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विद्या निवास मिश्र का ललित निबन्ध 'पानी बिन सब सून'

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  विद्यानिवास मिश्र  बरसात अपने साथ हरियाली लाती है। गर्मी और उमस के मौसम से हमें निजात दिलाती है। चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई पड़ता है। यह बारिश अपने साथ बाढ़ भी लाती है जिसकी विनाश लीला हमें भयाक्रांत कर देती है। इसकी वजह से तमाम लोगों को विस्थापित होना पड़ता है। नदियों ने तो बहना ही सीखा है। आखिर वे खुद को कैसे रोकें और कहां कहां रोकें। यह ठीक है कि नदी किनारे ही दुनिया कि तमाम सभ्यताएं विकसित हुईं। लेकिन हमने भी तो हद कर दिया। हमने नदियों के पाट तक को नहीं छोड़ा और उनके किनारों को अतिक्रमित करते हुए घर ही नहीं मुहल्ले भी बसा लिए। इस बारिश, पानी और नदी को ले कर मनुष्य ने कई ऐसे शब्द गढ़े जो अब उसकी सांस्कृतिक सम्पदा हैं। विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध पढ़ते हुए हर बार अपनी जमीन की याद आती है। उनके निबंधों में प्रयुक्त देशज शब्द कई बार चौंकाते हैं। ऐसे शब्द जिन्हें हमने कभी न कभी जरूर सुन रखा है, कई बार तो उनका इस्तेमाल भी किया है। लेकिन अब वे हमसे भी छूटते जा रहे हैं। आगे आने वाली पीढ़ी से इस बारे में हम क्या उम्मीद करें। 'हिन्दी की शब्द सम्पदा' जैसी उनकी किताब इस मामले म...

विद्या निवास मिश्र का निबंध 'कुंभ पर्व'

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  विद्या निवास मिश्र  आजकल इलाहाबाद अपने कुम्भ मेले के आयोजन के लिए चर्चा के केन्द्र में है। हिन्दू धार्मिक एवम सांस्कृतिक परम्परा में कुम्भ, कलश या घट का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। बिना कुम्भ के कोई धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता। घट में जल भरा जाता है। यह घट की पूर्णता का द्योतक होता है। इसमें भरा जल प्रतीकात्मक रूप से नदियों के जल का प्रतिनिधित्व करता है। विद्यानिवास मिश्र ने इस घट की आध्यात्मिकता को विश्लेषित करते हुए उचित ही लिखा है ' यह कुंभ जीवन की पूर्णता, उर्वरता और प्रकाशमयता का प्रतीक होने के साथ निखिल सृष्टि के साथ उसके तादात्म्य, समस्त देवत्व के साथ उसके सायुज्य और सर्वभूतहित के लिए उसके उपयोज्य भाव का भी प्रतीक है।' विद्यानिवास मिश्र के निबन्ध विद्वता से भरे तो होते ही हैं, साथ ही उनमें ऐसी सहजता होती है जिससे पाठक सहज ही अपना जुड़ाव महसूस करने लगता है। 'महाकुम्भ विशेष' के अन्तर्गत आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं  विद्या निवास मिश्र का निबंध 'कुंभ पर्व'। महाकुम्भ विशेष : 21 'कुंभ पर्व' विद्या निवास मिश्र कुंभ का नाम लेते ही हमारे सा...

विद्या निवास मिश्र का निबन्ध 'बसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं'

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  विद्या निवास मिश्र ऋतुओं में अल्हड़ होने के कारण ही बसन्त को ऋतुराज कहा गया है। कुछ भी अधिक नहीं। सबमें एक साम्य भाव दिखाई पड़ता है। न अधिक ठंड, न अधिक गर्म। मौसम सुहाना हो जाता है। यह नवागत का स्वागत करता है। नव पल्लव पुराने की जगह लेने के लिए आतुर हो जाते हैं। हमारे यहां जो अधिकांश पर्व त्यौहार हैं वे ऋतुओं पर ही आधारित हैं। बसन्त पंचमी का पर्व ऐसा ही है। बच्चों को इसी दिन विद्यारम्भ कराया जाता है। विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध अपने आप में बेजोड़ हैं। इस बसन्त को ले कर ही उन्होंने अपना चर्चित निबन्ध लिखा था 'बसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं'। सभी को बसन्त की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए इस अवसर पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विद्या निवास मिश्र का निबन्ध 'बसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं'। 'बसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं' विद्या निवास मिश्र दो हजार वर्ष पूर्व किसी प्राकृत कवि ने लिखा— दीसइणं चूअमउलं अत्ता ण अ वाई मलअगन्धवहो। पत्तं वसंतमासं साहइ उक्ककण्ठिअं चेअम्॥ दीखते न बौर कहीं आम के  छू नहीं पाई अभी गंधलदी दखिना पवन। पर अकुलाए चित्त ने साखी भरी  सखि वसंत आ ग...

विद्या निवास मिश्र का आलेख 'वसंत मेरे द्वार'

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विद्या निवास मिश्र वसन्त का मौसम अपने आप में अलबेला होता है। ऋतु हो कर भी सभी ऋतुओं से अलग इसकी अपनी आभा होती है। इसके आने के साथ केवल मौसम ही नहीं बदलता बल्कि प्रकृति का परिवेश तक बदल जाता है। आम में बौर लगने शुरू हो जाते हैं। कोयल की मिठास भरी कूक सुनाई पड़ने लगती है। पेड़ों से पत्ते एक एक कर विदा लेने लगते हैं। नवपल्लव की आमद होने लगती है। वियोग और संयोग के उन्माद भरे स्वर में तब्दील हो जाता है आखिरकार यह वसन्त। शायद ही दुनिया का ऐसा कोई रचनाकार होगा जिसने वसन्त को अपनी रचनाओं में न ढाला हो। विद्यानिवास मिश्र के एक संग्रह का नाम ही है 'वसन्त आ गया मगर कोई उत्कंठा नहीं'। मेरा मन विद्यानिवास जी के ललित निबन्धों का जैसे दीवाना सा है। अपने निबन्धों में वे जहाँ एक तरफ वेद, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों के सामयिक श्लोकों के उद्धरण देते हैं, वहीं दूसरी तरफ लोक गीतों और लोक कथाओं के प्रसंग भी उनके निबन्धों में समावेशित रहते हैं। एक निच्छल और ठेठ भोजपुरिया मन के दर्शन उनके निबन्धों में होते हैं। वसंतोत्सव की बधाई और शुभकामनाएं देते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं विद्यान...