तीजन बाई से अल्पना त्रिपाठी की बातचीत
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| तीजन बाई |
आज तड़के पंडवानी की मशहूर गायिका तीजन बाई का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के साथ संस्कृति का एक अध्याय समाप्त हो गया। तीजन बाई ने यह दिखाया कि अगर कला के प्रति प्रतिबद्धता हो तो कोई भी अवरोधक आपकी राह नहीं रोक सकता। बचपन में पिता की प्रताड़ना हो, दो दो पतियों से अलगाव की स्थिति हो, जवान बेटे के निधन की त्रासदी हो या फिर कम उम्र में एक बेटी के चल बसने का गम कोई भी दुःख या गम पंडवानी से उन्हें जुदा नहीं कर पाया। बूढ़े नाना को अपने बचपन में जो उन्होंने पंडवानी गाते सुना तो उसी समय उन्होंने पंडवानी सीखने का फ़ैसला कर लिया। फिर तो पंडवानी से उनका साथ आजीवन बना रहा। आमतौर पर छत्तीसगढ़ में पंडवानी की दो शैलियां प्रचलित हैं। पहली वेदमती शैली और दूसरी कापालिक शैली। वेदमती शैली में कथा वाचन को शास्त्रों के मुताबिक़ ज़्यादा रखा जाता है, जबकि कापालिक शैली में कल्पना और नये प्रयोगों की संभावना अधिक होती है।वेदमती शैली में मुख्य कलाकार घुटनों के बल बैठ कर कथा-वाचन करता है जबकि कापालिक शैली में मुख्य कलाकार मंच पर चहलकदमी करता हुआ, खड़ा हो कर कथा-वाचन करता है। छत्तीसगढ़ में लंबे समय से प्रचलित पंडवानी पहले केवल पुरुष ही गाते थे। पंडवानी गायन महिलाओं के लिए लगभग प्रतिबंधित थी। तीजन ने इस प्रतिबंधित राह को खुद के लिए चुना। यह सफर दुष्कर था। लेकिन तीजन और दुष्कर जैसे एक दूसरे के पर्याय ही तो थे। अल्पना त्रिपाठी से एक बातचीत में उन्होंने बताया कि "यह पंडवानी हमारी पहचान है। उसके लिए कोई समझौता नहीं। गुरु की बात मानना ही भगवान की पूजा है। मेरा बेटा जब दिवंगत हुआ तो उसके तुरंत बाद ही मैं कार्यक्रम करने गई क्योंकि कार्यक्रम पहले से ही तय था। कितना कठिन रहा होगा मेरे लिए। आप खुद स्त्री हैं महसूस कर सकती हैं पीड़ा, पर कलाकार का धर्म मैंने उस परिस्थिति में भी निभाया।" तीजन बाई अनपढ़ थीं। वे किसी तरह केवल अपना दस्तखत कर लेती थीं, लेकिन यह सब भी उनके राह का रोड़ा नहीं बना। बिलासपुर विश्वविद्यालय ने साल 2003 और रविशंकर विश्वविद्यालय ने साल 2006 में तीजन बाई को डी.लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। उनकी प्रतिभा को देश और दुनिया में कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाज़ा गया। उन्हें 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी, 2003 में पद्मभूषण, 2018 में फुकुओका पुरस्कार और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। अनामिका अनु से सितंबर, 2022 में पंडवानी की चर्चा के क्रम में 'छत पर बंदर से लिपटे बच्चे को दिखाते हुए तीजन बाई ने कहा था, "जैसे उसके बच्चे ने मां को पकड़ रखा है, मैंने उसी तरह से पंडवानी को पकड़ रखा है। पंडवानी ही मेरा बेड़ा पार लगाएगी।" कुछ दिन पहले अल्पना त्रिपाठी ने उनके साथ एक बातचीत की थी जो अभी तक अप्रकाशित है। तीजन बाई को नमन करते हुए आज हम पहली बार पर यह बातचीत साझा कर रहे हैं। आलोचक पीयूष कुमार के सौजन्य से हमें यह साक्षात्कार प्राप्त हुआ। इसके लिए हम उनके आभारी हैं।
