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श्याम सुन्दर सिंह की कविताएँ

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श्याम सुन्दर  एक सवाल कवियों के जेहन में बार बार उठता है कि देश का मतलब आखिर क्या है? अनेक कवियों ने इस पर कविताएं भी लिखी हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक मशहूर कविता का शीर्षक ही है 'देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता'। युवा कवि श्याम  सुन्दर भी इस सवाल से टकराते हुए लिखते हैं "मैं इस देश से नफ़रत नहीं करता,/ इसीलिए इसकी झूठी तारीफ़ नहीं करता।/ मेरे लिए देश/ किसी नेता का चेहरा नहीं,/ न किसी धर्म की जागीर है।/ देश वह मज़दूर है/ जो सुबह अपनी पीठ पर औज़ार बाँध कर निकलता है/ और शाम को अपनी थकान के साथ/ आधे पेट घर लौटता है।/ देश वह किसान है/ जिसकी फ़सल का दाम/ किसी और की मेज़ पर तय होता है।" आज का समय 'निंदक नियरे राखिये' वाला समय नहीं बल्कि झूठी तारीफों के पुल खड़ा करने वाला समय है। इसीलिए यह पुल मामूली से वजन को भी बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रखता और धराशाई हो जाता है। दरअसल  यह देश केवल उन नेताओं का नहीं जो देश के प्रतिनिधि के तौर पर पूरी दुनिया में तिलिस्म रचने का प्रयास करते हैं। देश का नक्शा उन किसानों, मजदूरों और आम लोगों से बनता है जो आज भी बदहाली का जीवन ...

परिचय दास का आलेख 'तस्वीर से बाहर मेरे गुरु'

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परमानन्द श्रीवास्तव  एक गुरु अपने जीवन में कई शिष्य तैयार करता है। गुरु को शिष्य की स्मृति नहीं रहती। लेकिन शिष्य गुरु को आजीवन याद रखता है। वह याद रखता है कि उसकी निर्मिति में गुरु की कैसी भूमिका थी। वह याद रखता है कि उसके वर्तमान अस्तित्व में गुरु के दिए गए संस्कार की बड़ी भूमिका है। प्रोफेसर परमानन्द श्रीवास्तव ऐसे ही गुरु थे जिनके उन शिष्यों की लम्बी फेहरिस्त है जो आज सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहे हैं। रवीन्द्र श्रीवास्तव (जो परिचय दास के नाम से लेखन करते हैं) परमानन्द जी के ही शिष्य रहे हैं। उन्होंने अपने एक आत्मीय संस्मरण में अपने गुरु को शिद्दत के साथ याद करते हुए लिखते हैं 'गुरु शायद दूसरी श्रेणी के होते हैं। वे फ्रेम में नहीं आते। वे फ्रेम बदल देते हैं। उनसे मिलने के पहले हम साहित्य को एक तरह से देखते हैं; उनसे मिलने के बाद वही साहित्य दूसरे कोण से दिखाई देने लगता है। वही कविता दूसरी हो जाती है, वही आलोचना दूसरी, वही लेखक दूसरा। गुरु हमें कोई तैयार दृष्टि दे कर मुक्त नहीं करता; वह हमारी आँखों में इतना प्रश्न भर देता है कि हम तैयार दृष्टियों से संतुष्ट हो...

राजेन्द्र दानी की कहानी 'प्रेमातीत'

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राजेन्द्र दानी प्रेम भी अजीब बला है। इसके बारे में यह उक्ति ख्यात है कि जो करे वह पछताए जो न करे वह भी पछताए। बहरहाल एक बार किसी से प्रेम हो जाए तो वह कम से कम स्मृतियों में ही सही आजीवन बना रहता है। पहले के जमाने में एक नैतिकता और आदर्श सब पर हावी रहा करता था और इक्का दुक्का मामलों को छोड़ कर प्रेम प्रायः असफल ही हो जाता करता था। प्रेम के बावजूद प्रेमी प्रेमिका एक मर्यादा में बंधे रहते थे और बदनाम हो जाने का एक भय हमेशा बना रहता था। अंततः ये प्रेमी प्रेमिका घर वालों की राय पसन्द से शादियाँ कर अपने अपने घर परिवार को चलाने में व्यस्त हो जाया करते और अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते। इन सबके बावजूद कुछ प्रेम ऐसे भी होते जो दिलों में जीवनपर्यन्त बने और बचे रहते। ऐसे ही प्रेम की कहानी को बयां किया है अपनी कहानी 'प्रेमातीत' में राजेन्द्र दानी ने। अपनी इस कहानी में वे लिखते हैं 'देवयानी की देह बेहद आकर्षक थी। वह उसे भरपूर मुलायम स्पर्श से वकील को वंचित नहीं रखती थी पर अंतिम मर्यादा उसने कभी नहीं खोई और वकील भी कभी इससे आगे न बढ़े। एकांत और गोपनीयता उन्हें उस दौर में भरपूर मिली...