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अमरकांत की कहानी 'हत्यारे'

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अमरकांत  भारत के गाँव कई मामलों में आज भी अलग किस्म के हैं। पिछड़ापन उनकी नियति है और गप्प हांकना अधिकांश ग्रामवासियों का स्वभाव। इस गप्प में हास्य व्यंग्य का बारीक पुट भी रहता है। अमरकांत पूर्वांचल के उस बलिया जिले से आते हैं, जहां ये बातें आम हैं। 'हत्यारे' अमरकांत की चर्चित कहानी है। इस कहानी में दो गपोड़ों के बीच बातचीत को व्यंग्य के जरिए अमरकांत प्रस्तुत करते हैं जिसमें वे भारतीय राजनीति के विद्रूप को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। भारत अभी आजाद ही हुआ था और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में इस नव स्वतन्त्र देश की बुनियाद रखी जा रही थी। लेकिन इसी समय से भ्रष्टाचार का घुन भारतीय राजनीति में प्रवेश करने लगा था। कहानी का एक चरित्र गोरा कहता है 'नेहरू हाथ पकड़ कर रोने लगा। बोला, “आज देश भारी संकट से गुज़र रहा है। सभी नेता और मंत्री बेईमान और संकीर्ण विचारों के हैं। जो ईमानदार हैं, उनके पास अपना दिमाग़ नहीं है। मेरी लीडरशिप भी कमज़ोर है। मेरे अफ़सर मुझको धोखा देते हैं। जनता की भलाई के लिए मैंने पाँच साला योजनाएँ शुरू कीं, लेकिन ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी अपने घरों को भरने में...

सुमन शेखर द्वारा की गई फिल्म समीक्षा "अभी कई 'मैं वापस आऊँगा' की ज़रूरत है"

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1947 में भारत अंग्रेजी गुलामी से आज़ाद हुआ लेकिन इस आजादी में विभाजन की असमाप्य पीड़ा समाहित थी। विभाजन का सबसे बड़ा कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच का अविश्वास और नफ़रत की भावना थी, जिसे दोनों समुदायों के कट्टरपंथियों ने निरन्तर हवा दी थी। दुर्भाग्यवश आज भी हमने उस घटना से सबक नहीं सीखा और नफ़रत जैसे के तैसे हमारे दिलों में जड़ जमाए हुए है। इसी की परिणति उस सिनेमा में भी दिखाई पड़ रही है जो 'कश्मीर फ़ाइल्स' और 'केरल फ़ाइल्स' के नाम से बनाई गई है। ऐसे में हाल में ही निर्देशक इम्तियाज़ अली की 'मैं वापस आऊंगा' ने उम्मीद की लौ जलाई है। आजकल उग्र राष्ट्रवाद के दौर में जब एक दूसरे को फतह करने के दावे बढ़ चढ़ कर किए जा रहे हों, इम्तियाज़ एक अलग प्रयोग करने का जोखिम उठाते हैं। निश्चित रूप से इस फिल्म में विभाजन की त्रासदी को फिल्माया गया है लेकिन उसे नफ़रती माहौल से बिल्कुल अलग रखा गया है। अतीत के घावों को कुरेदने से बचती हुई यह फिल्म उस मनुष्यता को देखने की कोशिश करती है, जो आज के समय में दुर्लभ हो गई है। इस फिल्म की समीक्षा करते हुए युवा कहानीकार सुमन शेखर लिखते हैं ...

मधु कांकरिया का उपन्यास अंश ‘रास्ते बंद हैं सब, कूचे कातिल के सिवा'

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मधु कांकरिया  नियम कानून इसलिए बनाए गए जिससे समाज में कोई अराजकता न रहे और उस का संचालन सुचारु रूप से हो सके। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन नियम कानूनों क़ा दुरुपयोग अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए करते रहे हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि वे जो कर रहे हैं वह गलत तो है ही, इससे किसी और की जिंदगी पर बुरा असर पड़ सकता है। एक झटके में ही निर्दोष व्यक्ति अपराधियों की पंक्ति में खड़ा दिखता है। यह उस व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है कि वह खुद को निरपराध साबित करे। व्यवस्था से जुड़े लोग भी इसका फायदा उठाते हैं। पुलिस, थाना, कचहरी और अदालत से जुड़े लोग भी इसका फायदा उठाते हैं। मधु कांकरिया लीक से अलग हट कर लेखन करती हैं। आजकल वे जो उपन्यास लिख रही हैं उसमें इस मुद्दे को उन्होंने बखूबी अपना विषय बनाया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मधु कांकरिया का उपन्यास अंश ‘रास्ते बंद हैं सब, कूचे कातिल के सिवा'। उपन्यास अंश  ‘रास्ते बंद हैं सब, कूचे कातिल के सिवा' मधु कांकरिया बकौल शेक्सपीअर यदि ‘जिंदगी एक मूर्ख द्वारा कही गयी कथा है' तो इस कथा का मूर्ख मैं ही हूँ। सच यह भी कि जीव...