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शिवदयाल का आलेख 'आरक्षण : नई वैचारिकी की जरूरत'

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शिव दयाल भारत का संविधान बनाते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि समाज का सबसे निम्नतम तबका अपने को उपेक्षित महसूस न करें। जाति व्यवस्था की विसंगतियों के चलते दलित समाज एक लम्बे समय तक छुआछूत और अस्पृश्यता का शिकार बना रहा। समाज में सामान्य जीवन जीना भी उसे नसीब नहीं हुआ। लेकिन आजादी के पश्चात संविधान बनाते समय इन वर्गों का जीवन उन्नत करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था का प्रावधान किया गया। यह बात सच है कि आरक्षण की व्यवस्था ने इन वर्गों को एक बेहतर जीवन प्रदान किया। हालांकि इस व्यवस्था की यह खामी रही कि आरक्षण का लाभ कुछ चुनिंदा जातियों को ही मिल सका। बाकी जातियों के जीवन स्तर में वह सुधार न हो सका जो अपेक्षित था। आजकल आरक्षण को ले कर फिर से बातें चल निकली हैं। जब तक निम्नतम जातियों के साथ भेदभाव बरता जाएगा आरक्षण खत्म करने के बारे में सोचा नहीं जा सकता। लेकिन यह सुपात्र व्यक्तियों को मिले या उनको मिले जिन्हें इसकी जरूरत है। इन जातियों के उन वर्गों या लोगों को सामने आना ही होगा जिन्होंने आरक्षण का भरपूर लाभ उठाया है। अपेक्षाकृत बदहाल जीवन जीने वाले लोगों को की ज्यादा जरूरत है। इसी संदर्भ में ...

रवि रंजन का आलेख 'रेशमी मर्यादा और धूल भरा यथार्थ : हरि भटनागर की ‘पंडूक’ कहानी में मौन और मानवतावादी स्वर'

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हरि भटनागर  हमारा समाज एक ऐसा समाज है जहां एक ही समय खंड में एक तरफ प्रगतिशीलता और आधुनिकता दिखाई पड़ती है वहीं दूसरी तरफ हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अंधविश्वासों और पाखण्ड के बीच जीवन यापन करता दिख जाता है। समाज का वह वर्ग जो खुद को आभिजात्य मानता है वह आधुनिकता के नाम पर उस मनुष्यता से विरत हो चुका है जो जीवन की कुंजी है। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो गरीबी और अभाव का जीवन जीते हुए भी ईमानदारी को अपना मूल्य बनाए हुए है। एक रचनाकार के रूप में हरि भटनागर अपनी कहानियों और उपन्यासों के जरिए अपने समय और समाज के सच को उद्घाटित करने का काम करते हैं। 'पंडूक' उनकी ऐसी ही कहानी है जो भारतीय समाज में व्याप्त गहरे वर्ग-भेद, खोखले धार्मिक पाखंड और पितृसत्तात्मक मानसिकता पर एक तीखा प्रहार करती है। इस कहानी की विस्तृत समालोचना वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन ने की है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हरि भटनागर की कहानी पर  रवि रंजन का आलेख 'रेशमी मर्यादा और धूल भरा यथार्थ : हरि भटनागर की ‘पंडूक’ कहानी में मौन और मानवतावादी स्वर'। समालो...

विमलेश त्रिपाठी की कहानी 'पर्दा'

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विमलेश त्रिपाठी  एक ही स्थिति परिस्थिति के बारे में अलग अलग लोगों का दृष्टिकोण अलग अलग होता है। यह मत विभिन्नता मनुष्य जाति की खास पहचान है। इसी से वाद विवाद संवाद की परिस्थितियां पैदा होती हैं। साहित्य इसे रेखांकित करने का काम करता है। विमलेश त्रिपाठी हमारे समय के सुपरिचित कहानीकार हैं। अपनी कहानी पर्दा में वे अस्पताल के बोझिल वातावरण में जीवन के वैचारिक टिक टिक को रेखांकित करते हैं जो दिमाग की घड़ी में हर पल उमड़ता घुमड़ता रहता है। विमलेश लिखते हैं 'वह बोतल में बंद जिन्न की तरह महसूस करती है कि उसे नाविक नहीं बचा पाएगा या समुद्र उसे नहीं ले जाएगा। उसकी इच्छाएँ धीरे-धीरे जीवित रहने से मृत्यु की ओर स्थानांतरित होती जातीं और फिर बस जीवन काट लेने भर पर टिक जातीं। जीने के अर्थ के बारे में कोई सवाल नहीं, ईश्वर से भी कोई संकेत नहीं, अनुभव में लिपटे दर्द में छिपा कोई संदेश भी नहीं। बस किनारे से जीवन को देखने वाले किसी व्यक्ति का अस्तित्व। वह अपने किनारे के दृश्य को उन डेली सोप धारावाहिक से भरती है, जिन्हें वह देखती है, एक खत्म करती है और दूसरा शुरू करती है। वह डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मि...

अजय तिवारी का व्याख्यान 'धूमिल की रचना-दृष्टि और संवेदना'

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धूमिल भारत की आजादी के लिए हमारे पुरखों ने जो सपना देखा था उसमें एक ऐसा भारत था जिसमें सभी समान हों। सभी का जीवन खुशहाल हो। इस आज़ादी के  साथ स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता की बहुत सी उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। लेकिन आजादी मिलने के पश्चात इस जनता की उम्मीद पर तुषारापात हुआ। भ्रष्ट प्रशासन की वजह से जनता का जीवन यथावत बना रहा। ऐसी स्थिति में रचनाकारों ने इस स्थिति पर अपनी कलम चलाई और इस स्थिति की कड़ी आलोचना की। धूमिल ऐसे रचनाकारों में अग्रणी थे जिन्होंने इस स्थिति पर यादगार कविताएं लिखी। ये कविताएं जनता में काफी लोकप्रिय भी हुईं। अपने एक व्याख्यान में वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी कहते हैं 'धूमिल की प्रतिनिधि पहचान जिन कविताओं से बनी, उनमें एक है—‘आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है।’ सैंतालीस में आज़ादी जिन सपनों के साथ आई थी, वे सपने नहीं रह गए थे। उन सपनों की जगह रंग बुझ गए थे। थके हुए थे, सारे सपने टूट गए थे।  यह अनुभव जिस कविता में है, उसका शीर्षक है—‘बीस साल बाद’। इस थकान से पहले वह ऊब है, ‘जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रुरत होती है!’ स्पष्टतः इस मोहभंग की मानसिकता से धूमिल का बड़ा ...