तेजेंदर लूथरा
इकहरापन यहाँ से आगे नहीं जा पाऊँगा मैं, यहाँ सोच भी कुंद है, और मान्यताओं की गुफा भी बंद. यहाँ से आगे मुझे रोशनी भी नज़र नहीं आती, और यहाँ से आगे जाना, व्यवहारिक भी नहीं होगा. मुझ मे ताकत ही नहीं बची है, या मुझे बचपन से ही, ठीक से चलना नहीं सिखाया गया है, कसूर किसका है, बहस बेकार है. अब दो ही विकल्प बचे हैं मेरे पास, या तो यही खड़ा रहू अड़कर, जो भी हूँ जैसा भी बनकर और या झुक कर लेकर चोर दरवाज़ा पहुँच जाऊँ सबसे आगे. एक कम महत्व वाला आदमी हर घर, हर जगह, होता है एक काम महत्व वाला आदमी, वो बोलता नहीं, सिर्फ सुनता है, सिर्फ पूछने पर देता है जवाब, झिझक शंका रोज़ पूछती है उससे, तुम कहाँ बैठोगे? तुम्हारा कमरा आज क्या होगा? तुम्हारी चादर, तुम्हारा बिस्तर कब बदला जायेगा? आज तुम्हारा खाने-सोने का समय कितना खिसकेगा? इस बार तुमारी छुट्टी किसकी छुट्टी से कटेगी? अपने सारे सवालों के जवाबों में, वो एक कबाड़ी की तरह, कचरे में हाथ डाल-डाल कर, बाकी सबके बचे-छोड़े, कम महत्व के टुकड़ों को, अनचाहे मन से थोडे कम से, बोरी में भर लेता है आधी ...