कैलाश बनवासी की कहानी 'सही या गलत?'
कैलाश बनवासी जिन्दगी की गाड़ी को सुचारूपूर्वक चलाने के लिए सभी को एक उम्र में रोजगार की जरूरत होती है। देश के अधिकांश युवा सरकारी नौकरियों के लिए दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करते हैं। लेकिन नौकरियां इनी गिनी होती हैं जबकि आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। रही सही कसर हमारे देश की लचर व्यवस्था निकाल देती है जिसमें पेपर लीक होने से ले कर नियुक्तियों में धांधलेबाजी की समस्या आम है। आजकल के युवा मजाक में कहते भी हैं कि आपलोगों को प्री मेंस और इंटरव्यू देने होते थे। आजकल तो उसमें एक चौथा आयाम कोर्ट भी जुड़ गया है। और कोर्ट जब तक मामला सुलझाए तब तक उम्र बीत जाती है। कैलाश बनवासी की कहानी में एक पात्र आज नौकरियों की हकीकत को कुछ इस तरह बयां करता है : ‘पापा, आप लोगों का ही टाइम अच्छा था,” बेटा अक्सर मुझसे कहता है, “कम से कम जो वेकेंसी निकलती थी, वो फुलफिल तो होती थी! यहाँ तो ढेर सारे प्रॉब्लम्स हैं...। बल्कि पूरी सीरिज है प्रॉब्लम्स की! परीक्षा से ऐन पहले ही पेपर लीक हो जाता है...। मेरे दो इम्पोर्टेंट एग्जाम्स के पेपर लीक हो गए थे और एग्जाम कैंसिल! अगर एग्जाम किसी तरह हो भी गए तो रिजल...