प्रतुल जोशी का आलेख 'कोसी का घटवार' : प्रेम की वेदना और युद्ध के अवसाद से उपजी रचना
कोई भी रचनाकार अपनी रचनाओं के दम पर लम्बे समय तक पाठकों के मन मस्तिष्क में अपनी जगह बनाए रखता है। रचनाकार की एक दो रचनाएँ ऐसी होती हैं जो उसके लेखकीय व्यक्तित्व का प्रतीक बन जाती हैं। प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी इसके अपवाद दिखाई पड़ते हैं। उनके पास एक नहीं बल्कि कई ऐसी कहानियाँ हैं जिनका जिक्र उनके नाम के साथ किया जाता है। 'कोसी का घटवार', 'दाज्यू', 'बदबू', 'मेंटल', 'नौरंगी बीमार है' जैसी कालजई कहानियों की याद तत्काल ही आती है। इनमें भी प्रमुख तौर पर 'कोसी का घटवार' कहानी की याद आती है जिसका अंदाजे बयां एक क्लासिकल कहानी का है। कहानी लिखते समय उस समय का परिवेश भी उसमें दर्ज हो जाता है जो कहानी को विश्वसनीय बनाती है। इस कहानी के कथा सूत्रों को पकड़ने का प्रयास कई आलोचकों ने किया है। प्रतुल जोशी ने कहानी के उन कथा सूत्रों की तहकीकात करने की कोशिश की है जो 'कोसी का घटवार' कहानी लिखे जाने में सहायक बने। अपने आलेख में वे लिखते हैं 'इस बहुचर्चित कहानी की लोकप्रियता को समझने के लिए आज से 78 वर्ष पूर्व के भारत देश में जाना पड़ेगा। यह व...