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पंकज मित्र 'बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है

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पंकज मित्र  अहिंसा कायरो का नहीं बल्कि बलवानों का हथियार है। गांधी जी ने बहुत सोच विचार कर इस अस्त्र का इस्तेमाल अंग्रेजों के खिलाफ किया था। परम्परागत हथियारों का जवाब देने में माहिर अंग्रेजों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। कहानीकार पंकज मित्र ने अपनी कहानी 'बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है' में इसी अहिंसा की बात अपनी तरह से किया है। इस में हमारा आज का बेहद हिंसक और क्रूर होता जा रहा समाज है। बाकी काम पंकज का कथा शिल्प और उनकी की भाषा शैली कर देती है। आज गांधी जयंती के दिन यह कहानी मानीखेज लग रही है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंकज मित्र 'बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है। 'बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है' पंकज मित्र हमारे बापू पर हमला हो गया था और वह भी हमारे मोहल्ले में। यह कोई रहस्य भी नहीं था कि किसने हमला किया था, या करवाया था और क्यों। बापू उन शारीरिक विशेषताओं वाले लोगों में शुमार होता था जिन्हें देखते ही षोडशी कन्याएं – “अंकल! थोड़ा साइड दीजिएगा” का विषवाण चला देती थीं और वह निष्कवच इन विषवाणों को झेलने के लिए अभिशप्त था। दरअसल दो तरह की शारीरिक...

कैलाश गौतम की कविता 'गान्‍ही जी'

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महात्मा गांधी  गांधी जी राजनीति को सेवा धर्म मानते थे। आज की राजनीति पेशा हो गई है जिसका एक मात्र उद्देश्य किसी भी तरह सत्ता में बने रहना है। राजनीति किसी भी देश को दिशा देने का काम करती है लेकिन अगर वही दिशाहीन हो जाए तो फिर किससे उम्मीद की जाए। गांधी जी की नजर में कतार में खड़ा अन्तिम आदमी होता था। आज के राजनीतिज्ञों की नजर पूंजीपतियों, माफियाओं और उन दबंगों पर होती है जो येन केन प्रकारेण चुनाव जितवा सकें। आज दिखावा और पाखण्ड ज्यादा है। गांधी जी ऐसी स्थिति में सहज ही याद आते हैं जिनका कहना था मेरा जीवन ही सन्देश है। क्या आज ऐसा कोई दिख रहा है जो यह कह सकने की स्थिति में हो। सही बात तो यह है कि हम गांधी को भुलाने की कोशिशें करने लगे हैं। लेकिन दिक्कतें ऐसी हैं कि बार बार गांधी की याद अनायास ही दिलाती हैं। कैलाश गौतम अपनी एक भोजपुरी कविता में गांधी जी को याद करते हुए लिखते हैं : 'जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला/ लम्‍बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला/ चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला/ एक्‍को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला'। आज दो अक्टूबर गांधी जी ...

राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'गांधी को देखने की जनपक्षीय दृष्टि'

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प्रेम कुमार मणि का आलेख ‘गाँधी को कैसे देखें’ को पढ़ते हुए राकेश कुमार गुप्त ने अपनी प्रतिक्रिया लिख भेजी है। राकेश जी ने जिन सवालों को यहां उठाया है वह केवल प्रतिक्रिया भर नहीं है, उसे एक मुकम्मल आलेख के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इस बात में कोई संशय नहीं कि गांधी जी ने जनता के व्यापक समूह को भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ कर इसे अखिल भारतीय आन्दोलन का रूप दे दिया। इससे आन्दोलन को नई धार मिली। 1857 से ले कर 1919 तक इस आन्दोलन में जो मंथरता थी, वह अब बदल गई। 1920 से 1947 के बीच के 28 साल महत्त्वपूर्ण थे जिसमें जनता  ने खुद को स्वतंत्रता के लिए तैयार कर लिया। राकेश लिखते हैं 'गांधी जी ने ने स्वतंत्रता की आकांक्षा को अभिजात राजनीतिक दायरे से निकाल कर सामान्य भारतीय के जीवन का प्रश्न बना दिया। गांधी के आने से पहले भी राष्ट्रीय आंदोलन था, राजनीतिक चेतना थी और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष था; लेकिन गांधी ने उस संघर्ष की सामाजिक पहुंच और राजनीतिक भाषा को असाधारण रूप से विस्तृत किया। किसान, मजदूर, स्त्रियां, तथाकथित अस्पृश्य, छोटे व्यापारी, कारीगर और ग्रामीण समाज का विशाल...

प्रेमकुमार मणि का आलेख 'गाँधी को कैसे देखें'

महान होने के बावजूद गांधी हाड़ मांस से बने एक मनुष्य थे और इसी नाते उनमें कई मानवीय कमज़ोरियां भी थीं। गांधी ने कभी अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश नहीं की। खुद अपनी आत्मकथा में वे अपनी गलतियों को खुले रूप में स्वीकार करते हैं। अपने समय के नायकों से उनके वैचारिक मतभेद भी थे। रवींद्र नाथ ठाकुर, मुहम्मद अली जिन्ना, भीम राव अंबेडकर, वीर सावरकर, जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस से उनके मत मतांतर थे। इसके बावजूद इन सब के लिए उनके मन में कोई तल्खी नहीं थी। वे सबके साथ मिलते, बैठते और खुले मन से बातचीत करते थे। केवल एक बार  1924 के बेलगांव कांग्रेस के वे अध्यक्ष चुने गए फिर भी कांग्रेस पर उनका पूरा नियंत्रण रहा। आज गांधी जी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे में तटस्थता के साथ गांधी का मूल्या कोशिश प्रेमकुमार मणि करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम  हैं प्रेमकुमार मणि का आलेख 'गाँधी को कैसे देखें। 'गाँधी को कैसे देखें'   प्रेमकुमार मणि  गाँधी को मैंने किसी अनुयायी अथवा लकीर के फकीर गाँधी-वादियों की तरह नहीं, बल्कि अपने विवेक से देखने की कोशिश की है। कोई ...

