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शैलजा की लम्बी कविता 'ऐसे कौन नाराज होता है'

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शैलजा दुनिया का शायद ही कोई कवि होगा जिसने माँ पर कविताएँ न लिखी हों। दुनिया का सबसे अप्रतिम रिश्ता होता है माँ और उसकी सन्तान का। यह अकथनीय होता है। भारतीय परम्परा में यह मान्यता है कि स्त्री सन्तान को जन्म देने के बाद ही स्त्रीत्व को पूर्ण करती है। माँ स्वाभाविक रूप से अपनी सन्तान के लिए आजीवन चिन्तित और परेशान रहती है और उसके बेहतर जीवन के लिए प्रयास करती रहती है। लेकिन एक दिन आता है जब माँ इस दुनिया से रुखसत कर जाती है। माँ की छत्र छाया के हटने से सन्तानों की दुनिया जैसे अधूरी हो जाती है। यह इसलिए भी कि माँ की जगह इस दुनिया में कोई ले ही नहीं सकता। शैलजा हमारे समय की समर्थ कवयित्री हैं। अपनी लम्बी कविता में उन्होंने माँ को शिद्दत से याद किया है। इस कविता को पढ़ते हुए वे तमाम स्मृतियां एकबारगी जैसे जीवन्त हो उठती हैं जो माँ के रहते हुए जी गई थीं। माँ की डांट फटकार, माँ का स्नेह और प्यार दुलार, पिता के साथ उनकी नोक झोंक सब एक एक कर याद आते हैं। इस रिश्ते में कोई औपचारिकता नहीं बल्कि अनौपचारिकता होती है। यह कविता इस अनौपचारिकता की ही दास्ताँ है। भावनात्मक अहसासों को शब्दबद्ध करना आसान...

सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'व्यंग्य की चकाचौंध का समय'

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सेवाराम त्रिपाठी  कोई भी रचना जब तक अनुभव से आप्लावित नहीं होती तब तक वह किसी को भी प्रभावित नहीं कर पाती। कह सकते हैं कि अनुभव ही किसी रचना को सार्वभौमिकता प्रदान करता है। हरिशंकर परसाई ने अपने लेखकीय पैनेपन से व्यंग्य, जिसे अभी तक दोयम दर्जे का माना जाता था, उसे एक प्रतिष्ठित विधा के रूप में स्थापित कर दिया। एक बातचीत में परसाई जी लिखते हैं “जो जीवन  से तटस्थ है, वह व्यंग्य लेखक नहीं 'जोकर' है। कोई भी सच्चा व्यंग्य-लेखक सामाजिक संघर्ष के संदर्भों से कट कर नहीं रह सकता। आखिर व्यंग्य किस पर किया जाएगा, उन्हीं पर न जो समाज में झूठ, पाखंड, अन्याय, विसंगति पैदा करते हैं। फिर व्यंग्य लेखक तटस्थ कैसे रहेगा? उसे संपृक्त होना ही पड़ेगा। बिना सामाजिक संघर्ष में शामिल हुए व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता- गैर जिम्मेदारी का मसखरापना किया जा सकता है।” आलोचक सेवाराम त्रिपाठी अपने आलेख में लिखते हैं 'व्यंग्य न तो जीवन से तटस्थ हो सकता है और न आम आदमी के संघर्षों, हक़ीक़तों और जटिलताओं से ही।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'व्यंग्य की चकाचौंध  का समय'। आलेख ...

देवेन्द्र आर्य की कविताएँ

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देवेन्द्र आर्य  जल जीवन का आधार है। यह सभी जानते हैं कि जीवन की उत्पत्ति जल से ही हुई। दुनिया की जो भी प्राचीनतम सभ्यताएँ थीं वे नदियों के किनारे ही फली फूली। कुछ नदियां तो आज भी उन देशों की जीवन रेखा तक कही जाती हैं। विकास की होड़ में मनुष्य प्रकृति को नष्ट करता जा रहा है। पेड़ पौधे हों या पहाड़ सबका सम्बन्ध नदियों से है। लेकिन मनुष्य इन सबके साथ निर्ममता से पेश आया है। यह विडम्बना ही है कि धरती पर बहुआयामी और बहुरंगी जीवन का वह लगातार नाश करता जा रहा है और अन्य ग्रहों, उपग्रहों पर जीवन की तलाश रहा है। यह अलग बात है कि जीवन का एक तृण भी कहीं से प्राप्त नहीं हुआ है। हर जगह नदियों की बेहिसाब लूट जारी है बिना यह सोचे कि नदी नहीं बचेगी तो जीवन भी नहीं बचेगा। देवेन्द्र आर्य अपनी कविता में उचित ही लिखते हैं "प्रयोगशालाएं एच टू ओ के अलावा/ कुछ नहीं समझतीं नदी को/ बिकी हैं पैसों पर/ बेच रहीं किस के इशारे पर जीवन अमृत / किसके सहारे चल रहा/ पत्थर बालू मछली केकड़े और जल का कलकल धंधा/ कारखानों के लिए नदी बिकाऊ असलहा है बस"। आज कवि का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए...