अजय तिवारी का व्याख्यान 'धूमिल की रचना-दृष्टि और संवेदना'
धूमिल भारत की आजादी के लिए हमारे पुरखों ने जो सपना देखा था उसमें एक ऐसा भारत था जिसमें सभी समान हों। सभी का जीवन खुशहाल हो। इस आज़ादी के साथ स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता की बहुत सी उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। लेकिन आजादी मिलने के पश्चात इस जनता की उम्मीद पर तुषारापात हुआ। भ्रष्ट प्रशासन की वजह से जनता का जीवन यथावत बना रहा। ऐसी स्थिति में रचनाकारों ने इस स्थिति पर अपनी कलम चलाई और इस स्थिति की कड़ी आलोचना की। धूमिल ऐसे रचनाकारों में अग्रणी थे जिन्होंने इस स्थिति पर यादगार कविताएं लिखी। ये कविताएं जनता में काफी लोकप्रिय भी हुईं। अपने एक व्याख्यान में वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी कहते हैं 'धूमिल की प्रतिनिधि पहचान जिन कविताओं से बनी, उनमें एक है—‘आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है।’ सैंतालीस में आज़ादी जिन सपनों के साथ आई थी, वे सपने नहीं रह गए थे। उन सपनों की जगह रंग बुझ गए थे। थके हुए थे, सारे सपने टूट गए थे। यह अनुभव जिस कविता में है, उसका शीर्षक है—‘बीस साल बाद’। इस थकान से पहले वह ऊब है, ‘जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रुरत होती है!’ स्पष्टतः इस मोहभंग की मानसिकता से धूमिल का बड़ा ...