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रजिया सज्जाद जहीर की कहानी 'नमक'

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रजिया सज्जाद जहीर  जिस मिट्टी में व्यक्ति जन्मा होता है, जिस मिट्टी में पला बढ़ा होता है, उसके प्रति एक स्वाभाविक लगाव उसके मन मस्तिष्क में होता है। अलग बात है कि राजनीतिक आग्रहों के चलते कागज पर विभाजन की लाईन खिंच जाती है। लेकिन यह सीमा क्या उस मन मस्तिष्क की सीमा बन पाती है जिसका स्वाभाविक लगाव उस व्यक्ति के अन्तर्मन में आजीवन बना रहता है। भारत पाकिस्तान के बीच भले ही कागजी तौर पर सरहदें खिंच गईं लेकिन उनके कदम वह कभी भी नहीं रोक पाई जिनके तंतु हृदय में संचित हैं। विभाजन पर रजिया सज्जाद जहीर की यह एक नायाब कहानी है जिसे आवश्यक तौर पर पढ़ा जाना चाहिए। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रजिया सज्जाद जहीर की कहानी 'नमक'। 'नमक' रजिया सज्जाद जहीर  उन सिख बीबी को देख कर सफ़िया हैरान रह गई थी, किस कदर वह उसकी माँ से मिलती थी। वही भारी भरकम जिस्म, छोटी-छोटी चमकदार आँखें, जिनमें नेकी, मुहब्बत और रहमदिली की रोशनी जगमगाया करती थी। चेहरा जैसे कोई खुली हुई किताब। वैसा ही सफ़ेद बारीक मलमल का दुपट्टा जैसा उसकी अम्मा मुहर्रम में ओढ़ा करती थी। जब सफ़िया ने कई बार उनकी तरफ़ मुहब्बत से देख...

फ्रांज़ काफ़्का की कहानी “पुरानी पाण्डुलिपि”

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फ्रांज़ काफ़्का फ्रैंज काफ्का बीसवीं सदी के एक सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली जर्मन लेखक और उपन्यासकर थे। उनकी लघु कहानियां आधुनिक समाज के व्यग्र अलगाव को चित्रित करतीं हैं। कुछ समकालीन आलोचकों का तो यहाँ तक मानना है कि काफ्का बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से एक है। उनके ही नाम पर प्रचलित "Kafkaesque" (काफ्काएस्क) अंग्रेजी भाषा का हिस्सा बन गया है जिसका उपयोग 'बहकाने वाले' या फिर 'खतरनाक' 'जटिलता' आदि के संदर्भ में किया जाता है। आज काफ़्का का जन्मदिन है। हम उनकी स्मृतियों को नमन करते हैं।  आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  फ्रांज़ काफ़्का  की कहानी  “पुरानी पाण्डुलिपि”। मूल जर्मन से अंग्रेजी अनुवाद किया है विला और एडविन म्यूर ने। और इसका हिन्दी अनुवाद चिर परिचित कवि, कहानीकार और अनुवादक  श्रीविलास सिंह ने किया है। “पुरानी पाण्डुलिपि” फ्रांज़ काफ़्का हिंदी अनुवाद : श्रीविलास सिंह  ऐसा लगता है कि हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ बातों की अनदेखी की गयी है। अभी के पहले तक इस बात के प्रति हम स्वयं कभी चिंतित नहीं हुए थे और अपने दैनिक कार्यों में व्यस...

ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'बाल की खाल'

