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शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य रचता मैला आंचल'

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फणीश्वर नाथ रेणु  भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समवेत भारतीय जन के संघर्ष की कहानी रही है। इस संग्राम में सभी वर्गों ने अपनी भूमिका अपने अंदाज में निभाई। मजदूरों किसानों की भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन सबको मिला कर ही भारत माता की वास्तविक तस्वीर साकार होती है। फणीश्वर नाथ रेणु अपने उपन्यास मैला आंचल में भारत माता के उस तस्वीर को सामने रखते हैं जिसके बारे में हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सोचा तक नहीं था। शिवदयाल लिखते हैं कि "रेणु के कथा साहित्य के मूल में भूमि है। मैला आंचल में भी रेणु जी भूमि की अवस्थिति, भूगोल, उसकी जैविक संपन्नता और मनुज समाज का ऐसा समग्र चित्र खींचते हैं कि मानो उसका भी मानवीकरण कर देते हैं। कहीं-कहीं इस कोशिश में मनोहरी भू-दृश्य भी उपस्थित करते हैं। ऐसी धरती के प्रति अगाध प्रेम उपजता है जिसका मोह छुड़ाए नहीं छूटता।" मिट्टी से मनुष्य का प्रेम पुरातन है जिसे रेणु जी अपने इस उपन्यास में पुनर्रचित करते हैं। आज रेणु जी की पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य ...

बलभद्र का आलेख 'राजा, परजा और कोतवाल : एक कथात्मक बालखेल'

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बलभद्र  बचपन और खेल का चोली दामन का सम्बन्ध है। बचपन में हम सभी तमाम खेलों से हो कर गुजरे होते हैं। बच्चे के स्वास्थ्य और मानसिक विकास में इनकी एक बड़ी भूमिका होती है। ये खेल वस्तुतः मनोरंजक होने के साथ साथ समाज की मनःस्थिति के परिचायक भी होते हैं। बचपन के ये दिन किसी भी मनुष्य के लिए अहम होते हैं। ये दिन ही भविष्य की दिशा तय करते हैं। आज भले ही क्रिकेट ने तमाम खेलों को निगल लिया है, कुछ समय पहले तक भोजपुरी क्षेत्र में ऐसे तमाम खेल प्रचलन में थे जिसमें किसी क्रीडा उपकरण की जरूरत नहीं होती थी। कुछ नियमों के अन्तर्गत इसे शारीरिक रूप से ही खेला जाता था। बलभद्र की बात उधार ले कर कहूं तो "चिक्का, कबड्डी, दोल्हा-पाती, बाघ-बकरी, सतघरवा जैसे अनेक खेल थे, जो बचपन से बाहर निकले बच्चे खेलते थे। दस वर्ष तक के बच्चों के लिए अँखमुदउवल (लुका-छुपी) जैसे कई खेल थे। ऐसा ही एक खेल था 'राजा, परजा और कोतवाल"। बलभद्र ने एक अभिनव प्रयोग करते हुए इन खेलों की कथा को उनकी समग्रता में समझने का प्रयत्न किया है। हमने इसे श्रृंखलाबद्ध रूप से 'कथा खेल खेल में' प्रकाशित करने का निश्चय किया है। प...

सुधीर सुमन का श्रद्धांजलि आलेख 'बहुआयामी वास्तविकताओं को चित्रित करने वाले कथाकार अनन्त कुमार सिंह'

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अनन्त कुमार सिंह  आज के समय में जब सारी मर्यादाएं, नैतिकताएं एक एक कर छिजती जा रही हैं, ऐसे में अनन्त कुमार सिंह का होना एक गहरी आश्वस्ति थी। सच्चे मायनों में वे मनुष्यता के प्रबल हिमायती थे। जो भी जरूरतमन्द उनके पास गया, वह खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी बन पड़ा, करने से कभी पीछे नहीं हटे। ऐसा नहीं था कि उन्हें धोखा नहीं मिला या उनकी आलोचना नहीं हुई, लेकिन वे चुपचाप सारे हलाहल पी जाते थे। उनके करीबियों को भी इसकी भनक नहीं लग पाती थी। अनन्त जी की सोच का दायरा बड़ा था। 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते हुए उन्होंने तमाम अनाम से रचनाकारों को अधिकाधिक स्पेस दिया। यही नहीं 'जनपथ' के सम्पादन से अपने वैचारिक लेखकीय संगठन जनवादी लेखक संघ से इतर जन संस्कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाकार साथियों को भी बेहिचक जोड़ा। पत्रिका लगातार घाटे में रही लेकिन अपने खून पसीने की कमाई लगा कर वे पत्रिका का सम्पादन प्रकाशन लगातार करते रहे। 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े जितेन्द्र कुमार ने एक बातचीत में बताया कि 'अब अनन्त कुमार सिंह हो पाना असंभव है'। इस  कथन में भले ही अतिरेक दि...

राहुल सांकृत्यायन के भोजपुरी नाटक "जपनिया राछछ" का पंकज मोहन द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद

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राहुल सांकृत्यायन  मानव इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध सबसे विनाशकारी युद्ध साबित हुआ। जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी राष्ट्रों ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। यूरोपीय तानाशाहों की तर्ज पर जापान ने तोजो के नेतृत्व में साम्राज्यवादी रुख अपनाते हुए 'एशिया एशियाइयों के लिए' जैसा नारा गढ़ दिया। ताकतवर होने के नाते समूचे एशिया पर कब्जा करना वह अपना अधिकार समझने लगा। इस समय उसने पूरी तरह से साम्राज्यवादी तौर तरीका अपना कर एशियाई देशों को रौंदना शुरू कर दिया। क्षेत्रफल के मामले में चीन के आगे जापान कहीं नहीं ठहरता, लेकिन बौने जापान ने चीन को 1904 में ही पराजित कर दिया।  1931 में जापान ने मंचूरिया पर कब्जा कर लिया और दुनिया देखती रह गई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने सिंगापुर, फिलीपींस, मलाया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, डच न्यू गिनी, वर्मा जैसे देशों पर कब्जा कर लिया। जापानी सेनाएं भारत में प्रवेश करने लगीं। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भोजपुरी नाटक 'जापानी राछछ' में जापान की इस साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा को उद्घाटित किया है। वैसे भी दुनिया के तमाम देशों में आज भी उ...