रवि रंजन का आलेख 'नदी का मर्सिया और स्मृतियों का कचनार: केशव तिवारी की कविता का समकालीन पाठ'
केशव तिवारी जीवन के अस्तित्व के लिए पानी जरूरी है। लेकिन दिन ब दिन पानी के स्रोत सिमटते जा रहे हैं। एक खबर के अनुसार जमीन से जितना पानी भारत निकाल रहा है उतना कोई देश नहीं निकालता। इस काम से पृथ्वी की हालत लगातार खराब होती जा रही है। इससे पृथ्वी के संतुलन पर लगातार खराब असर पड़ रहा है। यहां तक की पृथ्वी अपनी धुरी से ही खिसकती जा रही है। दुनिया में जमीन से जितना जल निकाला जा रहा है उसका 25 फ़ीसदी से ज्यादा केवल भारत में हो रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पाया गया है कि नदियां सूखती जा रही हैं। ऐसा वैश्विक स्तर पर हो रहा है। केशव तिवारी की बकुलाही, चन्द्रावल, पहुज, क्वारी, सिंध, धसान, उर्मिल, चेलना और जेमनार जैसी लुप्तप्राय नदियों पर केंद्रित कविताएँ समकालीन हिंदी साहित्य में इको-क्रिटिसिज्म (पारिस्थितिकीय आलोचना) का एक जीवंत और मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को चेरिल ग्लोटफेलिटी (Cheryl Glotfelty) की इस स्थापना के निकष पर परखा जा सकता है कि "साहित्यिक अध्ययन को भौतिक जगत के साथ अंतर्संबंधों की तलाश करनी चाहिए।" केशव तिवारी इन नदियों को केवल जलधाराओं क...