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रवि रंजन का आलेख 'करुणा, परमार्थ और नैतिक उत्तरदायित्व का काव्यशास्त्र : श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता ‘अल मिकदार’

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श्रीप्रकाश शुक्ल  युद्ध किसी समस्या का अन्तिम समाधान नहीं निकालता लेकिन विडम्बना यह है कि इतिहास युद्धों से भरा पड़ा है। फिलिस्तीन के लोगों का संघर्ष अरसे से निरन्तर जारी है। इजरायल और अरब देशों के बीच इस क्रम में कई युद्ध हो चुके हैं। युद्ध की तबाही के बीच कुछ पात्र ऐसे होते हैं जो मनुष्यता को बचाए रखने का प्रयास करते हैं। ‘अल मिकदार’ एक ऐसा ही नायक है जो विदूषक की भूमिका निभाता है। विदूषक का काम औरों का मनोरंजन करना होता है। गम्भीर माहौल को हल्का फुल्का बनाने का करिश्मा ये विदूषक हँसते हुए निभाते हैं। लेकिन कम लोग ही यह अंदाजा लगा पाते हैं कि विदूषक के मन मस्तिष्क में भी तमाम दुःख और तकलीफें भरी पड़ी हैं। इस ‘अल मिकदार’ शीर्षक से  कवि श्रीप्रकाश शुक्ल ने एक कविता लिखी है जो इसी मानवीय और नैतिक दृष्टि का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन इस कविता की तहकीकात करते हुए लिखते हैं 'यह कविता युद्ध की विभीषिका का चित्रण अवश्य करती है, किन्तु उसका वास्तविक केंद्र युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य है; विनाश नहीं, बल्कि विनाश के बीच बची हुई मनुष्यता है। कविता का नायक ऐसा व्यक्ति है ...