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अंजू केशव की गजलें

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अंजू केशव नाम - अंजू केशव  निवास - जमशेदपुर, झारखंड जन्मतिथि - 24 अप्रैल  शिक्षा - स्नातकोत्तर, जेट उत्तीर्ण  पुस्तक - सन्नाटे में शोर बहुत है (ग़ज़ल-संग्रह)  गीत, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा आदि साहित्य की विविध विधाओं में लेखन,  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साझा संग्रहों में प्रकाशित अक्सर सामने दिखने वाला तथ्य ही सच नहीं होता। सच के तमाम पहलू और भी होते हैं। लेकिन इन्हें देखने परखने की फुरसत आज भला किसके पास है? देखने के लिए जो संवेदनाजनित दृष्टि चाहिए वह इस दौर में लगातार छिजती जा रही है। आदर्श और नैतिकता बीती और अप्रासंगिक बातें होती जा रही हैं।  इस दौर में सोचने समझने को जैसे स्थगित सा कर दिया गया है। फिर भी कुछ लोग हैं जो सोचने और सिहरने वाले हैं। रचनाकार इसीलिए आम जनता के बीच होते हुए भी थोड़ा अलग होता है। वह उन उपेक्षितों की बात करता है जिन पर किसी की नज़र नहीं पड़ती। अंजू केशव जिजीविषा से भरी रचनाकार हैं। वे जानती हैं कि दुखड़ा रोने से काम नहीं चलता। जिसके पास उम्मीदें हैं, उसके पास सब कुछ है। वह हारी हुई लड़ाई भी जीत सकता है। अंजू जन्म जन्मान्तर जैसी काल्पन...

रवि नन्दन सिंह का आलेख 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'

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किसी भी रचनाकार के विकास में उस जगह का विशिष्ट स्थान होता है जहाँ वह अपने जीवन का अमूल्य समय बिता चुका होता है।  प्रेमचंद का इलाहाबाद से एक ऐसा रिश्ता बना जिसका निर्वहन उन्होंने आजीवन किया। यहीं पर रहते हुए उन्होंने अपनी कुछ विशिष्ट कृतियां रची। रविनंदन सिंह के अनुसार उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ अर्थात् ‘देवस्थान का रहस्य’ यहीं पर रहते हुए लिखना आरंभ किया। यह उपन्यास बनारस से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘आवाजे-खल्क’ में अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के लेखक का नाम था—धनपत राय उर्फ ‘नवाबराय अलाहाबादी’। पढ़ाई से ले कर नौकरी तक इलाहाबाद से प्रेमचंद का 'कभी नीम तो कभी शहद सम्बन्ध' बना रहा। यहीं पर रहते हुए प्रेमचंद पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम लगा।  आज प्रेमचंद का जन्मदिन है। उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत करते हैं रवि नन्दन सिंह का आलेख 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'। 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद' रवि नन्दन सिंह             प्रेमचंद और इ...

प्रेमचंद का निबन्ध 'अंधविश्वास'

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कुछ विशेष तरह के रीति रिवाज, कर्मकाण्ड और आयोजन हिन्दू धार्मिक परंपरा के अंग रहे हैं। जनता अपनी धार्मिक आस्था के तहत इनका अपनी तरह से अनुसरण करती है। इलाहाबाद में 2025 में आयोजित महाकुम्भ इस परम्परा का एक विशिष्ट उदाहरण है। महाकुम्भ में एक तरफ जहां अनेक विद्वत लोग शामिल हुए वहीं दूसरी तरफ इसमें ढोंगियों और पाखंडियों का भी अच्छा खासा बोलबाला था। कुछ साधु वेशधारी तो लोगों को मारते पीटते और गाली गलौज़ करते तक नजर आए। कबीर दास साधु के स्वभाव के बारे में लिखते हैं :  साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै थोथा देय उड़ाय।। लेकिन यहां के साधुओं को देख कर लगा कि वे अपने आत्म के अन्दर 'थोथा' को ही संचित किए हुए हैं। उनके यहाँ 'सार' का घोर अभाव है। इस क्रम में प्रेमचंद के एक आलेख की याद आती है जिसका शीर्षक ही 'अंधविश्वास' है। काफी समय पहले लिखा गया यह आलेख जैसे आज भी प्रासंगिक है। कहानियों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी प्रगतिशील सोच के लिए भी प्रेमचंद जाने जाते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक अध्यक्ष के तौर पर दिया गया उनका भाषण आज भी याद किया जाता है। आज प्रेमच...

