शालिनी खन्ना की कहानी 'दुर्गा'
शालिनी खन्ना स्त्री सशक्तिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद हमारे समाज में सबसे ज्यादा स्त्रियां ही असुरक्षित हैं। स्त्रियों के लिए खतरा बाहर का ही नहीं होता, यह आन्तरिक भी अधिक होता है। पारिवारिक लोगों से भी उन्हें यह खतरा बराबर बना रहता है। पितृ सत्तात्मक सोच की इंतहा यह कि इस तरह की जो दुर्घटना होती है उसमें दोषी स्त्रियों को ही ठहराया जाता है। उन्हें अपना पक्ष, अपनी बात तक नहीं रखने दी जाती। शालिनी खन्ना की कहानी दुर्गा इसी पृष्ठभूमि पर लिखी गई कहानी है। शालिनी की कहानियों में नारी मनोदशा का वास्तविक चित्रण मिलता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शालिनी खन्ना की कहानी 'दुर्गा'। दुर्गा शालिनी खन्ना फगुनिया ने कटोरे में बसियाया भात निकाला, उस पर दो टुकड़े प्याज के और थोड़ा नमक भी डाल दिया। साथ ही दरवाजे के बाहर लगे मिर्ची के पौधे से दो मिर्ची भी तोड़ लाई और उसके साथ बसियाया भात पानी सहित ही सुड़कने लगी। शायद बरसाती ऊमस वाली गर्मी के कारण भात ज्यादा ही बसिया गया था, इसलिए उसकी खटास कुछ अधिक ही लग रही थी। फिर भी फगुनिया को अच्छा ही लगा और अगर अच्छा न भ...