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नीलोत्पल की लम्बी कविता 'वह जीवन को जीवन देती आवाज़'

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नीलोत्पल मां से पुत्र का जैसा जुड़ाव होता है वह शायद ही किसी और सम्बन्ध में दिखाई पड़े। अपनी संतान के लिए मां अपना अस्तित्व तक समाप्त कर देती है। वह चाहती है कि संतान के पास दुनिया का कोई दुःख फटक तक नहीं पाए। मां की उपस्थिति भर से घर गुलजार रहता है। लेकिन उसकी अनुपस्थिति मारक होती है। उसके न होने पर महसूस होता है कि आपने अपना सब कुछ खो दिया है। आपने वह आवाज खो दी है जो हर वक्त आपके साथ रहती थी। नीलोत्पल की एक लम्बी कविता है 'वह जीवन को जीवन देती आवाज़'। अपनी इस कविता में वे लिखते हैं 'उसकी अनुपस्थिति में/ हर चीज़ बोलना बंद कर देती/ जैसे पानी ज़मीन में और गहरे उतर गया।' वे लिखते हैं 'माँ पानी में घुली हुई कोई लोक धुन है'। ऐसी लोक धुन जिससे हर किसी का आत्मीय रिश्ता होता है। ऐसी लोक धुन जिसे सब सुनना चाहते हैं। नीलोत्पल हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। हमने उनसे आग्रह कर साल भर पहले यह कविता मंगाई थी। अपरिहार्य कारणों से इस कविता का प्रकाशन नहीं हो पाया। नीलोत्पल ने कविता की बावत कभी टोका नहीं। आज के समय में इतना धैर्य गिने चुने कवियों में ही दिखाई पड़ता है। नील ...

कँवल भारती का आलेख 'नौटंकी और सांग'

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कंवल भारती नौटंकी उत्तर भारत की ख्यात नाट्य परम्परा है। पूर्व-आधुनिक भारत के किसान समाज में रची-बसी यह नाट्यकला जीवंत नृत्य, ढोल की थाप और बुलंद गायन से शुरू होती है। नगाड़े की थाप इसे अलग अर्थ प्रदान करती है। यह नाट्य परम्परा अपने आप में इस अर्थ में मौलिक है कि यह भारतीय जनजीवन में प्रचलित धार्मिक महाकाव्यों रामायण और महाभारत से इतर समकालीन जीवन और उसकी विडम्बना पर केन्द्रित होती है। इनकी कथाएँ अक्सर नाटकीय प्रेम प्रसंग में फंसी नायिकाओं के जीवन पर केंद्रित होती हैं। कैथरीन हैनसेन की नौटंकी पर एक महत्त्वपूर्ण किताब है 'ग्राउंड्स फॉर प्ले'। अपनी इस किताब में कैथरीन हैनसेन ने अपने शोध के आधार पर नौटंकी प्रदर्शन के विभिन्न तत्वों - संगीत, नृत्य, कविता, लोकप्रिय कथाएँ और लिखित ग्रंथों का वर्णन किया है। वे इस कला विधा के सामाजिक इतिहास का पता लगाती हैं और नौटंकी कथाओं में अर्थों के खेल का अन्वेषण करती हैं, विशेष रूप से उन तरीकों पर ध्यान केंद्रित करती हैं जिनसे राजनीतिक सत्ता, सामुदायिक पहचान और लैंगिक असमानता जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे इन कथाओं में प्रस्तुत किए जाते हैं। एक सम...

कुबेर नाथ राय का आलेख 'इतिहास और शुक-सारिका कथा'

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कुबेर नाथ राय  इतिहास को देखने की दृष्टि विभिन्न विचारधाराओं में अलग अलग रही है। इतिहास पर राय व्यक्त करने के लिए इतिहासकार होना जरूरी नहीं। साहित्यकारों ने भी इतिहास को अपने नजरिए से देखने की कोशिश की है। स्वाभाविक रूप से उनकी दृष्टि एक इतिहासकार की दृष्टि से अलग होती है। भारत पर एक लम्बे समय तक मुसलमानों ने शासन किया। स्वाभाविक रूप से इस मुस्लिम शासन के पक्ष विपक्ष में बातें की जाती हैं। एक दृष्टि सेक्यूलर इतिहासकारों की है जिन्होंने अपने विश्लेषण में समन्वयवादी दृष्टिकोण को अपनाया। इस क्रम में हिन्दू मुस्लिम समन्वय पर ध्यान दिया गया। दरअसल इतिहास को सन्दर्भों से काट कर नहीं देखा समझा जा सकता। किसी भी परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए उस समय के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू को देखना जरूरी होता है। कुबेर नाथ राय को हम उनके बेहतर निबंधों के लिए जानते हैं। लेकिन इतिहास पर भी उनकी अपनी राय है जिसे उन्होंने अपने एक आलेख में साफ़गोई से व्यक्त किया है। कुबेर जी के इस आलेख में हम उनके उस पारम्परिक रुझान को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं जिसका झुकाव हिन्दुत्व की तरफ है। इस...