मिज़ाज की कहानी 'संडे की ओ टी पी'
मिज़ाज व्यवहार और सिद्धान्त भले एक दूसरे से जुड़े प्रतीत होते हैं लेकिन उनमें हमेशा एक गहरी फाँक होती है। इसीलिए ट्रेनिंग या अभ्यास की जीवन में एक बड़ी भूमिका होती है। यह जान कर आपको ताज्जुब हो सकता है कि हमारे इर्द गिर्द तमाम लोग ऐसे भी हैं जो गेहूँ, जौ, अरहर, अलसी, मूँग, मसूर के पौधे को नहीं पहचान सकते। ये ऐसे लोग हैं जो पैक्ड बैग में यह सब खरीदते और उपयोग करते हैं। जो इन फसलों तक से अनभिज्ञ हैं वे किसानों की संवेदनाओं और दिक्कतों को कैसे समझ सकते हैं। यह ठीक है कि खेती किसानी से जुड़े लोग इन फसलों की खेती अपनी आजीविका के लिए करते हैं लेकिन दुनिया की भूख को मिटाने की जिम्मेदारी भी यही निभाते हैं। ये किसान अनाज के इन पौधों को आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि खेती से उनके सरोकार गहरे तक जुड़े होते हैं। मिज़ाज ने इसी सन्दर्भ को ले कर कहानी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मिज़ाज की कहानी 'संडे की ओ टी पी'। कहानी 'संडे की ओ टी पी' मिज़ाज वह इतवार का दिन था और सोया को आफिस नहीं जाना था। सोया महज़ 22 वर्ष की थी और कैंपस प्लेसमेंट के बाद मेट्रो शह...