इसराइल की कहानी 'फ़र्क़'
इसराइल होना तो यह चाहिए कि जमीन पर किसान काबिज होते। लेकिन उनके पास प्रायः जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं होता। जिन जमींदारों के पास सैकड़ों बीघे जमीन होती है, उनका परिश्रम से इनका कोई लेना देना नहीं होता। ये अपनी जमीन बटाई पर या अधिया पर किसानों को दे कर निश्चिन्त रहते हैं। फसल तैयार होने पर इन्हें बैठे बिठाए अनाज मिल जाता है। अनाज उपजाने के बावजूद किसान जीवनयापन तक के लिए सालों साल संघर्ष करता रहता है। अतिरिक्त जमीन किसानों को उपलब्ध कराने के लिए विनोबा भावे ने भूदान आन्दोलन शुरू किया था। हालांकि यह आन्दोलन भी महज कर्मकाण्ड बन कर रह गया। शीघ्र ही इसकी विकृतियां और पाखण्ड सामने आ गए। खेती किसान करते और जब फसल तैयार होती तो जमींदार के कारिंदे अपने लठैतो के साथ आ कर फसल काट ले जाते। बदलते समय के साथ किसानों के घर परिवार की नई पीढ़ी जब प्रतिवाद करने लगी तब संघर्ष आरम्भ हुआ। इसराइल ने अपनी कहानी 'फर्क' के जरिए इस यथार्थ को सामने लाने का काम किया है। हिंसा अहिंसा की बात करने वालों को वे बारीकी से इसके दर्द को समझाने की कोशिश करते हैं। इसराइल ने किसानों कामगारों के जीवन की विडम्बना को स...