दुर्गेन्द्र अकारी के साथ एक खास मुलाकात
दुर्गेन्द्र अकारी आज की कविता में ज्ञान का ज्यादा आधिक्य दिखाई पड़ता है जबकि कवि के लिए ज्ञान नहीं बल्कि संवेदना का होना जरूरी होता है। जनकवि दुर्गेन्द्र 'अकारी' ऐसे ही कवि थे। वे खुद को 'लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर' (एल एल पी पी) कहा करते थे और इस उपाधि को अपने नाम के साथ लगाया भी करते थे। उनके गीत जन गीत हुआ करते थे। अपने एक गीत में उन्होंने बनिहारों की पीड़ा को प्रभावशाली तरीके से आकार दिया जिसके चलते हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था। उनके गीतों को जनता के बीच मंचित भी किया गया। 5 नवम्बर को जनकवि दुर्गेन्द्र 'अकारी' का स्मृति दिवस है। हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। इस अवसर पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं अकारी जी से एक खास मुलाकात। प्रस्तुति सुधीर सुमन की है। 'यहां इस धरती ने आदमी आदमी को चंदबरदाई बना के पैदा किया है' प्रस्तुति : सुधीर सुमन ‘मत कर भाई, तू बनिहारी सपन में’- इस गीत से उन्होंने अपने बारे में बताने की शुरुआत की। इस गीत को उन्होंने अपने ही गांव में एक रूपक की तरह मंच से प्रस्तुत किया था, जिसे सुनने के बाद हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था...