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राजकिशोर राजन की कविताएँ

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राजकिशोर राजन  अक्षर और शब्द होते हुए वाक्य की यात्रा  हमें  भाषा की बारीकियों से अवगत कराती है। शब्द किसी भी भाषा की रीढ़ होते हैं जिनके प्रायः अलग-अलग मतलब होते हैं। हिन्दी में तो एक ही शब्द के कई कई पर्याय होते हैं हालांकि उनके प्रयोग के सन्दर्भ अलग-अलग ही होते हैं। एक ही शब्द को हर जगह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा भी होता है कि एक ही शब्द अलग-अलग भाषाओं में प्रयुक्त किया जाता है लेकिन उनके अभिप्राय अलग-अलग होते हैं। प्रजापति एक ऐसा ही शब्द है। हिन्दू धर्म में आमतौर पर यह शब्द ब्रह्मा के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें परम्परा के अनुसार सृष्टि का निर्माता माना जाता है। आजकल इस शब्द को कुम्हार लोग अपने जातिगत नाम के लिए प्रयुक्त करते हैं। वे भी तो निर्माण ही करते हैं। मिट्टी को सुन्दर बर्तनों के रूप में गढ़ डालते हैं। अपने विकास क्रम में मनुष्य ने सबसे पहले मिट्टी के बर्तनों को ही इस्तेमाल करना सीखा था। इक्कीसवीं सदी में भी आज हम मिट्टी के बर्तन प्रयुक्त करते हैं। धार्मिक कार्यों में आज भी मिट्टी के बर्तनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। बांग्ला में प्रजापति शब्द महिलाओं ...

राजकिशोर राजन की कविताएँ

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युवा कवि राजकिशोर राजन का एक नया कविता संग्रह 'कुशीनारा से गुजरते' हाल ही में बोधि प्रकाशन से आया है।  हम इस संग्रह की कविताएँ आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इन कविताओं के साथ कवि की अपनी बातें इस संग्रह और कविताओं के बारे में हैं। तो आइए रु-ब-रु होते हैं राजकिशोर राजन की कविताओं से। अपनी बात के बहाने कुछ बात किसी कविता संग्रह में ‘दो शब्द’ या ‘अपनी बात’ लिखना या पढ़ना मुझे प्रिय नहीं है चूँकि कविता ही अंततः ‘अपनी बात’ होती है। कविता स्वयं सब कुछ का भेद खोल देती है। परन्तु इस संग्रह की बात कुछ भिन्न है। विद्यार्थी जीवन में मैथिली शरण गुप्त की ‘यशोधरा’ कोर्स में था। उसे पढ़ कर महीनों बेचैन रहा था। ‘जायें सिद्धि वे पावें सुख से .............’ जैसी पंक्तियों से सीने में दर्द उभर जाता था। सिद्धार्थ के प्रति जहाँ रोष जनमता था वहीं यशोधरा के प्रति रह-रह भक्ति भाव उमड़ जाता था। अकसर सोचा करता कि कम से कम कह कर तो जाते। नहीं कहना था, नहीं सुनना था तो फिर विवाह ही क्यो किया? परन्तु जैसे-जैसे उम्र होती गयी और बौद्ध साहित्य पढ़ता रहा वैसे-वैसे पश्चाताप से घिरने लगा। यहाँ तो बात...

राजकिशोर राजन की कविताएँ

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राजकिशोर राजन दुःख और पीड़ा जब तक इस पृथिवी पर है तब तक बुद्ध का नाम भी जिन्दा रहेगा। एक कवि भी हमेशा इस दुःख और पीड़ा से संघर्ष करता है और इस तरह उस आम जन के पक्ष में खड़ा होता है जिसके दम पर इस दुनिया की हस्ती है। राजकिशोर राजन हमारे समय के ऐसे ही महत्वपूर्ण युवा कवि हैं जिन्होंने इन सवालों से टकराने की जद्दोजहद की है । इसकी आहट प्रत्यक्ष रूप से उनकी कविताओं में सुनी जा सकती है । पहली बार पर हम राजन की इसी अंदाज की कुछ नयी कविताएँ प्रस्तुत कर रहे हैं । तो आइए पढ़ते हैं राज किशोर राजन की नयी कविताएँ ।       कुशीनारा से गुजरते (बुद्ध की जीवनयात्रा पर आधारित कविताएं) राजकिशोर राजन राग अकस्मात् ही हुआ होगा कभी दबे पैर आया होगा ईर्ष्या-द्वेष घृणा-बैर आदि के साथ जीवन में राग फिर न पूछिए ! क्या हुआ ................... कुछ भी नहीं बचा बेदाग। दंगश्री पृथ्वी से ऊपर नहीं पृथ्वी पर ही है संभावना मुक्ति, आनंद की प्रेय और श्रेय की दंगश्री पर्वत की ओर उँगली उठा बुद्ध ने कहा था आकाश को और सदा से आकाश की ओर टकटकी लगाए मनुष्य को कहा लौटने को पृथ्वी पर दंगश्री, दंग है अब त...

राजकिशोर राजन

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राजकिशोर राजन पिता का नाम : स्व. राधाकृष्ण सिंह जन्म तिथि : 25.08.1967 शिक्षा : एम.ए (हिंदी) एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा प्रकाशित कृतियाँ : 'बस क्षण भर के लिए', 'नूरानी बाग' एवं ‘ढील हेरती लड़की’ काव्य पुस्तकें प्रकाशित । आरसी प्रसाद सिंह साहित्य सम्मान । बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा सम्मान एवं अन्य संगठनों द्वारा पुरस्कार । कुछ कविताओं का अंग्रेजी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद आजीविका टयूशन से लेकर अखबार तक अन्य : विगत डेढ़ दशक से देश के प्रतिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं - माध्यम, अक्षर पर्व, दस्तावेज, पाखी, वसुधा, जनसत्ता, हिन्दुस्तान आदि में कविताएं प्रकाशित । आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से कविताओं का प्रकाशन । रंगमंच के क्षेत्र में भी सक्रियता, कई नाटकों का लेखन व निर्देशन । कुछेक पत्रिकाओं का संपादन । संप्रति : राजभाषा विभाग, पूर्व मध्य रेल, हाजीपुर में कार्यरत । स्थायी निवास का पता : ग्राम - चाँदपरना, पोस्ट - सिधवलिया, जिला - गोपालगंज, बिहार - 841423 वर्तमान पता-   59 एल आई सी कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना - 800020. मोबाईल - 099...