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रघु रॉय के फोटोग्राफ

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  रघु रॉय  जहां शब्द बोलना बन्द कर देते हैं वहां तस्वीर की भाषा शुरू होती है। तस्वीरें अपने आप में सब कुछ कह डालती हैं। रघु रॉय ने इंजीनियरिंग करने के बावजूद पेशे के तौर पर फोटोग्राफी को चुना। रघु राय के बड़े भाई एस पॉल इस समय तक फोटोग्राफ़ी की दुनिया में स्थापित हो चुके थे। 1966 में रघु उनके पास दिल्ली आए। उन्होंने पहली तस्वीर एक गदहे की ली। बिल्कुल सामने से ली गई तस्वीर से ऐसा लग रहा था जैसे गदहा आँख में आँख डाल कर अपनी व्यथा कथा कहना चाहता हो। इस तस्वीर ने उनकी ज़िंदगी को बदल दिया। उनकी पहली ही यह तस्वीर 'लंदन टाइम्स' में आधे पन्ने पर छपी। बड़े भाई की बदौलत रघु राय को 1966 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' में नौकरी मिल गई। लेकिन वे वहां ज़्यादा दिन तक नहीं टिक पाए। क्योंकि तब 'द स्टेट्समैन' की काफ़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी, 1967 में वो वहां पहुंच गए। 'द स्टेट्समैन' में काम करने के समय की एक घटना का जिक्र करते हुए वे बताते हैं, "बात जेपी आंदोलन के समय की है. बिहार में आंदोलन चरम पर था। मैं जेपी के साथ बिहार घूम रहा था। आंदोलन के दौरान उनपर लाठी चार्ज हुआ था ...