राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'दिल्ली में गांधी, भगत सिंह और आंबेडकर; सत्ता में डायर की छाया!'
किसी भी देश का लोकतन्त्र तभी सुरक्षित रहता है जब जनता को इस बात की पूरी स्वतंत्रता हो कि वह खुल कर अपनी बात कह सके। लेकिन जब शासन इस बात पर आमादा हो जाए कि वह किसी को कोई प्रदर्शन नहीं करने देगा तब लोकतन्त्र की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। सत्ताधारी दल की भक्ति और देश की भक्ति दोनों अलग अलग बातें हैं। इसे एक साथ जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। भारत ने खुद अपनी आजादी धरना, हड़ताल और प्रदर्शनों के दम पर ही प्राप्त की है। ब्रिटिश सत्ता हमेशा इसे कुचलने का प्रयास करती रही। लेकिन जीत भारतीय लोगों की ही हुई। आज 10 अक्टूबर 2026 को शासन की रोक के बावजूद लोकतन्त्र और उसकी मर्यादा को बचाने के लिए दिल्ली में देश के युवाओं ने ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया है। इस विरोध प्रदर्शन पर राकेश गुप्त अपनी टिप्पणी में लिखते हैं 'जब कोई युवा बिना हिंसा का सहारा लिए अपने अधिकार की मांग करता है, तो वह गांधी की अहिंसक प्रतिरोध परंपरा को जीवित करता है। जब वह भय के बावजूद अन्याय के विरुद्ध प्रश्न पूछता है, तो वह भगत सिंह की निर्भीक चेतना से प्रेरणा लेता है। और जब वह अपने साथ खड़े व्यक्ति की जाति, धर्म या आर्थिक...