सरिता शर्मा का आलेख 'रूमी का जीवन'
रूमी की प्रतिमा महान सूफी संत और फारसी साहित्य के प्रख्यात लेखक मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी (30 सितम्बर, 1207 से 17 दिसंबर 1273 ई) ने मसनवी लेखन में महत्वपूर्ण योगदान किया। रूमी मूलतः अफ़ग़ानिस्तान के निवासी थे लेकिन इन्होंने अपना जीवन मध्य तुर्की के सल्जूक दरबार में बिताया और वहां पर इन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएँ रचीं। रूमी के जीवन में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब शम्स तबरेज़ नाम के घुमक्कड़ दरवेश उनके जीवन में आए। एक दूसरे से मिलने के बाद दोनों अच्छी तरह से यह समझ गए कि उनके भीतर ईश्वर को जानने की एक जैसी ललक है। मध्य तुर्की के कोन्या में इनका देहांत हुआ जिसके बाद इनकी कब्र एक मज़ार का रूप लेती गई जहाँ इनकी याद में सैकड़ों सालों से आयोजन होते आते रहे हैं। उनकी खूबसूरत कविताओं ने उन्हें हमेशा सर्वश्रेष्ठ ईरानी कवियों में से एक बनाया है। रूमी की कविताओं में प्रेम और ईश्वर भक्ति का सुंदर समिश्रण दिखाई पड़ता है। इनको हुस्न और ख़ुदा के बारे में लिखने के लिए खास तौर पर जाना जाता है। रूमी प्रेम के पुजारी थे और इसे खासा तवज्जो दिया करते थे। आज जब दुनिया में स्वार्थ प्रबल होता जा रहा ...