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प्रेमकुमार मणि का आलेख 'कबीर की दुनिया'

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  भारतीय मानस को  जिन कुछ  व्यक्तित्वों ने गहरे तौर पर  प्रभावित किया उनमें कबीर का नाम अग्रणी है। भक्त संतों में भी कबीर अपने आप में अनूठे और अलबेले अंदाज़ वाले हैं। उल्टी बानी बोलने का साहस और कवित्व उनमें ही है। यही नहीं उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम धर्म की कुरीतियों और पाखंडों के खिलाफ उस समय बोलने में कोई कोताही नहीं बरती जब दिल्ली में कट्टरपंथी शासन था। कबीर ने इन पाखण्डों पर कड़े प्रहार किए। पढ़ाई लिखाई से जो एक पाखंड हमारे व्यक्तित्व में अनायास ही विकसित हो जाता है, कबीर उससे कोसों दूर थे। कबीर ने उस अमर देस की कल्पना की जहां लोग परिश्रम करना अपना मुख्य धर्म ही नहीं बल्कि कर्तव्य समझते हैं। यहां लोग अपने हाथ की कमाई खाने में यकीन रखते हैं। वे अमरबेल यानी कि परजीवी बनने से बचते हैं।  इस अमर देस की नागरिकता मांगी नहीं जाती बल्कि खुद ब खुद अर्जित की जाती है। प्रेम कुमार मणि ने अपने कबीर की दुनिया आलेख के तहत कबीर को समझने की कोशिश की है।  प्रभात खबर समाचार पत्र के  21 जून 2024 अंक में  साहित्य-संस्कृति पृष्ठ पर प्रकाशित इस आलेख को हम साभार ले रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते

शर्मिला जालान द्वारा सुधा अरोड़ा का लिया गया साक्षात्कार

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  सुधा अरोड़ा  सुधा अरोड़ा हमारे समय की अग्रणी कथाकार हैं। अपनी कहानियों में सुधा जी ने समय के सरोकारों को खुल कर व्यक्त किया है। स्त्री सवाल और सन्दर्भ उनके लेखन के मूल में है। महिलाओं पर केन्द्रित लेखों के संग्रह  ' औरत की दुनिया' में उन्होंने अपने विचार खुल कर व्यक्त किए हैं।  एक दर्जन से अधिक उनके कहानी-संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें ‘महानगर की मैथिली’, ‘काला शुक्रवार’, ‘रहोगी तुम वही’ आदि चर्चित रहे हैं। उनका उपन्यास ‘यहीं कहीं था घर’ शीर्षक से प्रकाशित है। ‘आम औरत ज़िंदा सवाल’ और ‘एक औरत की नोटबुक’ उनके स्त्री-विमर्श-संबंधी आलेखों के संकलन हैं। सुधा जी से एक आत्मीय साक्षात्कार लिया है कथाकार शर्मिला जालान ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  शर्मिला जालान द्वारा सुधा अरोड़ा का लिया गया यह महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार। सातवें दशक की चर्चित कथाकार 'महानगर की मैथिली' की लेखिका सुधा अरोड़ा कुछ वर्षों पहले जब कोलकाता में थीं उन्हें 'भारतीय भाषा परिषद' में दूर से देखा था। खुलता-खिलता रंग। होंठों पर मृदुल मुस्कान आँखों में तैरता पानी। लाल रंग के बार्डर की साड़ी। उनका यह र

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी बीस साल बाद'

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  जिन्दगी अपने आप में एक कहानी है। कुछ कुछ पूरी, कुछ कुछ अधूरी। स्मृतियों को रिवाइण्ड कर हम अतीत में बिताए पलों को न केवल याद करते हैं बल्कि उसे मानसिक तौर पर कुछ समय के लिए जी भी आते हैं। प्रचण्ड प्रवीर ने इसी क्रम में एक कहानी लिखी है 'बीस साल बाद'। कहानी अतीत की दो घटनाओं के हवाले से आगे बढ़ती है। दोनों घटनाओं के अलग अलग होने के बावजूद उनमें एक साम्यता यह है कि अन्त में दोनों में बेबसी दिखाई पड़ती है। यह निम्न मध्यम वर्ग की विडम्बना भी है। कुछ पाठकों को भले ही इस कहानी में कथा सूत्र खोजने में दिक्कत हो, लेकिन प्रवीर की यही शैली उन्हें अन्य रचनाकारों से अलग खड़ा करती है। उनके यहां पाठकों के सोचने विचारने के लिए बहुत कुछ होता है। कल की बात शृंखला के अन्तर्गत वे इस तरह की कहानियां लगातार लिख रहे हैं । इस कड़ी में यह 254 वीं कहानी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'बीस साल बाद'। कल की बात – २५४ ' बीस साल बाद' प्रचण्ड प्रवीर  कल की बात है। जैसे ही मैंने मुद्दतों से बन्द पड़े सिनेमा हॉल के पास खस्ताहाल रेस्तराँ में पहुँचा, मनोज मेरा इंत

मुसाफिर बैठा की कविताएं

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  आमतौर पर लोग लीक पर चलते हुए अपना जीवन बिताते हैं। लेकिन इतिहास में वही दर्ज होते हैं जो अलीक हो कर चलते हैं। ऐसे लोग अलग हट कर सोचते ही नहीं, करते भी हैं। हालांकि यह अलग सोचना या करना आसान नहीं होता। इसकी कीमत भी उन्हें चुकानी होती है। लेकिन जो अलीक चलते हैं, उन्हें कीमतों की परवाह कहां होती है। दशरथ मांझी ऐसे ही अलीक चलने वाले व्यक्ति थे जिन्होंने असम्भव को सम्भव कर दिखाया था। एक मामूली व्यक्ति ने वह काम कर दिखाया था जो शक्तिमान बन बैठे लोगों के वश की बात नहीं। मुसाफिर बैठा ने इस महामानव पर एक कविता लिखते हुए प्रतिमानों को पलट दिया है। 'दशरथ माझी होती हैं चीटियां' शीर्षक से जो कविता लिखी है वह इसका उदाहरण है आमतौर पर कवि चीटियों को अपना प्रतिमान बनाते हैं। मुसाफिर बैठा ने यहां दशरथ मांझी को ही प्रतिमान बना दिया है। यह किसी भी कवि की सफलता होती है। मुसाफिर बैठा दलित शोषित वंचित तबके को अपनी कविताओं के केंद्र में रखते हैं और उन्हीं के हको हुकूक की बात करते हैं। हाल ही में उनका तीसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है 'नए मुहावरे का चांद'। आइए आज पहली बार पर हम