ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'बाल की खाल'
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| ललन चतुर्वेदी |
मानव देह अपने आप में परफेक्ट मानी जाती है। सभी अंगों प्रत्यंगों के अपने अलग अलग महत्व और मायने हैं। मानव शरीर में बाल का अपना विशेष महत्त्व है। सिर के बालों को सजाने संवारने के साथ साथ मूंछ दाढ़ी के बाल भी लोग अलग अलग समयों में अपनी अपनी तरह संवारते रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों के बाल जल्द ही साथ छोड़ने लगते हैं और वे गंजे हो जाते हैं। बालों को बचाने के तमाम प्रयास नाकाफी साबित होते हैं। नीबू और मट्ठा का उपयोग करने से ले कर बाल को बार बार छिलवाने की तरकीब भी काम नहीं आती और अन्ततः सिर पर जल्दी ही भरा पूरा चाँद दिखाई देने लगता है। कुछ लोग सिर पर विग लगा कर सच्चाई को नकारने का प्रयास करते हैं लेकिन पुणे की घटना ने विग लगाने वालों के मन में ऐसा खौफ भर दिया है कि क्या कहिए। अब वे विग पहनने के पहले सौ बार सोच रहे हैं। क्या ठिकाना कोई माशूका का मूड उसे देख कर उखड़ जाए और फिर वह न जाने क्या कर डाले। अब यह भी तो देखिए कि पता नहीं किस भक्त ने किस प्रेरणा से भगवान शिव के भरे पूरे बालों के साथ चाँद को यूं ही टांक दिया। अब वे चाँद को सिर पर ढोते ही रहते हैं। चाँद को सिर से उतारने की कोई तरकीब काम नहीं आती। और चाँद भी हैं कि हर पल सिर पर सवार। खैर वे तो औघड़दानी माने जाते हैं उनका क्या? और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत की सिवा। मुए, ये बाल असमय ही सफेद दिखने लगते हैं। इसका दर्द उन युवाओं से सहज ही पूछा जा सकता है जो कम्पटीशन की तैयारियों में जुटे हुए हैं कि एक रोजी रोजगार मिले तब गाजा बाजा बजे। लेकिन उनके बालों की सफेदी अतीत के ब्रिटिश साम्राज्य जैसी रोज ब रोज फैलती ही जाती है। वह गाना तो आपने सुना ही होगा 'उड़े जब जब जुल्फें तेरी'। और यहां ये सफेद बाल क्या खाक उड़ेंगे। कवाँरियों का दिल इन्हें देख कर मचलना ही भूल जाता है। तो बालों के साथ तमाम यादें और बातें जुड़ी हुई हैं जिसे अपने व्यंग्य में ढाला है ललन चतुर्वेदी ने। ललन जी बालों के दंश को एक अरसे से झेल रहे हैं। बहरहाल यह सिर्फ उनकी ही आपबीती नहीं कईयों की आपबीती है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'बाल की खाल'।
व्यंग्य
'बाल की खाल'
ललन चतुर्वेदी
उसके घुंघराले बाल को देख कर एक कवि ने कहा था- "अपने बालों के प्रति सावधान-सचेत रहना।" कवि का मानना था कि घुंघराले बाल अल्पायु होते हैं। वे भरी जवानी में भी साथ छोड़ सकते हैं। कवि की बातों को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि वे भविष्यद्रष्टा होते हैं। दुःख यह है कि अधिकांश लोग कवि की बातों पर कान नहीं देते। कवि क्रिकेट-प्रेमी था और रवि शास्त्री के बालों का फैन था, वैसे ही जैसे कुछ वर्ष पूर्व परवेज मुशर्रफ़ धौनी के बालों के मुरीद हो गए थे। उसने भी कवि की बात को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया।
