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यतीश कुमार की समीक्षा 'जीवन के छायाचित्र श्रृंखला की किताब'

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सामान्य तौर पर जब कविता, कहानी, उपन्यास से साहित्य भरा पड़ा है, उस समय में कथेतर गद्य की साहित्य में अपनी एक अलग भूमिका दिखाई पड़ती है। स्वतन्त्र प्रकाशन के तहत कथेतर गद्य की शृंखला के तहत नौ लेखकों नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, प्रताप सहगल, गिरिश पंकज, मीना झा, विभा रानी, रणविजय राव, डॉ. स्वाति चौधरी एवं संदीप तोमर और सुशील स्वतंत्र की किताबों का प्रकाशन एक नई परिघटना है। हर लेखक ने अपनी किताब में अपनी अनुभूतियों और संवेदनाओं को खुल कर व्यक्त किया है। इस शृंखला की एक किताब सुशील स्वतंत्र की 'इक्कीस मई' की समीक्षा की है कवि कथाकार यतीश कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यतीश कुमार की समीक्षा 'जीवन के छायाचित्र श्रृंखला की किताब'। 'जीवन के छायाचित्र श्रृंखला की किताब' यतीश कुमार पिता को अपने आचरण की उपस्थिति में याद करता पुत्र इस रेखाचित्र में समय की घड़ी को ठीक करते हुए रोटी की पतली पपड़ी को अलग से खाने का ज़िक्र करता है। क्या होते हैं पिता—अबोले हिमोग्लोबिन में लोहा बन जाने वाले या फटकार और दाद का अंतर मिटाने वाले? डॉ. स्वाति चौधरी और संदीप तोमर के संपादन क...

गणेश पाण्डेय की कविताएँ

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गणेश पाण्डेय  गणेश पाण्डेय का संक्षिप्त परिचय: 13 जुलाई 1955 को तेतरी बाजार, सिद्धार्थनगर (तत्कालीन जनपद बस्ती), उत्तर प्रदेश में जन्म। आरंभिक शिक्षा वहीं और आसपास। गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. और यहीं से आठवें दशक की हिन्दी कहानी पर डॉक्टरेट। जीविका की शुरुआत में कुछ वक़्त पत्रकारिता से सम्बद्ध। कुछ समय उद्योग विभाग में सहायक प्रबंधक के रूप में सरकारी नौकरी। सन् 1987 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति, वहीं प्रोफेसर, वहीं से सेवानिवृत्त। साहित्यिक पत्रिका 'यात्रा' का संपादन। इंटरनेट पर अपने ब्लॉग का संचालन। कृतियाँ : अटा पड़ा था दुख का हाट (कविता- संग्रह) जल में (कविता-संग्रह) अथ ऊदल कथा (उपन्यास) पीली पत्तियाँ (कहानी संग्रह) आठवें दशक की हिन्दी कहानी (शोध) रचना, आलोचना और पत्रकारिता (आलोचना), जापानी बुख़ार (कविता-संग्रह), परिणीता (कविता-संग्रह), आलोचना का सच (आलोचना), नयी सदी की कविता (आलोचना), रीफ़ (उपन्यास), आलोचक के नोट्स (आलोचना) एक अछूत कवि की आत्मकथा (कविता-संग्रह)। रिश्तों का जीवन में अपना एक विशिष्ट स्थान होता है...

ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य आलेख 'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'

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ललन चतुर्वेदी  किसी भी पुरुष के लिए जीवन का सुखद क्षण होता है उसका प्रेम में पड़ जाना। लेकिन जो परंपरावादी हैं उनके लिए तो यह प्रेम सारी व्यवस्था को तहस नहस करने वाला होता है। इसलिए प्रेम पर पहरे बिठा दिए जाते हैं। लेकिन प्रेमी भी कम जिद्दी नहीं होते। वे हर रास्ते की काट निकाल लेते हैं और प्रेम की पींगे मारते रहते हैं। कवि ललन चतुर्वेदी अपने व्यंग्य आलेख में लिखते हैं : 'प्रेम कोई हँसी-मजाक या दिल्लगी का विषय नहीं है- यह दिल लगाने का पुनीत काम है। प्रेम और प्यार में थोड़ा-बहुत या यूँ कहें कि मार्जिनल अंतर हो सकता है लेकिन मेरी दृष्टि से दोनों एक ही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। बहुधा ऐसा होता नहीं है। सब कुछ चरणबद्ध तरीके से होता है। मान लीजिए कोई बहुमंजिली इमारत हो और लिफ्ट की व्यवस्था नहीं हो तो सीढ़ियों से ही आप ऊपरी मंजिल तक पहुँच सकते हैं। प्रेम में स्टेप-बाय-स्टेप बढ़ना होता है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य आलेख 'प्रेम सत्याग्रह की विषयवस्तु है'। व्यंग्य                 'प्रेम स...