हेमन्त शर्मा का आलेख 'तवायफें न होतीं तो बिस्मिल्लाह न होता'
'तवायफें न होतीं तो बिस्मिल्लाह न होता' हेमन्त शर्मा शहनाई बड़ा अजीब वाद्य है। उसमें अपना कुछ नहीं होता। न तार, न थाप, न गले की कशिश. बस एक खोखली नली और उसमें फूँक मारता हुआ आदमी। लेकिन यही खोखलापन उसकी ताक़त है। जितना भीतर खाली, उतनी दूर तक आवाज़। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने इसी खालीपन को अपने सुरों से भर दिया. वह शहनाई नहीं बजाते थे, उसमें अपनी साँस छोड़ते थे। फिर वह साँस उनकी नहीं रहती थी. उसमें बनारस बोलता था, गंगा बहती थी, मंदिर की घंटियाँ बजती थीं और नमाज़ की तल्लीनता उतर आती थी। वह सीधे मौला से बतियाते थे. इसलिए उन्हें खुदा के लिए किसी मंदिर-मस्जिद की जरूरत नहीं थी। उस्ताद ऐसे बनारसी थे जो गंगा में वज़ू करके नमाज़ पढ़ते थे और सरस्वती को यादकर शहनाई की तान छेड़ते थे। इस्लाम में संगीत के हराम होने के सवाल पर हँस कर कहते थे—“ इस्लाम में संगीत की मनाही है, तो क्या हुआ क़ुरान की शुरुआत तो ‘बिस्मिल्लाह’ से ही होती है।” बिस्मिल्लाह ख़ाँ के लिए संगीत, सुर और नमाज़ एक ही चीज़ थे। वो मंदिरों में शहनाई बजाते थे, सरस्वती के उपासक थे और गंगा नदी से भी उन्हें बेपनाह लगाव था। साथ ही पा...