भरत प्रसाद का आलेख 'नवस्त्री की प्रतिबद्ध कथाकार : कृष्णा सोबती'
कृष्णा सोबती कोई भी कहानी महज कोरी कल्पना नहीं होती बल्कि उसमें कहानीकार का जीवन अनुभव भी अनुस्यूत होता है। यह जीवन अनुभव व्यक्तिगत नहीं होता बल्कि व्यापक हो कर समूचे समाज का जीवनानुभव बन जाता है। चर्चित कथाकार और उपन्यासकार कृष्णा सोबती का लेखन बहुत कुछ आत्मबद्ध लेखन के रूप में चिह्नित किया जाता है जिसमें उनके व्यक्तिगत दुख, संताप, दैनिक पराजय, विलाप सघन, प्रगाढ़ और प्रखर हैं। लेकिन अगर यह महज उनका ही होता तो उसकी व्याप्ति इतनी सघन न होती। यह उनके समय की स्त्रियों का दुःख दैन्य था। भले ही स्त्रियों बेहतरी की बात की जाती हो, आज भी कमोबेश स्त्रियों की हमारे समाज में त्रासद स्थिति ही है। स्त्रियों के प्रति अपराध न केवल बढ़े हैं बल्कि और निर्मम और कुछ अधिक अमानवीय हुए हैं। स्त्रियों को गुलाम समझे जाने की मानसिकता मन मस्तिष्क में आज भी बनी रहती है। ऐसे में कृष्णा सोबती की रचनाएँ जीवन्त हो कर हमारे सामने आती हैं। हाल ही में प्रयागपथ का दिसंबर-2025 का अंक आया है जो ' कृष्णा सोबती विशेषांक' के रूप में है। भरत प्रसाद का एक आलेख इस अंक से हमने स...