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भोलानाथ गहमरी के गीत

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  भोजपुरी गीतों का आकलन प्रायः कुछ भोंडे गायकों के अश्लील गानों से किया जाने लगा है। लेकिन भोजपुरी गीतों का यह विकृत सच है। भोजपुरी तो सनेह और जियरा की भाषा है। भोजपुरी में बेहतरीन गीतों और गायकों की एक समृद्ध परम्परा रही है। मोहम्मद खलील से ले कर आज के गायक भरत व्यास और शारदा सिन्हा तक। रफी ने भी कुछ उम्दा भोजपुरी गीत गाए हैं जो दिल जीत लेते हैं। 'कि रस चुवेला' गीत को याद करिए, ऐसी मधुरता और ऐसे अर्थ सन्दर्भ दुर्लभ हैं। भोला नाथ गहमरी भोजपुरी के ऐसे गीतकार रहे हैं जिन्होंने एक से बढ़ कर एक गीत लिखे जिसे कई महत्त्वपूर्ण गायकों ने अपना स्वर दिया। गहमरी जी का एक संग्रह भी 'लोक रागिनी' नाम से प्रकाशित हुआ था। लेखक अखिलेश श्रीवास्तव चमन के पास लोक रागिनी की वह दुर्लभ प्रति है जिसे गहमरी जी ने अपने हस्ताक्षर के साथ उन्हें दिया था। हमारे आग्रह पर चमन जी ने गहमरी जी के गीत उपलब्ध कराए हैं। इसके लिए हम उनके आभारी हैं। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं भोला नाथ गहमरी के गीत। गीत के साथ हमने लोक रागिनी की वह भूमिका भी दी है जो बीते समय में प्रकाशन की दुश्वारियों को भलीभांति रेखांकित क

सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'हास्य और व्यंग्य : एक पुनर्विचार'

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  सेवाराम त्रिपाठी  आमतौर पर व्यंग्य रचनाओं को हास्य से जोड़ कर देखने की परम्परा है। लेकिन यह सच नहीं है। व्यंग्य अलग है, हास्य रचना अलग। व्यंग्य रचनाएं गम्भीर होती हैं इसीलिए गहरे तक बेधती हैं। दूसरी तरफ हास्य रचनाएं हल्की होती हैं और तात्कालिक तौर पर मन में विनोद भाव पैदा करती हैं। इनका मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव नहीं पड़ता। तात्कालिकता हास्य की नियति होती है। सेवाराम त्रिपाठी ने व्यंग्य और हास्य के इस अन्तर को स्पष्ट करते हुए इस पर विचार किया है। आइए आज पहली बार ब्लॉग पर पढ़ते हैं सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'हास्य और व्यंग्य :  एक पुनर्विचार'। 'हास्य और व्यंग्य :  एक पुनर्विचार' सेवाराम त्रिपाठी                हास्य और व्यंग्य को ले कर बहुत बड़ा घपला पाठकों के बीच भी है और तथाकथित व्यंग्यकारों की दुनिया के पास भी। वैसे कहा जाता है व्यंग्य, लेकिन उसमें हास्य ही हास्य धूम मचाता रहता है। जादू-टोना दिखाने वालों की भांति कुछ व्यंग्य-याफ्ता भी वहां अपना मजमा लगाए हुए हैं। हास्य, उपहास, परिहास, मज़ाक, मसखरी और हरक्की इसके कई रूप अनवरत प्रकट होते रहते हैं? तुलसीदास ने नारद के

शंभुनाथ का आलेख फिल्म 'गांधी गोडसे एक युद्ध' पर चंद बातें'

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  इतिहास के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि यह झूठ का साथ नहीं देता। दिक्कत यह भी है कि यह आधारहीन बातें नहीं करता। जो  भी बात करता है उसके लिए सबूत या स्रोत मांगता है।  कई बार यह काफी असुविधा भी पैदा करता है। इससे बिलग साहित्य में रचनाकार को कल्पना लोक में उड़ने की पूरी आजादी होती है। यहां सबूत नहीं गढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है। एक बात और भी है कि इतिहास स्रोत के रूप में साहित्य का भी सहारा लेता है। अलग बात है कि ऐसा करते समय इतिहासकार को बहुत सजग सतर्क रहना पड़ता है। जब हम इस जगह पर खड़े हो कर देखते हैं तो मामला दिलचस्प हो जाता है। इधर एक फिल्म आई है 'गांधी गोडसे एक युद्ध'। चूंकि इस फिल्म के लेखक के रूप में असगर वजाहत का नाम जुड़ा है इसलिए बौद्धिक वर्ग में इसे ले कर वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा समय उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है जो किसी न किसी रूप में हिन्दू राष्ट्रवाद या प्रतिक्रियावाद से जुड़ी हुई हैं। गोडसे इसका वाहक है। गांधी उस समन्वय के पक्षधर थे जो सभी को साथ ले कर चलने में यकीन करती है। गांधी को पता था कि सबको साथ लिए बिना भारत अं

अवंतिका प्रसाद राय की कविताएं

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  अवंतिका राय महानगरीय सभ्यता ने प्रकृति से ले कर मनुष्य सबको बुरी तरह प्रभावित किया है। निश्छल मन इससे आक्रांत होता है और खुद को बिलग महसूस करता है। विजय बैगा हो, सुदामा बंसफोर या फिर स्वयं कवि इन सारे बदलावों का साक्षी होते हुए भी हतप्रभ है। समय की सुई पीछे नहीं घूमती। वह हमेशा आगे ही देखती और चलती है। लेकिन यह बात मानीखेज है कि कुदरत के होने से ही इस समय और समय की सुई का अस्तित्व है। कवि अवंतिका राय ने कम लिखा है। और लिखने से भी बहुत कम छपे हैं। वे एक सजग, सतर्क और उस मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति हैं जिसमें सबके लिए समान जगह और सम्मान बचा हुआ है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं कवि अवंतिका राय की कविताएं। अवंतिका प्रसाद राय की कविताएं बच्चे और खिड़कियां मकानों में खिड़कियां ढूंढ़ ही लेते हैं बच्चे  उठो उठो जैसे पूरब से उठता है सूरज पृथ्वी को जीवन देते हुए जैसे उठता है कहानियों का नायक चतुर्दिक अपनी आभा बिखेरते हुए और लड़ता है निर्णायक युद्ध ऐसे उठो जैसे उठता है गुलाब उठता है वृक्ष असंख्य प्राणियों का आश्रय बन अपने जीवन से जीवधारियों का प्राण स्पंदित करते हुए उठो जैसे उठता है शिक्षक बच्चों क