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सुनील मिश्र की गजलें

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सुनील मिश्र परिचय सुनील मिश्र लेखन विधा मुख्यत: ग़ज़ल। ग़ज़लें व कविता-कहानियां, लेख-समीक्षाएं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं जैसे ‘सारिका’, ‘समकालीन परिभाषा’, ‘आजकल ‘ आदि में प्रकाशित। संयुक्त सचिव (सेवा-निवृत्त), भारत सरकार  नींद मनुष्य की रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल है। नींद से शरीर की थकान तो मिटती ही है वह आगे काम करने के लिए ऊर्जा जुटाने का काम भी करती है। सामान्य तौर पर नींद हमारे रोजमर्रा में ऐसे शामिल है कि हम इसके महत्व का आभास तक नहीं कर पाते। लेकिन अगर यह नींद ही गायब हो जाए तो क्या होगा? अक्सर कई ऐसी दिक्कतें सामने आती हैं जो हमारे जीवन के सामान्य चक्र को बाधित कर देती है। नींद भी उसमें से एक है। नींद में मनुष्य ख्वाब देखता है और उस ख्वाब को फिर पूरा करने की कोशिश में जुट जाता है। लेकिन आजकल हमारे इर्द गिर्द ऐसी तमाम घटनाएं घटित हो रही हैं जो बुरे ख्वाब सरीखी हैं। हम  कोई ऐसा बुरा ख्वाब देखते हैं और फिर नींद ही काफूर हो जाती है। नींद और नींद में ख्वाब देखना सामान्य सी बात है लेकिन बुरे ख्वाबों के चलते नींद का गायब हो जाना असामान्य है। और जब नींद ही गायब हो जाए तब ज...

चन्द्रेश्वर का संस्मरण 'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'

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अनन्त कुमार सिंह  हाल ही में पटना में अनन्त कुमार सिंह पर जनवादी लेखक संघ की एक गोष्ठी हो रही थी। गोष्ठी के कई वक्ता ऐसे भी थे जो अनन्त कुमार सिंह के व्यक्तित्व और लेखन से परिचित ही नहीं थे। तब वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र कुमार ने इस बात पर अपनी चिन्ता जाहिर करते हुए कहा कि जनवादी लेखक संघ बिहार के सदस्य तक अगर अनन्त बाबू को नहीं जानते हैं तो यह दुखद है। अगर हम अपने ही लोगों को नहीं पढ़ेंगे तब साहित्य और रचना कर्म कैसे आगे बढ़ पाएगा। जब जनवादी लेखक संघ बिहार के लोग अनन्त बाबू को नहीं जानते तो बाहर के लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है। अनन्त जी ने 100 के आस पास कहानियां लिखी, एक उपन्यास लिखा और इसके साथ साथ सीमित संसाधनों के बावजूद आरा से 'जनपथ' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का निरन्तर संपादन करते रहे। कवि चन्द्रेश्वर से भी अनन्त जी के कुछ खट्टे कुछ मीठे सम्बन्ध रहे। अपने संस्मरण में चन्द्रेश्वर ने अनन्त बाबू को बेबाकी से याद किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चन्द्रेश्वर का संस्मरण 'स्मृतियों में कथाकार अनंत बाबू'। अनंत कुमार सिंह पर संस्मरण  'स्मृतियों में कथा...

परांस - 13 : अरविंद शर्मा की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  आमतौर पर अन्तिम दिन का इंतजार करना कोई नहीं चाहता। किसी विद्यालय का अन्तिम दिन हो या नौकरी का, यह एक समूचे वृतान्त का पटाक्षेप होता है। अन्तिम दिन से कई बातों, कई रूढ़ियों से भी मुक्ति मिल जाती है। वही रूढ़ियां जिनके प्रति कभी एक चिढ़ जैसी होती थी अब अचानक ही मोहसक्त करने लगती हैं। बहरहाल मनुष्य की उस प्रवृत्ति का क्या कहा जा सकता है जिसमें वह हर बीते पल को आगे के लिए सुरक्षित संरक्षित कर लेना चाहता है। इन स्मृतियों के सहारे वह अपने आगे के सफर को बेहतर बनाना चाहता है। यही जीवन है जो विरोधाभासों के बीच भी कदम दर कदम आगे बढ़ता रहता है। जम्मू के कवि अरविन्द शर्मा अपनी कविता 'मोह' में लिखते हैं 'स्कूल के अंतिम दिन,/ आ कर,/ उतारनी थी वर्दी,/ फिर कभी न पहनने के लिए/ उस दिन,/ नहीं उतारी आते ही,/ उतारी ही नहीं गई/ देर शाम, बहुत बोझिल मन से,/ उतारी भी तो बहुत सहेज कर।/ जकड़ लेना उन्हीं बेड़ियों को/ जिनसे छूटने की चाह में जिए/ क्या ऐसा ही होता है/ अंतिम दिन?' अरविन्द की भाषा में टटकापन है। विषय भी अलग किस्म के हैं जो कवि की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। अपनी कविताओ...