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रोक़ डाल्टन की कविताएं:

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Roque Dalton रोके एंटोनियो डाल्टन गार्सिया सल्वाडोरियन कवि, निबंधकार, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी थे। रोके डाल्टन नाम से वे अधिक प्रख्यात थे। लैटिन अमेरिका के सबसे प्रभावशाली कवियों में उनका नाम अग्रणी है। एल साल्वाडोर (स्पैनिश:República de El Salvador) मध्य अमेरिका में स्थित सबसे छोटा और सबसे सघन आबादी वाला देश है।  मार्क्सवादी-लेनिनवादी होने के नाते, वे 1957 में अल सल्वाडोर की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और उसी वर्ष सोवियत संघ का दौरा किया। बाद में, जोस मारिया लेमस के राष्ट्रपति काल के दौरान विद्रोह भड़काने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कारावास से छूटने के बाद, डाल्टन क्यूबा में निर्वासन में रहे, जहाँ उन्होंने एक लेखक के रूप में अपना करियर विकसित किया और उनकी अधिकांश कविताएँ प्रकाशित हुईं। बाद में उन्होंने प्राग स्थित 'द इंटरनेशनल रिव्यू : प्रॉब्लम्स ऑफ पीस एंड सोशलिज्म' के संवाददाता के रूप में कार्य किया और 1969 में अपनी पुस्तक 'टैबर्ना वाई ओट्रोस लुगारेस' के लिए कासा डे लास अमेरिकास कविता पुरस्कार जीता। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डाल...

पी. कुमार मंगलम का आलेख 'प्रतिरोध के विविध रंग और एक बेहतर दुनिया की हज़ार ख़्वाहिशें: एदुआर्दो गालेआनो

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एदुआर्दो गालेआनो अमरीकी महाद्वीप का नाम आते ही हमारे जेहन में संयुक्त राज्य अमेरिका की तस्वीर उभरती है जो आज दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है। लेकिन इसी महाद्वीप में लातीनी अमरीका और दक्षिण अमरीका भी हैं जिनकी अपनी एक अलग परम्परा है। पहले ये देश यूरोपीय शक्तियों की उपनिवेशवादी नीति के शिकार बने और अब अमरीका की साम्राज्यवादी नीति से आक्रांत हैं। 1831 में मुनरो सिद्धान्त और आज के समय में डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों से अमरीकी मानसिकता को सहज ही समझा जा सकता है। इस परिस्थिति में इन देशों में प्रतिरोध की एक लम्बी परम्परा मिलती है जो यहां के रचनाकारों की रचनाओं में सशक्त रूप से अभिव्यक्त होती है। एदुआर्दो गालेआनो का समस्त लेखन ही प्रतिरोध का लेखन है। कैंसर से चली लंबी लड़ाई के बाद 13 अप्रैल 2015 को एदुआर्दो गालेआनो इस दुनिया से विदा हुए थे। दस साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी गालेआनो आज प्रासंगिक बने हुए हैं। यह इस बात को दिखाता है कि जिस भयंकर रूप से ग़ैरबराबर दुनिया की कई सच्चाइयाँ वह अपने लेखन से उघाड़ते रहे, वह अपनी जगह सिर्फ बरकरार ही नहीं है, बल्कि और ज़्यादा असमान या कहे...

भरत प्रसाद का उपन्यास 'कालकलौटी'

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भरत प्रसाद  जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। इसीलिए प्रकृति जीवन को अपनी तरफ आकर्षित करती रहती है। जीवन भी इस प्रकृति की तरफ स्वाभाविक रूप से झुकता है। पेड़ पौधे, पशु पक्षियां, कीड़े मकोड़े पृथिवी की जैविक समृद्धि में अनमोल रत्न की तरह हैं। इनके बिना पृथिवी और पृथिवी पर के जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। रचनाकारों की रचनाओं में यह प्रकृति अनायास ही आती है। क्योंकि इसके बिना रचनाओं में रवानी नहीं आ पाती। अलग बात है कि विकास के नाम पर आजकल प्रकृति पर ही लगातार प्रहार किया जा रहा है। वन दिन ब दिन सिकुड़ते जा रहे हैं। हम प्रकृति की खूबसूरती को निहारने की बजाए दिन रात मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। अपने आस पास के न तो पेड़ पौधों को पहचानते हैं, न ही पशु पक्षियों को। एक अजनबीयत हम सब पर लगातार हावी होती  जा रही है। हालत यह है कि अपने ही घर परिवार में अब हम अजनबी नजर आने लगे हैं। इससे भयावह और भला क्या हो सकता है। भरत प्रसाद इन दिनों एक उपन्यास ' कालकलौटी'  लिख रहे हैं। पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के दूसरे रविवार को 'कालकलौटी' उपन्यास को धारावाहिक रूप...

शिवदयाल का आलेख 'एकला चलो रे.. ताकि पथ नये खुलते रहें'

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गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की एक कविता है : ‘यदि तुम्हारी पुकार पर/ कोई नहीं आता/ अकेले ही चले चलो.....’ यह कविता व्यक्तिगत तौर पर मुझे काफी आकर्षित करती है। हालांकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यह सामाजिकता ही उसे सही मायने में उसे एक मनुष्य बनाती है, लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं जब मनुष्य को अकेले ही आगे बढ़ने का निर्णय लेना पड़ता है। गांधी जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। गांधी जी ने हालांकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन अगर हम इतिहास को गौर से देखें तो कई अवसरों पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। यहां तक कि भारत का विभाजन न हो इसे ले कर भी वह अकेले पड़ गए। उनके अलावा अपवादस्वरूप शायद ही कोई ऐसा था जो विभाजन के पक्ष में नहीं था। विपरीत परिस्थितियों में भी गांधी अकेले चलते रहे। गांधी और गुरुदेव के रिश्ते जगजाहिर हैं। गांधी जी ने रवीन्द्र नाथ को 'गुरुदेव' कहा जबकि रवीन्द्र नाथ ने गांधी जी को 'महात्मा' की संज्ञा दी। आज के दौर में जब अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अवसरवाद जीवन मूल्य बनते जा रहे हैं ऐसे में किसी भी आदर्शवादी व्यक्ति का अकेले पड़ जाना स्व...