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एदुआर्दो गालेआनो के पुस्तक का अंश 'आईनाघर: करीब-करीब पूरी दुनिया का इतिहास'

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एदुआर्दो गेलियानो का जन्म 3 सितंबर 1940 को मोंटेवीडियो, उरुग्वे में हुआ था। वे वेल्श, इतालवी, जर्मन और स्पेनिश मूल के थे। दो साल की माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, गैलियानो ने चौदह वर्ष की आयु में संदेशवाहक और किराया वसूलने सहित कई तरह की नौकरियाँ कीं। अंततः उन्हें एल सोल में नौकरी मिल गई। उरुग्वे के समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ने लेखन से पहले ही इस किशोर के कॉमिक्स प्रकाशित किए थे। गैलियानो का चित्रकला का शौक जीवन भर बना रहा; उनकी लघु चित्रकलाएँ उनकी बाद की कई पुस्तकों में देखी जा सकती हैं, जबकि उनके हस्ताक्षर के साथ अक्सर एक छोटा हाथ से बनाया हुआ सुअर होता था। 1960 के दशक में एक पत्रकार के रूप में गैलियानो वामपंथी प्रकाशनों में प्रमुखता हासिल करते हुए आगे बढ़े और मारियो वर्गास ल्लोसा , मारियो बेनेडेट्टी , मैनुअल माल्डोनाडो डेनिस और रॉबर्टो फर्नांडीज रेटामार जैसे लेखकों के योगदान वाले एक प्रभावशाली साप्ताहिक पत्रिका मार्चा के संपादक बने। उन्होंने दो वर्षों तक दैनिक एपोका का संपादन किया और यूनिवर्सिटी प्रेस के प्रधान संपादक के रूप में भी काम किया। 1959 में उन्होंने अपनी पहली ...

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'तूफान मेल'

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प्रचण्ड प्रवीर  सामाजिकता के अपने अलग किस्म के आयाम होते हैं। यह सामाजिकता ही एक दूसरे को आपस में जोड़ने का काम करती है। इससे ही रिश्ते नाते उपजते हैं जिससे एक दूसरे से जुड़ाव के साथ साथ संवेदनाओं का नया संसार निर्मित होता है। प्रचण्ड प्रवीर अपनी कहानी 'तूफान मेल' में इसका जिक्र उम्दा तरीके से करते हैं। कोलकाता में जनमे रमेश साढ़ू की मुलाकात एक यात्रा में उत्तराखंड की एक लड़की हिमानी नेगी से होती है। दोनों की निकटता की परिणति अन्ततः शादी के बंधन में होती है। जीवन त्वरित गति से चलता रहा और आखिर एक दिन उन्होंने पाया कि तूफान की गति से जीवन कुछ झोंको के साथ अपने अंदाज़ में आगे बढ़ गया। 'कल की बात' के अन्तर्गत प्रचण्ड प्रवीर की यह 290वीं प्रस्तुति है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'तूफान मेल'। कल की बात – 290 'तूफान मेल' प्रचण्ड प्रवीर  कल की बात है। जैसे ही मैँने दफ्तर मेँ कदम रखा, बाहर आते मोहित ने टोका। “कहाँ तूफान मेल की तरह चले जा रहे हैँ? चलिये हमारे साथ कैफेटेरिया। ”  मैँने उससे कहा कि मैँ बैग रख कर और लैपटॉप चालू कर के दस मिन...

