जगदीश्वर चतुर्वेदी का आलेख 'सव्यसाची की डिजिटल फलक पर अनुपस्थिति क्यों?'
सव्यसाची साहित्य का संसार व्यापक है। तमाम ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से साहित्य की सेवा करते हुए अपनी जिंदगी गुजार दिया। वे प्रचार प्रसार की दुनिया से अलग लगभग अनाम से रहते हुए चुपचाप अपना काम करते रहे। ऐसा ही एक नाम है सव्यसाची का। मार्कण्डेय जी सव्यसाची और उनकी पत्रिका उत्तरार्द्ध की अक्सर चर्चा किया करते थे। मैं इनके बारे में नहीं जानता था लेकिन मार्कण्डेय जी की चर्चा के पश्चात प्रदीप सक्सेना से सव्यसाची के बारे में जाना समझा। लोगों की धारणा है कि इंटरनेट पर सब कुछ उपलब्ध है। लेकिन यह अधूरा सच है। इंटरनेट पर आज भी बहुत कुछ उपलब्ध नहीं है। हाल ही में कथाकार अनन्त कुमार सिंह का जब निधन हुआ तब मैंने नेट पर उनकी रचनाओं के बारे में जानना चाहा। वहाँ निराशा हाथ लगी। नेट पर बिहार के माफिया अनंत कुमार सिंह के बारे में जानकारियां भरी पड़ी थीं। हमारे प्रिय कहानीकार हैं नीरज कुमार सिंह। इनकी कहानियां भी नेट पर दूर दूर तक कहीं नजर नहीं आयीं। सव्यसाची के बारे में भी असफलता ही हाथ लगी। शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं 'सव्यसाची का जन्म 10 जुलाई 1932 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले क...