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भरत प्रसाद का उपन्यास 'कालकलौटी'

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भरत प्रसाद  जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। इसीलिए प्रकृति जीवन को अपनी तरफ आकर्षित करती रहती है। जीवन भी इस प्रकृति की तरफ स्वाभाविक रूप से झुकता है। पेड़ पौधे, पशु पक्षियां, कीड़े मकोड़े पृथिवी की जैविक समृद्धि में अनमोल रत्न की तरह हैं। इनके बिना पृथिवी और पृथिवी पर के जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। रचनाकारों की रचनाओं में यह प्रकृति अनायास ही आती है। क्योंकि इसके बिना रचनाओं में रवानी नहीं आ पाती। अलग बात है कि विकास के नाम पर आजकल प्रकृति पर ही लगातार प्रहार किया जा रहा है। वन दिन ब दिन सिकुड़ते जा रहे हैं। हम प्रकृति की खूबसूरती को निहारने की बजाए दिन रात मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। अपने आस पास के न तो पेड़ पौधों को पहचानते हैं, न ही पशु पक्षियों को। एक अजनबीयत हम सब पर लगातार हावी होती  जा रही है। हालत यह है कि अपने ही घर परिवार में अब हम अजनबी नजर आने लगे हैं। इससे भयावह और भला क्या हो सकता है। भरत प्रसाद इन दिनों एक उपन्यास ' कालकलौटी'  लिख रहे हैं। पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के दूसरे रविवार को 'कालकलौटी' उपन्यास को धारावाहिक रूप...

शिवदयाल का आलेख 'एकला चलो रे.. ताकि पथ नये खुलते रहें'

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गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की एक कविता है : ‘यदि तुम्हारी पुकार पर/ कोई नहीं आता/ अकेले ही चले चलो.....’ यह कविता व्यक्तिगत तौर पर मुझे काफी आकर्षित करती है। हालांकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यह सामाजिकता ही उसे सही मायने में उसे एक मनुष्य बनाती है, लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं जब मनुष्य को अकेले ही आगे बढ़ने का निर्णय लेना पड़ता है। गांधी जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। गांधी जी ने हालांकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन अगर हम इतिहास को गौर से देखें तो कई अवसरों पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। यहां तक कि भारत का विभाजन न हो इसे ले कर भी वह अकेले पड़ गए। उनके अलावा अपवादस्वरूप शायद ही कोई ऐसा था जो विभाजन के पक्ष में नहीं था। विपरीत परिस्थितियों में भी गांधी अकेले चलते रहे। गांधी और गुरुदेव के रिश्ते जगजाहिर हैं। गांधी जी ने रवीन्द्र नाथ को 'गुरुदेव' कहा जबकि रवीन्द्र नाथ ने गांधी जी को 'महात्मा' की संज्ञा दी। आज के दौर में जब अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अवसरवाद जीवन मूल्य बनते जा रहे हैं ऐसे में किसी भी आदर्शवादी व्यक्ति का अकेले पड़ जाना स्व...

राजकिशोर राजन की कविताएँ

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राजकिशोर राजन  अक्षर और शब्द होते हुए वाक्य की यात्रा  हमें  भाषा की बारीकियों से अवगत कराती है। शब्द किसी भी भाषा की रीढ़ होते हैं जिनके प्रायः अलग-अलग मतलब होते हैं। हिन्दी में तो एक ही शब्द के कई कई पर्याय होते हैं हालांकि उनके प्रयोग के सन्दर्भ अलग-अलग ही होते हैं। एक ही शब्द को हर जगह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा भी होता है कि एक ही शब्द अलग-अलग भाषाओं में प्रयुक्त किया जाता है लेकिन उनके अभिप्राय अलग-अलग होते हैं। प्रजापति एक ऐसा ही शब्द है। हिन्दू धर्म में आमतौर पर यह शब्द ब्रह्मा के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें परम्परा के अनुसार सृष्टि का निर्माता माना जाता है। आजकल इस शब्द को कुम्हार लोग अपने जातिगत नाम के लिए प्रयुक्त करते हैं। वे भी तो निर्माण ही करते हैं। मिट्टी को सुन्दर बर्तनों के रूप में गढ़ डालते हैं। अपने विकास क्रम में मनुष्य ने सबसे पहले मिट्टी के बर्तनों को ही इस्तेमाल करना सीखा था। इक्कीसवीं सदी में भी आज हम मिट्टी के बर्तन प्रयुक्त करते हैं। धार्मिक कार्यों में आज भी मिट्टी के बर्तनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। बांग्ला में प्रजापति शब्द महिलाओं ...

