुछ मामले नफ़े-नुकसान से परे होते हैं। बड़े से बड़े लोगों के सामने भी जिस बात को ठीक नहीं समझता, जिसके दूरगामी नतीजे ठीक आते नहीं दीखते, उसका शालीनतापूर्वक प्रतिकार करता हूं, आवश्यकतानुसार प्रखरता से भी!
उन्हें और उनकी जीवन यात्रा को याद करते हुए मेरा मन आदर से भर जाता है। श्री चंद्रशेखर ने 'जीवन जैसा जिया' में जो कहा, जब अकेले होता हूं तो कुछ वैसे ही भाव उमड़ते हैं,
"बलिया के एक छोटे-से गाँव से आज तक की यात्रा एक ऐसी गाथा है जिसमें ज़िन्दगी उतार-चढ़ाव के हिचकोलों से गुज़री है। कितने सहयोगी मिले, कितनों ने उन्मुक्त स्नेह दिया, कितनों ने उदासी के क्षणों में सहारा दिया। अपने ममत्व का सम्बल दिया। साथ ही उनसे भी प्रेरणा मिली जिन्होंने मार्ग में रोड़े अटकाए। अकारण आक्षेप लगाए। मेरे मनसूबों को तोड़ने की हर कोशिश की, पर ऐसे कम ही रहे। जो रहे भी, उनका मेरे मन पर कोई गहरा असर नहीं पड़ा। क्षणिक आक्रोश या उदासी में समय बीता, पर शायद ऐसी ही है जग की रीति।"
उड़ीसा की मुख्यमंत्री रहीं नन्दनी सत्पथी और भारत के प्रधानमंत्री रहे श्री चंद्रशेखर अपने उजले दिनों में उजाले बिखेरते कितने सुन्दर लग रहे हैं! सार्वजनिक जीवन में यह संबंधों की मर्यादा थी, रिश्तों की गरिमा थी! बहुत शुभ्र, बहुत निश्छल, सहज मानवीय स्पर्श और ऊष्मा! कलुष-तम से परे हमारी भारतीय राजनीति में खोती जा रही आत्मीयता और विश्वास का वह दौर फिर से लौटे! मनुष्य होने की आश्वस्ति! विश्वास कर पाने का साहस!
राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए अपने उप-प्रधानमंत्री ताऊ देवी लाल जी की मौजूदगी में कश्मीरी नौजवानों व मुख़्तलिफ़ संगठनों के नुमाइंदों से अपील करते तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी:
"... और उस सम्मान के आधार पर मैं उन नौजवानों से कहना चाहता हूं, उनके विचारों से मैं असहमत हो सकता हूं, उनकी मांगों को मानने में शायद मैं असमर्थ हो सकता हूं। लेकिन मैं उनको न्योता देता हूं, अपनी बातों को रखने के लिए पूरे आज़ाद हैं। प्रतिरोध का हर आंदोलन चलाने की इस देश में सबको छूट है। लेकिन, दोस्तो याद रखो, जिस तरह मैं समझता हूं, सरकार बंदूक की गोली पर लोगों की भावनाओं को नहीं बदल सकती, उसी तरह से देश के नौजवानो याद रखो, कोई भी सरकार जो बंदूक की गोली के सामने झुक जाएगी, वो सरकार अपने कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकती। हम गोली चलाने के ख़िलाफ़ हैं चाहे गोली सरकारी पुलिस चलाए चाहे गोली कोई और अत्युत्साह में चलाए। मैं गोली के ख़िलाफ़ हूं। लेकिन, ये भी याद रखिए कि आप भी सीमाओं का अतिक्रमण न करें, क्योंकि उन पुरानी बातों पर रोने वाला मैं आदमी नहीं हूं। मैं अतीत को भूल करके नये भविष्य को बनाने की बात सोचना चाहता हूं, और वर्तमान की चुनौतियों का सहारा लेना चाहता हूं।"
उनकी जाने कितनी बातें आज इस मोड़ पर हमारे देश को कुछ राह दिखाती हैं गर हम गौर करना चाहें:
"मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब मैं बोल रहा हूँ तो इसका विरोध होगा। मैं जानता हूँ कि उन लोगों के बीच में बोल रहा हूँ जो इतिहास के प्रति अंधे हैं, जो भविष्य के बारे में अनजान हैं, जिनकी समझ नहीं है। मैं उनलोगों के बीच बोल रहा हूँ जिनको भारत के भविष्य के बारे में न चिंता है, न भारत के अतीत के बारे में जानते हैं, जिन्होंने संसदीय परंपरा को नहीं समझा है।"
