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अजय तिवारी का व्याख्यान 'धूमिल की रचना-दृष्टि और संवेदना'

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धूमिल भारत की आजादी के लिए हमारे पुरखों ने जो सपना देखा था उसमें एक ऐसा भारत था जिसमें सभी समान हों। सभी का जीवन खुशहाल हो। इस आज़ादी के  साथ स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता की बहुत सी उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। लेकिन आजादी मिलने के पश्चात इस जनता की उम्मीद पर तुषारापात हुआ। भ्रष्ट प्रशासन की वजह से जनता का जीवन यथावत बना रहा। ऐसी स्थिति में रचनाकारों ने इस स्थिति पर अपनी कलम चलाई और इस स्थिति की कड़ी आलोचना की। धूमिल ऐसे रचनाकारों में अग्रणी थे जिन्होंने इस स्थिति पर यादगार कविताएं लिखी। ये कविताएं जनता में काफी लोकप्रिय भी हुईं। अपने एक व्याख्यान में वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी कहते हैं 'धूमिल की प्रतिनिधि पहचान जिन कविताओं से बनी, उनमें एक है—‘आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है।’ सैंतालीस में आज़ादी जिन सपनों के साथ आई थी, वे सपने नहीं रह गए थे। उन सपनों की जगह रंग बुझ गए थे। थके हुए थे, सारे सपने टूट गए थे।  यह अनुभव जिस कविता में है, उसका शीर्षक है—‘बीस साल बाद’। इस थकान से पहले वह ऊब है, ‘जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रुरत होती है!’ स्पष्टतः इस मोहभंग की मानसिकता से धूमिल का बड़ा ...

चारु गुप्ता का आलेख 'सुमित सरकार (1939–2026): भारतीय इतिहासकारों के इतिहासकार'

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सुमित सरकार  इतिहास लेखन ढर्रे से अलग भी हो सकता है। राजनीति से अलग हट कर भी इसके कई आयाम हैं। इतिहास लेखन को जिन इतिहासकारों ने एक नई दिशा प्रदान की उसमें सुमित सरकार का नाम अग्रणी है। सरकार ने वर्ग, जाति, लैंगिकता और जन-राजनीति को ऐतिहासिक आख्यान का हिस्सा बना कर आधुनिक भारत के अध्ययन को नई दिशा देने का सफल प्रयास किया। एक शिक्षक के तौर पर अपने विद्यार्थियों को उन्होंने इतिहास की जटिलताओं के प्रति खुले मन से विचार करना  और पीढ़ियों के विद्यार्थियों को सहज और निश्चित निष्कर्षों पर प्रश्न उठाना सिखाया। उनकी पुस्तक  'Modern India' इतिहास पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए एक जरूरी किताब है।  चारु गुप्ता अपने आलेख में लिखती हैं 'Modern India' किसी भी मायने में सामान्य पाठ्यपुस्तक नहीं थी। कांग्रेस के प्रस्ताव और संवैधानिक समझौते महत्त्वपूर्ण बने रहे, लेकिन उनके साथ-साथ किसान, मजदूर, आदिवासी, निम्न-मध्यवर्गीय कार्यकर्ता, जाति-आधारित आंदोलन, क्षेत्रीय संघर्ष और गुमनाम जनसमूह भी इतिहास में दिखाई देने लगे। राष्ट्रवाद अब केवल यह नहीं रह गया था कि राष्ट्रीय नेताओं ने क्या कहा य...

श्रीधर मिश्र की कविताएं

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श्रीधर मिश्र  किताबें मनुष्य को सभ्य बनाती हैं। किताबें मनुष्य को वह जानकारियां प्रदान करती हैं जो उसे अपने समय और समाज के प्रति जागरूक करती हैं। किताबें बताती हैं कि अतीत में हमसे किस तरह की चूक हुई और किस तरह हम अपने भविष्य को बेहतर बना सकते हैं। साहित्य हो या ज्ञान विज्ञान किताबों के मार्फ़त ही हम जानकारियाँ प्राप्त करते हैं। छापेख़ाने की खोज ने मनुष्य के जीवन को बदल कर रख दिया था और सही मायने में दुनिया ने तभी आधुनिक युग में प्रवेश किया था। लोगों ने धर्म की आंतरिक दिक्कतों को पहली बार जाना समझा था। श्रीधर मिश्र अपनी कविता में लिखते हैं 'इसमें कुछ दूरदर्शी लोगों का जिक्र है/ जिन्होंने टूटती जमीन की जगह/ आसमान की फ़िक्र की।/ कुछ ने चट्टान के बचाव में/ नदी के जल पर हथौड़े चलाये।' कवि किताबों की ताकत से परिचित है और उन किताबों के उ। आयामों से भी जिनकी इस दुनिया को बेहतर बनाने में भूमिका है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं श्रीधर मिश्र की कविताएं।  श्रीधर मिश्र की कविताएं  यह किताब यह एक जादुई किताब है जहाँ से भी पढ़ना शुरू करें एक नई कहानी खड़ी हो जाती है। कई दस्तावेज हैं जिन्...

कर्मेंदु शिशिर का आलेख 'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा'

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अवधेश प्रधान  परम्परा और आधुनिकता आम तौर पर एक दूसरे के विरोधाभासी लगते हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं। परम्परा में सारी बातें गलत हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसी तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि आधुनिकता में भी सारी बातें सही हैं। अवधेश प्रधान अपने लेखन में इस परम्परा और आधुनिकता की पड़ताल करते हुए ऐसे तथ्य सामने रखते हैं जो तर्कपूर्ण लगते हैं। वे नवजागरण के महत्त्व को समझने की जरूरत पर बल देते हैं। वह नवजागरण जिसने सही मायनों में भारतीयों के अन्दर आधुनिक विचारों का बीजारोपण किया। इस नवजागरण ने भारतीयों को अपने भीतर झाँकने की दृष्टि प्रदान की। इसी क्रम में वे स्वामी विवेकानंद के अवदान को विस्तार से रेखांकित करते हैं। वे आध्यात्मिकता के उन परतों को भी बेहिचक रेखांकित करते हैं जो मानवीय मूल्यों का पक्षधर है। उनके लेखन को आधार बना कर कर्मेंदु शिशिर ने वर्तमान साहित्य पत्रिका के नवंबर 2024 जुलाई 2026 के संयुक्तांक में एक विस्तृत आलेख लिखा है। यह आलेख इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि समकालीन दो विद्वान लेखक एक दूसरे के बारे में कितना जानते समझते हैं और अपने समकालिक शख्सियत पर  किस तरह लिखा जान...