हरियश राय के उपन्यास पर चंद्रकला सिंह की समीक्षा

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दूब धरती से लगी हुई होती है। वह ऊँची नहीं होती लेकिन उसकी जिजीविषा अदम्य होती है। आंधी तूफान बड़े बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंकते हैं लेकिन वह दूब का बाल बाँका भी नहीं कर पाते। बरसात में यह दूब मिट्टी को बचाने का काम करती है। आमतौर पर साहित्य उनकी बात करता है जिनकी बात कोई और नहीं करता। वह दबे कुचले हुए लोगों की बात करता है। प्रतिष्ठित रचनाकार हरियश राय अपनी कहानियों और उपन्यासों में इन दबे कुचले लोगों के मुद्दों को उठाते हैं। उनके हालिया प्रकाशित उपन्यास का नाम ही है दूब। नायिका दूर्वा अपने प्रयासों से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाती है लेकिन उसे अहसास होता है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता ही सब कुछ नहीं होता। हरेक व्यक्ति के कुछ और भी वैयक्तिक और सामाजिक सरोकार होते हैं। हरियश राय के इस उपन्यास पर अपनी समीक्षा में चन्द्रकला सिंह लिखती हैं 'यह उपन्यास स्त्री की गरिमा के साथ-साथ प्रकृति और पहाड़ की गरिमा का भी प्रश्न उठाता है। दूर्वा जिस तरह अपने जीवन के लिए लड़ती है, उसी तरह वह अपने पहाड़ों, जंगलों, जलस्रोतों और वहाँ के लोगों के जीवन के लिए भी चिंतित दिखाई देती है।' यही इस उपन्यास का प...

प्रचण्ड प्रवीर के कहानी संग्रह उत्तरायण पर धीरेन्द्र प्रताप सिंह की समीक्षा

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कौन मनुष्य होगा जो खुले आसमान में रात्रि को चांद सितारों को निहारता नहीं होगा। इसी क्रम में प्राचीन काल में मनुष्य ने कुछ सितारों को खगोलीय हिसाब से जोड़ कर बारह राशियों की परिकल्पना की। तमाम लोगों को यह विश्वास है कि ये राशियाँ हमारे जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करती हैं। बहरहाल इन बारह राशियों के नामों को शीर्षांकित करते हुए प्रचण्ड प्रवीर ने अपना कहानी संग्रह उत्तरायण तैयार किया है जिसमें कुल छः कहानियाँ हैं। साहित्य में मिथकों के इस्तेमाल की एक समृद्ध परम्परा रही है। इसी क्रम में इस कहानी संग्रह को भी देखा जा सकता है। युवा अध्येता धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने इस संग्रह की समीक्षा करते हुए लिखा है 'इस संग्रह की कहानियाँ एक ठहरे हुए जल में हलचल की तरह या कहें कि कई जगह अचानक से हाथ की अंगुलियों में लगे नश्तर की तरह दिमाग़ को झनझना देने वाली हैं। कई जगह तो कहानियों की विषयवस्तु से अधिक कहानी से गुथी हुई टिप्पणियाँ विस्मित कर देती हैं। राशियों के नाम से जुड़ी हुई कहानियों में पहले उस संबंधित राशि की खगोलशास्त्रीय व्याख्या है, फिर उस व्याख्या के मर्म से जोड़ कर कहानी की जो विषयवस्तु बुनी ...