विहाग वैभव के कविता संग्रह पर शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की समीक्षा 'हिंसा की शिनाख़्त करती बेबाक कविता का विकल कवि: विहाग वैभव'
यह देश किन लोगों का है? क्या कुर्सी पर बैठे हुए उन नेताओं का है जिनके लिए झूठ ही सच और सच ही झूठ बन जाता है। क्या यह देश उन नौकरशाहों का है जो अपने छल छद्म से नौकर की बजाय मालिक जैसा आचरण करने लगते हैं। क्या यह देश उन दलालों और ठेकेदारों का है जो अपनी पुश्त दर पुश्त के लिए सारा धन अपने पास कर लेना चाहते हैं। यह देश उन निश्छल किसानों और कामगारों का है जिनके पास यकीन है कि यह देश उनका है और तीन पाँच करने वालों से डरने की कोई जरूरत नहीं। अ रसा पहले कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक कविता लिखी थी 'देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता'। इस कविता में वे लिखते हैं : "इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/ कुछ भी नहीं है/ न ईश्वर/ न ज्ञान/ न चुनाव/ कागज पर लिखी कोई भी इबारत/ फाड़ी जा सकती है/ और जमीन की सात परतों के भीतर/ गाड़ी जा सकती है।" और अन्त में वे लिखते हैं : "किसी हत्यारे को कभी मत करो माफ/ चाहे हो वह तुम्हारा यार/ धर्म का ठेकेदार,/ चाहे लोकतंत्र का/ स्वनामधन्य पहरेदार।" विहाग वैभव की कविता उस कड़ी को आगे बढ़ाती है। उनकी कविता में न तो कोई प्रशस्ति गान मिलेगा न ही क...