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शिवकुमार मिश्र का आलेख 'मिट्टी से जुड़ी कवि-संवेदना'

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हमारे चारों तरफ लोक जीवन अपने अंदाज में जी रहा होता है। इस जीवन में अथाह पीड़ा, असमाप्य संघर्ष है लेकिन लोक की अदम्य जिजीविषा इस पीड़ा और संघर्ष को कभी मुखर नहीं होने देती। यह अलग बात है कि विकास की होड़ में दिन प्रतिदिन हम लोक से कटते जा रहे हैं। केशव तिवारी सही मायनों में लोक के कवि हैं। उन्होंने न केवल उसे देखा है बल्कि जिया भी है। इसीलिए उनकी कविताओं में यह लोक अपने चटख अंदाज में दिखाई पड़ता है। चर्चित आलोचक जीवन सिंह के सम्पादन में एक किताब आई है 'साँसों को पढ़ता कवि'। इस किताब में कुल 23 लेखकों के आलेख संकलित किए गए हैं। ये आलोचक तीन पीढ़ियों के हैं। इनमें एक तरफ जहां शिव कुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ आलोचक हैं वहीं दूसरी तरफ भरत प्रसाद, अविनाश मिश्र और सन्तोष अर्श जैसे युवा आलोचक भी हैं। केशव की कविताई पर यह किताब एक मुकम्मल पड़ताल है। बानगी के तौर पर हम शिव कुमार मिश्र का आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन्होंने केशव तिवारी के पहले कविता संग्रह पर लिखा था। शीघ्र ही इस किताब से एक और आलेख हम प्रकाशित करेंगे जो कवि के इधर की कविताओं पर आज की पीढ़ी के आलोचक का होगा। तो आइए आज पहली ब...

राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'लोकतंत्र, असहमति और राज्य की संवैधानिक मर्यादा'

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राकेश कुमार गुप्त लोकतन्त्र बहुदलीय पद्धति पर आधारित होता है। उसमें सत्ताधारी दल एक तरफ जहां सत्ता का दायित्व संभालता है वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल उसकी आलोचना प्रत्यालोचना करते हुए आईना दिखाने का काम करते हैं। लेकिन जब सत्ताधारी दल खुद को ही राष्ट्र समझने लगते हैं तब विपक्षी दलों के लिए दिक्कत उठ खड़ी होती है। सत्ताधारी दल की आलोचना को राष्ट्र की आलोचना समझ लेने पर यह दिक्कत उठ खड़ी होती है। हाल ही में जेन जी के जंतर मंतर पर प्रदर्शन ने जहां सत्ताधारी दल के लिए पहली बार गम्भीर चुनौती प्रस्तुत की वहीं युवाओं की भाषा को ले कर पक्ष विपक्ष में विचार व्यक्त किए गए। यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि  सरकारें बहुमत से बनती हैं, पर संविधान केवल बहुमत का नहीं होता; वह प्रत्येक नागरिक का होता है। असहमति का अधिकार लोकतन्त्र की रीढ़ होता है और इसी रीढ़ पर इसका समूचा ढांचा टिका होता है। उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के अधिवक्ता राकेश कुमार गुप्त ने जेन जी के इस प्रदर्शन को संवैधानिक आधार पर परखने की कोशिश की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'लोकतंत्र, असहमति और राज्य की संवै...

पंकज पराशर का यात्रा संस्मरण 'पहली रात टोकियो में'

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पंकज पराशर  हरेक सभ्यता के जीने रहने का अपना विशेष अनुशासन होता है। उसके अपने अभिप्राय होते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने जितनी तकनीकी प्रगति की वह दुनिया के सामने एक मिसाल की तरह है। जापानी लोग यह ख्याल रखते हैं कि उनकी वजह से अगला व्यक्ति प्रभावित दुष्प्रभावित न हो। इसीलिए वहां के लोगों की आवाज भी एकदम धीमी होती है। यह हमारी दक्षिण एशियाई संस्कृति के बरक्स बिल्कुल विपरीत है जहाँ लोग बिना शोर के कोई भी काम करने के अभ्यस्त नहीं होते। हम अपरिचित से भी बात करने का कोई न कोई सूत्र ढूँढ लेते हैं जबकि जापानी लोग खुद को अपने तक ही सीमित रखते हैं। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभूतियों और स्पर्श की जगह मशीनें नहीं ले सकतीं। पंकज पराशर ने हाल ही में जापान की यात्रा की और इसे शिद्दत से महसूस किया। अपने यात्रा संस्मरण में वे लिखते हैं 'एक शाम शिंजुकु स्टेशन के बाहर हजारों लोगों की भीड़ को सड़क पार करते देखा। वह संसार के सबसे व्यस्त सड़क पार करने वाले मार्गों में से एक था। चारों तरफ़ नीयॉन लाइटें। विशाल स्क्रीनें। विज्ञापन। फैशन स्टोर्स, ...

यादवेन्द्र का आलेख 'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'

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यादवेन्द्र  आत्मीय सम्बन्ध हमें जीवन की ऊष्मा प्रदान करते हैं। ये सम्बन्ध हमें निराशा के बियाबान से बाहर निकाल कर उम्मीद की किरणें बिखेरते हैं। इन सबके मूल में स्मृति का बड़ा हाथ होता है। रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए हमें इसका अहसास ही नहीं होता कि स्मृतिलोप हो जाने पर क्या परिस्थितियों बनेंगी। स्मृतिलोप होने पर व्यक्ति खुद अपना होशो हवाश खो बैठता है। आत्मीय लोगों यहाँ तक कि पति, पत्नी, मां, पिता, भाई, बहन, बेटे, बेटी तक को पहचान नहीं पाते। आप इस त्रासद स्थिति की कल्पना कर सकते हैं कि आपका अपना कोई अजीज ही आपको पहचानने की क्षमता खो चुका होता है। डिमेंशिया ऐसी ही बीमारी है जिसमें व्यक्ति अपने अतीत की सारी स्मृतियों को विस्मृत कर जाता है। यादवेन्द्र जी ने जी बी प्रभात की कहानी चॉकलेट के साथ साथ लवीनिया ग्रीनलॉ की कविताएँ प्रस्तुत की हैं जो डिमेंशिया की भयावह त्रासदी को व्यक्त करते हैं। लवीनिया ग्रीनलॉ अपनी कविता 'मेरे पिता का जानना न जानना' में लिखती हैं  ' वे पेंसिल के बारे में सोचते हैं/   उसी तरह जुराब के बारे में भी/  जब बाथरूम में घुसते हैं/  तो अपने हाथ...