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देवेन्द्र आर्य की कविताएँ

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देवेन्द्र आर्य  जल जीवन का आधार है। यह सभी जानते हैं कि जीवन की उत्पत्ति जल से ही हुई। दुनिया की जो भी प्राचीनतम सभ्यताएँ थीं वे नदियों के किनारे ही फली फूली। कुछ नदियां तो आज भी उन देशों की जीवन रेखा तक कही जाती हैं। विकास की होड़ में मनुष्य प्रकृति को नष्ट करता जा रहा है। पेड़ पौधे हों या पहाड़ सबका सम्बन्ध नदियों से है। लेकिन मनुष्य इन सबके साथ निर्ममता से पेश आया है। यह विडम्बना ही है कि धरती पर बहुआयामी और बहुरंगी जीवन का वह लगातार नाश करता जा रहा है और अन्य ग्रहों, उपग्रहों पर जीवन की तलाश रहा है। यह अलग बात है कि जीवन का एक तृण भी कहीं से प्राप्त नहीं हुआ है। हर जगह नदियों की बेहिसाब लूट जारी है बिना यह सोचे कि नदी नहीं बचेगी तो जीवन भी नहीं बचेगा। देवेन्द्र आर्य अपनी कविता में उचित ही लिखते हैं "प्रयोगशालाएं एच टू ओ के अलावा/ कुछ नहीं समझतीं नदी को/ बिकी हैं पैसों पर/ बेच रहीं किस के इशारे पर जीवन अमृत / किसके सहारे चल रहा/ पत्थर बालू मछली केकड़े और जल का कलकल धंधा/ कारखानों के लिए नदी बिकाऊ असलहा है बस"। आज कवि का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए...

रवि रंजन का आलेख 'जैव-राजनीति और आत्मीयता का क्षरण'

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श्रीप्रकाश शुक्ल  कोरोना महामारी मनुष्यता के समक्ष एक ऐसी विपदा ले कर आई जिसने समूचे प्रतिमानों को बदल कर रख दिया। कोरोना से ग्रसित मनुष्य महज रोगी बन कर रह गया। ऐसा रोगी जिससे सभी को आवश्यक रूप से दूर रहना था। जीवन की क्षणभंगुरता उजागर हो गई। तमाम लोगों की मौतें अस्पतालों में ही हुई। इस दौरान पूँजीवाद की निर्ममता भी स्पष्ट हो गई। रवि रंजन अपने आलेख में लिखते हैं  'महामारी के दौरान पूँजीवाद का एक बड़ा अंतर्विरोध उजागर हुआ। जिन श्रमिकों के श्रम पर पूरी अर्थव्यवस्था निर्भर थी, वही सबसे अधिक असुरक्षित सिद्ध हुए। भारत सहित अनेक देशों में लाखों श्रमिकों का विस्थापन हुआ। वे पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए विवश हुए। यह दृश्य मार्क्सवादी अर्थों में श्रम और पूँजी के संबंधों की नग्न वास्तविकता को सामने लाता है।'  इस कोरोना वह आधार बना कर कवि श्री प्रकाश शुक्ला ने एक महत्वपूर्ण कविता लिखी ‘उत्तर- कोरोना...’।  वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन ने आलोचना की जो नई पद्धति विकसित की है वह अपने आप में एक प्रतिमान है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता को समझने के क्रम में वे दुनिया के कई महत्वपूर्ण आलो...