"एक बात हम याद रखें कि हम इतिहास के आख़िरी आदमी नहीं हैं। हम असफल हो जायेंगे, यह देश असफल नहीं हो सकता। देश ज़िंदा रहेगा, इस देश को दुनिया की कोई ताक़त तबाह नहीं कर सकती। ये असीम शक्ति जनता की; हमारी शक्ति है, और उस शक्ति को हम जगा सकें, तो यह सदन अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा।"
आज गिरते मूल्यों के बीच बहुत कम लोग नज़र आते हैं जिन्हें संसदीय मर्यादा का अनुपालन करने की फ़िक्र हो। चंद्रशेखर से लाख असहमति हो, पर वे संसद में डिग्निटी के साथ बहस करना और उसका हिस्सा होना जानते थे। इतनी नम्रता और प्रखरता से वो बात रखते थे कि अटल जी भी बुरा नहीं मानते थे,
"अपने अंदर में विभेद हो और सारे देश को एकता का संदेश दिया जाय, यह बात कुछ सही नहीं दिखाई पड़ती। मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि पीएम ने अपने आचरण से हमारे जैसे लोगों को निराश किया है...। अख़बारों के पन्ने से इतिहास नहीं लिखा जाता, लोगों के प्रशस्ति गान से इतिहास नहीं बनता। ...बेअक़्ल लोगों की सलाह लेने से कभी-कभी हम ख़तरे में पड़ जाते हैं, प्रधानमंत्री जी। प्रलाप सामर्थ्य का द्योतक नहीं है। ...शायद इसीलिए मैं आपके विश्वास तोड़ने की इस कला का विरोध करता हूँ"।
ऐसा इसलिए भी संभव हो पाता था कि लोकसभा के अध्यक्ष भी उसी निष्पक्षता से अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते थे। एक वाक़या याद आता है कि चंद्रशेखर सदन में पूरे प्रवाह में बोल रहे हैं, इतने में एक सदस्य ने अनावश्यक टोकाटोकी की। बस क्या था, चंद्रशेखर अपने युवा-तुर्क वाले अंदाज़ में आ गये, मानीय सदस्य को एक नज़र देखा और डपटते हुए धीरे से ले ली चुटकी:
If you're Speaker, then I shall address to you. Unfortunately, you aren't, and I think country will not be that unfortunate that you'll be a coming speaker.
इतना कह कर चंद्रशेखर जी ने ठहाका लगा दिया, बस पूरे सदन में कहकहे... ये चंद्रशेखर जी की वाग्पटुता और स्वीकार्यता थी।
"Nations are not run by ballot and bullet, but by the will power of the people. और, याद रखिए कि चापलूसों और समर्थकों में बहुत थोड़ा अंतर होता है। There's a very thin line between supporters and flatterers."
चंद्रशेखर जी का अंदाज़े-बयां सबसे अलहदा था। उनकी सादाबयानी में जो मारक क्षमता थी, उसके प्रभाव से वे ज़रूर वाकिफ़ होंगे जिन्होंने उन्हें क़ायदे से सुना है। वे कुछ कहते थे तो लोग सुनते थे। और अदब से बैठ भी जाते थे। एक सदस्य बोल रहे थे, लोग हंगामा कर रहे थे। चंद्रशेखर जी उठे और कहा, "अध्यक्ष महोदय, मुझे बाक़ी के बारे में नहीं मालूम है कि उनकी दिलचस्पी इन्हें सुनने में है या नहीं, पर मैं इन्हें सुनना चाहता हूं"। उसके बाद शोरगुल स्वतः थम गया।
क्या दिन थे जब एक साथ श्री चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेई, एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल सदन में हुआ करते थे। और, उसी दौरान चंद्रशेखर जी आडवाणी जी पर बरस पड़ते थे कि गृह मंत्री जी जितना कम मुंह खोलेंगे, इस देश के लिए उतना अधिक अच्छा होगा!
