सुधीर सुमन का श्रद्धांजलि आलेख 'बहुआयामी वास्तविकताओं को चित्रित करने वाले कथाकार अनन्त कुमार सिंह'
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| अनन्त कुमार सिंह |
आज के समय में जब सारी मर्यादाएं, नैतिकताएं एक एक कर छिजती जा रही हैं, ऐसे में अनन्त कुमार सिंह का होना एक गहरी आश्वस्ति थी। सच्चे मायनों में वे मनुष्यता के प्रबल हिमायती थे। जो भी जरूरतमन्द उनके पास गया, वह खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी बन पड़ा, करने से कभी पीछे नहीं हटे। ऐसा नहीं था कि उन्हें धोखा नहीं मिला या उनकी आलोचना नहीं हुई, लेकिन वे चुपचाप सारे हलाहल पी जाते थे। उनके करीबियों को भी इसकी भनक नहीं लग पाती थी। अनन्त जी की सोच का दायरा बड़ा था। 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते हुए उन्होंने तमाम अनाम से रचनाकारों को अधिकाधिक स्पेस दिया। यही नहीं 'जनपथ' के सम्पादन से अपने वैचारिक लेखकीय संगठन जनवादी लेखक संघ से इतर जन संस्कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाकार साथियों को भी बेहिचक जोड़ा। पत्रिका लगातार घाटे में रही लेकिन अपने खून पसीने की कमाई लगा कर वे पत्रिका का सम्पादन प्रकाशन लगातार करते रहे। 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े जितेन्द्र कुमार ने एक बातचीत में बताया कि 'अब अनन्त कुमार सिंह हो पाना असंभव है'। इस कथन में भले ही अतिरेक दिखाई पड़े, लेकिन काफी हद तक इस कथन में सच्चाई भी है। बीते 5 अप्रैल 2026 को अनन्त कुमार सिंह का बिहार के गया जिले में स्थित उनके पैतृक गांव बहेरा में निधन हो गया। हालांकि अनन्त जी की कर्मभूमि आरा रही। लगभग चार दशकों के अन्तराल में फैले अपने लेखन में उन्होंने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विसंगतियों पर खुल कर प्रहार किए। अपनी कालजयी रचनाओं में वंचित वर्गों के प्रति गहरी संवेदनशीलता के चलते वे हमेशा जिन्दा और प्रासंगिक बने रहेंगे। आजादी के बाद के भारतीय समाज की वास्तविकताओं को जानने के लिए उनकी रचनाएं आज भी एक अमूल्य दस्तावेज की तरह हैं। इन रचनाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती। पहली बार की तरफ से हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। नागार्जुन जन्मशती पर अनन्त जी ने जनपथ के विशेषांक का सम्पादक सुधीर सुमन को बनाया था। अनन्त जी से सुधीर सुमन के आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुधीर सुमन का श्रद्धांजलि आलेख 'बहुआयामी वास्तविकताओं को चित्रित करने वाले कथाकार अनन्त कुमार सिंह'।
श्रद्धांजलि आलेख
'बहुआयामी वास्तविकताओं को चित्रित करने वाले कथाकार अनन्त कुमार सिंह'
सुधीर सुमन
बिहार के कथाकार सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को मुखरता से व्यक्त करने के लिए जाने जाते रहे हैं। अनंत कुमार सिंह एक ऐसे ही कथाकार थे, जिनकी कहानियों और उपन्यासों में पिछले लगभग चार दशक की जितनी समस्याओं को चित्रित किया गया है, उतना शायद ही किसी दूसरे कथाकार की कहानियों और उपन्यासों में मिलेगा।
