संदेश

विभूति नारायण राय लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुजीत कुमार सिंह का आलेख 'पचहत्तर के विभूति नारायण राय और जोकहरा का पुस्तकालय'

चित्र
  जोकहरा का पुस्तकालय किताबें इसलिए महत्त्वपूर्ण होती हैं कि यह किसी भी व्यक्ति के जीवन और सोच को बदल कर रख देती हैं। सामंती मानसिकता के चलते दुर्भाग्यवश उत्तर भारत में पढ़ने की संस्कृति का विकास ही नहीं हो पाया। घरों में पुस्तक के नाम पर 'रामचरितमानस' जरूर मिल जाती है लेकिन इसे भी लोग अक्सर लाल-पीले कपड़े में लपेट कर अगरबत्ती दिखाने तक सीमित कर देते हैं। इस जड़ स्थिति को बदलने के क्रम में विभूति नारायण ने जोकहरा में पुस्तकालय की स्थापना की। अपने प्रयासों से विभूति जी ने निहायत ही पिछड़े जोकहरा को साहित्यिक केन्द्र के रूप में बदल दिया। सुजीत कुमार सिंह विद्यार्थी जीवन से ही इस पुस्तकालय से जुड़े रहे हैं और उनकी मिली जुली स्मृतियां हैं। अपने संस्मरण में सुजीत लिखते हैं : ' विभूति नारायण राय चाहते तो यह पुस्तकालय इलाहाबाद या आज़मगढ़ जैसे शहर में स्थापित कर सकते थे। कुछ पढ़े-लिखे लोग आलोचना करते थे कि विभूति जी को जोकहरा में पुस्तकालय नहीं खोलना चाहिए था। लेकिन भारत के गांव अब भी बहुत ही पिछड़े हुए हैं। तैंतीस साल पहले इस तरह का स्वप्न देखना और उसे साकार करना एक तरह की क्रांति ह...

विभूति नारायण राय का आलेख 'कश्मीर फाइल्स का सच'

चित्र
विभूति नारायण राय पूर्व आई पी एस एवम पूर्व कुलपति हैं, राय साहब कश्मीर में उस समय पोस्टेड थे, जब वहाँ उथल पुथल का दौर चल रहा था। हाल ही में बनी फ़िल्म 'द कश्मीर फाइल्स' काफी चर्चित रही है और आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। इस फ़िल्म को ले कर उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण बातें रखी हैं। आज पहली बार पर प्रस्तुत है विभूति नारायण राय का आलेख 'कश्मीर फाइल्स का सच'।   ' कश्मीर फाइल्स का सच   विभूति नारायण राय  दुनिया की सबसे खूबसूरत फिल्में नरसंहार और उससे उपजे विस्थापन को ले कर बनी हैं। विस्थापन है भी ऐसा विषय, जो कहानी, कविता, नाटक, फिल्म- गरज यह कि रचनात्मकता की हर विधा के सर्जक के समक्ष चुनौती की तरह आता है। इस चुनौती को स्वीकार करने में अपने कुछ जोखिम भी हैं। बहुत कम रचनाकार, जिनमें फिल्म निर्माता भी शामिल हैं, इस परीक्षा में खरे उतरते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण नि:संगता का अभाव है, जिसकी अपेक्षा इस संवेदनशील विषय को रहती है। द कश्मीर फाइल्स, जो इन दिनों विवादों के घेरे में है, इसी नि:संगता की कमी के कारण एक औसत मुंबइया फिल्म बन कर रह गई है। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए 1993-94...