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सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'लेखकीय दुनिया की आबोहवा'

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सेवाराम त्रिपाठी साहित्य, संस्कृति हो या राजनीति आजकल जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों और प्रतिमानों की गिरावट सहज ही देखी जा सकती है। राजनीतिक मूल्यों और प्रतिबद्धताओं में गिरावट से सहज ही इस बात को समझा जा सकता है, जो हमेशा नेतृत्वकारी भूमिका में होती है। प्रेमचंद ने साहित्य को आगे चलने वाली उस मशाल के रूप में देखा जो राजनीति तक को दिशा दिखाती है। लेकिन लगता है वह दौर बीत गया। साहित्य में भी पतनशीलता की यह प्रवृत्ति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। जिनके कन्धों पर समाज को दिशा दिखाने की जिम्मेदारी थी वे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भाड़ बनने की होड़ में लग गए हैं।  पद, पुरस्कार और सम्मान पाने के लिए लेखक किस तरह की जोर जुगत लगाते हैं इससे लगभग सभी वाकिफ़ हैं। एक समय था जब प्रकाशक लेखकों को रॉयल्टी प्रदान किया करते थे। आज छपने की होड़ इस कदर है कि लेखक रॉयल्टी शब्द से ही अपरिचित हैं। प्रायः अपना पैसा लगा कर ही तथाकथित लेखक अपनी किताबें छपवा रहे हैं। ऐसे लेखकों का सिरदर्द होता है जगह जगह पर किताबें भेजना जिससे उस किताब की चर्चा हो सके। ये लेखक इस प्रयास में भी लग जाते हैं कि कोई पुरस्कार झटक ...

परिचय दास का आलेख 'कृष्ण : जीवन के सबसे सुंदर अर्थ की तरह'

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परिचय दास  'कृष्ण : जीवन के सबसे सुंदर अर्थ की तरह' परिचय दास कृष्ण को याद करते ही सबसे पहले कोई मंदिर नहीं खुलता, कोई शास्त्र नहीं खुलता, कोई दार्शनिक सूत्र सामने नहीं आता। सबसे पहले एक आँगन खुलता है। उस आँगन में धूप की एक पतली-सी रेखा पड़ी है, तुलसी के पास मिट्टी थोड़ी गीली है, किसी कोने में मटकी रखी है और दूर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दे रही है। कृष्ण शायद इसी हँसी से शुरू होते हैं। वे आकाश में जितने विराट हैं, मनुष्य की स्मृति में उतने ही छोटे, उतने ही अपने, जैसे अभी-अभी किसी माँ की गोद से उतरकर आँगन में भागे हों। कृष्ण का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि वे हमारे सामने किसी एक रूप में ठहरते ही नहीं। उन्हें पकड़ना चाहें तो वे बालक हो जाते हैं, बालक को पकड़ें तो माखनचोर निकलते हैं, माखनचोर को पकड़ें तो बाँसुरी बजाने लगते हैं, बाँसुरी के पीछे जाएँ तो राधा मिलती हैं, राधा से आगे बढ़ें तो वृंदावन, वृंदावन से आगे कुरुक्षेत्र और कुरुक्षेत्र से आगे एक ऐसा विराट मौन, जिसमें मनुष्य अपने सबसे कठिन प्रश्नों के साथ अकेला खड़ा है। कृष्ण की यही गति उन्हें केवल कथा का पात्र नहीं रहने देती। वे...

उद्भ्रान्त की कविताएँ

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उद्भ्रान्त मनुष्य ऐसा प्राणी है जो हँस सकता है। आमतौर पर यह हँसना खुशी की स्थिति में होती है। एक दूसरे से मिलते समय भी हम अपनी खुशी का इज़हार करते हैं। कभी कभी दुःख के क्षणों में भी व्यंग्य के तौर पर मनुष्य हँसता है। हँसी प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है इसीलिए निरंकुश लोगों के लिए यह दिक्कततलब होती है। बलबन जैसे शासक के दरबार में कोई भी हँसने का साहस नहीं कर पाता था। किसी को रुलाना बहुत आसान होता है लेकिन किसी के चेहरे पर हँसी ला पाना कठिन होता है। अपनी कविता हँसी में उद्भ्रान्त जी लिखते हैं 'रुदन का नहीं/ हँसी का विस्फोट/ जिससे प्रथम सहमा/ फिर काँपा दिग्मंडल।' आज उद्भ्रान्त जी ने अपने उम्र का 78वाँ पड़ाव पूरा कर लिया है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं उद्भ्रान्त की कविताएँ। उद्भ्रान्त की कविताएँ  स्त्री की जगह एक स्त्री की जगह  कितनी है इस विराट सृष्टि में  जिसे बचाने ताज़िंदगी वह करती संघर्ष  प्रकृति से,  समाज से,  समाज के बेहतर कहे जाने वाले हिस्से से  और- अपने आप से भी? जरूर वह जगह  बहुत बड़ी होगी  या फिर...

सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'

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सुमन शेखर  संवेदनशीलता सही मायने में मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन दुनिया की चालाकियाँ कुछ इस तरह की होती हैं ऐसे मनुष्य का जीवन प्रायः कठिन हो जाता है। यही नहीं सरकारें भी अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप घटनाएं गढ़ लेती हैं और उसी के अनुसार उसे क्रियान्वित कर अपने समर्थकों को खुश रखने में लगी रहती हैं। आदिवासियों जैसे भोले भाले लोग इसके आसान शिकार बनते रहते हैं। मीडिया न्यूज रूम में ही समाचार गढ़ने लगती है और अपना निर्धारित काम छोड़ कर सरकार का गुणगान करने में लगी रहती है। मोगेस बाबू ऐसे ही पात्र हैं जो तमाम वजहों से स्मृतिहीनता के शिकार बन जाते हैं। युवा कहानीकार सुमन शेखर की कहानी पढ़ते हुए हम सिहरते रहते हैं। कहीं कहीं हम खुद मोगेस बाबू के पात्र में तब्दील होते जाते हैं। सुमन शेखर की यह कहानी  “पाठ” पत्रिका के जनवरी अंक से साभार ली गई है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'। कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'    सुमन शेखर  “कभी कभी लगता है जैसे अपनी ही देह पराई है। अपनी ही देह पहेली है, जिसके बारे में कुछ भी कहना खुद को आ...