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ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'।

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ललन चतुर्वेदी  किसी भी व्यक्ति के बचपन के दिन उसकी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं। माँ पिता की सघन छाया में बच्चे का विकास होता है। माँ पिता बच्चे में अपने अक्स ढूंढते हैं। बच्चे भी किसी तरह की फिक्र से दूर निश्छल मन अपनी कल्पना की दुनिया में खोए रहते हैं। धीरे धीरे बच्चों का विकास होता है और उनकी स्कूलिंग शुरू हो जाती है। यहीं पर बच्चों को वर्णमाला से परिचित कराया जाता है साथ ही उनकी सामाजिकता का भी विकास होता है। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में खुद के बचपन को उसके खुरदुरेपन के साथ याद किया है। उनका सरस गद्य पाठक को खुद के साथ बहा ले जाता है। बांग्ला की एक कहावत है 'अभाव स्वभाव बदल देता है।' सामान्य घर परिवार की नियति होता है अभाव। लेकिन इसी अभाव के बीच जिस बच्चे का विकास होता है वह उसके अन्दर दृढ़ इच्छा शक्ति के बीज बो देता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'। संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'                                    ...

भगवान स्वरूप कटियार के कविता संग्रह 'शब्द स्तब्ध हैं' पर अवंतिका सिंह द्वारा लिखी गई समीक्षा

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कविता वस्तुतः मनुष्यता की भाषा है। कविता उम्मीद का अलख जगाये रखती है। कविता अपने आप में एक प्रतिवाद रचती है। इसीलिए कविता वह विधा है जिसमें दुनिया के सर्वाधिक लोग लेखन करते हैं। यह इसलिए कि कविता भरोसे की भाषा है। कवि  भगवान स्वरूप कटियार का मानना है कि  'कविता मनुष्य की मातृभाषा है। सही मायने में इंसान होने की पहचान ईमानदार और निडर होने के साथ साथ अन्याय के खिलाफ खड़ा होना है।' इस संग्रह की समीक्षा करते हुए अवन्तिका सिंह लिखती हैं 'यह काव्य संग्रह इसी साहस का दस्तावेज है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भगवान स्वरूप कटियार के कविता संग्रह 'शब्द स्तब्ध हैं' पर अवंतिका सिंह द्वारा लिखी गई समीक्षा 'कविता जब बोलती है'। कविता जब बोलती है! अवंतिका सिंह  जब अन्याय, अत्याचार, हिंसा, अराजकता का माहौल दिखाई देता हो। शोषण, लैंगिक असमानता, बेईमानी का दौर चलता हो। सच बोलना मुश्किल हो और भय का वातावरण दिखाई दे। ऐसे समय में बोलने का एकमात्र माध्यम है- कविता,  जो चुप्पी को तोड़ने और मनुष्य के पक्ष में निडरता से खड़े होने का साहस देती है।  कविता जब बोलती है तो वह अन्...

भरत प्रसाद के धारावाहिक उपन्यास कालकलौटी की दूसरी कड़ी

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भरत प्रसाद  प्रकृति का अपना अद्भुत ताना बाना है। यह ताना बाना किसी भी व्यक्ति को सहज ही अपनी तरफ आकृष्ट कर लेता है। दह, ताल, तलैया, पोखर, तालाब जैसे इस खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। इस जलमग्न क्षेत्र में पौधों की उपस्थिति सहजीवन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। उपन्यासकार भरत प्रसाद अपने उपन्यास कालकलौटी में प्रकृति के इस खूबसूरत नज़ारे का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं प्रकृति की लीला के आगे लोटने का मन करता है। कहाँ से पाया ऐसा जादुई खिलना, कैसे भर गया इतना टटकापन? पंखुड़ियों में नरमी की महिमा कैसे भर उठी? मोती झील का हार अकेले कमल-पत्ता नहीं। जलकुंभी, काई, सेवार, पनिहा घास सब अपने-अपने ढंग से रच-बस गए हैं – झील की काया में। जलकुंभी हटा दो तो झील के तन से साड़ी हट गई। काई हटावोगे, तो पानी की चमड़ी छिल जाएगी। सेवार के बिना तो झील अपने आदिम अनगढ़पन को खो देगी। रही बात पनिहा घास की तो वह झील की काया के पीछे छाया जैसी रहती है। कहा न कि मोती झील की अपनी दुनिया है। पटेरा, पोंटे, मोकटान, जेनीचेला, कटिया, कुमुदिनी, सफेद कमल, कमल गट्टा – ये सब ऐसे सेवार हैं, जिन्हें या तो प...

