संदेश

कर्मेंदु शिशिर का आलेख 'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा'

'अवधेश प्रधान के गद्य के साथ छोटी सी सहचर यात्रा' कर्मेंदु शिशिर डॉ. रामविलास शर्मा ने नवजागरण की जिस अवधारणा को प्रस्तुत किया था, वह तमाम तरह के विरोध, आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद न सिर्फ स्वीकृत हुआ बल्कि अनेक विचार कनछियों के साथ एक विराट वट वृक्ष की तरह स्थापित हुआ। अब नवजागरण की अवधारणा में इतने विचार वैविध्य का समावेश हो चुका है, उसका इतना विस्तार हो चुका है कि उसे नकारना किसी के लिए संभव नहीं। बावजूद उसके विरोध के स्वर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देते रहे हैं। विचारणीय बात यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल नवजागरण की अवधारणा अपनी मूल प्रकृति में ही उपनिवेशवाद के विरोध में थी। उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बावजूद नवजागरण का विरोध इस बात का सबूत है कि इसके जीवाश्म अभी भी मौजूद हैं, जिसकी उपस्थिति हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ये पाश्चात्य आधुनिकतावादियों की शक्ल में मिलते हैं। इनकी जड़ें इस देश में नहीं होती, ये हथेलियों पर ठगे जड़विहीन लोग हैं। इनकी कोशिशें भारतीय नवजारण के आधार-स्तंभों पर लगातार चोट कर उसे संदिग्ध करने क...

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'पिया तोसे नैना लागे रे'

चित्र
प्रचण्ड प्रवीर  उम्र के एक पड़ाव के दौरान एक दूसरे के प्रति लगाव सहज ही हो जाता है। कई बार यह लगाव महज दोस्ती तक सीमित रह जाता है तो कई बार यह प्यार जनम जनम के रिश्ते में तब्दील हो जाता है। कभी लगता है प्यार झूठा है तो कभी यह सच्चा लगने लगता है। हँसी मजाक जीवन की एकरसता को तोड़ते हैं और व्यक्ति को जीवन्त बनाते हैं। खासकर प्यार में इस हँसी मजाक की भूमिका अलग रंगत लिए होती है। प्रचण्ड प्रवीर अपनी कहानियों में हिन्दी फिल्मी गीतों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। इस कहानी में भी कुछ रोमांटिक गीत गज़ल का प्रयोग उन्होंने बखूबी किया है। इस कहानी का शीर्षक ही एक लोकप्रिय गीत के मुखड़े से लिया गया है। बहरहाल आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'पिया तोसे नैना लागे रे'।   कल की बात – २९१ 'पिया तोसे नैना लागे रे' प्रचण्ड प्रवीर  कल की बात है। जैसे ही मैँने बृजेश के घर मेँ कदम रखा, मेहमानों की भीड़ मेँ से दमकती सुचित्रा भाभी निकल कर मेरी तरफ आयीँ। मैँने उनको जन्मदिन की बधाई देते हुए फूलों का गुच्छा उनकी ओर बढ़ायी। उन्होँने उलाहना दिया, “ये क्या फूल-पत्ते? मुझे लगा था कि आप ...

मिज़ाज की कहानी 'संडे की ओ टी पी'

चित्र
मिज़ाज व्यवहार और सिद्धान्त भले एक दूसरे से जुड़े प्रतीत होते हैं लेकिन उनमें हमेशा एक गहरी फाँक होती है। इसीलिए ट्रेनिंग या अभ्यास की जीवन में एक बड़ी भूमिका होती है। यह जान कर आपको ताज्जुब हो सकता है कि हमारे इर्द गिर्द तमाम लोग ऐसे भी हैं जो गेहूँ, जौ, अरहर, अलसी, मूँग, मसूर के पौधे को नहीं पहचान सकते। ये ऐसे लोग हैं जो पैक्ड बैग में यह सब खरीदते और उपयोग करते हैं। जो इन फसलों तक से अनभिज्ञ हैं वे किसानों की संवेदनाओं और दिक्कतों को कैसे समझ सकते हैं। यह ठीक है कि  खेती किसानी से जुड़े लोग इन फसलों की खेती  अपनी आजीविका के लिए करते हैं लेकिन दुनिया की भूख को मिटाने की जिम्मेदारी भी यही निभाते हैं। ये किसान अनाज के इन पौधों को आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि खेती  से उनके सरोकार गहरे तक जुड़े होते हैं। मिज़ाज ने इसी सन्दर्भ को ले कर कहानी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  मिज़ाज  की कहानी 'संडे की ओ टी पी'। कहानी 'संडे की ओ टी पी' मिज़ाज वह इतवार का दिन था और सोया को  आफिस नहीं जाना था। सोया महज़ 22 वर्ष की थी और कैंपस प्लेसमेंट के बाद मेट्रो शह...

