स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'झांसी प्रवास की स्मृतियाँ'
स्वप्निल श्रीवास्तव हर शहर अपने आप में विशिष्ट होता है। उसकी भौगोलिक स्थिति, उसका इतिहास, उसकी परम्परा, वहाँ से जुड़े विशिष्ट व्यक्ति उसे एक अलग पहचान प्रदान करते हैं। उसकी खूबी को वहां जा कर ही महसूस किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में अवस्थित झांसी ऐसा ही एक शहर है जिसकी अपनी एक अलग आभा है। झांसी का नाम लेते ही याद आती हैं रानी लक्ष्मी बाई, जिन्होंने 1857 में अद्भुत शौर्य के साथ अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। याद आती है बचपन की किताबों में पढ़ी सुभद्राकुमारी चौहान की कालजई पंक्तियाँ 'बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी'। मैथिली शरण गुप्त और सियाराम शरण गुप्त अनायास ही याद आते हैं। 'मुझे चांद चाहिए' जैसा अद्भुत उपन्यास लिखने वाले सुरेन्द्र वर्मा और इतिहास को साहित्य में ढालने वाले वृंदावन लाल वर्मा इसी मिट्टी की खुशबू हैं। अनाम रह जाने वाले ओम शंकर असर जैसे यारबाश की यादें मन मस्तिष्क में घुमड़ने लगती हैं जिनके पास हिन्दी साहित्य की तमाम स्मृतियाँ, अनेक पुरानी पत्रिकाओं के अमूल्य अंक और दुर्लभ किताबों का खजाना था। झांसी का किला जैसे आज भी अपनी कह...