बेजी जैसन के कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' पर देवेश पथ सारिया की समीक्षा 'मनुष्यता की करुण पुकार'
मनुष्य जहां पर भी है वह अपनी समस्याओं में परेशान रहता है। यह परेशानी मनुष्य की विशिष्टता भी है। वह इन समस्याओं से जूझते हुए ही आगे अपनी राह बनाता है। इस तरह मनुष्य बाहर तो परेशान है ही, खुद अपने अन्दर भी युद्धरत रहता है। जब तक जीवन है तब तक जीवन की समस्याएँ हैं। यानी समस्याएँ जीवन की निशानी हैं। मौत के बाद सारी समस्याएँ जैसे एकबारगी खत्म हो जाती हैं। बेजी जैसन अपनी कविताओं में मनुष्य की इन समस्याओं को गम्भीरता के साथ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए ऐसे लगता है जैसे हम खुद इन समस्याओं से दो चार हो रहे हों। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से बेजी जैसन का कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' प्रकाशित हुआ है। कवि देवेश पथ सारिया ने इस संग्रह की समीक्षा लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बेजी जैसन के कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' पर देवेश पथ सारिया की समीक्षा 'मनुष्यता की करुण पुकार'।
पुस्तक समीक्षा
'मनुष्यता की करुण पुकार'
देवेश पथ सारिया
बेजी जैसन को मैं एक बेजोड़ अनुवादक के तौर पर जानता आया हूँ। उन्होंने ओशन वुओंग और सायत नोवा की कविताओं के अद्भुत अनुवाद किए हैं। उनकी कविताओं से मेरा पहला परिचय उनकी कविता पुस्तक 'गुम गौरैयों की चुप दुनिया' पढ़ते हुए हुआ।
बेजी दक्षिण भारत से हैं और इन दिनों विदेश में रहती हैं। वह हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। उनके संपूर्ण रचनाकर्म में इन जगहों और संस्कारों का समावेश दृष्टिगोचर होता है।
ऐसा माना जाता है कि हिंदी साहित्य को नये आयाम तक ले जाने में हिंदी से बाहर के कवियों-लेखकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। विज्ञान से संबंधित अनेक कवियों-लेखकों ने हिंदी को यादगार रचनाएं दी हैं।
इसी तरह प्रवासी साहित्यकारों को साहित्य में अलग से रेखांकित किया जाता है। अलबत्ता कई बार उन्हें दूर देश का निवासी मान कर हाशिए पर रखने की साजिशें भी हुई हैं। यूँ भी साहित्य एवं कला की दुनिया में तुच्छ राजनीति बार-बार उभरती रहती है। फिर भी जैसा मेरा अपना अनुभव है, यदि आप ईमानदारी से प्रयास करते हैं तो हिंदी समाज आपको एक आउटसाइडर की तरह नहीं बल्कि एक आवश्यक अंग की तरह स्वीकार करता है। प्रवासी लेखकों से यह अपेक्षा रखी जानी चाहिए कि वे केवल भारत के नॉस्टॅल्जिया में न खोए रहें। न ही यह कि वे विदेशी लेखकों की नकल करने लगें। प्रवासी लेखकों से भारत पीछे छूट गया है, जीवन एक दूसरे देश में आगे बढ़ रहा है तो लेखन भी उसी के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। भारतीयता और उस दूसरे देश की स्थानीयता के मिले-जुले प्रभाव से जो लेखन का रसायन तैयार होगा, वह हिंदी को समृद्ध करने वाला होगा। इस कसौटी पर बेजी जैसन की कविताएँ खरी उतरती हैं।
