रवि रंजन का आलेख 'रेशमी मर्यादा और धूल भरा यथार्थ : हरि भटनागर की ‘पंडूक’ कहानी में मौन और मानवतावादी स्वर'
हरि भटनागर हमारा समाज एक ऐसा समाज है जहां एक ही समय खंड में एक तरफ प्रगतिशीलता और आधुनिकता दिखाई पड़ती है वहीं दूसरी तरफ हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अंधविश्वासों और पाखण्ड के बीच जीवन यापन करता दिख जाता है। समाज का वह वर्ग जो खुद को आभिजात्य मानता है वह आधुनिकता के नाम पर उस मनुष्यता से विरत हो चुका है जो जीवन की कुंजी है। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो गरीबी और अभाव का जीवन जीते हुए भी ईमानदारी को अपना मूल्य बनाए हुए है। एक रचनाकार के रूप में हरि भटनागर अपनी कहानियों और उपन्यासों के जरिए अपने समय और समाज के सच को उद्घाटित करने का काम करते हैं। 'पंडूक' उनकी ऐसी ही कहानी है जो भारतीय समाज में व्याप्त गहरे वर्ग-भेद, खोखले धार्मिक पाखंड और पितृसत्तात्मक मानसिकता पर एक तीखा प्रहार करती है। इस कहानी की विस्तृत समालोचना वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन ने की है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हरि भटनागर की कहानी पर रवि रंजन का आलेख 'रेशमी मर्यादा और धूल भरा यथार्थ : हरि भटनागर की ‘पंडूक’ कहानी में मौन और मानवतावादी स्वर'। समालो...