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यादवेन्द्र का आलेख 'देखने में सिर्फ़ वस्तु नहीं शामिल होती'

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यादवेन्द्र  देखना मनुष्य द्वारा बरती जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। देखने से हम कई चीजें अनुभूत करते हैं और उसे अपनी बातों या रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के देखने का तरीका ही वासनमय हो तो क्या किया जा सकता है। खासकर स्त्री के सन्दर्भ में परंपरागत सोच आज भी दकियानूसी बनी हुई है। स्त्री की कोई भी तस्वीर देख कर सस्ती सी टिप्पणी कर देना ऐसे लोगों के लिए आज आम है। ऐसे लोगों के लिए राजा रवि वर्मा की पेंटिंग अनावृत स्त्री को समझ पाना उनके समझ के बाहर की बात है। जिसके दिल दिमाग में वासना ही भरी हुई हो वह स्त्री सौंदर्य, स्त्री वस्त्रों या साज सिंगार के बारे में क्या सोचेगा या क्या बात करेगा? मधुसूदन आनन्द की कहानी 'देखना' के बहाने यादवेन्द्र जी ने अपने आलेख में इसी पहलू पर कुछ गम्भीर विमर्श प्रस्तुत किया है। आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण रचना को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। कतिपय कारणों से पिछले महीने हम यह कॉलम प्रस...

रवि रंजन का आलेख 'सत्ता, स्मृति और संवेदना: दीप्ति कुशवाह के रंग विमर्श का समाजशास्त्रीय एवं सौन्दर्यशास्त्रीय मानचित्र'

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दीप्ति कुशवाह रंग जीवन को एक अलग अर्थ प्रदान करते हैं। अलग अलग रंगों की अलग अलग अर्थ छटा होती है। इंद्रधनुषी आभा से भरा सूर्य जीवन को अर्थवान बना देता है। रंगों के बिना दुनिया की कल्पना ही नहीं की जा सकती। और जब ये रंग किसी कवि की कविता में आते हैं तो इनके अर्थ कुछ और ही हो जाते हैं। दीप्ति कुशवाह की कविताओं में ये रंग अपने अर्थों में मुखर हो उठते हैं। इस तरह दीप्ति की कविताओं में रंग महज सौंदर्यपरक अवयव न रह कर सामाजिक संरचनाओं, वर्गीय चेतना और स्त्री-अस्तित्व के द्वंद्वों के व्याख्याकार बन जाते हैं। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन दीप्ति की इन कविताओं के रंगों की तहकीकात करते हुए लिखते हैं "दीप्ति की इन कविताओं का चित्रकला से संबंध मात्र विषयगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक और संवेदनात्मक भी है, जहाँ शब्द कैनवास पर रंगों की परतों की तरह बिछते चले गए हैं। पूरी काव्य-श्रृंखला एक 'कलर पैलेट' की तरह काम करती है, जहाँ हर कविता एक स्वतंत्र चित्र है, फिर भी वे एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। कवयित्री ने जिस प्रकार पीले रंग को 'स्वर्ण के स्वप्न', 'हल्दी की थाली' और 'अमलतास के भरेप...

रामजी तिवारी का यात्रा वृत्तांत 'सुदूर पूर्वोत्तर से'

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  रामजी तिवारी  'सेवेन सिस्टर्स' भारत का वह क्षेत्र है, जहां आज भी प्रकृति अपने वास्तविक स्वरूप में दिख जाती है। वैसे भी पर्यटकों का आकर्षण जम्मू कश्मीर, राजस्थान या दक्षिण के राज्य होते हैं। लेकिन पूर्वोत्तर आज भी इस आकर्षण से थोड़ा बचा हुआ है। रामजी तिवारी पर्यावरण की दृष्टि से अगर पूर्वोत्तर को भारत का फेफड़ा कहते हैं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं। यायावरी भी एक शगल है। यह सबके बस की बात नहीं। लेकिन रामजी तिवारी तो जैसे यायावरी को जीते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले बुंदेलखंड गए थे, फिर वे पूर्वोत्तर की यात्रा पर चले गए। और आज जब उनकी यह पोस्ट लगा रहा हूं, वे तमिलनाडु घूम रहे हैं। घर, परिवार और नौकरी के साथ वे यायावरी का सन्तुलन सहज ही स्थापित कर लेते हैं। बहरहाल हमने उनसे आग्रह किया कि वे पूर्वोत्तर का यात्रा वृत्तान्त पहली बार के लिए भेजें। थोड़े टाल मटोल के पश्चात उन्होंने आखिरकार यह यात्रा वृत्तान्त हमें उपलब्ध करा दिया। इस वृत्तांत से हमें पूर्वोत्तर के कई ऐसे पहलुओं के बारे में जानकारी मिलती है जो सर्वथा नई हैं। अपने वृत्तांत में रामजी लिखते हैं  "अरुणाचल में प्रव...