ममता कालिया के साथ अनुज की एक बातचीत
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| ममता कालिया के साथ बात करते हुए अनुज |
ममता कालिया के साथ अनुज की एक बातचीत
“हिंदी साहित्य का यह दुर्भाग्य है कि लेखिकाएँ अपने लेखन से ज़्यादा, अपनी जीवन शैली के लिए चर्चित होती हैं...”
- ममता कालिया
अनुज : ममता जी, नमस्कार।
ममता कालिया : जी, नमस्कार।
अनुज : आप हिन्दी की मशहूर लेखिका हैं, आपका परिचय देना, सूरज को दिन की परिभाषा बताने जैसा है। अभी हाल ही में, आपके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। शंकर जी की यह योजना है कि ‘परिकथा’ के अगले अंक में आपका एक साक्षात्कार प्रकाशित किया जाए।
ममता कालिया : शंकर जी बिना किसी शोर-शराबे के चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। वे साहित्य की बड़ी सेवा कर रहे हैं। मैंने 'परिकथा' में पिछली बार कुछ लिखा था, इसका 111वाँ अंक था। उस पूरे अंक में कई चीज़ें बहुत अच्छी थीं, पता नहीं कैसे उन्हें इतनी अच्छी-अच्छी सामग्री मिल भी जाती है।
अनुज : शंकर जी ने इस साक्षात्कार की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी है। लेकिन मैं यहाँ आपका कोई साक्षात्कार लेने नहीं आया हूँ, हम लोग बस एक बातचीत करेंगे।
ममता कालिया : चलो ठीक है, बहुत अच्छा लगा। कम-से-कम तुम इसी बहाने यहाँ आए तो सही। मुझे याद है, रवि के समय तुम यहाँ आए थे। शंकर जी को पहली बार तुम ही यहाँ ले कर आए थे। गीताश्री को भी तो यहाँ पहली बार तुम्हीं ले कर आए थे। वंदना भी थी।
अनुज : हाँ, मुझे याद है। सन 2012-13 के आस पास की बात होगी।
ममता कालिया : और उस दिन उस लड़की को भी तुम्हीं ले कर आए थे, जो आज मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने पर... मेरे ख़िलाफ़ फ़ेसबुक पर ख़ूब विष वमन कर रही है... (फिर जोर-जोर से ठहाके लगा कर हँसने लगती हैं।)
अनुज : यह तो बहुत गलत बात है। यह सुन कर मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। साहित्य में लोग सीनियर-जूनियर का बिल्कुल ख्याल नहीं रखते! इस बात पर एक शे’र याद आ रहा है, किसी शायर ने कहा कि ‘ये अदब वाले, बड़े बे-अदब होते हैं।’ (फिर दोनों लोग हँसने लगते हैं)
ममता कालिया (ख़ूब खुश हो कर) : आज याद करती हूँ, जब तुम शंकर जी को ले कर आए थे। वह क्या जमाना था! शंकर जी तब भी वैसे ही थे और आज भी वैसे ही हैं। अपनी धुन के पक्के। जानते हो अनुज, शंकर जी की रवि बहुत इज़्ज़त करते थे और उनकी बहुत तारीफ किया करते थे। अक्सर मुझसे कहते थे कि — "शंकर जी के लिए कभी मना मत करना, कोई रचना माँगे तो दे देना।" वो बहुत अच्छे इंसान हैं, बहुत 'सोबर' इंसान हैं। ‘मुझे याद है कि एक बार शंकर जी जमशेदपुर के एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। वे थोड़ा सा ही बोले, लेकिन इतना अच्छा बोले कि सब दंग रह गए। उनकी गंभीरता मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेखकों में जो बड़बोलापन होता है ना, वो उनके अंदर रत्ती भर नहीं है। वो अपने आप को हमेशा पीछे रखते हैं, कभी अपनी मार्केटिंग नहीं करते। नहीं तो, कई संपादक तो ये करते हैं कि अपनी पत्रिका में अपने ऊपर ही 40 पन्ने का लेख डाल देते हैं। वे कभी ऐसा नहीं करते। और अपनी पत्रिका में भी नहीं करते। 'परिकथा' उनकी अपनी पत्रिका है, लेकिन उसमें भी वे जबरदस्ती कई लोगों को जगह दिए रहते हैं।
अनुज : ममता जी, सबसे पहले मैं आपको ‘परिकथा’ की ओर से साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए खूब सारी बधाई देता हूँ।
ममता कालिया : जी, बहुत-बहुत धन्यवाद आपका।
अनुज : ममता जी, बहुत सारे पाठकों से मेरी बातचीत हुई है। प्रायः लोगों ने यह माना है कि आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने में बहुत देर हुई है। यह आपको बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। आप क्या कहती हैं?
ममता कालिया : यह तो साहित्य अकादमी जाने, लेकिन यह ज़रूर है कि देर बहुत हुई। और जब किसी चीज़ में बहुत देर हो जाती है, तो देखिए उसकी उम्मीद भी कमज़ोर पड़ जाती है। अब मिल गया तो ठीक है, हम तो सत्तर साल से लिख रहे हैं और लिखते ही रहते हैं, न मिलता तो भी लिखते रहते। क्योंकि लेखक का धर्म यही है और उसका मनोरंजन भी यही है।
अनुज : साहित्य में किसी लेखक के लिए पुरस्कार का कितना महत्व होता है?
