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अज्ञेय का संपादकीय आलेख 'हिंदुत्व की परिभाषा'

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  अज्ञेय एक जमाना था जब साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, धर्मयुग, सारिका और माया जैसी पत्रिकाओं की धूम थी। इसमें छपने का मतलब ही होता था लेखक बिरादरी में शामिल हो जाना। हिन्दी साहित्य के कई बड़े नाम इन पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे। ये पत्र तब सही मायनों में लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका निभाते थे। दिनमान के सम्पादक प्रख्यात साहित्यकार  सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय थे। दिनमान के सम्पादकीय में वे अपने विचार खुल कर व्यक्त करते थे। मनोज मोहन के पास पुरानी पत्रिकाओं का खजाना है। यह संपादकीय उन्हीं के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। मनोज मोहन लिखते हैं ' 1969 का चुनाव होने वाला था। अज्ञेय दिनमान के संपादकीय में हिंदुत्व के ख़तरे पर साफ़-साफ़ लिख रहे थे...।' आज उनके जन्मदिन 7 मार्च के अवसर पर हम उनके इस महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय आलेख को प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अज्ञेय का संपादकीय आलेख 'हिंदुत्व की परिभाषा'। संपादकीय 'हिंदुत्व की परिभाषा' मध्यावधि चुनाव ज्यों-ज्यों निकटतर आते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों की सरगर्मियाँ बढ़ रही हैं, त्यों-त...

अनामिका सिंह की गजलें

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अनामिका सिंह  परिचय -   नाम- अनामिका सिंह  जन्म तारीख - 09 अक्टूबर 1978 जन्मस्थान -इन्दरगढ़ जिला कन्नौज  वतर्मान निवास - शिकोहाबाद, फिरोजाबाद माता – श्रीमती देशरानी  पिता – श्री श्रीकृष्ण यादव  शिक्षा - परास्नातक विज्ञान एवं समाज-शास्त्र, बी.एड. संप्रति -शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश में कार्यरत अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित ग़ज़लें / नवगीत प्रकाशन प्रकाशित कृतियाँ   'न बहुरे लोक के दिन’ नवगीत संग्रह (बोधि प्रकाशन -(2021) नवगीत संग्रह- 'अँधेरा कुछ तो होगा दूर' (बिम्ब प्रतिबिम्ब प्रकाशन) 'अक्षर अक्षर हव्य', दोहा संग्रह, श्वेतवर्णा प्रकाशन (2024) ‘उम्मीदों के गीत-पंख' गीत संग्रह (2024) श्वेतवर्णा प्रकाशन  ‘राहतों के नाम पर बेचैनियाँ' ग़ज़ल संग्रह सम्पादन- ‘आलाप’ समवेत नवगीत संकलन (2023) शुभदा बुक्स प्रकाशन 'सुरसरि के स्वर'  समवेत छंद संकलन , श्वेतवर्णा प्रकाशन (2020) सम्पादन - 'अंतर्नाद' साहित्यिक पत्रिका   सह-सम्पादन ‘कल्लोलिनी’ साहित्यिक पत्रिका सम्पादक/ संचालक ‘कंदील' समकालीन कविता पर एकाग्र साहित्यिक समूह लेखन विधा – ग़ज़ल ...

नीलेश रघुवंशी के उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' की अरुण जी द्वारा की गई समीक्षा

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आज के समय में शहर हर व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इसकी तमाम वजहें होती हैं। हालांकि शहर का तिलिस्म वहां रहने के बाद धीरे धीरे टूटता चला जाता है। शहर का आक्रामक विस्तार आस पास के गांवों कस्बों को तो निगलता ही है साथ ही वह प्राकृतिक परिवेश को भी निगलते हुए आगे बढ़ता जाता है। शहर में सुविधाएं भले ही हों,  लेकिन मनुष्य सामाजिकता से कट कर एकाकी हो जाता है। आस पास के दुख दर्द से किसी का कुछ भी लेना देना नहीं होता। नीलेश रघुवंशी अपने उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' में भोपाल शहर के आस-पास के लोगों के बदलते जीवन और उनकी जद्दोजहद को रेखांकित करता है। लंदन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर फ्रेंसेस्का ऑर्सीन अपने एक इंटरव्यू में नीलेश के इस उपन्यास को हिन्दी के पॉच कालजई उपन्यासों में शुमार करती हैं। इस उपन्यास की एक समीक्षा की है अरुण जी ने। अरुण जी अपने यात्रा वृत्तान्त के लिए जाने जाते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीलेश रघुवंशी के उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' की अरुण जी द्वारा की गई समीक्षा 'दस किलोमीटर में एक नहीं, अनेक कहानियां'। 'दस किलोमीटर...

कुमार वीरेन्द्र का आलेख "जन चेतना के निर्माण का दहकता दस्तावेज 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' "

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कुमार बीरेंद्र  भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में पत्र पत्रिकाओं की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन पत्र पत्रिकाओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन चेतना तैयार करने में एक बड़ी भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन इन पत्र पत्रिकाओं को नियंत्रित करने के लिए हमेशा तमाम उपक्रम करता रहा। ऐसे पत्रों में 'चांद' के साथ-साथ ' हिन्दू  पंच' नाम भी प्रमुख है। अंग्रेजों ने चांद के फांसी अंक पर तो प्रतिबंध लगाया ही, हिन्दू पंच' के बलिदान अंक को भी जब्त कर लिया। ' हिन्दू  पंच' का 'बलिदान अंक' पहले ही उसके पाठकों के हाथों में जा चुका था। इस पत्र ने अपना मुख्य काम कर दिया था। ' हिन्दू  पंच' के इस 'बलिदान अंक' को केन्द्रित कर कुमार वीरेंद्र ने एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है जिसे 'उत्तर प्रदेश' के 'जब्तशुदा साहित्य विशेषांक' जनवरी अप्रैल 2023 में प्रकाशित किया गया है। हम इस आलेख को साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। आज कुमार वीरेंद्र का जन्मदिन है कुमार वीरेंद्र की रुचि शोध में है और वह अपने आलेख में शोध पर विशेष ध्यान रखते हैं। वे बिना शोरोगुल के चुपचाप अपना काम ...

अवन्तिका राय की लघु कथाएं

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अवन्तिका राय रोजी रोटी के लिए विस्थापन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड के लोगों की जैसे उनकी नियति ही है। इन लोगों को समवेत रूप में बिहारी कहा जाता है। जैसे बिहारी होना अपराध हो। आमतौर पर उनके बारे में उनके इलाके के लोगों की राय होती है कि वह खुशकिस्मत है। दूसरी जगह जा कर अच्छे से कमा खा रहा है। लेकिन उसकी दिक्कतें क्या हैं, कैसी हैं, इससे भला किसी को क्या लेना देना? तमाम संसाधन होने के बावजूद उत्तर भारत के ये राज्य पिछड़े होने के लिए अभिशप्त हैं। यहां के जनप्रतिनिधि तमाम तरह से जनता को भरमा कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं।  महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब में अक्सर इन लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है लेकिन ये लोग जैसे जहर पी कर अपना जीवन बिताने के अभ्यस्त हो जाते हैं।  अवन्तिका राय अपनी लघु कथा पन्द्रह अगस्त में इस पीड़ा की एक बानगी करीने से व्यक्त करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अवन्तिका राय की लघु कथाएं। अवन्तिका राय की लघु कथाएं  कहानी सांढ़ और बंदरों की  एक सांढ़ मन्थर गति से चलते हुए जंगल में विचरण कर रहा था।  जैसा कि दिखता ही है, उसका अंडक...