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'लेडी विद अ लैपटॉप'

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प्रचण्ड प्रवीर  जिन्दगी प्रायः बहुरंगी होती है। सुख दुःख इसके हिस्से होते हैं। सबके अपने अपने सुख, सबकी अपनी अपनी दिक्कतें, दुःख और तकलीफें होती हैं। हम सबको अपनी जिंदगी में इन सब का सामना खुद करना पड़ता है और खुद ही इनसे निबटना पड़ता है। एक कहावत है डूबते को तिनके का सहारा। सफर करते हुए कभी कभी पास बैठे सहयात्री की आंखों में ही तमाम उम्मीदें दिखाई पड़ने लगती हैं। अपनी कहानी ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ में प्रचण्ड प्रवीर लिखते हैं "मैँने देखा महिलाओँ के डिब्बे के पास बनी बेंच पर कत्थई ड्रेस पहनी मास्क लगाये ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ अपने लैपटॉप को खोले बैठे मेरी तरफ एकटक देख रही है। शायद वह रुक कर कहीँ और जाने वाली थी। शायद किसी की प्रतीक्षा कर रही थी। शायद वह मुझसे कुछ पूछना चाहती थी पर संकोच और अपरिचित होने के नाते भी पूछ नहीँ पा रही थी। और उसकी गहरी आँखोँ से ऐसा लग रहा था मानो कुछ ही समय मेँ समाधान मिल जायेगा, और फिर एक नवीन और भव्य जीवन प्रारम्भ होगा। और यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि अभी उसके सामने एक बहुत लम्बा रास्ता है, और उसका सबसे जटिल और कठिन हिस्सा तो अभी बस आरम्भ ही हो रहा था।' आ...

शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली'

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भगत सिंह  भारतीय इतिहास में भगत सिंह एक धूमकेतु की तरह आते हैं। अचानक अपनी चमक बिखेरते हैं और फिर रुखसत हो जाते हैं। भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा हालांकि क्षणिक दिखाई पड़ती है लेकिन उसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दिशा को मोड़ने का महत्त्वपूर्ण काम किया। भारत का हर युवा भगत सिंह की क्रांतिकारी चेतना से प्रभावित हुआ और शीघ्र ही वह वातावरण बनने लगा जिसमें अंग्रेजों के लिए यहाँ लम्बे समय तक टिक पाना दुष्कर हो गया। भगत सिंह प्रबुद्ध थे। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जिसमें सामाजिक समरसता जैसी वास्तविक स्वतंत्रता हो।  शैलेन्द्र चौहान अपने आलेख में लिखते हैं 'भगत सिंह की राजनीतिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था—शोषण और असमानता से मुक्त समाज की कल्पना। वे राजनीतिक स्वतंत्रता को अंतिम लक्ष्य नहीं मानते थे। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ ऐसा समाज भी था जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो। इसीलिए उनकी दृष्टि में राष्ट्रवाद केवल राष्ट्र की सीमाओं तक सीमित विचार नहीं था। उसमें सामाजिक न्याय और आर्थिक बराबरी का प्रश्न भी शामिल था।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलेन्द्र चौ...

प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'

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मनुष्य का एक सहज जुड़ाव अपनी मिट्टी के साथ होता है। परिस्थितियोंवश उसे निर्वासित होना पड़ता है। लेकिन जब निर्वासन किसी पर थोप दिया जाए तो यह त्रासद होता है। इस त्रासदी को हमारे समाज में प्रायः स्त्रियों के साथ जोड़ दिया जाता है। प्रभा मुजुमदार इस निर्वासन को दृढ़ता के साथ नकारती हैं। अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए इस संग्रह की भूमिका में वे लिखती हैं ‘एक सजग रचनाकार राजसत्ता, धर्मसत्ता, बाजार की सत्ता या और किसी भी सत्ता की निरंकुशता के विरोध में विद्रोह और प्रतिरोध की आवाज को अभिव्यक्ति देता है। वह अनिवार्य रूप से मनुष्यता का पक्षधर होता है।’ यह एक कवि का होना है जो हमेशा मनुष्यता के पक्ष में और निरंकुशता के विरोध में खड़ा रहता है। हाल ही में प्रभा मुजुमदार का पांचवा कविता संग्रह ‘नकारती हूँ निर्वासन’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की समीक्षा लिखी है कौशल किशोर ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रभा मुजुमदार के कविता संग्रह की कौशल किशोर द्वारा की गई समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता'। पुस्तक समीक्षा 'तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता' कौशल किशोर ऐसे कालखंड में जब पक्षधर...