श्री चंद्रशेखर ने लोकसभा में बोलते हुए जिस तरह युद्धोन्माद, संसदीय गरिमा, उग्रवाद व सरकार के उत्तरदायित्व पर कोई 27-28 साल पहले बातें रखीं, कभी-कभी सोचता हूँ कि आज वे जीवित होते तो क्या मौजूदा हालात में वर्तमान प्रधानमन्त्री व गृहमंत्री से ऐसा कह पाते या उन्हें कहने दिया जाता? आप भी पढ़ें कि उन्होंने अटल-आडवाणी व उनकी टोली से सदन में क्या कहा:
"मैं नहीं जानता कि कोई राष्ट्र जो अतीत पर रोता रहेगा, वो नया भविष्य कैसे बना सकेगा। जज़्बात को उभार कर वोट पाये जा सकते हैं, सरकार बनाई जा सकती है, लेकिन देश की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। यह एजेंडा केवल आपके विश्वासघात का दस्तावेज़ है...।
मैं कहना चाहूँगा कि गृहमंत्री थोड़ा कम बोला करें, तो देश के लिए अच्छा रहेगा। देश चलाना, दूसरे देशों से संबंध रखना कोई बच्चों का खेल नहीं है। वीरता बहुत अच्छी होती है बोलने में, युद्ध बहुत बुरा होता है भोगने में। लड़ाई खतरनाक खेल है और उस खेल से आप देश का नुकसान करेंगे। व्यवधान.... अध्यक्ष महोदय, मेरा पहला सुझाव तो ये है कि अगर इन सदस्यों को सद्बुद्धि दे सकें कि संसद में किस तरह आचरण किया जाता है...
अध्यक्ष जी, ये हमसे लड़ लें लेकिन मैं प्रधानमंत्री से कहूँगा कि आप पाकिस्तान से लड़ने की बात न करें। मैं ये कहता रहूँगा। मैं फिर आपसे कहूँगा कि युद्ध खतरनाक होता है, लड़ाई में आप अकेले पड़ जाएँगे। लड़ाई से देश का नुकसान होगा, पाकिस्तान का नुकसान होगा। व्यवधान... अध्यक्ष जी, जो लोग सेना में जाना चाहते हैं, उन्हें आप भेज दीजिए, मुझे कोई एतराज़ नहीं है।
लेकिन, हम तो इसी संसद में हैं, और यहीं का कर्त्तव्य पालन कर रहे हैं। वहाँ कर्त्तव्य पालन के लिए हमारे सेना, आर्मी, फ़ौज़ के लोग हैं, ये निर्णय वही करेंगे कि कब लड़ाई लड़नी चाहिए, किस तरह से लड़नी चाहिए। वो सलाह प्रधानमंत्री जी को और रक्षामंत्री जी को देंगे। अगर उनकी सलाह हो कि लड़ लेना ही ज़रूरी है, तो लड़ लीजिए, मुझे उसमें कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन, उस समय भी मैं इसका विरोध करता करूँगा, अकेले भी रहूँगा तो विरोध करता रहूँगा। मैं लड़ाई के खिलाफ़ हूँ, और लड़ाई के विरोध में मैं अपनी आवाज़ उठाता रहता हूँ। मैंने अकेले भी एटम बम बनाने का विरोध किया, आगे भी करूँगा, क्योंकि एटम बम रक्षा का हथियार नहीं है, वो आक्रमण का हथियार है। रक्षा उससे नहीं होती, उससे आक्रमण होता है। और, भारत एक आक्रामक देश नहीं है। भारत को आक्रमण की बात नहीं सोचनी चाहिए।
व्यवधान...
मैंने उग्रवाद को भी देखा है थोड़े दिनों तक, और जानता हूँ कि उग्रवाद से कैसे निबटा जाता है। ये भाषणवीरों से उग्रवाद नहीं रुकता है। उग्रवाद रुकता है कठोर निर्णय से, उग्रवाद रुकता है संकल्पशक्ति से। अनिर्णय की सरकार उग्रवाद को नहीं रोक सकती। जो सरकार फ़ैसले नहीं ले सकती, वो उग्रवाद नहीं रोक सकती। जातियों के नाम पर, धर्म के नाम पर देश को बाँटने वाले उग्रवाद को नहीं रोक सकते। और इसलिए मैं ये कहना चाहता हूँ, अध्यक्ष महोदय कि उग्रवाद बुरा है, उग्रवाद को जब धर्म का सहारा मिल जाता है, तो अत्यंत भयंकर हो जाता है। अगर एक तरफ से उग्रवाद धर्म के आधार पर चल रहा है, तो उसी तरह का उग्रवाद धर्म के आधार पर चलाने की प्रवृत्ति इस देश में पैदा नहीं होनी चाहिए। इस तरह से...
