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विजय शंकर चतुर्वेदी की कविताएँ

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विजय शंकर चतुर्वेदी  राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिकल्पनाएं भले ही हमें आकृष्ट करती हों, लेकिन यह एक ऐसी निर्मिति है जो हमें मनुष्य और मनुष्यता के स्तर पर  सीमित करती है। राष्ट्रवाद शासकों के हित साधन का भी एक टूल है जिसका उपयोग वे प्रायः अपने हित साधन के लिए किया करते हैं। एक नवजात बच्चे के लिए जाति, धर्म, भाषा की तरह राष्ट्रवाद भी किसी काम का नहीं। जैसे जैसे वह बड़ा होता है वैसे वैसे ये संस्थाएँ उसके अंदर रूढ़िबद्ध होती हैं और उसे सीमित करती हैं। उपनिवेशवादी ताकतें जब भी किसी क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाती थीं तो उनका सबसे पहला निशाना वहां की अर्थव्यवस्था और संस्कृति ही बनती थी। यह यूं ही नहीं है कि लैटिन अमरीका, दक्षिण अमरीका के साथ साथ कई ऐसे मुल्क हैं जिनकी अपनी स्थानीय भाषा और संस्कृति पूरी तरह नष्ट हो गई और वे अपने उस देश की भाषा और संस्कृति का अनुसरण करने लगे जिसने कभी वहां कब्जा जमाया था। गुरुदेव का यह मानना था, "जब तक इस संसार में राष्ट्रों का बोलबाला रहेगा, तब तक हमारे पास अपनी उच्चतर मानवता को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का विकल्प नहीं होगा।" यह उच्चतर मानवता सार्वभौमि...