विद्या निवास मिश्र का ललित निबन्ध 'पानी बिन सब सून'
विद्यानिवास मिश्र बरसात अपने साथ हरियाली लाती है। गर्मी और उमस के मौसम से हमें निजात दिलाती है। चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई पड़ता है। यह बारिश अपने साथ बाढ़ भी लाती है जिसकी विनाश लीला हमें भयाक्रांत कर देती है। इसकी वजह से तमाम लोगों को विस्थापित होना पड़ता है। नदियों ने तो बहना ही सीखा है। आखिर वे खुद को कैसे रोकें और कहां कहां रोकें। यह ठीक है कि नदी किनारे ही दुनिया कि तमाम सभ्यताएं विकसित हुईं। लेकिन हमने भी तो हद कर दिया। हमने नदियों के पाट तक को नहीं छोड़ा और उनके किनारों को अतिक्रमित करते हुए घर ही नहीं मुहल्ले भी बसा लिए। इस बारिश, पानी और नदी को ले कर मनुष्य ने कई ऐसे शब्द गढ़े जो अब उसकी सांस्कृतिक सम्पदा हैं। विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध पढ़ते हुए हर बार अपनी जमीन की याद आती है। उनके निबंधों में प्रयुक्त देशज शब्द कई बार चौंकाते हैं। ऐसे शब्द जिन्हें हमने कभी न कभी जरूर सुन रखा है, कई बार तो उनका इस्तेमाल भी किया है। लेकिन अब वे हमसे भी छूटते जा रहे हैं। आगे आने वाली पीढ़ी से इस बारे में हम क्या उम्मीद करें। 'हिन्दी की शब्द सम्पदा' जैसी उनकी किताब इस मामले म...