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सुनील कुमार पाठक का आलेख

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  सुनील कुमार पाठक  भोजपुरी एक बड़े समुदाय की मातृभाषा है। आठवीं अनुसूची में शामिल न होने के बावजूद भोजपुरी साहित्य ने अपनी यात्रा एक गौरव और गंभीरता के साथ पूरी की है। आज भी यह यात्रा जारी है। भोजपुरी कविता ने अपने समय की विडंबनाओं को बखूबी रेखांकित करने का काम किया है। इसका वृत्त बड़ा है। यह कविता आज भी मुख्य रूप से खेती किसानी और घर परिवार से जुड़ी हुई है। इस कविता के मूल में वह जनपक्षधरता है जो यहाँ की मिट्टी में विद्रोही तेवर के साथ उपस्थित है। यहाँ बिना किसी शोरोगुल के हर किस्म का वह विमर्श भी मिल जाएगा जो हिन्दी के साथ साथ अन्य भाषाओं की कविता में चलन में है। इस कविता में बड़बोलापन नहीं है बल्कि भोजपुरी क्षेत्र की वास्तविकता दिखाई पड़ती है। इस कविता में 'नव निर्माण की क्षमताएं हैं और पुरानी भीत को ढाहने की ताकत' भी है। इसमें 'ललकी किरनिया फूटने की उम्मीद' है और इस उम्मीद को बनाए रखने के लिए लड़ने भिड़ने की क्षमता भी है। सुनील कुमार पाठक ने अपने आलेख में समकालीन भोजपुरी कविता पर समग्र रूप से दृष्टिपात किया है। आइए सुनील कुमार पाठक के इस आलेख के हवाले से पहली बार प...