शुभा मिश्रा की कविताएँ
शुभा मिश्रा पुरुष मानसिकता आज भी स्त्रियों को दोयम दर्जे का मानती है। स्त्रियों के प्रति अपराधों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। स्त्री लगातार संघर्ष करती है। स्त्री घर की चारदीवारी में आजीवन बंध कर रह जाती है। वह मिट्टी के दीये जैसी सतत जलती रहती है। उसका प्रकाश खुद के लिए नहीं होता बल्कि औरों को उजाला देने के लिए होता है। अपने घर परिवार के लिए भूख और प्यास बर्दाश्त करती रहती है। और यह बर्दाश्त करना आजीवन चलता रहता है। स्त्री होने के नाते शुभा मिश्रा इससे वाकिफ हैं और बखूबी अपनी कविता इसे दर्ज करती हैं। अपनी एक कविता में शुभा लिखती हैं : 'यमराज से भी छल कर जाती हूँ/ लबालब भरी हुई/ न जाने कब रिक्त हो जाती हूँ/ ये चमत्कार नहीं तो/ और क्या है/ युग बीत गए/ प्रेम भरे हृदय को नहीं बदल पाती हूँ/ कंठ सूख गए/ जिह्वा जकड़ गई/ गाँव बदल गए शहरों में/ गोबर लिपे आँगन बदल गए/ चमचमाती बालकनी में/ स्वप्न बदले, हकीकत बदली/ प्रणय की परिभाषा वही प्राचीन पाती हूँ।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शुभा मिश्रा की कविताएँ। शुभा मिश्रा की कविताएँ खसरापाँचसाला मैंने ज्यादातर आदिवासी औरतों के हाथों में...