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हितेन्द्र पटेल का आलेख 'भारत को फिर से सोचने का समय'

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हितेन्द्र पटेल  रोजी रोजगार जीवन से जुड़े ऐसे मुद्दे हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। लोकतांत्रिक सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने देश के युवाओं को रोजगार प्रदान करे जिससे कि वह अपना जीवन यापन करने के साथ समाज और राष्ट्र की सेवा कर सके। लेकिन युवाओं को रोजगार देने के बजाय सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी से बचने के प्रयास में लग जाती हैं। एक और दिक्कत है जो थोड़ी बहुत नौकरियां बची हैं उनकी भर्ती प्रक्रिया में ऐसा भ्रष्टाचार व्याप्त है जिससे दिन रात हाड़तोड़ परिश्रम करने वाले योग्य अभ्यर्थी रोजगार पाने की प्रक्रिया से ही बाहर हो जाते हैं जबकि अयोग्य लोग भ्रष्ट अधिकारियों को साध कर या रिश्वतखोरी के जरिए रोजगार प्राप्त कर लेते हैं। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक होने का मामला बार बार सामने आया है।  ऐसे में युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है जो जंतर मंतर से ले कर रांची तक प्रखर रूप में दिखाई पड़ रहा है। युवाओं (जिन्हें जेन जी कहा जा रहा है) के प्रदर्शन में उनकी भाषा और तरीके को ले कर बुद्धिजीवियों के द्वारा प्रश्नचिह्न उठाए जा रहे हैं। लेकिन इस पीढ़ी को सवालों ...

सरिता शर्मा का आलेख 'रूमी का जीवन'

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रूमी की प्रतिमा महान सूफी संत और फारसी साहित्य के प्रख्यात लेखक  मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी (30 सितम्बर, 1207 से 17 दिसंबर 1273 ई) ने मसनवी लेखन में महत्वपूर्ण योगदान किया। रूमी मूलतः अफ़ग़ानिस्तान के निवासी थे लेकिन इन्होंने अपना जीवन  मध्य तुर्की के सल्जूक दरबार में बिताया और वहां पर इन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएँ रचीं। रूमी के जीवन में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब शम्स तबरेज़ नाम के घुमक्कड़ दरवेश उनके जीवन में आए। एक दूसरे से मिलने के बाद दोनों अच्छी तरह से यह समझ गए कि उनके भीतर ईश्वर को जानने की एक जैसी ललक है। मध्य तुर्की के कोन्या में इनका देहांत हुआ जिसके बाद इनकी कब्र एक मज़ार का रूप लेती गई जहाँ इनकी याद में सैकड़ों सालों से आयोजन होते आते रहे हैं। उनकी खूबसूरत कविताओं ने उन्हें हमेशा सर्वश्रेष्ठ ईरानी कवियों में से एक बनाया है। रूमी की कविताओं में प्रेम और ईश्वर भक्ति का सुंदर समिश्रण दिखाई पड़ता है। इनको हुस्न और ख़ुदा के बारे में लिखने के लिए खास तौर पर जाना जाता है। रूमी प्रेम के पुजारी थे और इसे खासा तवज्जो दिया करते थे। आज जब दुनिया में स्वार्थ प्रबल होता जा रहा ...

ममता कालिया के साथ अनुज की एक बातचीत

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  ममता कालिया के साथ बात करते हुए अनुज साहित्य लेखन कल्पनाजनित होते हुए भी काफी कुछ अनुभवजनित होता है। यह अनुभव व्यक्तिगत होते हुए भी तमाम ऐसी भूमिकाएँ समेटे हुए होता है कि पाठक को उसमें अपना जीवन संघर्ष दिखाई देने लगता है। ममता कालिया का एक उपन्यास है 'दौड़'। यह हमारे समय, समाज और संस्कृति को इस तरह बयां करता है कि हमारा वर्तमान दृश्यमान हो उठता है। हमारा यह समय भी तो आपाधापी का ही है। यह आपाधापी इस तरह की है कि इसमें अपनों तक के लिए कोई जगह नहीं है। यह उपन्यास कॉर्पोरेट जगत की उस बेरहमी और निष्ठुरता को उद्घाटित करता है जिसमें मनुष्यता के लिए कोई जगह ही नहीं है। आप जब तक दौड़ में हैं जिन्दा हैं। दौड़ से बाहर होते ही आप दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंके जाते हैं। इसकी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए ममता जी बताती हैं 'मेरे बेटे अनु ने जब एमबीए किया और जॉब शुरू की, तो वह अपने अनुभव बताता था। उसने 25 नौकरियाँ बदलीं। वह कहता था कि कॉर्पोरेट जगत में अगर जहाज डूबने वाला हो, तो सबसे पहले वह छोड़ना चाहिए। कॉर्पोरेट संस्कृति बहुत 'कट-थ्रोट' है। वहाँ कोई किसी का सगा नहीं है। वही...