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हेरम्ब चतुर्वेदी के उपन्यास 'सुल्तान रजिया' पर हर्ष मणि सिंह की समीक्षा

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भारत में शासकों की जो लम्बी परम्परा मिलती है उसमें गिनी चुनी महिलाएं ही शासक के रूप में दिखाई पड़ती हैं। मध्यकाल में शासक के रूप में एकमात्र जो नाम मिलता है वह नाम रजिया सुल्तान का है। सुल्तान इल्तुतमिश ने परंपराओं की परवाह न करते हुए अपनी सुयोग्य पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। यह बात उस समय के अमीरों और उलेमाओं को भला कैसे बर्दाश्त होती। उन्होंने वह हरेक कदम उठाया जिससे रजिया को गद्दी से हटाया जा सके। रजिया ने भी अपनी तरफ से खुद को बचाने की हरचन्द कोशिश की लेकिन उसका महिला होना ही अभिशाप बन गया और अन्ततः अपनी जान दे कर उसे शासक बनने की कीमत चुकानी पड़ी। हेरम्ब चतुर्वेदी ने इतिहास के ऐसे पात्रों को अपने उपन्यासों के जरिए रेखांकित करने का प्रयास किया है जो अभी तक अदृश्यमान थे। इस कड़ी में  'जहांआरा', 'हमीदा बानो' के बाद उन्होंने रजिया को अपने उपन्यास का मुख्य पात्र बनाया है। जाहिर तौर पर एक इतिहासकार होने के नाते उन्होंने कल्पनाओं की उड़ान वहीं तक भरी है जो इतिहास को कदाचित विकृत न कर पाए।  अर्थशास्त्र के अध्येता  हर्ष मणि सिंह ने इस उपन्यास को पढ़ते हु...

संतोष पटेल का आलेख "राष्ट्रवाद की कलई खोलती रवींद्रनाथ टैगोर की कृति: ‘घरे बाइरे’ "

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'राष्ट्र' और 'राष्ट्रवाद' क्या है, इसे ले कर कई सवाल मन में सहज ही उठ खड़े होते हैं। आज दुनिया भर में राष्ट्रवाद का शोर कुछ ज्यादा ही है। दरअसल यह भी एक तरह का उन्माद है जिसे उन लोगों द्वारा समय समय पर इसे इसलिए हवा दी जाती है कि जो सत्ता पर येन केन प्रकारेण अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। राष्ट्रवाद अपने आप में बुरा नहीं है लेकिन उग्र राष्ट्रवाद हमेशा भयावह होता है। हालांकि तात्कालिक रूप से यह उन्माद लोगों को एकबद्ध करता है लेकिन इतिहास गवाह है कि यह राष्ट्र को दूरगामी नुकसान पहुंचाता है। दुनिया ने अब तक जो दो विश्व युद्धों की भयावहता देखी है उसके शुरू होने में इस उग्र राष्ट्रवाद की बड़ी भूमिका रही है।  1857 के पश्चात भारत में कई कारकों की वजह से राष्ट्रवाद की भावना जागृत हुई जिसने आगे चल कर अंग्रेजों के उपनिवेशवाद के समक्ष कड़ी चुनौती प्रस्तुत की। राष्ट्रवाद पर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का अपना अलग और खुला नजरिया था। उन्होंने अपनी रचनाओं और लेखों में बार-बार कहा था कि " 'राष्ट्र' (Nation) की अवधारणा मूल रूप से एक पश्चिमी आयात है जो यांत्रिक और शोषणकारी है...

बसंत त्रिपाठी का आलेख 'नामवर सिंह (पर) एक अधूरा आलेख'

