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साइना लोफी की कविताएं

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  साइना लोफी साइना लोफी (Gcina Mhlophe)  साइना लोफी दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद  कार्यकर्ता, अभिनेत्री, कहानीकार, नाटककार और कवयित्री हैं। उनका जन्म 1958 में नाटाल में हुआ था और वे एक होसा माता और जुलू पिता की संतान हैं। उन्होंने अपना कार्यकारी जीवन एक घरेलू नौकर के रूप में प्रारम्भ किया फिर वे प्रेस ट्रस्ट और बी बी सी के लिए समाचार वाचक रहीं। फिर उन्होंने ‘लर्न एंड टीच’ पत्रिका में लेखन का कार्य किया। वर्तमान में वे The International Association for Theatre for Children and Young People के संरक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उनकी कहानियों, नाटकों और कविताओं की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने अनेक फिल्मों में काम किया है और अनेक फिल्मों का निर्देशन किया है। उन्हें मुक्त विश्वविद्यालय, इंग्लैंड, नाटाल विश्वविद्यालय और रोड्स विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया है।  अपने लेखन और अफ़्रीकी महिलाओं की आधुनिक विश्व में भूमिका के सम्बन्ध में  हार्वर्ड क्रिमसन को दिए गए एक साक्षात्कार में वे कहती हैं कि “इससे मुझे निश्चय ही अच्छी अनुभू...

उमा चक्रवर्ती का आलेख 'सीता के मिथक का विकास : मिथक और साहित्य में महिलाएँ'

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उमा चक्रवर्ती  भारतीय परम्परा में उन पंच कन्याओं का जिक्र मिलता है जो प्रातः स्मरणीय मानी जाती हैं। : 'अहल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा।/ पञ्चकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्॥' इन पंच कन्याओं में सीता का नाम नहीं आता। हालांकि भारतीय नारियों के आदर्श में सीता का नाम अग्रणी है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में राज्य की निजी भूमि को सीता कहा जाता था। यह भूमि उपजाऊ होती थी। सीता का जन्म भी धरती से ही हुआ और वे अन्ततः धरती में ही समाहित हो गईं। विवाह के बाद सीता ने पति राम के साथ वनवास जाने का निर्णय लिया। जंगल की दिक्कतें उन्हें बताई गईं लेकिन वे अपने इरादे पर दृढ़ बनी रहीं। आगे चल कर उनके जीवन में एक बड़ी त्रासदी तब आई जब लंकाधिपति रावण ने उनका अपहरण कर लिया। राम ने सीता की वापसी के लिए युद्ध किया। सीता राम को मिलीं। लेकिन उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। राम, सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे। लेकिन मात्र एक लांछन के आधार पर सीता को फिर जंगल भेज दिया गया। इस तरह देखें तो सीता का समूचा जीवन ही त्रासदी से परिपूर्ण था। मिथकों का प्रयोग इतिहास लेखन में सतर्कता के साथ करना होता ह...

कैलाश बनवासी की कहानी 'बाजार में रामधन'

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कैलाश बनवासी  कृषि के मशीनीकरण ने आज भले ही बैलों को अनुपयोगी बना दिया हो लेकिन एक जमाना हुआ करता था जब किसान की निधि उनके बैल ही हुआ करते थे। यह मात्र पशु नहीं बल्कि परिवार का सदस्य सरीखा होता था। हालांकि किसानों की स्थिति बत्तीस दातों के बीच जीभ सरीखी होती। किसान की स्थिति अपने घर में भी असहज ही होती। नई पीढ़ी को हल, बैल सब बोझिल लगते और वह आधुनिकता से प्रभावित हो अपना अतीत तक भूलने के लिए तैयार हो जाती। पुरातन आदर्शों से उसका कुछ भी लेना देना नहीं होता। रामधन का छोटा भाई मुन्ना बैलों को बेचने के पीछे का तर्क देते हुए कहता है :  "आखिर ये दिन भर यहाँ बेकार में बँधे ही तो रहते हैं। खेती-किसानी के दिन छोड़ कर और कब काम आते हैं? यहाँ खा-खा कर मुटा रहे हैं ये!"  रामधन अपने ही भाई मुन्ना को समझा नहीं पा रहा था। वह समझा भी नहीं सकता था। अब कैसे समझाता इस बात को कि बैल हमारे घर की इज्जत है... घर की शोभा है। और इससे बढ़ कर हमारे पिता की धरोहर है। उस किसान का भी कोई मान है समाज में, जिसके घर एक जोड़ी बैल नहीं हैं! कैसे समझाता कि हमारे साथ रहते-रहते ये भी घर के सदस्य हो गये हैं। ज...