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शैलेन्द्र चौहान की कविताएं

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शैलेन्द्र चौहान  माना जाता है कि लोकतन्त्र का उद्देश्य है जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए'। इसे अभी तक की सबसे बेहतर शासन पद्धति माना जाता है। लेकिन शासक की उस मानसिकता का क्या किया जा सकता है जो गद्दी पाते ही अपने को राजा ही समझने लगता है। लोकतन्त्र अपने उद्देश्यों को पाने में प्रायः असफल रहा है। भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं लगाया जा सका। नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, दलालों ने देश को जम कर लूटा है। जातिवाद टूटने की बजाए कहीं और मजबूत हुआ है। धर्म का वर्चस्व और बढ़ा है। समानता की बात कागज पर ही सिमट कर रह गई है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पाने के लिए लोगों को भटकना पड़ता है। इस लोकतन्त्र में लोक ही गायब हो गया है। तन्त्र और शक्तिशाली हुआ है। कवि शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं : "लोकतंत्र/ धीरे-धीरे/ लोक से दूर/ भोग के करीब पहुँच गया/ जहाँ सेवा का स्थान/ सुविधा ने ले लिया/ और आदर्शों की जगह/आरामकुर्सियों ने/ निराश हताश लोक ने भी/ यह सत्य स्वीकार लिया"। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलेन्द्र चौहान की कविताएं। शैलेन्द्र चौहान की कविताएं  धमकी देने वाला अज़ब-ग...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 4, बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त की कविताएं

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बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त  व्यक्तिगत रूप से कहूं तो बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त मेरे प्रिय कवि हैं। जर्मनी में वे उस दौर में लिख रहे थे जब वहां का वातावरण पूरी तरह विषाक्त हो चुका था। उनका प्रमुख लेखन दो विश्व युद्धों के बीच के दौर का है। इस समय जर्मन साम्राज्यवादी गतिविधियां अपने उत्कर्ष पर थीं। हिटलर के नायकत्व का जादू लोगों के दिल दिमाग पर छाया हुआ था। ऐसे कठिन समय में  ब्रेख्‍त साम्राज्यवाद के खिलाफ कविताएं लिख रहे थे जब उसके खिलाफ सोचना भी गुनाह माना जाता था। वे तानाशाही के खिलाफ कविताएं लिख रहे थे।  उन्होंने नाटकों द्वारा मार्क्सवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करने के लिये ‘एपिक थियेटर’ नाम से नाट्य मंडली का गठन किया। हिंदी में एपिक थियेटर को लोक नाटक के रूप में जाना जाता है। ब्रेख्त ने पारंपरिक अरस्तू के नाट्य सिद्धांतों से सर्वथा भिन्न तथा मौलिक नाट्य सिद्धांत रचे। उनका तर्क था कि जो कुछ मंच पर घटित है उससे दर्शक एकात्म न हों। वे समझे कि जो कुछ दिखाया जा रहा है वह विगत की ही गाथा है। गौरतलब है कि ऐसा ही प्रभाव लोक गीतों को गाये जाने की कला करती है। युद्ध के विरुद्ध कविता की चौथी ...

हरियश राय का आलेख 'विभाजन का जहरीला संताप और कृष्णा सोबती की रचनात्मकता'

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कृष्णा सोबती  भारत विभाजन की त्रासदी का शिकार आबादी का एक बड़ा वर्ग हुआ। इन लोगों में रचनाकार भी अच्छी खासी संख्या में शामिल थे। सआदत हसन मंटो, कृष्णा सोबती, यशपाल, कुर्रतुल ऐन हैदर, भीष्म साहनी, उपेन्द्र नाथ अश्क,  खदीजा मस्तूर, कृश्न चंदर, अमृता प्रीतम जैसे तमाम लेखकों ने इस विभाजन की यंत्रणा भुगती और स्वाभाविक रूप से इसे अपनी रचनाओं में चित्रित किया। कृष्णा सोबती के लेखन की पड़ताल करते हुए हरियश राय लिखते हैं "यह एक सच्चाई है कि हिन्दुस्तान के बँटवारे की स्मृतियां हमारे देश के कथाकारों के मन में इतने गहरे समाई हुई हैं कि बँटवारे के इतने लंबे अर्से बाद भी वे स्मृतियां उनका पीछा नहीं छोड़तीं, उन्हें बार-बार हांट करती हैं और किसी न किसी रुप में रचनात्मक स्तर पर व्यक्त होती रहती हैं। दरअसल कोई भी रचनाकार अपने अतीत से, अपनी परम्पराओं से, अपनी स्मृतियों से एकदम कट कर रह भी नहीं सकता। पुरानी स्मृतियां उसके जेहन में लगातार दस्तक देती रहती हैं।" इस आलेख को हमने प्रयाग पथ का हालिया अंक से साभार लिया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  हरियश राय का आलेख 'विभाजन का जहरी...

