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नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'

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नीरज सिंह  जीवन की बहुत सारी जरूरतें होती हैं। रोजी रोटी की जरूरत इनमें सबसे प्रमुख है। इसके लिए लोग अपना घर बार छोड़ कर देश विदेश चले जाते हैं। इसके लिए व्यक्ति हर समय प्रयत्नशील रहता है। तो क्या मनुष्य जीवन का यही अन्तिम प्राप्य है। नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत' पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि जीवन के लिए यही सब कुछ नहीं है। बल्कि कुछ ऐसी जरूरतें भी हैं जिसे मनुष्य निभाने की कोशिश करता है। अमूर्त होते हुए भी यह जरूरत सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह जरूरत है मनुष्यता। जिसके लिए मनुष्य स्वतः स्फूर्त तरीके से उठ खड़ा होता है। मनुष्यता की इस भावना ने ही तो मनुष्य को इस पृथिवी का सबसे बुद्धिमान और संवेदनशील प्राणी बनाया है। वासुदेव केवट अपनी नाव को अच्छे खासे रुपयों में रिजर्व कर ले जा रहा होता है कि तभी एक कारुणिक आवाज सुन कर अपनी आत्मा की आवाज पर पीछे लौटने का निर्णय लेता है। उसे महसूस होता है कि रमेसरा बहू, जिसकी तबियत बहुत खराब है को यथाशीघ्र अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। और यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत थी। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'। 'जरूरत' ...

हितेन्द्र पटेल का आलेख 'सुमित सरकार (1939-2026) का जाना'

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  सुमित सरकार  किसी भी समय के इतिहास को समझने में इतिहासकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पढ़ने पढ़ाने के क्रम में हम किन इतिहासकारों की किताबों से हो कर गुजर रहे हैं, यह बात बहुत मायने रखती है। आधुनिक इतिहास को जानने समझने के लिए एक दौर में सुमित सरकार, विपन चन्द्र, सब्यसाची भट्टाचार्य, रजनी पाम दत्त की किताबें आवश्यक होती थीं। बेहतर समझ के लिए आज भी इन किताबों की अपनी भूमिका है। इन सबमें सुमित सरकार की किताब और किताबों से अलग थी। पहली बार पढ़ते हुए यह बोझिल सी लगी। आज इसे महसूस कर रहा हूं क्योंकि हम एक खास किस्म का इतिहास पढ़ने के अभ्यस्त थे जबकि सुमित सरकार एक अलग तरह का इतिहास लिख रहे थे जिसमें राजनीतिक परिस्थितियों को सामाजिक इतिहास के जरिए जानने समझने और विश्लेषण पर जोर था। लीक से अलग हट कर नई बातों से हो कर गुजरते हुए ये दिक्कतें आती हैं। इस बात में कोई संशय नहीं कि सुमित सरकार की Modern India 1885–1947 आज भी एक उम्दा किताब है। उनके पिता सुशोभन सरकार थे जो बीसवीं सदी के बंगाल के असाधारण प्राध्यापक और मार्क्सवादी इतिहासकार थे। पिता का प्रभाव उनके व्यक्तित्व और लेखन पर ...

स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'देवरिया के दिन'

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स्वप्निल श्रीवास्तव  महानगरों से जुड़े जनपदों की मुसीबत यह होती है कि उनका उतना विकास नहीं हो पाता जितना होना चाहिए था। गोरखपुर के पड़ोसी देवरिया ऐसा ही जनपद है। देवरिया मूलतः एक कस्बाई शहर है। जनपद के दूर दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोगों की वजह से यह गुलजार रहता है। देवरिया भोजपुरी भाषाभाषी जिला है। यहां लोगों का लोकप्रिय भोजन लिट्टी चोखा है। साहित्यिक हलकों में भी मोतीराम बी ए, शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी, ध्रुवदेव मिश्र पाषाण जैसे प्रमुख रचनाकारों ने इसे केन्द्र में बनाए रखा। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव अपनी रोजी रोटी के क्रम मे कुछ दिन देवरिया में भी पदस्थापित रहे। आजकल वे उन शहरों के बारे में तफसील से लिख रहे हैं। इस बार उन्होंने  देवरिया की यादों को स्मृतिबद्ध किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'देवरिया के दिन'। 'देवरिया के दिन'  स्वप्निल श्रीवास्तव  वे शहर मुझे बहुत अच्छे लगते है खासकर वे  शहर जो शहर होने की प्रक्रिया में होते है उसमें लोकगंध बची रहती है। शहर के चारों तरफ गाँव की आबादी हो और गाँव के लोगों का शहर में आ...