तीजन बाई से अल्पना त्रिपाठी की बातचीत
छत्तीसगढ़ी संस्कृति की पहचान तीजन
अमूर्त विधाओं से बनने वाले मूर्त रूप की कल्पना करता है तो जो छवि निर्मित होगी वह सिर्फ और सिर्फ तीजन बाई की ही होगी। पंडवानी की पर्याय बन चुकी तीजन बाई, पद्मविभूषण तीजन बाई, छत्तीसगढ़ ही नहीं अपितु भारतीय कला की गौरव तीजन बाई।
लगभग बारह वर्ष पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में मैंने तीजन बाई को पंडवानी गाते देखा-सुना था, उसकी स्मृतियाँ आज भी मेरे मन में जीवंत हैं। ये तीजन बाई और लोक-कला का जादू ही है कि उनके अमिट सम्मोहन से कोई बच पाए। उनसे मिलने का सुअवसर अब मिला वो भी उनके घर जा कर। इस अविस्मरणीय मुलाक़ात और उनसे हुए सार्थक संवाद की कुछ लड़ियाँ सुधी पाठकों हेतु मैं प्रस्तुत कर रही हूँ-
अपने बचपन को याद करते हुए तीजन बाई बातचीत शुरू करती हैं - "मैं तेरह साल की उम्र से मंच पर प्रस्तुति दे रही हूँ और जब मंच पर नहीं होती तब मंच के नीचे भी पांडवानी ही गा रही होती हूँ।"
अपने नाम और जन्म के बारे में वह कहती हैं कि "जिस समय देश आजाद हुआ था उसी दौरान आम के पेड़ की छाँव में मेरा जन्म हुआ था । तीज त्यौहार के दिन जन्म होने के कारण ही मेरा नाम माता जी ने तीजन रखा।" प्रकृति से तीजन बाई का जन्म का नाता है तभी तो आज भी अपने जन्म के 75 वें वर्ष में वह चैत्र नवरात्र के नवों दिन इमली के पेड़ के नीचे बड़ी सहजता और प्रेम से गुजार कर बहुत आनंदित रहती हैं।
तीजन बाई से मिलना एक भरी पूरी लोक-संस्कृति से मिलना है। लोक की सरलता, सहजता और उदात्तता का साक्षात्कार करना है। जितनी सहजता से पांडवानी की कथा तीजन बाई सुनाती हैं, उसे सीखने की यात्रा सीधी-सरल नहीं रही। तीजन पारधी समाज से आती हैं, जिनकी बसाहट दुर्ग-भिलाई के गनियारी गाँव में है। इसीलिए उनके दादा-नाना का घर, मायका-ससुराल सब आस-पास ही अवस्थित है। पंडवानी सीखने के बारे में वह कहती हैं कि नाना बृजलाल महाभारत की कहानियाँ कहते थे। उन्हें इस कथा को गाते-सुनाते देखना तीजन का सबसे प्रिय काम था। धीरे-धीरे उन्हें ये कथाएं याद होने लगीं और वह भी उनका अनुकरण करते हुए गाने लगीं। पिता श्री धनुक लाल को तीजन का पंडवानी गाना बहुत नागवार गुजरा था। बालिका तीजन को रोकने की बहुत चेष्टा की उन्होंने। थप्पड़ बरसाए, बचाने आती माता को भी नहीं बख्शा। लेकिन उनकी सारी कोशिशें व्यर्थ गईं। तीजन को तो महाभारत की कथा में ही अपनी दुनिया दिखने लगी थी।
मंच पर पहली प्रस्तुति के सवाल पर तीजन बाई का चेहरा खिल उठता है। बड़े उत्साह से वह बताती हैं कि "तेरह साल की उम्र में मैंने चंदखुरी गांव में पहली बार मंच पर पंडवानी की कथा सुनाई। उस समय यह कथा अठारह दिनों तक चलती थी। कार्यक्रम कीमत पर तय नहीं होते थे बस एक नारियल फूल पर करार हो जाता था। कार्यक्रम के दौरान जो चढ़ोत्तरी (चढ़ावा) मंच पर मिलता था, वही कलाकारों का मानदेय होता था।" इस तरह से कापालिक शैली में पहली बार मंच पर किसी महिला का पदार्पण हुआ।
यह पूछने पर कि क्या उस छोटी सी उम्र में आपने पद्मविभूषित, विश्वविख्यात तीजन बाई के, आज के कद की कल्पना की थी? कोई सपना देखा था?
