सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण-टोला'
सूरज पालीवाल आम तौर पर रामलीला का प्रचलन पूरे उत्तर भारतीय परिदृश्य में दिखाई पड़ता है। स्वाभाविक तौर पर इसमें गाँव के सभी जाति, वर्ग के लोग अपनी अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं। मंच से इतर भी तमाम भूमिकाएँ होती हैं और इसे रूपायित करने का काम प्रायः वे लोग करते हैं जिन्हें निम्न या दलित कहा जाता है। इनके प्रति इसी समाज के तथाकथित सवर्ण तबके की सोच एवं व्यवहार व्यावहारिक नहीं होता है। इनके मेहनताने को ले कर भी अक्सर टकराव होता है और दिक्कतें आती हैं। वरिष्ठ आलोचक सूरज पालीवाल ने कुछ बेहतर कहानियां भी लिखी हैं। ऐसी ही उनकी एक चर्चित कहानी है 'रावण टोला'। पालीवाल जी ने इस कहानी में ग्रामीण स्तर पर जातीय समीकरण, लोगों की सोच और गँवई दाँव पेंच को उजागर करने का प्रयास किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण-टोला'। 'रावण-टोला' सूरज पालीवाल रामलीला समाप्त होने में अभी पाँच दिन बाकी थे। शहर में पढ़ने वाले लड़के भी रामलीला का बहाना लगा कर गाँव में ऐश कर रहे थे। लाल छींट की साड़ी जैसे तहमद की फैशन चल पड़ी थी इस बार गाँव में। बाल भी बाजने के मोहन-कट ...