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यादवेन्द्र का आलेख 'अथाह पानी में डूब गई माटी'

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  विद्यासागर नौटियाल विकास अपने आप में एक विवादास्पद शब्द है। आजकल का विकास ऐसा है जो तात्कालिक रूप से तो बेहतर दिखाई पड़ता है लेकिन दूरगामी दृष्टि से इसका प्रभाव नकारात्मक होता है। तकनीक के मामले में निश्चित रूप से हम बहुत विकास कर गए हैं लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि इसने हमारे पर्यावरण को तहस नहस कर दिया है। नेपाल की त्रासदी इसका जीवन्त उदाहरण है। तिब्बत के ऊँचाई वाली जगहों पर बड़े बड़े बांध बना कर जो असंतुलन पैदा किया गया है उसके दूरगामी परिणाम कुछ इसी तरह भयावह होंगे। टिहरी बाँध से हम सब परिचित हैं। लेकिन यह बात कम लोगों को मालूम होगी कि इसके अंदर भागीरथी और भिलंगना नदियों के तट पर बसा टिहरी का पुराना शहर दफ़न है। उस समय इसे बचाने के लिए शहर के लोगों ने धरना, प्रदर्शन, हड़ताल कर अपना प्रतिरोध व्यक्त किया था। लेकिन सरकारों की ज़िद के आगे प्रायः लोगों की ज़िद कहां चल पाती है। विद्यासागर नौटियाल ने टिहरी की इसी पृष्ठभूमि को अपनी कहानी 'माटी वाली' में शिद्दत से दर्ज़ किया है। यादवेन्द्र जी ने इस कहानी के बहाने अपनी उस संस्कृति और परम्परा को याद किया है जिसकी नींव पर आज ह...

प्रेम कुमार मणि का आलेख

  'मेरी दृष्टि में राधाकृष्णन'   प्रेम कुमार मणि बचपन से 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस का स्वाँग देखता रहा हूँ। जब विद्यार्थी था तब इस अवसर पर शिक्षकों के कल्याण के लिए एक कोश इकट्ठा किया जाता था। यह सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। इस अवसर पर स्कूलों में कुछ आयोजन किया जाता था। वह महान हैं के पाठ सुनते-सुनते हमारी पीढ़ी ऊब गई थी।  जब कॉलेज में पहुंचा तब इनके बारे में कुछ विशेष जाना। कुछ पढ़ा भी इनका लिखा। मेरे गुरु भिक्षु जगदीश काश्यप जी थे। राधाकृष्णन उनके मित्र थे। उनसे एक बार चर्चा की और अनुरोध किया कि राधाकृष्णन जी के बारे में कुछ बतावें। वह हँस कर टाल गये। उनकी किताब 'इण्डियन फिलॉसफी' पढ़ने के लिए कहा। उनकी एक किताब 'उपनिषदों की भूमिका' मैंने हिन्दी में पढ़ी थी। वह आकर्षक लगी थी। 'इण्डियन फिलॉसफी' के बारे में भी बहुत सुना था। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उस में कुछ विशेष नहीं दिखा। संभव है अधिक समझने का सामर्थ्य मुझ में नहीं रहा होगा। हाँ, जब वह किताब छपी थी तो इस विषय पर एक कायदे की किताब रही होगी। राहुल जी ने अपनी किताब 'दर्शन-दिग्दर्शन' में उ...

सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'लेखकीय दुनिया की आबोहवा'

