स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'देवरिया के दिन'
स्वप्निल श्रीवास्तव महानगरों से जुड़े जनपदों की मुसीबत यह होती है कि उनका उतना विकास नहीं हो पाता जितना होना चाहिए था। गोरखपुर के पड़ोसी देवरिया ऐसा ही जनपद है। देवरिया मूलतः एक कस्बाई शहर है। जनपद के दूर दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोगों की वजह से यह गुलजार रहता है। देवरिया भोजपुरी भाषाभाषी जिला है। यहां लोगों का लोकप्रिय भोजन लिट्टी चोखा है। साहित्यिक हलकों में भी मोतीराम बी ए, शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी, ध्रुवदेव मिश्र पाषाण जैसे प्रमुख रचनाकारों ने इसे केन्द्र में बनाए रखा। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव अपनी रोजी रोटी के क्रम मे कुछ दिन देवरिया में भी पदस्थापित रहे। आजकल वे उन शहरों के बारे में तफसील से लिख रहे हैं। इस बार उन्होंने देवरिया की यादों को स्मृतिबद्ध किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'देवरिया के दिन'। 'देवरिया के दिन' स्वप्निल श्रीवास्तव वे शहर मुझे बहुत अच्छे लगते है खासकर वे शहर जो शहर होने की प्रक्रिया में होते है उसमें लोकगंध बची रहती है। शहर के चारों तरफ गाँव की आबादी हो और गाँव के लोगों का शहर में आ...