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मधु कांकरिया की मेरी ढाका डायरी की शर्मिला जालान द्वारा की गई समीक्षा

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बांग्लादेश दुनिया का एक ऐसा देश है जिसका निर्माण धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के आधार पर हुआ था। राष्ट्र बनने की उसकी प्रक्रिया त्रासद थी और उसे इस क्रम में उसे भयावह नरसंहार का दंश भी झेलना पड़ा। जिस पाकिस्तान से वह लड़ाई लड़ कर वह अलग हुआ था उसकी नींव में ही धर्म था लेकिन इसके संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भविष्य के बांग्लादेश की परिकल्पना की थी। इसके बावजूद, यह विडंबना ही कही जाएगी कि शीघ्र ही एक सैनिक जनरल ने तख्ता पलट कर इसे इस्लामिक राज्य घोषित कर दिया। आज का बांग्लादेश कट्टरवाद की अंधी राह पर चल पड़ा है। बहरहाल वरिष्ठ लेखिका  मधु कांकरिया ने अपना कुछ समय बांग्लादेश में बिताया जिसे उन्होंने 'मेरी ढाका डायरी' के रूप में शब्दबद्ध किया है। बकौल शर्मिला जालान 'डायरी में उनके चिंतक और विचारक रूप की झलक मिलती है जो उन्हें आत्मालोचक और आत्मान्वेषी बनाता है। इसी के साथ इस्लाम, राजनीति, गरीबी और अभाव से जुड़े प्रश्नों को वे मजबूती से उठाती हैं और अपने विचार स्पष्टता से रखती हैं। ढाका को जानने की प्रक्रिया में वे अपनी दुविधाओं और ...

यादवेन्द्र का आलेख 'भूखे पेट रहेंगे पर सिनेमा जरूर देखेंगे'

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यादवेन्द्र  सिनेमा मनोरंजन का ही नहीं, ज्ञान का भी एक प्रमुख माध्यम रहा है। हालांकि एक अरसा पहले हमारे हिन्दी समाज में सिनेमा देखने को अच्छा नहीं माना जाता था। तमाम घरों के लड़के तब छुप छुपा कर ही सिनेमा देखने जाया करते थे। कई ऐसे भी जुनूनी होते थे जो पहले शो का पहला टिकट हासिल कर ही सिनेमा देखने में यकीन करते थे। चाहें इसके लिए कोई भी परेशानी झेलनी पड़े। तब सिनेमा का टिकट लेने के लिए लम्बी लम्बी लाइन लगा करती थी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ती थी। तब अखबारों का एक पूरा पन्ना शहर के सिनेमाघरों में लगी फिल्मों के उल्लेख से ही भरा होता था। यादवेन्द्र जी उस दौर को याद करते हुए उचित ही लिखते हैं 'हमारे अपने जीवन में बीस साल पहले तक सिनेमा हॉल के दरवाज़े जितनी शिद्दत से खुलते थे उसका प्रभाव एकदम जादुई होता था। चालीस पैतालीस साल तक के और उससे बड़े लगभग सभी लोगों की स्मृति में सिनेमा हॉल का जादू ज़रूर जिंदा होगा, सिनेमा हॉल भौतिक रूप में भले ही बंद हो गए हों। तब सिनेमा का साहित्य से एक अटूट रिश्ता हुआ करता था।  लेकिन जमाना बदला और सिनेमा का चरित्र भी बदल गय...

सुजीत कुमार सिंह का आलेख 'लाहौर का जात-पात तोड़क मण्डल जाति-जनगणना के विरुद्ध था'