उसे अपने बालों पर नाज था। बचपन में माँ उसके बालों की चोटियाँ बाँध देती थी। कुछ बच्चे उसे लड़की कह कर चिढ़ाते। वह रोते हुए माँ से कहता- "मेरे बाल कटवा दो।" माँ कहती -"ग्यारह वर्ष पूरे होने पर महादेव जी के मंदिर जाकर मुंडन करवा दूंगी।" खैर, जैसे ही वह अठारह साल का हुआ, उसके बाल एकाध जगह से तिलकने अर्थात सफ़ेद होने लगे। वह चिंतित रहने लगा। फलतः उसके बाल तेजी से झड़ने लगे। जो शेष बचे वे सफ़ेद होने लगे। उसने डॉक्टर बुखारी से लगातार तीन वर्षों तक होमियोपैथ की लाइकोपोडियम और आर्निका जैसी दवाइयां खायीं लेकिन बालों का पकना जारी रहा। परन्तु भाग्य ने उसका साथ दिया। कम उम्र में उसकी शादी हो गयी। बारात जाने के पहले उसने उस समय उपलब्ध गोदरेज हेयर डाई से बाल रंगवा लिया। उसके बाल काले बादल की तरह दिखने लगे। जब विवाह हो गया उसके बाद उसे हेयर डाई करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। मुख्य काम तो हो गया था। पत्नी सीधी-सादी हो तो जीवन आसान हो जाता है। तत्कालीन पत्नियों को बालों से कोई शिकायत रहती नहीं थी। सुहाग अमर रहे-उनका एकमात्र मिशन होता था। क्या ज़माना था कि चाँद और अमा (अमावस्या) की जोड़ी भी निबह जाती थी।
इससे पहले कि वह बालों के प्रति सचेत हो, समय काफी आगे निकल चुका था। वीरान बाग़ को आबाद किया जा सकता है लेकिन रुखसत हुए बाल को वापस नहीं लाया जा सकता है। इस बीच उसकी पत्नी भी विदा ले चुकी थी। चारों तरफ वीरानगी देख उसने बुझे हुए दिल को एक बार फिर रोशन करने का सोचा। एक पत्रकार मित्र ने इस आग को हवा दी। साहब ने नगर-ढिंढोरा पीट दिया कि एक बार प्रीत की रीत में बंधना चाहता हूँ। कोई दिल दरिया करने को तैयार हो तो उफनती नदी में बिना लाइफ जैकेट कूदने को तैयार हूँ। लोग उसकी दिलेरी देख दांतों तले उंगली दबाने लगे। कहने लगे- "यह उमर गलती से मिस्टेक करने का नहीं।" उस समय उसने देखा कि इस देश में कितनी ही उफनती नदियाँ हैं जो अपने कूलों में सिमट कर नालियों में बदल गयी हैं। उन्हें हिम्मत नहीं कि काली नागिन की तरह डंसती रातों को चुनौती दे सकें। पर कुछ हैं जो अपनी दिलेरी दिखा कर हाथ थामने को बेताब हैं। उन्हीं में से एक ने जब पैगाम भेजा तो बंदानवाज खुश हो कर मिलने पहुँच गया। महज दूसरी मुलाक़ात में बन्दे ने जब सर्दी वाला मंकी कैप उतारा तो खतरनाक ऑबजर्वेशन आया- "हेयर ट्रांसप्लांट समय की मांग है।" लगा कि सारे मंसूबों पर पानी फिर गया। फिर से चाँद पर बालों की रोपनी कौन कराए? दो टूक कह दिया- "मोहतरमा, दिल-ओ-जान हाजिर है लेकिन कमजोर विद्यार्थी को डिफकल्ट टास्क मत दीजिए। आप तो बड़े नसीबों से मिली हैं। रब की मर्जी है कि जोड़ी बन जाए। शायर हूँ। आपकी खिदमत में शेर अर्ज करता हूँ। दाद दीजिए-
कुछ तुम्हारी बंदिशें हैं, कुछ हमारे दायरे
जब मुकद्दर ही बने दुश्मन तो कोई क्या करे?
