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प्रीता माथुर ठाकुर से प्रतुल जोशी की बातचीत

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  प्रीता माथुर ठाकुर भारत के नामचीन और पुराने थियेटर ग्रुप में मुम्बई के 'अंक' थियेटर ग्रुप का स्थान अग्रणी है। इसकी स्थापना दिनेश ठाकुर ने 1976 में की थी। प्रीता माथुर विख्यात थियेटर अभिनेत्री हैं। पहले पहल उन्होंने इप्टा से जुड़ कर अभिनय की बारीकियां सीखी। आगे चल कर अंक थियेटर ग्रुप से जुड़ाव के पश्चात नीता जी ने दिनेश ठाकुर के साथ काम किया। बाद में नीता जी ने दिनेश ठाकुर के साथ शादी कर ली। थियेटर, थियेटर से जुड़े मुद्दों और चुनौतियों को ले कर नीता माथुर ठाकुर से एक खास बातचीत की है प्रतुल जोशी ने। यह विस्तृत बातचीत नीता जी के आवास पर सम्पन्न हुई। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  मुम्बई के "अंक" थियेटर की ग्रुप की प्रमुख एवं प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता स्व. दिनेश ठाकुर की पत्नी  श्रीमती प्रीता माथुर ठाकुर से प्रतुल जोशी की एक खास बातचीत। श्रीमती प्रीता माथुर ठाकुर से प्रतुल जोशी की बातचीत प्रतुल - प्रीता जी, शुरू में आप ए. सी. सी. सीमेंट के वित्त विभाग से जुड़ी थीं। तो आप जब बम्बई में आयीं उस वक्त एक स्ट्रगलर के तौर पर नहीं, बल्कि एक कंपनी के साथ काम करते हुए आपने समय नि

ख़ान मोहम्मद सिंध की अफगान कहानी 'तमाशा'

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  रोजमर्रा का काम करने वाले लोगों की अपनी मुश्किलें होती हैं। ऐसा आदमी रोज अपने लिए और अपने घर परिवार के लिए जद्दोजहद करता है। लेकिन उसकी मुश्किलें कम नहीं होतीं। नौकरशाही की संवेदनशून्यता इन मुश्किलों को और भी पेचीदा बना देती है। वैसे भी नौकरशाही का चेहरा काफी कुछ उस पूंजीवाद से मिलता जुलता होता है जिसके यहां संवेदना के लिए कोई जगह नहीं होती। अफगानिस्तान आज भी कबीलाई मानसिकता वाला देश है। गरीबी और जहालत यहां की जैसे पहचान है। इस देश को समूची स्थिति ही मार्मिक है । ख़ान मोहम्मद सिंध ने अपनी इस कहानी के माध्यम से उस गरीब के जीवन को उकेरने का प्रयास किया है जो रोज ही कुंआ खोदने और पानी पीने के लिए अभिशप्त है। मूल रूप से पश्तो में लिखी गई इस कहानी का  अंग्रेज़ी अनुवाद एंडर्स विंडमार्क ने किया है, जिसका हिंदी अनुवाद चर्चित अनुवादक और रचनाकार श्रीविलास सिंह ने किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  ख़ान मोहम्मद सिंध की अफगान कहानी 'तमाशा'। 'तमाशा' ख़ान मोहम्मद सिंध  पश्तो से अंग्रेज़ी अनुवाद: एंडर्स विंडमार्क हिंदी अनुवाद : श्रीविलास सिंह तब साँझ हुए देर हो चुकी थी जब

केशव तिवारी की कविताएं

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  केशव तिवारी अपनी ढब के अलग तरह के कवि हैं। स्थानीयता को सार्वभौमिक बनाने की कला में उनका जवाब नहीं। कवि का मिट्टी से कुछ इस तरह का जुड़ाव है जैसे जीवन का सांसों की डोर से। इसीलिए उनकी कविता में सहज ही ऐसे शब्द आते हैं जो देशीयता की सुगन्ध भरपूर लिए हुए होते हैं। वे शब्द जिनके साथ हमारा अतीत जुड़ा है और दुर्भाग्यवश आज जो गुमशुदा से होते जा रहे हैं। आज जब कवि और उनकी कविताएं जैसे एकरूपता का शिकार हो गई हैं, केशव आज के उन विरल कवियों में से एक हैं जिनकी कविता पढ़ कर कवि को आसानी से पहचाना जा सकता है। हाल ही में हिंदगुग्म प्रकाशन से उनका नया संग्रह प्रकाशित हुआ है 'नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा'। संग्रह से इन कविताओं का चयन किया है कविता के उम्दा पारखी सुधीर सिंह ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं केशव तिवारी की कविताएं। केशव तिवारी की कविताएं चैत है कि जंग लगी कटार जिसे बिल्ली काट गई  कल पता चला  उसके ठीक दाहिने कोने  खड़ा एक उम्रदराज गुलमोहर  इस चैत के आते ही चला गया जीवन-संगीत  किसी जोगी की झाँझ की तरह बज रहा था हर बात में मिट्टी की क़सम खाने वाले किसान  आखिरकार मिट्टी म

नामवर सिंह का आलेख 'मदन महीपजू को बालक बसंत'

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नामवर सिंह बसन्त को ऐसे ही ऋतुओं का राजा नहीं कहा गया है। बसन्त आते ही सहसा समूचा परिदृश्य बदल जाता है। जो मौसम काट खाने को दौड़ता था वह भी बसन्त के सान्निध्य में नरम पड़ गया है। तरह तरह के फूलों ने रंगों को जैसे नए आयाम प्रदान कर दिए हैं। कवि प्रसिद्धि और किसी मौसम में नहीं बल्कि इसी मौसम में सार्थक होती है। इस बसन्त का मोह ही कुछ ऐसा है कि इससे कोई रचनाकार नहीं बचा। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह का एक आलेख है 'मदन महीपजू को बालक बसंत'। इसे पढ़ कर लगता है नामवर जी ऐसे ही नामवर नहीं थे। उनकी सोच समझ और जानकारी का दायरा काफी बड़ा था। गांव से ले कर राजधानी तक का बहुवर्णी जीवन उनकी दृष्टि में था। आज  नामवर जी की पुण्यतिथि है। पहली बार की तरफ से उन्हें सादर नमन। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  नामवर सिंह का आलेख 'मदन महीपजू को बालक बसंत'।  (यह आलेख हम सन्तोष भदौरिया की फेसबुक वॉल से साभार ले रहे हैं।) मदन महीपजू को बालक बसंत नामवर सिंह लिखने बैठा कि देव के कवित्त की यह आखिरी कड़ी फिर सुनाई पड़ी। न जाने क्‍या हो गया है मेरे पड़ोसी मित्र को! आज भोर की उनींदी श्रुति में भी वे