हरियश राय के उपन्यास पर चंद्रकला सिंह की समीक्षा
दूब धरती से लगी हुई होती है। वह ऊँची नहीं होती लेकिन उसकी जिजीविषा अदम्य होती है। आंधी तूफान बड़े बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंकते हैं लेकिन वह दूब का बाल बाँका भी नहीं कर पाते। बरसात में यह दूब मिट्टी को बचाने का काम करती है। आमतौर पर साहित्य उनकी बात करता है जिनकी बात कोई और नहीं करता। वह दबे कुचले हुए लोगों की बात करता है। प्रतिष्ठित रचनाकार हरियश राय अपनी कहानियों और उपन्यासों में इन दबे कुचले लोगों के मुद्दों को उठाते हैं। उनके हालिया प्रकाशित उपन्यास का नाम ही है दूब। नायिका दूर्वा अपने प्रयासों से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाती है लेकिन उसे अहसास होता है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता ही सब कुछ नहीं होता। हरेक व्यक्ति के कुछ और भी वैयक्तिक और सामाजिक सरोकार होते हैं। हरियश राय के इस उपन्यास पर अपनी समीक्षा में चन्द्रकला सिंह लिखती हैं 'यह उपन्यास स्त्री की गरिमा के साथ-साथ प्रकृति और पहाड़ की गरिमा का भी प्रश्न उठाता है। दूर्वा जिस तरह अपने जीवन के लिए लड़ती है, उसी तरह वह अपने पहाड़ों, जंगलों, जलस्रोतों और वहाँ के लोगों के जीवन के लिए भी चिंतित दिखाई देती है।' यही इस उपन्यास का प...