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प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख्वाब'

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प्रज्ञा पत्रकारीय जीवन प्रायः बेतरतीब होता है। पत्रकारों को रोज ही कोई न कोई नई लकीर खींचनी होती है। उनकी नजर आम तौर पर उन तथ्यों या सूचनाओं पर होती हैं जो उनके अखबार के लिए बिकाऊ हो सके। ऐसे में कई बार हवा में तीर चलाना पड़ता है। वैसे उन सभी काम काज में ही ऐसा ही होता है जहां हर रोज भारी अनिश्चितता होती है। कई ऐसे काम काज हैं जहां रोज कुँवा खोदना और पानी पीना होता है। देश की अधिकांश जनता ऐसा ही अनिश्चित जीवन यापन करती है। समकालीन कहानीकारों में प्रज्ञा ने अपने कहन और अनूठे शिल्प से पाठकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। 'चांद जैसे ख्वाब' उनकी ऐसी ही कहानी है। जिसमें एक पत्रकार जो लक्ष्य ले कर एक जमाने के चर्चित कवि शशांक निकेत जी की पत्नी के पास बातचीत करने पहुंचती है लेकिन बातचीत का सूत्र बेतरतीबी से कवि पत्नी और उनके लेखकीय जीवन की तरफ मुड़ जाता है। वह जीवन जिसके बारे में कवि पत्नी अब यह भी बिसर गई हैं कि उन्होंने पहले कुछ इस तरह का लिखा था। प्रज्ञा की यह कहानी हमने 'बनमाली कथा' से साभार लिया है । तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख...

हेमन्त कुमारी देवी का आलेख 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं'

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हेमन्त कुमारी देवी  हेमन्तकुमारी देवी ने  मर्यादा के 1914 अंक में 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं' नामक एक आलेख लिखा था। यह आलेख स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उस समय स्त्रियों पर कैसी बंदिशें थीं। हेमन्तकुमारी ने अपने इस आलेख में वे रास्ते बताए हैं जिस पर चल कर स्त्रियाँ एक सम्मानित जीवन जी सकती हैं।  वर्ष 1888 में हेमन्त कुमारी देवी ने ‘सुगृहिणी’ नामक स्त्री पत्रिका नागरी भाषा में निकाली थी। हिन्दी नवजागरण काल के इतिहास में किसी स्त्री द्वारा संपादित ‘सुगृहिणी’ पहली पत्रिका और श्रीमती हेमन्त कुमारी देवी हिन्दी साहित्य इतिहास में पहली स्त्री संपादिका है। ऐसा इसलिये कि श्रीमती हरदेवी की पत्रिका ‘भारत भगिनी’ सन 1889 में निकली थी। ‘सुगृहिणी’ पत्रिका का पहला अंक फरवरी 1888 में निकला था। नवजागरणकालीन यह पत्रिका सुखसंवाद प्रेस, लखनऊ में पण्डित बिहारी लाल के द्वारा मुद्रित होती थी। इस पत्रिका में कुल बारह पृष्ठ होते थे। ‘सुगृहिणी’ का पहला और आखिरी पृष्ठ रंगीन हुआ करता था। जिस समय हिन्दी में बालकृष्ण भट्ट, बदरी नारायण चौधरी, राधाचरण गोस्वामी और ...

विनोद दास का संस्मरण 'लासानी : गुलशेर खान शानी'

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गुलशेर खान शानी  भारतीय मुसलमान की वास्तविक गाथा को जानने के लिए हमें काला जल को आवश्यक तौर पर पढ़ना पड़ेगा। यह उपन्यास शिद्दत से आज के मुस्लिम परिवेश को ईमानदारी से उभारता है। आम तौर पर भारतीय मुसलमानों को शासक, नवाब, दरबारी और सुसंस्कृत अभिजात वर्ग की तरह पेश (चित्रित) किए जाने की परम्परा रही है। लेकिन वह जमाना अब बीती बात हो गई। शानी ने अपने उपन्यास “काला जल’’ में मुसलमानों को उसी रुप में दिखाया है जो वो हैं। आज भारतीय मुसलमान संशय के दायरे में पहले से कहीं अधिक हैं। इसीलिए वह सशंकित भी है। उसे अपनी राष्ट्रीयता लगातार साबित करनी पड़ती है। इस क्रम में वह आज भी जद्दोजहद कर रहा है। शानी साक्षात्कार और भारतीय समकालीन साहित्य जैसी दो महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संस्थापक सम्पादक थे। जन्मदिन पर हम उन्हें नमन करते हुए पहली बार पर विनोद दास का संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं  'लासानी : गुलशेर खान शानी'। शानी के जन्मदिन पर  'लासानी : गुलशेर खान शानी'  विनोद दास  यह वह समय था जब दिल्ली के सांस्कृतिक हृदय मण्डी हाउस स्थित रवींद्र भवन के साहित्य अकादमी परिसर में हिन्दी ...

हेरम्ब चतुर्वेदी के उपन्यास 'सुल्तान रजिया' पर हर्ष मणि सिंह की समीक्षा

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भारत में शासकों की जो लम्बी परम्परा मिलती है उसमें गिनी चुनी महिलाएं ही शासक के रूप में दिखाई पड़ती हैं। मध्यकाल में शासक के रूप में एकमात्र जो नाम मिलता है वह नाम रजिया सुल्तान का है। सुल्तान इल्तुतमिश ने परंपराओं की परवाह न करते हुए अपनी सुयोग्य पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। यह बात उस समय के अमीरों और उलेमाओं को भला कैसे बर्दाश्त होती। उन्होंने वह हरेक कदम उठाया जिससे रजिया को गद्दी से हटाया जा सके। रजिया ने भी अपनी तरफ से खुद को बचाने की हरचन्द कोशिश की लेकिन उसका महिला होना ही अभिशाप बन गया और अन्ततः अपनी जान दे कर उसे शासक बनने की कीमत चुकानी पड़ी। हेरम्ब चतुर्वेदी ने इतिहास के ऐसे पात्रों को अपने उपन्यासों के जरिए रेखांकित करने का प्रयास किया है जो अभी तक अदृश्यमान थे। इस कड़ी में  'जहांआरा', 'हमीदा बानो' के बाद उन्होंने रजिया को अपने उपन्यास का मुख्य पात्र बनाया है। जाहिर तौर पर एक इतिहासकार होने के नाते उन्होंने कल्पनाओं की उड़ान वहीं तक भरी है जो इतिहास को कदाचित विकृत न कर पाए।  अर्थशास्त्र के अध्येता  हर्ष मणि सिंह ने इस उपन्यास को पढ़ते हु...