अनंत कुमार सिंह व्यापक जनाकांक्षाओं वाले कहानीकार थे। नवें दशक से ही वे लगातार कहानियाँ लिख रहे थे। उनकी कहानियों में यथार्थ और आदर्श का द्वंद्व दिखाई पड़ता है। 'जागते रहो' कहानी में चौकीदार की दुर्दशा पर कहानी लिखने वाला एक लेखक पूरी तरह यथार्थवादी है, वह चाहता है कि जो वस्तुस्थिति है, उसे हु-ब-हू पाठकों तक ले जाए, मगर आलोचक उसकी कहानी में कमजोरी तलाशते हैं, हालांकि उसकी कहानी का यथार्थ ही वास्तविक हो जाता है। हकीकत में चौकीदार अपनी आर्थिक विवशताओं के कारण मर जाता है। यह कहानी अनंत कुमार सिंह के रचनात्मक उद्देश्य और शिल्प को समझने की दृष्टि से प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है।
अनंत कुमार सिंह के पहले संग्रह 'चौराहे पर' में संकलित 'सबेरा', 'हीरवा की मौत' में निम्नवर्गीय लोगों की बदहाल स्थिति का बेहद भयावह चित्रण किया गया है। 'फैसला' में एक गरीब व्यक्ति पर पिता के श्राद्ध के लिए दबाव डाला जाता है। जबकि दबाव डालने वाले की मूल मंशा उसकी जमीन हड़प लेने की है। 'वापसी' स्त्री के अस्तित्वगत पहचान से जुड़ी कहानी है। नायिका का पति उसके सामाजिक कार्यों में अवरोध बनता है, उसे उत्पीड़ित करता है, तो घर-परिवार छोड़ कर महिला संगठन को चुन लेती है। उनके पहले संग्रह की कई कहानियां सांप्रदायिकता की समस्या पर केंद्रित हैं। 'अपने लोग', 'वहशी, 'हकीकत' आदि कहानियों में सांप्रदायिकता को कई कोणों से देखा गया है। 'काफिर' कहानी मुस्लिम संप्रदाय में तलाक की समस्या को उठाती है। यह बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण से प्रेरित कहानी है। इसी तरह 'विभाजन रेखा' अयोध्या में शिलापूजन की योजना के कारण देश भर में भड़के सांप्रदायिक तनाव की पृष्ठभूमि में लिखी गयी कहानी है, जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जान देने वाले रामजी नट का अविस्मरणीय चरित्र गढ़ा गया है।
'और लातूर गुम हो गया' और 'राग भैरवी' में पत्रकारिता की जनविरोधी (मेन लीड), राष्ट्रविरोधी सांप्रदायिक मानसिकता (और लातूर गुम हो गया), ढपोरशंखी राजनीति (आवनहार), राजनीति का अपराधीकरण (शराफत जिंदा है), दलित द्वारा गोमांस-भक्षण की प्रतिक्रिया में होने वाले सामंती जुल्म (भूख), ट्रेड यूनियनों के भीतर बढ़ते लंपट और अपराधी तत्व (गजब), कर्मचारियों की छंटनी (एक कहानी की भूमिका), उपभोक्तावाद प्रेरित प्रदर्शनप्रियता और विकृतियाँ (राग भैरवी, काल दंश), धार्मिक आयोजनों में बढ़ती लंपटई (प्रदूषण), दहेज (परिभाषा), शहरी सुविधाओं के आकर्षण में गाँव से कटते लोग (रहूंगा यहीं), पिछड़ी जातियों का सामंतीकरण (चेहरा तो सब कुछ बता देता है), राजनीतिक पार्टियों के अंदर गरीब नेताओं का घटता प्रतिनिधित्व (अथ चुनाव कथा), पूंजी की संस्कृति के प्रभाव पर परिवार और समाज के भीतर साहित्यकारों का घटता महत्त्व ('एक लेखक की मौत' और 'ऐसे जैसे कुछ हुआ ही नहीं') आदि विविध समस्याओं को उठाया गया है।
कहानीकार नीरज सिंह ने ठीक ही लिखा है-"अनंत कुमार सिंह की कहानियों में विषय की दृष्टि से पर्याप्त विविधता है। वर्तमान भारतीय समाज की बहुआयामी वास्तविकताओं का उन्होंने यथार्थपूर्ण अंकन किया है। गाँव और नगर उनके लिए अलग से आकर्षण के केंद्र नहीं हैं। वे उनकी कहानियों में वर्तमान दौर की सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों के चित्रण में सहायक बन कर उपस्थित हुए है।"
