संदेश

विवेक कुमार शुक्ल के उपन्यास पर वैभव मणि त्रिपाठी की समीक्षा

चित्र
एक जमाना था जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र संघ का चुनाव होता था। नवनिर्वाचित प्रतिनिधि बकायदे अपने पद की शपथ लेते थे। इनका काम छात्र छात्राओं की समस्याओं का प्रशासन के साथ मिल बैठ कर समाधान निकालना होता था। ये विश्वविद्यालय/ महाविद्यालय लोकतांत्रिक राजनीति की नर्सरी कहे जाते थे। यहीं पर नवनिर्वाचित प्रतिनिधि राजनीति का ककहरा सीखते थे। लेकिन वह दौर खत्म हुआ और राजनीति की नर्सरी सूख गई। विवेक कुमार शुक्ल अपने उपन्यास में उस दौर को याद करते हुए वह कथानक बुनते हैं जो हमारे समाज का हिस्सा हुआ करता था। हाल ही में विवेक कुमार शुक्ल का नया उपन्यास आया है 'अमरपुर'। इस उपन्यास की एक समीक्षा लिखी है वैभव मणि त्रिपाठी ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विवेक कुमार शुक्ल के उपन्यास पर वैभव मणि त्रिपाठी की समीक्षा 'कोलाहल में सिम्फनी- अमरपुर'। समीक्षा  कोलाहल में सिम्फनी – अमरपुर वैभव मणि त्रिपाठी  किसी भी रचना की प्रासंगिकता पर बात करें तो वो रचनाएं श्रेष्ठतम की कतार में मानी जाती रही हैं, जिन रचनाओं का वितान बड़ा हुआ करता है। विवेक कुमार शुक्ल का बीते दिनों युवा वाणी...

परांस-15 : अशोक कुमार की कविताएँ

चित्र
कमल जीत चौधरी  जीवन की अन्तिम कड़ी मृत्यु है। भारतीय परम्परा में हर पिता यह चाहता है कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी सन्तान मुखाग्नि दे। सामान्य तौर पर इस जिम्मेदारी का निर्वहन पुत्र करता है। लेकिन बदलते समय के साथ बेटियां भी आगे बढ़ कर यह दायित्व निभा रही है। अशोक कुमार की एक उम्दा कविता है 'बेटी से'। कविता की पंक्तियाँ हैं : 'मेरी चिता में उसी तरह अग्नि धर देना/ जैसे रोज़ सुबह-शाम थाली में/ चपाती धर जाती हो,/ जो प्यार दिया, तुमसे लिया/ उसका अंत अग्नि ही तो है'। अग्नि सब कुछ का अन्त कर डालती है। पार्थिव देह भी अग्नि में जल कर राख बन जाती है और इस तरह मिट्टी अपनी मूल मिट्टी में मिल जाती है। कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हैं 'बाप मरण तो कह पाया/ पर अपना जीना न कह सका/ जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त/ बहुत लम्बी होती है।' मृत्यु आसान है। जीना बहुत कठिन। जीवन में किसिम किसिम किसिम की जरूरतें पड़ती हैं। यानी जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त बहुत लम्बी होती है। कवि अशोक कुमार जीवन की जरूरतों से वाकिफ हैं। हमारे इस बार के परांस के कवि अशोक कुमार हैं। अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौ...

हितेन्द्र पटेल का आलेख 'इतिहास पर पुनर्विचार'

चित्र
हितेन्द्र पटेल बंगाल ने आधुनिक भारत में नवजागरण की प्रक्रिया का नेतृत्व किया। राजा राम मोहन रॉय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, राम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द जैसे नाम इस बात की तस्दीक करते हैं।  आगे चल कर सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, चितरंजन दास, सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता आंदोलन से न केवल जुड़ते हैं बल्कि भारतीय आंदोलन की अपरिहार्यता बन जाते हैं। बंगाल ही अकेला ऐसा प्रान्त है जिसे अंग्रेजों ने 1905 में विभाजित कर दिया। इस विभाजन ने राष्ट्रीय आंदोलन को राष्ट्र व्यापी बना दिया। आजादी के समय बँटवारे का दंश भी बंगाल को भुगतना पड़ा। इस तरह स्वतंत्रता के पूर्व या स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय राजनीति में बंगाल की एक अहम भूमिका रही है। 1940 के बाद मुस्लिम लीग ने जहां एक तरफ मुस्लिम राजनीतिक मत को संगठित करना आरंभ किया वहीं दूसरी तरफ हिन्दू महासभा ने यह सोच विकसित किया कि संख्यात्मक बहुमत पर आधारित प्रातिनिधिक लोकतंत्र हिंदुओं के राजनीतिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर सकता। आज़ादी मिलने के बाद भी धार्मिक आग्रहों का यह अलगाव बंगाल के लिए एक बड़ा मुद्दा बना रहा। इतिहास लेखन की प्रक्रिया उतनी इकहर...