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इतिहास पर वाद विवाद

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इतिहास साक्ष्यों के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। यह इतिहास की ताकत भी है और सीमा भी। अलग अलग विचारधारा वाले इतिहासकारों के लिए यह तथ्य ही परेशानियां खड़ी करते हैं। वास्तव में किसी भी साक्ष्य को इतिहासकार अपनी तरह से क्रॉस चेक करता है। इतिहासकार किसी एक स्रोत के हवाले से निष्कर्ष निकालने से बचते हैं। क्योंकि हर स्रोत की अपनी सीमा होती है ऐसे में दूसरे अन्य स्रोतों से उसके हकीकत की तहकीकात करने की जिम्मेदारी भी इतिहासकार की ही होती है। हमारे देश में मुद्रित शब्दों को हकीकत मानने का चलन रहा है। पुराण ग्रन्थ हों या महाकाव्य ग्रन्थ, हम उन्हें साहित्य की तरह पढ़ने की बजाए इतिहास मान कर पढ़ने लगते हैं तो दिक्कत उठ खड़ी होती है। अकबर के काल का पूरा सच न तो अबुल फजल बया कर पाते हैं, न ही बदायूंनी की कट्टरपंथी सोच अकबर की हकीकत बता पाती है। इसके लिए हमें स्रोतों को क्रॉस चेक करते हुए हकीकत को तलाशना पड़ता है। मध्य काल के तमाम ऐसे नाम मिलते हैं जिनकी किताबें उस समय को जानने के लिए एक आधारभूत सामग्री की तरह हैं। बकौल विजय मनोहर तिवारी ये नाम हैं - "फखरे मुदब्बिर, मिनहाजुद्दीन सिराजुद्दीन ...

भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 'धूप है कि मोह की आँखमिचौली'

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भरत प्रसाद  प्रकृति का अपना एक अलग मौसम चक्र हुआ करता है। भारत इस मामले में एक समृद्ध देश है जहां अलग अलग मौसम एकरसता को तोड़ते हुए जीवन को थोड़ा सरस बना देते हैं। सावन का महीना सारे महीनों से न्यारा होता है। बारिश की फुहारें एक तरफ जहां गर्मी से निजात दिलाती हैं वहीं दूसरी तरफ गुनगुने ठण्ड के मौसम का बीज बो देती हैं। धरती चारों तरफ शस्य श्यामला नजर आने लगती है। खेतों में धान की रोपाई बनिहारिनों के सुमधुर लोकगीतों के साथ आरम्भ हो जाती है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास 'कालकलौटी' के प्रारम्भ में कुदरत के इस खूबसूरत नज़ारे का शब्द चित्र बनाते हैं। आजकल हर महीने के दूसरे रविवार को हम भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का धारावाहिक रूप से प्रकाशन कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का चौथा अंश। उपन्यास अंश 4 : कालकलौटी         'धूप है कि मोह की आँखमिचौली' भरत प्रसाद  धूप मीठी कि छाया? बारिश में भीगना मोहक कि नदी में कूद जाना? बादलों की उमड़-घुमड़ जादुई या उनकी दिशा भेदी गर्जना? टिप-टिप बारिश का संगीत मादक या वर्षा की...

अखिलेश कुमार शंखधर का आलेख 'मणिपुर की ‘महिप पत्रिका’ का साहित्यिक अवदान'

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किसी भी साहित्यिक पत्रिका का मुख्य उद्देश्य साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं को प्रकाशित करने के साथ साथ स्थानीय रचनाशीलता को बढ़ावा देना भी होता है। गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका निकलना तमाम चुनौतियों से भरा होता है। लेकिन कुछ पत्रिकाओं ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है। महिप ऐसी ही पत्रिका है जिसका प्रकाशन मणिपुर की प्रतिष्ठित स्वैच्छिक हिंदी संस्था ‘मणिपुर हिंदी परिषद्’ द्वारा किया जाता है। अखिलेश शंखधर लिखते हैं - "  ‘महिप पत्रिका’ ने हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवियों और रचनाकारों पर बेहतरीन सामग्री तो प्रस्तुत की ही है, साथ ही इस पत्रिका ने अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से हिंदी के पाठकों को परिचित कराने के उद्देश्य से ही मणिपुरी के अनेक रचनाकारों पर केंद्रित अंक निकाले हैं। साथ ही साथ मणिपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं के विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं को भी पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। महिप पत्रिका ने आरंभ से ही मणिपुरी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य को अनुवाद के माध्यम से व्यापक पाठक जगत् के सम...

रबीन्द्रनाथ ठाकुर के मृत्यु-गीत

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रबींद्र नाथ ठाकुर  जीवन के प्रारम्भ से ही मृत्यु दार्शनिकों, कवियों के लिए चिन्तन का विषय रही है। जहाँ जीवन है वहाँ मृत्यु अवश्यंभावी है। हिन्दू संस्कारों में मृत्यु को भी अन्तिम संस्कार के रूप में शामिल किया गया है। यक्ष के एक सवाल के जवाब में युधिष्ठिर ने बताया था कि मृत्यु अवश्यंभावी है, तब भी मनुष्य जीवन जीने की कामना में लगातार लगा रहता है। यह सबसे बड़ा आश्चर्य है। जयश्री पुरवार लिखती हैं 'रबीन्द्र नाथ विश्व साहित्य के एक ऐसे साहित्यकार थे जिनकी लेखनी से मानव जीवन दर्शन का कोई विषय नहीं अछूता नहीं रहा। किशोर कवि को मृत्यु प्रिय लगती है। मरण से कौन नहीं डरता। पर कवि के लिए तो मरण अपने प्रिय के समान है। जितना प्रिय राधा को श्याम है उतना ही प्रिय कवि को मरण। मृत्यु पर कवि के विचारों का भाव हमें आकर्षित करता है। कवि कहते है, "यदि आप जीवन को सत्य के रूप में जानना चाहते हैं, तो आपको मृत्यु के माध्यम से इसकी पहचान ढूंढनी होगी। जो व्यक्ति मृत्यु से भय खाता है और जीवन में अटका रहता है, उसे जीवन नहीं मिलता क्योंकि उसके मन में परलोक के प्रति उचित सम्मान नहीं है। जो मनुष्य मृत्य...