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अवन्तिका राय की लघु कथाएं

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अवन्तिका राय रोजी रोटी के लिए विस्थापन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड के लोगों की जैसे उनकी नियति ही है। इन लोगों को समवेत रूप में बिहारी कहा जाता है। जैसे बिहारी होना अपराध हो। आमतौर पर उनके बारे में उनके इलाके के लोगों की राय होती है कि वह खुशकिस्मत है। दूसरी जगह जा कर अच्छे से कमा खा रहा है। लेकिन उसकी दिक्कतें क्या हैं, कैसी हैं, इससे भला किसी को क्या लेना देना? तमाम संसाधन होने के बावजूद उत्तर भारत के ये राज्य पिछड़े होने के लिए अभिशप्त हैं। यहां के जनप्रतिनिधि तमाम तरह से जनता को भरमा कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं।  महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब में अक्सर इन लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है लेकिन ये लोग जैसे जहर पी कर अपना जीवन बिताने के अभ्यस्त हो जाते हैं।  अवन्तिका राय अपनी लघु कथा पन्द्रह अगस्त में इस पीड़ा की एक बानगी करीने से व्यक्त करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अवन्तिका राय की लघु कथाएं। अवन्तिका राय की लघु कथाएं  कहानी सांढ़ और बंदरों की  एक सांढ़ मन्थर गति से चलते हुए जंगल में विचरण कर रहा था।  जैसा कि दिखता ही है, उसका अंडक...

सीमा आजाद की कहानी अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं'

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सीमा आजाद  मनुष्य की पहचान में कई कारक अपनी प्रमुख भूमिका निभाते हैं। रंग, नस्ल, धर्म, भाषा कुछ ऐसे कारक हैं जो एक व्यक्ति की पहचान के साथ कुछ इस तरह जुड़ जाते हैं कि इन सबसे अलग कर उसे देखना सम्भव नहीं हो पाता। दुर्भाग्यवश यही सब कारक दंगे फसाद के मूल में भी होते हैं। धर्म के साथ यह दिक्कत कुछ अधिक ही होती है। हर धर्म अपनी कमीज को ही ज्यादा सफेद बताता है जबकि दूसरे धर्म को तमाम खामियों से भरा बताता है। संकीर्ण सोच के चलते यह दिक्कत कुछ और बढ़ जाती है। धर्म हमें सामाजिक समरसता की शिक्षा देते हैं न कि आपसी विद्वेष की। बहुसंख्यक समाज अपने अल्पसंख्यकों को अक्सर सन्देह के नजरिए से देखता है। एक जमाने में यूरोपीय समाज में यहूदियों को ईसाई लोग शंका के नजरिए से ही देखा करते थे। इतिहास गवाह है कि हिटलर ने लगभग साठ लाख यहूदियों को निर्ममता से मार डाला। इनका अपराध यही था कि वे यहूदी थे। आज मुसलमानों के साथ ऐसा हो रहा है। उनका नाम हर आतंकवादी घटना के साथ जोड़ कर लिया जाता है। उन्हें देशभक्ति का सबूत देना पड़ता है। उन्हें मॉब लिंचिंग का शिकार होना पड़ता है। एक डर उनके मन मस्तिष्क में बैठ जाता ह...

प्रेम कुमार मणि का आलेख फिरदौसी का ईरान'

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फिरदौसी किसी भी देश को समग्र तौर पर जानने के लिए उसकी संस्कृति को जानना महत्त्वपूर्ण होता है। फारस यानी कि ईरान प्राचीन विश्व संस्कृति का नेतृत्व करने वाले देशों में से एक रहा है। ईरानी धर्मग्रन्थ 'ज़ेंद अवेस्ता' और भारतीय धर्मग्रन्थ 'वेद' में समानता के कुछ दिलचस्प सूत्र दिखाई पड़ते हैं। शाहनामा दुनिया की क्लासिकल कृतियों में एक प्रमुख कृति मानी जाती है। बकौल प्रेम कुमार मणि "फिरदौसी की कृति 'शाहनामा' अरबी संस्कृति के विरुद्ध ईरान के सांस्कृतिक प्रतिरोध का जीवन्त दस्तावेज है। फिरदौसी और 'शाहनामा' को मैं मध्य एशिया के सांस्कृतिक प्रतिरोध का केन्द्रक मानता हूँ।" ईरान आज अमरीका और इजरायल के हमलों का प्रतिरोध कर रहा है। अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा करने का अधिकार सभी देशों को है। इसी स्वाभिमान की रक्षा करते हुए प्रमुख ईरानी धार्मिक नेता और वहां के वास्तविक शासक आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई 28 फरवरी 2026 को शहीद हो चुके हैं। अमरीका आज अपनी मनमानियां करता जा रहा है। वेनेजुएला के बाद ईरान उसके निशाने पर है। किसी भी देश की जनता को अपने शासकों के बारे...

यादवेन्द्र का आलेख 'कविता से सिनेमा, बरास्ते (पट) कथा'

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रबीन्द्र नाथ ठाकुर  आमतौर पर विधाएं रचनाकार की अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं। हरेक विधा की अपनी विशिष्टता होती है जो उसे खास बनाती है। खुद एक ही रचनाकार अलग अलग विधाओं में आवाजाही करता दिखाई पड़ता है। सिनेमा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। इसके मूल में पटकथा होती है जिसे पटकथा लेखक किसी कहानी, कविता या उपन्यास को आधार बना कर लिखता है। गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर की बांग्ला कविता 'फाँकी' को आधार बना कर चर्चित बाँग्ला फ़िल्मकार बुद्धदेब दासगुप्ता ने एन एफ़ डी सी की आर्थिक मदद से हिंदी में छोटी सी फ़िल्म बनाई है जो रबीन्द्र नाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर तेरह कविताओं पर आधारित फीचर फ़िल्म "त्रयोदशी" का हिस्सा है।  यह आम धारणा है कि इस कविता में उद्धृत 'मैं' स्वयं कवि रबीन्द्र नाथ ठाकुर हैं और बीनू उनकी दिवंगत पत्नी मृणालिनी देवी हैं जिन्हें वे इलाज के लिए पेंड्रा रोड के टीबी सेनेटोरियम ले कर आए थे। मृणालिनी देवी (पूर्व नाम भवतारिणी देवी) का जन्म   1 मार्च 1874 को हुआ था। आज 1 मार्च को  मृणालिनी देवी की स्मृति को  सम्मानपूर्वक स्मरण करते...