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परांस 11 शेख़ मोहम्मद कल्याण की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  हर नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए पहली तारीख़ एक उम्मीद का दिन होता है। आमतौर पर यह वेतन का मिलने का दिन होता है। यह घर परिवार सबकी उम्मीदों का दिन होता है। लेकिन इसके बाद कृष्ण पक्ष के चाँद की तरह यह आमदनी लगातार छिजती चली जाती है और अन्ततः एक दिन ऐसा आता है जब पूरा परिवार एक तारीख की तरफ अपनी उम्मीदें लिए बेसब्री से ताकने लगता है। अरसा पहले रेडियो सिलोन पर हर महीने की पहली तारीख को किशोर कुमार द्वारा फिल्म 'पहली तारीख' का गाया गया एक गाना जरूर बजाया जाता था 'दिन है सुहाना, आज पहली तारीख है/ दिन है सुहाना आज पहली तारीख है/ ख़ुश है ज़माना, आज पहली तारीख है/ पहली तारीख अजी, पहली तारीख है।' उन दिनों वेतन नकद मिलता था। और इस नकद वेतन में तमाम के सपने समाहित होते थे। गीत की अगली पंक्तियों से आप सारा माजरा समझ सकते हैं। 'बीवी बोली घर जरा जल्दी से आना/ आज शाम को पिया जी हमें सिनेमा दिखाना/ हमें सिनेमा दिखाना/ करो ना बहाना, हां बहाना बहाना/ करो ना बहाना, आज पहली तारीख है'। एक सामान्य मनोरंजन तक के लिए परिवार पहली के इस वेतन पर ही निर्भर होता था। शेख़ मोहम्मद क...

रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'मातृभाषा : नैसर्गिक विकास का सुंदर द्वार'

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रणविजय सिंह सत्यकेतु  भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ साथ अपने समुदाय के साथ एकजुट होने का भी सशक्त माध्यम भी है। हम अपनी सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति अपनी मातृ भाषा में ही कर सकते हैं। उपनिवेश स्थापना के क्रम में कुछ यूरोपीय देश पहला हमला अधीन देश की भाषा और संस्कृति पर ही करते थे। यही वजह है कि अफ्रीका और दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में अवस्थित अनेक देश अपनी मूल भाषा गँवा कर उसकी जगह यूरोपीय भाषाओं मसलन अंग्रेजी, स्पेनिश, पोर्चुगीज, फ्रेंच और डच का ही प्रयोग करते हैं।  धर्म के आधार पर भले ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ लेकिन भाषा वह कारक बन गई जो अन्ततः उसके विभाजन के रूप में परिणत हुआ। ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 21 फरवरी 1952 में तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषायी नीति का विरोध किया। यह प्रदर्शन अपनी मातृभाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए था। प्रदर्शनकारी बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग कर रहे थे, जिसके बदले में पाकिस्तान की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाई। लेकिन लगातार जारी विरोध के चलते अंत में सरकार को बांग्ला भाषा क...

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'एआई समिट'

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आजकल चारों तरफ ए आई का बोलबाला है। कुछ भी जानना हो तो झट फोन उठा कर ए आई से पूछ लो। कुछ सेकेंडों या मिनटों में तमाम जानकारियां आपके सामने रख देगा। क्रिकेट खेलना हो या बच्चों को पालना हो तब भी  ए आई ही बताएगा या सिखाएगा। सवाल वही है कि हम किस कदर तकनीक के गुलाम होना चाहते हैं? मोबाइल ने पहले ही बहुत कुछ वारा न्यारा कर रखा है। अब हमें अपने प्रिय जनों के मोबाइल नंबर भी याद नहीं होते। गिनती, पहाड़ा, जोड़, घटाना सबके लिए मोबाइल। यानी अब बच्चों को पहाड़ा रटने की कोई जरूरत नहीं। कहीं जाना हो तो गूगल मैप लगा लो। राहगीर बन कर पूछने का काम कौन करेगा? यानी सब कुछ खत्म सा होता जा रहा है। तो क्या  ए आई मानवीय संवेदना या भावनाओं की जगह ले सकेगा? कत्तई नहीं। फिर हम  ए आई को इतना महत्त्व क्यों दे रहे हैं। तकनीक की हमारे जीवन में कहीं इतनी अधिक दखलंदाजी न बढ़ जाए कि वापस लौट पाने की राह भी न बचे।  आजकल नई दिल्ली के भारत मंडपम में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का आयोजन हो रहा है जिसमें दुनिया के सौ से अधिक देश हिस्सेदारी कर रहे हैं। प्रचण्ड प्रवीर भी इस समिट में गए थे। इस विषय पर कल क...