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कैम्पस में कविता

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साहित्यिक गोष्ठियों का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि नए रचनाकारों को समकालीन साहित्य की अधुनातन एवं प्रगतिशील प्रवृत्तियों से न केवल परिचित कराया जाए बल्कि उनमें रचनात्मक प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दिया जाए और उनके लेखन को बेहतर स्वरूप प्रदान किया जाए। इस क्रम में उनकी रचनाओं का पाठ कराते हुए उस रचना पर वरिष्ठ एवं समकालीन रचनाकारों द्वारा आलोचनात्मक पड़ताल कर उन्हें बेहतर लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लिखावट फाउंडेशन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों के जरिए यह महत्वपूर्ण प्रयास कर रहा है। लिखावट फाउंडेशन का एक महत्वपूर्ण प्रयास 'कैंपस में कविता' है जिसमें वह विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में जा कर रचना गोष्ठी आयोजित करने की पहल करता है। हाल ही में लिखावट फाउंडेशन और  आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय धौलाकुंआ, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 'कैंपस में कविता' का आयोजन किया गया। इस आयोजन की एक रपट ज्योति त्रिपाठी ने हमें उपलब्ध कराया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ज्योति त्रिपाठी की रपट 'कैम्पस में कविता'। रपट   कैम्पस में कविता प्रस्तुति : ज्योति त्रिपाठ...

कैथरिन मेन्सफील्ड की कहानी 'नाशपाती का पेड़'

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कैथरिन मेन्सफील्ड जीवन को जीने का सबका अपना अलग तरीका होता है। इसका कोई एक ढांचा नहीं होता। इसीलिए सब इसे अपने अंदाज में जीने की कोशिश करते हैं। कैथरीन मैन्सफील्ड नैसर्गिक रूप से स्वच्छंद स्वभाव वाली महिला कहानीकार थीं। परंपरागत रूप से स्त्रियों का अनिश्चित भविष्य वाला जीवन उन्हें पसन्द नहीं था। इस विचार ने ही उनमें विद्रोह का बीज-वपन कर दिया। खुद कैथरीन भी अपने जीवन को अपेक्षित मोड़ न दे सकीं जिससे उनका स्वभाव असंतुलित और जीवन अव्यवस्थित रहा। आरंभ में जीवन की कठोरताओं ने उसकी रचनाओं को भी कटुता तथा तीखे व्यंग्य से पूर्ण बनाया। सोलह साल की उम्र में ही अपनी स्कूली दोस्त को लिखे पत्र में उसकी स्वाभाविक स्वतंत्रता की स्पष्ट झलक मिलती है: मैं किस कदर चाहती हूँ कि सभी स्त्रियों का एक निश्चित भविष्य हो- क्या तुम नहीं चाहती? बैठे-बैठे एक अदद पति का इंतजार करने के ख्याल से ही मुझे सख्त नफरत है, लेकिन बहुतेरी लड़कियाँ तो ऐसे ही सोचती हैं। ... तुम्हारी इस ख्वाहिश के बारे में पढ़ कर मैं मुस्कुरा उठी कि तुम अपनी तकदीर खुद बनाना चाहती हो- ओह, कितनी ही बार मैंने खुद भी ऐसा ही महसूस किया है। मेरी ललक...

रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'शुभा : दक्ष शिल्पी की उत्कृष्ट कृति'

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अनूप लाल मण्डल  परिचय जन्म : 11 अक्तूबर 1896 मृत्यु : 21/22 सितंबर 1982 प्रेमचंद के परवर्ती और रेणु के पूर्ववर्ती अनूप लाल मंडल सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, कथाकार और समाज सुधारक थे। उन्हें हिंदी साहित्य में वंचितों और उपेक्षित वर्गों को केंद्रीय चरित्र बनाकर लिखने वाले शुरुआती रचनाकारों में गिना जाता है। उन्होंने 20 से अधिक मौलिक और अनूदित उपन्यास लिखे। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, समाज सुधार और यथार्थ का गहरा चित्रण मिलता है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'अपराधी की औलाद', 'मनुष्य इकाई है', 'माटी का माली', 'पिंजरे की उड़ान', 'तूफान और तिनके', 'नया सूरज नया चांद', 'मीमांसा', 'रक्त और रंग', और 'अवध पराया धन' प्रमुख है। उनके चर्चित उपन्यास 'मीमांसा' पर वर्ष 1940 में किशोर साहू द्वारा 'बहुरानी' नामक फिल्म बनाई गई थी। 'रक्त और रंग' उपन्यास को बिहार सरकार की ओर से पुरस्कृत किया गया था। 'शुभा' उपन्यास अप्रकाशित रह गया था। उनके उपन्यास 'तूफान और तिनके' में पिछड़ा वर्ग और समाज का मानक चित्रण...

विनोद दास का संस्मरण 'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'

  संस्मरण  'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'   विनोद दास  हम उन यादों से बार-बार गुज़रना चाहते हैं जो हमारे साथ पहली बार घटित होती हैं। पहली बार देखी गयी फिल्म। पहली बार पढ़ी गयी किताब। पहली बार लिखी गयी कविता। किसी को देखने पर पहली बार धड़का दिल। पहली बार की गयी रेल या हवाई यात्रा।  मुझे आज अपने मन की वह घुमड़न याद आ रही है जब किसी किताब को पढ़कर उस पर पहली बार कुछ लिखने की इच्छा अंकुरित हुई थी। किताब थी-कुँवर नारायण का कहानी संग्रह-'आकारों के आसपास'।  छोटे कलेवर की कहानियाँ। कथ्य और शिल्प में विविधता और नवाचार। बहुस्तरीय अर्थ अनुभव से समृद्ध ताज़ी और मर्मस्पर्शी भाषा। कवि की कहानियाँ होने के बावजूद संवेदना के धरातल पर लिजलिजे रोमान से सायास दूरी। कहानी होते हुए कहानी के पारम्परिक विन्यास से मुक्त।  उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए कभी लगता कि कोई निबन्ध पढ़ रहे है तो कभी लगता कि किसी छोटी नीतिकथा से कोई सबक सीख रहे हैं। इनमें कभी संस्मरण का आस्वाद मिलता तो कभी किसी मामले घटना को पढ़ते हुए अखबार की रपट की याद आती। यह एक सुखद संयोग भी था कि उन दिनों कुँवर नार...