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बलराज पाण्डेय

अमरकान्त की कालजयी कहानियाँ बलराज पाण्डेय हिन्दी में नई कहानी (सन् 1950-1960) के अधिकतर कथाकार मध्य वर्ग से आये थे। उन्होंने अपने और अपने आस-पास के मध्यवर्गीय जीवन को जिस रूप में देखा था, उसी को अपनी कहानियों में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया था। इनमें बहुत-से ऐसे कथाकार थे जो गाँवों से आये थे। फणीश्वर नाथ रेणु, मार्कण्डेय, शिवप्रसाद सिंह, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी की कहानियों में गाँव के जीवन्त चित्र देखे जा सकते हैं। कुछ ऐसे भी कथाकार थे जो छोटे शहरों की जिन्दगी को अपनी कहानियों में जगह दे रहे थे। इन्होंने भी गाँव में समय बिताया था। गाँव का परिवेश इनकी यादों में ताजा था। इनकी कहानियों में प्रयुक्त ग्राम जीवन के शब्दों से इनकी पहचान की जा सकती है। अमरकांत ऐसे ही कथाकार हैं, जिन्होंने रहने के लिए तो इलाहाबाद शहर चुना था, लेकिन उनकी कहानियों में किसी-न-किसी रूप में गाँव झलक मारता है। मुख्य रूप से वे शहरी मध्य वर्ग के कथाकार हैं- उस शहरी मध्य वर्ग के, जो अभाव में जिन्दगी जी रहा  है। आजादी मिलने के बाद भी उसे भविष्य के लिए कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। अमरकान्त की बहुचर्चित कहानी...

प्रतुल जोशी का यात्रा वृत्तांत 'मुम्बई से गोवा'

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गोवा में प्रतुल जोशी मनुष्य जन्मजात घुमक्कड़ प्राणी है। सहज रूप में उसे उन जगहों के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है, जो उसके आस पास या दूर दराज हैं। जानने की इस प्रवृत्ति की वजह से ही अमरीका यानी नई दुनिया की खोज हुई। यूरोप से भारत आने के जलमार्ग की खोज हुई। आज कई देशों की आय का एक बड़ा साधन यह पर्यटन ही है। हमारा भारत अपने आप में तमाम विविधताओं वाला देश है। इसीलिए इसे देशों का देश भी कहा जाता है। हालांकि विकास के नाम पर आज हम इन जगहों की कुदरती खूबसूरती को नष्ट करते जा रहे हैं फिर भी हमारे  यहां घूमने फिरने की तमाम जगहें अभी भी बची हुई हैं। आमतौर पर पर्यटन हमारे उत्तर भारत के लोगों की प्रवृत्ति नहीं। आम जनता इसे आज तक खाए अघाए लोगों का उपक्रम ही मानती रही है। बहरहाल हरेक यात्रा वृत्तांत अपने आप में बहुत कुछ समेटे होता है। उसमें इतिहास के साथ वर्तमान भी होता है। भूगोल के साथ राजनीति भी होती है। प्रकृति के साथ सामाजिकता भी शामिल होती है। राहुल जी तो कहा ही करते थे : 'सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ/ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ'। वे आजीवन घुमक्कड़ी करते...

शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'

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भारतीय दर्शन की एक लंबी एवं समृद्ध परम्परा रही है। छठी सदी ई पू में दर्शन की कई ऐसी धाराएं अस्तित्व में आईं जिन्होंने वैदिक दर्शन के समक्ष चुनौती प्रस्तुत किया। इनमें जैन और बौद्ध धर्म सर्वाधिक ख्यात हुए। आगे चल कर इसमें संन्यासियों, वीतरागियों, गोरखपंथियों, कबीरपंथियों आदि की धारा भी समाहित और समंजित हुईं। भारत की समृद्ध चिन्तन परम्परा ने साहित्य को भी काफी हद तक प्रभावित किया। कवि शिवदयाल एक्टिविस्ट भी रहे हैं। एक तरफ जे. पी. आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है तो दूसरी तरफ भारतीय दार्शनिक धारा से वे प्रभावित रहे हैं। इसका उदाहरण उनकी कविताएं हैं। अनुभव संसार व्यापक होने के चलते उनकी कविताओं में पर्याप्त विविधता दिखाई पड़ती है। वर्ष 2024 में उनका  पहला कविता-संग्रह  'ताक पर दुनिया' प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की समीक्षा की है जितेन्द्र कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा 'शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'। शिवदयाल की कविताई : सामाजिक स...