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सन्तोष दीक्षित के उपन्यास पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा

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  राजनीति भी अपनी तरह से अपने समय का मिथक गढ़ती रहती है। हर पार्टी और राजनीतिज्ञ जो सत्ता पर काबिज होता है, अपने राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का दावा करता है। भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक कांग्रेस शासन में रही और अपने हिसाब से वह सत्ता को संचालित और परिभाषित करती रही। 2014 से भारतीय राजनीति में एक नए युग का आरम्भ हुआ जिसे  'न्यू इंडिया' जैसा एक चमकदार नाम दिया गया है। इस न्यू इंडिया में सब कुछ उलट पलट सा गया है। धर्म का उभार इसका एक प्रमुख अंग है। वैसे भी भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की हमेशा एक नेतृत्वकारी भूमिका रही है। आज इस जाति और धर्म का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। सन्तोष दीक्षित ने अपने उपन्यास 'खलल' के जरिये इस न्यू इंडिया की कवायद को करीने से विश्लेषित करने की कोशिश की है। जितेन्द्र कुमार ने इस उपन्यास की एक विस्तृत पड़ताल की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सन्तोष दीक्षित के उपन्यास 'खलल' पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद'। 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद' जितेन्द्र कुमार  रामर...

सुनील मिश्र की गजलें

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सुनील मिश्र परिचय सुनील मिश्र लेखन विधा मुख्यत: ग़ज़ल। ग़ज़लें व कविता-कहानियां, लेख-समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं जैसे ‘सारिका’, ‘समकालीन परिभाषा’, ‘आजकल ‘ आदि में प्रकाशित। संयुक्त सचिव (सेवा-निवृत्त), भारत सरकार  नींद मनुष्य की रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल है। नींद से शरीर की थकान तो मिटती ही है वह आगे काम करने के लिए ऊर्जा जुटाने का काम भी करती है। सामान्य तौर पर नींद हमारे रोजमर्रा में ऐसे शामिल है कि हम इसके महत्व का आभास तक नहीं कर पाते। लेकिन अगर यह नींद ही गायब हो जाए तो क्या होगा? अक्सर कई ऐसी दिक्कतें सामने आती हैं जो हमारे जीवन के सामान्य चक्र को बाधित कर देती है। नींद भी उसमें से एक है। नींद में मनुष्य ख्वाब देखता है और उस ख्वाब को फिर पूरा करने की कोशिश में जुट जाता है। लेकिन आजकल हमारे इर्द गिर्द ऐसी तमाम घटनाएं घटित हो रही हैं जो बुरे ख्वाब सरीखी हैं। हम  कोई ऐसा बुरा ख्वाब देखते हैं और फिर नींद ही काफूर हो जाती है। नींद और नींद में ख्वाब देखना सामान्य सी बात है लेकिन बुरे ख्वाबों के चलते नींद का गायब हो जाना असामान्य है। और जब नींद ही गायब हो जाए तब ज...

चन्द्रेश्वर का संस्मरण 'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'

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अनन्त कुमार सिंह  हाल ही में पटना में अनन्त कुमार सिंह पर जनवादी लेखक संघ की एक गोष्ठी हो रही थी। गोष्ठी के कई वक्ता ऐसे भी थे जो अनन्त कुमार सिंह के व्यक्तित्व और लेखन से परिचित ही नहीं थे। तब वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र कुमार ने इस बात पर अपनी चिन्ता जाहिर करते हुए कहा कि जनवादी लेखक संघ बिहार के सदस्य तक अगर अनन्त बाबू को नहीं जानते हैं तो यह दुखद है। अगर हम अपने ही लोगों को नहीं पढ़ेंगे तब साहित्य और रचना कर्म कैसे आगे बढ़ पाएगा। जब जनवादी लेखक संघ बिहार के लोग अनन्त बाबू को नहीं जानते तो बाहर के लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है। अनन्त जी ने 100 के आस पास कहानियां लिखी, एक उपन्यास लिखा और इसके साथ साथ सीमित संसाधनों के बावजूद आरा से 'जनपथ' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का निरन्तर संपादन करते रहे। कवि चन्द्रेश्वर से भी अनन्त जी के कुछ खट्टे कुछ मीठे सम्बन्ध रहे। अपने संस्मरण में चन्द्रेश्वर ने अनन्त बाबू को बेबाकी से याद किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चन्द्रेश्वर का संस्मरण 'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'। अनंत कुमार सिंह पर संस्मरण  'स्मृतियों में कथा...