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लीलाधर जगूड़ी के संग्रह 'कविता का अमरफल' पर अच्युतानंद मिश्र का आलोचनात्मक आलेख 'अमरफल चाहता है कि कविता फिर किसी फल का बीज बनकर अमर हो'।

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  लीलाधर जगूड़ी   लीलाधर जगूड़ी हिन्दी साहित्य के अनूठे और अपनी बनक के कवि हैं। पिछले छः दशकों से वे लगातार रचनारत हैं। इसीलिए काव्यालोचना के लिए वे चुनौती खड़ी करते रहते हैं। किसी बने बनाये खाँचे में रख कर जगूड़ी जी का मूल्यांकन सम्भव भी नहीं। उनकी कविताओं में कई जमाने के साक्षात्कार और प्रतिबिम्ब हैं। गद्य को काव्य में बरतने का अप्रतिम हुनर जगूड़ी जी में है। उनके कविता संग्रह इसके गवाह हैं। ' शंखमुखी शिखरों पर ', से शुरू हुई उनकी काव्य यात्रा ' नाटक जारी है ', ' इस यात्रा में ', ' रात अब भी मौजूद है ', : बची हुई पृथ्वी ', ' घबराए हुए शब्द ', ' भय भी शक्ति देता है ', ' अनुभव के आकाश में चाँद ', ' महाकाव्य के बिना ', ' ईश्वर की अध्यक्षता में ', ' खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है ' जैसे कविता संग्रहों से होते हुए बिल्कुल नए कविता संग्रह ' कविता का अमरफल ' तक पहुँची है। कविता क