तीजन बाई ने गहरी श्वास छोड़ते हुए जवाब दिया कि "बिना सपना देखे कोई कहीं ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकता। सपना देखने पर ही मेहनत करने की ताकत और हिम्मत मिलती है।"
हाल ही में बॉलीवुड के हीरो रणबीर कपूर ने घर आ कर तीजन बाई से मुलाकात की। अभी बॉलीवुड के ही किसी बड़े डायरेक्टर ने तीजन बाई पर बायोपिक बनाने के लिए उनसे संपर्क किया है। जिसमें लीड हीरोइन में विद्या बालन के होने की चर्चा है। तीजन बाई ने आठ बार पेरिस जा कर पंडवानी की प्रस्तुति दी है। विश्व के तमाम देशों में शो कर चुकी हैं। जब मैंने उनसे पूछा कि इतनी शोहरत पा कर आपको कैसा लगता है? उनका दो टूक जवाब था-" 'कुछो नहीं लागत ओ' (कुछ नहीं लगता)। बहुत गरीबी देखी है मैंने। अब पैसे और पुरस्कार से भरी दुनिया भी देख रही हूँ। तब भी बोरे-बासी और टमाटर चटनी खाती थी, आज भी वही खाती हूँ।
मैंने पूछा, पुरस्कार मिला? तो बोलीं 'हाँ भाई, मिला।' पद्म विभूषण मिला? 'तो हाँ भाई मिला'। मेरे गुरु जी ने मुझे अनमोल शिक्षा दी। अभिमान नाशवान है सरलता ही महान है। घमंड नहीं करना। जीवन में जो समय और ऊर्जा घमंड करने में खर्च करें उसी समय को काम करने में लगा।
किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि "Simples can not be defined, Simples can only demonstrated. "सरलता को परिभाषित नहीं किया जा सकता सरलता को केवल प्रदर्शित किया जा सकता है"। जब भी मैं तीजन बाई की सरलता और सहजता, जिसको तीन घंटे के इस मुलाकात में मैंने पल-पल महसूस किया, व्यक्त करने की कोशिश करती हूँ, बयां करने के लिए शब्द ढूंढती हूँ, मैं सर्वथा असफल रहती हूँ।
उम्र के सत्तर वर्ष पूर्ण कर चुकी तीजन बाई किसी बच्ची की तरह निश्छल और पारदर्शी हैं। द्रौपदी के जीवन के दुखों की बात करते हुए उनकी आंखें भर आती हैं। लगभग 62 वर्षों में उन्होंने द्रौपदी की दारुण कथा को हजारों बार साझा किया होगा पर आज भी कथा में ऐसे डूबती हैं मानो पहली बार कह सुन रही हैं। वह कहती हैं "कहने वाले तो अनेक प्रकार से कथा कहते हैं, पर जिस प्रकार जो मैं सुनाती हूँ और लोगों को डुबाती हूँ, रुलाती हूँ, हँसाती हूँ, गुस्सा दिलाती हूँ, यह काम मैं बचपन से ले कर अभी तक कर रही हूँ, आगे भी करती रहूँगी।"
बचपन से अभी तक का व्यक्तिगत जीवन आपका कैसा रहा? किन किन रूपों में आप का संघर्ष रहा?
"संघर्ष हर व्यक्ति के जीवन में रहता है किसी के जीवन में कम तो किसी में ज्यादा। पंडवानी ने दुखों से संघर्ष की बहुत प्रेरणा दी। जब इतने समर्थ देवी-देवता भी दुःख से नहीं बच पाए तो तीजन क्या है?
"बचपन में पिता द्वारा कड़ी यातनाएं, शादी हुई तो पति नहीं ले गया। बाद में गृहस्थी बसाई। तीन बच्चे हुए। पर उस दूसरे पति को मेरा मंच पर जाना, कार्यक्रमों के लिए बाहर जाना पसंद नहीं था। कुछ दिनों बाद उससे तलाक हो गया। बाद में एक और शादी की। साथ काम करने वाले कलाकार से। पर वो शादी भी जल्दी ही टूट गई। जवान बेटा खत्म हो गया। एक बेटी कम उम्र में भगवान को प्यारी हो गई।" शेष दुःख भरी कहानी उनकी आंखों से छलकते आँसुओं ने पूरी की।
दोनों पतियों से मतभेद किस बात को ले कर था। दोनों को ही मालूम था कि आप कलाकार हैं, फिर तकरार क्यों हुआ?