मोहतरमा थोड़ा पिघल गयीं। इस उमर में चलता है। मजबूरियाँ दोनों तरफ थीं। रजामंदी हुई लेकिन शर्त यह कि जनाब विग लगाया करेंगे। काम फिर हो गया और जनाब भारत के नेता की तरह वायदे भूल गए। पत्नी ट्रम्प का उदाहरण देती तो पति पुतिन का। रूस और यूक्रेन की तरह दोनों में आज भी युद्ध चल रहा है। यूँ ही रस्ते कट रहे हैं। सलाम-नमस्ते तो होना नहीं है। पुराने जमाने की शादियाँ लॉन्ग लास्टिंग होती थी। अब आज के जमाने में देह और नेह दोनों परफेक्ट चाहिए। परफेक्शन का समय है। किसी ने क्या खूब कहा है-
लोग नाहक किसी को कहते हैं बुरा
आदमी अच्छा वक्त बुरा होता है।
अब आगे का हवाल सुनाने के पहले एक जरूरी क्वोटेशन पढ़िए। यह अपने बचाव के लिए लिख रहा हूँ नहीं तो आजकल पेट्रोलिंग पार्टी से ज्यादा ट्रोलिंग पार्टी सक्रिय है। बच्चन जी ने अपनी जीवनी में कहीं लिखा है- "स्त्री यदि इंद्र से नफ़रत करे तो उसकी दृष्टि में इन्द्रासन से शायद ही नीची कोई जगह हो।" बात बिलकुल सही है। स्त्री जब भी प्रेम करती है तो सम्पूर्णता में करती है और यदि नफरत करती है तो मूलोच्छेद भी कर देती है। इधर के अनुभवों से जोड़ कर देखें तो एक ही समय में वह प्रेम और नफरत दोनों कर सकती है। इसे समय की विडंबना कहिए। पात्र अलग हो सकते हैं लेकिन पात्रता की कसौटी वह स्वयं निर्धारित करती है। प्रेम होगा लेकिन योजना से जुड़े सभी दस्तावेज (जो सूक्ष्म अक्षरों में लिखे गए हैं) फ़ास्ट लाइफ में सावधानी से पढ़ने के लिए किसके पास वक्त है? इसके अक्षर भी इतने छोटे होते हैं कि पढ़ने के लिए माइक्रोस्कोप ढूँढना पड़ता है। कौन जहमत उठाए? ऑफर लिमिटेड है तथा टर्म एंड कंडीशन भी लागू है। लेकिन लाइफ इंश्योर करने का लोभ भी है। इन सारी विघ्न-बाधाओं के बावजूद जब दिल परदेसी हो जाता है तो अपनी हदें भूल जाता है। प्यार एक ऐसा अहद (करार) है जिसमें हद से गुजरना लाजिमी है।
खैर, बात तो बाल पर करनी है। इधर-उधर बहकने अर्थात विषयांतर करने का कोई औचित्य नहीं है और इरादा भी नहीं है। वैसे इतना जरूरी भी नहीं था कि इस समय बाल पर कवर स्टोरी की जाए लेकिन पत्रकारिता का उसूल है कि सामयिक विषयों पर तीरे-नजर फरमाया जाए। लिहाजा देश के एक पुण्य नगर में हुई घटना जिसे दुर्घटना मुक़र्रर करने की कोशिशें नाकाम हुई हैं उसमें एक अहम् मुद्दा बाल का भी है। सोचिए, मुहावरा सिद्ध होने में कितना समय लेता है? अनुपम खेर का एक शो आता था - 'लाइफ में कुछ भी हो सकता है'। लिखते हुए बहुत दुःख होता है कि बाल के कारण खाल निकल ही गयी। दस बहाने कर के दिल ले जाने वाले लोग इतने बेवफा हो सकते हैं कि जान, जान कहते, जान ही निकाल देते हैं। यदि कोई खुदा होता तो उस जवान का कोई बाल-बांका कर पाता? यदि वह किसी उपाय से बच जाता तो अखबार का हेड लाइन बनता- साहसी युवक निजी प्रयत्नों से बाल-बाल बच गया। यह अत्यंत दुखद है कि कोई प्रेम करते हुए चेतन रह ही नहीं पाता। प्रेम तो नीम बेहोशी की अवस्था है। विस्मृति की दशा है यह नहीं कहा जा सकता कि यही एक मात्र कारण है लेकिन मैं अपना बाल खुजला रहा हूँ कि बाल भी कितने मूल्यवान होते हैं। मुझे अफ़सोस है कि मुट्ठी भर से भी कम मेरे बाल बचे हुए हैं। लोग जब बालों के मौजूद अवशेष के बारे में सवाल करते हैं तो अपने बचपन के दिनों की डबल चोटियाँ याद आ जाती हैं। भगवान् किसी को भी बाल के मामले में कंगाल नहीं करें। अंत में अनुरोध यह भी कि कृपया मेरी बातों में बाल की खाल न निकालें। शरीर का एक-एक अंग मूल्यवान है। देह भी वन टाइम गिफ्ट है। नेह चाहिए तो देह से सनेह करना ही होगा। उसमें भी बालों की हिफाजत विशेष रूप से जरूरी है। यह वह मेहमान है जब एक बार रूठ कर चला जाता है तो वापस नहीं आता है। उस पत्रकार मित्र का शुक्रिया जिसने इस कवर स्टोरी के लिए इनपुट प्रदान करते हुए प्रोत्साहित किया।
संपर्क
ई मेल : lalancsb@gmail.com
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नई विधा । अच्छा है। और भी ग़म हैं जमाने में कविता के सिवा ।
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