नरेश कौशिक के उपन्यास 'ज़िन्दा रहने की ज़िद' पर यतीश कुमार की समीक्षा।
पितृसत्तात्मक समाज में आज भी महिलाओं की स्थिति दारुण बनी हुई है। पुरुष महिलाओं को स्वतंत्रत छोड़ना नहीं चाहता। वही खुद को अपने घर परिवार की महिलाओं के जीवन के बारे में कोई भी निर्णय लेने वाला जिम्मेदार व्यक्ति मानता है। ऐसे में अगर किसी स्त्री ने अपने स्तर से निर्णय ले लिया तो उसके लिए दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं। ऑनर किलिंग यानी सम्मान के नाम पर हत्या ऐसी ही घटना है जो आज आए दिन घटित होती रहती है। पत्रकार नरेश कौशिक का उपन्यास 'ज़िन्दा रहने की ज़िद' ऐसी ही महत्वपूर्ण कृति है जो हमारे सामने एक भयावह विरोधाभास को सामने लाता है। एक ओर पर्दे के पीछे और हवेली की चारदीवारी के भीतर स्त्रियों की गरिमा का प्रतिदिन हनन किया जाता है, तो वहीं दूसरी तरफ उन्हीं लोगों द्वारा अपने पारिवारिक सम्मान की रक्षा के नाम पर निर्दोष युवाओं की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। उपन्यास की नायिका दुर्गा है जो रामायण के सीता की ही तरह मिट्टी के घड़े से जीवित निकल कर आती है। वह इस विश्वास को मजबूती प्रदान करती है कि तमाम अवरोधों के बावजूद यह दुनिया सुंदर हो सकती है, अगर ईमानदारी से कोशिश किया जाए। वह अपन...