सुधीर सुमन का श्रद्धांजलि आलेख 'बहुआयामी वास्तविकताओं को चित्रित करने वाले कथाकार अनन्त कुमार सिंह'
अनन्त कुमार सिंह आज के समय में जब सारी मर्यादाएं, नैतिकताएं एक एक कर छिजती जा रही हैं, ऐसे में अनन्त कुमार सिंह का होना एक गहरी आश्वस्ति थी। सच्चे मायनों में वे मनुष्यता के प्रबल हिमायती थे। जो भी जरूरतमन्द उनके पास गया, वह खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी बन पड़ा, करने से कभी पीछे नहीं हटे। ऐसा नहीं था कि उन्हें धोखा नहीं मिला या उनकी आलोचना नहीं हुई, लेकिन वे चुपचाप सारे हलाहल पी जाते थे। उनके करीबियों को भी इसकी भनक नहीं लग पाती थी। अनन्त जी की सोच का दायरा बड़ा था। 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते हुए उन्होंने तमाम अनाम से रचनाकारों को अधिकाधिक स्पेस दिया। यही नहीं 'जनपथ' के सम्पादन से अपने वैचारिक लेखकीय संगठन जनवादी लेखक संघ से इतर जन संस्कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाकार साथियों को भी बेहिचक जोड़ा। पत्रिका लगातार घाटे में रही लेकिन अपने खून पसीने की कमाई लगा कर वे पत्रिका का सम्पादन प्रकाशन लगातार करते रहे। 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े जितेन्द्र कुमार ने एक बातचीत में बताया कि 'अब अनन्त कुमार सिंह हो पाना असंभव है'। इस कथन में भले ही अतिरेक दि...