सीमा आजाद की कहानी अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं'
सीमा आजाद मनुष्य की पहचान में कई कारक अपनी प्रमुख भूमिका निभाते हैं। रंग, नस्ल, धर्म, भाषा कुछ ऐसे कारक हैं जो एक व्यक्ति की पहचान के साथ कुछ इस तरह जुड़ जाते हैं कि इन सबसे अलग कर उसे देखना सम्भव नहीं हो पाता। दुर्भाग्यवश यही सब कारक दंगे फसाद के मूल में भी होते हैं। धर्म के साथ यह दिक्कत कुछ अधिक ही होती है। हर धर्म अपनी कमीज को ही ज्यादा सफेद बताता है जबकि दूसरे धर्म को तमाम खामियों से भरा बताता है। संकीर्ण सोच के चलते यह दिक्कत कुछ और बढ़ जाती है। धर्म हमें सामाजिक समरसता की शिक्षा देते हैं न कि आपसी विद्वेष की। बहुसंख्यक समाज अपने अल्पसंख्यकों को अक्सर सन्देह के नजरिए से देखता है। एक जमाने में यूरोपीय समाज में यहूदियों को ईसाई लोग शंका के नजरिए से ही देखा करते थे। इतिहास गवाह है कि हिटलर ने लगभग साठ लाख यहूदियों को निर्ममता से मार डाला। इनका अपराध यही था कि वे यहूदी थे। आज मुसलमानों के साथ ऐसा हो रहा है। उनका नाम हर आतंकवादी घटना के साथ जोड़ कर लिया जाता है। उन्हें देशभक्ति का सबूत देना पड़ता है। उन्हें मॉब लिंचिंग का शिकार होना पड़ता है। एक डर उनके मन मस्तिष्क में बैठ जाता ह...