ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'।
ललन चतुर्वेदी किसी भी व्यक्ति के बचपन के दिन उसकी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं। माँ पिता की सघन छाया में बच्चे का विकास होता है। माँ पिता बच्चे में अपने अक्स ढूंढते हैं। बच्चे भी किसी तरह की फिक्र से दूर निश्छल मन अपनी कल्पना की दुनिया में खोए रहते हैं। धीरे धीरे बच्चों का विकास होता है और उनकी स्कूलिंग शुरू हो जाती है। यहीं पर बच्चों को वर्णमाला से परिचित कराया जाता है साथ ही उनकी सामाजिकता का भी विकास होता है। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में खुद के बचपन को उसके खुरदुरेपन के साथ याद किया है। उनका सरस गद्य पाठक को खुद के साथ बहा ले जाता है। बांग्ला की एक कहावत है 'अभाव स्वभाव बदल देता है।' सामान्य घर परिवार की नियति होता है अभाव। लेकिन इसी अभाव के बीच जिस बच्चे का विकास होता है वह उसके अन्दर दृढ़ इच्छा शक्ति के बीज बो देता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है'। संस्मरण 'मेरा बचपन खो गया है' ...