रवि रंजन का आलेख 'जैव-राजनीति और आत्मीयता का क्षरण'
श्रीप्रकाश शुक्ल कोरोना महामारी मनुष्यता के समक्ष एक ऐसी विपदा ले कर आई जिसने समूचे प्रतिमानों को बदल कर रख दिया। कोरोना से ग्रसित मनुष्य महज रोगी बन कर रह गया। ऐसा रोगी जिससे सभी को आवश्यक रूप से दूर रहना था। जीवन की क्षणभंगुरता उजागर हो गई। तमाम लोगों की मौतें अस्पतालों में ही हुई। इस दौरान पूँजीवाद की निर्ममता भी स्पष्ट हो गई। रवि रंजन अपने आलेख में लिखते हैं 'महामारी के दौरान पूँजीवाद का एक बड़ा अंतर्विरोध उजागर हुआ। जिन श्रमिकों के श्रम पर पूरी अर्थव्यवस्था निर्भर थी, वही सबसे अधिक असुरक्षित सिद्ध हुए। भारत सहित अनेक देशों में लाखों श्रमिकों का विस्थापन हुआ। वे पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए विवश हुए। यह दृश्य मार्क्सवादी अर्थों में श्रम और पूँजी के संबंधों की नग्न वास्तविकता को सामने लाता है।' इस कोरोना वह आधार बना कर कवि श्री प्रकाश शुक्ला ने एक महत्वपूर्ण कविता लिखी ‘उत्तर- कोरोना...’। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन ने आलोचना की जो नई पद्धति विकसित की है वह अपने आप में एक प्रतिमान है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता को समझने के क्रम में वे दुनिया के कई महत्वपूर्ण आलो...