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सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'

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सुमन शेखर  संवेदनशीलता सही मायने में मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन दुनिया की चालाकियाँ कुछ इस तरह की होती हैं ऐसे मनुष्य का जीवन प्रायः कठिन हो जाता है। यही नहीं सरकारें भी अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप घटनाएं गढ़ लेती हैं और उसी के अनुसार उसे क्रियान्वित कर अपने समर्थकों को खुश रखने में लगी रहती हैं। आदिवासियों जैसे भोले भाले लोग इसके आसान शिकार बनते रहते हैं। मीडिया न्यूज रूम में ही समाचार गढ़ने लगती है और अपना निर्धारित काम छोड़ कर सरकार का गुणगान करने में लगी रहती है। मोगेस बाबू ऐसे ही पात्र हैं जो तमाम वजहों से स्मृतिहीनता के शिकार बन जाते हैं। युवा कहानीकार सुमन शेखर की कहानी पढ़ते हुए हम सिहरते रहते हैं। कहीं कहीं हम खुद मोगेस बाबू के पात्र में तब्दील होते जाते हैं। सुमन शेखर की यह कहानी  “पाठ” पत्रिका के जनवरी अंक से साभार ली गई है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुमन शेखर की कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'। कहानी 'अनहद अविचल मोगेश बाबू'    सुमन शेखर  “कभी कभी लगता है जैसे अपनी ही देह पराई है। अपनी ही देह पहेली है, जिसके बारे में कुछ भी कहना खुद को आ...

पंखुरी सिन्हा का यात्रा वृत्तान्त 'इतिहास के पन्नों में रचा बसा एक शहर-एल्वस'

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  पंखुरी सिन्हा पंखुरी सिन्हा आजकल पुर्तगाल में हैं। इसी क्रम में उन्होंने वहां के खूबसूरत शहर एल्वस की यात्रा की।  एल्वस अपने शानदार किलों और कथीड्रल के लिए ख्यात है। आमतौर पर बात जब शहर के किलेबंदी की आती है तो हम एक किले के बारे में जानते हैं लेकिन एल्वस की किलेबंदी पांच स्तरीय है जिसे पंखुड़ी फाइव स्टार सुरक्षा व्यवस्था का नाम देती हैं। अपने यात्रा संस्मरण में वे लिखती हैं 'एल्वस में महल के अलावा कुल 5 किले हैं, जिनमें मुख्य दो हैं फोर्ते दे नौसा सेन्होरा दा ग्रासा, और फोर्ते दे सैंता लूज़िया! ये दोनों किले 5 सितारा सुरक्षा वाले किले हैं, जिनके चारों ओर वही स्टार शेप्ड दीवारों का जादुई नक्शा है। नौसा सेन्होरा शहर के ऊपर, पहाड़ पर है। लेकिन सैंता लूज़िया शहर की दीवारों के करीब है! जब अगली सुबह दीवारों के एक खूबसूरत जंजाल से निकल कर दूसरे में दाखिल होती हुई किले की आदमकद दीवारों तक पहुँची तो किसी मध्ययुगीन इतिहास की किताब के बीच से गुज़रने का सा एहसास हो रहा था।' यह यात्रा संस्मरण इस तरह लिखा गया है जैसे हम खुद एल्वास से हो कर गुजर रहे हों। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंख...

राकेश कुमार गुप्ता का आलेख 'आरक्षण को नई वैचारिकी नहीं, संवैधानिक ईमानदारी चाहिए'

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राकेश कुमार गुप्ता  आज पहली बार पर हमने शिवदयाल जी का लेख “आरक्षण : नई वैचारिकी की जरूरत” प्रकाशित किया था। इस आलेख के संदर्भ में राकेश कुमार गुप्ता ने अपना यह आलेख भेजा है। वस्तुतः आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना है न कि आर्थिक सहायता प्रदान करना।।समाज के भेदभाव का सामना कर रहे वर्ग को वह सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करना है जो सामान्य तौर पर उसे उपलब्ध नहीं हो पाई है।  इसे उपलब्ध करने के लिए जिस संवैधानिक ईमानदारी की जरूरत थी उसका निर्वहन शासन प्रशासन द्वारा नहीं किया गया। राकेश अपने लेख में लिखते हैं 'आरक्षण का मूल उद्देश्य गरीबी हटाना नहीं है। गरीबी दूर करने के लिए छात्रवृत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, आवास, खाद्य सुरक्षा, कौशल विकास और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता जैसी अनेक नीतियाँ हो सकती हैं। आरक्षण का संवैधानिक उद्देश्य अलग है—राज्य की संस्थाओं में उन सामाजिक समूहों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, जो ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारणों से वहाँ पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर सके हैं। यही अंतर आरक्षण और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के ब...

शिवदयाल का आलेख 'आरक्षण : नई वैचारिकी की जरूरत'

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शिव दयाल भारत का संविधान बनाते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि समाज का सबसे निम्नतम तबका अपने को उपेक्षित महसूस न करें। जाति व्यवस्था की विसंगतियों के चलते दलित समाज एक लम्बे समय तक छुआछूत और अस्पृश्यता का शिकार बना रहा। समाज में सामान्य जीवन जीना भी उसे नसीब नहीं हुआ। लेकिन आजादी के पश्चात संविधान बनाते समय इन वर्गों का जीवन उन्नत करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था का प्रावधान किया गया। यह बात सच है कि आरक्षण की व्यवस्था ने इन वर्गों को एक बेहतर जीवन प्रदान किया। हालांकि इस व्यवस्था की यह खामी रही कि आरक्षण का लाभ कुछ चुनिंदा जातियों को ही मिल सका। बाकी जातियों के जीवन स्तर में वह सुधार न हो सका जो अपेक्षित था। आजकल आरक्षण को ले कर फिर से बातें चल निकली हैं। जब तक निम्नतम जातियों के साथ भेदभाव बरता जाएगा आरक्षण खत्म करने के बारे में सोचा नहीं जा सकता। लेकिन यह सुपात्र व्यक्तियों को मिले या उनको मिले जिन्हें इसकी जरूरत है। इन जातियों के उन वर्गों या लोगों को सामने आना ही होगा जिन्होंने आरक्षण का भरपूर लाभ उठाया है। अपेक्षाकृत बदहाल जीवन जीने वाले लोगों को की ज्यादा जरूरत है। इसी संदर्भ में ...