युद्ध के विरुद्ध कविता : 4, बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त की कविताएं


बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त 


व्यक्तिगत रूप से कहूं तो बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त मेरे प्रिय कवि हैं। जर्मनी में वे उस दौर में लिख रहे थे जब वहां का वातावरण पूरी तरह विषाक्त हो चुका था। उनका प्रमुख लेखन दो विश्व युद्धों के बीच के दौर का है। इस समय जर्मन साम्राज्यवादी गतिविधियां अपने उत्कर्ष पर थीं। हिटलर के नायकत्व का जादू लोगों के दिल दिमाग पर छाया हुआ था। ऐसे कठिन समय में ब्रेख्‍त साम्राज्यवाद के खिलाफ कविताएं लिख रहे थे जब उसके खिलाफ सोचना भी गुनाह माना जाता था। वे तानाशाही के खिलाफ कविताएं लिख रहे थे। उन्होंने नाटकों द्वारा मार्क्सवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करने के लिये ‘एपिक थियेटर’ नाम से नाट्य मंडली का गठन किया। हिंदी में एपिक थियेटर को लोक नाटक के रूप में जाना जाता है। ब्रेख्त ने पारंपरिक अरस्तू के नाट्य सिद्धांतों से सर्वथा भिन्न तथा मौलिक नाट्य सिद्धांत रचे। उनका तर्क था कि जो कुछ मंच पर घटित है उससे दर्शक एकात्म न हों। वे समझे कि जो कुछ दिखाया जा रहा है वह विगत की ही गाथा है। गौरतलब है कि ऐसा ही प्रभाव लोक गीतों को गाये जाने की कला करती है। युद्ध के विरुद्ध कविता की चौथी प्रस्तुति के क्रम में यह चौथी प्रस्तुति है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त की कविताएं।



युद्ध के विरुद्ध कविता : 4

बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त की कविताएं 


मूल जर्मन से अनुवाद – मोहन थपलियाल



युद्ध जो आ रहा है 


युद्ध जो आ रहा है

पहला युद्ध नहीं है।

इसे पहले भी युद्ध हुए थे।

पिछला युद्ध जब खत्म हुआ

तब कुछ विजेता बने और कुछ विजित-

विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा

विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही।

(1936-38)



दीवार पर खड़िया से लिखा था


दीवार पर खड़िया से लिखा था:

वे युद्ध चाहते हैं

जिस आदमी ने यह लिखा था

पहले ही धराशायी हो चुका है।

(1936-38)



जब कूच हो रहा होता है 


जब कूच हो रहा होता है

बहुतेरे लोग नहीं जानते

कि दुश्मन उनकी ही खोपड़ी पर

कूच कर रहा है

वह आवाज जो उन्हें हुक्म देती है

उन्हीं के दुश्मन की आवाज होती है

और वह आदमी जो दुश्मन के बारे में बकता है

खुद दुश्मन होता है।

(1936-38)



ऊपर बैठने वालों का कहना है


ऊपर बैठने वालों का कहना है:

यह महानता का रास्ता है

जो नीचे धंसे हैं, उनका कहना हैः

यह रास्ता कब्र का है।

(1936-38)




नेता जब शान्ति की बात करते हैं 


नेता जब शान्ति की बात करते हैं

आम आदमी जानता है

कि युद्ध सन्निकट है

नेता जब युद्ध का कोसते हैं

मोर्चे पर जाने का आदेश

हो चुका होता है

(1936-38)



वे जो शिखर पर बैठे हैं, कहते हैं


वे जो शिखर पर बैठे हैं, कहते हैं:

शान्ति और युद्ध के सार तत्व अलग-अलग हैं

लेकिन उनकी शान्ति और उनका युद्ध

हवा और तूफान की तरह हैं

युद्ध उपजता है उनकी शान्ति से

जैसे मां की कोख से पुत्र

मां की डरावनी शक्ल की याद दिलाता हुआ

उनका युद्ध खत्म कर डालता है

जो कुछ उनकी शान्ति ने रख छोड़ा था।

(1936-38)



जनरल, तुम्हारा टैंक एक शक्तिशाली वाहन है


जनरल, तुम्हारा टैंक एक शक्तिशाली वाहन है

वह जंगलों को रौंद देता है

और सैकड़ों लोगों को चपेट में ले लेता है

लेकिन उसमें एक दोष है

उसे एक चालक चाहिए


जनरल, तुम्हारा बमवर्षक जहाज़

शक्तिशाली है

तूफान से तेज़ उड़ता है वह और

एक हाथी से ज्‍यादा भारी वज़न उठाता है

लेकिन उसमें एक दोष है

उसे एक कारीगर चाहिए


जनरल, आदमी बहुत

उपयोगी होता है

वह उड़ सकता है और

हत्या भी कर सकता है

लेकिन उसमें एक दोष है


वह सोच सकता है



भूखों की रोटी हड़प ली गई है 


भूखों की रोटी हड़प ली गई है

भूल चुका है आदमी मांस की शिनाख्त

व्यर्थ ही भुला दिया गया है जनता का पसीना।

जय पत्रों के कुंज हो चुके हैं साफ।

गोला बारूद के कारखानों की चिमनियों से

उठता है धुआं।

(1933-47)



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