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ललन चतुर्वेदी  मानव देह अपने आप में परफेक्ट मानी जाती है। सभी अंगों प्रत्यंगों के अपने अलग अलग महत्व और मायने हैं। मानव शरीर में बाल का अपना विशेष महत्त्व है। सिर के बालों को सजाने संवारने के साथ साथ मूंछ दाढ़ी के बाल भी लोग अलग अलग समयों में अपनी अपनी तरह संवारते रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों के बाल जल्द ही साथ छोड़ने लगते हैं और वे गंजे हो जाते हैं। बालों को बचाने के तमाम प्रयास नाकाफी साबित होते हैं। नीबू और मट्ठा का उपयोग करने से ले कर बाल को बार बार छिलवाने की तरकीब भी काम नहीं आती और अन्ततः सिर पर जल्दी ही भरा पूरा चाँद दिखाई देने लगता है। कुछ लोग सिर पर विग लगा कर सच्चाई को नकारने का प्रयास करते हैं लेकिन पुणे की घटना ने विग लगाने वालों के मन में ऐसा खौफ भर दिया है कि क्या कहिए। अब वे विग पहनने के पहले सौ बार सोच रहे हैं। क्या ठिकाना कोई माशूका का मूड उसे देख कर उखड़ जाए और फिर वह न जाने क्या कर डाले। अब यह भी तो देखिए कि  पता नहीं किस भक्त ने किस प्रेरणा से भगवान शिव के भरे पूरे बालों के साथ चाँद को यूं ही टांक दिया। अब वे चाँद को सिर पर ढोते ही रहते हैं। चाँद को सिर से उतार...

शुभा मिश्रा की कविताएँ

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शुभा मिश्रा  पुरुष मानसिकता आज भी स्त्रियों को दोयम दर्जे का मानती है। स्त्रियों के प्रति अपराधों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। स्त्री लगातार संघर्ष करती है। स्त्री घर की चारदीवारी में आजीवन बंध कर रह जाती है। वह मिट्टी के दीये जैसी सतत जलती रहती है। उसका प्रकाश खुद के लिए नहीं होता बल्कि औरों को उजाला देने के लिए होता है। अपने घर परिवार के लिए भूख और प्यास बर्दाश्त करती रहती है। और यह बर्दाश्त करना आजीवन चलता रहता है। स्त्री होने के नाते शुभा मिश्रा इससे वाकिफ हैं और बखूबी अपनी कविता इसे दर्ज करती हैं। अपनी एक कविता में शुभा लिखती हैं : 'यमराज से भी छल कर जाती हूँ/ लबालब भरी हुई/ न जाने कब रिक्त हो जाती हूँ/ ये चमत्कार नहीं तो/ और क्या है/ युग बीत गए/ प्रेम भरे हृदय को नहीं बदल पाती हूँ/ कंठ सूख गए/ जिह्वा जकड़ गई/ गाँव बदल गए शहरों में/ गोबर लिपे आँगन बदल गए/ चमचमाती बालकनी में/ स्वप्न बदले, हकीकत बदली/ प्रणय की परिभाषा वही प्राचीन पाती हूँ।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शुभा मिश्रा की कविताएँ। शुभा मिश्रा की कविताएँ  खसरापाँचसाला मैंने ज्यादातर आदिवासी औरतों के हाथों में...

अमरकांत की कहानी 'हत्यारे'

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अमरकांत  भारत के गाँव कई मामलों में आज भी अलग किस्म के हैं। पिछड़ापन उनकी नियति है और गप्प हांकना अधिकांश ग्रामवासियों का स्वभाव। इस गप्प में हास्य व्यंग्य का बारीक पुट भी रहता है। अमरकांत पूर्वांचल के उस बलिया जिले से आते हैं, जहां ये बातें आम हैं। 'हत्यारे' अमरकांत की चर्चित कहानी है। इस कहानी में दो गपोड़ों के बीच बातचीत को व्यंग्य के जरिए अमरकांत प्रस्तुत करते हैं जिसमें वे भारतीय राजनीति के विद्रूप को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। भारत अभी आजाद ही हुआ था और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में इस नव स्वतन्त्र देश की बुनियाद रखी जा रही थी। लेकिन इसी समय से भ्रष्टाचार का घुन भारतीय राजनीति में प्रवेश करने लगा था। कहानी का एक चरित्र गोरा कहता है 'नेहरू हाथ पकड़ कर रोने लगा। बोला, “आज देश भारी संकट से गुज़र रहा है। सभी नेता और मंत्री बेईमान और संकीर्ण विचारों के हैं। जो ईमानदार हैं, उनके पास अपना दिमाग़ नहीं है। मेरी लीडरशिप भी कमज़ोर है। मेरे अफ़सर मुझको धोखा देते हैं। जनता की भलाई के लिए मैंने पाँच साला योजनाएँ शुरू कीं, लेकिन ब्लाकों के सरकारी कर्मचारी अपने घरों को भरने में...