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ललन चतुर्वेदी की कविताएं

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ललन चतुर्वेदी ललन चतुर्वेदी  (मूल नाम ललन कुमार चौबे) वास्तविक जन्म तिथि : 10 मई 1966  मुजफ्फरपुर (बिहार) के पश्चिमी इलाके में  नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में  शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), बी एड., यूजीसी की नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण। 'प्रश्नकाल' का दौर नाम से एक व्यंग्य संकलन प्रकाशित  साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं में सौ से अधिक कविताएं प्रकाशित। 'रोशनी ढोती औरतें' शीर्षक से अपना पहला कविता संकलन प्रकाशित करने की योजना है।    संप्रति : भारत सरकार के एक कार्यालय में अनुवाद कार्य से संबद्ध एवं स्वतंत्र लेखन लंबे समय तक रांची में रहने के बाद पिछले तीन वर्षों से बेंगलूर में रहते हैं।   आज हम एक अजीब से दौर से गुजर रहे हैं। यह वह दौर है जब हम कुछ भी आलोचनात्मक बोलने पर विरोधी की नज़र से देखे समझे जाने लगते हैं। अब 'निन्दक नियरे राखिए' का दौर नहीं है बल्कि 'प्रशंसक (चापलूस) नियरे राखिए' का दौर चल पड़ा है। ऐसे में कवि को असुविधा होती है कि वह क्या करे, क्या न करे? लल्लन चतुर्वेदी की कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगा कि वे नए कवि हैं। उनकी भाषा में एक पर

भगत सिंह का आलेख 'अछूत का सवाल'

  पुरातन काल से ही भारत की एक बड़ी समस्या अछूत समस्या रही है। इस समस्या ने देश के सामने कई उलझनें खड़ी कीं तथा  काफी क्षति पहुंचाई। आजादी की लड़ाई के समय भी यह समस्या हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को लगातार परेशान करती रही। इसी क्रम में  काकीनाडा में 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में दलितों को, जिन्हें उन दिनों 'अछूत' कहा जाता था, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बांट देने का सुझाव दिया। हिन्दू और मुस्लिम अमीर लोग इसे पक्का करने के लिए धन खर्चने को भी तैयार थे। दरअसल दलित प्रश्न स्वराज के व्यापक प्रश्न की अंतर्धारा के रूप में चलता रहा। बहस के इस वातावरण में भगत सिंह ने 'अछूत का सवाल' नामक लेख लिखा जो जून, 1928 के 'किरती' में विद्रोही नाम से प्रकाशित हुआ। इस आलेख को हमने 'क्रान्ति की धार विचारों की सान पर तेज होती है' पुस्तिका से साभार लिया है। इसका संपादन विकास नारायण राय ने किया है और यह साहित्य उपक्रम, फरीदाबाद, हरियाणा से प्रकाशित है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं भगत सिंह का आलेख 'अछूत का सवाल'।