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गणेश नारायण देवी से रमाशंकर सिंह की बातचीत

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गणेश नारायण देवी किसी भी व्यक्ति की निर्मिति में उसके परिवेश और परिस्थितियों का बड़ा हाथ होता है। इससे जो जीवन बनता है वह अनुभवजन्य होता है। गणेश नारायण देवी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं जिन्होंने जीवन को अपनी शर्तों पर जिया। उन्होंने मजदूरी की। पी एच. डी. किया। विदेश पढ़ने गए। विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने और एक समय के बाद उसे छोड़ भी दिया। इसके बाद भाषा के हवाले से संस्कृति की पड़ताल शुरू कर दिया। यह उनका जुनून ही था कि उन्होंने भारत की जीवित भाषाओं का दस्तावेजीकरण करने के लिए यह बड़ा अभियान चलाया। सर जॉर्ज ग्रियर्सन के बाद यह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है जो असाधारण है। भारतीय भाषा के सर्वेक्षण के इस मैराथन काम के लिए उन्होंने तीन हजार से अधिक शिक्षकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को जोड़ा। 2010 में उनके नेतृत्व में पीपल्स लिंग्विटिक सर्वे ऑफ इण्डिया ने भारत की 780 जीवित भाषाओं का सर्वेक्षण प्रकाशित किया।  गणेश देवी को साहि‍त्‍य एवं शि‍क्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2014 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इनकी समालोचना पुस्तक 'आफ़्टर ऐम्नीसिया : ट्रेडिशन एंड चेंज इन इ...

रमाशंकर सिंह की कविताएं

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  रमाशंकर सिंह सुख और दुःख जीवन के वे पहलू हैं जो हमें कभी खुशियों से भर देते हैं तो कभी गम के सागर में डूबा देते हैं। कवियों ने इस सुख दुःख को अपने तरह से विश्लेषित करने का प्रयास किया है। बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत ही है : "सब्बम दुखम"। इसका सामान्य सा अर्थ है "संसार दुःख से भरा है"। यह मानव जीवन की सार्वभौमिक प्रकृति को प्रदर्शित करता है।  बुद्ध ने दुख से मुक्ति के लिए ही अपने प्रख्यात सिद्धान्त 'अष्टांगिक मार्ग' का प्रतिपादन किया जिसे ' मध्यम मार्ग' भी कहा जाता है।  भक्ति सन्त  कबीर के पास सुख और दुःख के बारे में कई दोहे हैं। वे लिखते हैं  'सुखिया सब संसार है खायै अरु सोवै,  दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै' यानी जो सोया है उसके पास कोई चिन्ता नहीं। जो जागृत है उसे दुनिया को देख कर रोना पड़ता है। इस दुनिया में इतने लोग हैं और लोगों की समस्याएँ हैं कि अपना दुःख उसके आगे कुछ भी नहीं लगता। रमाशंकर सिंह एक कवि हैं साथ साथ इतिहासकार भी। वे अपनी एक कविता में तिरस्कृतों के सुख की चर्चा करते हैं। सुख की चर्चा तभी होती है जब दुख हो। और बा...

यतीश कुमार की समीक्षा नदी पुत्र- उत्तर भारत में निषाद और नदी

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नदियों से मनुष्य की पुरातन नातेदारी है। विश्व की सभी प्राचीनतम सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं। सिन्धु नदी के तटीय क्षेत्रों में हड़प्पा की सभ्यता अस्तित्व में आई, जिसने नगरीय सभ्यता के वे प्रतिमान रचे, जिसे देख कर आज भी आश्चर्य होता है।वैदिक काल में गंगा यमुना का विशाल मैदान अस्तित्व में आया जहां भारतीय संस्कृति की बुनियाद रखी गई। आज चाहें हमने जितनी प्रगति कर ली हो, लेकिन नदियों की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। रमाशंकर सिंह युवा शोधकर्ता हैं। हाल ही में इनकी एक शोधपरक किताब आई है 'नदी पुत्र'। इसके जरिए रमाशंकर ने उन नदीपुत्रों की विडंबनापूर्ण स्थिति पर प्रकाश डाला है जिनके जीवन यापन से नदी सभ्यता के आरम्भ से ही नाभिनालबद्ध रही है। यतीश कुमार ने नदी पुत्र पर एक गम्भीर नजर डाली है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रमाशंकर सिंह की किताब नदी पुत्र पर यतीश कुमार की समीक्षा। नदी पुत्र- उत्तर भारत में निषाद और नदी यतीश कुमार  संस्कृतियों का पहला पाठ है हमारी नदियाँ। इन नदियों के संग नालबद्ध निषाद प्रजाति का उदय विकास और पतन को क्रमबद्ध साधने की कोशिश है यह किताब। मनुष्य ...

रमाशंकर सिंह की कविताएँ

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  रमाशंकर सिंह समाज में ऐसे तमाम तबके हैं जिनकी इस दुनिया को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका है। यह अलग बात है कि ये तबके आमतौर पर साहित्य और इतिहास से विलग ही रखे गए। बदलते समय के साथ लेखन का रंग ढंग और मिजाज भी बदला है। सौन्दर्य को देखने परखने की दृष्टि भी बदली है। यह अनायास नहीं कि उपेक्षित वर्गों को आज साहित्य ही नहीं बल्कि समाज विज्ञान के क्षेत्रों में भी केन्द्रीय स्थान मिलने लगा है। रमाशंकर सिंह इतिहास के अध्येता हैं और मल्लाहों के जीवन पर इनका महत्त्वपूर्ण शोधकार्य है। रमाशंकर जनपक्षधर कवि हैं और इसके सरोकारों को लेकर कविताएँ लिख रहे हैं। शव ढोने वाले लोग हों या नगडची या फिर गोरु चरवाह, रमाशंकर की कविताओं में पूरा स्पेस पाते हैं। आज पहली बार पर प्रस्तुत है रमाशंकर सिंह की कविताएँ।   रमाशंकर सिंह की कविताएँ     शव ढोने वाले लोग     उनके लिए हर फोन करने वाला ग्राहक है भले ही उसकी आवाज़ रुँधी ही क्यों न हो     अस्पताल में मौत बिजली के आने-जाने जितना है सामान्य उनके लिए     वे मुस्तैदी से ले जाते हैं शव अस...