नित्यानंद गायेन की सात कविताएँ
नित्यानंद गायेन युवा कवि नित्यानंद गायेन की कविता 'धूप पिघल रही है' पढ़ते हुए मुझे वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल की एक कविता है 'कवि' की ये पंक्तियाँ याद आयीं - 'इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे/ उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज है/ एक फ़ेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी/ उन्हें यह तक मालूम है/ कि कब मैं चुप हो कर गरदन लटका लूँगा/ मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही/ हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे/ साथियों के रास्ते पर/ एक कवि और कर ही क्या सकता है/ सही बने रहने की कोशिश के सिवा।' कवि आज जो भी कुछ घटित हो रहा है उसे देखने के लिए अभिशप्त है । लेकिन विचलन के इस समय में सही बने रहने की कोशिश भी कम अहम नहीं है । फासिस्ट शक्तियां आज अपने देश में वह सब कुछ कर रही हैं जो उनकी स्वाभाविक प्रकृति होती है । इसी क्रम में वे प्रोपेगंडा फैलाने का काम भी करती हैं लेकिन कवि नित्यानन्द इस बात को ले कर आश्वस्त हैं कि 'झूठ की उम्र लम्बी नहीं होती' । आइए आज पढ़ते हैं आक्रोश के स्वर के कवि नित्यानन्द की कुछ नयी कविताएँ । नित्यानंद गायेन की सात कविताएँ झूठ...