कन्हैया लाल सेठिया के संग्रह पर यतीश कुमार की समीक्षा
कन्हैया लाल सेठिया सामान्य तौर पर मरुस्थल अपने सूखे, बंजरपन और निर्जनता के लिए जाने जाते हैं। दूर दूर तक केवल और केवल सन्नाटा। हरियाली का कहीं कोई नामो निशान नहीं। ऐसे में अदम्य जिजीविषा वाले जीव ही बच पाते हैं। कन्हैया लाल सेठिया ऐसे ही कवि रहे हैं जिनकी कविताएं मरुस्थलीय जिजीविषा से भरी हुई दिखती हैं। सेठिया जी की कविताओं की पड़ताल करते हुए यतीश कुमार लिखते हैं 'मरुस्थलीय जिजीविषा और संस्कृति की सीख भी कविताओं के नेपथ्य की धार है। सेठिया जी की कविताओं में राजस्थान की माटी की महक कूट-कूट कर भरी है। रेगिस्तान जहाँ एक तरफ अभाव और तपती रेत का प्रतीक है, वहीं दूसरी तरफ वह वहाँ के लोगों की अटूट आस्था और जीवन के प्रति उत्सवधर्मिता का भी गवाह है। इस संग्रह की रचनाएँ यह दिखाती हैं कि कैसे कम से कम संसाधनों में भी मनुष्य गरिमा के साथ जी सकता है।' हाल ही में महाकवि सेठिया की प्रतिनिधि रचनाएँ नामक एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की कविताओं की पड़ताल कर रहे हैं कवि यतीश कुमार। मरुस्थलीय जिजीविषा की कविताएँ यतीश कुमार महाकवि कन्हैया लाल सेठिया का कविता संग्रह 'पंख दिए आ...