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ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'

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ललन चतुर्वेदी  हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि पति और पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। इनसे परिवार रूपी गाड़ी चलती रहती है। लेकिन सच का यही पहलू नहीं है। यह भी बात सरेआम कही सुनी जाती है कि शादी के दिन तक लड़का हँसता मुस्कुराता है लेकिन शादी के बाद लड़के को ताउम्र रोना पड़ता है। जबकि शादी के दिन लड़की रोती है लेकिन इसके बाद ता उम्र हँसती है। खैर बातें जो भी हों, यह बात तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि पति को पत्नी की हां में हां मिलानी ही पड़ती है अन्यथा बिजली गिरते देर नहीं लगती। पति बाहर कहां जाता है, क्या करता है, किन लोगों से मिलता है, इस पर पत्नी का नियंत्रण होता है। पत्नी के कहे अनुसार चले सो ठीक अन्यथा बे ठीक होने में कितनी देर लगती है। ललन चतुर्वेदी अब बाकायदा सेवानिवृत्त हो कर घर आ गए हैं। उनके पास अनुभवों की पूंजी जमा होनी शुरू हो गई है। इन्हीं अनुभवों को ले कर उन्होंने एक व्यंग्य लिखा है। उनके व्यंग्य में अनुभव की चाशनी को सहज ही महसूस किया जा सकता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'सफल वह है जो चिरकालिक सफल पति है'। व्यंग्य  'सफल वह ह...

गोविन्द निषाद का संस्मरण 'स्मृतियों में राजेन्द्र कुमार'

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राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र कुमार जी की एक तरफ जहां वरिष्ठ लोगों से जुड़े हुए थे वहीं दूसरी तरफ वे बिल्कुल नए रचनाकारों से भी बिना किसी हिचक के शीघ्र ही जुड़ जाते थे। यही वजह है कि उनके चाहने वालों में एक बड़ा वर्ग उन युवाओं का रहा, जिन्हें उन्होंने कभी पढ़ाया नहीं, या कभी अपनी पत्रिका में प्रकाशित नहीं किया। इन युवाओं का जुड़ाव उनकी सरलता सहजता की वजह से हुआ। इन युवाओं का जुड़ाव उनकी विद्वता की वजह से हुआ। गोविन्द निषाद इलाहाबाद के उभरते हुए कवि कहानीकार हैं। उनका गद्य सरस, सहज और आकर्षक होता है। गोविन्द हालांकि राजेन्द्र कुमार जी से कभी मिल नहीं पाए। मिले भी तो मृत्यु की सूचना के पश्चात। लेकिन उनके पास राजेन्द्र कुमार जी से जुड़ा एक आत्मीय संस्मरण है। अपने संस्मरण में गोविन्द लिखते हैं 'अभी मेरी एक कहानी प्रकाशित हुई है तद्भव में, "तो आ रही है मिस काजल" जिसका शीर्षक है। सर ने उसको पढ़ा। इस समय तक वो पढ़ रहे थे कि 'तद्भव' में क्या लिखा जा रहा है? उस कहानी को उन्होंने पढ़ा और मेरा उस पर पता लिखा हुआ था कि मैं इलाहाबाद में रहता हूँ। मुझे यह बात तब पता चली जब किसी ने ...

मनीष चौरसिया की रपट "हम हरदम रहेंगे दुनिया में"

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किसी भी व्यक्ति की लोकप्रियता का आंकलन करना हो तो देखना चाहिए कि उसके जीवन के उपरान्त वह लोगों की स्मृतियों में किस तरह जिंदा है। 16 जनवरी 2026 को राजेन्द्र कुमार का देहावसान हुआ। उनकी अनुपस्थिति से  इलाहाबाद में वह सन्नाटा पैदा हो गया है जिसकी भरपाई सम्भव नहीं है।  8 फरवरी 2026 को राजेन्द्र कुमार की स्मृति में एक सभा का आयोजन इलाहाबाद के सभी संगठनों की तरफ से किया गया। किसी भी लेखक की स्मृति में एक साथ इतने दिग्गजों का जुटान मैने नहीं देखा। यह राजेन्द्र कुमार के व्यक्तित्व का चुम्बकीय आकर्षण था कि सब अपने प्रिय शिक्षक, कवि, आलोचक को श्रद्धांजलि देने के लिए स्वतः स्फूर्त ढंग से आए। रांची से रणेंद्र, रविभूषण, बनारस से सदानंद साही, कृष्ण मोहन सिंह, विंध्याचल यादव, देहरादून से धीरेन्द्र तिवारी, उत्तराखंड से ही शैलेय, दिल्ली से सन्ध्या नवोदिता और मृत्युञ्जय, लखनऊ से कौशल किशोर के साथ साथ इलाहाबाद से सुधांशु मालवीय, अजामिल, हरीश चन्द्र पाण्डे, अली अहमद फातमी, अजामिल, अनीता गोपेश, सन्तोष भदौरिया, प्रणय कृष्ण, लालसा यादव, विवेक निराला, बसंत त्रिपाठी, शिवानन्द मिश्र, संगम लाल, अवनीश य...