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राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'दिल्ली में गांधी, भगत सिंह और आंबेडकर; सत्ता में डायर की छाया!'

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किसी भी देश का लोकतन्त्र तभी सुरक्षित रहता है जब जनता को इस बात की पूरी स्वतंत्रता हो कि वह खुल कर अपनी बात कह सके। लेकिन जब शासन इस बात पर आमादा हो जाए कि वह किसी को कोई प्रदर्शन नहीं करने देगा तब लोकतन्त्र की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। सत्ताधारी दल की भक्ति और देश की भक्ति दोनों अलग अलग बातें हैं। इसे एक साथ जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। भारत ने खुद अपनी आजादी धरना, हड़ताल और प्रदर्शनों के दम पर ही प्राप्त की है। ब्रिटिश सत्ता हमेशा इसे कुचलने का प्रयास करती रही। लेकिन जीत भारतीय लोगों की ही हुई। आज 10 अक्टूबर 2026 को शासन की रोक के बावजूद लोकतन्त्र और उसकी मर्यादा को बचाने के लिए दिल्ली में देश के युवाओं ने ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया है। इस विरोध प्रदर्शन पर राकेश गुप्त अपनी टिप्पणी में लिखते हैं 'जब कोई युवा बिना हिंसा का सहारा लिए अपने अधिकार की मांग करता है, तो वह गांधी की अहिंसक प्रतिरोध परंपरा को जीवित करता है। जब वह भय के बावजूद अन्याय के विरुद्ध प्रश्न पूछता है, तो वह भगत सिंह की निर्भीक चेतना से प्रेरणा लेता है। और जब वह अपने साथ खड़े व्यक्ति की जाति, धर्म या आर्थिक...

ऐन कार्सन की रचनाएँ, अनुवाद : सुमन शेखर

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  ऐन कार्सन  दुनिया का साहित्य जगत बेसब्री से साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता के नाम की प्रतीक्षा करता है। इस प्रतीक्षा के दौरान लोग विभिन्न नामों पर कयास लगाते रहते हैं। बहरहाल इस वर्ष यह सम्मान  कवयित्री, अनुवादक और निबंधकार के तौर पर दुनिया भर में जानी जाने वाली ऐन कार्सन को दिया गया है।  ऐन कार्सन का जन्म 21 जून, 1950 को कनाडा के टोरंटो में हुआ था। वह मार्गरेट और रॉबर्ट कार्सन की दूसरी और आखिरी संतान थीं। उनकी माँ घर संभालती थीं और पिता टोरंटो डोमिनियन बैंक में काम करते थे। बचपन में उनका परिवार ओंटारियो के छोटे-छोटे कस्बों में एक बैंक से दूसरे बैंक जाता रहा। इनमें स्टोनी क्रीक, पोर्ट होप और टिमिन्स जैसे कस्बे शामिल थे।  ऐन का व्यक्तिगत जीवन दुःख से भरा रहा। इस दुःख की प्रतिध्वनि उनकी रचनाओं में सहज ही देखी जा सकती है। वे अपने व्यक्तिगत दुःखों के मौन, विखंडित प्रेम और स्मृतियों को केवल शब्दों में पिरोती नहीं, बल्कि पन्नों पर कलाकृतियों की तरह उकेरती हैं। शब्दों, चित्रों और अनुवादों के बीच की हर सरहद को तोड़ कर साहित्य को नया कैनवास देने वाली ऐन कार्सन क...

अंजू केशव की गजलें

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अंजू केशव नाम - अंजू केशव  निवास - जमशेदपुर, झारखंड जन्मतिथि - 24 अप्रैल  शिक्षा - स्नातकोत्तर, जेट उत्तीर्ण  पुस्तक - सन्नाटे में शोर बहुत है (ग़ज़ल-संग्रह)  गीत, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा आदि साहित्य की विविध विधाओं में लेखन,  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और साझा संग्रहों में प्रकाशित अक्सर सामने दिखने वाला तथ्य ही सच नहीं होता। सच के तमाम पहलू और भी होते हैं। लेकिन इन्हें देखने परखने की फुरसत आज भला किसके पास है? देखने के लिए जो संवेदनाजनित दृष्टि चाहिए वह इस दौर में लगातार छिजती जा रही है। आदर्श और नैतिकता बीती और अप्रासंगिक बातें होती जा रही हैं।  इस दौर में सोचने समझने को जैसे स्थगित सा कर दिया गया है। फिर भी कुछ लोग हैं जो सोचने और सिहरने वाले हैं। रचनाकार इसीलिए आम जनता के बीच होते हुए भी थोड़ा अलग होता है। वह उन उपेक्षितों की बात करता है जिन पर किसी की नज़र नहीं पड़ती। अंजू केशव जिजीविषा से भरी रचनाकार हैं। वे जानती हैं कि दुखड़ा रोने से काम नहीं चलता। जिसके पास उम्मीदें हैं, उसके पास सब कुछ है। वह हारी हुई लड़ाई भी जीत सकता है। अंजू जन्म जन्मान्तर जैसी काल्पन...

रवि नन्दन सिंह का आलेख 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'

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किसी भी रचनाकार के विकास में उस जगह का विशिष्ट स्थान होता है जहाँ वह अपने जीवन का अमूल्य समय बिता चुका होता है।  प्रेमचंद का इलाहाबाद से एक ऐसा रिश्ता बना जिसका निर्वहन उन्होंने आजीवन किया। यहीं पर रहते हुए उन्होंने अपनी कुछ विशिष्ट कृतियां रची। रविनंदन सिंह के अनुसार उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ अर्थात् ‘देवस्थान का रहस्य’ यहीं पर रहते हुए लिखना आरंभ किया। यह उपन्यास बनारस से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘आवाजे-खल्क’ में अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के लेखक का नाम था—धनपत राय उर्फ ‘नवाबराय अलाहाबादी’। पढ़ाई से ले कर नौकरी तक इलाहाबाद से प्रेमचंद का 'कभी नीम तो कभी शहद सम्बन्ध' बना रहा। यहीं पर रहते हुए प्रेमचंद पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम लगा।  आज प्रेमचंद का जन्मदिन है। उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत करते हैं रवि नन्दन सिंह का आलेख 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'। 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद' रवि नन्दन सिंह             प्रेमचंद और इ...