ममता कालिया : देखिए, पुरस्कार इस रूप में महत्वपूर्ण होता है कि लोग थोड़ा सा आपसे बात करने की प्रवृत्ति दिखाते हैं, एक झुकाव पैदा होता है कि आपसे बात करें। नहीं तो लेखक बहुत एकाकी प्राणी होता है। लेखन भी बहुत एकाकी कला है। आप चुपचाप एक कमरे में बैठे हैं, और आप लिखे जा रहे हैं, आपको कुछ नहीं पता इसका हश्र क्या होगा। एक ज़माने में पत्रिकाएं निकलती थीं, तो संपादक का हमारे पास पत्र आता था कि आपकी रचना स्वीकृत हो गई है और इस अंक में आएगी, तो बहुत अच्छा लगता था। छपने में भले ही छह महीने लगें, लेकिन वह समय 'भरा-भरा' लगता था कि हमारी रचना वहाँ आएगी। एक उम्मीद और एक इंतज़ार दोनों बनता था। अब वो सब खत्म हो चुका है। अब बड़ी पत्रिकाएं तो सब खत्म हो गई हैं। कुछ एक पत्रिकाएं लोगों के इंडिविजुअल एफर्ट से निकल रही हैं जैसे 'परिकथा' है, 'हंस' है, 'तद्भव' है। कुछ एक पत्रिकाएं बची हैं। तो अब लिखने का स्कोप कहाँ बचा है। लिखने की जगहें बहुत कम होती जा रही हैं। एक लेखक के लिए पुरस्कार का बस यही महत्त्व है कि जिन लोगों ने आपका नाम नहीं सुना है, वे सुन लेते हैं और जिन्होंने आपको नहीं पढ़ा है, शायद वे कभी-कभी किताब भी खरीद लेते हैं। इस सबसे लिखने-पढ़ने को थोड़ा सा बढ़ावा मिलता है। मेरे लिए पुरस्कार का यही महत्त्व है।
अनुज : आप कह रही हैं कि अब लिखने का स्कोप नहीं बचा, लेकिन अभी तो सब कुछ डिजिटल हो गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तो और ज़्यादा दूर तक आपकी रीच बढ़ जाती है। छपने के लिए आसमान बड़ा हो जाता है!
ममता कालिया : वह रीच स्क्रॉल करने भर तक ही होता है। हमने देखा, स्क्रॉल करते गए, करते गए, और एट द एंड ऑफ़ द डे, हम सो गए। उसमें आप किसी भी चीज़ में गहरे नहीं उतरते हैं। और गहरे उतरने के लिए सोशल मीडिया नहीं है। वो आपको छिटपुट जानकारी देता है। आप गूगल में जाइए, प्रेमचंद के ऊपर चार लाइनें या दस लाइनें लिखी हुई हैं। आप उसका क्या करेंगे? उतना तो आप दर्जा पांच में पढ़ चुके। तो आप ये देखिए कि सोशल मीडिया ने विस्तार किया है, लेकिन उसने उस विस्तार में गहराई नहीं डाली है, पठनीयता नहीं डाली है, खाली सूचना। सूचना-सूचना, इसका क्या करोगे? इतनी सूचना इकट्ठी हो गई है हर एक के बारे में, चाहे विदेशी लेखक हो, चाहे देश का लेखक हो, हमारे पास सूचनाओं का इतना अंबार लग गया है, इन सूचनाओं का हम करेंगे क्या...?
अनुज : आपको क्या लगता है, इसमें क्या होना चाहिए?
ममता कालिया : मुझे लगता है, देखिए कभी-कभी कोई समझदारी की पोस्ट आती है, तो लोग उसे पढ़ते हैं, ध्यान देते हैं। अगर कोई अच्छी बात लिखी हो। आज भी लोग जानना चाहते हैं कि भाई सिल्विया प्लाथ की मृत्यु हुई तो कैसे हुई? समझ रहे हैं ना? या किन स्थितियों में लेखक भुवनेश्वर मरे हुए स्टेशन पर मिले थे। ये सारी बातें जो हैं, एक तरह से साहित्य की निधि भी हैं और चेतावनी भी हैं। तो मुझे तो ये लगता है कि साहित्य की इन चीज़ों के बारे में अगर बताए सोशल मीडिया, तो लोग ज़्यादा एजुकेट होंगे। क्योंकि उन्हें पता चलेगा मज़ाज़ कैसे खत्म हुए। आखिर एक लेखक की एक यात्रा होती है, लेखन की एक यात्रा होती है, उसमें कहाँ वो गड्ढे में गिरा, कहाँ वो ऊपर उठा, कुछ तो पता चलना चाहिए। ये क्या कि आपने बता दिया इस सन में पैदा हुए थे, इस सन में मरे, सन भी गलत लिखते हैं। कई बार तो जो जीवित है उसको दिवंगत लिख देते हैं, दिवंगत को जीवित लिख देते हैं। तो ये सारी घटनाएं इसी माध्यम में होनी थी और इसी युग में होनी थी जब अभी हम लोग बैठे हैं, ये बताने के लिए कि कौन किस सन में गया।
अनुज : आपके पति रवींद्र कालिया जी भी बहुत अच्छे लेखक थे। फिर साहित्य के इस बीहड़ में, दो-दो शेर इतने दिनों तक साथ-साथ रहे कैसे, यह संभव कैसे हुआ?
ममता कालिया (हँसते हुए) : वो इसलिए, देखिए अनुज, होता ये है कि जब शेर एक दूसरे की ताकत को पहचान लेते हैं ना, तो हमला नहीं करते। तो हमारे बीच में सबसे अच्छी समझ ये थी कि हम मिले भी लेखक की तरह से ही थे। लड़ते-भिड़ते मिले थे, लेकिन फिर हमारा समझौता हो गया, कि ठीक है, तुम लिखते हो, तो हम भी लिखते हैं। और रवि ने कभी भी इसको ईगो का प्रश्न नहीं बनाया। रवि के लिए लिखना एक मनोरंजन था और उनके लिए लिखना जीने का एक तरीका था। उनके सारे दोस्त ही लेखक थे। लेखक थे, संपादक थे और बेरोज़गार लोग थे। इस तरह के लोग उनके दोस्त थे, जो संघर्षशील लोग थे, वे उनके दोस्त थे। जो बहुत ज्यादा सेट्ल्ड लोग थे, उनसे हम लोगों की बनती नहीं थी। और मेरा यह था कि मैं छोटी-मोटी नौकरी करती थी, जिसमें ‘ईगो’ का सवाल ही नहीं अँटता। क्योंकि कॉलेज में इतनी समस्यायें होती थीं कि मैं उनसे निजात पाने के लिए लिखती थी। कॉलेज में जो होता है होता रहे, वहाँ से चार बजे निकले फिर आप अपने घर में तो बादशाह हैं। यहाँ पर कोई नहीं है हमें कुछ कहने वाला। और वाकई हमारे घर में कोई टोका-टाकी नहीं थी। विभूति नारायण राय ने अपने संस्मरण में लिखा है कि यदि मैंने कहीं लोकतंत्र देखा है तो हमारे घर में देखा, इसमें सचमुच कोई अतिश्योक्ति नहीं है। वाकई में मेरे घर में इतना लोकतंत्र था कि मैं यदि यह तय कर लूँ कि मुझे कुछ नहीं करना है, मुझे बस लिखना है तो मुझे कोई तंग नहीं करता था। बच्चे छोटे-छोटे थे, शोर मचाते रहते थे, लेकिन रवि मुझे कभी डिस्टर्ब नहीं करते थे। उनके कोई दोस्त आते थे तो मैं ही नीचे आ जाती थी क्योंकि उनके जो दोस्त थे, वे मेरे भी दोस्त थे, वैसे उनके दुश्मन मेरे दुश्मन नहीं थे।
अनुज : अच्छा, मैंने सुना है कि रवीन्द्र कालिया जी ने आपको चलती बस में प्रपोज किया था?
ममता कालिया : नहीं, प्रपोज नहीं किया था, वह पहली मुलाकात थी। 30 जनवरी 1965 की रात थी। जब हम चंडीगढ़ से लौट रहे थे, करनाल में बस खराब हो गई थी। हमारी पहली मुलाकात थी और वे रास्ते भर लगातार मेरे ऊपर अटैक करते आए थे। हम दोनों अजनबी थे एक दूसरे के लिए। उन्होंने मेरी अकविताएं पढ़ रखी थीं, जो प्रारंभ में छपी थीं और मैंने उनकी दो-तीन कहानियां पढ़ी थीं, जो सब पत्नी के बारे में थीं। तो मैं सोचती थी, ये विवाहित आदमी है, इससे कौन मगज़मारी करे और मैं ज़रा भी अपना टाइम वेस्ट नहीं करना चाहती थी। मेरी बस इस बात में दिलचस्पी थी कि मैं घर पहुँच जाऊँ, क्योंकि अगले दिन कॉलेज था। खूब ठंड थी। इतनी तेज़ ठंड थी कि हम लोग सिर्फ चाय लेते रहे और रवींद्र सिगरेट पीते जा रहे थे, क्योंकि वे चेन स्मोकर थे। उनकी सिगरेट से भी थोड़ी सी गर्मी मिल रही थी और उनकी बातों से भी। और लगातार बातें हो रही थीं। मैं जिन-जिन लेखकों को पसन्द करती थी, वे लगातार उन सबको ज़ीरो बता रहे हैं। इस पर मुझे बड़ा गुस्सा आ रहा था। फिर जब उन्होंने मुझसे ये कहा कि "आप क्या सिर्फ़ कविता-वविता ही लिखती हैं? कहानी नहीं लिखतीं?" तब मुझे उनके ऊपर और बहुत तेज़ गुस्सा आया। मैंने कहा, ये आदमी अपने आप को समझता क्या है? इसने तीन कहानियां क्या लिख दी हैं, तो ये अपने को बहुत बड़ा कहानीकार समझने लगा है! और तब तक मेरी बहुत कहानियां छप चुकी थीं 'लहर' में, 'ज्ञानोदय' में, क्योंकि वहाँ के संपादक माँगते थे, और हम कहानी लिख देते थे। लेकिन वह शौकिया लेखन था। हम गंभीर नहीं थे कहानी को ले कर, हम कविता को ले कर गंभीर थे। अकविता के बाद इतनी जघन्य हो गयी कविता कि हम खुद ही डर गये कि अभी शादी भी नहीं हुई है और ये कवितायें गले पड़ गयीं तो क्या होगा। हालत तो यह थी कि जिस दिन मेरी शादी हुई, उस दिन मेरे ही मित्र कविता पोस्टर पर लगा कर दिखा रहे थे, कि "आज प्यार शब्द घिसते-घिसते चपटा हो गया है, अब हमारी समझ में सहवास आता है...।" और मुझे सहवास का मतलब भी मालूम नहीं था। और वहाँ मेरी कविता शादी में दिखायी जा रही थी। मैंने सोचा कि मेरे पापा देखेंगे तो क्या सोचेंगे, वे बेचारे सीधे-सादे सरकारी आदमी। वे भीरु बहुत थे, डरते थे कि इज्जत ना खतम हो जाए, लेखकों के बीच में लड़की जा रही है। जितने बाराती थे, वे सब लेखक ही आए थे। हालाँकि पापा आकाशवाणी में थे और उनका बहुत लेखको से संबंध था, लेकिन फिर भी उनका था कि वे समझते थे कि लेखक जो हैं, वे बहुत वफादार किस्म के लोग नहीं होते हैं। यह समझते थे वे। मेरे घर में लेखकों के बहुत नम्बर कटे हुए थे।
अनुज : आप अपने जन्म और बचपन के बारे में कुछ बताइये।
ममता कालिया : जन्म तो जहाँ होना था, हो गया 1940 में। जब हमारी मां को दिन चढ़े और उनको दिखाया गया डॉक्टर को, मथुरा में, वे जॉइंट फैमिली में रहती थीं। पापा उस समय आगरा में एम. ए. कर रहे थे और ट्यूशन पढ़ाते थे। इंग्लिश सब्जेक्ट का उस समय भी बहुत बोलबाला था। तो अपने बच्चों को अच्छी इंग्लिश सिखाने के लिए लोग ट्यूटर रखते थे। तो पापा का गुज़ारा चल जाता था। एक साइकिल थी उनके पास। पापा तो थे आगरा में और मम्मी सास-ससुर के पास मथुरा में थी। तो डॉक्टर ने कह दिया कि हम नहीं कर सकते, ये नॉर्मल डिलीवरी नहीं होगी। इनका तो सिजेरियन करना होगा। वहाँ सिजेरियन को 'पेट चाक करना' कहते थे। माँ दुबली थी, और कमज़ोर बहुत थी। डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिए मथुरा में। तो वृन्दावन में एक हॉस्पिटल था 'कनाडियन मिशन हॉस्पिटल'। अभी भी है वो। उस समय छोटा था, अब बड़ा हो गया है। तो हम दोनों बहनें कनाडियन मिशन हॉस्पिटल में पेट चाक से पैदा हुए थे, सिजेरियन बेबीज़ हैं हम। अब आज तो यह कॉमन बात हो गई है, हर बच्चा सिजेरियन बेबी ही है। उस ज़माने में तो बहुत बड़ी बात थी। सब कहने लगे, सिजेरियन से हुई, तो भी छोरी ही हुई...!
अनुज : आप तो दिल्ली में ही रही हैं, पली-बढ़ी भी यही हैं?
