इतिहास पर वाद विवाद
इतिहास साक्ष्यों के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। यह इतिहास की ताकत भी है और सीमा भी। अलग अलग विचारधारा वाले इतिहासकारों के लिए यह तथ्य ही परेशानियां खड़ी करते हैं। वास्तव में किसी भी साक्ष्य को इतिहासकार अपनी तरह से क्रॉस चेक करता है। इतिहासकार किसी एक स्रोत के हवाले से निष्कर्ष निकालने से बचते हैं। क्योंकि हर स्रोत की अपनी सीमा होती है ऐसे में दूसरे अन्य स्रोतों से उसके हकीकत की तहकीकात करने की जिम्मेदारी भी इतिहासकार की ही होती है। हमारे देश में मुद्रित शब्दों को हकीकत मानने का चलन रहा है। पुराण ग्रन्थ हों या महाकाव्य ग्रन्थ, हम उन्हें साहित्य की तरह पढ़ने की बजाए इतिहास मान कर पढ़ने लगते हैं तो दिक्कत उठ खड़ी होती है। अकबर के काल का पूरा सच न तो अबुल फजल बया कर पाते हैं, न ही बदायूंनी की कट्टरपंथी सोच अकबर की हकीकत बता पाती है। इसके लिए हमें स्रोतों को क्रॉस चेक करते हुए हकीकत को तलाशना पड़ता है। मध्य काल के तमाम ऐसे नाम मिलते हैं जिनकी किताबें उस समय को जानने के लिए एक आधारभूत सामग्री की तरह हैं। बकौल विजय मनोहर तिवारी ये नाम हैं - "फखरे मुदब्बिर, मिनहाजुद्दीन सिराजुद्दीन ...