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परांस-14 : नरेश कुमार खजूरिया की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  दिन और रात को मिला कर ही एक तारीख पूरी होती है। आम तौर पर दिन का जिक्र तो बढ़ चढ़ कर किया जाता है लेकिन रात का जिक्र दबी जुबान में किया जाता है। रात सियाह होती है। रात में सभी आराम करते हैं। नींद लेते हैं। जीवधारी होने के नाते नींद सबकी जरूरत होती है। पहले कभी रात के अँधेरे में अपराधी सक्रिय होते थे लेकिन अब तो दिन दहाड़े सारे अपराध बेखौफ घटित होते हैं। फिर रात पर ही यह तोहमत क्यों? लेकिन एक कवि जानता है कि रात के मतलब अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग होते हैं। कवि नरेश कुमार खजूरिया अपनी कविता में लिखते हैं 'क्या वही मतलब है/ रात का उस औरत के लिए भी/ जिसका कोई घर नहीं है/ बीमार बच्चे की माँ के लिए/ कैसी होती है/ रात?/ जो होती है/ मर्द की रात/ क्या वही औरत की होती है?/ क्या ट्रक ड्राईवर की भी/ रात होती है?/ अपनी झोपड़ी में/ अलाव सेंकता/ हुआ वह सोच रहा है:/ कैसी होती है/ राजा की रात?' सचमुच एक जैसी लगने वाली रात कितने अलग अलग अर्थ अभिप्रायों से भरी होती है। नरेश इन अभिप्रायों को न केवल पहचानते हैं बल्कि उसे बखूबी अपनी कविता में दर्ज भी करते हैं। अप्रैल 2025 से कवि कमल...

रवि रंजन का आलेख "स्मृति का जल और विस्मृति का सूखा : सविता सिंह की ‘यह पानी नीला दर्पण’ कविता का सौंदर्यशास्त्र"

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सविता सिंह  जीवन का आरम्भ जल से हुआ है। जल के बिना जीवन की परिकल्पना तक नहीं की जा सकती। दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुईं। आज की दुनिया के कई महत्वपूर्ण नगर नदियों के किनारे ही अवस्थित हैं। रवि रंजन लिखते हैं ' विश्व की लगभग सभी सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं में जल को जन्म, प्रवाह, परिवर्तन, स्मरण, शुद्धि और पुनर्सृजन के रूपकों से जोड़ा गया है। इसके विपरीत सूखा केवल जल का अभाव नहीं रहा; वह क्षय, रिक्तता, विस्मृति, विघटन और जीवन-ऊर्जा के ह्रास का भी संकेतक रहा है। इसीलिए जल और सूखा मात्र प्राकृतिक अवस्थाएँ नहीं हैं; वे मानव-अनुभव के गहरे अस्तित्वगत और सांस्कृतिक रूपक हैं। एक ओर जल है, जो जोड़ता है, बचाता है, संचित करता है और बहाता है; दूसरी ओर सूखा है, जो संबंधों, स्मृतियों और जीवन के प्रवाह को संकट में डाल देता है। इन दोनों के बीच मौजूद तनाव मनुष्य की आत्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक नियति से जुड़ा हुआ है।' सविता सिंह हमारे समय की महत्त्वपूर्ण कवयित्री हैं। सविता सिंह की एक उम्दा कविता है “यह पानी नीला दर्पण”। इस कविता के हवाले से रवि रंजन पानी के उन व...