अनंत कुमार सिंह ने 'ताकि बची रहे हरियाली' और 'नागफांस लिए घट के भीतर' नामक दो उपन्यास भी लिखे। लेकिन वे मूलतः कहानीकार थे। 'चौराहे पर', 'लातूर गुम हो गया', और 'राग भैरवी' के अतिरिक्त 'कठफोड़वा तथा अन्य कहानियां', 'तुम्हारी तस्वीर नहीं है यह', 'प्रतिनिधि कहानियां', 'ब्रेकिंग न्यूज', 'नया साल मुबारक हो तथा अन्य कहानियाँ' तथा 'अब और नहीं' उनके अन्य प्रकाशित कहानी संग्रह हैं। समाज और परिवार में बढ़ती संवेदनहीनता, स्वार्थपरता और चौतरफा नैतिक पतन को लेकर वे बेहद चिंतित रहते थे। यह चिंता उनकी कहानियों में प्रमुखता से देखी जा सकती है। 'ब्रेकिंग न्यूज' कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी खुद ही एक ऐसे साहित्यकार के बारे में है जिसकी एक इलेक्ट्रानिक चैनल का एक्सीक्यूटिव प्रोड्यूसर बनने के बाद साहित्य की दुनिया में भी पूछ बढ़ जाती है, पर वह अपनी सामाजिक नैतिकता खो देता है। औरतें सिर्फ उसके लिए उपभोग होती हैं और मीडिया महज मालिक के कारोबार का माध्यम। अपने पारिवारिक सामाजिक रिश्तों से भी वह पूरी तरह कट जाता है।
इस संग्रह की कहानियों में शिक्षा (लपटें), खेती (मुआर नहीं), कृषि संस्कृति (भुच्चड़), शहरी मेहनतकशों की जिंदगी (पहियों पर पहाड़, वाह रे! आह रे! चौधरी मुरारचंद्र शास्त्री) के प्रति अनंत जी गहरे तौर पर संवेदित नजर आते हैं। उनकी कहानियां अपने ही अहं और कुंठा में डूबे आत्मकेंद्रित मध्यवर्गीय व्यक्ति की कहानियां नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि पुराने समाज के प्रति कोई अंधमोह है इनमें, वहां के शोषण और उत्पीड़न की स्मृतियां, खासकर अपने हक अधिकार से वंचित लोगों और अपने प्रेम से वंचित स्त्रियों (बसंती बुआ, मुखड़ा-दुखड़ा-टुकड़ा!) की बहुत मार्मिक स्मृतियां हैं, जो पाठक की चेतना को लोकतांत्रिक बनाती हैं। शहर और गांव तथा संगठित और असंगठित श्रमिकों को एकताबद्ध करने का स्वप्न (रात जहां मिलती है) भी इनमें है। कहानी संग्रह का समर्पण भी गौर करने लायक है- 'इस धरती को जहां रहता हूं मैं अपने शब्दों के साथ।'
यह धरती मूलतः नवसाम्राज्यवादी अर्थनीति और बाजारवादी संस्कृति की मार झेल रहे किसानों की धरती है। यह धरती उपन्यास 'ताकि बची रहे हरियाली' में है, यह 'इलिसाबेटा डोरिया नगर उर्फ़ रेणुटांड़', 'रहूंगा यहीं' और ‘मुआर नहीं’ आदि कई कहानियों में है। अनंत कुमार सिंह के उपन्यास ‘ताकि बची रहे हरियाली’ में कृषि वैज्ञानिक नवीन रासायनिक खाद और खतरनाक कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल के विरुद्ध किसानों को सचेत करता है, क्योंकि इससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति का क्षय हो रहा है, बल्कि अनाज में भी जहर भर रहा है। लोग कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। अपने कुछ सहकर्मियों के साथ मिलकर वह जैविक खाद यानी वर्मी कम्पोस्ट और पेड़-पौधों से तैयार कीटनाशक दवाओं के उपयोग के लिए किसानों को प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। लेकिन रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं की कंपनियों के उत्पादों के जरिए भारी कमाई करने वाले लोगों को यह नागवार गुजरता है। नवीन पर आरोप लगता है कि वह अनधिकृत रूप से कार्यालय से अनुपस्थित रहता है और किसानों को अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक सलाह देता है।
