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ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'चिट्ठी ना कोई सन्देश, जाने ये कौन सा देस!'

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ललन चतुर्वेदी  आज मोबाइल के जमाने में भले ही पत्र लिखना और भेजना लगभग अप्रासंगिक हो गया हो, पत्र लिख कर सन्देश भेजने की परम्परा पुरानी है। इसके लेखन का एक तरीका होता था जो शुरुआती छात्र जीवन में सिखाया जाता था। और प्रेमी प्रेमिका के लिए ये पत्र रोमांच भरे होते थे । पत्र के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा करना और पत्र पाने पर हुलसना आज के प्रेमी प्रेमिकाओं को नसीब कहां। शब्द वैसे भी बहुत कुछ कह डालते हैं और पत्र के साथ स्पर्श भी तो जुड़ा होता है। पहले के जमाने में जब शिक्षा सीमित थी अशिक्षित लोग पत्र लिखवाने के लिए पढ़े लिखे लोगों के पास आ कर पत्र लिखवाते थे। उन अनुभूतियों को शब्दबद्ध करना आसान नहीं होता था। आज की पीढ़ी पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय, लिफाफा और बैरंग पत्रों के मिजाज से शायद ही परिचित हो। साहित्य में तो इस पत्र लेखन से पूरे काल खण्ड की जानकारी मिल जाती थी। इसलिए रचनाकारों के पत्र प्रायः सम्भाल कर रखे जाते और प्रकाशित किए जाते। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में उन दिनों को शिद्दत से याद किया है। यह आलेख कुछ व्यंग्यात्मक पुट भी लिए हुए है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ...

गणेश नारायण देवी से रमाशंकर सिंह की बातचीत

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गणेश नारायण देवी किसी भी व्यक्ति की निर्मिति में उसके परिवेश और परिस्थितियों का बड़ा हाथ होता है। इससे जो जीवन बनता है वह अनुभवजन्य होता है। गणेश नारायण देवी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं जिन्होंने जीवन को अपनी शर्तों पर जिया। उन्होंने मजदूरी की। पी एच. डी. किया। विदेश पढ़ने गए। विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने और एक समय के बाद उसे छोड़ भी दिया। इसके बाद भाषा के हवाले से संस्कृति की पड़ताल शुरू कर दिया। यह उनका जुनून ही था कि उन्होंने भारत की जीवित भाषाओं का दस्तावेजीकरण करने के लिए यह बड़ा अभियान चलाया। सर जॉर्ज ग्रियर्सन के बाद यह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है जो असाधारण है। भारतीय भाषा के सर्वेक्षण के इस मैराथन काम के लिए उन्होंने तीन हजार से अधिक शिक्षकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को जोड़ा। 2010 में उनके नेतृत्व में पीपल्स लिंग्विटिक सर्वे ऑफ इण्डिया ने भारत की 780 जीवित भाषाओं का सर्वेक्षण प्रकाशित किया।  गणेश देवी को साहि‍त्‍य एवं शि‍क्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2014 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इनकी समालोचना पुस्तक 'आफ़्टर ऐम्नीसिया : ट्रेडिशन एंड चेंज इन इ...

नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'

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नीरज सिंह  जीवन की बहुत सारी जरूरतें होती हैं। रोजी रोटी की जरूरत इनमें सबसे प्रमुख है। इसके लिए लोग अपना घर बार छोड़ कर देश विदेश चले जाते हैं। इसके लिए व्यक्ति हर समय प्रयत्नशील रहता है। तो क्या मनुष्य जीवन का यही अन्तिम प्राप्य है। नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत' पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि जीवन के लिए यही सब कुछ नहीं है। बल्कि कुछ ऐसी जरूरतें भी हैं जिसे मनुष्य निभाने की कोशिश करता है। अमूर्त होते हुए भी यह जरूरत सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह जरूरत है मनुष्यता। जिसके लिए मनुष्य स्वतः स्फूर्त तरीके से उठ खड़ा होता है। मनुष्यता की इस भावना ने ही तो मनुष्य को इस पृथिवी का सबसे बुद्धिमान और संवेदनशील प्राणी बनाया है। वासुदेव केवट अपनी नाव को अच्छे खासे रुपयों में रिजर्व कर ले जा रहा होता है कि तभी एक कारुणिक आवाज सुन कर अपनी आत्मा की आवाज पर पीछे लौटने का निर्णय लेता है। उसे महसूस होता है कि रमेसरा बहू, जिसकी तबियत बहुत खराब है को यथाशीघ्र अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। और यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत थी। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'। 'जरूरत' ...