सुमन शेखर द्वारा की गई फिल्म समीक्षा "अभी कई 'मैं वापस आऊँगा' की ज़रूरत है"
1947 में भारत अंग्रेजी गुलामी से आज़ाद हुआ लेकिन इस आजादी में विभाजन की असमाप्य पीड़ा समाहित थी। विभाजन का सबसे बड़ा कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच का अविश्वास और नफ़रत की भावना थी, जिसे दोनों समुदायों के कट्टरपंथियों ने निरन्तर हवा दी थी। दुर्भाग्यवश आज भी हमने उस घटना से सबक नहीं सीखा और नफ़रत जैसे के तैसे हमारे दिलों में जड़ जमाए हुए है। इसी की परिणति उस सिनेमा में भी दिखाई पड़ रही है जो 'कश्मीर फ़ाइल्स' और 'केरल फ़ाइल्स' के नाम से बनाई गई है। ऐसे में हाल में ही निर्देशक इम्तियाज़ अली की 'मैं वापस आऊंगा' ने उम्मीद की लौ जलाई है। आजकल उग्र राष्ट्रवाद के दौर में जब एक दूसरे को फतह करने के दावे बढ़ चढ़ कर किए जा रहे हों, इम्तियाज़ एक अलग प्रयोग करने का जोखिम उठाते हैं। निश्चित रूप से इस फिल्म में विभाजन की त्रासदी को फिल्माया गया है लेकिन उसे नफ़रती माहौल से बिल्कुल अलग रखा गया है। अतीत के घावों को कुरेदने से बचती हुई यह फिल्म उस मनुष्यता को देखने की कोशिश करती है, जो आज के समय में दुर्लभ हो गई है। इस फिल्म की समीक्षा करते हुए युवा कहानीकार सुमन शेखर लिखते हैं ...