प्रतुल जोशी का आलेख 'कोसी का घटवार' : प्रेम की वेदना और युद्ध के अवसाद से उपजी रचना

चित्र
कोई भी रचनाकार अपनी रचनाओं के दम पर लम्बे समय तक पाठकों के मन मस्तिष्क में अपनी जगह बनाए रखता है। रचनाकार की एक दो रचनाएँ ऐसी होती हैं जो उसके लेखकीय व्यक्तित्व का प्रतीक बन जाती हैं। प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी इसके अपवाद दिखाई पड़ते हैं। उनके पास एक नहीं बल्कि कई ऐसी कहानियाँ हैं जिनका जिक्र उनके नाम के साथ किया जाता है। 'कोसी का घटवार', 'दाज्यू', 'बदबू', 'मेंटल', 'नौरंगी बीमार है' जैसी कालजई कहानियों की याद तत्काल ही आती है। इनमें भी प्रमुख तौर पर 'कोसी का घटवार' कहानी की याद आती है जिसका अंदाजे बयां एक क्लासिकल कहानी का है। कहानी लिखते समय उस समय का परिवेश भी उसमें दर्ज हो जाता है जो कहानी को विश्वसनीय बनाती है। इस कहानी के कथा सूत्रों को पकड़ने का प्रयास कई आलोचकों ने किया है। प्रतुल जोशी ने कहानी के उन कथा सूत्रों की तहकीकात करने की कोशिश की है जो 'कोसी का घटवार' कहानी लिखे जाने में सहायक बने। अपने आलेख में वे लिखते हैं 'इस बहुचर्चित कहानी की लोकप्रियता को समझने के लिए आज से 78 वर्ष पूर्व के भारत देश में जाना पड़ेगा। यह व...

गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'

चित्र
गरिमा श्रीवास्तव  सामान्य तौर से देखने पर यह लगता है कि इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ कर इतिहास में स्त्रियाँ प्रायः नदारद हैं। यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर ऐसा क्यों है? साहित्य में भी इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। गरिमा श्रीवास्तव ने अपने महत्त्वपूर्ण शोध लेख के जरिए वास्तविकता की पड़ताल की है। इसके लिए उन्होंने भारतेन्दु युग की स्त्री कविता की तहकीकात की है। ज्ञातव्य है कि भारतेन्दु युग से ही आधुनिक हिन्दी साहित्य की शुरुआत मानी जाती है। अपनी पड़ताल करते हुए उन्होंने  पाया है कि आमतौर पर जो दिखाया बताया जाता है सच वही नहीं है। सच का पहलू कुछ और ही है। मुंशी देवी प्रसाद द्वारा सम्पादित ‘महिला मृदुवाणी’ का प्रकाशन 1904 में हुआ। इसमें उस समय की 35 कवयित्रियों की रचनाएँ इसमें संकलित हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं : कविरानी चौबे लोकनाथ जी स्त्री अर्धांगिनी जी, ठाकुरानी काकरेची जी, कुशला, खगनिया, गिरिधर कविराय की स्त्री, चंद्रकला बाई, चाम्पादे रानी, छत्रकुंवरी बाई, जामसुता जाडेची जी, श्री प्रताप बाई, झीमा, पंडितानी तीजांजी, ताज, तुलछराय, पद्मा, बीरा, प्रतापकुंवरी बाई, मीरा बाई, ...