व्यवधान...
ये जितने लोग बातें कर रहे हैं, और मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चुपचाप सुन रहे हैं ताकि ये लोग अपने भाषण को पूरा कर सकें। मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब मैं बोल रहा हूँ तो इसका विरोध होगा। मैं जानता हूँ कि उन लोगों के बीच में बोल रहा हूँ जो इतिहास के प्रति अंधे हैं, जो भविष्य के बारे में अनजान हैं, जिनकी समझ नहीं है। मैं उन लोगों के बीच बोल रहा हूँ जिनको भारत के भविष्य के बारे में न चिंता है, न भारत के अतीत के बारे में जानते हैं, जिन्होंने संसदीय परंपरा को नहीं समझा है। इसलिए, अध्यक्ष महोदय, इसी तरह के लोगों ने उग्रवाद पैदा किया है हमारे पड़ोस के देश में, और इसी तरह का उग्रवाद पैदा करने की कोशिश हो रही है। उग्रवाद से उग्रवाद नहीं बंद होता। उग्रवाद शांति की बातों से बंद होता है। उग्रवाद बंद होता है समझाने से, उग्रवाद बंद होता है समझदारी से, और इसीलिए...
अभी हमारे मित्र अटल जी के शांति के प्रस्तावों का बड़ा समर्थन कर रहे थे, अब शांति शब्द से ही इन बेचारों को पीड़ा हो रही है। इसलिए अध्यक्ष महोदय, मैं इसीलिए नहीं बोलना चाहता था, बोलने के खिलाफ़ था, चुपचाप सुन रहा था, आपने बड़ी कृपापूर्वक मुझे बोलने के लिए कहा, इन सद्बुद्धि वालों से भगवान मेरी रक्षा करें, बस यही मुझे कहना है।"
श्री चंद्रशेखर युनाइटेड फ्रंट में नेतृत्व परिवर्तन व कांग्रेस की समर्थन वापसी की चिट्ठी के सवाल पर बोलते हुए:
"अध्यक्ष महोदय, जसवंत जी देवगौड़ा की आलोचना कई विषयों में कर सकते हैं, मगर जब गुजराल ने विदेश मंत्री रहते हुए बाहर के मुल्कों के साथ रिश्ते बेहतर किये हों, तो यह आलोचना मुझको अनुचित मालूम पड़ती है। जब देश का प्रधानमन्त्री रूस में हो, करार कर रहा हो, उसी बीच कांग्रेस आलाकमान की ओर से समर्थन वापसी का फैसला हो रहा हो, इससे लज्जानक और कुछ नहीं हो सकता। ये चार दिन नहीं रूक सकते थे? भारत का प्रधानमन्त्री रूस से करार करके लौटा हो, और चारा दिन प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर बैठा रहे, यह बात कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगेगा, यह हम सब जानते हैं। जो चिट्ठी सामने आई है, जिस व्यक्ति ने भी लिखा हो, मेरे लिए उसका महत्व कूड़े से ज्यादा नहीं है।
मैं कांग्रेस में रहा हूँ। उस समय उसकी वर्किंग कमिटी में रहा हूँ जब एक-से-एक दिग्गज थे। इस देश की महान नेत्री इंदिरा जी की इच्छा के विरुद्ध जीत कर आया। मैं उस कांग्रेस को जानता हूँ जहाँ महात्मा गाँधी की इच्छा के खिलाफ़ सुभाष बाबू की जीत हो जाती हो, और लोग उनके पीछे चल पड़ते हों। इसलिए, कांग्रेस की परंपरा आप मुझको मत सिखलाइए।
