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हेरम्ब चतुर्वेदी का आलेख 'भारतीय पत्रकारिता और राष्ट्र प्रेम : 'स्वराज्य' का आत्मोत्सर्ग उत्सव!'

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भारतीय इतिहास को उसकी संस्कृति के बिना संपूर्णता में  जाना  समझा  नहीं जा सकता। वैसे भी इतिहास के अनेकानेक आयाम होते हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इतिहास और संस्कृति एक दूसरे से कुछ इस तरह नाभिनालबद्ध हैं कि एक दूसरे को अलग कर उन्हें समझा ही नहीं जा सकता। प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने इतिहास को उसके विविध आयामों के साथ जानने समझने की कोशिश की है। राष्ट्रवाद के उदय के पश्चात भारतीय इतिहास का एक नया दौर आरंभ होता है। इस राष्ट्रवाद को विकसित करने में पत्र पत्रिकाओं का अहम योगदान था। इन पत्र पत्रिकाओं में एक सम्मानित नाम है 'स्वराज्य' का। इस समाचार पत्रिका के सन्दर्भ में 'रौलेट समिति' की रिपोर्ट में लिखा गया है कि 'संयुक्त प्रान्त जैसे शांतिप्रिय प्रान्तों में भी क्रान्ति के बीजारोपण का प्रथम सुनियोजित एवं निष्ठापूर्वक प्रयास नवम्बर 1907 से 'स्वराज्य' समाचार पत्रिका के प्रकाशन के माध्यम से हुआ।' हेरंब चतुर्वेदी लिखते हैं 'सिर्फ ढाई वर्ष की अल्पावधि (1907 से 1910) में इसके मात्र 75 अंक प्रकाशित हुए और इसके सभी सम्पादक एक-एक करके पकड़े गये और इन्ह...

विभूति तिवारी की कविताएँ

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विभूति तिवारी कवि परिचय विभूति तिवारी  शिक्षिका (प्राचार्य) म. प्र. स्कूल शिक्षा विभाग  उत्तर स्नातक - रसायनशास्त्र  साहित्यिक परिचय  कविता, गीत, नवगीत लेखन  मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन इकाई ब्योहारी की सचिव  वातायन प्रत्यूषा अलंकरण से सम्मानित  मानव शरीर में मस्तिष्क की विशिष्ट भूमिका होती है। शरीर का संचालन, विचार, जान पहचान, प्रेम, नफरत जैसे जितने भी भाव हैं सब इस मस्तिष्क की बदौलत ही हैं। किसी वजह से मस्तिष्क अगर अपना सन्तुलन खो देता है तो व्यक्ति मनोरोगी हो जाता है। उसे खुद अपनी सुध बुध नहीं रहती। वह पहचान तक नहीं पाता। लोग ऐसे व्यक्ति को पागल की संज्ञा देने लगते हैं। कवि विभूति तिवारी अपनी कविता 'मानसिक रोगी' में लिखती हैं : 'लोग कहते हैं ...पागल) पर कौन पूछता है/ उसके अंदर की दुनिया कितनी टूटी है?/ कितनी रातें उसने बिना नींद के बिताई हैं,/ कितनी आशाएँ उसने खून की तरह बहा दी'। कवि उसे एक मनुष्य की तरह देखती हैं और उस संवेदना की तलाश करती हैं जो अब धीरे धीरे दुर्लभ होता जा रहा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विभूति तिवारी की कविताएँ। हमे...

परांस 11 शेख़ मोहम्मद कल्याण की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  हर नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए पहली तारीख़ एक उम्मीद का दिन होता है। आमतौर पर यह वेतन का मिलने का दिन होता है। यह घर परिवार सबकी उम्मीदों का दिन होता है। लेकिन इसके बाद कृष्ण पक्ष के चाँद की तरह यह आमदनी लगातार छिजती चली जाती है और अन्ततः एक दिन ऐसा आता है जब पूरा परिवार एक तारीख की तरफ अपनी उम्मीदें लिए बेसब्री से ताकने लगता है। अरसा पहले रेडियो सिलोन पर हर महीने की पहली तारीख को किशोर कुमार द्वारा फिल्म 'पहली तारीख' का गाया गया एक गाना जरूर बजाया जाता था 'दिन है सुहाना, आज पहली तारीख है/ दिन है सुहाना आज पहली तारीख है/ ख़ुश है ज़माना, आज पहली तारीख है/ पहली तारीख अजी, पहली तारीख है।' उन दिनों वेतन नकद मिलता था। और इस नकद वेतन में तमाम के सपने समाहित होते थे। गीत की अगली पंक्तियों से आप सारा माजरा समझ सकते हैं। 'बीवी बोली घर जरा जल्दी से आना/ आज शाम को पिया जी हमें सिनेमा दिखाना/ हमें सिनेमा दिखाना/ करो ना बहाना, हां बहाना बहाना/ करो ना बहाना, आज पहली तारीख है'। एक सामान्य मनोरंजन तक के लिए परिवार पहली के इस वेतन पर ही निर्भर होता था। शेख़ मोहम्मद क...