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सुधीर सुमन का श्रद्धांजलि आलेख 'बहुआयामी वास्तविकताओं को चित्रित करने वाले कथाकार अनन्त कुमार सिंह'

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अनन्त कुमार सिंह  आज के समय में जब सारी मर्यादाएं, नैतिकताएं एक एक कर छिजती जा रही हैं, ऐसे में अनन्त कुमार सिंह का होना एक गहरी आश्वस्ति थी। सच्चे मायनों में वे मनुष्यता के प्रबल हिमायती थे। जो भी जरूरतमन्द उनके पास गया, वह खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी बन पड़ा, करने से कभी पीछे नहीं हटे। ऐसा नहीं था कि उन्हें धोखा नहीं मिला या उनकी आलोचना नहीं हुई, लेकिन वे चुपचाप सारे हलाहल पी जाते थे। उनके करीबियों को भी इसकी भनक नहीं लग पाती थी। अनन्त जी की सोच का दायरा बड़ा था। 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते हुए उन्होंने तमाम अनाम से रचनाकारों को अधिकाधिक स्पेस दिया। यही नहीं 'जनपथ' के सम्पादन से अपने वैचारिक लेखकीय संगठन जनवादी लेखक संघ से इतर जन संस्कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाकार साथियों को भी बेहिचक जोड़ा। पत्रिका लगातार घाटे में रही लेकिन अपने खून पसीने की कमाई लगा कर वे पत्रिका का सम्पादन प्रकाशन लगातार करते रहे। 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े जितेन्द्र कुमार ने एक बातचीत में बताया कि 'अब अनन्त कुमार सिंह हो पाना असंभव है'। इस  कथन में भले ही अतिरेक दि...

राहुल सांकृत्यायन के भोजपुरी नाटक "जपनिया राछछ" का पंकज मोहन द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद

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राहुल सांकृत्यायन  मानव इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध सबसे विनाशकारी युद्ध साबित हुआ। जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी राष्ट्रों ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। यूरोपीय तानाशाहों की तर्ज पर जापान ने तोजो के नेतृत्व में साम्राज्यवादी रुख अपनाते हुए 'एशिया एशियाइयों के लिए' जैसा नारा गढ़ दिया। ताकतवर होने के नाते समूचे एशिया पर कब्जा करना वह अपना अधिकार समझने लगा। इस समय उसने पूरी तरह से साम्राज्यवादी तौर तरीका अपना कर एशियाई देशों को रौंदना शुरू कर दिया। क्षेत्रफल के मामले में चीन के आगे जापान कहीं नहीं ठहरता, लेकिन बौने जापान ने चीन को 1904 में ही पराजित कर दिया।  1931 में जापान ने मंचूरिया पर कब्जा कर लिया और दुनिया देखती रह गई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने सिंगापुर, फिलीपींस, मलाया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, डच न्यू गिनी, वर्मा जैसे देशों पर कब्जा कर लिया। जापानी सेनाएं भारत में प्रवेश करने लगीं। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भोजपुरी नाटक 'जापानी राछछ' में जापान की इस साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा को उद्घाटित किया है। वैसे भी दुनिया के तमाम देशों में आज भी उ...

ललन चतुर्वेदी के काव्य-संग्रह 'आवाज़ घर' की चारुमित्रा द्वारा की गई समीक्षा

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'कविता की आवश्यकता क्या है' आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इस पर विचार करते हुए लिखा है ' मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी न किसी रूप में, पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा। बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मंडल बाँधता चला आ रहा है जिसके भीतर बँधा-बँधा वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का संबंध भूला-सा रहता है। इस परिस्थिति में मनुष्य को अपनी मनुष्यता खोने का डर बराबर रहता है। इसी से अंत:प्रकृति में मनुष्यता को समय-समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली आ रही है और चली चलेगी। जानवरों को इसकी ज़रूरत नहीं।' इस बात में कोई दो राय नहीं कि मनुष्यता के सामने खतरे आज कहीं अधिक हैं। आज का कवि इस बात से भलीभांति अवगत है और वह उन सभी शक्तियों के विरोध में खड़ा हैं जो मनुष्यता के विरोध में खड़े हैं। ललन चतुर्वेदी की कविताएं बिना किसी शोरोगुल के अपना मूल काम करती हैं। कवि की कविताओं को पढ़ते हुए चारुमित्रा लिखती है ललन चतुर्वेदी की कविताए...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 5, कुबेर दत्त की कविता 'नंबर दो के मसखरे'

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  कुबेर दत्त  तुलसी दास की एक चौपाई है "प्रभुता पाई काहि मद नाहीं"। प्रभुता शासकों को न जाने कितने पाखण्ड रचने के लिए विवश करती है। खुद को मासूम, निर्दोष, जनता के लिए हर पल प्रतिबद्ध, लोकतन्त्र का प्रहरी, जनता का सेवक जैसे विरुद उसे धारण करने पड़ते हैं। लेकिन असलियत है कि इन सारे पाखंडों के बावजूद सामने आ ही जाती है। उनका उद्देश्य उजागर हो जाता है कि वर्चस्व बनाए रखना ही उनका प्रमुख उद्देश्य है। ऐसे शासकों का मसखरापन एक न एक दिन सामने आ ही जाता है। आज के परिस्थितियों के आलोक में  कुबेर दत्त की कविता  'नंबर दो के मसखरे' की  लगातार याद आ रही है। कविता हमेशा मनुष्यता की बात करती है और युद्ध के विरोध में खड़ी रहती है। इन दिनों हम 'युद्ध के विरुद्ध कविता' शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इस कड़ी में आज पहली बार पर प्रस्तुत है  कुबेर दत्त की कविता  'नंबर दो के मसखरे'। युद्ध के विरुद्ध कविता : 5 'नंबर दो के मसखरे' (लू शुन की रचनाओं को पढ़ते हुए) कुबेर दत्त ‘वे, मासूमियत निःसंगता और पाखंड के स्वच्छंद प्रतिनिधि हैं’- वे असल में सत्ता का सेन्सर हैं और निःशंक...