रवि रंजन का आलेख 'चित्र से परे: सविता सिंह की ‘स्त्री की आत्मा और पिकासो’ कविता में प्रतिनिधित्व और आत्मसत्ता'
सविता सिंह समय की नियति है कि वह लगातार आगे बढ़ता रहता है और अपने पीछे छूटे अनुभवों को धीरे-धीरे मिटाता जाता है। लेकिन इस प्रवाह के विरुद्ध खड़े होने का साहस करती है कला। इसीलिए कला को प्रतिवाद की भाषा भी कहा जाता है। लियो टॉल्स्टॉय का मानना था कि 'कला को मनुष्यों के बीच संवेदनात्मक और नैतिक संबंधों को गहरा करना चाहिए।' बीसवीं शताब्दी में थियोडोर अडोर्नो ने कला की स्वायत्तता को स्वीकार करते हुए भी 'उसे इतिहास और समाज से पूरी तरह अलग नहीं माना।' कला वस्तुतः किसी क्षण, अनुभव या ऐतिहासिक परिस्थिति को रूप दे कर भविष्य के लिए सुरक्षित कर लेती है। इस तरह कलाकृतियाँ केवल सौंदर्य की वस्तुएँ नहीं होतीं, बल्कि अपने समय की स्मृतियों को भी अपने भीतर सँजोए रखती हैं। सविता सिंह की एक कविता है 'स्त्री की आत्मा और पिकासो'। यह कविता बार-बार इस बात पर ज़ोर देती है कि स्त्री की 'सच्ची तस्वीर' नहीं बनाई जा सकती। यह स्त्री इतनी वास्तविक रचना है कि इसकी नकल या प्रतिकृति बना पाना असम्भव है। पिकासो की एक मशहूर पेंटिंग है 'वीपिंग वूमन'। कहा जाता है कि पिकासो ने अपनी इ...