संदेश

भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 'धूप है कि मोह की आँखमिचौली'

चित्र
भरत प्रसाद  प्रकृति का अपना एक अलग मौसम चक्र हुआ करता है। भारत इस मामले में एक समृद्ध देश है जहां अलग अलग मौसम एकरसता को तोड़ते हुए जीवन को थोड़ा सरस बना देते हैं। सावन का महीना सारे महीनों से न्यारा होता है। बारिश की फुहारें एक तरफ जहां गर्मी से निजात दिलाती हैं वहीं दूसरी तरफ गुनगुने ठण्ड के मौसम का बीज बो देती हैं। धरती चारों तरफ शस्य श्यामला नजर आने लगती है। खेतों में धान की रोपाई बनिहारिनों के सुमधुर लोकगीतों के साथ आरम्भ हो जाती है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास 'कालकलौटी' के प्रारम्भ में कुदरत के इस खूबसूरत नज़ारे का शब्द चित्र बनाते हैं। आजकल हर महीने के दूसरे रविवार को हम भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का धारावाहिक रूप से प्रकाशन कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का चौथा अंश। उपन्यास अंश 4 : कालकलौटी         'धूप है कि मोह की आँखमिचौली' भरत प्रसाद  धूप मीठी कि छाया? बारिश में भीगना मोहक कि नदी में कूद जाना? बादलों की उमड़-घुमड़ जादुई या उनकी दिशा भेदी गर्जना? टिप-टिप बारिश का संगीत मादक या वर्षा की...

अखिलेश कुमार शंखधर का आलेख 'मणिपुर की ‘महिप पत्रिका’ का साहित्यिक अवदान'

चित्र
किसी भी साहित्यिक पत्रिका का मुख्य उद्देश्य साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं को प्रकाशित करने के साथ साथ स्थानीय रचनाशीलता को बढ़ावा देना भी होता है। गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका निकलना तमाम चुनौतियों से भरा होता है। लेकिन कुछ पत्रिकाओं ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है। महिप ऐसी ही पत्रिका है जिसका प्रकाशन मणिपुर की प्रतिष्ठित स्वैच्छिक हिंदी संस्था ‘मणिपुर हिंदी परिषद्’ द्वारा किया जाता है। अखिलेश शंखधर लिखते हैं - "  ‘महिप पत्रिका’ ने हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवियों और रचनाकारों पर बेहतरीन सामग्री तो प्रस्तुत की ही है, साथ ही इस पत्रिका ने अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से हिंदी के पाठकों को परिचित कराने के उद्देश्य से ही मणिपुरी के अनेक रचनाकारों पर केंद्रित अंक निकाले हैं। साथ ही साथ मणिपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं के विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं को भी पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। महिप पत्रिका ने आरंभ से ही मणिपुरी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य को अनुवाद के माध्यम से व्यापक पाठक जगत् के सम...

रबीन्द्रनाथ ठाकुर के मृत्यु-गीत

चित्र
रबींद्र नाथ ठाकुर  जीवन के प्रारम्भ से ही मृत्यु दार्शनिकों, कवियों के लिए चिन्तन का विषय रही है। जहाँ जीवन है वहाँ मृत्यु अवश्यंभावी है। हिन्दू संस्कारों में मृत्यु को भी अन्तिम संस्कार के रूप में शामिल किया गया है। यक्ष के एक सवाल के जवाब में युधिष्ठिर ने बताया था कि मृत्यु अवश्यंभावी है, तब भी मनुष्य जीवन जीने की कामना में लगातार लगा रहता है। यह सबसे बड़ा आश्चर्य है। जयश्री पुरवार लिखती हैं 'रबीन्द्र नाथ विश्व साहित्य के एक ऐसे साहित्यकार थे जिनकी लेखनी से मानव जीवन दर्शन का कोई विषय नहीं अछूता नहीं रहा। किशोर कवि को मृत्यु प्रिय लगती है। मरण से कौन नहीं डरता। पर कवि के लिए तो मरण अपने प्रिय के समान है। जितना प्रिय राधा को श्याम है उतना ही प्रिय कवि को मरण। मृत्यु पर कवि के विचारों का भाव हमें आकर्षित करता है। कवि कहते है, "यदि आप जीवन को सत्य के रूप में जानना चाहते हैं, तो आपको मृत्यु के माध्यम से इसकी पहचान ढूंढनी होगी। जो व्यक्ति मृत्यु से भय खाता है और जीवन में अटका रहता है, उसे जीवन नहीं मिलता क्योंकि उसके मन में परलोक के प्रति उचित सम्मान नहीं है। जो मनुष्य मृत्य...

निहाल सिंह की कविताएं

चित्र
निहाल सिंह पिता का अपनी संतान से प्रेम दुनिया का पवित्रतम प्रेम होता है। पिता खुद सारी तकलीफें सहन कर अपनी सन्तान को दुनिया के सारे सुख उपलब्ध करा देना चाहता है। उसे नहीं पता कि उसकी सन्तान भविष्य में उसके साथ कैसा बर्ताव करेगी लेकिन आमतौर पर पिता को इस बात की कोई परवाह नहीं होती। सामान्यतया हम इस लगाव को अनुभूत कर पाने में सक्षम नहीं होते। लेकिन एक दिन जब वही सन्तान खुद पिता बनती है, तब पिता पुत्र के बीच के प्रेम को और अनुभूतियों का अहसास करती है। कवि निहाल सिंह इन अहसासों को जीते हुए उसे अपनी कविता में खूबसूरती से उतारते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं निहाल सिंह की कविताएँ। निहाल सिंह की कविताएं  साॅंझ ढलते ही  साॅंझ ढलते ही चरवाहे घेर लेते है भेड़ों को  पहाड़ों की ओट में जल्दी ही छुप जाता है सूरज वादियों में दिन कब ढल जाए  पता नही चलता कब बादल बरसने लगे, कब बिजली चमकने लगे, कब खिसकने लगे पहाड़  वहां न रेल की सीटी  बजती है  न बस का हॉर्न सुनाई  पड़ता है  वो तो भेड़ें समझ जाती है  साॅंझ की आहट  बजाने लगती है घुंघरू  जो प...