चन्द्रदेव यादव के कविता संग्रह 'माटी क बरतन' पर मोहन लाल यादव की समीक्षा 'भोगे हुए यथार्थ की कविताएँ'।
हिन्दी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं में भी महत्त्वपूर्ण लेखन निरन्तर हो रहा है। भोजपुरी हिन्दी की उपबोली है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार के एक बड़े हिस्से में बोली समझी जाती है। चन्द्र देव यादव भोजपुरी अंचल से जुड़े हुए कवि हैं। उनकी कविताएँ गवाह हैं कि लोक से उनका जुड़ाव तो है ही, संवाद भी निरन्तर बना हुआ है। 'माटी क बरतन' उनका हालिया प्रकाशित भोजपुरी का कविता संग्रह है। यह शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ बयां कर देता है। कवि कहानीकार मोहन लाल यादव ने इस संग्रह की पड़ताल करते हुए एक समीक्षा लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चन्द्रदेव यादव के कविता संग्रह 'माटी क बरतन' पर मोहन लाल यादव की समीक्षा 'भोगे हुए यथार्थ की कविताएँ'। भोगे हुए यथार्थ की कविताएँ मोहन लाल यादव लोक-संस्कृति किसी भी देश की पहचान होती है। यह किसी भी भूभाग की दीर्घकालीन परंपरा होती है। इसमें वहाँ की बोली-बानी, वेश-भूषा, नृत्य-गीत, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार आवश्यक तत्त्व के रूप में शामिल होते हैं। हमारा देश बहुत विशाल है तथा विभिन्न तरह के लोक साहित्य एवं संस्कृतियों का समुच्चय है। कहा भी...