टेरी एरेट की कविता फ़ासीवाद जब आएगा

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Terry Ehret फासीवाद, नाजीवाद मूलतः एक प्रवृत्ति है। जरूरी नहीं कि तानाशाह शासक शुरू में तानाशाह जैसा ही दिखे। इतिहास गवाह है कि हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह जनता को तमाम ऐसे सपने दिखा कर सत्ता में आए जो कभी पूरे नहीं होने थे। शुरू में तानाशाहों का चेहरा खासा उदारवादी और लोकतांत्रिक दिखता है लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है वह उसका चेहरा और स्वभाव बदलने लगता है। तानाशाह धर्म, राष्ट्रवाद और निजीकरण की बातें ज्यादा करते हैं। तानाशाह लड़ाईयों में ज्यादा यकीन करते हैं। तानाशाह अक्सर जनता में यह प्रदर्शित करते हैं कि उसका अपना कुछ नहीं, जो भी उसका है वह राष्ट्र और उसकी जनता के लिए ही है। आज दुनिया युद्ध के जंजाल में उलझी हुई है। अमरीका और इजरायल का निर्मम चेहरा सबके सामने है। कहने के लिए अमरीका एक लोकतान्त्रिक देश है लेकिन हमेशा उसका चेहरा एक तानाशाह की भांति दिखाई पड़ता है। बहरहाल ईरान आजकल एक थोपा हुआ युद्ध लड़ रहा है। उसने वेनेजुएला की तरह समर्पण नहीं किया। अगर समर्पण कर देता तो शायद यह नौबत नहीं आती। लेकिन ईरान एक पुरानी सभ्यता है । उसकी फितरत लड़ने की है न कि आत्मसमर्पण की। इन दिनों हम यु...

प्रकर्ष मालवीय “विपुल" की रपट “स्मार्ट होते शहर के बीच लोप होती स्मृतियाँ”

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29 मार्च 2026 को स्टेनली रोड स्थित इलाहाबाद मेडिकल एसोसियेशन के सभागार में गोपेश समग्र के विमोचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ रचनाकार अशोक वाजपेई थे। सर्व भाषा ट्रस्ट दिल्ली ने इस गोपेश समग्र को प्रकाशित किया है। इसका सम्पादन किया है वरिष्ठ कवि अजामिल ने। इसकी एक रपट हमें लिख भेजी है कवि प्रकर्ष मालवीय विपुल ने। पोस्ट में प्रयुक्त तस्वीरें ली हैं प्रख्यात फोटोग्राफर एस के यादव ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रकर्ष मालवीय “विपुल" की रपट “स्मार्ट होते शहर के बीच लोप होती स्मृतियाँ”। रपट   “स्मार्ट होते शहर के बीच लोप होती स्मृतियाँ”- अशोक बाजपेयी प्रकर्ष मालवीय “विपुल" गोपीकृष्ण ‘गोपेश’ की रचनाओं के समग्र का लोकार्पण इलाहाबाद शहर स्थित इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन के सभागार में दिनांक 29/03/2026 को गरिमापूर्ण ढंग से आयोजित हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत उनकी चर्चित रचनाओं “मुझसे मेरा नाम ना पूछो” और “पीले हाथ करती हैं” की प्रस्तुति से हुई, जिन्हें क्रमशः वंदना शर्मा और पंकज श्रीवास्तव ने सस्वर प्रस्तुत किया। समग्र में संकलित गीतों पर विचार रखते ह...

कृष्ण मोहन का आलेख 'निर्मल वर्मा का चिंतन'

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निर्मल वर्मा  किसी भी लेखक की पहचान उसके चिन्तनपरक आलेखों से की जा सकती है। इन आलेखों में लेखक अपने हवाले से बात तो करता ही है, अपनी बात के समर्थन में साक्ष्य भी प्रस्तुत करता है। साक्ष्यों का यह प्रस्तुतीकरण भी उस की सोच और अवधारणा को ही स्पष्ट कर देते हैं। निर्मल वर्मा नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकारों में से एक रहे हैं। अगर उनके समूचे चिंतन पर दृष्टिपात किया जाए तो आप पाएंगे कि वह भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या के लिए ही समर्पित है। लेकिन क्या उनकी यह व्याख्या भारतीय परम्परा का समग्र विवेचन कर पाती है या फिर यह विवेचन आपको सोच के किसी पुरातन द्वीप पर ही ले जा कर छोड़ देता है और अन्ततः वर्तमान के धरातल पर आपको निराश करता है। बुद्धिजीवी वर्ग समय समय पर भारतीयता के बारे में अपनी राय व्यक्त करता रहा है। लेकिन मूल रूप से देखा जाए तो यह अवधारणा रैखिक तो कतई नहीं है। बल्कि इसके अनेक आयाम हैं। भारतीयता की अवधारणा को पश्चिम की तुला पर रख कर तो परखा भी नहीं जा सकता। भारतीयता की अवधारणा को ले कर निर्मल जी ने खुल कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इस चिन्तन की आलोचकीय पड़ताल ...