चन्दन पाण्डेय की कहानी 'शुभ विवाह'
चन्दन पाण्डेय उत्तर भारतीय परिप्रेक्ष्य में लड़की का विवाह पिता की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। विवाह के बाद लड़कियों का घर ही नहीं गोत्र भी बदल जाता है। शादी को ले कर वे जितनी सपने बुनती हैं, उससे कहीं ज्यादा इस बात को ले कर भयाक्रांत रहती हैं कि न जाने पति का व्यवहार कैसा होगा। ससुराल के अन्य लोग कैसे होंगे। उनका रवैया क्या होगा? शादी के बाद लड़की का घर ही अब उसके मायके में तब्दील हो जाता है। अगर लड़की को ससुराल में दिक्कत होती है तो उसकी माँ, पिता, भाई, बहन सभी यही समझाते हैं कि वह वहाँ की स्थिति के अनुरूप एडजस्ट करें। धीरे धीरे लड़की की ससुराल ही उसका वास्तविक घर बन जाता है जबकि वह घर जहाँ वह पली बढ़ी होती है, लगातार बेगाना होता चला जाता है। जिस घर में बाकायदा एक कमरे पर उसका कब्जा होता था, उसी घर में उसके लिए अब कोई जगह ही नहीं रह जाती। लड़की की विदाई तो अवश्यंभावी होती है। लेकिन विदाई इस मायने में मारक होती है कि यह महज शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक विदाई भी बन जाती है। शादियों के समय महिलाओं द्वारा ही गाए जाने वाले पारम्परिक गीतों में यह व्यथा सहज ही महसूस की जा स...