ममता कालिया : जब मैं दस महीने की थी, पापा दिल्ली आ गए थे। वे 'कॉमर्स कॉलेज' में लेक्चरर थे, जिसे अभी एसआरसीसी के नाम से जानते हैं। मथुरा में मेरे बाबा चाहते थे कि पापा नौकरी न करें, बल्कि घर का काम देखें, पर पापा दिल्ली आ गए। बचपन में मुझे चेचक हो गया था। हालत इतनी खराब थी कि डॉक्टर ने कह दिया था कि अगर यह बच भी गई तो अंधी, बहरी या गूँगी होगी। मम्मी तो कहती थीं कि इससे तो मर जाना अच्छा है, पर पापा का एटीट्यूड मेरे प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक और टॉलरेंट रहा था।
अनुज : विवाह के बाद का जीवन कैसा रहा?
ममता कालिया : विवाह के बाद जीवन संतुलित नहीं रहा। मतलब पारिवारिक जीवन बहुत खराब रहा, कहने को प्रेम विवाह था हमारा, लेकिन हमारे तो इन-लॉज़ हमारे साथ ही आ गए रहने के लिए। तो फिर कॉम्प्लीकेशन्स हुए जो कल्चरल किस्म के थे। जो खाना मुझे बनाना नहीं आता था, वे कहा करते कि वह बनाओ, और जो खाना मुझे पसंद था, वे उस खाने को छूते भी नहीं थे। कहते थे, यह तो हमारे यहाँ पशु खाते हैं। जैसे अरहर की दाल है। वे कहते कि अरहर की दाल हमारे यहाँ जानवरों को खिलाई जाती है। अगर उग गई खेत में, तो जानवर को डाल दी जाती है। पंजाब में कोई नहीं खाता। वहाँ सब उड़द की दाल खाते हैं, साबुत उड़द खाते हैं, राजमा खाते हैं, छोले खाते हैं। तो हमारे घर में आनी ही बंद हो गई थी ये दालें जो मैं खाती थी - मूंग की दाल, अरहर और मसूर की दाल।
अनुज : रवीन्द्र कालिया का आपके प्रति कैसा रूख रहता था?
ममता कालिया : रवि का ये था कि वे एक तरफ तो मेरे प्रेमी थे, लेकिन दूसरी तरफ अपनी माँ के भी बहुत प्रेमी थे। हर हिन्दुस्तानी पुरुष की तरह, वे भी अपनी माँ को बहुत प्रेम करते थे। मैंने देखा है सबका यही है, जब शादी हो जाती है तो मां के प्रति प्रेम बहुत जागता है। तब तक चाहे कैसा भी रह लें, लेकिन मां के प्रति सबसे ज़्यादा वफादारी शादी के बाद ही पैदा होती है। वे भी यही कहते, कुछ भी हो जाए, मेरी मां का ध्यान रखना। तो यह एक प्राइस टैग रवींद्र ने भी लगा दी थी। लेकिन मैं उसके बावजूद अपना रास्ता निकाल लेती थी, क्योंकि मैं रात के 10 बजे के बाद लिखती थी, जब सब सो जाते थे।
अनुज : तो क्या आपके उपन्यास 'बेघर' में जो मानसिक विस्थापन दिखता है, वह इन्ही परिस्थितियों की उपज थी या यह विशुद्ध आपकी कल्पना थी?
ममता कालिया : देखिए, उसमें मेरे पर्सनल परिवार का कोई मतलब नहीं है। उसमें सिर्फ दूसरे-दूसरे लोग हैं। इसमें जो संजीवनी का कैरेक्टर है। मुझे एक लड़की मिली थी। कांता बेन नाम था उसका।
अनुज : अच्छा ऐसा कैरेक्टर मिला है आपको, तब तो परमजीत भी होगा?
ममता कालिया : मैं तो उस समय पन्द्रह साल की थी। मेरी बहन का प्रेम प्रसंग चल रहा था, एयर फोर्स के एक लड़के से। दोनों शाम में घूमने निकलते थे। वह मुझसे बड़ी थी। हमारे घर में इसको बुरा नहीं मानते थे। तो वह जो कांता बेन मिली थी, उसने मेरी माँ को कहा कि, ‘अपनी बेटी को कहो कि धीरे चले, लड़का लोग दोस्ती करेगा, साथ घूमेगा, घर ले कर जाएगा, लेकिन शादी नहीं बनाएगा..।’ वह खुद प्रेम में धोखा खायी हुई थी। उसे जो लड़का मिला था वह उसके साथ घूमा-फिरा, शॉपिंग की, साथ रहा, लेकिन अंत समय में एकदम से पीछे हट गया। कहा कि ‘ऐसी लड़की के साथ मैं शादी क्यों करुँगा जो रोज़ मेरे साथ घूमने जाती थी।’
अनुज : अच्छा वह जो संजीवनी और परमजीत हैं, वे... (ममता जी बीच में ही बात काट देती हैं और फिर बोलने लगती हैं)
ममता कालिया : ...देखिए परमजीत भी संजीवनी से वही एक्सपेक्ट कर रहा है जो उसके पहले ब्वॉय फ्रेंड ने एक्सपेक्ट किया। वह उसको शादी के पहले ऑफिस क्यों ले कर जाता था। तो संजीवनी प्रेम में पागल हो कर चली गयी उसके साथ। और एक उम्र होती है, एक मोमेंट होता है, आप ना नहीं कर पाते। तो सारा का सारा जो सेट अप है, वह आपके माइंड सेट को बताता है कि एक तरफ तो आपको प्रेमिका चाहिए, और दूसरी तरफ आप चाहते हैं कि उसे किसी ने टच नहीं किया हो। दोनों बातें कैसे हो सकती हैं? और फिर वह उसे छोड़ देता है, और पोटैटो की तरह छोड़ देता है। और एक टेक्निकल लड़की से शादी कर लेता है, रमा। वह जो रमा है, वह हमारे एक फ्रैंड की पत्नी थी, पंजाबी परिवार था। मेरी पहचान के दिल्ली में बहुत पंजाबी परिवार थे, उसमें रवीन्द्र का परिवार भी एक था। रवीन्द्र के परिवार में संकीर्णता नहीं थी। ऐसा ही एक परिवार था। वे पान मसाला खाते हुए मर गये। पान मसाला जा कर उनके विंड पाइप में फँस गया और वे मर गए। उनकी वाइफ थी, टिपिकल पंजाबी औरत, खूब मोटी सी, चटक-मटक दुपट्टे और सलवार कमीज पहनने वाली, वह अमृतसर में नौकरी करती थी, उसके पति मुंबई में नौकरी करते थे, वह अपने पति के साथ कभी नहीं रहती थी। कभी-कभी आती थी। वह पति पर शक भी करती थी। वह बिना बताये आधी रात में पहुँचती थी। और आ कर सबसे पहले सब दरवाजे खोल-खोल कर देखती थी कि कोई है तो नहीं अंदर में। तो ‘बेघर’ में 'रमा' की जो कैरेक्टर है, वह वही है, टेक्निकली प्योर, लेकिन बाकी दिमाग एकदम कूड़ेदान। तो मेरे दिमाग के ऊपर उसका बहुत असर पड़ा। मेरी भी उस समय क्या उम्र थी, मैंने जब उन लोगों को देखा था तो मैं 24 साल की थी। जब ‘बेघर’ लिखा तब तक तो मैं 29 की हो गई थी, लेकिन ये मेरे दिमाग में चक्कर लगा रहे थे ये लोग।
