रणेंद्र का आलेख 'अथक सृजन की विकलता दूधनाथ सिंह'
दूधनाथ सिंह सृजन का कर्म अपने आप में एक कठिन काम है। लेखक अपनी बातों को अपनी वेदना को किसी विधा में शब्दबद्ध कर स्वयं को अभिव्यक्त करता है। इस अभिव्यक्ति को पाठक अपनी वेदना, जीवन और सरोकारों से जोड़ कर देखता है। दूधनाथ सिंह अपने समय के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। विधाओं में जो प्रयोग और आवाजाही उन्होंने किया वह हमें विस्मय में डालता है। वे साठोत्तरी दौर के बेजोड़ कथाकार थे। कविता से उन्होंने अपने लेखकीय जीवन की शुरुआत की। आपातकाल के समय उन्होंने पक्षधर का अंक निकाला जो खासा चर्चित रहा। यमगाथा जैसे कालजई नाटक की रचना की। आलोचना के क्षेत्र में उन्होंने मील का पत्थर स्थापित किया। धीरेन्द्र वर्मा रचनावली का सम्पादन कार्य किया। भुवनेश्वर समग्र को अंतिम स्वरूप प्रदान किया। विद्वत जगत में लौट आ ओ धार संस्मरण की अद्भुत किताब मानी जाती है। उनके रचनाकर्म पर प्रकाश डालते हुए रणेंद्र लिखते हैं 'आलोचक के रूप में भी उन्होंने अपने मानक खुद बनाए। उन्होंने सायास अकादमिक आलोचना के बने बनाए ढांचे को तोड़ा। महाप्राण निराला, महादेवी या मुक्तिबोध पर लिखते हुए उन्होंने अपने कथाकार या संस्मरणकार की शैली...