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कँवल भारती का आलेख 'रावण : इतिहास या मिथक'

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18वीं सदी की रावण की एक मूर्ति आज बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक पर्व विजयादशमी है। आमतौर पर रावण को बुराई का प्रतीक बताया जाता है और देश भर में रावण के पुतले जलाए जाने का चलन है। लेकिन लोक अपनी अपनी तरह से इन मिथकीय चरित्रों को देखता और स्वीकार करता है। दक्षिण भारत में रावण को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। कई ऐसे ब्राह्मण परिवार हैं जो आज भी रावण को अपना कुल गुरु स्वीकार करते हैं। 'चक्रदत्त' नामक वैद्यक ग्रन्थ में रोगव्याधि-निवारण मन्त्र में रावण को नमस्कार किया जाता है। रावण के दस सिरों को पेरियार नायकर ने उसके दस गुण बताए हैं, जो ये हैं-  (1) एक महान विद्वान्,  (2) बहुत बड़ा संत,  (3) वेद शास्त्रों का ज्ञाता,  (4) अपने सम्बन्धियों व प्रजा का दयालुतापूर्वक पालन कर्ता,  (5) वीर योद्धा,  (6) शक्तिशाली पुरुष,  (7) शूरवीर सिपाही,  (8) पवित्र आत्मा,  (9) परमात्मा का प्रिय पुत्र,  और  (10) वरदानी पुरुष।आमतौर पर यह अवधारणा प्रचलित है कि रावण ब्राह्मण था। लेकिन उसे राक्षस राज भी कहा गया है जिसका वध राम ने किया था। जबकि प्राचीन भारती...

विमल चन्द्र पाण्डेय का उपन्यास अंश 'गुल अब्बास'

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युवावस्था में मन की उमंगें उड़ान भरती रहती हैं। लेकिन गाँव के युवाओं का जीवन उनके अभिभावकों द्वारा नियंत्रित करने की कोशिशें की जाती है। ऐसे में एक संकोच उनके मन में बना रहता है। भले ही शहर में लड़के लड़कियों की आपसी दोस्ती आम हो आज भी गांवों में लड़कियों को ले कर लड़के सतर्क रहने की कोशिश करते हैं। विमल चन्द्र पाण्डेय हमारे समय के ऐसे कथाकार हैं जो अपने समय की प्रतिध्वनियों को अपनी रचनाओं में करीने से रेखांकित करते हैं। हाल ही में उनका उपन्यास 'गुल अब्बास' प्रकाशित हुआ है। पूर्वांचल के समाज की एक झलक इसमें सहज ही देखी जा सकती है। आज विमल चन्द्र पाण्डेय का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विमल चन्द्र पाण्डेय का उपन्यास अंश 'गुल अब्बास'। उपन्यास अंश 'गुल अब्बास' विमल चन्द्र पांडेय  काली और आरके ब्लैक एण्ड व्हाइट नोकिया का पुराना मोबाइल इस्तेमाल करते थे। आरके को स्मार्टफोन के बारे में पता था लेकिन उसने बेटे तक ऐसे किसी आविष्कार के बारे में जल्दी खबर नहीं पहुँचने दी। नौवीं के बाद आरके ने काली की पढ़ाई छुड़वा दी थी और ...

जतिन दास की पेंटिंग्स पर जॉनी एम एल का आलेख और राजेन्द्र शर्मा की कविताएँ

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जतिन दास कला किसी की मुखपेक्षी नहीं होती। वह अपने आप में स्वतन्त्र होती है। कलाकार किस बात से प्रभावित हो कर अपना सृजन करने लगे, इसका पता उसे भी नहीं होता। समय और परिस्थितियां उसे सृजन की तरफ न केवल उन्मुख करती हैं बल्कि उसे रचनाशील भी बनाती हैं। चित्रकला और कविता का सम्बन्ध घनिष्ठ है। गहराई से देखा जाए तो चित्रों में कोई न कोई कविता पढ़ने को मिल जाएगी दूसरी तरफ कविता को ध्यान से पढ़ा जाए तो कोई न कोई पेंटिंग मन मस्तिष्क में उभर आती है। जतिन दास देश के सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों में शामिल हैं। उनकी पेंटिंग्स समय और सरोकारों से जुड़ी होती है। वे समय समय पर अपनी कूची ऐसे विषयों पर चलाते हैं जो बिल्कुल हमारे बीच के होते हैं। लेकिन अपने आप में खोये लोग उन्हें देख पहचान नहीं पाते। जतिन दास ऐसे लोगों की खोज कर न जीवन उन्हें अपनी पेंटिंग में ढालते हैं बल्कि उन्हें मुख्य धारा में ला देते हैं। सफाईकर्मी जो समाज का कूड़ा कचरा साफ करने का काम रोजाना ही करते हैं उनकी नई पेंटिंग्स का विषय हैं। सफाईकर्मियों की कई उम्दा पेंटिंग्स उन्होंने बनाई है। बकौल जॉनी एम एल - जतिन दास मेरे पास आते हैं और कहते हैं, ...