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नामवर सिंह  हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह एक ऐसा नाम है जिसके आस पास कोई दिखाई नहीं पड़ता। विद्वता और तर्कशीलता के चलते विरोधी भी नामवर जी का लोहा मानते थे। इस तरह वे अजातशत्रु थे। वे अपने व्याख्यानों की तैयारी जिस तरह करते थे, वह उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। संस्कृत और अंग्रेजी पर अधिकार उनकी विद्वता को और धारदार बनाते थे। शुरुआती लेखन के बाद उन्होंने लिखना छोड़ कर व्याख्यान देना शुरू किया। वाचिक परम्परा के अदभुद और अप्रतिम उदाहरण वे आजीवन बने रहे। आशीष त्रिपाठी ने कई खण्डों में उनके इन व्याख्यानों को संकलित करने का कार्य किया है। नामवर जी पर बहुत कुछ लिखा पढ़ा गया है और आज भी यह प्रक्रिया जारी है। तब भी लगता है कि नामवर जी पर अधूरा ही लिखा गया है। इस अधूरे की शक्ल में ही कवि आलोचक बसन्त त्रिपाठी ने नामवर जी की रचनात्मकता पर एक आलेख लिखा है जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बसंत त्रिपाठी का आलेख 'नामवर सिंह (पर) एक अधूरा आलेख'। 'नामवर सिंह (पर) एक अधूरा आलेख' बसंत त्रिपाठी  आलोचक की सार्थकता इस बात में...

हर्ष पाठक की रपट 'पाठकों को गहरे मानवीय बोध से जोड़ती हैं संजीव कौशल की कविताएँ'

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  संजीव कौशल इलाहाबाद साहित्यिक रूप से एक जागरूक शहर रहा है। एक समय में तो इसे साहित्य की राजधानी तक कहा जाता था। हर दिन कोई न कोई गोष्ठी, विचार विमर्श, राष्ट्रीय संगोष्ठी, नाट्य आयोजन, कवि सम्मेलन यहां की परम्परा रही है। हिंदुस्तानी अकादमी, राष्ट्रीय संग्रहालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसी जगहों पर यह आयोजन लगातार होते रहते थे। इन सरकारी संस्थाओं में खुली गोष्ठियों की परंपरा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे में व्यक्तिगत प्रयासों के द्वारा बाल भारती स्कूल, एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज, गांधी संस्थान, रूहे अंजुमन जैसी जगहों पर अब ये आयोजन किए जाते हैं।  घर गोष्ठी ऐसे आयोजनों की रीढ़ रही है जहां पर रचनाओं पर स्वस्थ बहस की एक संस्कृति विकसित हुई।  जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संगठन के द्वारा यह रचनात्मक सक्रियता लगातार जारी है। जनवादी लेखक संघ के वर्तमान सचिव बसंत त्रिपाठी ने जनवादी लेखक संघ की सक्रियता को फिर एक नया आयाम दिया है। हाल ही में जनवादी लेखक संघ ने युवा कवि संजीव कौशल के कविता पाठ और उन पर बातचीत का आयोजन 4 मई 2026 को बाल भारती स्कूल में किया। संजीव...

रोक़ डाल्टन की कविताएं:

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Roque Dalton रोके एंटोनियो डाल्टन गार्सिया सल्वाडोरियन कवि, निबंधकार, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी थे। रोके डाल्टन नाम से वे अधिक प्रख्यात थे। लैटिन अमेरिका के सबसे प्रभावशाली कवियों में उनका नाम अग्रणी है। एल साल्वाडोर (स्पैनिश:República de El Salvador) मध्य अमेरिका में स्थित सबसे छोटा और सबसे सघन आबादी वाला देश है।  मार्क्सवादी-लेनिनवादी होने के नाते, वे 1957 में अल सल्वाडोर की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और उसी वर्ष सोवियत संघ का दौरा किया। बाद में, जोस मारिया लेमस के राष्ट्रपति काल के दौरान विद्रोह भड़काने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कारावास से छूटने के बाद, डाल्टन क्यूबा में निर्वासन में रहे, जहाँ उन्होंने एक लेखक के रूप में अपना करियर विकसित किया और उनकी अधिकांश कविताएँ प्रकाशित हुईं। बाद में उन्होंने प्राग स्थित 'द इंटरनेशनल रिव्यू : प्रॉब्लम्स ऑफ पीस एंड सोशलिज्म' के संवाददाता के रूप में कार्य किया और 1969 में अपनी पुस्तक 'टैबर्ना वाई ओट्रोस लुगारेस' के लिए कासा डे लास अमेरिकास कविता पुरस्कार जीता। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डाल...