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हर्ष पाठक की कविताएँ

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हर्ष पाठक  आम आदमी से ही कोई भी राष्ट्र और राष्ट्रीयता है। आम आदमी से ही कोई धर्म, नस्ल या जाति है। लेखक आम आदमी की पीड़ाओं को ही शब्दबद्ध करने का दावा करते हैं। यानी कि आज आम आदमी के नाम पर ही दुनिया का सारा कार्य व्यापार चल रहा है। यहाँ तक कि निरंकुश शासक भी खुद को आम आदमी का ही सेवक कहते बताते हैं। लेकिन एक सवाल उठ खड़ा होता है कि आम आदमी आज भी कहां पर खड़ा है? आम आदमी का जीवन आज भी बदहाल क्यों है? युवा कवि हर्ष पाठक अपनी कविता 'उनका होना' में लिखते हैं : "उन्होंने कई सारी गलतियों को सुधारा/ ढेरों मुकम्मल लड़ाइयां लड़ीं/ किसी के आगे की थाली नहीं छीनी/रूखी–सूखी में गुजारा किया/ सभाओं में उपस्थित रहे/ सम्मेलनों की कुर्सियां खींची/ किताबों की इमारतें खड़ी कर दी/ जगह–जगह आवाज़ें ऊंची ही रखी/ फिर भी बदहवास से भटक रहे थे"। हर्ष की कविताएँ अपने समय और सरोकारों की वह कविता है जिसके केन्द्र में वह आम आदमी है जो तमाम तरह की सत्ताओं के मकड़जाल में खुद को कुछ इस तरह उलझा पा रहा है कि उसे बाहर निकल पाने की राह तक नहीं दिख रही। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हर्ष पाठक की कविताएँ...

रणेंद्र का आलेख 'अथक सृजन की विकलता दूधनाथ सिंह'

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दूधनाथ सिंह सृजन का कर्म अपने आप में एक कठिन काम है। लेखक अपनी बातों को अपनी वेदना को किसी विधा में शब्दबद्ध कर स्वयं को अभिव्यक्त करता है। इस अभिव्यक्ति को पाठक अपनी वेदना, जीवन और सरोकारों से जोड़ कर देखता है। दूधनाथ सिंह अपने समय के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। विधाओं में जो प्रयोग और आवाजाही उन्होंने किया वह हमें विस्मय में डालता है। वे साठोत्तरी दौर के बेजोड़ कथाकार थे। कविता से उन्होंने अपने लेखकीय जीवन की शुरुआत की। आपातकाल के समय उन्होंने पक्षधर का अंक निकाला जो खासा चर्चित रहा। यमगाथा जैसे कालजई नाटक की रचना की। आलोचना के क्षेत्र में उन्होंने मील का पत्थर स्थापित किया। धीरेन्द्र वर्मा रचनावली का सम्पादन कार्य किया। भुवनेश्वर समग्र को अंतिम स्वरूप प्रदान किया। विद्वत जगत में लौट आ ओ धार संस्मरण की अद्भुत किताब मानी जाती है। उनके रचनाकर्म पर प्रकाश डालते हुए रणेंद्र लिखते हैं 'आलोचक के रूप में भी उन्होंने अपने मानक खुद बनाए। उन्होंने सायास अकादमिक आलोचना के बने बनाए ढांचे को तोड़ा। महाप्राण निराला, महादेवी या मुक्तिबोध पर लिखते हुए उन्होंने अपने कथाकार या संस्मरणकार की शैली...

अजय तिवारी का व्याख्यान आलेख 'शमशेर की काव्य-दृष्टि'

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शमशेर बहादुर सिंह  सौन्दर्य भला किसे आकर्षित नहीं करता। यह सौंदर्य की आंतरिक शक्ति होती है कि ताकतवर भी उसके सामने झुक जाता है। और प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के क्या कहने। शमशेर बहादुर सिंह को सौन्दर्य का अप्रतिम कवि माना जाता है। लेकिन यह सौन्दर्य जितना सहज सरल दिखता है उतना होता नहीं। उसमें भी जटिलता होती है। उसमें भी विरह की वेदना होती है। वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी लिखते हैं 'जैसे वसंत प्रकृति की रचना-शक्ति है, वैसी शृंगार मनुष्य की रचना-शक्ति है इसलिए दोनों एक ज़मीन पर मिल जाते हैं। शमशेर को भी वसंत के साथ शृंगार याद आता है लेकिन विडम्बना क्या है कि जैसे ही वसंत के साथ शृंगार आता है, वैसे ही उन्हें अपनी दिवंगत पत्नी का स्मरण होता है। प्रिय की स्मृति शृंगार के साथ! शृंगार और प्रिय की स्मृति लेकिन वह जो प्रिय है उनकी, वह वास्तव में नहीं है इसलिए तुरंत अभावों का दंश सामने आता है। शमशेर वसंत के बाहरी सौंदर्य का चित्रण छोड़ कर मन की उस अतृप्ति, भाव, दंश को चित्रित करने लगते हैं। शमशेर की कविताओं की दुरूहता का यह सबसे बड़ा कारण है। उनकी दुरूहता के इस रहस्य को तरह-तरह से व्याख्यायित किया गय...

चंद्रेश्वर से पंजाबी- हिन्दी लेखक जतिंदर औलख की बातचीत

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चन्द्रेश्वर  हरेक लेखक का अपना एक अलग व्यक्तित्व और लेखन का तरीका होता है। वैसे कविता और गद्य रचनाएँ अपने आप में लेखक के बारे में बहुत कुछ बता देती हैं लेकिन  साक्षात्कार के माध्यम से खुद रचनाकार पाठकों से रु ब रु होता है। इससे रचनाकार के उन पक्षों के बारे में पता चलता है जिसके बारे में हम प्रायः अनभिज्ञ होते हैं। चन्द्रेश्वर पाण्डेय हिन्दी भोजपुरी के वरिष्ठ रचनाकार हैं जिन्होंने दोनों भाषाओं में साधिकार लेखन किया है। हाल ही में  पंजाबी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका 'अनुताश' के जुलाई-दिसंबर 2026 अंक में चन्देश्वर का  साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है जिसे पंजाबी एवं हिन्दी के रचनाकार जतिंदर औलख ने लिया है। कुछ परिवर्द्धन के साथ उस साक्षात्कार का हिन्दी में अनुवाद पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हिन्दी भोजपुरी के कवि चंद्रेश्वर से पंजाबी-हिन्दी लेखक जतिंदर औलख की बातचीत। वरिष्ठ हिन्दी-भोजपुरी कवि-गद्यकार चंद्रेश्वर से  पंजाबी- हिन्दी लेखक जतिंदर औलख की बातचीत  “मानवीय संवेदना के बिना साहित्यकार होना असंभव है” औल...