शैलेंद्र चौहान की कविताएं
शैलेन्द्र चौहान जल ने ही जीवन को एक रूप दिया। हवा और धूप ने बाद में उसकी परिभाषा गढ़ी। कहा जाता है कि नदी में एक बार प्रवाहित पानी दुबारा प्रवाहित नहीं होता। ठीक उसी तरह बकौल शैलेन्द्र चौहान 'मनुष्य एक ही देह में बार-बार जन्म लेता है'। हर रोज वह एक नई शुरुआत करता है और रात की नींद में अगले दिन के सपने बुनता है। यह जल अद्भुत है। जितना सहज दिखता है उतना होता नहीं। जटिल हो कर भी पृथिवी पर सहजता से सर्वत्र उपलब्ध है। लेकिन पृथिवी से इतर आज तक हमें पानी की एक भी बूँद नहीं मिली है। अलग बात है कि हम पानी खोजने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। पानी की महत्ता तब समझ आती है जब जल मिलता ही नहीं। रहीम दास लिखते हैं 'बिन पानी सब सून'। जल के बिना प्यास नहीं बुझती। आंखों का पानी सही मायनों में हमें मनुष्य बनाता है इसीलिए उसे बचाए रखने की कोशिश मनुष्य लगातार करता है। शैलेन्द्र चौहान ने जल पर कुछ कमाल की कविताएं लिखी हैं। जल को जानने समझने के लिए जरूर इसे पढ़ा जाना चाहिए। अपनी एक कविता में वे लिखते हैं 'जल ने ही सिखाया/ ऊपर दिखाई देना बचा रहना नहीं होता/ और नीचे चले जाना हमेशा हार जा...