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कुमार अंबुज की कविताएँ

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कुमार अंबुज कविता की दुनिया में कुछ कवि ऐसे हैं जिनका लिखा काफी कुछ अपना लगता है। पढ़ने गुनने का मन होता है। जो सत्ता की चाटुकारिता करता है वह भांड होता है। जो सत्ता की आलोचना करता है वह कवि होता है। कवि तो बेखौफ होता है। वह बेखौफ लिखते हुए ही अच्छा लगता है। आज के दौर में जब मीडिया के साथ साथ साहित्य भी सत्ता का पिछलग्गू बन चुका है, कुमार अंबुज बेखौफ कविताएँ लिख रहे हैं। लगातार लिख रहे हैं।  आज उनका जन्मदिन है।  प्रिय कवि को जन्मदिन की बधाइयाँ व ढेर सारी शुभकामनाएँ!  आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं कुमार अंबुज की कविताएँ।  कुमार अंबुज की कविताएँ एक ही प्रेम  एक प्रेम काफ़ी है ज़िन्दा रहने के लिए  एक ही प्रेम नष्ट होने के लिए  पर्याप्त है एक प्रेम का दंड एक का ही वरदान कर देता है धन्य  एक प्रेम की निराशा फैल जाती है दूर तक और वही थाम लेता है आशा का चिथड़ा  एक प्रेम से ऊब पैदा होती है, उसी से तृप्ति एक प्रेम सूर्योदय और सूर्यास्त के लिए  वही काफ़ी है रात में चाँद सितारों के वास्ते एक प्रेम की व्यग्रता हो सकती है बर्दाश्त सँभाली जा सकती है बस ...

शेखर सिंह की कविताएँ

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शेखर सिंह  मनुष्य की यह सामान्य फितरत है कि वह दूसरे के बारे में जानने समझने की जिज्ञासा से हमेशा भरा होता है। जब भी किसी परिचित से हम मिलते हैं तो सामान्य तौर पर हमारा यह पहला सवाल होता है कि 'कैसे हो?' सामने का व्यक्ति चाहें वह जिस परिस्थिति में हो, जवाब देता है कि 'ठीक हूँ'। यह सवाल और जवाब इतना रूटीन टाइप्ड हो चुका है कि अक्सर अभिनय सरीखा लगता है, बावजूद इसके यथावत चलता रहता है। यथावत इस तरह कि दो चार क्षण थम कर आपस में इत्मीनान से कुछ बात तो कर ली जाए।  लेकिन एक कवि इसे अस्वीकार करता है उसके लिए यह परिस्थिति भी कुछ अलग तरह की होती है। युवा कवि शेखर सिंह अपनी कविता में लिखते हैं "पूछूँगा नहीं/ कि कैसे हो/ अगर तहज़ीब और सरलता के/ आपसी शीत युद्ध में/ शहादत हमेशा आपसी क़रार की होनी हो/ ...अगर समय की कमी/ और बेमतलब की भागदौड़ में/ हमेशा ख़ुदकुशी करना पड़ता हो/ ज़रा से ठहराव को/ तो बिलकुल नहीं पूछूँगा"। एक लम्बे अरसे बाद पहली बार पर शेखर की कविताएँ साया हो रही हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर सिंह की कुछ बिल्कुल नई कविताएँ। शेखर सिंह की कविताएँ  जिरहबख़्तर...

पीयूष कुमार का आलेख 'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें'

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पीयूष कुमार  जैसे जैसे हम विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं वैसे वैसे दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। साहित्य अपने समय के सरोकारों को बारीकी से दर्ज करने का काम करता है और इस क्रम में इन दिक्कतों को भी हमारे समय के कहानीकार दर्ज कर रहे हैं। विधा के अन्तर्गत देखें तो कहानियों में यह अभिव्यक्ति और सार्थक रूप में दिखाई पड़ती है। बया के हालिया प्रकाशित कहानी केंद्रित अंक ने एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। इस अंक में कुल सत्ताइस कहानियाँ शामिल है। पीयूष कुमार ने इन कहानियों में से नौ कहानियों को आधार बनाते हुए यह आलोचनात्मक आलेख लिखा है। ये नौ कहानीकार हैं : मधु काँकरिया, महेश दर्पण, रत्न कुमार सांभरिया, रामजी यादव, अंजलि देशपांडे, धनेश दत्त पांडेय, समीना खान, ममता शर्मा और सुमन शेखर। खुद पीयूष कुमार लिखते हैं "यह कहानियाँ जीवन सरोकार की कहानियों के लिहाज से चयनित की गई हैं जिनमें जीवन की कथा निराशा, टूटन, कायरता, जानलेवा संघर्ष, भय और सामाजिक-आर्थिक पराजय के रूप में नजर आती है। यह इस समय की प्रतिनिधि कहानियाँ हैं ऐसे में क्या यह मान लेना चाहिये कि उम्मीद और सुखांत का जीवन अब समाप्त हो गया...