राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'गलता लोहा : जब जाति की दीवार पर श्रम की हथौड़ी पड़ती है'
शेखर जोशी कोई भी हुनर छोटा या बड़ा नहीं होता लेकिन भारतीय जाति प्रथा की यह त्रासदी है कि इसके द्वारा बौद्धिकता और शारीरिक श्रम में वह विभाजन पैदा किया गया जिसने सामाजिक व्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई। आज भी हमारे समाज में यह विभाजन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जाति झूठा अहंकार पैदा करती है। यह अहंकार खुद को विशिष्ट और दूसरे को हीन समझने का निराधार भ्रम पैदा करती है। शेखर जी ने अपनी कहानी 'गलता लोहा' के जरिए जाति के इस मिथ्या अभिमान पर प्रहार किया है। शेखर जी प्रतीकों का बेजोड़ इस्तेमाल करते हैं। भट्ठी सब कुछ गला डालती है। बकौल राकेश कुमार गुप्ता "कहानी हमें बताती है कि जाति की दीवारें कानून से चुनौती पा सकती हैं, शिक्षा से कमजोर हो सकती हैं, आर्थिक परिवर्तन से दरक सकती हैं, लेकिन उनका वास्तविक क्षरण तब शुरू होता है जब मनुष्य दूसरे मनुष्य के श्रम को अपने बराबर की रचनात्मक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। लोहे को नया आकार देने के लिए उसका गलना जरूरी है; समाज को नया आकार देने के लिए उसकी जमी हुई धारणाओं का पिघलना भी उतना ही जरूरी है।" शेखर जोशी के जन्मदिन पर विशेष प्रस...