अनुज : ‘बेघर’ तो 1971 की रचना है।
ममता कालिया : हाँ, ये '71 में छप गया था। ये मैंने लिखी तो थी 1969 में, हॉस्टल में रहते हुए शुरू किया था। बॉम्बे में मैं हॉस्टल में थी और तब मैं कहानियां लिखती थी, मेरी कहानियाँ 'धर्मयुग' में छप जाती थीं, 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' में छपती थीं। एक दिन मैंने रवि को एसटीडी कॉल पर कहा कि "भाई, मेरा टाइम नहीं बीतता, मैं क्या करूं? मतलब बड़ी बोर होती हूँ हॉस्टल में।" तो उन्होंने कहा "तुम नॉवेल लिखो।" अब रवींद्र ने कह दिया नॉवेल लिखो, तो मैंने नॉवेल लिखना शुरू कर दिया। और वही सारे लोग हैं। एक बहुत अच्छा स्मार्ट लड़का था खोसला, वो सारा समय घोड़ों के पीछे रहता था। तो इसमें भी एक कैरेक्टर आता है 'वलिया', वो घोड़ों के ही पीछे लगा रहता है। उसने इतना रजिस्टर बना रखा था, एक-एक घोड़े की उसने जन्मपत्री बना रखी थी, ये कब दौड़ा, इसके घुटने मिलते हैं तो ये अच्छा दौड़ता है कि कम दौड़ता है, सारा उसने लिख रखा था। और वह हम लोग को दिखाता था, दो पैग पीने के बाद रजिस्टर ले आता था। तो एक-एक घोड़े के बारे में बताता था। फिर मुझे कहता "ममता तुम चलो इस बार, तुम चलोगी तो जीतेंगे रेस।"
अनुज : उन दिनों आप मुंबई में रहती थीं।
ममता कालिया : हाँ...।
अनुज : मुंबई और दिल्ली में आप क्या अंतर देखती हैं?
ममता कालिया : मुंबई में आपको लोगों की वैराइटी बहुत मिलती है। दिल्ली में मैंने देखा लोगों के क्लोन हैं। सब एक तरह से दिखने वाले लोग हैं, जैसे क्लोन हों। इस कॉलोनी में आप जिससे बात कीजिए बस नंबर का फर्क है, 303 की जगह आप 308 में चले जाइए, या 803 में चले जाइए, सब जगह एक जैसे लोग मिलेंगे, प्रोटोटाइप्स सारे। लेकिन मुंबई में वैराइटी बहुत थी। एक तो रवींद्र की फितरत ऐसी थी कि रवींद्र के सारे दोस्त बन जाते थे।
अनुज : आप मुंबई में तो रही हीं, कोलकाता में भी रहीं, दिल्ली में रहीं, इलाहाबाद में रहीं... और आपने लगभग अपने संस्मरणों में सबको याद किया है। आपको अपनी रचना में सबसे अच्छी रचना कौन सी लगती है? हालांकि किसी लेखक से यह पूछना तो बेमानी बात है, लेकिन फिर भी पूछ रहा हूँ?
ममता कालिया : अब ये तो नहीं कहूँगी मैं कि 'जीते जी इलाहाबाद' मुझे सबसे अच्छी लगती है। वो ठीक है अच्छी है, मैंने बड़े उमंग में लिखी, तरंग में लिखी, मस्ती में लिखी है। मैं ज़्यादातर मस्ती में लिखती हूँ, या किसी बात से परेशान होती हूँ तब लिखती हूँ। तो अभी तक जो मैंने लिखी हैं उनमें मैं ये कहूँगी मेरे जीवन के सबसे निकट जो रही है रचना, वह है शायद 'नरक दर नरक' और 'दुक्खम सुक्खम'। ये दोनों नॉवेल।
अनुज : ममता जी, मुझे यह देख कर बहुत आश्चर्य होता है कि आप आज लगभग 70 वर्षों से लगातार लिखती आ रही हैं। जहाँ तक मुझे याद है, आपने 1960 से लिखना शुरू किया और अब तक लगातार लिख ही रही हैं। 1971 में आपका ‘बेघर’ उपन्यास है, 1976 में ‘नरक दर नरक’ आया, 1980 में ‘प्रेम कहानी’ आ गयी, 1987 में ‘लड़कियाँ’ आई, 1997 में ‘एक पत्नी के नोट्स’ उपन्यास छप गया, फिर 2000 में ‘दौड़’, 2009 में ‘दुक्खम-सुक्खम’ और अब जाकर 2025 में ‘जीते जी इलाहाबाद’। इसी पर आपको हालिया साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है। मसलन, आप लगातार लिखती रही हैं। कुछ वर्षों के अन्तराल पर आपके उपन्यास छपते ही रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि आप इतनी 'डिसिप्लिन्ड राइटिंग' कैसे कर पाती हैं?
ममता कालिया : क्योंकि मुझे लगता है अनुज, आप खुद भी एक अच्छे लेखक हैं, इसलिए मैं कह रही हूँ, लिखना एक अभ्यास होता है। और वह एक चिंगारी कहीं से मिल जाती है न, कहीं कोई दियासलाई जला देता है आपके अंदर, एक स्पार्क उठ जाता है कि उस घटना के ऊपर काम करना ही करना है। जैसे अभी आजकल मेरे अंदर लगातार एक लपट उठ रही है, अगले उपन्यास के लिए। और वह शायद मेरा आखिरी होगा, उसके बाद मैं नहीं लिखना चाहती और लिखूँगी भी तो कथेतर कुछ लिखूँगी।
अनुज : नहीं, आखिरी उपन्यास क्यों? हो सकता है कि लिखते हुए कोई नई चीज़ दिमाग में आ जाए और एक नया उपन्यास और बन जाए!
