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शर्मिला जालान के उपन्यास पर संजय गौतम की समीक्षा

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हमारे समाज में लड़कियों की शादी संस्कार से ज्यादा एक समस्या के रूप में जानी जाती है। जब भी किसी लड़की का पिता शादी के लिए किसी लड़के के दरवाजे पर जाता है तो लड़के वाले आभिजात्य भिखमंगेपन की शुरुआत कर देते हैं। उन्हें लड़की पढ़ी लिखी तो चाहिए ही, सुन्दर भी चाहिए। भले ही लड़के की सूरत जो हो। किसी भी लड़की के लिए त्रासद वह समय होता है जब उसे शादी के लिए लड़के वालों को दिखाया जाता है। उसे त्रासद होता है उसे रिजेक्ट किया जाना। लेकिन लड़की की संवेदनाओं से उन्हें क्या मतलब जो पत्थरदिल होते हैं। वैसे भी हमारे समाज में आज भी लड़कियों को रोज ही जिन स्थितियों का शिकार होना पड़ता है वह भयावह है। सच कहें तो लड़कियों के मामले में हमारी सोच पूरी तरह पारम्परिक और रूढ़िवादी है। शर्मिला जालान के उपन्यास 'शादी से पेशतर' पढ़ते हुए संजय गौतम उचित ही लिखते हैं "फिर वही सवाल सामने आ जाता है कि एक समाज के रूप में क्या हम वहीं ठहरे हैं या कुछ आगे बढ़े हैं, या आगे न जा कर हम कुछ पीछे हो गए हैं, हो रहे हैं, पहले से ज्यादा क्रूर हो रहे हैं। लड़कियां आखिर क्या करें। करियर की ऊँचाई पर होने के बावजूद भी...

कन्हैया लाल सेठिया के संग्रह पर यतीश कुमार की समीक्षा

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कन्हैया लाल सेठिया सामान्य तौर पर मरुस्थल अपने सूखे, बंजरपन और निर्जनता के लिए जाने जाते हैं। दूर दूर तक केवल और केवल सन्नाटा। हरियाली का कहीं कोई नामो निशान नहीं। ऐसे में अदम्य जिजीविषा वाले जीव ही बच पाते हैं। कन्हैया लाल सेठिया ऐसे ही कवि रहे हैं जिनकी कविताएं मरुस्थलीय जिजीविषा से भरी हुई दिखती हैं। सेठिया जी की कविताओं की पड़ताल करते हुए यतीश कुमार लिखते हैं  'मरुस्थलीय जिजीविषा और संस्कृति की सीख भी कविताओं के नेपथ्य की धार है। सेठिया जी की कविताओं में राजस्थान की माटी की महक कूट-कूट कर भरी है। रेगिस्तान जहाँ एक तरफ अभाव और तपती रेत का प्रतीक है, वहीं दूसरी तरफ वह वहाँ के लोगों की अटूट आस्था और जीवन के प्रति उत्सवधर्मिता का भी गवाह है। इस संग्रह की रचनाएँ यह दिखाती हैं कि कैसे कम से कम संसाधनों में भी मनुष्य गरिमा के साथ जी सकता है।' हाल ही में महाकवि सेठिया की प्रतिनिधि रचनाएँ नामक एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की कविताओं की पड़ताल कर रहे हैं कवि यतीश कुमार। मरुस्थलीय जिजीविषा की कविताएँ  यतीश कुमार  महाकवि कन्हैया लाल सेठिया का कविता संग्रह 'पंख दिए आ...

सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कविताएँ

  एक का पहाड़ा बचपन में अक्सर सोचता था  कि इनका नाम पहाड़े क्यों रखा गया क्या इनका पहाड़ से कोई रिश्ता है या पहाड़ सरीखे होते हैं  हर बच्चे के लिए उसके बचपन में  इसलिए रखा गया यह नाम हम चाहें बचने की जितनी कोशिशें करें पहाड़ों के बिना काम नहीं चलता था पिता भी कहते काम लायक तो सीख ही जाओ कम से कम दस तक का पहाड़ा याद कर लो मैं रट्टा लगाने में एकदम फिसड्डी भागता भरसक कोशिश लगा कर लेकिन हमेशा पकड़ लिया जाता दो एक्कम दो  दो दूनी चार दो तिहाई छः  पहाड़े लगातार आगे बढ़ते चले जाते और बढ़ती जाती उनकी क्लिष्टता भी सात, नौ, तेरह, सत्रह, उन्नीस के पहाड़े में अक्सर अंटक जाता सही बात तो यह  कि मुझे सारे पहाड़े एक सरीखे दिखाई पड़ते तमाम व्यस्तताएं होते हुए भी  उन दिनों घर पर पिता ही पढ़ाते थे  दस का पहाड़ा सिखाते हुए पिता ने सुझाया एक से ले कर दस तक गिनती लिख लो और सबके आगे लगा दो शून्य एक का पहाड़ा तो याद ही होगा तुम्हें डांटते हुए पिता ने पूछा हमसे अब तक किसी ने भी नहीं बताया था  कि एक का भी पहाड़ा होता है  सो मैंने इनकार में सिर हिला दिया ...

राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'हिंदी दिवस: भाषा का उत्सव या हमारी भाषाई पराजय का स्मरण?'

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राकेश कुमार गुप्ता  हाल की एक खबर यह है कि मध्य प्रदेश सरकार ने चिकित्सा शिक्षा के लिए हिन्दी में किताबें प्रकाशित करवाया। चार साल बाद स्थिति यह है कि एक भी विद्यार्थी ने माध्यम के रूप में हिन्दी का चयन नहीं किया। हाल ही की एक खबर यह भी है की भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने को ले कर कुछ लोगों ने यह आपत्ति दर्ज कराई कि इससे हिंदी कमजोर होगी। हिन्दी को ले कर आए दिन तमाम बातें होती रहती हैं। रूस, चीन, जर्मनी और जापान जैसे देशों में चिकित्सा, तकनीक और अभियांत्रिकी की पढ़ाई वहां की भाषाओं में ही होती है। ये दुनिया के ताकतवर देश हैं और यह इन देशों ने अपनी भाषा में ही काम कर यह उपलब्धि हासिल की है। फिर हिन्दी में वह क्या कमी है जो हमारे देश के युवकों को तैयार कर पाने में असफल रही है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय भाषाएँ हिन्दी के लिए रीढ़ की तरह हैं। ये हिन्दी को समृद्ध करती हैं न कि कमजोर। होना तो यह चाहिए कि हिंदुस्तान में हर दिन हिन्दी के लिए होता। लेकिन हम साल में सिर्फ एक बार हिन्दी दिवस मना कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। राकेश कुमार गुप्ता ने हिन...

मनोज कुमार झा की कविताएं

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मनोज कुमार झा  सामान्य व्यक्ति का जीवन स्वयं में एक महासमर होता है। वह न तो अतिरिक्त के बारे में सोच पाता है न ही वह अतिरिक्त कुछ जुटा पाता है। कपड़ा हो या चप्पल, तब तक उपयोग में लाये जाते हैं जब तक ये खुद साथ न छोड़ दें।  कपड़ा छोटा हो गया, कोई बात नहीं, घर का कोई छोटा सदस्य उसका उपयोग कर लेगा। लेकिन वे इन बातों का मतलब क्या समझ पाएँगे जिनके पास सब कुछ इफरात है। ऐसे लोग अपनी चीजों को अक्सर ही फेंक देते हैं जिसे वे बाँटने का नाम दे देते हैं। मनोज कुमार झा हमारे समय के ऐसे कवि हैं जिनको पढ़ना खुद के जीवन और समय को जीने जैसा होता है। उनकी कविताओं को आप एकबारगी नहीं पढ़ सकते। इन कविताओं को पढ़ते हुए एक सिहरन सी होती है। उनकी ये कविताएं भक्त कवियों के पदों जैसी अर्थगर्भित हैं। मनोज अपनी कविता 'असल बातों से दूरी' में लिखते हैं "तुम क्या जान पाओगे इस देश को/ तुम जानते ही नहीं कि कपड़े/ पहले कहाँ फटते हैं/ और तुम जानने की कोशिश भी नहीं करते।" इस अर्थ में वे कबीर की परम्परा से जुड़ते हैं। कबीर का लाजवाब दोहा है "साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाए। मैं भी भूखा न रहूं, सा...