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विहाग वैभव के कविता संग्रह पर शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की समीक्षा 'हिंसा की शिनाख़्त करती बेबाक कविता का विकल कवि: विहाग वैभव'

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यह देश किन लोगों का है? क्या कुर्सी पर बैठे हुए उन नेताओं का है जिनके लिए झूठ ही सच और सच ही झूठ बन जाता है। क्या यह देश उन नौकरशाहों का है जो अपने छल छद्म से नौकर की बजाय मालिक जैसा आचरण करने लगते हैं। क्या यह देश उन दलालों और ठेकेदारों का है जो अपनी पुश्त दर पुश्त के लिए सारा धन अपने पास कर लेना चाहते हैं। यह देश उन निश्छल किसानों और कामगारों का है जिनके पास यकीन है कि यह देश उनका है और तीन पाँच करने वालों से डरने की कोई जरूरत नहीं। अ रसा पहले कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक कविता लिखी थी 'देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता'। इस कविता में वे लिखते हैं : "इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/ कुछ भी नहीं है/ न ईश्वर/ न ज्ञान/ न चुनाव/ कागज पर लिखी कोई भी इबारत/ फाड़ी जा सकती है/ और जमीन की सात परतों के भीतर/ गाड़ी जा सकती है।" और अन्त में वे लिखते हैं : "किसी हत्यारे को  कभी मत करो माफ/ चाहे हो वह तुम्हारा यार/ धर्म का ठेकेदार,/ चाहे लोकतंत्र का/ स्वनामधन्य पहरेदार।" विहाग वैभव की कविता उस कड़ी को आगे बढ़ाती है। उनकी कविता में न तो कोई प्रशस्ति गान मिलेगा न ही क...

यादवेन्द्र का आलेख 'तो तुम्हें पक्के तौर पर जीना पड़ेगा'

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यादवेन्द्र  हर मनुष्य अपनी एक पहचान चाहता है। इस पहचान के लिए वह जीने मरने के लिए तैयार रहता है। दरअसल यह पहचान उसे सामाजिकता प्रदान करता है। राष्ट्र, धर्म, जाति ऐसी संस्थाएं हैं जो इस पहचान को पुष्ट करने का काम करती हैं। यहूदी ऐसे लोग रहे हैं जिन्हें शुरू से ही पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। बीसवीं सदी के चौथे दशक में जर्मन तानाशाह हिटलर ने यहूदियों का क्रूरतापूर्वक दमन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात यहूदियों ने इजरायल नामक अपना देश बना लिया। लेकिन वे अपना क्रूर अतीत भूल गए और फ़िलिस्तीनियों का दमन करने लगे। आज तक यह क्रम निरन्तर चल रहा है। यादवेन्द्र जी अपने आलेख में लिखते हैं "7 अक्टूबर 2023 को ग़ज़ा पर इजराइल ने जो हमले शुरू किए, वे अब तक जारी हैं। 16 मई 2026 को 'द गार्डियन' में प्रकाशित एक लेख में संयुक्त राष्ट्र के हवाले से बताया गया है कि सिर्फ़ ग़ज़ा में तब से अब तक बमबारी में 72619 फ़िलिस्तीनियों की जान जा चुकी है - हर दिन 75 से ज़्यादा असामयिक मौतें। विडंबना यह है कि आज फ़िलिस्तीन की मूल भूमि पर जितने फ़िलिस्तीनी रह रहे हैं, संख्या में उससे ज़्यादा विदेशों ...

हेमन्त शर्मा का आलेख 'लौटती स्मृति का फूल है हरसिंगार'

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'लौटती स्मृति का फूल है हरसिंगार' हेमन्त शर्मा  ‘हरसिंगार’ फूलने लगे हैं। इसे देख मन मगन है, चित्त पुलकित। बांछें खिली हुई हैं (श्रीलाल जी के शब्दों में शरीर में जहां भी होती हैं)। यह मदमाता, शर्मीला और नशीला फूल आधी रात चुपके से फूलता है। और फूलते ही झड़ने लगता है। जब भैरवी अपने आरोह पर होती है, आसावरी पूरे उठान पर होती है, तो इसका सौंदर्य चरम पर होता है। चिरैया बोलती है। धरती जल्दी जग जाती है। तभी हरसिंगार की टहनियां मन की गांठ की तरह खुलती हैं और उसके फूल टहनियों के बंधन से मुक्त हो पेड़ से झड़ने लगते हैं। धरती श्वेत-सिंदूरी फूल की चादर ओढ़ लेती है। केसरिया रंग रति का और सफेद यौवन का प्रतीक है। सवेरा होते-होते हरसिंगार शांत और स्थिर हो जाता है। वातावरण उसकी भीनी गंध से उच्छ्वासित होता है। जैसे जहाज का पंछी जहाज पर लौटता है। पखेरू शाम ढलते घोंसलों की तरफ लौटते हैं। चींटियां लौटती हैं अपने बिलों में, वैसे ही मेरा मन इस मौसम में बार-बार हरसिंगार की तरफ लौटता है। मुझे जिन फूलों से (अंग्रेजी वाले नहीं) बहुत प्यार है उसमें एक ‘पारिजात’ भी है। हरसिंगार को ही ‘पारिजात’, ‘शेफाली’, या...

राकेश कुमार गुप्त का आलेख “सबसे बड़ा जो साहसिक कार्य हम कर सकते हैं, वह है अपने सपनों को जीना।”

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राकेश कुमार गुप्त सभी प्राणियों से मनुष्य इसलिए भी अलग है कि वह सपने देखता है। इन सपनों का वह विश्लेषण करता है और फिर इन्हें यथार्थ में ढालने की कोशिश करता है। सपने हमारी कल्पनाशीलता के पंख होते हैं। ये सपने हमारी प्रतिरोधी चेतना के वाहक होते हैं। आप किसी मनुष्य को कैद कर सकते हैं लेकिन उसके सपनों पर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगा सकते। मनुष्य को यह प्रकृतिप्रदत्त उपहार है जिसने उसके सर्वश्रेष्ठ होने में बड़ी भूमिका निभाई है। राकेश कुमार गुप्त अपने आलेख में उचित ही लिखते हैं "मनुष्य के पूरे इतिहास को यदि एक अलग दृष्टि से पढ़ा जाए तो वह केवल युद्धों, साम्राज्यों, राजाओं, क्रांतियों और तकनीकी आविष्कारों का इतिहास नहीं दिखाई देगा; वह उन सपनों का इतिहास भी दिखाई देगा जिन्हें मनुष्य ने अपनी वर्तमान परिस्थितियों से आगे जा कर देखा था। आज जो कुछ हमें सामान्य और स्वाभाविक दिखाई देता है, वह कभी किसी मनुष्य की कल्पना में असंभव था। मनुष्य का आकाश में उड़ना, समुद्रों के पार जाना, रोगों का उपचार करना, दासता को चुनौती देना, स्त्रियों को मताधिकार देना, उपनिवेशों का स्वतंत्र होना, जाति और नस्ल के आध...