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वसुंधरा पाण्डेय की कविताएँ

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वसुन्धरा पाण्डेय  यह अजीब विडम्बना है कि हरेक व्यक्ति जीवन भर अपने लिए संपूर्णता की कामना करता है। लेकिन यह संपूर्णता अन्ततः एक मृगमरीचिका ही साबित होती है। तमाम प्रयास जो इस संपूर्णता के लिए किए जाते हैं, वही दरअसल वास्तविकता होते हैं। ये छोटे छोटे प्रयास ही अन्ततः उस संपूर्णता को सिरजते हैं जो उस आसमान जैसा होता है जिसका कहीं अस्तित्व ही नहीं। हकीकत यही है कि हर अधूरापन अपने आप में तमाम संभावनाएं लिए होता है जबकि संपूर्णता सारी संभावनाओं का समापन कर देती है। मनुष्य जीवन के इस अधूरेपन की कवयित्री हैं वसुन्धरा पाण्डेय। इसी दृष्टि के चलते वसुन्धरा उस गरीबी को देख पाती हैं जो उस बहुमूल्य रत्न निकालने में पूरी जिन्दगी लगे रहते हैं, लेकिन वह बहुमूल्यता उनके किसी काम की नहीं होती। दरअसल यही दृष्टि किसी भी कवि का प्राप्य होती है। आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं वसुन्धरा पाण्डेय की कविताएँ। वसुंधरा पाण्डेय की कविताएँ  नन्हे हीरों का अंधकार उन नन्हें हीरे बच्चों का भविष्य कोयलों से भी काला है जिनकी सुबह स्कूल की घंटियों से नहीं फैक्ट्रियों की कर्कश आवाज़ों से खुलती है और जिनकी रात कहा...

सुरजीत मजूमदार का वक्तव्य 'भूमंडलीकरण के बाद की आर्थिक प्रक्रियाएं और अमेरिकन पूँजी'

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सुरजीत मजूमदार विविधताएं किसे नहीं सुहाती। विविधताओं से भरी हुई अपनी यह धरती खूबसूरत दिखती है। बोली, भाषा, संस्कृति, धर्म, नस्ल आदि विविधताओं से भरी यह दुनिया अपने आप में नायाब है। लेकिन कुछ शक्तियों के लिए यह बर्दाश्त नहीं कि दुनिया अपनी मर्जी से चले। ये ताकतवर शक्तियाँ चाहती हैं कि उनकी मर्जी के बिना पत्ता तक न हिले। वे अपनी भाषा, बोली, धर्म और मुद्रा तक का वर्चस्व पूरी दुनिया पर चाहती हैं। अमरीका इन शक्तियों का सरगना है।  शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व स्तर पर अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ा। इसके बाद भूमंडलीकरण की ज़मीन तैयार की गई Washington Consensus (WC) के जरिए। वाशिंगटन कंसेंसस, यानी अमेरिका के वाशिंगटन शहर में स्थित तीन संस्थाओं — ‘विश्व बैंक’, ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ और ‘यू.एस. ट्रेज़री’ — द्वारा सुझाए गए दस नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के फ़ॉर्मूले ने निजीकरण, मुक्त व्यापार, टैक्स सुधार और डी-रेगुलराइजेशन की वकालत की और पूरी दुनिया को भूमंडलीकरण के जाल में बुरी तरह उलझा दिया।  लेकिन अब महाशक्ति के तौर पर उसका आसन डोलने लगा है। चीन की शक्ति की आहट को अब सब महसूस क...

प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख्वाब'

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प्रज्ञा पत्रकारीय जीवन प्रायः बेतरतीब होता है। पत्रकारों को रोज ही कोई न कोई नई लकीर खींचनी होती है। उनकी नजर आम तौर पर उन तथ्यों या सूचनाओं पर होती हैं जो उनके अखबार के लिए बिकाऊ हो सके। ऐसे में कई बार हवा में तीर चलाना पड़ता है। वैसे उन सभी काम काज में ही ऐसा ही होता है जहां हर रोज भारी अनिश्चितता होती है। कई ऐसे काम काज हैं जहां रोज कुँवा खोदना और पानी पीना होता है। देश की अधिकांश जनता ऐसा ही अनिश्चित जीवन यापन करती है। समकालीन कहानीकारों में प्रज्ञा ने अपने कहन और अनूठे शिल्प से पाठकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। 'चांद जैसे ख्वाब' उनकी ऐसी ही कहानी है। जिसमें एक पत्रकार जो लक्ष्य ले कर एक जमाने के चर्चित कवि शशांक निकेत जी की पत्नी के पास बातचीत करने पहुंचती है लेकिन बातचीत का सूत्र बेतरतीबी से कवि पत्नी और उनके लेखकीय जीवन की तरफ मुड़ जाता है। वह जीवन जिसके बारे में कवि पत्नी अब यह भी बिसर गई हैं कि उन्होंने पहले कुछ इस तरह का लिखा था। प्रज्ञा की यह कहानी हमने 'बनमाली कथा' से साभार लिया है । तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख...