रजिया सज्जाद जहीर की कहानी 'नमक'
रजिया सज्जाद जहीर जिस मिट्टी में व्यक्ति जन्मा होता है, जिस मिट्टी में पला बढ़ा होता है, उसके प्रति एक स्वाभाविक लगाव उसके मन मस्तिष्क में होता है। अलग बात है कि राजनीतिक आग्रहों के चलते कागज पर विभाजन की लाईन खिंच जाती है। लेकिन यह सीमा क्या उस मन मस्तिष्क की सीमा बन पाती है जिसका स्वाभाविक लगाव उस व्यक्ति के अन्तर्मन में आजीवन बना रहता है। भारत पाकिस्तान के बीच भले ही कागजी तौर पर सरहदें खिंच गईं लेकिन उनके कदम वह कभी भी नहीं रोक पाई जिनके तंतु हृदय में संचित हैं। विभाजन पर रजिया सज्जाद जहीर की यह एक नायाब कहानी है जिसे आवश्यक तौर पर पढ़ा जाना चाहिए। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रजिया सज्जाद जहीर की कहानी 'नमक'। 'नमक' रजिया सज्जाद जहीर उन सिख बीबी को देख कर सफ़िया हैरान रह गई थी, किस कदर वह उसकी माँ से मिलती थी। वही भारी भरकम जिस्म, छोटी-छोटी चमकदार आँखें, जिनमें नेकी, मुहब्बत और रहमदिली की रोशनी जगमगाया करती थी। चेहरा जैसे कोई खुली हुई किताब। वैसा ही सफ़ेद बारीक मलमल का दुपट्टा जैसा उसकी अम्मा मुहर्रम में ओढ़ा करती थी। जब सफ़िया ने कई बार उनकी तरफ़ मुहब्बत से देख...