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जितेन्द्र कुमार का संस्मरण 'प्रतिबद्ध कथाकार-संपादक अनन्त कुमार सिंह'

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अनन्त कुमार सिंह  आज के समय में साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिका निकालना एक अत्यन्त दुष्कर काम है। यह एक घर फूंक तमाशा है। साहित्यिक पत्रिका निकालने के लिए जुनून की जरूरत होती है। अनन्त कुमार सिंह में वह जुनून था। एक छोटे से शहर आरा से वे 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते रहे। वे एक प्रतिबद्ध कहानीकार तो थे ही, सम्पादन में भी वह प्रतिबद्धता लगातार दिखाई पड़ती है। इस क्रम में वे विचारों को कभी आड़े नहीं आने देते थे। जनवादी लेखक संघ से जुड़े होने के बावजूद 'जनपथ' के सम्पादन में उन्होंने तमाम ऐसे रचनाकारों की मदद ली जो जन संस्कृति मंच या प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे। आज जब इंसानियत खत्म होती जा रही है, उनके बारे में कहा जा सकता है कि सही मायने में वे एक इंसान थे। जो उनके पास गया खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी मदद हो सकती थी, वे बढ़ चढ़ कर करते थे। 'जनपथ' के अंकों में उन्होंने तमाम नए रचनाकारों को प्रकाशित किया। समय समय पर उन्होंने कई विशेषांक प्रकाशित किए जो अब हिन्दी साहित्य की धरोहर हैं। वरिष्ठ आलोचक जितेन्द्र कुमार अरसे से 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े रहे ह...

प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएँ

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प्रकर्ष मालवीय 'विपुल'  यह समूचा जीवन तमाम कथा कहानियों और किंवदंतियों से भरा पड़ा है। आप कहीं भी जाइए हर जगह या परिवेश से जुड़ी कोई न कोई कहानी आपको मिल जाएगी। वैसे भी हर सौन्दर्य के पीछे एक इतिहास होता है। हर सौन्दर्य के पीछे अनथक श्रम जुड़ा होता है, जो प्रायः अनदेखा रह जाता है। हर सौन्दर्य के पीछे कुछ ऐसी क्रूरताएं होती हैं जो जड़ व्यक्ति में भी सिहरन पैदा कर दे। चेरापूंजी के नोहकलिकाई झरने के पीछे भी एक सिहरा देने वाली किंवदंती है। किंवदंती उस पुरुष चाहत की जो अपने प्रेम को पाने के लिए मासूम की हत्या से भी गुरेज नहीं करता। वैसे प्रेम तो उदात्त बनाता है। सच्चा प्रेम हमारी सोच को विस्तृत करता है न कि संकीर्ण बनाता है। जिस प्रेम में इस तरह की भावनाएं हैं वह विकृति है नं कि प्रेम। कवि प्रकर्ष मालवीय हाल ही में चेरापूंजी गए थे जहां उनका साक्षात्कार न केवल नोहकलिकाई झरने से हुआ बल्कि झकझोर देने वाली किंवदंती से भी हुआ। प्रकर्ष ने इसे अपनी एक कविता में दर्ज किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएं। प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की कविताएँ...

रवि रंजन का आलेख 'नदी का मर्सिया और स्मृतियों का कचनार: केशव तिवारी की कविता का समकालीन पाठ'

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केशव तिवारी  जीवन के अस्तित्व के लिए पानी जरूरी है। लेकिन दिन ब दिन पानी के स्रोत सिमटते जा रहे हैं। एक खबर के अनुसार जमीन से जितना पानी भारत निकाल रहा है उतना कोई देश नहीं निकालता। इस काम से पृथ्वी की हालत लगातार खराब होती जा रही है। इससे पृथ्वी के संतुलन पर लगातार खराब असर पड़ रहा है। यहां तक की पृथ्वी अपनी धुरी से ही खिसकती जा रही है। दुनिया में जमीन से जितना जल निकाला जा रहा है उसका 25 फ़ीसदी से ज्यादा केवल भारत में हो रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पाया गया है कि नदियां सूखती जा रही हैं। ऐसा वैश्विक स्तर पर हो रहा है।  केशव तिवारी की बकुलाही, चन्द्रावल, पहुज, क्वारी, सिंध, धसान, उर्मिल, चेलना और जेमनार जैसी लुप्तप्राय नदियों पर केंद्रित कविताएँ समकालीन हिंदी साहित्य में इको-क्रिटिसिज्म (पारिस्थितिकीय आलोचना) का एक जीवंत और मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को चेरिल ग्लोटफेलिटी (Cheryl Glotfelty) की इस स्थापना के निकष पर परखा जा सकता है कि "साहित्यिक अध्ययन को भौतिक जगत के साथ अंतर्संबंधों की तलाश करनी चाहिए।" केशव तिवारी इन नदियों को केवल जलधाराओं क...