ममता कालिया : नहीं-नहीं, क्योंकि वह उपन्यास थोड़ा बड़ा होगा। वह मैं लिखना चाहती हूँ, मैं अपने पापा से प्रभावित बहुत रही हूँ और मैं बड़ी खुशी से इस बात को स्वीकार करती हूँ कि पापा एक तरह से मेरे निर्माता थे। जब तक रवि नहीं मिले, तब तक पापा ही पापा बोलती थी मैं। तो पापा के चरित्र में दो-तीन बड़े कॉन्ट्राडिक्शन्स थे। एक तरफ वे भारत सरकार के ऐसे समर्थक थे कि लोग कहते थे कि उनके अंदर से फाइलों की खुशबू आती है, और दूसरी तरफ पापा को सरकार की सारी विसंगतियाँ चुभती थीं। पापा 1975 में रिटायर हुए। उन दिनों मैं इलाहाबाद में रहती थी। पापा ने मेरे लिए पोस्टिंग इलाहाबाद में ली थी। मेरे घर में घुसते ही पापा ने कहा, "देखो भारत सरकार कितनी मूर्ख है, मेरे बाल सफेद नहीं हुए, मेरा दाँत नहीं टूटा, मेरी कमर भी नहीं झुकी और मुझे रिटायर कर दिया। इस समय प्रसारण के बारे में मैं जितना जानता हूँ, वी. बी. केस्कर (जवाहर लाल नेहरु के समय सूचना और प्रसारण मंत्री रहे थे) भी नहीं जानता...!"
अनुज : जब आपकी शादी हुई थी तो वे खुश थे?
ममता कालिया : वे तो रवि को पहले से जानते थे। मुझसे ज्यादा वे रवि को लेखक के रूप में जानते थे। पापा उन्हें पसन्द करते थे, लेकिन माइनस प्वॉयन्ट यही था कि ये हिन्दी वाले थे। एम. ए. हिन्दी। तो डर के मारे मैंने घर में झूठ बोल दिया कि ये डबल एम. ए. हैं। जब कभी पापा अंग्रेजी में कुछ बोलते तो रवि हक्के-बक्के से मुँह देखते रहते। रवि की इंग्लिश बहुत कमजोर थी। पंजाब के आदमी की इंग्लिश तो होती ही है कमजोर, और उच्चारण तो बहुत ही खराब था। तो पापा कहते, "ममता, ये कैसा पढ़ा हुआ है..."। शादी को चार साल बीत चुके थे, अब पापा क्या कहते। अच्छा, एक दिन चाचा जी ने, भारत चाचा जी, वे भी एम. ए. इंग्लिश थे, उन्होंने एक दिन कहा, "चलो, इसमें एक अच्छी बात है कि अब तक इसके नाम से कोई स्कैंडल नहीं है...।" तो मेरे घर में अंग्रेजी की बड़ी पूछ थी। एक दिन रवि ने बड़ा प्राउडली कहा कि "मेरा अंग्रेजी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है...।" और मुझे डाँटा भी, "शादी के लिए तुमने ऐसा झूठ बोला"। उन्होंने तो मेरा भी अंग्रेजी में लिखना भी छुड़ा दिया।
अनुज : आपकी रचना 'दौड़' कॉर्पोरेट जगत पर आधारित है। इसका विचार कैसे आया?
ममता कालिया : मेरे बेटे अनु ने जब एमबीए किया और जॉब शुरू की, तो वह अपने अनुभव बताता था। उसने 25 नौकरियाँ बदलीं। वह कहता था कि कॉर्पोरेट जगत में अगर जहाज डूबने वाला हो, तो सबसे पहले वह छोड़ना चाहिए। कॉर्पोरेट संस्कृति बहुत 'कट-थ्रोट' है। वहाँ कोई किसी का सगा नहीं है। वहीं से 'दौड़' का आधार बना।
अनुज : आपकी एक बेहद चर्चित रचना है 'एक पत्नी के नोट्स'। शानी का लिखा हुआ एक उपन्यास है 'एक लड़की की डायरी'।
ममता कालिया : नहीं, मैंने नहीं पढ़ी।
अनुज : मैं दूसरी बात पूछ रहा हूँ। शानी से पहले, एक लेखिका हुई थीं डोरिस लेसिंग। उन्होंने 'द गोल्डन नोटबुक' नाम की किताब लिखी है। और आपने लिखा ‘एक पत्नी के नोट्स’। क्या उस समय लेखकों में 'नोट्स' या 'डायरी' वाली कोई विशेष विधा तैयार करने की कोई कोशिश चल रही थी?
ममता कालिया : नहीं, मैं तो सीधे-सीधे उपन्यास ही लिख रही थी। वैसे लखनऊ में मेरी एक दोस्त थीं दीपक शर्मा, जो बहुत अच्छी स्त्रीवादी कहानियाँ लिखती थीं। उनके पति बड़े विचित्र थे, वे नहीं चाहते थे कि वे लेखिका बनें, जबकि उनकी 25 किताबें आ चुकी थीं। मेरा पात्र 'संदीप' कहीं न कहीं उन स्थितियों से ही उपजा था।
अनुज : आपकी रचना 'लड़कियाँ' 1987 में छपी थी और कृष्णा सोबती की 'ऐ लड़की' 1991 में, क्या आपको कृष्णा जी की ‘लड़की’ और आपकी कैरेक्टर लल्ली में कोई साम्य दिखता है? वैसे कृष्णा जी की रचना आपके चार साल बाद आई थी। आप इसे कैसे देखती हैं?
ममता कालिया : मुझे लगता है कि मेरी 'लड़कियाँ' कृष्णा जी की तुलना में ज़्यादा बहादुर हैं। वे परिस्थितियों का मुकाबला करना जानती हैं। कृष्णा जी के यहाँ तो बस माँ-बेटी का संवाद है, जहाँ माँ कहती है, 'न दबना, न दबाना'। यह बात उन्हें बुढ़ापे में समझ आई। उन्होंने हमेशा 'देह' की कहानियाँ लिखीं, चाहे 'ज़िंदगीनामा' हो या 'मित्रो मरजानी'। कृष्णा सोबती की दृष्टि बहुत सीमित थी। लोग उन्हें उनकी जीवन पद्धति के कारण सिर पर चढ़ाते रहे थे। हिंदी साहित्य का यह दुर्भाग्य है कि लेखिकाएँ अपने लेखन से ज़्यादा अपनी जीवन शैली के लिए चर्चित होती हैं, जैसे किसी का सिगरेट पीना या शादी न करना।
अनुज : कृष्णा सोबती जी के साथ आपके रिश्ते कैसे थे? उनके साथ बीते किसी व्यक्तिगत अनुभव को साझा करना चाहेंगी?