मोहन लाल यादव का आलेख 'सत्यकामी नीलकांत, बहुआयामी नीलकांत'

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नीलकांत  साहित्य का भी अपना एक प्रतिपक्ष होता है। इस प्रतिपक्ष में वे होते हैं जिनका स्वभाव विद्रोही का होता है। इस प्रतिपक्ष का चयन स्वयं करना पड़ता है। नीलकांत ऐसे ही रचनाकार थे जो आजीवन 'साहित्य का प्रतिपक्ष' रचते रहे। उन्हें 'हिन्दी साहित्य का आउटसाइडर' भी कहा गया। आउटसाइडर इसलिए कि वे बने बनाए खांचे में फिट नहीं हो पाते थे। कह सकते हैं उनका स्वभाव ही इस तरह का था। वे अपने ही जीवन को नष्ट करने की हद तक अराजक थे। इस अराजकता के वे स्वयंभू नायक थे। इसीलिए उनके इस अराजकता का शिकार खुद उनके परिवार को भी होना पड़ा। कथाकार मार्कण्डेय जी उनके सगे बड़े भाई थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा 'नीलकांत एक असाधारण कथाकार हो सकते थे। उनके अन्दर इसकी योग्यता भी थी। लेकिन उन्होंने अपनी ही अराजकता से खुद की प्रतिभा को नष्ट कर लिया।' रामचन्द्र शुक्ल पर लीक से अलग हट कर जो काम उन्होंने किया वह उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित करता है। जोखिम उठाते हुए भी उन्होंने इस काम को अंजाम दिया। मार्कण्डेय जी कहते थे जिस साहित्यकार का वध करना हो उसकी किताब नीलकांत को थमा दो। बाकी का काम नीलकांत कर दे...

कौशल किशोर का आलेख 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा'

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मुद्राराक्षस एक जमाना था जब हम राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप पृष्ठ का पूरे सप्ताह बेसब्री से इंतजार किया करते थे। यह पृष्ठ तमाम महत्वपूर्ण विद्वानों के वैचारिक आलेखों से भरा होता था जो प्रत्येक शनिवार को चार पेज के सप्लीमेंट के रूप में प्रकाशित होता था। इन नामों में से एक नाम जो हमें अलग से आकर्षित करता था वह नाम मुद्राराक्षस का हुआ करता था। मुद्राराक्षस का आलेख बिल्कुल अलग, मौलिकता और वैचारिकता से भरा होता था। मुद्राराक्षस लीक पर चलने की अपेक्षा खुद नई परम्परा बनाने में विश्वास रखते थे। यही नहीं पारम्परिक प्रगतिशील आलोचना के लिए भी उन्होंने कड़ी चुनौती पेश की। आज  मुद्राराक्षस की दसवीं पुण्यतिथि है। उनकी स्मृति को हम नमन करते हुए आज पहली बार प्रस्तुत कर रहे हैं  कौशल किशोर का आलेख 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा'। 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा' कौशल किशोर मुद्राराक्षस। उनका यही नाम था। पर हमारे लिए वे 'मुद्रा जी' थे और यही रहेंगे। 13 जून 2016 को उन्होंने हमारा साथ छोड़ा। याद आता है वह दिन। दोपहर का समय था जब उनके बड़े बेटे र...

भगवानदास मोरवाल का उपन्यास अंश ‘सैय्यद इब्राहीम का ब्रज गमन’

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भगवानदास मोरवाल ‘मानुष हौं तो’ वर्तमान कथा साहित्य के सर्वाधिक सक्रिय और अपने नए-नए विषयों के लिए जाने जाने वाले कथाकार भगवानदास मोरवाल का तेरहवाँ उपन्यास है, जो शीघ्र ही वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रहा है। विदित है कि हाल में वाणी प्रकाशन से ही उनका बारहवाँ उपन्यास ‘दण्ड प्रहार’ (2025) प्रकाशित हुआ है। उनकी लेखकीय रचनात्मक को ध्यान में रखते हुए, हाल में इलाहाबाद की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संचेतना’ द्वारा, प्रति वर्ष किसी रचनाकार को उसके समग्र साहित्यिक योगदान के लिए दिया जानेवाला वर्ष 2026 का ‘राजमणि देवी स्मृति साहित्य सम्मान’ 2026  उन्हें देने की घोषणा की गई है। अतीत को उसके उसी रूप में संचित करने की परम्परा सामान्य तौर पर इतिहास में प्रचलित रही है। लेकिन हमारे यहाँ उस तरह का बोध न होने की वजह से अतीत की घटनाओं या व्यक्तित्व के बारे में सुनिश्चित जानकारी नहीं मिल पाती। यही वजह है कि कबीर, सूर, तुलसी की जन्म तिथि और स्थान के बारे में आज भी एकमत नहीं है। ऐसी ही स्थिति रसखान के साथ रही है। बल्कि रसखान के बारे में संदर्भों का कहीं ज्यादा ही अकाल है।  रसखान हिंदी साहित...