प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख्वाब'
प्रज्ञा पत्रकारीय जीवन प्रायः बेतरतीब होता है। पत्रकारों को रोज ही कोई न कोई नई लकीर खींचनी होती है। उनकी नजर आम तौर पर उन तथ्यों या सूचनाओं पर होती हैं जो उनके अखबार के लिए बिकाऊ हो सके। ऐसे में कई बार हवा में तीर चलाना पड़ता है। वैसे उन सभी काम काज में ही ऐसा ही होता है जहां हर रोज भारी अनिश्चितता होती है। कई ऐसे काम काज हैं जहां रोज कुँवा खोदना और पानी पीना होता है। देश की अधिकांश जनता ऐसा ही अनिश्चित जीवन यापन करती है। समकालीन कहानीकारों में प्रज्ञा ने अपने कहन और अनूठे शिल्प से पाठकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। 'चांद जैसे ख्वाब' उनकी ऐसी ही कहानी है। जिसमें एक पत्रकार जो लक्ष्य ले कर एक जमाने के चर्चित कवि शशांक निकेत जी की पत्नी के पास बातचीत करने पहुंचती है लेकिन बातचीत का सूत्र बेतरतीबी से कवि पत्नी और उनके लेखकीय जीवन की तरफ मुड़ जाता है। वह जीवन जिसके बारे में कवि पत्नी अब यह भी बिसर गई हैं कि उन्होंने पहले कुछ इस तरह का लिखा था। प्रज्ञा की यह कहानी हमने 'बनमाली कथा' से साभार लिया है । तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख...