अज्ञेय का संपादकीय आलेख 'हिंदुत्व की परिभाषा'
अज्ञेय एक जमाना था जब साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, धर्मयुग, सारिका और माया जैसी पत्रिकाओं की धूम थी। इसमें छपने का मतलब ही होता था लेखक बिरादरी में शामिल हो जाना। हिन्दी साहित्य के कई बड़े नाम इन पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे। ये पत्र तब सही मायनों में लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका निभाते थे। दिनमान के सम्पादक प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय थे। दिनमान के सम्पादकीय में वे अपने विचार खुल कर व्यक्त करते थे। मनोज मोहन के पास पुरानी पत्रिकाओं का खजाना है। यह संपादकीय उन्हीं के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। मनोज मोहन लिखते हैं ' 1969 का चुनाव होने वाला था। अज्ञेय दिनमान के संपादकीय में हिंदुत्व के ख़तरे पर साफ़-साफ़ लिख रहे थे...।' आज उनके जन्मदिन 7 मार्च के अवसर पर हम उनके इस महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय आलेख को प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अज्ञेय का संपादकीय आलेख 'हिंदुत्व की परिभाषा'। संपादकीय 'हिंदुत्व की परिभाषा' मध्यावधि चुनाव ज्यों-ज्यों निकटतर आते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों की सरगर्मियाँ बढ़ रही हैं, त्यों-त...