भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 'धूप है कि मोह की आँखमिचौली'
भरत प्रसाद प्रकृति का अपना एक अलग मौसम चक्र हुआ करता है। भारत इस मामले में एक समृद्ध देश है जहां अलग अलग मौसम एकरसता को तोड़ते हुए जीवन को थोड़ा सरस बना देते हैं। सावन का महीना सारे महीनों से न्यारा होता है। बारिश की फुहारें एक तरफ जहां गर्मी से निजात दिलाती हैं वहीं दूसरी तरफ गुनगुने ठण्ड के मौसम का बीज बो देती हैं। धरती चारों तरफ शस्य श्यामला नजर आने लगती है। खेतों में धान की रोपाई बनिहारिनों के सुमधुर लोकगीतों के साथ आरम्भ हो जाती है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास 'कालकलौटी' के प्रारम्भ में कुदरत के इस खूबसूरत नज़ारे का शब्द चित्र बनाते हैं। आजकल हर महीने के दूसरे रविवार को हम भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का धारावाहिक रूप से प्रकाशन कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का चौथा अंश। उपन्यास अंश 4 : कालकलौटी 'धूप है कि मोह की आँखमिचौली' भरत प्रसाद धूप मीठी कि छाया? बारिश में भीगना मोहक कि नदी में कूद जाना? बादलों की उमड़-घुमड़ जादुई या उनकी दिशा भेदी गर्जना? टिप-टिप बारिश का संगीत मादक या वर्षा की...