संदेश

अमरेन्द्र कुमार शर्मा का आलेख 'सिनेमा की काया का द्रष्टा'

चित्र
अमरेन्द्र कुमार शर्मा  कला जीवन की एकरसता को तोड़ती है और मनुष्य को संवेदनशील बनाती है। कला के अनेक माध्यम हैं। इन माध्यमों में सिनेमा वह माध्यम है जिसके दोहरे आयाम हैं। दृश्य के साथ साथ श्रव्य भी। इन दोनों का किसी भी दर्शक के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए मनोरंजन के माध्यम के रूप में सिनेमा अन्य कलाओं से अग्रणी दिखाई पड़ता है। अपनी शुरुआत से ले कर आज तक हिन्दी सिनेमा कई चरणों से हो कर गुजरा है। आजकल यह ओ टी टी स्टेज में है।  अमरेन्द्र कुमार शर्मा ने हिन्दी सिनेमा के चरित्र और उसके विकास को ले कर तीन विशेषज्ञ लेखकों से बातचीत किया है। ये विशेषज्ञ लेखक हैं : विजय पाडलकर, विजय शर्मा और मनोज रूपड़ा। अमरेन्द्र शर्मा ने एक ही तरह के कुल आठ सवाल इन तीनों विशेषज्ञों से किए हैं। इन सवालों के जरिए इक्कीसवीं सदी में हिंदी सिनेमा के विभिन्न दृष्टिकोणों को ले कर सिनेमा  लेखन पर गम्भीर विमर्श किया गया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बातचीत पर आधारित अमरेन्द्र कुमार शर्मा का आलेख 'सिनेमा की काया का द्रष्टा'। 'सिनेमा की काया का द्रष्टा'  अमरेन्द्र कुमार शर्मा...

साइना लोफी की कविताएं

चित्र
  साइना लोफी साइना लोफी (Gcina Mhlophe)  साइना लोफी दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद  कार्यकर्ता, अभिनेत्री, कहानीकार, नाटककार और कवयित्री हैं। उनका जन्म 1958 में नाटाल में हुआ था और वे एक होसा माता और जुलू पिता की संतान हैं। उन्होंने अपना कार्यकारी जीवन एक घरेलू नौकर के रूप में प्रारम्भ किया फिर वे प्रेस ट्रस्ट और बी बी सी के लिए समाचार वाचक रहीं। फिर उन्होंने ‘लर्न एंड टीच’ पत्रिका में लेखन का कार्य किया। वर्तमान में वे The International Association for Theatre for Children and Young People के संरक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उनकी कहानियों, नाटकों और कविताओं की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने अनेक फिल्मों में काम किया है और अनेक फिल्मों का निर्देशन किया है। उन्हें मुक्त विश्वविद्यालय, इंग्लैंड, नाटाल विश्वविद्यालय और रोड्स विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया है।  अपने लेखन और अफ़्रीकी महिलाओं की आधुनिक विश्व में भूमिका के सम्बन्ध में  हार्वर्ड क्रिमसन को दिए गए एक साक्षात्कार में वे कहती हैं कि “इससे मुझे निश्चय ही अच्छी अनुभू...

उमा चक्रवर्ती का आलेख 'सीता के मिथक का विकास : मिथक और साहित्य में महिलाएँ'

चित्र
उमा चक्रवर्ती  भारतीय परम्परा में उन पंच कन्याओं का जिक्र मिलता है जो प्रातः स्मरणीय मानी जाती हैं। : 'अहल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा।/ पञ्चकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्॥' इन पंच कन्याओं में सीता का नाम नहीं आता। हालांकि भारतीय नारियों के आदर्श में सीता का नाम अग्रणी है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में राज्य की निजी भूमि को सीता कहा जाता था। यह भूमि उपजाऊ होती थी। सीता का जन्म भी धरती से ही हुआ और वे अन्ततः धरती में ही समाहित हो गईं। विवाह के बाद सीता ने पति राम के साथ वनवास जाने का निर्णय लिया। जंगल की दिक्कतें उन्हें बताई गईं लेकिन वे अपने इरादे पर दृढ़ बनी रहीं। आगे चल कर उनके जीवन में एक बड़ी त्रासदी तब आई जब लंकाधिपति रावण ने उनका अपहरण कर लिया। राम ने सीता की वापसी के लिए युद्ध किया। सीता राम को मिलीं। लेकिन उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। राम, सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे। लेकिन मात्र एक लांछन के आधार पर सीता को फिर जंगल भेज दिया गया। इस तरह देखें तो सीता का समूचा जीवन ही त्रासदी से परिपूर्ण था। मिथकों का प्रयोग इतिहास लेखन में सतर्कता के साथ करना होता ह...