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'मार्कण्डेय की कथा का सम्पादकीय'।

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  किसी भी पत्रिका का सम्पादकीय उस पत्रिका की आत्मा के समान होती है। संपादकीय से ही पत्रिका की दृष्टि और उसकी बनक के बारे में पता चलता है। वैसे यह सम्पादकीय लिखना कभी भी आसान नहीं होता। प्रख्यात कथाकार मार्कण्डेय ' कथा ' जैसी सुविख्यात पत्रिका निकालते थे। 1969 ई. में कथा का पहला अंक प्रकाशित हुआ। यह क्रम आजीवन चलता रहा। अक्टूबर 2009 में कथा का 14 वां अंक छपा। कुल 42 सालों के बीच मात्र 14 अंक। एक अंतराल के बाद छपने पर भी पाठकों को ' कथा ' की प्रतीक्षा रहती थी। आज हम मार्कण्डेय के सम्पादन में प्रकाशित ' कथा ' के अंकों के सम्पादकीय को अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ' कथा ' के  पहले अंक से 14 वें अंक तक की सम्पादकीय को यथारूप प्रस्तुत किया गया है। इस सम्पादकीय से हमें उस समय और समय के प्रति सम्पादकीय चिन्ता की प्रतिध्वनि सुनायी पड़ती है। आज मार्कण्डेय की ग्यारहवीं पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें नमन करते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं ' मार्कण्डेय की कथा का सम्पादकीय ' ।   कथा, अंक-1 ,  सितम्बर नवम्बर  1969 कथा का प्रकाशन किसी सीमित ...