यादवेन्द्र का आलेख 'देखने में सिर्फ़ वस्तु नहीं शामिल होती'
यादवेन्द्र देखना मनुष्य द्वारा बरती जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। देखने से हम कई चीजें अनुभूत करते हैं और उसे अपनी बातों या रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के देखने का तरीका ही वासनमय हो तो क्या किया जा सकता है। खासकर स्त्री के सन्दर्भ में परंपरागत सोच आज भी दकियानूसी बनी हुई है। स्त्री की कोई भी तस्वीर देख कर सस्ती सी टिप्पणी कर देना ऐसे लोगों के लिए आज आम है। ऐसे लोगों के लिए राजा रवि वर्मा की पेंटिंग अनावृत स्त्री को समझ पाना उनके समझ के बाहर की बात है। जिसके दिल दिमाग में वासना ही भरी हुई हो वह स्त्री सौंदर्य, स्त्री वस्त्रों या साज सिंगार के बारे में क्या सोचेगा या क्या बात करेगा? मधुसूदन आनन्द की कहानी 'देखना' के बहाने यादवेन्द्र जी ने अपने आलेख में इसी पहलू पर कुछ गम्भीर विमर्श प्रस्तुत किया है। आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण रचना को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। कतिपय कारणों से पिछले महीने हम यह कॉलम प्रस...