विमलेश त्रिपाठी की कहानी 'पर्दा'
विमलेश त्रिपाठी एक ही स्थिति परिस्थिति के बारे में अलग अलग लोगों का दृष्टिकोण अलग अलग होता है। यह मत वैभिन्यता मनुष्य जाति की खास पहचान है। इसी से वाद विवाद संवाद की परिस्थितियां पैदा होती हैं। साहित्य इसे रेखांकित करने का काम करता है। विमलेश त्रिपाठी हमारे समय के सुपरिचित कहानीकार हैं। अपनी कहानी पर्दा में वे अस्पताल के बोझिल वातावरण में जीवन के वैचारिक टिक टिक को रेखांकित करते हैं जो दिमाग की घड़ी में हर पल उमड़ता घुमड़ता रहता है। विमलेश लिखते हैं 'वह बोतल में बंद जिन्न की तरह महसूस करती है कि उसे नाविक नहीं बचा पाएगा या समुद्र उसे नहीं ले जाएगा। उसकी इच्छाएँ धीरे-धीरे जीवित रहने से मृत्यु की ओर स्थानांतरित होती जातीं और फिर बस जीवन काट लेने भर पर टिक जातीं। जीने के अर्थ के बारे में कोई सवाल नहीं, ईश्वर से भी कोई संकेत नहीं, अनुभव में लिपटे दर्द में छिपा कोई संदेश भी नहीं। बस किनारे से जीवन को देखने वाले किसी व्यक्ति का अस्तित्व। वह अपने किनारे के दृश्य को उन डेली सोप धारावाहिक से भरती है, जिन्हें वह देखती है, एक खत्म करती है और दूसरा शुरू करती है। वह डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मि...