उपन्यास में शेखर और राम की कहानी भी है। शेखर एक तरह से नवीन का ही प्रतिरूप है, जो गांव में रह कर खेती करता है और खाद व कीटनाशक दवा देशी तरीके से बनाता है। राम जो वर्षों पहले गांव छोड़ कर चला गया है और कीटनाशक कारखाने का मालिक हो गया है, वह जब गांव लौटता है और देखता है कि उसकी कीटनाशक दवाओं के कारण लोगों की जिंदगी तबाह हो रही है, तो उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। कारखाना बंद कर के वह अपनी पूंजी से मुफ्त शिक्षा, चिकित्सा, सिंचाई और पेयजल की व्यवस्था करने में जुट जाता है। लेकिन इस आदर्शवाद या हृदय परिवर्तन के जरिए किसान विरोधी व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता। यथार्थ यह है कि गांवों से लोगों का तेजी से पलायन हो रहा होता है। शहर में वे दूसरी त्रासदियों के शिकार होते हैं।
एक ईमानदार कृषि वैज्ञानिक के तौर पर अपनी ड्यूटी निभाने की जद्दोजहद में जुटे नवीन को धीरे-धीरे लगने लगता है कि ‘‘वर्मी कम्पोस्ट और घरेलू कीटनाशक के नुस्खे बताना ही समस्या का समाधान नहीं है। ...सारी बीमारियों की जड़ में व्यवस्था है- राजसत्ता है जिसकी कोख से निकली है व्यवस्था- राजधानी, जिला से होते हुए प्रखंड स्तर का प्रशासन। जिसका पोर-पोर सड़ गया है।’’
विडंबना यह है कि जिन्हें प्रशासन किसानों का प्रतिनिधि बताता है, वे किसान हैं ही नहीं। किसानों के लिए सरकारी योजनाएं तय करने और मूल्य निर्धारण में न वास्तविक किसानों की कोई भूमिका होती है और न ही उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाता है। बाजार के साथ पदाधिकारी-कर्मचारी और दलाल भी किसानों को लूटने में पीछे नहीं हैं।
यथार्थ का प्रत्यक्ष अनुभव भी वैचारिक रूपांतरण की वजह बनता है। किसान के नाम पर सवर्ण-सामंती वर्चस्व को बनाए रखने वालों और नक्सलियों को एक ही तुला पर तोलने वाले नवीन को इनके बीच के फर्क का पता चलता है। भूस्वामियों की रक्षा की आड़ में गरीब खेत मजदूरों, महिलाओं, बच्चों का जनसंहार रचाने वाले ठीक उसी तरह के फर्जी किसान हैं, जैसे किसानों की योजनाओं को हड़पने वाले दलाल। बल्कि दोनों एक ही हैं। उपन्यास की पृष्ठभूमि भोजपुर की है। नवीन को भोजपुर के लंबे सामंतवाद विरोधी किसान संघर्ष की गहरी समझ नहीं है। उसका सहयोगी राणा उसे समझाता है- ‘‘...असमानता, भेदभाव, सामंती मिजाज, सत्ता-व्यवस्था का भ्रष्टाचार के चलते समाज में अशांति फैल रही है। अगर सभी को प्राप्य मिले, हक मिले तो न असंतोष फैलेगा और न उग्रवाद पनपेगा।’’
नवीन और उसके सहयोगी राजनेता-भ्रष्ट प्रशासन और माफिया-दलालों के गठबंधन के निशाने पर आ जाते हैं। भ्रष्ट मंत्री उन्हें उग्रवादियों का समर्थक, देशद्रोही और समाज विरोधी करार देता है। संकट को झेल रहे वास्तविक किसानों के प्रति नवीन की सच्ची संवेदना उसे अंततः नए दौर के किसान संघर्ष के करीब ले जाती है।
अनंत कुमार सिंह ने अपने कथा साहित्य में सिर्फ समस्याओं को उठाया ही नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध प्रतिरोध भी दिखाया या अपने तईं आदर्श समाधान तलाशने की कोशिश भी की। उनकी कहानियों के तेलुगू, मलयालम, बांग्ला, उर्दू, पंजाबी आदि में अनुवाद भी हुए। अनंत कुमार सिंह ने 'आजादी की कहानी' नामक एक बालकथा संग्रह की रचना भी की।