"दूसरे वाले पति का घर यहीं मेरे पड़ोस में है। अच्छा आदमी था। दोनों को मेरा काम करना पसंद नहीं था। पहले वाले को लगता था कि मुझे मंच छोड़ देना चाहिए और मैं किसी भी कीमत पर पंडवानी छोड़ने को तैयार नहीं थी बाद वाले पति को लगता था कि मैं उसकी हर बात मानूँ। वह मुझ पर पूर्ण नियंत्रण करना चाहता था। कब शो करना है, कहाँ करना है, नहीं करना है, सब उसकी मर्जी से।"
वह भी कलाकार थे कहीं ऐसा तो नहीं कि आप से ईर्ष्या हो गई हो?
"मैं नहीं जानती" उनका सीधा जवाब था।
पंडवानी के प्रति इतनी दीवानगी? यह पूछने पर उन्होंने कहा कि "मेरे गुरु जी अनपढ़ थे। मैं भी दस्तखत छोड़ कुछ नहीं पढ़-लिख पाती। लेकिन इस विधा को सीखने के दौरान मैंने गुरु की बातों को मन में गांठ बाँध कर रखी। यह पंडवानी हमारी पहचान है। उसके लिए कोई समझौता नहीं। गुरु की बात मानना ही भगवान की पूजा है। मेरा बेटा जब दिवंगत हुआ तो उसके तुरंत बाद ही मैं कार्यक्रम करने गई क्योंकि कार्यक्रम पहले से ही तय था। कितना कठिन रहा होगा मेरे लिए। आप खुद स्त्री हैं महसूस कर सकती हैं पीड़ा, पर कलाकार का धर्म मैंने उस परिस्थिति में भी निभाया।"
पंडवानी गायन में तीजन अपना सच्चा साथी तंबूरे को ही मानती हैं। तंबूरा जो कभी अर्जुन की धनुष बन जाता है तो कभी भीम की गदा। तीजन इस तंबूरे में तीन देवताओं का वास मानती हैं। वीणा के तार वाग्देवी की कृपा से है, तो कृष्ण का मोरपंख हर परिस्थिति में साथ देने का आश्वासन है। वहीं गदा के रूप में तंबूरा संकटमोचन है। पंडवानी गायन में तीजन के हाथ में तंबूरे की यति-गति कहानी के आवेग और प्रभाव को बढ़ा देती है।
पंडवानी गायन में हारमोनियम, तबला, मंजीरा, ढोलक वादकों के साथ ही रागी की क्या भूमिका होती है इसको बताते हुए तीजन बाई कहती हैं कि "पूरी कथा संवाद शैली में प्रस्तुत होती है। संवाद से ही कथा खुलती है। ऐसे में जो रागी होते हैं वो मेरी कही गई बातों पर प्रतिक्रिया देते हैं जिससे कहानी आगे बढ़ती है। प्रायः हव जी, हो जी, अच्छा की आवाज वो निकालते हैं।"
जिस द्रौपदी की कथा आप सुनाती हैं उन्हें अपने जीवन में असीम दुःख उठाने पड़े। और आपको भी जीवन में कुछ कम दुःख नहीं सहना पड़ा। आप कभी अपने जीवन के दुःखों की तुलना द्रौपदी के दुःखों से करती हैं?
तीजन बाई बताती हैं कि "मैं एक साधारण स्त्री और द्रौपदी तो साक्षात देवी माता, कोई तुलना हो सकती है भला। हाँ, यह है कि द्रौपदी को जीवन में दूसरों ने दुःख दिया और मुझे अपने सगों ने।" क्या आप अपने समकालीन छत्तीसगढ़ के प्रख्यात लोक रंगकर्मी हबीब तनवीर जी से कभी मिली हैं? इस प्रश्न के जवाब में तीजन बाई बताती हैं कि "एक बार हबीब तनवीर जी, एक कार्यक्रम के सिलसिले में हम लोगों को दिल्ली ले गए थे, साथ में छत्तीसगढ़ के अन्य कलाकार साथी भी थे। कार्यक्रम के अगले दिन अखबार ने मेरी तस्वीरों को प्रमुखता से छापा। खैर उसके बाद से तनवीर जी के साथ कभी कोई काम करने का अवसर नहीं मिला।"
