पंकज मित्र की कहानी 'भुईंलोटन का भलेंटाइन'
पंकज मित्र हमारा यह समय अजीब समय है। समाज की व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी उन लोगों ने ले ली है जो खुद अराजकता प्रेमी हैं। वेलेंटाइन डे को दुनिया भर में प्रेम दिवस के रूप में मनाए जाने की परम्परा रही है। अराजकतावादियों की आंखों को यह प्रेम नहीं सुहाता। धर्म के ठेकेदार अब इसे मातृ पितृ भक्ति दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कर एक अलग तान छेड़ दी है। हालांकि समाज व्यवस्था को संचालित करने के लिए कुछ कायदे कानून होते हैं जिनके पालन की अपेक्षा सारे नागरिकों से की जाती है। लेकिन जब नैतिकता के नाम पर कोई व्यक्ति या भीड़ नियम कानून को अपने हाथों में लेने की कोशिश करती है तो अराजकता व्याप्त हो जाती है। आजकल धर्म के नाम पर हमारे यहां नियम कानून को अपने हाथ में लेने की कवायदें जोरो पर है। मॉब लिंचिंग की घटनाएँ आम हैं। भाषा, रहन सहन, पोशाक पहनावा आदि के आड़ में अराजक तत्त्व अपना हित साध रहे हैं। पंकज मित्र अपनी कहानी 'भुईंलोटन का भलेंटाइन' में जो परिदृश्य रचते हैं वह काफी कुछ आज के सच सरीखा लगता है। यह अलग बात है कि आज भी भुईंलोटन जैसे कुछ लोग बचे हैं जो मनुष्यता को बचाने की हरचन्द कोशिश...