संदेश

अनन्त कुमार सिंह की कहानी 'मदार के फूल'

चित्र
अनन्त कुमार सिंह  भारतीय जाति व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी उसमें निहित असमानता है। इस असमानता को ले कर समय समय पर उन जातियों द्वारा प्रतिवाद किया जाता है। यह प्रतिवाद आज भी जारी है। बिहार में भूमिहार सामंती वर्ग के खिलाफ भूमिहीन मजदूरों ने एक लम्बी लड़ाई लड़ कर अपना हकों हुकूक पाने के लिए संघर्ष किया और बहुत हद तक उसे प्राप्त भी किया। जमींदार और उनकी जमींदारी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। कहानीकार अनन्त कुमार सिंह ने वह दौर देखा और जाना था। जन पक्षधरता के चलते उन्होंने उन भूमिहीनों को हक की लड़ाई में साथ दिया जो अभी तक किनारे कर दिए गए थे। अनन्त बाबू की एक लोकप्रिय कहानी है 'मदार के फूल'। इसी नाम का उनका एक संग्रह भी है। बीते 5 अप्रैल 2026 को उनका निधन हो गया। उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।  'चौराहे पर', 'लातूर गुम हो गया', और 'राग भैरवी' के अतिरिक्त 'कठफोड़वा तथा अन्य कहानियां', 'तुम्हारी तस्वीर नहीं है यह', 'प्रतिनिधि कहानियां', 'ब्रेकिंग न्यूज', 'नया साल मुबारक हो तथा अन्य कहानियाँ' तथा 'अब और नहीं...

जयंत जिज्ञासु का आलेख 'अपने पैमाने वाले चंद्रशेखर जी'

चित्र
चंद्रशेखर  चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के कुछ उन पुरोधाओं में से एक रहे हैं जिनका सम्मान हर पार्टी के लोग किया करते थे। उन्होंने कांग्रेस तब छोड़ी जब वे कोई बेहतर पद प्राप्त कर सकते थे। उन्होंने जेल जाना पसंद किया लेकिन नैतिकता से समझौता करना उनका उसूल था ही नहीं। उस समय जनता पार्टी का गठन करने में उनकी भूमिका अग्रणी थी। चंद्रशेखर जी को नवगठित जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया।पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्ध आज भी अच्छे नहीं हैं और उसके साथ हमेशा एक युद्ध उन्माद जैसी स्थिति बनी रहती है। चंद्रशेखर जी ने तब भी पाकिस्तान के साथ युद्ध का विरोध किया। यही नहीं परमाणु बम बनाने के पक्ष में भी वे नहीं रहे। आज युद्ध के उन्माद में डूबी हुई दुनिया के लिए उनके सन्देश कारगर साबित हो सकते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के वे हमेशा समर्थक रहे। प्रधानमंत्री बनने के पश्चात एक अवसर पर उन्होंने कहा "मैं उन नौजवानों से कहना चाहता हूं, उनके विचारों से मैं असहमत हो सकता हूं, उनकी मांगों को मानने में शायद मैं असमर्थ हो सकता हूं। लेकिन मैं उनको न्योता देता हूं, अपनी बातों को रखने के लिए पूरे आज़ाद हैं। प्रतिरोध का...

सुरेश कुमार का आलेख 'उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियां'

चित्र
सुरेश कुमार  एक लम्बे अरसे तक पुरुषों की यह परम्परागत सोच बनी रही कि स्त्रियाँ उनसे हर मामले में कमतर होती हैं। इस मुद्दे को ले कर एक लम्बी बहस भी चली। उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों को मर्दवादियों द्वारा ‘गृहिणी’ और ‘जाहिल’ होने का ख़िताब दिया जा रहा था।  औपनिवेशिक भारत में बीबी रत्नकुँवर और कुलीन जैनमती इन दोनों लेखिकाओं ने स्त्री लेखन और बौद्धिक निर्मितियों को बड़ी शिद्दत के साथ गति प्रदान की थी।  बीबी रत्नकुँवर ने ‘प्रेतरत्न’ नामक संग्रह रच कर इस अवधारणा के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करते हुए स्त्रियों के पक्ष को मजबूती से सामने रखा और यह बताया कि स्त्रियाँ किसी भी मामले में कमतर नहीं होतीं। बीबी रत्नकुँवर उन्नीसवीं शताब्दी की महान कवयित्री और विदुषी लेखिका थी। रत्नकुँवर की यह पहल हिंदी नवजागरण काल के इतिहास में स्त्री बौद्धिकता की निर्मितियों और दख़ल की तरफ इशारा करता है। सुरेश कुमार स्वतंत्र शोध अध्येता हैं। इन दिनों नवजागरणकालीन साहित्य पर स्वतंत्र शोध कार्य कर रहे हैं। रत्नकुँवर के संग्रह और अवधारणाओं पर सुरेश कुमार ने एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते ...