रंजीत वर्मा का आलेख 'कैसी हो आज की कविता'
रंजीत वर्मा आम तौर पर साहित्य का यह दायित्व होता है कि समाज को दिशा देने का काम करे। वह अपने समय ही नहीं बल्कि समय से आगे की सोचे और इसके लिए जन मानस को तैयार करने का काम करे। हिन्दी साहित्य के आरम्भिक दौर में दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं दिखाई पड़ता। तब के रचनाकारों की रचनाओं में धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ता है। इस नींव ने हमें मुक्त तरीके से सोचने विचारने तक के लिए प्रेरित नहीं किया। 1936 में प्रगतिशील लेखक लेखक संघ की स्थापना के साथ पुरानी सोच का पटाक्षेप होता है। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद खुले तौर पर कहते हैं - साहित्य की बहुत सी परिभाषाएं दी गयी हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा 'जीवन की आलोचना' है। चाहे वह निबंध के रूप में हो, चाहे कहानियों के, या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या होनी चाहिए।' हमें आजादी मिले एक अरसा हो गया। लेकिन हम आज तक पूर्वाग्रहों से मुक्त कहां हो पाए हैं। हम आज कहीं ज्यादा धार्मिक हो गए हैं हम आज कहीं ज्यादा जातिवादी हो गए हैं। हम आज कहीं ज्यादा संकीर्ण हो गए हैं। हम आज कहीं ज्यादा कट्टर हो गए ह...