तीजन बाई ने यह भी बताया कि तमाम देशों की यात्राओं में सबसे ज्यादा उन्हें पेरिस पसंद आया। क्योंकि स्वतंत्रता, निडरता और कला को भरपूर सम्मान देने में पेरिसवासियों का कोई जवाब नहीं। वहाँ लोग कलाकारों की बहुत सेवा करते हैं। भाषा की कोई जरूरत ही नहीं है। मैंने भी प्रस्तुति हिंदी में तैयार की थी। पर जब वहां विभिन्न देशों से आए कलाकारों को देखा-सुना सब अपनी-अपनी भाषा में प्रस्तुति दे रहे थे। मैं उनकी भाषाएं नहीं समझ पा रही थी, लेकिन उनकी कला समझ में खूब आ रही थी। तभी मैंने भी निश्चय कर लिया कि मैं भी हिंदी में सुनाने की तकलीफ क्यों उठाऊँ। उनके लिए तो जैसे हिंदी वैसे छत्तीसगढ़ी। अपना देश तो सबसे प्यारा है। खान-पान पहनावा संस्कृति सब में सबसे समृद्ध।
'क्या एक महिला कलाकार होने के नाते आपको कभी किसी मुश्किल का सामना करना पड़ा? या कभी किसी प्रस्तुति के दौरान कोई अप्रिय स्थिति बनी हो? जिसको आप हमसे साझा करना चाहती हों' तीजन बाई बहुत संतोष के साथ कहती हैं कि "मैं देश-विदेश सब जगह घूमी, सब जगह लोगों ने मुझे खूब स्रेह दिया-सम्मान दिया। मंच पर भी कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। इसके कई कारण रहे। एक तो मेरी कद-काठी, व्यक्तित्व, मर्दाना आवाज जिसके कारण किसी की कभी कुछ हिम्मत नहीं पड़ी। दूसरा शालीन स्वभाव और तीसरा देवी-देवताओं की कहानी का प्रभाव।"
जिस गाँव में जन्मी, उसी गाँव में बेटे-बेटियां, बहू, नाती-पोतों से भरे मोहल्ले में तीजन बाई अपनी बेटी के घर में नाती-नातिन के साथ बहुत स्वाभिमान से रहती हैं। भिलाई स्टील प्लांट ने ना केवल तीजन बाई को नौकरी दी अपितु उनके कला के उत्कर्ष हेतु सतत मंच भी उपलब्ध कराया। बीएसपी के प्रति अपनी कृतज्ञता जताते हुए तीजन बाई ने ग्रामवासियों और छत्तीसगढ़ के प्रति भी आभार व्यक्त किया। आने वाली पीढ़ियों तक इस कला को पहुँचाने हेतु तीजन बाई ने बहुत सारे युवाओं को पांडवानी की शिक्षा दी। जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न शिविरों के माध्यम से कला का प्रशिक्षण भी दिया। पर अभी तक कोई समर्पित योग्य शिष्य न मिल पाने का मलाल भी उन्हें खूब है। मोबाइल, टीवी, इंटरनेट के द्वारा मनोरंजन के बढ़ते साधनों का लोक संस्कृति पर पड़ने वाले किसी भी तरह के प्रभावों को नकारते हुए वह कहती हैं कि लोक कलाएँ कभी नहीं मरेंगी। वो समय के साथ अपना सुयोग्य पात्र चुन लेती हैं। और फिर पूरे धज के साथ प्रतिष्ठित हो जाएंगी।
अंत में तीजन बाई ने युवाओं हेतु अपने संदेश में कहा कि शॉर्टकट के चक्कर में कभी नहीं पड़ना चाहिए। युवक-युवतियां पूरी मेहनत करेंगे, सपने देखेंगे तो जरुर सफलता मिलेगी।
तीजन बाई आज न जाने कितनी युवतियों की आदर्श हैं। उनकी असाधारण यात्रा कला साधकों के लिए एक मिसाल है। लेकिन अपने निजी जीवन में आए दुःखों के बादल से उनका मन इतना भारी है कि वह यह कहने से अपने आप को नहीं रोक पाईं कि 'ईश्वर करे तीजन जैसा जीवन किसी भी स्त्री का न हो।'
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| अल्पना त्रिपाठी |
डॉ. अल्पना त्रिपाठी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से नाटक एवं रंगमंच पर शोध कार्य किया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके शोध आलेख एवं कविताएं प्रकाशित है। आजकल भिलाई छत्तीसगढ़ में रह रही हैं।



बढ़िया आलेख।तीजन बाई का अल्पना जी द्वारा लिया गया यह साक्षात्कार हम पाठकों की ओर भी 'पहली बार'ने सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में प्रकाशित किया।इस हेतु आप सभी को हमारा धन्यवाद संतोष जी!
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