रवि नन्दन सिंह का आलेख 'अपनी विनाशलीला के बादशाह: दूधनाथ सिंह'
दूधनाथ सिंह लेखक का अपना एक स्वाभिमान होता है। यह स्वाभिमान अमूल्य होता है और किसी भी लेखक को सही मायनों में लेखक बनाता है। इस स्वाभिमान के चलते ही वह किसी लाभ लोभ से मुक्त हो कर मनुष्यता का पक्ष लेता है। आज के समय में लेखक पुरस्कार और सम्मान लेने के लिए लेखक अपनी संस्तुति खुद ही करते कराने में लगे रहते हैं। लेकिन इलाहाबाद ऐसे लेखकों का गढ़ रहा है जो अपने रचनाशीलता के लिए ख्यात रहे हैं। पुरस्कारों की लॉबीइंग से दूर रहने की परम्परा भी यहां रही है। दूधनाथ सिंह अपने ढब के लेखक थे। यह जानने के बावजूद कि लेखन से घर परिवार की बात तो दूर खुद अपना खर्च नहीं उठाया जा सकता, वे लेखक बनने के लिए ही इलाहाबाद आए और आजीवन लेखन कर्म में लगे रहे। वे खुद को अपनी विनाशलीला के बादशाह कहा करते थे। वे साठोत्तरी कहानी के प्रमुख स्तम्भ तो थे ही, बाद में मुक्तिबोध, महादेवी वर्मा, भुवनेश्वर और धीरेन्द्र वर्मा जो आलोचनात्मक कार्य किया वह बेजोड़ है। अपने आलेख में रविनंदन सिंह लिखते हैं 'दूधनाथ सिंह के व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे साहित्यिक जीवन की उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को अलग-अलग ...