यादवेन्द्र का आलेख 'भूखे पेट रहेंगे पर सिनेमा जरूर देखेंगे'
यादवेन्द्र सिनेमा मनोरंजन का ही नहीं, ज्ञान का भी एक प्रमुख माध्यम रहा है। हालांकि एक अरसा पहले हमारे हिन्दी समाज में सिनेमा देखने को अच्छा नहीं माना जाता था। तमाम घरों के लड़के तब छुप छुपा कर ही सिनेमा देखने जाया करते थे। कई ऐसे भी जुनूनी होते थे जो पहले शो का पहला टिकट हासिल कर ही सिनेमा देखने में यकीन करते थे। चाहें इसके लिए कोई भी परेशानी झेलनी पड़े। तब सिनेमा का टिकट लेने के लिए लम्बी लम्बी लाइन लगा करती थी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ती थी। तब अखबारों का एक पूरा पन्ना शहर के सिनेमाघरों में लगी फिल्मों के उल्लेख से ही भरा होता था। यादवेन्द्र जी उस दौर को याद करते हुए उचित ही लिखते हैं 'हमारे अपने जीवन में बीस साल पहले तक सिनेमा हॉल के दरवाज़े जितनी शिद्दत से खुलते थे उसका प्रभाव एकदम जादुई होता था। चालीस पैतालीस साल तक के और उससे बड़े लगभग सभी लोगों की स्मृति में सिनेमा हॉल का जादू ज़रूर जिंदा होगा, सिनेमा हॉल भौतिक रूप में भले ही बंद हो गए हों। तब सिनेमा का साहित्य से एक अटूट रिश्ता हुआ करता था। लेकिन जमाना बदला और सिनेमा का चरित्र भी बदल गय...