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शिव प्रकाश त्रिपाठी का नयी दिल्ली के पुस्तक मेले पर रिपोर्ताज ‘बहुरि न आवहु हट्ट...’।

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नयी दिल्ली में हर वर्ष जनवरी का महीना पुस्तक-प्रेमियों के लिए ‘पुस्तक-मेले’ की सौगात ले आकर आता है। प्रकाशक इस अवसर पर अपनी विशिष्ट किताबों की श्रृंखला प्रकाशित और प्रस्तुत करते हैं। कई लेखक पुस्तक मेले की उत्सुकता से प्रतीक्षा इसलिए करते हैं क्यों कि मेले में उनकी किताब के आने और विमोचित होने का कार्यक्रम पहले से ही सुनिश्चित होता है। कई लेखक साल भर मेहनत की कमाई से प्रति महीने बचाए हुए अपने कोष से कुछ चुनिन्दा किताबें खरीदने के लिए आते हैं। और हमारे जैसे तमाम मित्र, अगर पारिवारिक व्यस्तताओं से समय निकाल पाए तो, (क्योंकि हम सबके लिए दिल्ली अक्सर दूर ही होती है) अपनी खाली ज़ेबें लिए घूमने-टहलने और मित्रों-परिचितों से मिलने के लिए मेले में पहुँच जाते हैं। युवा कवि शिव त्रिपाठी ने इस पुस्तक मेले पर एक उम्दा रिपोर्ताज़ लिख भेजा है। (रिपोर्ताज हिन्दी साहित्य की उन विधाओं में से एक है, जो पहले काफी लिखे जाते थे। लेकिन समय की मार रिपोर्ताज पर भी पड़ी है और अब तो कविता-कहानी-उपन्यास के मकड़जाल ने जैसे सारी विधाओं और रिपोर्ताज को जैसे लील सा लिया है।) शिव ने बड़ी रोचक शैली में यह रिपोर्ताज ...