हरिशंकर परसाई का आलेख 'दूसरी आज़ादी' का एक साल
हरिशंकर परसाई लोकप्रियता दोधारी तलवार की तरह होती है। एक तरफ यह आपको आपके काम के प्रति आश्वस्त करती है तो दूसरी तरफ आपको झूठे मोहपाश में भी डाल देती है। 1971 के भारत पाक युद्ध के पश्चात प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। ऐसी स्थिति में धीरे धीरे वे ऐसी स्थिति में पहुँच गईं जिसमें सारे निर्णय वे खुद लेनेलगीं। संस्थाएँ अप्रासंगिक होने लगीं। जय प्रकाश नारायण ने इस तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलन्द किया। उस समय की सारी पार्टियां जयप्रकाश के साथ खड़ी थीं जिसमें तब का जनसंघ भी शामिल था। इसके पश्चात आपात काल लगा। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी सत्ता में आई। जनता पार्टी ने कई ऐसे निर्णय लिए जो प्रतिशोधपूर्ण थे और वह खुद के पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रही थी। व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने तब एक आलेख में लिखा "जिस इन्दिरा गाँधी को ये रोज़ डर दिखाते हैं उसकी वापसी का मार्ग तो यही प्रशस्त कर रहे हैं अपने अकर्म और कुकर्म से। ये जनता को सावधान करते हैं— खबरदार, इन्दिरा गाँधी की तानाशाही लौटने की कोशिश कर रही है। और जनता उसी “तानाशाह” को वोट दे देती है। कैसी विडम्बना है। माना कि...