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रणेन्द्र का आलेख 'रेणु के कथागायन का सौन्दर्य और सीमाएँ'

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फणीश्वरनाथ रेणु     कल फणीश्वरनाथ रेणु का जन्मदिन था। संयोगवश कल रणेन्द्र का भी जन्मदिन था। ' आलोचना ' के हालिया अंक में रणेन्द्र का रेणु पर एक शोध आलेख प्रकाशित हुआ था। हम कल ही इस आलेख को पहली बार पर देना चाहते थे। लेकिन लेख काफी बड़ा होने के कारण हम ऐसा न कर सके। यह आलेख जिस अंदाज में इसे लिखा गया है वह काबिलेगौर है। वस्तुतः शोध आलेख इसी तरह से लिखे जाने चाहिए। रणेन्द्र जी का परिश्रम यह ताकीद करता है कि वे यूं ही हमारे दौर के बेहतरीन रचनाकार नहीं हैं। अप्रतिम रचनाकार रेणु पर लिखे गए कुछ बेहतरीन आलेख ' पहली बार ' पर सिलसिलेवार देने की हमारी योजना है। इसकी शुरुआत विनोद तिवारी के आलेख से हम पहले ही कर चुके हैं। रणेन्द्र जी को उनके जन्मदिन पर विलम्बित बधाई देते हुए आज पहली बार हम प्रस्तुत कर रहे हैं रणेन्द्र का आलेख ' रेणु के कथागायन का सौन्दर्य और सीमाएं ' ।     रेणु के कथागायन का सौन्दर्य और सीमाएँ   रणेन्द्र 1954 में प्रकाशित अपने प्रथम उपन्यास ‘ मैला आँचल ’ को कथा गायक फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं ‘ आंचलिक उपन्यास ’ की संज्ञा से विभूषित किया