भाजपा के एक मित्र जिनका नाम नहीं लेना चाहता, ने मुझसे कहा कि आप दोनों तरफ की बातें मत करिए। महोदय, मुझे न इनसे कुछ लेना है, न उनसे कुछ लेना है। मैं 1962 से ले कर आज 1997 तक इस सदन में वही बोलता आया हूँ जिसे मैं ठीक समझता हूँ। गुजराल जी, आप गवाह हैं कि कितनी बार आप मंत्री पद का संदेशा ले कर आए। आप मेरे मित्र हैं, इसलिए मैं ज्यादा तारीफ़ नहीं करूँगा। सुना है, आप प्रधानमन्त्री भी बनने वाले हैं। कोई ये न समझे कि मुझे आपसे कुछ चाहिए। पर इतना ज़रूर है अध्यक्ष महोदय कि विदेश नीति को पटरी पर ला कर इन्होंने देश की बड़ी सेवा की है।
कांग्रेस के एक साथी हैं। पुणे में रहते हैं तो शिवाजी से प्रेरणा लेते हैं, और जब दिल्ली आते हैं, तो पता नहीं किस-किस से प्रेरणा ले बैठते हैं! (सदन ठहाकों से गूँज उठा) मुझसे नहीं लेता। मैं एक बात ये भी कह देना चाहता हूँ सभापति महोदय कि अटल जी भी मुझसे पूछते हैं कि शरद पवार की क्या राय है। 30 मार्च से कोई बात उनसे मेरी नहीं हुई, न टेलीफोन पर। आज पहली बार दर्शन हुआ। मुसीबत के बाद लोग मेरे पास आते हैं, मुसीबत पैदा करते समय नहीं आते।
सभापति जी, गंभीर संकट है, और ऐसे समय में हमें इन चीजों को हँसी में नहीं टालना चाहिए। किसी व्यक्ति से आप नाराज़ हो सकते हैं। व्यक्ति आएंगे, जाएंगे, इतिहास में बड़ा से बड़ा युगपुरुष भी अर्द्धविराम है, पूर्णविराम नहीं है। प्रधानमन्त्री आएंगे-जाएंगे। कांग्रेस पार्टी में मैं भी रहा हूँ, पर उन मान्यताओं को संतोष मोहन देव जी, इस तरह पैरों के नीचे मत कुचलिए। आप समर्थन दें या न दें... (चंद्रशेखर यील्ड करते हुए, संतोष मोहन - आपको कितनी बार कहा, कांग्रेस में आ जाइए, आप बोलते नै आएंगे, नै आएंगे!)
सभापति जी, इनके उदार निमंत्रण के लिए मैं इनका बड़ा आभारी हूँ। लेकिन इनको याद रहना चाहिए कि मैंने कांग्रेस तब छोड़ी थी जब उसकी नेता इंदिरा गाँधी थीं। और गुजराल जी आप जानते हैं, किन परिस्थितियों में छोड़ी थी। 1975 में विरोधी पार्टियों को निर्णय करना था, उनके लिए एक ही रास्ता था जेल जाना, मेरे पास दो रास्ते थे- भारत सरकार में जाऊँ या मैं जेल जाऊँ। मैंने जेल में जाना स्वीकार किया था। गुजराल जी, आप याद रखिए मैंने सरकार में जाना नहीं स्वीकार किया था। आप भी मेरे पास आए थे। ये बातें मैं कहता नहीं, लेकिन दोस्तो, सॉरी सभापति जी, उस समय यदि मैं कांग्रेस छोड़ के चला गया, तो आज के नेता जो कांग्रेस में हैं, उनके अंदर चला जाऊँ, ये आपकी बुद्धि की बलिहारी है, इससे ज्यादा...।
