परांस - 13 : अरविंद शर्मा की कविताएँ
कमल जीत चौधरी आमतौर पर अन्तिम दिन का इंतजार करना कोई नहीं चाहता। किसी विद्यालय का अन्तिम दिन हो या नौकरी का, यह एक समूचे वृतान्त का पटाक्षेप होता है। अन्तिम दिन से कई बातों, कई रूढ़ियों से भी मुक्ति मिल जाती है। वही रूढ़ियां जिनके प्रति कभी एक चिढ़ जैसी होती थी अब अचानक ही मोहसक्त करने लगती हैं। बहरहाल मनुष्य की उस प्रवृत्ति का क्या कहा जा सकता है जिसमें वह हर बीते पल को आगे के लिए सुरक्षित संरक्षित कर लेना चाहता है। इन स्मृतियों के सहारे वह अपने आगे के सफर को बेहतर बनाना चाहता है। यही जीवन है जो विरोधाभासों के बीच भी कदम दर कदम आगे बढ़ता रहता है। जम्मू के कवि अरविन्द शर्मा अपनी कविता 'मोह' में लिखते हैं 'स्कूल के अंतिम दिन,/ आ कर,/ उतारनी थी वर्दी,/ फिर कभी न पहनने के लिए/ उस दिन,/ नहीं उतारी आते ही,/ उतारी ही नहीं गई/ देर शाम, बहुत बोझिल मन से,/ उतारी भी तो बहुत सहेज कर।/ जकड़ लेना उन्हीं बेड़ियों को/ जिनसे छूटने की चाह में जिए/ क्या ऐसा ही होता है/ अंतिम दिन?' अरविन्द की भाषा में टटकापन है। विषय भी अलग किस्म के हैं जो कवि की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। अपनी कविताओ...