पीयूष कुमार का आलेख 'नौ कहानियों में नौ दिनों की नौ रातें'
पीयूष कुमार जैसे जैसे हम विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं वैसे वैसे दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। साहित्य अपने समय के सरोकारों को बारीकी से दर्ज करने का काम करता है और इस क्रम में इन दिक्कतों को भी हमारे समय के कहानीकार दर्ज कर रहे हैं। विधा के अन्तर्गत देखें तो कहानियों में यह अभिव्यक्ति और सार्थक रूप में दिखाई पड़ती है। बया के हालिया प्रकाशित कहानी केंद्रित अंक ने एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। इस अंक में कुल सत्ताइस कहानियाँ शामिल है। पीयूष कुमार ने इन कहानियों में से नौ कहानियों को आधार बनाते हुए यह आलोचनात्मक आलेख लिखा है। ये नौ कहानीकार हैं : मधु काँकरिया, महेश दर्पण, रत्न कुमार सांभरिया, रामजी यादव, अंजलि देशपांडे, धनेश दत्त पांडेय, समीना खान, ममता शर्मा और सुमन शेखर। खुद पीयूष कुमार लिखते हैं "यह कहानियाँ जीवन सरोकार की कहानियों के लिहाज से चयनित की गई हैं जिनमें जीवन की कथा निराशा, टूटन, कायरता, जानलेवा संघर्ष, भय और सामाजिक-आर्थिक पराजय के रूप में नजर आती है। यह इस समय की प्रतिनिधि कहानियाँ हैं ऐसे में क्या यह मान लेना चाहिये कि उम्मीद और सुखांत का जीवन अब समाप्त हो गया...