07 जनवरी 1953 को ग्राम-बहेरा, प्रखंड-आमस, जिला-गया, बिहार में जन्मे अनंत कुमार सिंह की साहित्यिक कर्मभूमि आरा रही। उन्होंने 'कुँवर सिंह और 1857 की क्रांति' नामक पुस्तक भी लिखी। आरा से ही उन्होंने 'जनपथ' जैसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित की, जिसमें ख्यातिलब्ध रचनाकार तो छपे ही, नये रचनाकारों को भी जगह मिली। 'जनपथ' ने दूसरी भाषाओं और हिंदीतर प्रदेशों के साहित्य पर विशेषांक भी निकाले। आरा की राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान है, उसे बरकरार रखने में अपने समय में इस पत्रिका की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
हालांकि जीवन के आखिरी वर्षों में वे गांव लौट गए थे। स्वास्थ्य संबंधी कारण तो थे ही पर यह उनका वैचारिक निर्णय भी रहा होगा। वे जीवन का आखिरी समय अपने ग्रामीणों और किसानों के बीच ही गुजारना चाहते थे। 'रहूंगा यहीं' केवल उनकी कहानी का शीर्षक ही नहीं है, यह उनका आत्मनिर्णय भी था।
अनंत कुमार सिंह को 'और लातूर गुम हो गया' पुस्तक पर 'परिमल' द्वारा 'राजेश्वर प्रसाद सिंह कथा-सम्मान' मिला। उन्हें फणीश्वर नाथ रेणु सम्मान दिया गया तथा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा सम्मानित किया गया।
अनंत जी विगत एक-डेढ़ दशक में वृद्धों के जीवन की मुश्किलों को लेकर भी बेहद संवेदित रहते थे। वृद्ध जीवन पर ‘जनपथ’ का अविस्मरणीय अंक निकाला था, जिसमें मुझ जैसे आलसी लेखक से भी एक लंबा लेख लिखवाने में सफल रहे थे। उन्होंने मुझे नागार्जुन विशेषांक के अतिथि संपादन की जिम्मेवारी दी थी, जो मेरी व्यस्तता के कारण टलती जा रही थी, पर उन्होंने पूरे धैर्य से इंतजार किया। उन्होंने भुनेश्वर भास्कर और राकेश दिवाकर जैसे कई चित्रकारों के रेखांकनों को अपनी पत्रिका में जगह दी। सांप्रदायिकता, बाजारवाद और भाषा आदि पर विशेषांक निकाले या विशेष सामग्री दी। मधुकर सिंह, विष्णुचंद्र शर्मा सरीखे कई साहित्यकारों पर विशेषांक निकाले। कुमार वीरेंद्र, सुनील श्रीवास्तव, ओम प्रकाश मिश्र जैसे युवा साहित्यकारों को संपादन की जिम्मेवारी दी। हम दो संगठनों में थे। वे हमेशा जनवादी लेखक संघ के राज्य और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहे, मैं आरंभ से ही जन संस्कृति मंच में रहा, पर आयोजनों में हमेशा उनका सहयोग मिला। वे हमेशा सीधे या सांकेतिक तरीके से सांगठनिक संकीर्णता से बचने का सुझाव देते थे। एक बार जलेस के एक कवि की कविताओं की मैंने थोड़ी आलोचना की, तो उन्हें लगा कि मैंने सांगठनिक वजह से ऐसा किया, तो मैंने ऐतराज किया और उन्हें समझाया कि नहीं इस वजह से मैंने नहीं किया, बल्कि वह मेरा मित्र भी है, इसलिए मुझे लगा कि केवल तारीफ करना उचित नहीं है, मुझे उसकी कविता में जो कमजोरियां नजर आती हैं, उसे भी कहूं। उसके बाद उन्होंने कभी इसकी चर्चा नहीं की। मैंने व्यक्तिगत तौर पर उनसे उदारता सीखी। आयोजनों के दौरान जितना संभव हो सका मैंने अपने बिरादराना संगठनों की मदद की और आज भी करता हूं, तो इसे अनंत कुमार सिंह जैसे लेखकों के व्यक्तित्व का प्रभाव के तौर पर भी देखा जा सकता है। पत्रिका के प्रकाशन में लगे युवा रचनाकारों की उन्होंने पर्याप्त मदद की। मेरा