ममता कालिया : एक बार वे इलाहाबाद में हमारे घर आईं। रवींद्र ने सारे लेखकों को बुला लिया, जैसी उनकी आदत थी। अमरकांत, मार्कंडेय, शेखर जोशी सब थे। कृष्णा जी बातचीत को हमेशा अपने ऊपर ले आती थीं, कोई भी बात हो वे घुमा-फिरा कर अपने ऊपर ले आती थीं। उन्होंने कहा कि 'सूरजमुखी अंधेरे के’ से पहले किसी ने स्त्री-पुरुष संबंधों पर कुछ नहीं लिखा है। तब अमरकांत जी ने उन्हें टोका। वे बहुत कम बोलते थे, लेकिन बहुत सटीक बोलते थे। अमरकांत जी ने कहा— "कृष्णा जी, आप क्या बात कर रही हैं? ममता का 'बेघर' तो 1971 में ही आ गया था और उसमें भी ये सारे संबंध और आज़ादी की बातें हैं।" कृष्णा जी को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने मुझे घूर कर देखा।
अनुज (हंसते हुए) : अच्छा?
ममता कालिया (हंसते हुए) : हाँ, और उस दिन उन्होंने मेरी काफी इंसल्ट भी की। मैं उनके लिए सेब काट कर लाई। वे खा नहीं रही थीं। तो मैंने उनसे कहा, "कृष्णा जी, सेब लीजिए ना, क्या आप सेब नहीं खाती हैं?" तो कहने लगीं— "नहीं, मैं सेब खाती हूँ, लेकिन मैं इस तरह से कटे हुए सेब नहीं खाती हूँ, इन्हें खूबसूरती से तराश कर लाइए, फिर खाऊँगी।" मैं उस समय हाउसवाइफ थी, क्या करती, मैं चुपचाप गई और दोबारा पतली-पतली फाँकें काट कर लाई। हमारे घर में दो विचारधाराएँ थीं, मेरी सास कहती थीं कि सेब के सिर्फ चार बड़े टुकड़े करो ताकि बच्चे के पेट में कुछ जाए। लेकिन कृष्णा जी को तो कलात्मकता चाहिए थी।
अनुज : आपने एक जगह कहा है कि साहित्य, वाहित्य बन गया है और संस्कृति विकृति बन गयी है। क्या यह 'दुक्खम-सुक्खम' और 'कल्चर-वल्चर' शीर्षक इसी विचार की अभिव्यक्ति है? इस तरह राइम बना कर शीर्षक रखने के पीछे कोई खास वजह?
ममता कालिया : 'कल्चर वल्चर' का मतलब उन संस्थानों से है, जहाँ संस्कृति को एक 'कमोडिटी' या प्रोडक्ट बना दिया गया है। वे लेखकों को बुलाते हैं, सम्मेलन करते हैं और अंत में 500 रुपये का लिफाफा पकड़ा देते हैं। यह संस्कृति को बहुत सस्ते में खरीदना है। 'वल्चर' यानी गिद्ध, जो संस्कृति को नोच रहे हैं। वहीं 'दुक्खम सुक्खम' एक गंभीर नाम है, जो जैन धर्म की स्थितियों से आया है। मेरी दादी भी गाया करती थीं— "कटी ज़िंदगानी कभी दुक्खम, कभी सुक्खम।"
अनुज : कविता के बारे में आपकी क्या समझ है? मसलन, कविता को आप किस तरह देखती हैं?
ममता कालिया : कविता वही है, जो आपको याद रह जाए और जो ज़्यादा लोगों की बात कहे।
अनुज : मैंने देखा है कि कवि लोग जब कविता पाठ करते हैं तो अपनी डायरी ले कर पढ़ते हैं। जबकि मंचीय कवियों को लम्बी-लम्बी कवितायें याद रहती हैं और श्रोताओं को भी उनकी पंक्तियाँ याद रहती हैं। तो फिर यदि यही एक पैमाना हो कि जो याद रह जाए, वही अच्छी कविता है, तब तो मंचीय कवियों को...(ममता जी शायद यह समझ जाती हैं कि मेरा प्रश्न क्या हैं, इसलिए मुझे बीच में रोक कर बोलने लगती हैं...)
ममता कालिया : अब मुझे मंजर भोपाली बहुत अच्छे लगते हैं, वे हाथ में एक छोटा सा चिट रखते थे, थोड़ा नेजल साउंड करते थे और पढ़ते बहुत अच्छा हैं, और एक शे’र को तीन-चार बार सुनाते हैं। इतनी बार सुनाते हैं कि शेर याद हो जाता है। लेकिन मुझे कुमार विश्वास का उतना अच्छा नहीं लगता, कुमार विश्वास ने इतना सिम्पलीफाई कर दिया है पोयट्री को, कि वह सूक्तियाँ बन गयी हैं। तो वह अच्छा नहीं लगता मुझे। और कविता पाठ के नाम पर तो हमें आज भी दिनकर और नवीन के स्वर ही याद आते हैं...।
अनुज : आपने दिनकर जी को सुना है?
ममता कालिया : सबको सुना है।
अनुज : दिनकर जी के बारे में बताइये।
ममता कालिया : दिनकर जी पहली बात, इतने लम्बे-चौड़े खूबसूरत थे, और इतनी नफासत से कपड़े पहनते थे, उनकी जैकेट को देख कर लगता था कि अभी वह टेलर से आई है और अभी उन्होंने पहनी है। और वे बड़ी सुरुचिपूर्ण थे। मुझे उनको देख कर कभी नहीं लगा कि वे हिन्दी के लेखक हैं। अज्ञेय जी और दिनकर जी, इन दोनों को देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता था। ये लोग मेरे हीरो थे।
अनुज : ‘कितने शहरों में कितनी बार’ शीर्षक की प्रेरणा अज्ञेय की रचना ‘कितनी नावों में कितनी बार’ से तो नहीं मिली थी?
