पंकज पराशर का आलेख 'ग़ालिब के साथ हमारे समय का संवाद'
कालजयी साहित्य की यह विशिष्टता होती है कि वह कभी अतीत की वस्तु नहीं बनता; वह प्रत्येक नए समय में अपना नया वर्तमान निर्मित करता है। मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाएँ इस बात की तस्दीक करती हैं। ग़ालिब के पत्रों और उनकी शायरी की अर्थ-संभावनाएँ समय के साथ और भी मौजू दिखाई पड़ती हैं। ग़ालिब को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी समकालीन रचनाकार को पढ़ रहे हों। पंकज पराशर अपने आलेख में उचित ही लिखते हैं 'साहित्य सूचना का विकल्प नहीं है, अनुभव का विस्तार है। वह उन प्रश्नों से जूझता है जिनका समाधान न इतिहास अकेले दे सकता है, न दर्शन, न विज्ञान और न ही राजनीति। मनुष्य का आंतरिक जीवन- उसकी इच्छाएँ, उसके भय, उसकी विफलताएँ, उसकी स्मृतियाँ और उसके आत्मसंघर्ष- साहित्य की सबसे बड़ी भूमि है। इसीलिए प्रत्येक सभ्यता अपने महान कवियों को केवल भाषा के कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव के विश्वसनीय व्याख्याकार के रूप में भी स्मरण रखती है।' हाल ही में पंकज की एक गम्भीर किताब आई है 'ग़ालिब के सौ रंग'। पंकज ने अपनी इस किताब में ग़ालिब की रचनाधर्मिता के हरेक रंग पर तरतीबवार बात करने की कोशिश की है।...