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हरे प्रकाश उपाध्याय की टिप्पणी 'दामोदर दत्त दीक्षित का सर्जक व्यक्तित्व'

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  हिन्दी साहित्य में एक ऐसा भी दौर दिखाई पड़ता है जब कुछ प्रमुख रचनाकार रचनात्मक गतिविधियों के अतिरिक्त प्रकाशन का कार्य भी सहजता से किया करते थे। भीषण महंगाई और जोड़ तोड़ के आज के समय को देख कर लगता है जैसे अब वह समय बीत गया। आज गिने चुने रचनाकार ही ऐसे हैं जो प्रकाशन कार्य से जुड़े हुए हैं।   हरे प्रकाश उपाध्याय हमारे समय के सुपरिचित कवि हैं। इससे इतर उनका एक और व्यक्तित्व प्रकाशक का भी है। वे लखनऊ से रश्मि प्रकाशन का संचालन करते हैं। इस प्रकाशन से उन्होंने कई जरूरी पुस्तकें प्रकाशित कर खुद को साबित किया है। प्रकाशन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें दूरदर्शिता के साथ साथ तकनीकी समझ की भी जरूरत पड़ती है। एक बेहतर प्रकाशक में इस दृष्टि का होना आवश्यक तो होता ही है कि क्या प्रकाशित किया जाए, इससे अधिक यह जरूरी होता है कि क्या न छापा जाए। दोयम दर्जे की किताबें प्रकाशित करने से प्रकाशक की छवि धुंधली होती है। प्रकाशन के साथ साथ हरे प्रकाश ने  सुपरिचित लेखक दामोदर दत्त दीक्षित के रचना संसार का चयन एवम सम्पादन भी किया है। इस सम्पादन के अन्तर्गत उन्होंने एक दीक्षित जी की रचन...