कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश 'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'
कल्पना मनोरमा मानव शरीर नश्वर है, यह बात सभी जानते हैं। इसके बावजूद सभी मनुष्यों की अपनी अपनी महत्वाकांक्षाएं होती हैं। किसी की ढंकी छुपी, किसी की खुली खुली। इसके लिए सब भरसक प्रयास भी करते हैं। वे भी जो यह कहते नहीं थकते कि उनकी कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। जनसेवा की बात करने वाले तथाकथित समाजसेवी हों या जन नेता हों या फिर धर्मोपदेश देने वाले महात्मा, सबकी अपनी-अपनी हसरतें होती हैं। कल्पना मनोरमा अपनी डायरी में लिखती हैं "कभी-कभी सोचती हूँ कि इतिहास के बड़े नाम और हमारे समय के छोटे-बड़े नामों में मूल अंतर कितना है? पैमाना अलग है, मनोवृत्ति शायद नहीं। सिकंदर ने संसार जीतना चाहा था। तो क्या हम अपने-अपने छोटे संसार जीतना नहीं चाहते हैं? किसी को भूभाग चाहिए था, किसी को प्रतिष्ठा। किसी को साम्राज्य चाहिए था, किसी को अनुयायी। इच्छा का आकार बदल जाता है, उसकी प्रकृति नहीं।" डायरी लेखन साहित्य की ऐसी विधा है जिस पर आजकल कम बात होती है। लेकिन ये अंश अक्सर ही विचारोत्तेजक होते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश 'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'। डाय...