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नीरज सिंह की कहानी 'दूसरा आदम'

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नीरज सिंह  लोकतन्त्र की रीढ़ होते हैं चुनाव और इस चुनाव में जनता के एक एक वोट का महत्व होता है। हमारे देश में जाति पांति की व्यवस्था इस चुनाव पर भारी पड़ती रही है। गाँव के रसूखदार लोग तमाम तरह के भय दिखा कर कमजोर लोगों को वोट डालने से रोक दिया करते थे। चुनाव सम्पन्न हो जाता और लोकतन्त्र अपने अंदाजा में चलता रहता। आजकल ई वी एम का जमाना है। ई वी एम का अपना अलग गुणा भाग है। फूल प्रूफ दिखने वाली व्यवस्था पर भी तमाम सवाल उठाये जाते रहे हैं। नीरज सिंह सातवें आठवें दशक के प्रमुख कहानीकार रहे हैं। अपनी कहानी 'दूसरा आदम' में वे बड़ी बारीकी से इन चुनावों की हकीकत बता देते हैं। कहानी की ये पंक्तियाँ पढ़िए " भिखारी सिंह चीख उठता है-ठेंगा लिखा है तुम्हारे संविधान में। गोली मारो इस संविधान को मास्टर..। यह संविधान हिजड़ा है, नपुंसक संविधान है। आज ही गये थे न हम लोग बी० डी० ओ० के पास यह कहने कि वोट के दिन जबरदस्ती की जायेगी बाबुओं द्वारा। जवाब तो तुमने सुना था न बी० डी० ओ० का कि वह कुछ नहीं कर सकता। अगर वोट के दिन मारपीट होती है तो उसकी रोकथाम पुलिस करेगी। लेकिन अब तो मारपीट होने का कोई प...

कुमार कृष्‍ण शर्मा की कविताएँ

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कुमार कृष्ण शर्मा  पहले यह परम्परा थी कि किसान अपने अनाज का एक हिस्सा अगली फसल के बीज के तौर पर सुरक्षित रख लेता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले मौसम में पैदा अन्न बीज बनने की क्षमता नहीं रखते। हमने उन्हें अब हाइब्रिड बना दिया है। कहा जा सकता है कि आज का जमाना ही हाइब्रिड का है। हाइब्रिड बीजों वाले खेत खूब लहलहाते हैं। अनाज भी खूब होता है। लेकिन यह एक कड़वा सच है कि उनमें बीज बनने की क्षमता नहीं होती। यह खेल भी पूंजीपतियों का है। वे चाहते हैं कि किसान हर वर्ष महंगे बीज खरीद कर ही खेत बोये और इसकी आमदनी उनकी जेब में जाए। किसान जिसकी नियति ही परेशान होना है, झक मार कर बीज खरीदता है। पूंजीपतियों की लालची नजर अब किसानों की जमीन पर है। किसी भी तरह अब वे उसे हड़पना चाहते हैं। रचनाकार की नजर इन सब पर है। कुमार कृष्ण शर्मा किसानों की संवेदनाओं से भलीभांति परिचित हैं। अपनी कविता में वे लिखते हैं 'किसान जेब टटोलता है/ उसमें खेतों की मिट्टी है/ सामने वहां बीज के चमकीले पैकेट हैं/ जिनको जेब से मतलब है/ मिट्टी से नहीं'। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुमार कृष्ण शर्मा की कविताएँ। कुमार  क...

हेमन्त शर्मा का आलेख 'कहूं अब नामवर किसको…?'

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नामवर सिंह  'कहूं अब नामवर किसको…?' हेमन्त शर्मा    जीवन की क्षुधा का जल भरी गगरियों से मिलना सामान्य बात है। गगरियां अधभरी हो कर भी छलकती हुई। किनारों पर इकट्ठा पानी में डूबती-उतराती हुई। समाज ऐसी गगरियों का मोहल्ला है। परस्पर ज्ञान, अनुभव और बोध की प्यास साझा करता, बुझाता, तत्काल उत्तर खोजता, लेकिन गगरी की भी अपनी सीमा है, वृत्ति है। उसका दायरा और संभावना भी सीमित है। वो तात्क्षणिक तो है, प्रबंधित और अवलंबनीय नहीं। इसलिए जब गहराई खोजनी हो तो सामने चाहिए होता है एक ज्ञानवापी व्यक्तित्व। कूप सी गहराई वाला। नदी जैसा प्रवाहमान, सरोवर जैसा गठन वाला जिसमें चारों ओर से संभावनाओं की सीढ़ियां उतरती हों, समुद्र जैसा गंभीर और झरने जैसी ताज़गी से भरा। हिंदी के साहित्य मंडल में मैंने जिन लोगों को देखा, जाना, पढ़ा और सीखा, उनमें मेरी इस अपेक्षा का एक ही नाम है- नामवर सिंह। एक सजीव पुस्तकालय, एक संदर्भ ग्रंथ, एक आलोचक, एक चिर-पाठक चरित्र वाला साहित्य प्रवर, एक छह फ़ीट का आदमी जिसकी देह से ले कर वाणी और आचरण तक पूरी भाषा और संस्कृति समाई हुई। आलोचना के तो वे शिखर पुरुष थे ही। नामवर जी ...