संदेश

आनन्द बहादुर की कहानी 'गुस्ताख'

चित्र
आनन्द बहादुर  जीवन में हर व्यक्ति की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है और वह अपने तरीके से उसका निर्वहन भी करता है। उस विशिष्ट व्यक्ति की अपनी एक जगह होती है जिसे सिर्फ और सिर्फ वही भरता है। कोई और उस जगह को भर नहीं पाता। गुस्ताख़ कहानी में आनन्द बहादुर एक ऐसे पात्र को सामने ले कर आते हैं जो आवाजों की नकल हू ब हू उतारा करता है। दो मित्रों के बीच की दूरी को अपनी नकली आवाज से न केवल पाटता है बल्कि दोनों के जीवन के उन रहस्यों को भी जान लेता है जो दोनों के दिलों दिमाग में हैं। यह उन दिनों की बात है जब घरों में लैंड लाइन फोन हुआ करते थे और जिसे एक अलग अंदाज में डायल किया जाता था। अब तो स्मार्टफोन का जमाना है जिसमें ट्रू कालर कॉल करने वाले व्यक्ति के बारे में सब कुछ बता देता है। यह कहानी दो मित्रों की उस मनोस्थिति की बात करते हुए भी उस व्यक्ति की उपस्थिति को करीने से दर्ज करती है जो सिर्फ आवाजों की नकल किया करता था। आज आनन्द बहादुर का जन्म दिन है। उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए इस अवसर पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं आनन्द बहादुर की कहानी 'गुस्ताख'। कहानी 'गुस्ताख...

कर्मेंदु शिशिर का आलेख 'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा'

'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा' कर्मेंदु शिशिर डॉ. रामविलास शर्मा ने नवजागरण की जिस अवधारणा को प्रस्तुत किया था, वह तमाम तरह के विरोध, आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद न सिर्फ स्वीकृत हुआ बल्कि अनेक विचार कनछियों के साथ एक विराट वट वृक्ष की तरह स्थापित हुआ। अब नवजागरण की अवधारणा में इतने विचार वैविध्य का समावेश हो चुका है, उसका इतना विस्तार हो चुका है कि उसे नकारना किसी के लिए संभव नहीं। बावजूद उसके विरोध के स्वर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देते रहे हैं। विचारणीय बात यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल नवजागरण की अवधारणा अपनी मूल प्रकृति में ही उपनिवेशवाद के विरोध में थी। उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बावजूद नवजागरण का विरोध इस बात का सबूत है कि इसके जीवाश्म अभी भी मौजूद हैं, जिसकी उपस्थिति हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ये पाश्चात्य आधुनिकतावादियों की शक्ल में मिलते हैं। इनकी जड़ें इस देश में नहीं होती, ये हथेलियों पर ठगे जड़विहीन लोग हैं। इनकी कोशिशें भारतीय नवजारण के आधार-स्तंभों पर लगातार चोट कर उसे संदिग्ध करने क...

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'पिया तोसे नैना लागे रे'

चित्र
प्रचण्ड प्रवीर  उम्र के एक पड़ाव के दौरान एक दूसरे के प्रति लगाव सहज ही हो जाता है। कई बार यह लगाव महज दोस्ती तक सीमित रह जाता है तो कई बार यह प्यार जनम जनम के रिश्ते में तब्दील हो जाता है। कभी लगता है प्यार झूठा है तो कभी यह सच्चा लगने लगता है। हँसी मजाक जीवन की एकरसता को तोड़ते हैं और व्यक्ति को जीवन्त बनाते हैं। खासकर प्यार में इस हँसी मजाक की भूमिका अलग रंगत लिए होती है। प्रचण्ड प्रवीर अपनी कहानियों में हिन्दी फिल्मी गीतों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। इस कहानी में भी कुछ रोमांटिक गीत गज़ल का प्रयोग उन्होंने बखूबी किया है। इस कहानी का शीर्षक ही एक लोकप्रिय गीत के मुखड़े से लिया गया है। बहरहाल आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'पिया तोसे नैना लागे रे'।   कल की बात – २९१ 'पिया तोसे नैना लागे रे' प्रचण्ड प्रवीर  कल की बात है। जैसे ही मैँने बृजेश के घर मेँ कदम रखा, मेहमानों की भीड़ मेँ से दमकती सुचित्रा भाभी निकल कर मेरी तरफ आयीँ। मैँने उनको जन्मदिन की बधाई देते हुए फूलों का गुच्छा उनकी ओर बढ़ायी। उन्होँने उलाहना दिया, “ये क्या फूल-पत्ते? मुझे लगा था कि आप ...

मिज़ाज की कहानी 'संडे की ओ टी पी'

चित्र
मिज़ाज व्यवहार और सिद्धान्त भले एक दूसरे से जुड़े प्रतीत होते हैं लेकिन उनमें हमेशा एक गहरी फाँक होती है। इसीलिए ट्रेनिंग या अभ्यास की जीवन में एक बड़ी भूमिका होती है। यह जान कर आपको ताज्जुब हो सकता है कि हमारे इर्द गिर्द तमाम लोग ऐसे भी हैं जो गेहूँ, जौ, अरहर, अलसी, मूँग, मसूर के पौधे को नहीं पहचान सकते। ये ऐसे लोग हैं जो पैक्ड बैग में यह सब खरीदते और उपयोग करते हैं। जो इन फसलों तक से अनभिज्ञ हैं वे किसानों की संवेदनाओं और दिक्कतों को कैसे समझ सकते हैं। यह ठीक है कि  खेती किसानी से जुड़े लोग इन फसलों की खेती  अपनी आजीविका के लिए करते हैं लेकिन दुनिया की भूख को मिटाने की जिम्मेदारी भी यही निभाते हैं। ये किसान अनाज के इन पौधों को आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि खेती  से उनके सरोकार गहरे तक जुड़े होते हैं। मिज़ाज ने इसी सन्दर्भ को ले कर कहानी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  मिज़ाज  की कहानी 'संडे की ओ टी पी'। कहानी 'संडे की ओ टी पी' मिज़ाज वह इतवार का दिन था और सोया को  आफिस नहीं जाना था। सोया महज़ 22 वर्ष की थी और कैंपस प्लेसमेंट के बाद मेट्रो शह...