खुद का अनुभव है, दो विशेषांकों में मैंने पत्रिका की टाइपिंग, पेजमेकिंग, फोटो सेटिंग आदि की जिम्मेवारी निभाई थी। एक दिन अचानक वे एक पत्रकार साथी के साथ आए और कुछ रुपये दे गए। उस वक्त मेरी बेहद तंगहाली की स्थिति थी और मैंने एक ऐसे आयोजन में भागीदारी से मना कर दिया था, जिसमें भाजपा का एक मंत्री आ रहा था। बाद में मुझे पता चला कि उसमें शिरकत करने वालों को कुछ रुपये भी मिले। क्या संयोग था कि वे रुपये उतने ही थे, जितना मुझे अनंत जी पत्रिका में लगे श्रम के एवज में जबरन दे कर गए थे। इस तरह से मेरे लेखकीय स्वाभिमान को बचाए रखने में वे सहयोगी रहे।
अनंत जी सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक में कार्यरत थे। वे बैंक के ट्रेड यूनियन में भी थे। कर्मचारियों के हितों के लिए कई बार वे प्रबंधन से जूझते रहते थे। बैंक की इस नौकरी में न जाने कितने जरूरतमंद लोगों की उन्होंने शीघ्र मदद की। हालांकि अपनी कहानियों में उन्होंने ट्रेड यूनियनों के भीतर के गलत तत्वों पर भी लिखा। व्यक्तिगत जीवन में वैसे भ्रष्ट लोगों की साजिशों को अंतिम दिनों तक झेला। रिक्शावालों से लेकर डाकिया तक की वे मदद करते रहे। दोस्तों की फिक्र करते रहे। 30 मार्च और 31 मार्च को उन्होंने मुझ से फोन पर बातें की। बाद में पता चला कि और भी कई मित्रों को फोन किया था। मुझे हमेशा उलाहना देते थे कि मैं लिखने पर ध्यान नहीं देता। उस दिन भी कहा। मेरी अस्वस्थता को जान कर अपना ख्याल रखने की हिदायत दी। मैंने फिर एक बार वादा किया कि हम लोग आपके गांव आएंगे। बस मुझे चार-पांच दिन की छुट्टी मिल जाए। उनके रचनात्मक योगदान पर हम कुछ रचनाकार साथी एक बड़ा आयोजन करना चाहते थे, पर पिछले तीन-चार वर्षों से किसी न किसी कारण से यह आयोजन टलता गया। फोन पर उनसे बातचीत के दौरान मैंने सोचा कि इस साल हर हाल में उन पर आयोजन किया जाएगा। लेकिन इसकी आशंका कहां थी कि महज चार दिन बाद 5 अप्रैल की सुबह हृदयाघात उन्हें हमसे छीन ले जाएगा। सबके दुख-सुख में साथ रहने वाला, वह मुस्कुराता हुआ मसीहाई किस्म का निश्छल शख्सियत अब हमसे दूर जा चुका है। गो कि ऐसा भी नहीं था कि इस मसीहा को जीवन में छल और विश्वासघात नहीं मिला। ऐसा नहीं था कि वह जीवन में छल करने वालों को नहीं जानता था या उनसे उसे शिकायत नहीं थी या उसे दुख नहीं था। लेकिन वह सब कुछ अपने दिल में दफ्न किये रहता था। अकारण नहीं है कि अंतिम डेढ़ दशक में अनंत जी के मोबाइल का काॅलर ट्यून था-
सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी।
सच तो यह है कि वे जानबूझ कर अनाड़ी-सा बने रहे। बकौल मुक्तिबोध
‘‘बेवकूफ बनने के खातिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूं
और यह सब देख बड़ा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूं...
हृदय मे मेरे ही,
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हंस-हंस कर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत्... स्वायत्त हुआ जाता है।’’
(इस आलेख में प्रयुक्त पुस्तकों के आवरण चित्र हमें सुधीर सुमन ने उपलब्ध कराए हैं।)
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| सुधीर सुमन |
सम्पर्क
मोबाइल : 9958672277






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