ममता कालिया : हाँ, बिल्कुल। मुझे लगा था कि यात्रा बताने के लिए यह शीर्षक बिल्कुल उपयुक्त है। अखिलेश ने मुझे कहा कि अलग-अलग शहरों पर लिखिए। पहले तो मैंने मना किया कि कोई गिनती नहीं है कि मैं कितने शहरों में रही। उसने कहा कि जो मन में आए लिखते रहिए।
अनुज : मैंने संसदीय कार्यवाही को वर्षों से लगातार देखा है, शायद ही कोई सत्र हो जहाँ किसी न किसी सांसद ने दिनकर जी का नाम ना लिया हो। आप रामधारी सिंह दिनकर को हिन्दी साहित्य में कहाँ रखती हैं, आपकी नज़र में साहित्य में वे क्या दर्जा रखते हैं?
ममता कालिया : दिनकर जी हमारे पथ-प्रदर्शक हैं। मैं दिनकर जी को बहुत महत्त्व देती हूँ। उन्होंने कई ऐसी पंक्तियाँ लिखी हैं, जो जीवन के पथ-प्रदर्शक बने। उन्होंने लिखा था - ‘जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध,’ और ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’। और तुमने जो कहा ना कि आज की कवितायें स्टेटमेंट बन जाती हैं, तो यह स्टेटमेंट अच्छा स्टेटमेंट है। वे नेहरू जी के दोस्त थे, फिर भी पार्लियामेंट में उनके सामने विरोध करने का साहस रखते थे। और वे नेहरु जी थे, कि वे इस बात की क़द्र करते थे।
अनुज : आजकल लेखन का जो माहौल है और उस समय का जो माहौल था, जबकि आज लेखकों की तादाद ज्यादा है...।
ममता कालिया : देखिए, इसमें यह महत्त्वपूर्ण होता है कि किस कद का लेखक आपके सामने आया है।
अनुज : यह क़द कैसे तय किया जाए?
ममता कालिया : आज क्या होता है कि कोई नाम बहुत चर्चित तो हो गया, लेकिन उसके अंदर बहुत व्यापक दृष्टि नहीं है। अब उसकी कविता पढ़कर या प्रोज पढ़ कर आप लिखेंगे तो क्या लिखेंगे। मैं नये-नये जो आए हैं, उनकी बात कर रही हूँ, एक दो तो बहुत अच्छा लिखते हैं, और नये तरीके से लिख रहे हैं, लेकिन उनमें कोई ऐसा नहीं है जो इंस्पायरिंग का प्वॉयन्ट बने। प्रेरणा का स्रोत बनना चाहिए। अब हमारे ज़माने में, हमने भवानी प्रसाद मिश्र से जो कवितायें सुनी। एक तो ‘गीत-फरोश’ और दूसरी ‘आज पानी गिर रहा है।’ क्या गजब की कविता है, उन्होंने जेल में लिखी थी। अब विनोद कुमार शुक्ल की कवितायें हैं। क्या खूबसूरत कवितायें हैं, ‘मैं उसे नहीं जानता, उसकी हताशा को जानता हूँ....।’ अरुण कमल की कुछ कवितायें बहुत अच्छी हैं।
अनुज : कविता को आप किस तरह से देखती हैं?
ममता कालिया : कविता को सिर्फ़ कवि और कविता के बीच का 'डायलॉग' नहीं होना चाहिए। जैसे मैंने एक कविता लिखी थी, "तू अब मिला है मुझे जब वक्त खत्म हो गया है, मैं पहली बार ऐसे सफर पर जा रही हूँ जिसके लिए न कोई पैकिंग करनी है, न टिकट कटाना है। और तो और, टिफिन बॉक्स में आलू की भुजिया और पराठे भी नहीं रखने हैं...।"
अनुज : बहुत सुंदर! अच्छी कविता है। आजकल जो कवितायें लिखीं जा रही हैं, उन पर आपकी क्या राय है?
ममता कालिया : अब कविता का रूप बदल गया है। नए लोगों ने इसे इतना बोल्ड और इनफॉर्मल बना दिया है कि उसमें से रस गायब हो गया है और सूचनाएँ ज़्यादा भर गई हैं। उपन्यास में तो किरदार अपना जीवन पा लेता है और अपनी तरह से बोलता है, पर कविता में हम सीधे अपने मन की बात कहते हैं।
अनुज : बीते कुछ सालों पहले बहुत सारे साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस कर दिया था। इस 'पुरस्कार वापसी' आंदोलन को आप किस तरह से देखती हैं?
ममता कालिया : मुझे यह आंदोलन कुछ हद तक मूर्खतापूर्ण लगा था। अगर आप लेखक हैं, तो अपना विरोध शब्दों में जताइये। नारे लगाना या पुरस्कार वापस करना, जो असल में तकनीकी रूप से संभव भी नहीं है क्योंकि पैसा लौटाने का कोई प्रावधान भी नहीं है। भारत सरकार के पास ऐसा कोई खाता नहीं है जिसमें पुरस्कार की राशि को वापस लिया जा सके। लेखक के विरोध का भी एक तरीका नहीं होना चाहिए। यह ठीक है कि लेखक को हमेशा प्रतिपक्ष में रहना चाहिए, पर विरोध का माध्यम उसकी रचना होनी चाहिए।
अनुज : डिजिटल दुनिया और किताबों के भविष्य पर आपका क्या सोचना है?
ममता कालिया : मुझे लगता है एक दिन यह 'डेटा' का सारा पसारा उड़ जाएगा। बिजली का बड़ा संकट आएगा और सारा डेटा खत्म हो जाएगा। तब सिर्फ़ मुद्रित शब्द ही बचेंगे। केवल किताबें ही बचेंगी। मेरा मुद्रित किताबों और कागज़ों पर छपे हुए शब्दों में बहुत विश्वास है।
अनुज : ममता जी, आपसे बातचीत करके बहुत अच्छा लगा। यह बातचीत 'परिकथा' पत्रिका के जुलाई-सितम्बर, 2026 अंक में प्रकाशित होगी।
ममता कालिया : बहुत अच्छा लगा, अनुज। तुम आज 12-14 सालों बाद मेरे घर आए हो। आते रहा करो, अच्छा लगता है।
अनुज : जी, बिल्कुल, आता रहूँगा। बहुत-बहुत धन्यवाद।
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| अनुज |
सम्पर्क
डॉ. अनुज
मोबाइल : 9868009750



बहुत अच्छा साक्षात्कार है.ममता जी सरल-सहज हैं लेकिन उनकी बातें महत्वपूर्ण लगीं.
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