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जतिन दास की पेंटिंग्स पर जॉनी एम एल का आलेख और राजेन्द्र शर्मा की कविताएँ

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जतिन दास कला किसी की मुखपेक्षी नहीं होती। वह अपने आप में स्वतन्त्र होती है। कलाकार किस बात से प्रभावित हो कर अपना सृजन करने लगे, इसका पता उसे भी नहीं होता। समय और परिस्थितियां उसे सृजन की तरफ न केवल उन्मुख करती हैं बल्कि उसे रचनाशील भी बनाती हैं। चित्रकला और कविता का सम्बन्ध घनिष्ठ है। गहराई से देखा जाए तो चित्रों में कोई न कोई कविता पढ़ने को मिल जाएगी दूसरी तरफ कविता को ध्यान से पढ़ा जाए तो कोई न कोई पेंटिंग मन मस्तिष्क में उभर आती है। जतिन दास देश के सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों में शामिल हैं। उनकी पेंटिंग्स समय और सरोकारों से जुड़ी होती है। वे समय समय पर अपनी कूची ऐसे विषयों पर चलाते हैं जो बिल्कुल हमारे बीच के होते हैं। लेकिन अपने आप में खोये लोग उन्हें देख पहचान नहीं पाते। जतिन दास ऐसे लोगों की खोज कर न जीवन उन्हें अपनी पेंटिंग में ढालते हैं बल्कि उन्हें मुख्य धारा में ला देते हैं। सफाईकर्मी जो समाज का कूड़ा कचरा साफ करने का काम रोजाना ही करते हैं उनकी नई पेंटिंग्स का विषय हैं। सफाईकर्मियों की कई उम्दा पेंटिंग्स उन्होंने बनाई है। बकौल जॉनी एम एल - जतिन दास मेरे पास आते हैं और कहते हैं, ...

सदानन्द शाही का आलेख 'धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे : लद्भेसर की प्रेम कथा'

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दूधनाथ सिंह  हमारे समाज के कई चेहरे होते हैं। आमतौर पर हम उन्हीं चेहरों से परिचित होते हैं जो समाज के स्वीकृत प्रतिमानों पर खरा उतरते हैं। जो चेहरे समाज को असहज करते हैं प्रायः उससे बचने की कोशिश की जाती है। समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी आजीविका के तौर पर जरायमपेशा को अपनाते हैं। समाज इन्हें अच्छे नज़रिए से नहीं देखता। दूधनाथ सिंह ने अपनी चर्चित कहानी ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ में जरायमपेशा बाप-बेटे ‘सिउ महतो’ और ‘मरकटवा’ की कहानी का बखान किया है। वैसे यह एकल कहानी नहीं है बल्कि बहुस्तरीय यथार्थ की कहानी है जिसमें समाज के कई एक पहलू को उभारने की कोशिश की गई है। कहानी चूंकि लोक गाथा के रूप में है इसलिए लम्बी होने के बावजूद इतनी रोचक है कि पाठक अगर इसे एक बार पढ़ना शुरू करे तो इन्हें अधूरा नहीं छोड़ सकता। सदानन्द शाही इस कहानी की आलोचना करते हुए लिखते हैं 'हिन्दी कहानी में बहुत दिन बाद बाप-बेटे की ऐसी जोड़ी दिखाई देती है जो प्रेमचंद के घीसू और माधो की याद दिलाती है। प्रकट तौर पर अमानवीय, जरायम लेकिन उनके भीतर बहुत गहरे मनुष्यता का एक सोता कल कल करता हुआ बह रहा है। यह कहानी उस...

रवि नन्दन सिंह का आलेख 'अपनी विनाशलीला के बादशाह: दूधनाथ सिंह'

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दूधनाथ सिंह  लेखक का अपना एक स्वाभिमान होता है। यह स्वाभिमान अमूल्य होता है और किसी भी लेखक को सही मायनों में लेखक बनाता है। इस स्वाभिमान के चलते ही वह किसी लाभ लोभ से मुक्त हो कर मनुष्यता का पक्ष लेता है। आज के समय में लेखक पुरस्कार और सम्मान लेने के लिए लेखक अपनी संस्तुति खुद ही करते कराने में लगे रहते हैं। लेकिन इलाहाबाद ऐसे लेखकों का गढ़ रहा है जो अपने रचनाशीलता के लिए ख्यात रहे हैं। पुरस्कारों की लॉबीइंग से दूर रहने की परम्परा भी यहां रही है। दूधनाथ सिंह अपने ढब के लेखक थे। यह जानने के बावजूद कि लेखन से घर परिवार की बात तो दूर खुद अपना खर्च नहीं उठाया जा सकता,  वे लेखक बनने के लिए ही इलाहाबाद आए और आजीवन लेखन कर्म में लगे रहे। वे खुद को अपनी विनाशलीला के बादशाह कहा करते थे। वे साठोत्तरी कहानी के प्रमुख स्तम्भ तो थे ही, बाद में मुक्तिबोध, महादेवी वर्मा, भुवनेश्वर और धीरेन्द्र वर्मा जो आलोचनात्मक कार्य किया वह बेजोड़ है। अपने आलेख में रविनंदन सिंह लिखते हैं 'दूधनाथ सिंह के व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे साहित्यिक जीवन की उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को अलग-अलग ...