शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'
भारतीय दर्शन की एक लंबी एवं समृद्ध परम्परा रही है। छठी सदी ई पू में दर्शन की कई ऐसी धाराएं अस्तित्व में आईं जिन्होंने वैदिक दर्शन के समक्ष चुनौती प्रस्तुत किया। इनमें जैन और बौद्ध धर्म सर्वाधिक ख्यात हुए। आगे चल कर इसमें संन्यासियों, वीतरागियों, गोरखपंथियों, कबीरपंथियों आदि की धारा भी समाहित और समंजित हुईं। भारत की समृद्ध चिन्तन परम्परा ने साहित्य को भी काफी हद तक प्रभावित किया। कवि शिवदयाल एक्टिविस्ट भी रहे हैं। एक तरफ जे. पी. आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है तो दूसरी तरफ भारतीय दार्शनिक धारा से वे प्रभावित रहे हैं। इसका उदाहरण उनकी कविताएं हैं। अनुभव संसार व्यापक होने के चलते उनकी कविताओं में पर्याप्त विविधता दिखाई पड़ती है। वर्ष 2024 में उनका पहला कविता-संग्रह 'ताक पर दुनिया' प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की समीक्षा की है जितेन्द्र कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा 'शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'। शिवदयाल की कविताई : सामाजिक स...