बेजी की कविताओं में उनका प्रवास और पेशा मदद करते हैं। चिकित्सक होने के नाते उन्होंने बीमारियों और मृत्यु को बहुत करीब से देखा है। उनके अपने पिता की मृत्यु ने इस अनुभूति को अधिक व्यक्तिगत और सघन बनाया है।
दशकों से इस धरती पर सबसे सताया हुआ कोई इलाका है तो वह है मध्य-पूर्व। फ़िलिस्तीन पर इजरायल के जुर्म कोई भी भावुक और जागरूक व्यक्ति कैसे क्षमा कर सकता है? बेजी कुवैत में रहती हैं और मध्य-पूर्व के हालात को हमसे बेहतर ढंग से महसूस कर पाती हैं। युद्ध पर आधारित उनकी कविताएँ इस बात की पुष्टि करती हैं:
"सुन रहे हो
उन्होंने खाना नहीं खाया था
इतनी मोहलत होती
कि मरने के पहले
पेट भर खा लेते बच्चे"
उनकी कविताओं में एक ऐसा मनुष्य नज़र आता है जो भीतर और बाहर दोनों जगह युद्धरत है। 'उपलब्धियाँ' कविता में कवयित्री सोशल मीडिया पर दिखावे के जीवन से त्रस्त मनुष्यता की बात करती है। वहीं थकान से संबंधित इन पंक्तियों में एक आदमी भीतर ही भीतर घुलता जा रहा है क्योंकि बाहरी दुनिया में तेज रफ्तार को ज़रूरी घोषित कर दिया गया है और चैन की सांस लेना एक अपराध की तरह माना जाता है:
"लगभग हर आदमी
थका है यहाँ
लगा है ना थका दिखने की कोशिश में
कि थका दिखने में
सौंदर्यबोध नहीं"
इस संघर्ष में स्त्रियों का संघर्ष भी शामिल है। उनकी कविताओं में एक स्त्री स्वयं और अपनी बच्ची को प्रताड़ित करने वाले पति को धीमा जहर दे कर मार डालती है और कविता में इसे आत्मरक्षा कहा गया है। अब सवाल यह उठेगा कि वैधानिक तरीक़े छोड़ कर क्या यही एक उपाय बचा था? और जवाब शायद यह हो कि कुछ लोगों के पास यह एक उपाय भी बड़ी मुश्किल से मौजूद होता है।
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| बेजी जैसन |
इस टैबू को कि सुशिक्षित कवि किसान की पीड़ा को बयान करती कविता नहीं लिख सकते, बेजी तोड़ती हैं, जब वह लिखती हैं:
"कोई नहीं जानता
किसान से बेहतर
शरीर का मिट्टी होना
नहीं करता है किसान कभी आत्महत्या
जब बार-बार हो जाता है फसल से हताश
मिला देता है खुद को
कि मिट्टी उपजाऊ हो सके।"
वह बच्चों की डॉक्टर हैं। बच्चों और मातृत्व से संबंधित कई अद्भुत कविताएँ इस पुस्तक में हैं। गर्भ में शिशु की उंगलियों और हृदय की निर्मिति का दृश्य रचती कविताएँ इस संकलन की उपलब्धि हैं। मार्मिकता की चरम सीमा को स्पर्श करना भी बेजी जानती हैं:
"अस्पताल से फोन था
रिसेप्शनिस्ट याद दिलाना चाहती थी
बच्चे की टीके की तारीख
पूछने पर, "कल आ सकोगे?"
