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नीरज सिंह की कहानी 'क्यों'

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नीरज सिंह  भारत की समूची सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था की भूमिका अहम रही है। इसने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिदृश्य को तो प्रभावित किया ही, साहित्य को भी गहरे तौर पर प्रभावित किया। लेकिन अर्थव्यवस्था की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। आर्थिक मजबूती समूचे परिदृश्य को बदल कर रख देती है। जातीय संरचना चाहें जितनी मजबूत हो, आर्थिक कारक उस व्यक्ति विशेष को खुद उसके सामाजिक परिवेश से अलग कर देता है। कहा जा सकता है कि पूंजी अपने अंदाज़ में वर्ग का निर्धारण करती है और जातिगत चरित्र को भी बदल देती है। नीरज सिंह की यह कहानी उत्तर भारत की जातीय संरचना को समझने के साथ साथ वर्गीय परिस्थिति का भी विश्लेषण करती है। नीरज सिंह एक समर्थ कहानीकार रहे हैं। सत्तर अस्सी के दशक में इनकी कहानियां खासी चर्चित रही हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'क्यों'। 'क्यों' नीरज सिंह बात तो वैसे कुछ भी नहीं थीं। लेकिन लोगों को तो उसका बतंगड़ बनाना था, बना दिया। हुआ यह कि गंगा मोची का बेटा किरपा अपनी उमर के अन्य लड़कों के साथ गांव के बाहर वाले अखाड़े के पास कंचे खेल रहा था...

स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'यादों के उजाले'

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बशीर बद्र  नामचीन शायर बशीर बद्र नहीं रहे। 28 मई 2026 को बशीर बद्र का इंतकाल हो गया। उनकी दो लाइनें पढ़ कर एक दौर मैं उनका मुरीद बन गया था। लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में  तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में। अपनी कविता की डायरी के पहले पन्ने पर मैंने इसे दर्ज़ किया था। कहीं न कहीं हमारे कवि की निर्मिति में इन दो पंक्तियों का बड़ा प्रभाव रहा है। दरअसल 1987 के मेरठ दंगों में दंगाईयों ने बशीर बद्र का घर आग के हवाले कर दिया। किसी भी घर का जलना सिर्फ एक घर का जलना नहीं होता। उस घर से जुड़ी तमाम स्मृतियां होती हैं। उस घर को बनाने मेंखून पसीने की कमाई लगी होती है। बशीर बद्र के इस घर के जलने के साथ है उसमें उनकी यादें, किताबें, बरसों के लिखे कागज और पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी राख हो गई। वह सदमा उन्हें भीतर तक तोड़ गया। लंबे अरसे तक वे अवसाद में रहे। फिर उन्होंने भोपाल को अपना मुकाम बना लिया और आजीवन वही रहे। तो इन पंक्तियों को लिखने में उनका अपना तिक्त अनुभव था।  बद्र साहब के भतीजे अमीन बताते हैं कि दंगों की आग में उनकी हज़ारों अप्रकाशित पंक्तियाँ भी जल गई थीं। करीब चार से पाँ...

गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास पर सुप्रिया पाठक की समीक्षा 'आउशवित्ज़: प्रेम के एकाकीपन का सामूहिक कोरस'

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द्वितीय विश्वयुद्ध अभी तक के मानव इतिहास सबसे त्रासद युद्ध माना जाता है। इस युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया। उन्हें गैस चैम्बर में डाल कर मार डाला गया।   आउशवित्ज़ (Auschwitz) द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी द्वारा स्थापित सबसे बड़ा और कुख्यात एकाग्रता एवं नरसंहार शिविर (Concentration and Extermination Camp) था। यह नाज़ी-अधिकृत पोलैंड के ओस्विसीम (Oświęcim) शहर में स्थित था। इस शिविर का संचालन 1940 से 1945 के बीच किया गया। एक अनुमान के आधार पर यहाँ 11 लाख से अधिक लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई, जिनमें अधिकांश यहूदी थे। इसके अलावा पोलिश लोग, रोमा (जिप्सी), और सोवियत युद्धबंदी भी शामिल थे।  गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा'  मानव इतिहास के एक क्रूरतम कालखंड यानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्त्रियों के साथ हुई हिंसा की परत-दर-परत पड़ताल है। हिन्दी में युद्ध के दौरान स्त्री हिंसा पर गिनी चुनी रचनाएँ ही आईं हैं और यह उपन्यास इस कमी को अंशत: पूरा करता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि  युद्ध का सबसे ...