कांग्रेस अगर नियमों में, सिद्धांतों में, आदर्शों में आस्था रखने वाला संगठन बने, मैं अकेला व्यक्ति हूँ जिसने कहा था, कांग्रेस पार्टी का एक इतिहास है, कांग्रेस पार्टी एक बड़ी पार्टी है, कांग्रेस पार्टी का व्यापक समर्थन है, कांग्रेस पार्टी फिर पुनर्जीवित हो सकती है, लेकिन पुनर्जीवित करने के लिए संतोष मोहन देव जी, थोड़ी हिम्मत चाहिए। राजेश पायलट जी, हिम्मत दिखाते हो, लेकिन उस हिम्मत के लिए अकेले चलने की शक्ति होनी चाहिए। प्रियरंजन दास जी, रवींद्रनाथ टैगोर को क़ोट करना आसान है, लेकिन समूह के साथ चलने की प्रवृत्ति मन की कमज़ोरी है, ये बात याद रखो। अकेले चलने की प्रवृत्ति हो जाए अगर कांग्रेस के चंद लोगों में, तो कांग्रेस आज भी ऊँचा संगठन बन सकती है। संतोष मोहन जी, जिस रोज़ वो कांग्रेस बनाएँगे, और आप निमंत्रण देंगे, मैं उस पर ज़रूर विचार करूँगा। आज की कांग्रेस को मैं दूर से भी छूना नहीं चाहता हूँ, ये बात याद रखिए।
(ठहाके)
मैं सभापति जी, आपसे कहना चाहता हूँ कि इस संकट की घड़ी में किसी व्यक्ति के ऊपर अंगुली उठा कर बातें करना, ये शोभा नहीं देता। राजनीति व्यक्तिगत आक्षेपों की राजनीति, चाहे वो आदर्शों के नाम पर हो, सिद्धांतों के नाम पर हो, व्यक्तिगत आक्षेपों से हमें दूर होना चाहिए। बहुत संकोच के साथ मगर राष्ट्रीय कर्तव्य समझ कर आज एक बात कहना चाहता हूँ। आज चाहे इधर के लोग हों या उधर के लोग, राष्ट्रीय सवालों के ऊपर हम एक मत हो कर कोई कार्यक्रम बना सकें, और उसके अनुसार इस संसदीय जनतंत्र को चलाने की कोशिश करें, तो शायद भारत को संकट से उबार सकते हैं।
ये संकट जो वास्तविक संकट है, ये घिनौना संकट जो आपने पैदा किया है, इसके लिए आपको मुबारक हो। लेकिन जितनी जल्दी इस संकट से आप अपने को मुक्त कर सकें और देश को मुक्त कर सकें, ये अच्छी बात होगी। मैं नेता, विरोधी दल से कहना चाहूँगा कि सरकार आज के बाद आपकी मर्जी पर चल भी रही है, क्या ज़रूरी है कि उसी का समर्थन कीजिए जो पत्र लिखा गया है। जो पत्र लिखा गया है, आज इस सरकार के खिलाफ मत दे कर के आप उस पत्र का समर्थन करेंगे, अपने आक्रोश का प्रदर्शन नहीं करेंगे, ये बात हमेशा याद रखिए। सात दिनों में सत्ता भागी नहीं जा रही है, अगर तेरह तारीख को ये सरकार नहीं चलाई जा सकती है तो उनके मुँह पर कालिख लगेगी जिन्होंने अमर्यादित व्यवहार किया है, जिन्होंने गैरजिम्मेदाराना हरकत की है, जिन्होंने राष्ट्र के साथ एक बड़ा अपराध किया है, जिन्होंने राष्ट्रीय कर्तव्य को, नैतिकता को तिलांजलि दी है। अध्यक्ष जी, आप इसमें शामिल न हों, तो आपसे, मैं उनसे कोई सद्बुद्धि की आशा नहीं करता, लेकिन आपसे सद्बुद्धि की आशा है, इसी निवेदन के साथ धन्यवाद!"
