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रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'शुभा : दक्ष शिल्पी की उत्कृष्ट कृति'

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अनूप लाल मण्डल  परिचय जन्म : 11 अक्तूबर 1896 मृत्यु : 21/22 सितंबर 1982 प्रेमचंद के परवर्ती और रेणु के पूर्ववर्ती अनूप लाल मंडल सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, कथाकार और समाज सुधारक थे। उन्हें हिंदी साहित्य में वंचितों और उपेक्षित वर्गों को केंद्रीय चरित्र बनाकर लिखने वाले शुरुआती रचनाकारों में गिना जाता है। उन्होंने 20 से अधिक मौलिक और अनूदित उपन्यास लिखे। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, समाज सुधार और यथार्थ का गहरा चित्रण मिलता है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'अपराधी की औलाद', 'मनुष्य इकाई है', 'माटी का माली', 'पिंजरे की उड़ान', 'तूफान और तिनके', 'नया सूरज नया चांद', 'मीमांसा', 'रक्त और रंग', और 'अवध पराया धन' प्रमुख है। उनके चर्चित उपन्यास 'मीमांसा' पर वर्ष 1940 में किशोर साहू द्वारा 'बहुरानी' नामक फिल्म बनाई गई थी। 'रक्त और रंग' उपन्यास को बिहार सरकार की ओर से पुरस्कृत किया गया था। 'शुभा' उपन्यास अप्रकाशित रह गया था। उनके उपन्यास 'तूफान और तिनके' में पिछड़ा वर्ग और समाज का मानक चित्रण...

विनोद दास का संस्मरण 'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'

  संस्मरण  'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'   विनोद दास  हम उन यादों से बार-बार गुज़रना चाहते हैं जो हमारे साथ पहली बार घटित होती हैं। पहली बार देखी गयी फिल्म। पहली बार पढ़ी गयी किताब। पहली बार लिखी गयी कविता। किसी को देखने पर पहली बार धड़का दिल। पहली बार की गयी रेल या हवाई यात्रा।  मुझे आज अपने मन की वह घुमड़न याद आ रही है जब किसी किताब को पढ़कर उस पर पहली बार कुछ लिखने की इच्छा अंकुरित हुई थी। किताब थी-कुँवर नारायण का कहानी संग्रह-'आकारों के आसपास'।  छोटे कलेवर की कहानियाँ। कथ्य और शिल्प में विविधता और नवाचार। बहुस्तरीय अर्थ अनुभव से समृद्ध ताज़ी और मर्मस्पर्शी भाषा। कवि की कहानियाँ होने के बावजूद संवेदना के धरातल पर लिजलिजे रोमान से सायास दूरी। कहानी होते हुए कहानी के पारम्परिक विन्यास से मुक्त।  उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए कभी लगता कि कोई निबन्ध पढ़ रहे है तो कभी लगता कि किसी छोटी नीतिकथा से कोई सबक सीख रहे हैं। इनमें कभी संस्मरण का आस्वाद मिलता तो कभी किसी मामले घटना को पढ़ते हुए अखबार की रपट की याद आती। यह एक सुखद संयोग भी था कि उन दिनों कुँवर नार...

कुंवर नारायण की इतिहासपरक कविताएं

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कुंवर नारायण  समय के साथ इतिहास का चोली दामन का सम्बन्ध होता है। इतिहास साक्ष्यों की धार पर अपने अंदाज में ही चलता है। इधर उधर होने की वहां कोई गुंजाईश ही नहीं। अनेक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो न केवल घटनाओं के साक्षी रहे बल्कि जिन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए इतिहास को सृजित किया। अमीर खुसरो ऐसे ही व्यक्ति थे जो सात सुल्तानों को दिल्ली की गद्दी पर आसीन होने के प्रत्यक्षदर्शी थे।  सुल्तान बनने बनाने के षडयंत्रों से वे भलीभांति वाक़िफ़ थे। इसीलिए नफ़रती राजनीति से उन्हें घृणा हो गई। कुंवर जी अपनी अमीर खुसरो कविता में लिखते हैं 'भूल जाना मेरे बच्चे कि ख़ुसरो दरबारी था।/  वह एक ख़्वाब था—/  जो कभी संगीत / कभी कविता /  कभी भाषा/  कभी दर्शन से बनता था/ वह एक नृशंस युग की सबसे जटिल पहेली था/  जिसे सात बादशाहों ने बूझने /  की कोशिश की!  कुंवर नारायण ने इतिहास को कविता में बरतने का सराहनीय प्रयास किया है। ये कविताएं उनकी इतिहास दृष्टि की परिचायक हैं। आज उनके जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति को प्रणाम करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुंवर नारायण की इतिहासपर...