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चन्दन पाण्डेय की कहानी 'शुभ विवाह'

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चन्दन पाण्डेय  उत्तर भारतीय परिप्रेक्ष्य में लड़की का विवाह पिता की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। विवाह के बाद लड़कियों का घर ही नहीं गोत्र भी बदल जाता है। शादी को ले कर वे जितनी सपने बुनती हैं, उससे कहीं ज्यादा इस बात को ले कर भयाक्रांत रहती हैं कि न जाने पति का व्यवहार कैसा होगा। ससुराल के अन्य लोग कैसे होंगे। उनका रवैया क्या होगा? शादी के बाद लड़की का घर ही अब उसके मायके में तब्दील हो जाता है। अगर लड़की को ससुराल में दिक्कत होती है तो उसकी माँ, पिता, भाई, बहन सभी यही समझाते हैं कि वह वहाँ की स्थिति के अनुरूप एडजस्ट करें। धीरे धीरे लड़की की ससुराल ही उसका  वास्तविक घर बन जाता है जबकि वह घर जहाँ वह पली बढ़ी होती है, लगातार बेगाना होता चला जाता है। जिस घर में बाकायदा एक कमरे पर उसका कब्जा होता था, उसी घर में उसके लिए अब कोई जगह ही नहीं रह जाती। लड़की की विदाई तो अवश्यंभावी होती है। लेकिन विदाई इस मायने में मारक होती है कि यह महज  शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक विदाई भी बन जाती है। शादियों के समय महिलाओं द्वारा ही गाए जाने वाले पारम्परिक गीतों में यह व्यथा सहज ही महसूस की जा स...

रवि भूषण का संस्मरण 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'

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राजेन्द्र कुमार का प्रारम्भिक जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। इन संघर्षों ने उनके जीवन को निखारने का काम किया। बचपन में ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू किया। छात्र वे विज्ञान के थे लेकिन रुचि हिन्दी साहित्य में थी। इसीलिए उनके लेखन में हमेशा एक तार्किकता दिखाई पड़ती है। कल्पना की उड़ान भरते हुए भी वे यथार्थ की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमाए रहे। सादगी उनके जीवन का पर्याय थी। समन्वय उनकी आदत में था और संघर्षों की आंच ने स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया। एक साथ ये गुण कम लोगों में मिलते हैं। आलोचक रवि भूषण जी की राजेन्द्र कुमार से घनिष्ठता थी। अपने संस्मरण में रवि भूषण ने राजेन्द्र कुमार जी को आत्मीयता के साथ याद किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  रवि भूषण का संस्मरण 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'। 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'  रवि भूषण  शायद वह बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक का कोई वर्ष था, जब हम लोग इलाहाबाद में मिले थे। पहली बार। उसके बाद कई बार कानपुर से ले कर इलाहाबाद तक के उनके जीवन के बारे में उनसे जाना। अस्सी के दशक के आरंभ से उन्होंने 'अभिप्र...

प्रचण्ड प्रवीर का आलेख 'वर्णोच्चार तथा छन्द : प्रातिशाख्योँ के आलोक मेँ'

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किसी भी भाषा के लिए उसकी वर्तनी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। प्रचण्ड प्रवीर लिखते हैँ 'प्राचीन भारतीय परम्परा मेँ समस्त ज्ञान को वैदिक संहिता और उनके उपजीव्य ग्रन्थोँ मेँ निबद्ध किया गया है। वेद के छह अङ्गोँ मेँ पहले दो, शिक्षा और व्याकरण के द्वारा वर्णोँ के उच्चारण और पदोँ की साधुता का ज्ञान हो जाना प्रतिपाद्य है। वैदिक मन्त्रोँ और पदोँ के अर्थ-ज्ञान के लिये 'निरुक्त' तीसरा अङ्ग गिना जाता है। अधिकांश मन्त्र पादबद्ध और छन्द विशेष से युक्त हैँ अतः उनके लिये चौथे अङ्ग 'छन्द' का विधान है। वैदिक कर्मोँ के अङ्गदर्श आदि कालोँ के ज्ञान के लिये 'ज्योतिष' पाँचवा अङ्ग है। वैदिक अनुष्ठान के क्रमोँ के ज्ञान के लिये कल्पसूत्र आदि वेद के छठे और अन्तिम अङ्ग 'कल्प' मेँ आते हैँ।' लिखने या बोलने में बरती जाने वाली अशुद्धियां दिक्कततलब होती हैँ। फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे कि अशुद्धियां खाने में कंकड़ के समान होती हैं जो खाने का सारा स्वाद बिगाड़ देती हैँ। न्यूज चैनल्स और पत्र पत्रिकाओं की बात तो छोड़िए किताबों में भी तमाम अशुद्धियां सहज ही देखी जा सकती हैँ। बचपन...