मणिलाल पटेल की गुजराती कहानी 'बाबा का आख़िरी ख़त'
मणिलाल पटेल एक परिवार में कई व्यक्ति होते हैं। एक परिवार का होने के बावजूद सदस्यों के अलग अलग स्वभाव होते हैं। कोई अपेक्षाकृत उदार, कोई कड़वा बोलने वाला, तो कोई मीठी मीठी बातें करने वाला। मीठी बातें करने वालों से सब भले ही खुश रहें, लेकिन उसका काईयापन खतरनाक होता है। कठोर बोलने वाले से प्रायः सभी रुष्ठ रहते हैं। लेकिन उस कठोरता के पीछे अक्सर एक संवेदनशील मन भी होता है जो अपनत्व से भरा होता है। खासकर अभिभावक को परिवार के सदस्यों के प्रति कड़ा या रुखा व्यवहार अपनाना पड़ता है जिसके पीछे तमाम कारण होते हैं। तीखे व्यवहार के पीछे छिपे सरल सहज मन के बारे में तो कभी-कभी पता भी नहीं चल पाता। और कभी कभी जब इस बात का पता चलता है तब तक देर हो गई होती है। मणिलाल पटेल की गुजराती कहानी 'बाबा का आख़िरी ख़त' इसी भाव भूमि पर आधारित संवेदनशील कहानी है। इस कहानी का खासतौर पर पहली बार के लिए अनुवाद किया है रजनीकांत एस. शाह ने। रजनीकांत ने अपने सरस अनुवाद के जरिए गुजराती के अनेक रचनाकारों की रचनाओं से हिन्दी संसार को परिचित कराया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मणिलाल पटेल की गुजराती कहानी ...