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कृष्ण मोहन का आलेख 'निर्मल वर्मा का चिंतन'

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निर्मल वर्मा  किसी भी लेखक की पहचान उसके चिन्तनपरक आलेखों से की जा सकती है। इन आलेखों में लेखक अपने हवाले से बात तो करता ही है, अपनी बात के समर्थन में साक्ष्य भी प्रस्तुत करता है। साक्ष्यों का यह प्रस्तुतीकरण भी उस की सोच और अवधारणा को ही स्पष्ट कर देते हैं। निर्मल वर्मा नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकारों में से एक रहे हैं। अगर उनके समूचे चिंतन पर दृष्टिपात किया जाए तो आप पाएंगे कि वह भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या के लिए ही समर्पित है। लेकिन क्या उनकी यह व्याख्या भारतीय परम्परा का समग्र विवेचन कर पाती है या फिर यह विवेचन आपको सोच के किसी पुरातन द्वीप पर ही ले जा कर छोड़ देता है और अन्ततः वर्तमान के धरातल पर आपको निराश करता है। बुद्धिजीवी वर्ग समय समय पर भारतीयता के बारे में अपनी राय व्यक्त करता रहा है। लेकिन मूल रूप से देखा जाए तो यह अवधारणा रैखिक तो कतई नहीं है। बल्कि इसके अनेक आयाम हैं। भारतीयता की अवधारणा को पश्चिम की तुला पर रख कर तो परखा भी नहीं जा सकता। भारतीयता की अवधारणा को ले कर निर्मल जी ने खुल कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इस चिन्तन की आलोचकीय पड़ताल ...

विनीता बाडमेरा का यात्रा वृत्तांत "यात्रा हवेलियों के शहर जैसलमेर की"

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हिन्दुस्तान अपने आप में एक महाद्वीप है। इसीलिए इसे 'देशों का देश' भी कहा जाता है। सचमुच हिन्दुस्तान के अलग अलग राज्य अपने आप में किसी देश से कम नहीं लगते। यहां विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि वाली जगहें हैं जिन्हें देखने के लिए देश विदेश से तमाम पर्यटक वर्ष भर आते रहते हैं। राजस्थान को पहले राजपूताना कहा जाता था। विभिन्न राजपूत राजाओं ने अपने छोटे छोटे राज्यों में मजबूत किलों और भव्य महलों का निर्माण कराया जो आज भी अपने शानदार अतीत की याद दिलाते हैं। राजस्थान का जैसलमेर ऐसी ही जगह है जिसे 'हवेलियों का शहर' ही कहा जाता है। जैसलमेर, उत्तर-पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान का एक शहर है, जो राजधानी जयपुर से 575 किलोमीटर पश्चिम में थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित है। यह एक पूर्व मध्ययुगीन व्यापारिक केंद्र और जैसलमेर राज्य की ऐतिहासिक राजधानी है, जिसकी स्थापना 1156 ई. में भाटी शासक रावल जैसल द्वारा की गई थी। जैसलमेर जिले का भू-भाग प्राचीन काल में ’माडधरा’ अथवा ’वल्लभ मण्डल’ के नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब...

भरत प्रसाद का आलेख 'नवस्त्री की प्रतिबद्ध कथाकार : कृष्णा सोबती'

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कृष्णा सोबती  कोई भी कहानी महज कोरी कल्पना नहीं होती बल्कि उसमें कहानीकार का जीवन अनुभव भी अनुस्यूत होता है। यह जीवन अनुभव व्यक्तिगत नहीं होता बल्कि व्यापक हो कर समूचे समाज का जीवनानुभव बन जाता है। चर्चित कथाकार और उपन्यासकार  कृष्णा सोबती का लेखन बहुत कुछ  आत्मबद्ध लेखन के रूप में चिह्नित किया जाता है जिसमें उनके व्यक्तिगत दुख, संताप, दैनिक पराजय, विलाप सघन, प्रगाढ़ और प्रखर हैं। लेकिन अगर यह महज उनका ही होता तो उसकी व्याप्ति इतनी सघन न होती। यह उनके समय की स्त्रियों का दुःख दैन्य था। भले ही स्त्रियों बेहतरी की बात की जाती हो, आज भी कमोबेश स्त्रियों की हमारे समाज में त्रासद स्थिति ही है। स्त्रियों के प्रति अपराध न केवल बढ़े हैं बल्कि और निर्मम और कुछ अधिक अमानवीय हुए हैं। स्त्रियों को गुलाम समझे जाने की मानसिकता मन मस्तिष्क में आज भी बनी रहती है। ऐसे में कृष्णा सोबती की रचनाएँ जीवन्त हो कर हमारे सामने आती हैं। हाल ही में  प्रयागपथ का  दिसंबर-2025 का अंक आया है जो  ' कृष्णा सोबती विशेषांक' के रूप में है। भरत प्रसाद का एक आलेख इस अंक से हमने  स...

आनन्द बहादुर की कहानी 'चीजें'

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आनन्द बहादुर  मनुष्य की निर्मिति में उसके आसपास की चीजों, परिस्थितियों, सम्बन्धों, समय, देश, काल का बड़ा हाथ होता है। कहा जा सकता है कि मनुष्य के वृत्त का निर्माण इन सब से ही होता है  घटनाएं और परिस्थितियों मनुष्य और मनुष्य के स्वभाव को समय के अनुसार बदल डालते हैं। आनंद बहादुर मनुष्य के इस वृत की पहचान करते हुए अपनी कहानी 'चीजें' में उचित ही लिखते हैं : "भीतर ही भीतर अव्यवस्थित होते चले जाना। भीतर की हर चीज का गलत जगह पर रख दिया जाना। महसूस करना। जाने कब से ऐसा करते करते यहाँ तक चले आना। एक चीज को उठाना, उसे गलत जगह पर रख देना, और भूल जाना। इस तरह धीरे-धीरे सारी चीजें गलत जगहों पर रखते चले जाना। और अब लगता है, वह खुद ही, किसी दूसरी जगह पर था। जहाँ था, जहाँ उसने सोच रक्खा था कि वह था, वहाँ वह था ही नहीं। न तो वहाँ, जहाँ उसने सोचा था कि उसे होना चाहिए था।" यह कहानी मनुष्य के आत्मगत परिस्थितियों की पड़ताल करती है। यह कहानी लेखक के आने वाले कहानी संग्रह 'गुस्ताख़ और अन्य कहानियाँ', आपस प्रकाशन, अयोध्या (उ प्र) में शामिल है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं आनंद बहा...