सुधीर सुमन का आलेख 'विजेंद्र अनिल : लाली हम भोर के'
विजेंद्र अनिल गरीब मेहनकश जनता ने इस दुनिया को आधुनिक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह अलग बात है कि वही जिंदगी की दौड़ में सबसे पीछे छूट गए। ऐसे वर्ग की जिंदगी को बदलने के लिए लिखना एक प्रतिबद्धता के तहत ही हो पाता है। एक बेहतर समाज की स्थापना विजेंद्र अनिल का सपना था। और लेखकीय स्तर पर जो हो सकता था, उसे किया। सुधीर सुमन लिखते हैं "विजेंद्र अनिल की कहानियां बिहार में क्रांतिकारी जन-राजनीति के निर्माण की वजहों और उसके विकास की प्रक्रिया के ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है। मगर इनमें विचारधारा का स्थूल प्रचार नहीं हैं। पहले संग्रह की जन्म, बैल, दूध, आधे पेट, माल मवेशी आदि कहानियों में तो बस बदहाली का यथार्थ चित्र ही पेश कर दिया गया है। इन कहानियों को पढ़ते हुए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह सूदखोरों और जमींदारों के शोषण-उत्पीड़न, सामाजिक भेदभाव, महाजनों की धोखाधड़ी और अपनी निर्धनता के कारण गांव के गरीब मेहनतकश लोग लड़ाई के लिए संगठित हुए होंगे।" आज ही के दिन 3 नवंबर 2007 को विजेंद्र अनिल का निधन हुआ था। उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं सुधीर स...