गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'
गरिमा श्रीवास्तव सामान्य तौर से देखने पर यह लगता है कि इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ कर इतिहास में स्त्रियाँ प्रायः नदारद हैं। यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर ऐसा क्यों है? साहित्य में भी इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। गरिमा श्रीवास्तव ने अपने महत्त्वपूर्ण शोध लेख के जरिए वास्तविकता की पड़ताल की है। इसके लिए उन्होंने भारतेन्दु युग की स्त्री कविता की तहकीकात की है। ज्ञातव्य है कि भारतेन्दु युग से ही आधुनिक हिन्दी साहित्य की शुरुआत मानी जाती है। अपनी पड़ताल करते हुए उन्होंने पाया है कि आमतौर पर जो दिखाया बताया जाता है सच वही नहीं है। सच का पहलू कुछ और ही है। मुंशी देवी प्रसाद द्वारा सम्पादित ‘महिला मृदुवाणी’ का प्रकाशन 1904 में हुआ। इसमें उस समय की 35 कवयित्रियों की रचनाएँ इसमें संकलित हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं : कविरानी चौबे लोकनाथ जी स्त्री अर्धांगिनी जी, ठाकुरानी काकरेची जी, कुशला, खगनिया, गिरिधर कविराय की स्त्री, चंद्रकला बाई, चाम्पादे रानी, छत्रकुंवरी बाई, जामसुता जाडेची जी, श्री प्रताप बाई, झीमा, पंडितानी तीजांजी, ताज, तुलछराय, पद्मा, बीरा, प्रतापकुंवरी बाई, मीरा बाई, ...