शर्मिला जालान के उपन्यास पर संजय गौतम की समीक्षा
हमारे समाज में लड़कियों की शादी संस्कार से ज्यादा एक समस्या के रूप में जानी जाती है। जब भी किसी लड़की का पिता शादी के लिए किसी लड़के के दरवाजे पर जाता है तो लड़के वाले आभिजात्य भिखमंगेपन की शुरुआत कर देते हैं। उन्हें लड़की पढ़ी लिखी तो चाहिए ही, सुन्दर भी चाहिए। भले ही लड़के की सूरत जो हो। किसी भी लड़की के लिए त्रासद वह समय होता है जब उसे शादी के लिए लड़के वालों को दिखाया जाता है। उसे त्रासद होता है उसे रिजेक्ट किया जाना। लेकिन लड़की की संवेदनाओं से उन्हें क्या मतलब जो पत्थरदिल होते हैं। वैसे भी हमारे समाज में आज भी लड़कियों को रोज ही जिन स्थितियों का शिकार होना पड़ता है वह भयावह है। सच कहें तो लड़कियों के मामले में हमारी सोच पूरी तरह पारम्परिक और रूढ़िवादी है। शर्मिला जालान के उपन्यास 'शादी से पेशतर' पढ़ते हुए संजय गौतम उचित ही लिखते हैं "फिर वही सवाल सामने आ जाता है कि एक समाज के रूप में क्या हम वहीं ठहरे हैं या कुछ आगे बढ़े हैं, या आगे न जा कर हम कुछ पीछे हो गए हैं, हो रहे हैं, पहले से ज्यादा क्रूर हो रहे हैं। लड़कियां आखिर क्या करें। करियर की ऊँचाई पर होने के बावजूद भी...