विमल चन्द्र पाण्डेय का आलेख 'मुठ्ठी में तक़दीर और आँखों में उम्मीदों की दिवाली'
ऐसा नहीं है कि हर भारतीय फिल्म को फालतू और खराब ही कह दिया जाए । ‘ बूट-पालिश ’ एक ऐसी फिल्म है जो एक उत्कृष्ट और यादगार फिल्म है । यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि ‘ वह उस निराशाजनक माहौल (जो आजादी के बाद चारों तरफ दिखने लगा था) में भी उस आशा की बात की करती है जिससे जीने की एक उम्मीद बची हुई है ।‘ कवि-कहानीकार मित्र विमल चन्द्र पाण्डेय ने एक पारखी नजर इस फिल्म पर डाली है और यह आलेख पहली बार के पाठकों के लिए तैयार किया है । तो आइए पढ़ते हैं यह आलेख । मुठ्ठी में तक़दीर और आँखों में उम्मीदों की दिवाली विमल चन्द्र पाण्डेय देश के १९४७ में आज़ाद होने से पहले माहौल कुछ इस तरह का बन गया था कि आज़ादी मिलते ही देश का कायाकल्प हो जायेगा। भुखमरी , सूखा , बाढ़ और बेरोज़गारी हर समस्या का एक ही इलाज़ नज़र आता था आजादी से उम्मीदें बहुत बढ़ गयी थीं और उनमें से ज़्यादातर झूठी थीं। बेसब्री से आजादी का इंतज़ार करते लोग जब तक ये समझ पाते कि सत्ता गोरे अंग्रेज़ों के हाथ से निकल कर काले अंग्रेज़ों के हाथ में चली गयी है। बह...