चित्रा वर्मा एवं मदन मोहन वर्मा का आलेख 'देश विभाजन और गांधी'
भारत विभाजन के लिए लोगबाग आजकल सारा दोषारोपण कांग्रेस और गांधी जी पर डाल देते हैं। एकांगी और बिना सोचे विचारे बोलने वाले लोग ही ऐसा कह सकते हैं। आज इतिहास ही सबका आसान शिकार है। जिसको जो मन आए बोल सकता है। यह कितना हास्यास्पद है कि जिन्होंने इतिहास का 'क ख ग़' तक नहीं पढ़ा, वे आज इतिहास को ही बदल डालने की बातें करते हैं। भारत विभाजन के लिए तमाम परिस्थितियां उत्तरदाई थीं, जो अपने आप में बहुत जटिल थीं। आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले गांधी जी , 1942 के आंदोलन के पश्चात पार्श्व में चले गए। सांप्रदायिक ताकतें अपना खुला खेल खेलने लगीं। जिसका खामियाजा अन्ततः देश को भुगतना पड़ा। सवाल यह है कि दोषी कौन नहीं था? क्या गांधी जी की ही यह एकल जिम्मेदारी थी कि वे देश को अविभाजित रखें? यह देश तो सबका था और आज भी है। किसी पर दोषारोपण कर आप अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते। जो गांधी जी लगातार यह कहते रहे कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा, उन्हें कितना मजबूर हो कर यह विभाजन स्वीकार करना पड़ा होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। क्या गांधी के अलावा किसी और का इस तरह का बयान मिलता है...