लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'
लकी राजीव प्रेम मनुष्य के अंतरतम की गहन अनुभूति है। यह किसी भी तरह के बन्धन को स्वीकार करने से इनकार कर देता है। जाति, धर्म हो या उम्र प्रेम के लिए ये कभी सीमाएँ नहीं बना पाते। लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता' में यह प्रेम नायक को सहज ही कुछ इस तरह अपने आगोश में ले लेता है कि वह पारोमिता को अपने नजदीक महसूस करने लगता है। लेकिन उसकी उम्र उसे इस राह में आगे बढ़ने से रोकती है। इस कहानी में वह सहज प्रवाह है जो पाठकों को लगातार बाँधे रखता है। यह कहानी 'अन्विति' के कहानी विशेषांक से साभार ली गई है और लेखिका को 'सविता कथा सम्मान 2027' के लिए चुना गया है। लेखिका को पहली बार की तरफ से बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'। 'पारोमिता' लकी राजीव आज तीसरे दिन भी काम वाली बाई ने सुबह सुबह फ़ोन करके बता दिया था, "अभी भी फीवर है मेरे को, एडजश करो न आज भी साहब"। एक ये क्रिया 'एडजस्ट' मुझे बहुत अच्छी तरह आती है, इसीलिए अक्सर मुझसे करवा भी ली जाती है। मैंने घड़ी देखी, आठ बज कर पांच मिनट..। डेढ़ घंटे में...