श्याम सुन्दर सिंह की कविताएँ
श्याम सुन्दर एक सवाल कवियों के जेहन में बार बार उठता है कि देश का मतलब आखिर क्या है? अनेक कवियों ने इस पर कविताएं भी लिखी हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक मशहूर कविता का शीर्षक ही है 'देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता'। युवा कवि श्याम सुन्दर भी इस सवाल से टकराते हुए लिखते हैं "मैं इस देश से नफ़रत नहीं करता,/ इसीलिए इसकी झूठी तारीफ़ नहीं करता।/ मेरे लिए देश/ किसी नेता का चेहरा नहीं,/ न किसी धर्म की जागीर है।/ देश वह मज़दूर है/ जो सुबह अपनी पीठ पर औज़ार बाँध कर निकलता है/ और शाम को अपनी थकान के साथ/ आधे पेट घर लौटता है।/ देश वह किसान है/ जिसकी फ़सल का दाम/ किसी और की मेज़ पर तय होता है।" आज का समय 'निंदक नियरे राखिये' वाला समय नहीं बल्कि झूठी तारीफों के पुल खड़ा करने वाला समय है। इसीलिए यह पुल मामूली से वजन को भी बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रखता और धराशाई हो जाता है। दरअसल यह देश केवल उन नेताओं का नहीं जो देश के प्रतिनिधि के तौर पर पूरी दुनिया में तिलिस्म रचने का प्रयास करते हैं। देश का नक्शा उन किसानों, मजदूरों और आम लोगों से बनता है जो आज भी बदहाली का जीवन ...