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कैलाश बनवासी की कहानी 'मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम'

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कैलाश बनवासी मनुष्य सब कुछ महज अपने फायदे के लिए नहीं करता। समय और समाज के लिए जो भी जरूरी समझता है, वह उसे करने का प्रयास करता है। लेकिन आज के भौतिकवादी समय में सभी चीजों को फायदे की तुला पर तौल कर देखा जाने लगा है। हमारा समाज जो लिखने पढ़ने से वैसे भी विरक्त रहा है, साहित्य को अजीब नजरिए से देखता है। लोग सवाल पूछते हैं 'कविता कहानी लिखने से क्या मिलता है'? उन्हें नहीं पता कि यह साहित्य स्वतः स्फूर्त ढंग से उपजता है। रचनाकार एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इस दायित्व को निभाता है। वह इसे नफे नुकसान की तुला पर तौलने के बारे में सोचता ही नहीं। दुनिया को बदलने में इन रचनाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कहा जाता है कि रूसो का साहित्य हर फ्रांसीसी क्रांतिकारी अपने सिरहाने रखता था। मांटेस्क्यू के विचारों ने निरंकुशता की जकड़बंदी को तोड़े में प्रमुख भूमिका निभाई। वाल्टेयर के व्यंग्य ने लोगों को अन्दर से झकझोर दिया। हमारे यहां वन्देमातरम में जाने कितने क्रांतिकारियों को देश के लिए कुर्बान होने की प्रेरणा प्रदान की। अपनी फांसी से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। कार्ल मार्क्स क...

हेमन्त शर्मा का आलेख 'तवायफें न होतीं तो बिस्मिल्लाह न होता'

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'तवायफें न होतीं तो बिस्मिल्लाह न होता' हेमन्त शर्मा  शहनाई बड़ा अजीब वाद्य है। उसमें अपना कुछ नहीं होता। न तार, न थाप, न गले की कशिश. बस एक खोखली नली और उसमें फूँक मारता हुआ आदमी। लेकिन यही खोखलापन उसकी ताक़त है। जितना भीतर खाली, उतनी दूर तक आवाज़। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने इसी खालीपन को अपने सुरों से भर दिया. वह शहनाई नहीं बजाते थे, उसमें अपनी साँस छोड़ते थे। फिर वह साँस उनकी नहीं रहती थी. उसमें बनारस बोलता था, गंगा बहती थी, मंदिर की घंटियाँ बजती थीं और नमाज़ की तल्लीनता उतर आती थी। वह सीधे मौला से बतियाते थे. इसलिए उन्हें खुदा के लिए किसी मंदिर-मस्जिद की जरूरत नहीं थी। उस्ताद ऐसे बनारसी थे जो गंगा में वज़ू करके नमाज़ पढ़ते थे और सरस्वती को यादकर शहनाई की तान छेड़ते थे। इस्लाम में संगीत के हराम होने के सवाल पर हँस कर कहते थे—“ इस्लाम में संगीत की मनाही है, तो क्या हुआ क़ुरान की शुरुआत तो ‘बिस्मिल्लाह’ से ही होती है।” बिस्मिल्लाह ख़ाँ के लिए संगीत, सुर और नमाज़ एक ही चीज़ थे। वो मंदिरों में शहनाई बजाते थे, सरस्वती के उपासक थे और गंगा नदी से भी उन्हें बेपनाह लगाव था। साथ ही पा...

प्रतुल जोशी का संस्मरण 'मेरे हिस्से का बंगाल'

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प्रतुल जोशी  आज का पश्चिम बंगाल वामपन्थ वाया तृणमूल होते हुए भाजपा के शासन तक का सफ़र तय कर चुका है। एक समय में वामपन्थ का गढ़ रहे बंगाल के इस मुक़ाम तक पहुंचने के तमाम कारण रहे हैं। बाद के दिनों के वामपंथी शासन में जो अराजक स्थितियाँ उत्पन्न हुईं उसने उसकी क़ब्र तैयार कर दी जिसका फ़ायदा तृणमूल ने उठाया। वैसे यह बंगाल भारत का सबसे जागरूक प्रान्त माना जाता है जहाँ साहित्य, संगीत और संस्कृति की जड़ें आम जनता तक में समाहित हैं। रबींद्र संगीत की अनुगूंज हर जगह महसूस की जा सकती है। कोलकाता आज भी सांस्कृतिक गतिविधियों का गढ़ है।  एक कहावत है कि 'बंगाल जो आज सोचता है वह पूरा भारत वही सौ साल बाद सोचता है।' बंगाल की यह पहचान उसके बुद्धिजीवियों के कारण ही है। राजा राम मोहन रॉय से शुरू हुई प्रतिवाद की परम्परा वहाँ आज भी कायम है। भारत को साहित्य में जो एकमात्र नोबेल मिला उसे पाने का श्रेय रबींद्र नाथ ठाकुर को ही है। भारत का राष्ट्र गान हो या राष्ट्र गीत उसे बंगाली रचनाकारों ने ही रचा है। वामपंथी शासन में भी वहां दुर्गापूजा का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता था। आकाशवाणी से वीरेन्द्र कृष्ण भट्ट...

ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'चिट्ठी ना कोई सन्देश, जाने ये कौन सा देस!'

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ललन चतुर्वेदी  आज मोबाइल के जमाने में भले ही पत्र लिखना और भेजना लगभग अप्रासंगिक हो गया हो, पत्र लिख कर सन्देश भेजने की परम्परा पुरानी है। इसके लेखन का एक तरीका होता था जो शुरुआती छात्र जीवन में सिखाया जाता था। और प्रेमी प्रेमिका के लिए ये पत्र रोमांच भरे होते थे । पत्र के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा करना और पत्र पाने पर हुलसना आज के प्रेमी प्रेमिकाओं को नसीब कहां। शब्द वैसे भी बहुत कुछ कह डालते हैं और पत्र के साथ स्पर्श भी तो जुड़ा होता है। पहले के जमाने में जब शिक्षा सीमित थी अशिक्षित लोग पत्र लिखवाने के लिए पढ़े लिखे लोगों के पास आ कर पत्र लिखवाते थे। उन अनुभूतियों को शब्दबद्ध करना आसान नहीं होता था। आज की पीढ़ी पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय, लिफाफा और बैरंग पत्रों के मिजाज से शायद ही परिचित हो। साहित्य में तो इस पत्र लेखन से पूरे काल खण्ड की जानकारी मिल जाती थी। इसलिए रचनाकारों के पत्र प्रायः सम्भाल कर रखे जाते और प्रकाशित किए जाते। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में उन दिनों को शिद्दत से याद किया है। यह आलेख कुछ व्यंग्यात्मक पुट भी लिए हुए है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ...