उद्भ्रान्त की आत्मकथा के तीसरे खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" की मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा की गई समीक्षा
आत्मकथा लिखना जितना आसान लगता है उतना यह आमतौर पर होता नहीं। यह कांटों पर चलने सरीखा होता है। आत्मकथा में लेखक से सच्चाई की अपेक्षा की जाती है न कि कथा कहानी गढ़ने की। गांधी जी की आत्मकथा 'माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ' इसीलिए एक बेहतरीन आत्मकथा मानी जाती है कि इसमें गांधी जी ने बेबाकी से अपनी गलतियों के बारे में भी लिखा। आत्मकथा लिखते समय लेखक अगर तटस्थ नहीं हो पाता तो ये दिक्कत सामने आती है। आत्मकथा कई खण्डों में भी लिखने की परम्परा है। हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा चार खंडों 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (1969), ' नीड़ का निर्माण फिर' (1970), ' बसेरे से दूर' (1977), ' दशद्वार से सोपान तक' (1985) लिखी। रमाकांत शर्मा उद्भ्रान्त का भी लिखने के मामले में कोई जवाब नहीं। अब जब लोग महाकाव्य लिखने को बीते जमाने की बात मानने लगे हैं, उद्भ्रान्त ने कई महाकाव्य लिख डाले हैं। इन दिनों वे भी अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं। इस आत्मकथा का तीसरा खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस खंड में उद्भ्रांत ने अपने जीवन के...