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जय प्रकाश का आलेख 'कर्म और श्रम के प्रतिष्ठापक कृष्ण'

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  भारतीय मिथकीय परम्परा में कृष्ण एक ऐसे चरित्र के रूप में उभर कर सामने आते हैं जिनमें बिल्कुल सामान्य व्यक्ति को भी अपना बिम्ब दिखाई पड़ता है। वे कर्म के साथ साथ ज्ञान और भक्ति से भी जुड़े हैं। ये तीनों सूत्र ऐसे हैं जिनसे भारत का एक बड़ा समुदाय खुद को जुड़ा हुआ पाता है। कृष्ण जहां एक तरफ सूरदास और मीरा के आराध्य के रूप में दिखाई पड़ते हैं वहीं दूसरी तरफ रसखान और नजीर के भी प्रिय हैं। कृष्ण पर अपने एक आलेख में जय प्रकाश उचित ही लिखते हैं ' कृष्ण का व्यक्तित्व इतना सर्वव्यापी है। यदि सखा हो तो कृष्ण  जैसा, प्रेमी हो तो कृष्ण जैसा, गुरू हो कृष्ण जैसा। वह एक साथ नीति, कूटनीति, तत्वज्ञानी, दार्शनिक, कलाकार, राजनेता, योद्धा सब हैं। कृष्ण में अस्तित्व अपनी सम्पूर्णता में प्रकट है।' परम्परा के अनुसार आज कृष्ण के जन्म का दिन जन्माष्टमी है। इस पर्व की बधाई देते हुए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं  जय प्रकाश का आलेख 'कर्म और श्रम के प्रतिष्ठापक कृष्ण'। 'कर्म और श्रम के प्रतिष्ठापक कृष्ण'                           ...

जय प्रकाश की कविताएँ

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   जय प्रकाश  भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। लेकिन अभिव्यक्ति के इस माध्यम के साथ भी कई दिक्कतें हैं। आज सारी नैतिकताएं, सारी प्रतिबद्धताएं जैसे ताक पर रख दी गई हैं। इनका कोई मूल्य नहीं है। येन केन प्रकारेन अपना स्वार्थ साधना ही केन्द्र में है। आज झूठ का बाजार गरम है। यह झूठ इस तरह, इतने माध्यमों से और इतनी बार बोला जा रहा है कि यही सच लगने लगता है। अपना विवेक इस्तेमाल न किया जाए तो सच झूठ में फर्क कर पाना बहुत मुश्किल है। कवि जय प्रकाश इसकी तहकीकात करते हुए लिखते हैं - 'हम कितने शर्तों पर जीवन जीते हैं/ हमारे पास कितने मुखौटे है?/ भाषा में झूठ का हिस्सा कितना है?' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जय प्रकाश की कविताएँ।                    जय प्रकाश की कविताएँ       भाषा में झूठ का हिस्सा कितना है    एक मुक्ति की एषणा के पीछे कितने पिंजरे है!  सुख की चाह के पीछे कितने  कितने खामोश दुख!  एक मौन के पीछे कितने शब्द मुखर रहते हैं!  एक प्रेम के पीछे  कितनी प्रती...

जय प्रकाश का आलेख 'माया और मोक्ष के बीच का संतुलन : कुम्भ मेला'

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जय प्रकाश  महाकुम्भ के आयोजन में लोगों की बड़ी तादाद शामिल होती है। इस मेले में धर्म और अध्यात्म की बातें होती हैं। लेकिन मुख्य बात यह है कि इस तरह के आयोजनों से क्या कोई ऐसा सन्देश मिलता है जो राष्ट्रीय या वैश्विक समुदाय को कोई नई दिशा दे सके। क्या हम उस गन्दगी के प्रति थोड़ा भी जागरूक हो पाते हैं जिसके चलते आज हमारी पवित्र नदियों नाले की शक्ल में तब्दील हो चुकी हैं। महिलाओं के साथ जो राष्ट्रव्यापी हिंसा रोज ही होती रहती है क्या उसके प्रति हम लोगों को थोड़ा भी जागरूक कर पाते हैं। अगर जवाब खोजा जाए तो हमें निराशा ही होती है। इस बार महाकुम्भ विशेष के अन्तर्गत हम प्रस्तुत कर रहे हैं युवा कवि जय प्रकाश का आलेख। आज जय प्रकाश का जन्मदिन भी है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जय प्रकाश का आलेख 'माया और मोक्ष के बीच का संतुलन : कुम्भ मेला'। महाकुम्भ विशेष : 8 'माया और मोक्ष के बीच का संतुलन : कुम्भ मेला'                                     ...