मयंक मिश्र की कविताएं
मयंक मिश्र इस सृष्टि में छोटी हो या बड़ी, सभी की अपनी कुछ न कुछ विशिष्टताएं होती हैं। अलग बात है कि नींव के पत्थर को सब देख नहीं पाते, जिस पर पूरी इमारत ही खड़ी होती है। उसे देखने के लिए अंतर्दृष्टि की जरूरत पड़ती है। इसी तरह नुक्ता यानी कि एक बिन्दु का भी अपना महत्व है। इसके बिना शब्दों की संरचना अक्सर लड़खड़ा जाती है। अलग बात है कि यह नुक्ता प्रायः अलक्षित ही रह जाता है। लेकिन कवि की अंतर्दृष्टि से वह अलक्षित नहीं रह पाता। मयंक मिश्र नवोदित कवि हैं, लेकिन उनके पास चीजों, घटनाओं, परिस्थितियों को देखने की अंतर्दृष्टि है। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह कहा जा सकता है कि उनके पास एक कवि दृष्टि है। अपनी कविता 'नुक्ता' में वे लिखते हैं 'हिल जाती घास/ इधर-उधर/ हो जाता है वह बूंद/ ओस का/ और/ बदल जाता है अर्थ'। कवित्व के सफर में मयंक की ये प्रारंभिक कविताएँ हैं। वे यह जानते हैं कि यह सफर आसान नहीं है। फिर भी चयन तो व्यक्ति को खुद करना होता है कि उसे किस रास्ते पर आगे बढ़ना है। कबीर लिखते हैं ' सुखिया सब संसार है, खाए अरु सो...