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शेखर सिंह की कविताएँ

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शेखर सिंह  पतंगों की अपनी एक प्यारी दुनिया हुआ करती है। अबोध बच्चों से ले कर बुजुर्गों तक में पतंगों के प्रति दीवानगी देखी जा सकती है। स्वाभाविक रूप से ये पतंगें कविताओं में भी आती हैं और कविता के आकाश को बहुरंगी बना देती हैं। पतंगों भरी आसमान यह तस्दीक करती है कि जिन्दगी हस्बेमामूल चल रही है। लेकिन पतंगों के लिए भी खतरे कम नहीं होते। पतंगें कट जाती हैं। कहीं फंस या उलझ कर चिथड़े चिथड़े हो जाती हैं लेकिन पतंग उड़ाने का उत्साह धीमा नहीं पड़ता। युवा कवि शेखर सिंह के अन्दर भी लटाई थामे पतंग उड़ाता उत्साह से भरा वह बच्चा है जो उम्मीदों से भरा हुआ है। और जब तक ये उम्मीदें हैं तब तक यह दुनिया सुरक्षित है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर सिंह की कविताएँ। शेखर सिंह की कविताएँ  अन्यथा ले सकते हैं कुछ दिनों से मैं  निहायत ईर्ष्यालु होता जा रहा हूँ ईर्ष्या करने लगा हूँ मोहल्ले की घरेलू महिलाओं से  जिनकी चर्चा में बना रहता है इन दिनों पड़ोस का एक लड़का जो शादी नहीं करना चाहता शादी और उम्र कैद में फ़र्क़ नहीं होता जिसकी राय में जिसे कल शाम एक लड़की के साथ देखा गया एक साथ हंसते ह...

कैलाश बनवासी की कहानी 'सही या गलत?'

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कैलाश बनवासी  जिन्दगी की गाड़ी को सुचारूपूर्वक चलाने के लिए सभी को एक उम्र में रोजगार की जरूरत होती है। देश के अधिकांश युवा सरकारी नौकरियों के लिए दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करते हैं। लेकिन नौकरियां इनी गिनी होती हैं जबकि आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। रही सही कसर हमारे देश की लचर व्यवस्था निकाल देती है जिसमें पेपर लीक होने से ले कर नियुक्तियों में धांधलेबाजी की समस्या आम है। आजकल के युवा मजाक में कहते भी हैं कि आपलोगों को प्री मेंस और इंटरव्यू देने होते थे। आजकल तो उसमें एक चौथा आयाम कोर्ट भी जुड़ गया है। और कोर्ट जब तक मामला सुलझाए तब तक उम्र बीत जाती है। कैलाश बनवासी की कहानी में एक पात्र आज नौकरियों की हकीकत को कुछ इस तरह बयां करता है : ‘पापा, आप लोगों का ही टाइम अच्छा था,” बेटा अक्सर मुझसे कहता है, “कम से कम जो वेकेंसी निकलती थी, वो फुलफिल तो होती थी! यहाँ तो ढेर सारे प्रॉब्लम्स हैं...। बल्कि पूरी सीरिज है प्रॉब्लम्स की! परीक्षा से ऐन पहले ही पेपर लीक हो जाता है...। मेरे दो इम्पोर्टेंट एग्जाम्स के पेपर लीक हो गए थे और एग्जाम कैंसिल! अगर एग्जाम किसी तरह हो भी गए तो रिजल...

मधु कांकरिया की मेरी ढाका डायरी की शर्मिला जालान द्वारा की गई समीक्षा

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बांग्लादेश दुनिया का एक ऐसा देश है जिसका निर्माण धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के आधार पर हुआ था। राष्ट्र बनने की उसकी प्रक्रिया त्रासद थी और उसे इस क्रम में उसे भयावह नरसंहार का दंश भी झेलना पड़ा। जिस पाकिस्तान से वह लड़ाई लड़ कर वह अलग हुआ था उसकी नींव में ही धर्म था लेकिन इसके संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भविष्य के बांग्लादेश की परिकल्पना की थी। इसके बावजूद, यह विडंबना ही कही जाएगी कि शीघ्र ही एक सैनिक जनरल ने तख्ता पलट कर इसे इस्लामिक राज्य घोषित कर दिया। आज का बांग्लादेश कट्टरवाद की अंधी राह पर चल पड़ा है। बहरहाल वरिष्ठ लेखिका  मधु कांकरिया ने अपना कुछ समय बांग्लादेश में बिताया जिसे उन्होंने 'मेरी ढाका डायरी' के रूप में शब्दबद्ध किया है। बकौल शर्मिला जालान 'डायरी में उनके चिंतक और विचारक रूप की झलक मिलती है जो उन्हें आत्मालोचक और आत्मान्वेषी बनाता है। इसी के साथ इस्लाम, राजनीति, गरीबी और अभाव से जुड़े प्रश्नों को वे मजबूती से उठाती हैं और अपने विचार स्पष्टता से रखती हैं। ढाका को जानने की प्रक्रिया में वे अपनी दुविधाओं और ...

यादवेन्द्र का आलेख 'भूखे पेट रहेंगे पर सिनेमा जरूर देखेंगे'

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यादवेन्द्र  सिनेमा मनोरंजन का ही नहीं, ज्ञान का भी एक प्रमुख माध्यम रहा है। हालांकि एक अरसा पहले हमारे हिन्दी समाज में सिनेमा देखने को अच्छा नहीं माना जाता था। तमाम घरों के लड़के तब छुप छुपा कर ही सिनेमा देखने जाया करते थे। कई ऐसे भी जुनूनी होते थे जो पहले शो का पहला टिकट हासिल कर ही सिनेमा देखने में यकीन करते थे। चाहें इसके लिए कोई भी परेशानी झेलनी पड़े। तब सिनेमा का टिकट लेने के लिए लम्बी लम्बी लाइन लगा करती थी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ती थी। तब अखबारों का एक पूरा पन्ना शहर के सिनेमाघरों में लगी फिल्मों के उल्लेख से ही भरा होता था। यादवेन्द्र जी उस दौर को याद करते हुए उचित ही लिखते हैं 'हमारे अपने जीवन में बीस साल पहले तक सिनेमा हॉल के दरवाज़े जितनी शिद्दत से खुलते थे उसका प्रभाव एकदम जादुई होता था। चालीस पैतालीस साल तक के और उससे बड़े लगभग सभी लोगों की स्मृति में सिनेमा हॉल का जादू ज़रूर जिंदा होगा, सिनेमा हॉल भौतिक रूप में भले ही बंद हो गए हों। तब सिनेमा का साहित्य से एक अटूट रिश्ता हुआ करता था।  लेकिन जमाना बदला और सिनेमा का चरित्र भी बदल गय...