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श्री नरेश मेहता के खण्डकाव्य 'महाप्रस्थान' की भूमिका

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श्री नरेश मेहता दूसरे सप्तक के कवि श्री नरेश मेहता की ख्याति ऐसे रचनाकारों में है जो भारतीय संस्कृति, परम्परा और मिथकों के हवाले से भारतीयता की बात करते हैं। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में लिखने वाले कवि नरेश जी का गद्य अनुभवजनित होने के नाते बेजोड़ है।  युवा कवि आशुतोष प्रसिद्ध गंभीर अध्येता हैं। हाल ही में अपनी फेसबुक वॉल पर उन्होंने यह टिप्पणी की थी " श्री नरेश मेहता के खण्डकाव्य 'महाप्रस्थान' की भूमिका कई कई बार पढ़ी जानी चाहिए। विवेचना, विचार, शब्द-शिल्प, इतिहास, ऐतिहासिक, संस्कृति, परम्परा, शैथिल्य में चलने की गरिमा और यह जानने के लिए की कला का और गद्य का उत्कर्ष कैसा हो सकता है।" आशुतोष से जब पहली बार के लिए यह उपलब्ध कराने का जिक्र किया तो उन्होंने भूमिका उपलब्ध कराने का श्रमसाध्य कार्य त्वरित गति से किया। इसके लिए हम आशुतोष के आभारी हैं। भारतीय मिथकीय परम्परा और जीवन दृष्टि को जानने के लिए नरेश जी का यह आलेख इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि आज सन्दर्भों को विकृत कर प्रस्तुत करने का सिलसिला चल पड़ा है।  तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  श्री नरेश मेहता के खण्डकाव्य 'म...

विजय शंकर चतुर्वेदी की कविताएँ

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विजय शंकर चतुर्वेदी  राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिकल्पनाएं भले ही हमें आकृष्ट करती हों, लेकिन यह एक ऐसी निर्मिति है जो हमें मनुष्य और मनुष्यता के स्तर पर  सीमित करती है। राष्ट्रवाद शासकों के हित साधन का भी एक टूल है जिसका उपयोग वे प्रायः अपने हित साधन के लिए किया करते हैं। एक नवजात बच्चे के लिए जाति, धर्म, भाषा की तरह राष्ट्रवाद भी किसी काम का नहीं। जैसे जैसे वह बड़ा होता है वैसे वैसे ये संस्थाएँ उसके अंदर रूढ़िबद्ध होती हैं और उसे सीमित करती हैं। उपनिवेशवादी ताकतें जब भी किसी क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाती थीं तो उनका सबसे पहला निशाना वहां की अर्थव्यवस्था और संस्कृति ही बनती थी। यह यूं ही नहीं है कि लैटिन अमरीका, दक्षिण अमरीका के साथ साथ कई ऐसे मुल्क हैं जिनकी अपनी स्थानीय भाषा और संस्कृति पूरी तरह नष्ट हो गई और वे अपने उस देश की भाषा और संस्कृति का अनुसरण करने लगे जिसने कभी वहां कब्जा जमाया था। गुरुदेव का यह मानना था, "जब तक इस संसार में राष्ट्रों का बोलबाला रहेगा, तब तक हमारे पास अपनी उच्चतर मानवता को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का विकल्प नहीं होगा।" यह उच्चतर मानवता सार्वभौमि...