शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा'
शेखर जोशी भारतीय समाज में जाति की भूमिका अहम रहती आई है। यह जाति न केवल समाज को विभाजित करती आई है बल्कि व्यक्ति में झूठा अहंकार भी भरती है। यह अहंकार व्यक्ति को कहीं का नहीं छोड़ता। शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा' ऐसी ही कहानी है जिसमें वे जाति के मिथ्याभिमान की कलई खोलते हैं। समाज के जातिगत विभाजन और श्रम की प्रतिष्ठा पर यह कहानी गहरा प्रहार करती है। यह कहानी उन चालाकियों को भी उद्घाटित करती है जो सजातीय होने के बावजूद व्यक्ति के मन में कहीं न कही छिपी होती है। लेकिन यह झूठा अहंकार एक न एक दिन टूटता ही है और व्यक्ति को जमीन पर आना ही पड़ता है। इस कहानी में उस जातीय विद्वेष को भी उद्घाटित किया गया है जो एक शिक्षक द्वारा अपने छात्रों के साथ की जाती है। शिक्षक का दायित्व एक समरस समाज की स्थापना होनी चाहिए। उसकी संकीर्ण दृष्टि समाज को उस गर्त की तरफ धकेल देती है जहां से निकल पाना बहुत कठिन होता है। कल 10 सितम्बर को शेखर जोशी का जन्मदिन है। इस अवसर पर विशेष प्रस्तुति के क्रम में उनकी कहानी गलता लोहा को आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर जोशी की कह...