चन्द्रभूषण का आलेख आल्हखंड का पुनर्पाठ
चन्द्र भूषण आमतौर पर आल्हा ऊदल का नाम सुनते ही हमारे जेहन में बुंदेलखंड अंचल और वहां की वीरता की अनुगूँज सहज ही सुनाई पड़ती है। यह अलग बात है कि भारत में इतिहास और लोक कथाएं आपस मे कुछ इस तरह अन्तर्गुम्फित हैं कि इन्हें अलग कर पाना खासा मुश्किल है। यह दरअसल तेईस लड़ाइयों की दास्तां है और हर लड़ाई में चार-छह ‘तरंगें’ अनिवार्य रूप में आती हैं। हालांकि अल्हैत इनसे सहमत नहीं और वे कुल बावन लड़ाइयों का दावा करते हैं जिसका जिक्र बाबू श्याम सुंदर दास ने अपने सम्पादन में किया है। बहरहाल आल्हा ऊदल की गाथा भले ही बुंदेलखंड अंचल की हो, इसकी ख्याति चारों तरफ रही है। हाल फिलहाल तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों में गवैए इसे पूरे तरन्नुम के साथ गाते बजाते थे। हर्षवर्धन के पश्चात उत्तर भारत में अनेक छोटे छोटे राज्य स्थापित हुए जिनमें गहरवार, चौहान, चंदेल और परिहार शासकों के राज्य प्रमुख हैं। ये राज्य अकसर आपस में ही लड़ा भिड़ा करते थे। कभी यह लड़ाई राज्य विस्तार के लिए तो कभी कभी शौर्य प्रदर्शन मात्र के लिए की जाती थी। कालिंजर के परमार शासक परमार्दि देव के राजकवि जगनिक ने महोबे ...