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कुमार वीरेन्द्र का आलेख "जन चेतना के निर्माण का दहकता दस्तावेज 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' "

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कुमार बीरेंद्र  भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में पत्र पत्रिकाओं की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन पत्र पत्रिकाओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन चेतना तैयार करने में एक बड़ी भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन इन पत्र पत्रिकाओं को नियंत्रित करने के लिए हमेशा तमाम उपक्रम करता रहा। ऐसे पत्रों में 'चांद' के साथ-साथ ' हिन्दू  पंच' नाम भी प्रमुख है। अंग्रेजों ने चांद के फांसी अंक पर तो प्रतिबंध लगाया ही, हिन्दू पंच' के बलिदान अंक को भी जब्त कर लिया। ' हिन्दू  पंच' का 'बलिदान अंक' पहले ही उसके पाठकों के हाथों में जा चुका था। इस पत्र ने अपना मुख्य काम कर दिया था। ' हिन्दू  पंच' के इस 'बलिदान अंक' को केन्द्रित कर कुमार वीरेंद्र ने एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है जिसे 'उत्तर प्रदेश' के 'जब्तशुदा साहित्य विशेषांक' जनवरी अप्रैल 2023 में प्रकाशित किया गया है। हम इस आलेख को साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। आज कुमार वीरेंद्र का जन्मदिन है कुमार वीरेंद्र की रुचि शोध में है और वह अपने आलेख में शोध पर विशेष ध्यान रखते हैं। वे बिना शोरोगुल के चुपचाप अपना काम ...

अवन्तिका राय की लघु कथाएं

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अवन्तिका राय रोजी रोटी के लिए विस्थापन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड के लोगों की जैसे उनकी नियति ही है। इन लोगों को समवेत रूप में बिहारी कहा जाता है। जैसे बिहारी होना अपराध हो। आमतौर पर उनके बारे में उनके इलाके के लोगों की राय होती है कि वह खुशकिस्मत है। दूसरी जगह जा कर अच्छे से कमा खा रहा है। लेकिन उसकी दिक्कतें क्या हैं, कैसी हैं, इससे भला किसी को क्या लेना देना? तमाम संसाधन होने के बावजूद उत्तर भारत के ये राज्य पिछड़े होने के लिए अभिशप्त हैं। यहां के जनप्रतिनिधि तमाम तरह से जनता को भरमा कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं।  महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब में अक्सर इन लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है लेकिन ये लोग जैसे जहर पी कर अपना जीवन बिताने के अभ्यस्त हो जाते हैं।  अवन्तिका राय अपनी लघु कथा पन्द्रह अगस्त में इस पीड़ा की एक बानगी करीने से व्यक्त करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अवन्तिका राय की लघु कथाएं। अवन्तिका राय की लघु कथाएं  कहानी सांढ़ और बंदरों की  एक सांढ़ मन्थर गति से चलते हुए जंगल में विचरण कर रहा था।  जैसा कि दिखता ही है, उसका अंडक...

सीमा आजाद की कहानी अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं'

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सीमा आजाद  मनुष्य की पहचान में कई कारक अपनी प्रमुख भूमिका निभाते हैं। रंग, नस्ल, धर्म, भाषा कुछ ऐसे कारक हैं जो एक व्यक्ति की पहचान के साथ कुछ इस तरह जुड़ जाते हैं कि इन सबसे अलग कर उसे देखना सम्भव नहीं हो पाता। दुर्भाग्यवश यही सब कारक दंगे फसाद के मूल में भी होते हैं। धर्म के साथ यह दिक्कत कुछ अधिक ही होती है। हर धर्म अपनी कमीज को ही ज्यादा सफेद बताता है जबकि दूसरे धर्म को तमाम खामियों से भरा बताता है। संकीर्ण सोच के चलते यह दिक्कत कुछ और बढ़ जाती है। धर्म हमें सामाजिक समरसता की शिक्षा देते हैं न कि आपसी विद्वेष की। बहुसंख्यक समाज अपने अल्पसंख्यकों को अक्सर सन्देह के नजरिए से देखता है। एक जमाने में यूरोपीय समाज में यहूदियों को ईसाई लोग शंका के नजरिए से ही देखा करते थे। इतिहास गवाह है कि हिटलर ने लगभग साठ लाख यहूदियों को निर्ममता से मार डाला। इनका अपराध यही था कि वे यहूदी थे। आज मुसलमानों के साथ ऐसा हो रहा है। उनका नाम हर आतंकवादी घटना के साथ जोड़ कर लिया जाता है। उन्हें देशभक्ति का सबूत देना पड़ता है। उन्हें मॉब लिंचिंग का शिकार होना पड़ता है। एक डर उनके मन मस्तिष्क में बैठ जाता ह...