प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'लेडी विद अ लैपटॉप'
प्रचण्ड प्रवीर जिन्दगी प्रायः बहुरंगी होती है। सुख दुःख इसके हिस्से होते हैं। सबके अपने अपने सुख, सबकी अपनी अपनी दिक्कतें, दुःख और तकलीफें होती हैं। हम सबको अपनी जिंदगी में इन सब का सामना खुद करना पड़ता है और खुद ही इनसे निबटना पड़ता है। एक कहावत है डूबते को तिनके का सहारा। सफर करते हुए कभी कभी पास बैठे सहयात्री की आंखों में ही तमाम उम्मीदें दिखाई पड़ने लगती हैं। अपनी कहानी ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ में प्रचण्ड प्रवीर लिखते हैं "मैँने देखा महिलाओँ के डिब्बे के पास बनी बेंच पर कत्थई ड्रेस पहनी मास्क लगाये ‘लेडी विद अ लैपटॉप’ अपने लैपटॉप को खोले बैठे मेरी तरफ एकटक देख रही है। शायद वह रुक कर कहीँ और जाने वाली थी। शायद किसी की प्रतीक्षा कर रही थी। शायद वह मुझसे कुछ पूछना चाहती थी पर संकोच और अपरिचित होने के नाते भी पूछ नहीँ पा रही थी। और उसकी गहरी आँखोँ से ऐसा लग रहा था मानो कुछ ही समय मेँ समाधान मिल जायेगा, और फिर एक नवीन और भव्य जीवन प्रारम्भ होगा। और यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि अभी उसके सामने एक बहुत लम्बा रास्ता है, और उसका सबसे जटिल और कठिन हिस्सा तो अभी बस आरम्भ ही हो रहा था।' आ...