पंकज चौधरी की कविताएं

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पंकज चौधरी  जाति भारतीय समाज की सच्चाई है। इसे उपेक्षित कर भारतीय समाज को आज भी नहीं समझा जा सकता। आजादी के पश्चात जिस भारत की कल्पना हमारे पुरखों ने की थी उसे दरअसल एक ऐसा देश होना था जहां जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, क्षेत्र को नहीं, योग्यता को वरीयता दी जानी थी। लेकिन समाज में कोई आधारभूत बदलाव नहीं आया। धार्मिक और जातीय कट्टरताएँ समय के साथ बढ़ीं हैं। धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह कदम कदम पर नजर आते हैं। चुनाव के लिए टिकट देते वक्त धर्म और जाति इतनी मजबूती से सामने आते हैं कि उसका ध्यान रखना सारे दलों की मजबूरी बन जाती है। ऐसे में उस समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है जो धार्मिक और जातीय दुराग्रहों से मुक्त हो। ऐसे में उस समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है जहां स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की आधुनिक भावना नजर आए। अपनी कविता 'जातिपर्व' में पंकज लिखते हैं : "यह जातिसभा का चुनाव है/ लोकसभा का नहीं!/ यह जातिपर्व का लोकतंत्र है/ लोकतंत्र का महापर्व नहीं!" पंकज चौधरी का हाल ही में एक नया कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है 'लम्बी लड़ाई'। पंकज हमारे समय के प्रतिष्ठ...

चन्द्रभूषण का आलेख आल्हखंड का पुनर्पाठ

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चन्द्र भूषण  आमतौर पर आल्हा ऊदल का नाम सुनते ही हमारे जेहन में बुंदेलखंड अंचल और वहां की वीरता की अनुगूँज सहज ही सुनाई पड़ती है। यह अलग बात है कि भारत में इतिहास और लोक कथाएं आपस मे कुछ इस तरह अन्तर्गुम्फित हैं कि इन्हें अलग कर पाना खासा मुश्किल है। यह दरअसल तेईस लड़ाइयों की दास्तां है और हर लड़ाई में चार-छह ‘तरंगें’ अनिवार्य रूप में आती हैं। हालांकि अल्हैत इनसे सहमत नहीं और वे कुल बावन लड़ाइयों का दावा करते हैं जिसका जिक्र बाबू श्याम सुंदर दास ने अपने सम्पादन में किया है। बहरहाल आल्हा ऊदल की गाथा भले ही बुंदेलखंड अंचल की हो, इसकी ख्याति चारों तरफ रही है। हाल फिलहाल तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों में गवैए इसे पूरे तरन्नुम के साथ गाते बजाते थे।  हर्षवर्धन के पश्चात उत्तर भारत में अनेक छोटे छोटे राज्य स्थापित हुए जिनमें गहरवार, चौहान, चंदेल और परिहार शासकों के राज्य प्रमुख हैं। ये राज्य अकसर आपस में ही लड़ा भिड़ा करते थे। कभी यह लड़ाई राज्य विस्तार के लिए तो कभी  कभी शौर्य प्रदर्शन मात्र के लिए की जाती थी। कालिंजर के परमार शासक परमार्दि देव  के राजकवि जगनिक ने महोबे ...