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सुरजीत मजूमदार का वक्तव्य 'भूमंडलीकरण के बाद की आर्थिक प्रक्रियाएं और अमेरिकन पूँजी'

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सुरजीत मजूमदार विविधताएं किसे नहीं सुहाती। विविधताओं से भरी हुई अपनी यह धरती खूबसूरत दिखती है। बोली, भाषा, संस्कृति, धर्म, नस्ल आदि विविधताओं से भरी यह दुनिया अपने आप में नायाब है। लेकिन कुछ शक्तियों के लिए यह बर्दाश्त नहीं कि दुनिया अपनी मर्जी से चले। ये ताकतवर शक्तियाँ चाहती हैं कि उनकी मर्जी के बिना पत्ता तक न हिले। वे अपनी भाषा, बोली, धर्म और मुद्रा तक का वर्चस्व पूरी दुनिया पर चाहती हैं। अमरीका इन शक्तियों का सरगना है।  शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व स्तर पर अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ा। इसके बाद भूमंडलीकरण की ज़मीन तैयार की गई Washington Consensus (WC) के जरिए। वाशिंगटन कंसेंसस, यानी अमेरिका के वाशिंगटन शहर में स्थित तीन संस्थाओं — ‘विश्व बैंक’, ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ और ‘यू.एस. ट्रेज़री’ — द्वारा सुझाए गए दस नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के फ़ॉर्मूले ने निजीकरण, मुक्त व्यापार, टैक्स सुधार और डी-रेगुलराइजेशन की वकालत की और पूरी दुनिया को भूमंडलीकरण के जाल में बुरी तरह उलझा दिया।  लेकिन अब महाशक्ति के तौर पर उसका आसन डोलने लगा है। चीन की शक्ति की आहट को अब सब महसूस क...

प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख्वाब'

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प्रज्ञा पत्रकारीय जीवन प्रायः बेतरतीब होता है। पत्रकारों को रोज ही कोई न कोई नई लकीर खींचनी होती है। उनकी नजर आम तौर पर उन तथ्यों या सूचनाओं पर होती हैं जो उनके अखबार के लिए बिकाऊ हो सके। ऐसे में कई बार हवा में तीर चलाना पड़ता है। वैसे उन सभी काम काज में ही ऐसा ही होता है जहां हर रोज भारी अनिश्चितता होती है। कई ऐसे काम काज हैं जहां रोज कुँवा खोदना और पानी पीना होता है। देश की अधिकांश जनता ऐसा ही अनिश्चित जीवन यापन करती है। समकालीन कहानीकारों में प्रज्ञा ने अपने कहन और अनूठे शिल्प से पाठकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। 'चांद जैसे ख्वाब' उनकी ऐसी ही कहानी है। जिसमें एक पत्रकार जो लक्ष्य ले कर एक जमाने के चर्चित कवि शशांक निकेत जी की पत्नी के पास बातचीत करने पहुंचती है लेकिन बातचीत का सूत्र बेतरतीबी से कवि पत्नी और उनके लेखकीय जीवन की तरफ मुड़ जाता है। वह जीवन जिसके बारे में कवि पत्नी अब यह भी बिसर गई हैं कि उन्होंने पहले कुछ इस तरह का लिखा था। प्रज्ञा की यह कहानी हमने 'बनमाली कथा' से साभार लिया है । तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख...

हेमन्त कुमारी देवी का आलेख 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं'

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हेमन्त कुमारी देवी  हेमन्तकुमारी देवी ने  मर्यादा के 1914 अंक में 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं' नामक एक आलेख लिखा था। यह आलेख स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उस समय स्त्रियों पर कैसी बंदिशें थीं। हेमन्तकुमारी ने अपने इस आलेख में वे रास्ते बताए हैं जिस पर चल कर स्त्रियाँ एक सम्मानित जीवन जी सकती हैं।  वर्ष 1888 में हेमन्त कुमारी देवी ने ‘सुगृहिणी’ नामक स्त्री पत्रिका नागरी भाषा में निकाली थी। हिन्दी नवजागरण काल के इतिहास में किसी स्त्री द्वारा संपादित ‘सुगृहिणी’ पहली पत्रिका और श्रीमती हेमन्त कुमारी देवी हिन्दी साहित्य इतिहास में पहली स्त्री संपादिका है। ऐसा इसलिये कि श्रीमती हरदेवी की पत्रिका ‘भारत भगिनी’ सन 1889 में निकली थी। ‘सुगृहिणी’ पत्रिका का पहला अंक फरवरी 1888 में निकला था। नवजागरणकालीन यह पत्रिका सुखसंवाद प्रेस, लखनऊ में पण्डित बिहारी लाल के द्वारा मुद्रित होती थी। इस पत्रिका में कुल बारह पृष्ठ होते थे। ‘सुगृहिणी’ का पहला और आखिरी पृष्ठ रंगीन हुआ करता था। जिस समय हिन्दी में बालकृष्ण भट्ट, बदरी नारायण चौधरी, राधाचरण गोस्वामी और ...