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कौशल किशोर का आलेख 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा'

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मुद्राराक्षस एक जमाना था जब हम राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप पृष्ठ का पूरे सप्ताह बेसब्री से इंतजार किया करते थे। यह पृष्ठ तमाम महत्वपूर्ण विद्वानों के वैचारिक आलेखों से भरा होता था जो प्रत्येक शनिवार को चार पेज के सप्लीमेंट के रूप में प्रकाशित होता था। इन नामों में से एक नाम जो हमें अलग से आकर्षित करता था वह नाम मुद्राराक्षस का हुआ करता था। मुद्राराक्षस का आलेख बिल्कुल अलग, मौलिकता और वैचारिकता से भरा होता था। मुद्राराक्षस लीक पर चलने की अपेक्षा खुद नई परम्परा बनाने में विश्वास रखते थे। यही नहीं पारम्परिक प्रगतिशील आलोचना के लिए भी उन्होंने कड़ी चुनौती पेश की। आज  मुद्राराक्षस की दसवीं पुण्यतिथि है। उनकी स्मृति को हम नमन करते हुए आज पहली बार प्रस्तुत कर रहे हैं  कौशल किशोर का आलेख 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा'। 'मुद्राराक्षस बदलाव की लड़ाई का सांस्कृतिक योद्धा' कौशल किशोर मुद्राराक्षस। उनका यही नाम था। पर हमारे लिए वे 'मुद्रा जी' थे और यही रहेंगे। 13 जून 2016 को उन्होंने हमारा साथ छोड़ा। याद आता है वह दिन। दोपहर का समय था जब उनके बड़े बेटे र...

भगवानदास मोरवाल का उपन्यास अंश ‘सैय्यद इब्राहीम का ब्रज गमन’

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भगवानदास मोरवाल ‘मानुष हौं तो’ वर्तमान कथा साहित्य के सर्वाधिक सक्रिय और अपने नए-नए विषयों के लिए जाने जाने वाले कथाकार भगवानदास मोरवाल का तेरहवाँ उपन्यास है, जो शीघ्र ही वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होने जा रहा है। विदित है कि हाल में वाणी प्रकाशन से ही उनका बारहवाँ उपन्यास ‘दण्ड प्रहार’ (2025) प्रकाशित हुआ है। उनकी लेखकीय रचनात्मक को ध्यान में रखते हुए, हाल में इलाहाबाद की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संचेतना’ द्वारा, प्रति वर्ष किसी रचनाकार को उसके समग्र साहित्यिक योगदान के लिए दिया जानेवाला वर्ष 2026 का ‘राजमणि देवी स्मृति साहित्य सम्मान’ 2026  उन्हें देने की घोषणा की गई है। अतीत को उसके उसी रूप में संचित करने की परम्परा सामान्य तौर पर इतिहास में प्रचलित रही है। लेकिन हमारे यहाँ उस तरह का बोध न होने की वजह से अतीत की घटनाओं या व्यक्तित्व के बारे में सुनिश्चित जानकारी नहीं मिल पाती। यही वजह है कि कबीर, सूर, तुलसी की जन्म तिथि और स्थान के बारे में आज भी एकमत नहीं है। ऐसी ही स्थिति रसखान के साथ रही है। बल्कि रसखान के बारे में संदर्भों का कहीं ज्यादा ही अकाल है।  रसखान हिंदी साहित...