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पॉल वेरलेन की कविताएं

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  पॉल वेरलेन  कहा जाता है कि दुनिया का हरेक व्यक्ति जन्मना कवि ही होता है। यह कहने के पीछे मनुष्य की वह संवेदनशीलता ही रही होगी जो उसमें अन्य के प्रति प्रेम का भाव जगाती है। लेकिन वही कविता पाठकों के दिल में जगह बना पाती है जिसमें सार्वजनीनता के दर्शन होते हैं। जिसमें आम जन का दुःख दर्द और उस की विडम्बनाएं होती हैं। कविता जबरन नहीं लिखी जा सकती बल्कि आज भी हृदय की आवाज पर ही लिखी जाती है। इसीलिए वास्तविक कविता लिख पाना हमेशा कठिन होता है। यही वजह है कि आसान दिखने के बावजूद हर समय किसी भी कवि के साथ कविता लिखना संभव नहीं हो पाता। आज जिस तरह की कविताएं अधिकांशतः लिखी जा रही हैं उसे देख पढ़ कर तो यही लगता है कि कविता के साथ धोखा या अत्याचार किया जा रहा है। फ्रांसीसी कवि पॉल वेरलेन अपनी कविता 'काव्य कला' में लिखते हैं : 'घूँघट के नीचे सुन्दर नज़र हो/ प्रचण्ड गर्मी की तपिश हो उसमें/ झलके शरद ऋतु का आकाश/ तेज़ नृत्य की कशिश हो उसमें'। फ्रेंच कवि पॉल वेरलेन की कविताओं का मूल रूसी से अनुवाद किया है वरिष्ठ कवि अनिल जनविजय ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं   पॉल वेरलेन की...

इस्मत चुग़ताई का संस्मरण 'मण्टो मेरा दोस्त'

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  इस्मत चुगताई एवम मंटो इस्मत चुग़ताई और सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य के सार्वकालिक हस्ताक्षर हैं। दोनों उम्दा लेखक थे और समकालीन थे। इनकी आपसी दोस्ती साहित्यकारों के लिए एक मिसाल की तरह है। सआदत हसन मंटो पर इस्मत चुग़ताई ने एक संस्मरण लिखा था। इस्मत चुग़ताई का यह संस्मरण अब तक हिन्दी में अप्रकाशित था। ’पहली बार’ के लिए उर्दू से इसका विशेष रूप से अनुवाद (लिप्यन्तरण)  किया है -- मसक्वा, रूस में रह रहीं लेखक, कवि और अनुवादक प्रगति टिपणीस ने।  इसके प्रस्तुतकर्ता अनिल जनविजय हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं इस्मत चुग़ताई का संस्मरण 'मण्टो मेरा दोस्त'। 'मण्टो मेरा दोस्त' इस्मत चुग़ताई एडेल्फ़ी चैम्बर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे घबराहट-सी हो रही थी, जैसे कभी इम्तिहान के हाल में दाख़िल होने से पहले हुआ करती थी। मुझे वैसे ही नए आदमियों से मिलते घबराहट हुआ करती थी, लेकिन यहाँ तो वो “नया आदमी” मण्टो था, जिससे मैं पहली बार मिलने जा रही थी। मेरी घबराहट वहशत की हदों को छूने लगी। मैंने शाहिद से कहा “चलो वापिस चलें, शायद मण्टो घर पर न हो।” मगर शाहिद ने मेरी उम्मीदों पर पानी फे...

अनिल जनविजय की कविताएं

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  अनिल जनविजय  अनिल जनविजय का जन्म 28 जुलाई 1957 को बरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी और फिर रूसी भाषा और साहित्य में एम.ए. किया। 1982 में उच्च अध्ययन के लिए सोवियत सरकार की छात्रवृत्ति पाकर मास्को विश्वविद्यालय पहुँचे और फिर 1989 में मास्को स्थित गोर्की लिटरेरी इंस्टीट्यूट से सर्जनात्मक लेखन में एम.ए. किया।  कविता लेखन की शुरुआत 1976 से हुई और जल्द ही पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होने लगे। 1982 में ‘कविता नहीं है यह’ काव्य-पुस्तिका और 1990 में ‘माँ, बापू कब आएँगे’ काव्य-संग्रह प्रकाशित हुआ। दूसरा काव्य-संग्रह ‘राम जी भली करें’ 2004 में प्रकाशित हुआ।  उनकी प्रतिष्ठा विदेशी कविताओं के अनुवादक के रूप में भी है। 2003 में येगेनी येव्तुशेंको की कविताओं का अनुवाद 'धूप खिली थी और रिमझिम वर्षा' शीर्षक से और 2004 में इवान बूनिन की कविताओं का अनुवाद 'चमकदार आसमानी आभा' शीर्षक से प्रकाशित हुई। रूसी कवियों के अलावे उन्होंने अफ़्रीकी, कोरियाई, जापानी, चीनी, अरबी, लातिनी अमेरिकी व इतालवी, फ़िलिस्तीनी, उक्राइनी, लातवियाई, लिथुआनियाई, उज़्बेकी, अरमेनियाई...