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सन्तराम बी. ए.  भारत में आजकल जनगणना चल रही है। जनगणना में जातीय प्रश्न को ले कर वाद विवाद की स्थिति रही है। जातीय जनगणना के पक्षधर आबादी में जातियों की सही स्थिति के आधार पर उस जाति के विकास के लिए प्रयास किए जाने के पक्षधर हैं जबकि दूसरी तरफ जातीय जनगणना के विरोधी इसे समाज को खण्डित करने वाला बता कर इसका पुरजोर विरोध करते हैं। वैसे भारत में प्रथम जातीय जनगणना 1931 में हुई।  लाहौर के जात-पात तोड़क मण्डल ने जाति-जनगणना की घनघोर आलोचना करते हुए तत्कालीन जनगणना कमिश्नर डा. जे. एच. हटन को एक मेमोरियल भी भेजा था। सुजीत कुमार सिंह ने उस समय  लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'सुधा' के हवाले से सन्तराम बी. ए. लिखित एक टिप्पणी 'अगली मनुष्य गणना और हमारा कर्त्तव्य' खोज निकली है। भाई परमानन्द और सन्तराम बी. ए. के हस्ताक्षर से जो मेमोरियल जनगणना कमिश्नर को भेजा गया था, उसे भी अगस्त 1930 के अंक में 'समाज-सुधार' स्तम्भ में प्रकाशित किया था। इस टिप्पणी और  मेमोरियल से हमें उस समय की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का भी ज़िक्र मिलता है। उस समय भी  जात-पात तोड़क मण्डल  हिन्दू ...

बेजी जैसन के कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' पर देवेश पथ सारिया की समीक्षा 'मनुष्यता की करुण पुकार'

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मनुष्य जहां पर भी है वह अपनी समस्याओं में परेशान रहता है। यह परेशानी मनुष्य की विशिष्टता भी है। वह इन समस्याओं से जूझते हुए ही आगे अपनी राह बनाता है। इस तरह मनुष्य बाहर तो परेशान है ही, खुद अपने अन्दर भी युद्धरत रहता है। जब तक जीवन है तब तक जीवन की समस्याएँ हैं। यानी समस्याएँ जीवन की निशानी हैं। मौत के बाद सारी समस्याएँ जैसे एकबारगी खत्म हो जाती हैं। बेजी जैसन अपनी कविताओं में मनुष्य की इन समस्याओं को गम्भीरता के साथ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए ऐसे लगता है जैसे हम खुद इन समस्याओं से दो चार हो रहे हों। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से बेजी जैसन का कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' प्रकाशित हुआ है। कवि देवेश पथ सारिया ने इस संग्रह की समीक्षा लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बेजी जैसन के कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' पर देवेश पथ सारिया की समीक्षा 'मनुष्यता की करुण पुकार'। पुस्तक समीक्षा  'मनुष्यता की करुण पुकार' देवेश पथ सारिया बेजी जैसन को मैं एक बेजोड़ अनुवादक के तौर पर जानता आया हूँ। उन्होंने ओशन वुओंग और सायत नोवा ...

परिचय दास का श्रद्धांजलि आलेख 'फिल्म गायिका : सुमन कल्याणपुर'

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सुमन कल्याणपुर  संगीत अपने आप में एक साधना है। रियाज इसका मुख्य हिस्सा होता है। जो इसे साध लेता है वह संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँच जाता है। यह ऊँचाई बिरले ही प्राप्त कर पाते हैं। सुमन कल्याणपुर ऐसे ही गायिकाओं में शुमार की जाती हैं जिनका स्वर अनायास ही श्रोताओं को अपनी तरफ आकृष्ट कर लेता था। उनके समय में तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी जो आवाज को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सके। परिचय दास लिखते हैं 'तब गायकी संवेदना का अपना अनुशासन हुआ करता था। उन्होंने इस अनुशासन को पूरी ईमानदारी से निभाया। शायद इसीलिए उनके गीतों में एक आंतरिक संतुलन दिखाई देता है—जो आज के असंतुलित, जल्दबाज़ संगीत में कम ही मिलता है।' 31 मई 2026 को सुमन कल्याणपुर का मुम्बई में निधन हो गया। उन्हें सादर नमन। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं परिचय दास का महत्त्वपूर्ण आलेख 'फिल्म गायिका : सुमन कल्याणपुर'। श्रद्धांजलि   'फिल्म गायिका : सुमन कल्याणपुर' परिचय दास  1 विरलता की उजली गूँज : सुमन कल्याणपुर सुमन कल्याणपुर का स्मरण किसी गीत को याद करने जैसा नहीं है; वह किसी बहुत पुरानी, बहुत आत्मीय अनुभूति के लौट आने ...