रघुवंश मणि की कविताएँ
रघुवंश मणि आज इस तथ्य से हम भलीभांति अवगत हैं कि पेड़ पौधों में भी जीवन होता है। जीवन की उनकी अभिव्यक्ति मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों से अलग तरह की है। इन पेड़ पौधों की बदौलत इस पृथिवी पर बहुरंगी जीवन है। इनके बारे में अभी तक हम बहुत कम जानते हैं। क्या पेड़ पौधों की भी अपनी कोई भाषा होती है? क्या वे आपस में बातें भी करते हैं? ऐसे तमाम सवाल जेहन में स्वाभाविक रूप से आते हैं। कवि रघुवंश मणि लिखते हैं कि 'हो सकता है पेड़ों की कोई भाषा हो/ मैं क्या बता सकता हूँ/ संभव तो है कि वे एक दूसरे से/ बातें करते हों तरंगों में/ और भी तो माध्यम हो सकते हैं/ शब्दों के अतिरिक्त/ हो सकता है यह भी/ कि उनकी स्मृतियाँ हों सदियों पुरानी/ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संप्रेषित होने वाली/ यादों का इतिहास हो किसी हिस्से में/ जड़ों, तनों, डालियों या पत्तियों में/ हो सकता है वे स्मृतियों को हवा में डाल देते हों/ या पृथिवी में कर देते हो सुरक्षित'। रघुवंश मणि की ख्याति एक उम्दा आलोचक की रही है। लेकिन वे बढ़िया कविताएं भी लिखते हैं जिसकी बानगी यहां पर प्रस्तुत है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रघुवंश मणि की क...