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सेवाराम त्रिपाठी साहित्य, संस्कृति हो या राजनीति आजकल जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों और प्रतिमानों की गिरावट सहज ही देखी जा सकती है। राजनीतिक मूल्यों और प्रतिबद्धताओं में गिरावट से सहज ही इस बात को समझा जा सकता है, जो हमेशा नेतृत्वकारी भूमिका में होती है। प्रेमचंद ने साहित्य को आगे चलने वाली उस मशाल के रूप में देखा जो राजनीति तक को दिशा दिखाती है। लेकिन लगता है वह दौर बीत गया। साहित्य में भी पतनशीलता की यह प्रवृत्ति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। जिनके कन्धों पर समाज को दिशा दिखाने की जिम्मेदारी थी वे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भाड़ बनने की होड़ में लग गए हैं।  पद, पुरस्कार और सम्मान पाने के लिए लेखक किस तरह की जोर जुगत लगाते हैं इससे लगभग सभी वाकिफ़ हैं। एक समय था जब प्रकाशक लेखकों को रॉयल्टी प्रदान किया करते थे। आज छपने की होड़ इस कदर है कि लेखक रॉयल्टी शब्द से ही अपरिचित हैं। प्रायः अपना पैसा लगा कर ही तथाकथित लेखक अपनी किताबें छपवा रहे हैं। ऐसे लेखकों का सिरदर्द होता है जगह जगह पर किताबें भेजना जिससे उस किताब की चर्चा हो सके। ये लेखक इस प्रयास में भी लग जाते हैं कि कोई पुरस्कार झटक ...

परिचय दास का आलेख 'कृष्ण : जीवन के सबसे सुंदर अर्थ की तरह'

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परिचय दास  'कृष्ण : जीवन के सबसे सुंदर अर्थ की तरह' परिचय दास कृष्ण को याद करते ही सबसे पहले कोई मंदिर नहीं खुलता, कोई शास्त्र नहीं खुलता, कोई दार्शनिक सूत्र सामने नहीं आता। सबसे पहले एक आँगन खुलता है। उस आँगन में धूप की एक पतली-सी रेखा पड़ी है, तुलसी के पास मिट्टी थोड़ी गीली है, किसी कोने में मटकी रखी है और दूर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दे रही है। कृष्ण शायद इसी हँसी से शुरू होते हैं। वे आकाश में जितने विराट हैं, मनुष्य की स्मृति में उतने ही छोटे, उतने ही अपने, जैसे अभी-अभी किसी माँ की गोद से उतरकर आँगन में भागे हों। कृष्ण का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि वे हमारे सामने किसी एक रूप में ठहरते ही नहीं। उन्हें पकड़ना चाहें तो वे बालक हो जाते हैं, बालक को पकड़ें तो माखनचोर निकलते हैं, माखनचोर को पकड़ें तो बाँसुरी बजाने लगते हैं, बाँसुरी के पीछे जाएँ तो राधा मिलती हैं, राधा से आगे बढ़ें तो वृंदावन, वृंदावन से आगे कुरुक्षेत्र और कुरुक्षेत्र से आगे एक ऐसा विराट मौन, जिसमें मनुष्य अपने सबसे कठिन प्रश्नों के साथ अकेला खड़ा है। कृष्ण की यही गति उन्हें केवल कथा का पात्र नहीं रहने देती। वे...

उद्भ्रान्त की कविताएँ

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उद्भ्रान्त मनुष्य ऐसा प्राणी है जो हँस सकता है। आमतौर पर यह हँसना खुशी की स्थिति में होती है। एक दूसरे से मिलते समय भी हम अपनी खुशी का इज़हार करते हैं। कभी कभी दुःख के क्षणों में भी व्यंग्य के तौर पर मनुष्य हँसता है। हँसी प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है इसीलिए निरंकुश लोगों के लिए यह दिक्कततलब होती है। बलबन जैसे शासक के दरबार में कोई भी हँसने का साहस नहीं कर पाता था। किसी को रुलाना बहुत आसान होता है लेकिन किसी के चेहरे पर हँसी ला पाना कठिन होता है। अपनी कविता हँसी में उद्भ्रान्त जी लिखते हैं 'रुदन का नहीं/ हँसी का विस्फोट/ जिससे प्रथम सहमा/ फिर काँपा दिग्मंडल।' आज उद्भ्रान्त जी ने अपने उम्र का 78वाँ पड़ाव पूरा कर लिया है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं उद्भ्रान्त की कविताएँ। उद्भ्रान्त की कविताएँ  स्त्री की जगह एक स्त्री की जगह  कितनी है इस विराट सृष्टि में  जिसे बचाने ताज़िंदगी वह करती संघर्ष  प्रकृति से,  समाज से,  समाज के बेहतर कहे जाने वाले हिस्से से  और- अपने आप से भी? जरूर वह जगह  बहुत बड़ी होगी  या फिर...