कर्मेंदु शिशिर का आलेख 'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा'
'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा' कर्मेंदु शिशिर डॉ. रामविलास शर्मा ने नवजागरण की जिस अवधारणा को प्रस्तुत किया था, वह तमाम तरह के विरोध, आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद न सिर्फ स्वीकृत हुआ बल्कि अनेक विचार कनछियों के साथ एक विराट वट वृक्ष की तरह स्थापित हुआ। अब नवजागरण की अवधारणा में इतने विचार वैविध्य का समावेश हो चुका है, उसका इतना विस्तार हो चुका है कि उसे नकारना किसी के लिए संभव नहीं। बावजूद उसके विरोध के स्वर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देते रहे हैं। विचारणीय बात यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल नवजागरण की अवधारणा अपनी मूल प्रकृति में ही उपनिवेशवाद के विरोध में थी। उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बावजूद नवजागरण का विरोध इस बात का सबूत है कि इसके जीवाश्म अभी भी मौजूद हैं, जिसकी उपस्थिति हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ये पाश्चात्य आधुनिकतावादियों की शक्ल में मिलते हैं। इनकी जड़ें इस देश में नहीं होती, ये हथेलियों पर ठगे जड़विहीन लोग हैं। इनकी कोशिशें भारतीय नवजारण के आधार-स्तंभों पर लगातार चोट कर उसे संदिग्ध करने क...