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सुप्रिया पाठक का आलेख 'भारत में स्त्री मुक्ति के वादे और इरादे'

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सुप्रिया पाठक  आदर्श किसे अच्छा नहीं लगता। लेकिन आदर्शों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह होती है कि वे इसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं होता। आदर्श सुनी सुनाई बात की तरह होता है जिसका कोई वास्तविक वजूद नहीं होता। इस तरह देखा जाए तो आदर्श बिल्कुल अलग होता है और उसे व्यावहारिक रूप प्रदान करना बिल्कुल अलग बात। स्त्रियों के सन्दर्भ में हमारे समाज का रवैया इस आदर्श और व्यवहार के बीच फर्क को स्पष्ट तौर पर दर्शाने वाला है। एक तरफ मनुस्मृति के अध्याय 3 श्लोक 56 में कहा गया है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।/ यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।' अर्थात 'जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं, जहाँ नारियों की पूजा नहीं होती है वहाँ समस्त (अच्छी से अच्छी) क्रियाएं (कर्म) निष्फल हो जाती हैं।' वहीं दूसरी तरफ हमारे सामाजिक जीवन में स्त्रियों को तमाम किस्म की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है। अनेक नियम कानून के बावजूद स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा लगातार बढ़ी है। सम्पत्ति के मामले में स्त्रियों को अपना हक पाने में तमाम जद्दोजहद करनी पड़ती है। संसद...

शर्मिला जालान का आलेख 'स्त्री कविता का वितान : पहचानी हुई अनिवार्य स्थितियों का सजीव चित्रण'

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शर्मिला जालान  पुरुष और स्त्री जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। एक के बिना इस गाड़ी के आगे बढ़ने की कल्पना नहीं की जा सकती। ऋग्वेद में इन्द्राणी का कथन है कि 'मैं समाज में मूर्धन्य हूँ। मै अग्रगण्य हूँ और उद्भट वक्ता हूँ।' 'अहं केतुरहं मूर्धाऽहमुग्रा विवाचनी।' इन्द्राणी का यह कथन संकेत करता है कि मैं बलहीन नहीं हूँ, अपितु बलयुक्त हूँ। मूर्धन्यता उसने अपने बूते प्राप्त किया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में स्त्री को अर्द्धांगिनी अर्थात पुरुष आधा भाग कहा गया है। 'अर्द्धो वा एष आत्मनः यत पत्नी'। इसके बावजूद स्त्रियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा। महिलाओं ने बराबरी का जायज हक पाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखा।  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को ख़ास बनाने की शुरुआत आज से 115 बरस पहले यानी 1908 में तब हुई, जब क़रीब पंद्रह हज़ार महिलाओं ने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में एक परेड निकाली। उनकी मांग थी कि महिलाओं के काम के घंटे कम हों। तनख़्वाह अच्छी मिले और महिलाओं को वोट डालने का हक़ भी मिले। एक साल बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का एलान...

अज्ञेय का संपादकीय आलेख 'हिंदुत्व की परिभाषा'

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  अज्ञेय एक जमाना था जब साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, धर्मयुग, सारिका और माया जैसी पत्रिकाओं की धूम थी। इसमें छपने का मतलब ही होता था लेखक बिरादरी में शामिल हो जाना। हिन्दी साहित्य के कई बड़े नाम इन पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे। ये पत्र तब सही मायनों में लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका निभाते थे। दिनमान के सम्पादक प्रख्यात साहित्यकार  सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय थे। दिनमान के सम्पादकीय में वे अपने विचार खुल कर व्यक्त करते थे। मनोज मोहन के पास पुरानी पत्रिकाओं का खजाना है। यह संपादकीय उन्हीं के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। मनोज मोहन लिखते हैं ' 1969 का चुनाव होने वाला था। अज्ञेय दिनमान के संपादकीय में हिंदुत्व के ख़तरे पर साफ़-साफ़ लिख रहे थे...।' आज उनके जन्मदिन 7 मार्च के अवसर पर हम उनके इस महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय आलेख को प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अज्ञेय का संपादकीय आलेख 'हिंदुत्व की परिभाषा'। संपादकीय 'हिंदुत्व की परिभाषा' मध्यावधि चुनाव ज्यों-ज्यों निकटतर आते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों की सरगर्मियाँ बढ़ रही हैं, त्यों-त...

अनामिका सिंह की गजलें

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अनामिका सिंह  परिचय -   नाम- अनामिका सिंह  जन्म तारीख - 09 अक्टूबर 1978 जन्मस्थान -इन्दरगढ़ जिला कन्नौज  वतर्मान निवास - शिकोहाबाद, फिरोजाबाद माता – श्रीमती देशरानी  पिता – श्री श्रीकृष्ण यादव  शिक्षा - परास्नातक विज्ञान एवं समाज-शास्त्र, बी.एड. संप्रति -शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश में कार्यरत अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित ग़ज़लें / नवगीत प्रकाशन प्रकाशित कृतियाँ   'न बहुरे लोक के दिन’ नवगीत संग्रह (बोधि प्रकाशन -(2021) नवगीत संग्रह- 'अँधेरा कुछ तो होगा दूर' (बिम्ब प्रतिबिम्ब प्रकाशन) 'अक्षर अक्षर हव्य', दोहा संग्रह, श्वेतवर्णा प्रकाशन (2024) ‘उम्मीदों के गीत-पंख' गीत संग्रह (2024) श्वेतवर्णा प्रकाशन  ‘राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' ग़ज़ल संग्रह सम्पादन- ‘आलाप’ समवेत नवगीत संकलन (2023) शुभदा बुक्स प्रकाशन 'सुरसरि के स्वर'  समवेत छंद संकलन , श्वेतवर्णा प्रकाशन (2020) सम्पादन - 'अंतर्नाद' साहित्यिक पत्रिका   सह-सम्पादन ‘कल्लोलिनी’ साहित्यिक पत्रिका सम्पादक/ संचालक ‘कंदील' समकालीन कविता पर एकाग्र साहित्यिक समूह लेखन विधा – ग़ज़ल ...