प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की फिल्म समीक्षा “मैं वापस आऊँगा : विभाजन की स्मृति, प्रेम की प्रतीक्षा”

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संचार के सशक्त माध्यम के रूप में सिनेमा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दुनिया भर में जनमानस को प्रभावित करने में फिल्मों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। भारतीय सन्दर्भ में फिल्मों के प्रति लोगों की दीवानगी कुछ अधिक ही रही है जिसकी तस्दीक सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, निर्माता निर्देशकों, गायक गायिकाओं की लोकप्रियता से की जा सकती है। लेकिन इसका एक दूसरा भी पक्ष है जो चिंताजनक है। आजकल बदले हुए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में हमारे यहाँ ऐसी प्रोपेगेंडा फिल्में बनाई जा रही हैं जो तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का काम कर रही हैं। इन फिल्मों का निशाना एक खास वर्ग ही होता है। इन्हीं परिस्मेंथितियों में एक ऐसी फिल्म आई है जिससे कुछ उम्मीदें की जा सकती हैं। यह फिल्म है 'मैं वापस आऊँगा'। कवि प्रकर्ष विपुल इस फिल्म की समीक्षा करते हुए लिखते हैं 'पिछले कुछ सालों में इन प्रोपेगंडा फ़िल्मों द्वारा हिंदी सिनेमा के उजले दामन पर जो गहरे दाग छोड़े गए हैं यह फ़िल्म उनको भी साफ़ करने का जिम्मा उठाती है। जब हम पाते हैं कि विभाजन विभीषिका दिवस के बहाने उन ज़ख़्मों को फिर से कुरेदने के लिये योजनाबद्ध तरीक़...

कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश 'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'

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कल्पना मनोरमा मानव शरीर नश्वर है, यह बात सभी जानते हैं। इसके बावजूद सभी मनुष्यों की अपनी अपनी महत्वाकांक्षाएं होती हैं। किसी की ढंकी छुपी, किसी की खुली खुली। इसके लिए सब भरसक प्रयास भी करते हैं। वे भी जो यह कहते नहीं थकते कि उनकी कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। जनसेवा की बात करने वाले तथाकथित समाजसेवी हों या जन नेता हों या फिर धर्मोपदेश देने वाले महात्मा, सबकी अपनी-अपनी हसरतें होती हैं। कल्पना मनोरमा अपनी डायरी में लिखती हैं "कभी-कभी सोचती हूँ कि इतिहास के बड़े नाम और हमारे समय के छोटे-बड़े नामों में मूल अंतर कितना है? पैमाना अलग है, मनोवृत्ति शायद नहीं। सिकंदर ने संसार जीतना चाहा था। तो क्या हम अपने-अपने छोटे संसार जीतना नहीं चाहते हैं? किसी को भूभाग चाहिए था, किसी को प्रतिष्ठा। किसी को साम्राज्य चाहिए था, किसी को अनुयायी। इच्छा का आकार बदल जाता है, उसकी प्रकृति नहीं।" डायरी लेखन साहित्य की ऐसी विधा है जिस पर आजकल कम बात होती है। लेकिन ये अंश अक्सर ही विचारोत्तेजक होते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश  'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'।   डाय...

सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'

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सुरेन्द्र प्रजापति स्थानीय विभाजन के बावजूद दुनिया भर के समाज में मुख्य रूप से दो वर्ग होते हैं। पहला शोषक वर्ग है होता है जबकि दूसरा शोषित वर्ग। आभिजात्य वर्ग का चरित्र शोषक का होता है जबकि कामकाजी वर्ग का चरित्र शोषक का होता है। सामान्यतया शोषित वर्ग अपने रोजी रोजगार के लिए इस आभिजात्य वर्ग पर ही निर्भर रहता है। इस निर्भरता की वजह से उसे तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दोनों वर्गों के बीच व्यवहारगत दिक्कतें भी दिखाई पड़ती हैं। इन व्यवहारगत दिक्कतों को सुरेन्द्र प्रजापति ने अपनी कहानी 'टूटती शाखा' में करीने से व्यक्त किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'। 'टूटती शाखा'                                     सुरेन्द्र प्रजापति सड़ाक! सड़ाक!!' सात वर्षीय छोटू पर जाह्नवी ने खजूर की छड़ी चलाई तो वह लड़का ऐसे चीखा जैसे जंगल की सूखी हुई लकड़ी चरमराई हो। वह चुड़ैल सी दिखने वाली औरत हाँफने लगी। उसके चेहरे पर नफ़रत और अवसाद के भाव थे जबकि छोटू बिल्कुल शांत था। ...