रवि रंजन का आलेख 'टूटी हुई, बिखरी हुई': आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना का काव्यशास्त्र'
शमशेर बहादुर सिंह एक ही रचनाकार के लेखन में विभिन्न विधाओं में परस्पर आवाजाही सहज ही देखी जा सकती है। यह आवाजाही उस लेखक की रचनाशीलता को समृद्ध करती है। शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी के उन विरलतम कवियों में से एक हैं जिनकी कविताएं चित्रमय होती हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' शमशेर की उन प्रतिनिधि कविताओं में है जिसकी चर्चा काफी होती है। इस कविता में आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना अपनी सबसे सघन अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। इस कविता के हवाले से वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन लिखते हैं - 'उनकी कविता में वस्तुएँ केवल वस्तुएँ नहीं रहतीं; वे मनुष्य की चेतना का विस्तार बन जाती हैं। दृश्य, ध्वनि, रंग, गन्ध, स्पर्श, स्मृति और मौन मिल कर ऐसा अनुभव-जगत निर्मित करते हैं जिसमें सामाजिक यथार्थ अपनी सबसे सूक्ष्म और कलात्मक उपस्थिति प्राप्त करता है। यही कारण है कि शमशेर की कविता का समाजशास्त्रीय अध्ययन केवल वर्ग, इतिहास या विचारधारा की पहचान भर नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की अनुभव-संरचना का अध्ययन भी है।' शमशेर की इस कविता की बहुआयामिता को अपने एक महत्त्वपूर्ण आलेख में रवि रंजन ने उद्घाटित करते हुए इसके स...