प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की फिल्म समीक्षा “मैं वापस आऊँगा : विभाजन की स्मृति, प्रेम की प्रतीक्षा”
संचार के सशक्त माध्यम के रूप में सिनेमा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दुनिया भर में जनमानस को प्रभावित करने में फिल्मों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। भारतीय सन्दर्भ में फिल्मों के प्रति लोगों की दीवानगी कुछ अधिक ही रही है जिसकी तस्दीक सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, निर्माता निर्देशकों, गायक गायिकाओं की लोकप्रियता से की जा सकती है। लेकिन इसका एक दूसरा भी पक्ष है जो चिंताजनक है। आजकल बदले हुए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में हमारे यहाँ ऐसी प्रोपेगेंडा फिल्में बनाई जा रही हैं जो तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का काम कर रही हैं। इन फिल्मों का निशाना एक खास वर्ग ही होता है। इन्हीं परिस्मेंथितियों में एक ऐसी फिल्म आई है जिससे कुछ उम्मीदें की जा सकती हैं। यह फिल्म है 'मैं वापस आऊँगा'। कवि प्रकर्ष विपुल इस फिल्म की समीक्षा करते हुए लिखते हैं 'पिछले कुछ सालों में इन प्रोपेगंडा फ़िल्मों द्वारा हिंदी सिनेमा के उजले दामन पर जो गहरे दाग छोड़े गए हैं यह फ़िल्म उनको भी साफ़ करने का जिम्मा उठाती है। जब हम पाते हैं कि विभाजन विभीषिका दिवस के बहाने उन ज़ख़्मों को फिर से कुरेदने के लिये योजनाबद्ध तरीक़...