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सुरेश कुमार का आलेख 'उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियां'

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सुरेश कुमार  एक लम्बे अरसे तक पुरुषों की यह परम्परागत सोच बनी रही कि स्त्रियाँ उनसे हर मामले में कमतर होती हैं। इस मुद्दे को ले कर एक लम्बी बहस भी चली। उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों को मर्दवादियों द्वारा ‘गृहिणी’ और ‘जाहिल’ होने का ख़िताब दिया जा रहा था।  औपनिवेशिक भारत में बीबी रत्नकुँवर और कुलीन जैनमती इन दोनों लेखिकाओं ने स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियों को बड़ी शिद्दत के साथ गति प्रदान की थी।  बीबी रत्नकुँवर ने ‘प्रेतरत्न’ नामक संग्रह रच कर इस अवधारणा के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करते हुए स्त्रियों के पक्ष को मजबूती से सामने रखा और यह बताया कि स्त्रियाँ किसी भी मामले में कमतर नहीं होतीं। बीबी रत्नकुँवर उन्नीसवीं शताब्दी की महान कवयित्री और विदुषी लेखिका थी। रत्नकुँवर की यह पहल हिंदी नवजागरण काल के इतिहास में स्त्री बौद्धिकता की निर्मितियों और दख़ल की तरफ इशारा करता है। सुरेश कुमार स्वतंत्र शोध अध्येता हैं। इन दिनों नवजागरणकालीन साहित्य पर स्वतंत्र शोध कार्य कर रहे हैं। रत्नकुँवर के संग्रह और अवधारणाओं पर सुरेश कुमार ने एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते ...

भालचन्द्र जोशी की कहानी 'एक डरे हुए पिता की चिट्ठी, बेटी के नाम'

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भाल चन्द्र जोशी  विकास के अत्याधुनिक होड़ से भरे दौर में रिश्ते सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। मनुष्य के लिए धन, पद, प्रतिष्ठा जरूरी है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके लिए संवेदनशीलता, अपनत्व, रिश्ते नाते आज भी बहुत मायने रखते हैं। जब तक वह इस बात को समझ पाता है ज़िन्दगी हाथ से फिसल जाती है। देखते-देखते हमारे गाँव हमसे बिछड़ गए। आंगन से गौरैया ही गायब नहीं हुई बल्कि सच कहें तो आंगन ही गायब हो गए। पेड़ों को अंधाधुंध काटता जा रहा मनुष्य गमलों में पौधों को बो और संजो रहा है। पानी जो जीवन के लिए जरूरी है, उसे फालतू बहाने में हम कोई कोताही नहीं करते और चांद, मंगल पर पानी की बूंदे तलाशते फिर रहे हैं। ऐसे में कहानीकार भाल चन्द्र जोशी चाहते हैं कि मनुष्य की संवेदनशीलता बची रहे। रिश्तों की तरलता कायम रहे। आँखों में थोड़ा सा पानी बचा रहे। कोई ऐसा अपना बचा रहे जिससे हम अपने सुख दुःख बेहिचक साझा कर सकें। वाकई इस संवेदनशीलता ने ही आज भी मनुष्यता को कायम रखा है। और जब तक यह मनुष्यता कायम है तब तक जीवन सुरक्षित है। भाल चन्द्र जोशी की एक उम्दा कहानी है 'एक डरे हुए पिता की चिट्ठी, बेटी...

नीतेश व्यास की डायरी के अंश

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नीतेश व्यास  आम तौर पर लिखना जितना आसान लगता है उतना होता नहीं। एक बार अगर लेखन में जी रम गया तो फिर किसी चीज की परवाह नहीं रह जाती। यह लेखन भी एक तरह की साधना या तपस्या ही है। कई बार ऐसा होता है कि लेखक के जीवन में भी अन्तराल आता है। कई बार ऐसा होता है कि लेखक चाह कर भी नहीं लिख पाता। ऐसा इसलिए होता है कि लेखन जबरन नहीं हो सकता। मस्तिष्क के खास प्रवाह का क्षण होता है लेखन। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि संवेदनशीलता के उत्कर्ष पर पहुंच कर ही लेखन किया जा सकता है। लेखकों में डायरी लिखने की एक समृद्ध परम्परा रही है। व्यक्तिगत दिखने वाली इन डायरियों में ऐसे सूत्र होते हैं जिससे पढ़ने वाला सहज ही अपना जुड़ाव महसूस करने लगता है। कई बार इन डायरियों के लेखन से ही रचनाकार अपनी कविता या कहानी के सूत्र ढूंढ लेते हैं। कवि नीतेश व्यास ने अपनी डायरी में से कुछ अंश पहली बार के लिए भेजा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  नीतेश  व्यास की डायरी के अंश। नीतेश व्यास की डायरी के अंश 19 जनवरी 2022 आज सवेरे सवा पांच बजे ही पड़ोसी के नल की तीखी धार और गली में भौंकने वाले शहरी-सियारों की आवाज़ों...