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प्रतुल जोशी का संस्मरण 'पिता की ज़िन्दगी के आख़िरी वर्ष'

शेखर जोशी नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकार थे। रचनाओं में ही नहीं जीवन में भी वे ईमानदारी बरतने के के पक्षधर रहे। 'अनहद' का एक अंक जब हमने उन पर केन्द्रित करने का निर्णय लिया तब उन्होंने मुझे सलाह दिया कि मैं ऐसा न करूँ। इस क्रम में कई बार तो उन्होंने अपनी सख़्त नाराज़गी भी ज़ाहिर की। आज के वक़्त में जब नवोदित रचनाकार तक खुद पर अंक केन्द्रित करवाने की जुगत में लगे रहते हैं, तब उनकी यह सोच हमें विस्मय में डालती है।  किसी भी दिखावे या शोरोगुल से वे हमेशा दूर रहे। जब ईजा का निधन हुआ और वे अकेले पड़ गए तब उन्होंने उस इलाहाबाद को छोड़ने का निर्णय लिया जिसे वे जीते थे। 100, लूकरगंज उनकी सांसों में समाया हुआ था। लेकिन वक़्त की नज़ाकत को भांपते हुए वे यह बात समझ गए थे कि इलाहाबाद उन्हें छोड़ना होगा। और यह कड़ा निर्णय उन्होंने लिया भी। आगे का शेष जीवन उन्होंने लखनऊ, ग़ाज़ियाबाद और पुणे में अपने बेटे बेटियों के साथ बिताया। अन्ततः  4 अक्टूबर 2022 को ग़ाज़ियाबाद में उनका निधन हुआ। उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रतुल जोशी ने अपने पिता के अन्तिम दिनों को शब्दबद्ध किया है। एक जीवन्त व्यक्ति जिसकी दमदार...

शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा'

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शेखर जोशी  भारतीय समाज में जाति की भूमिका अहम रहती आई है। यह जाति न केवल समाज को विभाजित करती आई है बल्कि व्यक्ति में झूठा अहंकार भी भरती है। यह अहंकार व्यक्ति को कहीं का नहीं छोड़ता। शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा' ऐसी ही कहानी है जिसमें वे जाति के मिथ्याभिमान की कलई खोलते हैं। समाज के जातिगत विभाजन और श्रम की प्रतिष्ठा पर यह कहानी गहरा प्रहार करती है। यह कहानी उन चालाकियों को भी उद्घाटित करती है जो सजातीय होने के बावजूद व्यक्ति के मन में कहीं न कही छिपी होती है। लेकिन यह झूठा अहंकार एक न एक दिन टूटता ही  है और व्यक्ति को जमीन पर आना ही पड़ता है। इस कहानी में उस जातीय विद्वेष को भी उद्घाटित किया गया है जो एक शिक्षक द्वारा अपने छात्रों के साथ की जाती है। शिक्षक का दायित्व एक समरस समाज की स्थापना होनी चाहिए। उसकी संकीर्ण दृष्टि समाज को उस गर्त की तरफ धकेल देती है जहां से निकल पाना बहुत कठिन होता है। कल 10 सितम्बर को शेखर जोशी का जन्मदिन है। इस अवसर पर विशेष प्रस्तुति के क्रम में उनकी कहानी गलता लोहा को आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर जोशी की कह...