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पंकज मोहन का आलेख 'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'

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प्रेमचंद स्वाधीनता आन्दोलन केवल राजनीति के मोर्चे पर ही नहीं लड़ा गया। यह लड़ाई लेखन के जरिए भी लड़ी गई। प्रेमचंद ने लेखन के जरिए अपना काम किया। वे गांधी जी से प्रभावित थे। अपने आलेख में पंकज मोहन प्रेमचंद के उस कथन का जिक्र करते हैं जो राष्ट्रवाद की अवधारणा के बारे में है। अपने एक लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगें या सभी हरिजन होंगे।” आगे उन्होने यह भी जोड़ दिया कि “हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक जुए से भी, उस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।" प्रेमचंद ने अपने लेखन के जरिए वह प्रतिमान स्थापित किया जो अन्य लेखकों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। आज प्रेमचंद जयंती पर उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर हम पढ़ते हैं पंकज मोहन का आलेख  'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'। ...

मुत्सुमी मियामोतो की कविताएँ, हिन्दी अनुवाद : पंकज मोहन

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पंकज मोहन  आज के समय में जब छल छद्म का आधिक्य है, विद्वता का निर्लज्ज प्रदर्शन है, झूठ ही जीवन पद्धति बनती जा रही है, अविश्वास इतना कि विश्वास कर पाना कठिन है, कहीं तो कोई है जिस पर यकीन किया जा सकता है। कहीं तो कोई है जो चुपचाप बिना किसी अभिलाषा के अपना काम निरन्तर किए जा रहा है। कभी बेहतर लोगों की भरमार रही होगी, लेकिन आज के समय में तो ऐसे लोग अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं। पंकज मोहन ऐसे ही व्यक्ति हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है। जिनसे कुछ सीखा गुना जा सकता है। उनकी सादगी के क्या कहने। कल पंकज जी ने अपने जीवन के सत्तर वर्ष पूरे कर लिए। पहली बार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की विलम्बित बधाई। कुछ दिन पहले उन्होंने जापानी कवयित्री मुत्सुमी मियामोतो की कविताओं का उम्दा अनुवाद किया था। आज हम पंकज जी द्वारा अनुदित कविताओं को उन्हीं की एक टिप्पणी के साथ पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।   जापानी कवयित्री मुत्सुमी मियामोतो 1980 के दशक में, जब मैं सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी का छात्र था, मैंने कोरिया की कुछ प्रमुख साहित्यिक रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसी कारण कोर...

राहुल सांकृत्यायन के भोजपुरी नाटक "जपनिया राछछ" का पंकज मोहन द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद

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राहुल सांकृत्यायन  मानव इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध सबसे विनाशकारी युद्ध साबित हुआ। जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी राष्ट्रों ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। यूरोपीय तानाशाहों की तर्ज पर जापान ने तोजो के नेतृत्व में साम्राज्यवादी रुख अपनाते हुए 'एशिया एशियाइयों के लिए' जैसा नारा गढ़ दिया। ताकतवर होने के नाते समूचे एशिया पर कब्जा करना वह अपना अधिकार समझने लगा। इस समय उसने पूरी तरह से साम्राज्यवादी तौर तरीका अपना कर एशियाई देशों को रौंदना शुरू कर दिया। क्षेत्रफल के मामले में चीन के आगे जापान कहीं नहीं ठहरता, लेकिन बौने जापान ने चीन को 1904 में ही पराजित कर दिया।  1931 में जापान ने मंचूरिया पर कब्जा कर लिया और दुनिया देखती रह गई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने सिंगापुर, फिलीपींस, मलाया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, डच न्यू गिनी, वर्मा जैसे देशों पर कब्जा कर लिया। जापानी सेनाएं भारत में प्रवेश करने लगीं। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भोजपुरी नाटक 'जापानी राछछ' में जापान की इस साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा को उद्घाटित किया है। वैसे भी दुनिया के तमाम देशों में आज भी उ...

पंकज मोहन का आलेख 'मदिरा और मोमो : सातवीॅ सदी चीन के एक मंत्री के जीवन के उत्थान-पतन की कथा'

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  पंकज मोहन  थांग  राजवंश (618-907 ई.) चीन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और समृद्ध "स्वर्ण युग" था। यह  राजवंश  अपने मजबूत सैन्य बल, सफल कूटनीतिक संबंधों, सांस्कृतिक उत्कर्ष और महानगरीय संस्कृति के लिए जाना जाता है। इस काल में रेशम मार्ग फिर से खुला, कला और संस्कृति का पर्याप्त विकास हुआ। इसी समय चीन एक शक्तिशाली और विश्व-व्यापी साम्राज्य बना। चीन की एकमात्र महिला शासक, महारानी वू ज़ेटियन, भी इसी राजवंश के दौरान रहीं।  थांग राजवंश का नया इतिहास जिसे औ यांग-शियु ने सन 1060 में पूरा किया, में मा चौ नामक "गुदरी में लाल" की संक्षिप्त जीवनी संकलित है। 1620 में प्रकाशित "पुरानी और नई  कथाएं" नामक पुस्तक में मा चौ के जीवन की कहानी थोड़ा विस्तार से कही गई है। इस कहानी पर प्रकाश डाला है विख्यात इतिहासकार पंकज मोहन ने। पंकज मोहन चीनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विशेषज्ञ हैं।  तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  पंकज मोहन का आलेख 'मदिरा और मोमो : सातवीॅ सदी चीन के एक मंत्री के जीवन के उत्थान-पतन की कथा'।  'मदिरा और मोमो :  सातवीॅ सदी चीन के एक म...