संदेश

चित्रा वर्मा एवं मदन मोहन वर्मा का आलेख 'देश विभाजन और गांधी'

चित्र
भारत विभाजन के लिए लोगबाग आजकल सारा दोषारोपण कांग्रेस और गांधी जी पर डाल देते हैं। एकांगी और बिना सोचे विचारे बोलने वाले लोग ही ऐसा कह सकते हैं। आज इतिहास ही सबका आसान शिकार है। जिसको जो मन आए बोल सकता है। यह कितना हास्यास्पद है कि जिन्होंने इतिहास का 'क ख ग़' तक नहीं पढ़ा, वे आज इतिहास को ही बदल डालने की बातें करते हैं। भारत विभाजन के लिए तमाम परिस्थितियां उत्तरदाई थीं, जो अपने आप में बहुत जटिल थीं। आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले  गांधी जी , 1942 के आंदोलन के पश्चात पार्श्व में चले गए। सांप्रदायिक ताकतें अपना खुला खेल खेलने लगीं। जिसका खामियाजा अन्ततः देश को भुगतना पड़ा।  सवाल यह है कि दोषी कौन नहीं था? क्या गांधी जी की ही यह एकल जिम्मेदारी थी कि वे देश को अविभाजित रखें? यह देश तो सबका था और आज भी है। किसी पर दोषारोपण कर आप अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते। जो गांधी जी लगातार यह कहते रहे कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा, उन्हें कितना मजबूर हो कर यह विभाजन स्वीकार करना पड़ा होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। क्या गांधी के अलावा किसी और का इस तरह का बयान मिलता है...

शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'पहल पत्रिका : हिंदी साहित्य में वैचारिक हस्तक्षेप की एक सशक्त परंपरा'

चित्र
पहल का पहला अंक साहित्यिक पत्रकारिता की जब भी बात की जाएगी 'पहल' का नाम अनिवार्य तौर पर लिया जाएगा। अपने समय में 'पहल' ऐसी जरूरी पत्रिका बन गई थी जिसे हर रचनाकार और साहित्यिक सरोकारों से जुड़ा हर व्यक्ति पढ़ना और देखना चाहता था। इसमें छपना हर रचनाकार का सपना होता था। साहित्यिक पत्रकारिता सामान्य पत्रकारिता से अलग होती है। इसकी चुनौतियां अलग होती हैं। केवल कविता, कहानी, आलेख और समीक्षा बटोर कर उसे एक जिल्द में छाप देना बहुत आसान काम होता है, जैसा कि आज की हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाएं कर रही हैं। लेकिन साहित्यिक पत्रिका का मूल उद्देश्य होता है : ऐसी रचनाएँ छापना जो पाठकों को उद्वेलित करे, अपने समय के सरोकारों से परिचित कराए, प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना की तरफ मोड़ दे और लीक से अलग हट कर चलना सिखाए। 'पहल' इन सारे प्रतिमानों पर हमेशा खरी उतरी। सम्पादक ज्ञानरंजन की संपादकीय प्रतिबद्धता को इस बात से समझा जा सकता है कि इस पत्रिका के सम्पादन के लिए उन्होंने खुद का अपना लेखन निर्ममता से स्थगित कर दिया। और अन्त में जब उन्हें ऐसा लगा कि वे बढ़ती उम्र के चलते पहल के प्रति न...

रघु रॉय के फोटोग्राफ

चित्र
  रघु रॉय  जहां शब्द बोलना बन्द कर देते हैं वहां तस्वीर की भाषा शुरू होती है। तस्वीरें अपने आप में सब कुछ कह डालती हैं। रघु रॉय ने इंजीनियरिंग करने के बावजूद पेशे के तौर पर फोटोग्राफी को चुना। रघु राय के बड़े भाई एस पॉल इस समय तक फोटोग्राफ़ी की दुनिया में स्थापित हो चुके थे। 1966 में रघु उनके पास दिल्ली आए। उन्होंने पहली तस्वीर एक गदहे की ली। बिल्कुल सामने से ली गई तस्वीर को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे गदहा आँख में आँख डाल कर अपनी व्यथा कथा कहना चाहता हो। इस पहली तस्वीर ने उनकी ज़िंदगी को बदल दिया। उनकी पहली ही यह तस्वीर 'लंदन टाइम्स' में आधे पन्ने पर छपी। बड़े भाई की बदौलत रघु राय को 1966 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' में नौकरी मिल गई। लेकिन वे वहां ज़्यादा दिन तक नहीं टिक पाए। क्योंकि तब 'द स्टेट्समैन' की काफ़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी, 1967 में वे वहां पहुंच गए। 'द स्टेट्समैन' में काम करने के समय की एक घटना का जिक्र करते हुए वे बताते हैं, "बात जेपी आंदोलन के समय की है. बिहार में आंदोलन चरम पर था। मैं जेपी के साथ बिहार घूम रहा था। आंदोलन के दौरान उनपर लाठी च...