सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'
सुमन शेखर संवेदनशीलता सही मायने में मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन दुनिया की चालाकियाँ कुछ इस तरह की होती हैं ऐसे मनुष्य का जीवन प्रायः कठिन हो जाता है। यही नहीं सरकारें भी अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप घटनाएं गढ़ लेती हैं और उसी के अनुसार उसे क्रियान्वित कर अपने समर्थकों को खुश रखने में लगी रहती हैं। आदिवासियों जैसे भोले भाले लोग इसके आसान शिकार बनते रहते हैं। मीडिया न्यूज रूम में ही समाचार गढ़ने लगती है और अपना निर्धारित काम छोड़ कर सरकार का गुणगान करने में लगी रहती है। मोगेस बाबू ऐसे ही पात्र हैं जो तमाम वजहों से स्मृतिहीनता के शिकार बन जाते हैं। युवा कहानीकार सुमन शेखर की कहानी पढ़ते हुए हम सिहरते रहते हैं। कहीं कहीं हम खुद मोगेस बाबू के पात्र में तब्दील होते जाते हैं। सुमन शेखर की यह कहानी “पाठ” पत्रिका के जनवरी अंक से साभार ली गई है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'। कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू' सुमन शेखर “कभी कभी लगता है जैसे अपनी ही देह पराई है। अपनी ही देह पहेली है, जिसके बारे में कुछ भी कहना खुद को आ...