जब अधिकांश लोग सेना बुला कर लालू प्रसाद को गिरफ़्तार करने पर 'भ्रष्टाचार' की ढाल बनाकर चुप्पी ओढ़े हुए थे और नीतीश जी जैसे लोग उल्टे इस क़दम के पक्ष में सदन में हंगामा कर रहे थे, तो चंद्रशेखर ने लालू प्रसाद मामले में सी बी आई द्वारा अपने अधिकार का अतिक्रमण करने, न्यायपालिका को अपने हाथ में लेने व व्यवस्थापिका को अंडरएस्टिमेट करने के अक्षम्य अपराध पर लोकसभा में बहस करते हुए जो कहा था, उसे आज याद किये जाने की ज़रूरत है -
"लालू प्रसाद ने जब ख़ुद ही कहा कि आत्मसमर्पण कर देंगे, तो चौबीस घंटे में ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटा जा रहा था कि सेना बुलाई गई? ऐसा वातावरण बनाया गया मानो राष्ट्र का सारा काम बस इसी एक मुद्दे पर ठप पड़ा हुआ हो। लालू कोई देश छोड़ कर नहीं जा रहे थे। मुझ पर आरोप लगे कि लालू को मैं संरक्षण दे रहा हूँ। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी दिलचस्पी किसी व्यक्ति विशेष में नहीं है, ऐसा करके मैं इस संसदीय संस्कृति की मर्यादा का संरक्षण कर रहा हूँ। जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कहकर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता। यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है।
किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है, किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है। लालू को मिटा सकते हो, मुलायम सिंह को गिरा सकते हो, किसी को हटा सकते हो जनता की नज़र से, लेकिन हम में और आप में सामर्थ्य नहीं है कि एक दूसरा लालू प्रसाद या दूसरा मुलायम या दूसरा कल्पनाथ राय या दूसरा आडवाणी बना दें। भ्रष्टाचार मिटना चाहिए, मगर भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है। एक शब्द है हिंदी में जिसे सत्यनिष्ठा कहा जाता है, अगर सत्यनिष्ठा (इंटेग्रिटी) नहीं है, तो सरकार नहीं चलायी जा सकती। और, सत्यनिष्ठा का पहला प्रमाण है कि जो जिस पद पर है, उस पद की ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए, उत्तरदायित्व को निभाने के लिए आत्मनियंत्रण रखे, कम-से-कम अपनी वाणी पर संयम रखें। ये नहीं हुआ अध्यक्ष महोदय।
सी बी आई अपनी सीमा से बाहर गयी है, ये भी बात सही है कि उस समय सेना के लोगों ने, अधिकारियों ने उसकी माँग को मानना अस्वीकार कर दिया था। ये भी जो कहा गया है कि पटना हाईकोर्ट ने उसको निर्देश दिया था कि सेना बुलायी जाये; वो बुला सकते हैं, इसको भी सेना के लोगों ने अस्वीकार किया था। ऐसी परिस्थिति में ये स्पष्ट था कि सीबीआइ के एक व्यक्ति, उन्होंने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया था। मैं नहीं जानता कि कलकत्ता हाईकोर्ट का क्या निर्णय है। उस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता। लेकिन ये प्रश्न ज़्यादा मौलिक है जिसका ज़िक्र अभी सोमनाथ चटर्जी ने किया। अगर पुलिस के लोग सेना बुलाने का काम करने लगेंगे, तो इस देश का सारा ढाँचा ही टूट जायेगा।
सेना बुलाने के बहुत-से तरीके हैं। वहाँ पर अगर मान लीजिए मुख्यमंत्री नहीं बुला रहे थे, वहाँ पर राज्यपाल जी हैं, यहाँ पर रक्षा मंत्री जी हैं, होम मिनिस्ट्री थी, बहुत-से साधन थे, जिनके ज़रिये उस काम को किया जा सकता था। लेकिन किसी पुलिस अधिकारी का सीधे सेना के पास पहुँचना एक अक्षम्य अपराध है। मैं नहीं जानता किस आधार पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि उनको इस बात के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए। मैं अध्यक्ष महोदय आपसे निवेदन करूँगा और आपके ज़रिये इस सरकार से निवेदन करूँगा कि कुछ लोगों के प्रति हमारी जो भी भावना हो, उस भावना को देखते हुए हम संविधान पर कुठाराघात न होने दें, और सभी अधिकारियों को व सभी लोगों को, चाहे वो राजनीतिक नेता हों, चाहे वो अधिकारी हों; उन्हें संविधान के अंदर काम करने के लिए बाध्य करें।
और, अगर कोई विकृति आयी है, तो उसके लिए उच्चतम न्यायालय का निर्णय लेना आवश्यक है, और मुझे विश्वास है कि हमारे मंत्री, हमारे मित्र श्री खुराना साहेब इस संबंध में वो ज़रा छोटी बातों से ऊपर उठ कर के एक मौलिक सवाल के ऊपर बात करेंगे।"
कुल मिला कर यह समय संसद में मसखरों के लगातार छाने और मंडराने की आहट के साथ हमारे सामने है, किसी रोज़ पूरा तंत्र ही कहीं मसखरा तंत्र में न तब्दील हो जाए, संकट इसी बात का है। गोपाल दास नीरज ने ठीक ही कहा:
न तो पीने का सलीक़ा न पिलाने का शऊर
ऐसे ही लोग चले आए हैं मैख़ाने में।





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