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परांस-15 : अशोक कुमार की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  जीवन की अन्तिम कड़ी मृत्यु है। भारतीय परम्परा में हर पिता यह चाहता है कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी सन्तान मुखाग्नि दे। सामान्य तौर पर इस जिम्मेदारी का निर्वहन पुत्र करता है। लेकिन बदलते समय के साथ बेटियां भी आगे बढ़ कर यह दायित्व निभा रही है। अशोक कुमार की एक उम्दा कविता है 'बेटी से'। कविता की पंक्तियाँ हैं : 'मेरी चिता में उसी तरह अग्नि धर देना/ जैसे रोज़ सुबह-शाम थाली में/ चपाती धर जाती हो,/ जो प्यार दिया, तुमसे लिया/ उसका अंत अग्नि ही तो है'। अग्नि सब कुछ का अन्त कर डालती है। पार्थिव देह भी अग्नि में जल कर राख बन जाती है और इस तरह मिट्टी अपनी मूल मिट्टी में मिल जाती है। कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हैं 'बाप मरण तो कह पाया/ पर अपना जीना न कह सका/ जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त/ बहुत लम्बी होती है।' मृत्यु आसान है। जीना बहुत कठिन। जीवन में किसिम किसिम किसिम की जरूरतें पड़ती हैं। यानी जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त बहुत लम्बी होती है। कवि अशोक कुमार जीवन की जरूरतों से वाकिफ हैं। हमारे इस बार के परांस के कवि अशोक कुमार हैं। अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौ...

हितेन्द्र पटेल का आलेख 'इतिहास पर पुनर्विचार'

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हितेन्द्र पटेल बंगाल ने आधुनिक भारत में नवजागरण की प्रक्रिया का नेतृत्व किया। राजा राम मोहन रॉय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, राम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द जैसे नाम इस बात की तस्दीक करते हैं।  आगे चल कर सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, चितरंजन दास, सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता आंदोलन से न केवल जुड़ते हैं बल्कि भारतीय आंदोलन की अपरिहार्यता बन जाते हैं। बंगाल ही अकेला ऐसा प्रान्त है जिसे अंग्रेजों ने 1905 में विभाजित कर दिया। इस विभाजन ने राष्ट्रीय आंदोलन को राष्ट्र व्यापी बना दिया। आजादी के समय बँटवारे का दंश भी बंगाल को भुगतना पड़ा। इस तरह स्वतंत्रता के पूर्व या स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय राजनीति में बंगाल की एक अहम भूमिका रही है। 1940 के बाद मुस्लिम लीग ने जहां एक तरफ मुस्लिम राजनीतिक मत को संगठित करना आरंभ किया वहीं दूसरी तरफ हिन्दू महासभा ने यह सोच विकसित किया कि संख्यात्मक बहुमत पर आधारित प्रातिनिधिक लोकतंत्र हिंदुओं के राजनीतिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर सकता। आज़ादी मिलने के बाद भी धार्मिक आग्रहों का यह अलगाव बंगाल के लिए एक बड़ा मुद्दा बना रहा। इतिहास लेखन की प्रक्रिया उतनी इकहर...

रणविजय सिंह सत्यकेतु की कविताएँ

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रणविजय सिंह सत्यकेतु  सभ्यताएं एक दिन में नहीं बनती। उन्हें बनने संवरने में शताब्दियां लग जाती हैं। ऐसा भी होता है कि एक ही समय में विभिन्न सभ्यताएं आपस में श्रेष्ठता के लिए संघर्ष करती रहती हैं। परमाणु हथियारों की खोज के बाद दुनिया में शक्ति के समीकरण बदल गए हैं। संयुक्त राज्य अमरीका वर्चस्व की होड़ में खुद को श्रेष्ठ तो मानता ही है साथ ही यह भी दर्शाना चाहता है कि वह दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है। इसी क्रम में ईरान उसके निशाने पर आया। लेकिन अमेरिका यह भूल गया कि ईरान वेनेजुएला जैसा देश नहीं है। फारस की सभ्यता दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में से एक है। प्रतिरोध की परंपरा वहां की जड़ों में है। ईरान के प्रतिरोध की परंपरा ने संयुक्त राज्य अमेरिका के अहंकार को दरका दिया है। अपनी एक कविता में रणविजय सिंह सत्यकेतु लिखते हैं : 'एक सतत सभ्यता/  किसी असभ्य अभियान से मात नहीं खाती/ श्रमशील, प्रतिबद्ध और कर्मठ आबादी को मिटाने वाले/ मतिछिन्न मंसूबों को कामयाब नहीं होने देती/ ईमान को ऊंचा रखने वाली जनता ने सिखाया/ दमदार संस्कृति हमेशा इतिहास रचती है/ विखंडित भूगोल के मायने बदल देती है/ ठोस इ...