"हाँ" कहा था उसने
किसी सूची में तो ज़िंदा था
उसका बच्चा।"
बेजी की कविताओं की भाषा आम बोलचाल की भाषा है जिसमें उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द भी शामिल होते हैं। मेरे हिसाब से कविता को आम जन से जोड़ने के लिए यह अच्छी बात है कि इस तरह की भाषा में कविता कही जाए:
"तूफां में
बुझाती भी है
धधकती भी है आग
जलते रहने की
कशिश
कितनी है
हवा में
परखती है आग"
ऐसे युवा कवियों की कविताओं में जो किसी विमर्श विशेष से संबंधित नहीं हैं, सामान्यतः प्रेम भरपूर होता है। हालांकि इन कविताओं में वह अत्यंत प्रच्छन्न रूप से व्यक्त हुआ है। इन कविताओं में प्रेमी इस तरह पास आते हैं जैसे दो पेड़ों की जड़ें जंगल को भुलावे में रख कर करीब आती हैं। यह विवाहोपरांत दांपत्य जीवन का प्रेम है:
"तुमने सरकाई तुम्हारी झूठी
हलवे की कटोरी मेरी तरफ़
और फिर जैसे सब ओझल हुआ
और रह गई मिठास
थोडी सी
हम में घुल कर"
बेजी की कविताओं में एक करुण आत्मीयता है। वह जीवन को देख-परख कर समझती हैं और साफ़ शब्दों में रहती हैं। उनकी भाषा अलंकारिक नहीं है। बच्चों पर लिखी कविताओं के लिए यह संग्रह पढ़ लिया जाना चाहिए। यह भी साहित्य की एक विधा है कि कविताएँ बच्चों पर हैं लेकिन बाल कविताएँ नहीं हैं। यह बच्चों के जन्म, बचपन, भूख और त्रासदियों के बारे में बड़ों को आगाह करती हैं।
एक पाठक के तौर पर मैं कवयित्री को यह सलाह देना चाहूंगा कि उन्हें कुछ कविताओं में जल्दबाज़ी में निष्कर्ष देने से बचना चाहिए। यह कुछ-कुछ फेसबुक पर लोकप्रिय कवियों द्वारा प्रयुक्त तकनीक है जिसकी चपेट में आने से बचना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। हालांकि बेजी की कुछ ही कविताएँ इससे प्रभावित हुई हैं। हम सभी को अपनी कविताओं को जल्दबाजी के दबाव और फ़ेसबुक के दुष्प्रभाव से बचाना चाहिए।
किताब : गुम गौरयों की चुप दुनिया
कवयित्री : बेजी जैसन
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
वर्ष : 2025
पृष्ठ: 111 मूल्य:
₹199
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| देवेश पथ सारिया |
परिचय
देवेश पथ सारिया
प्रकाशित पुस्तकें :
कविता संकलन : नूह की नाव (2022), अदृश्य आत्मीय की टोह में (2025)
कहानी संग्रह: स्टिंकी टोफू (2025)।
कथेतर गद्य : छोटी आँखों की पुतलियों में (2022)
अनुवाद: हक़ीक़त के बीच दरार (2021), यातना शिविर में साथिनें (2023)
अन्य भाषाओं में अनुवाद/प्रकाशन: कविताओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, स्पेनिश, मंदारिन, रूसी, बांग्ला, मराठी, पंजाबी और राजस्थानी भाषा-बोलियों में हो चुका है। इन अनुवादों का प्रकाशन एन ला मास्मेदुला, लिबर्टी टाइम्स, लिटरेरी ताइवान, ली पोएट्री, मे प्यान, पोयमामे, यूनाइटेड डेली न्यूज़, स्पिल वर्ड्स, बैटर दैन स्टारबक्स, गुलमोहर क्वार्टरली, बाँग्ला कोबिता, इराबोती, कथेसर, सेतु अंग्रेज़ी, प्रतिमान पंजाबी और भरत वाक्य मराठी पत्र-पत्रिकाओं में हुआ है। A Toast to Winter Solstice (अंग्रेज़ी अनुवाद: शिवम तोमर, 2023) शीर्षक से एक अंग्रेज़ी कविता संकलन प्रकाशित।
पुरस्कार/सम्मान : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2023), स्नेहमयी चौधरी सम्मान (2025)।
विशेष :
1. ताइवान के संस्कृति मंत्रालय की योजना के अंतर्गत 'फॉरमोसा टीवी' पर कविता पाठ (2022)
2. काओशोंग वर्ल्ड पोएट्री फेस्टिवल (2023) में शिरकत।
सम्पादन : गोल चक्कर वेब पत्रिका
सम्पर्क
मोबाइल : 9784972672
ईमेल: deveshpath@gmail.com



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