आनन्द बहादुर की कहानी 'चीजें'
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| आनन्द बहादुर |
मनुष्य की निर्मिति में उसके आसपास की चीजों, परिस्थितियों, सम्बन्धों, समय, देश, काल का बड़ा हाथ होता है। कहा जा सकता है कि मनुष्य के वृत्त का निर्माण इन सब से ही होता है घटनाएं और परिस्थितियों मनुष्य और मनुष्य के स्वभाव को समय के अनुसार बदल डालते हैं। आनंद बहादुर मनुष्य के इस वृत की पहचान करते हुए अपनी कहानी 'चीजें' में उचित ही लिखते हैं : "भीतर ही भीतर अव्यवस्थित होते चले जाना। भीतर की हर चीज का गलत जगह पर रख दिया जाना। महसूस करना। जाने कब से ऐसा करते करते यहाँ तक चले आना। एक चीज को उठाना, उसे गलत जगह पर रख देना, और भूल जाना। इस तरह धीरे-धीरे सारी चीजें गलत जगहों पर रखते चले जाना। और अब लगता है, वह खुद ही, किसी दूसरी जगह पर था। जहाँ था, जहाँ उसने सोच रक्खा था कि वह था, वहाँ वह था ही नहीं। न तो वहाँ, जहाँ उसने सोचा था कि उसे होना चाहिए था।" यह कहानी मनुष्य के आत्मगत परिस्थितियों की पड़ताल करती है। यह कहानी लेखक के आने वाले कहानी संग्रह 'गुस्ताख़ और अन्य कहानियाँ', आपस प्रकाशन, अयोध्या (उ प्र) में शामिल है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं आनंद बहादुर की कहानी 'चीजें'।
कहानी
'चीजें'
आनन्द बहादुर
उसे लगता है कि चीजों को ठीक से सम्हाल कर रखना भी एक काम है। पहले ऐसा नहीं था। धीरे धीरे आया ये उसमें। मानो किसी ने उसके अंदर भी किसी चीज को अव्यवस्थित कर दिया हो। कितना बदल जाता है इंसान। और कितना बदल जाता है सब कुछ। सब कुछ तो शायद वैसा का वैसा ही रहता है। केवल इंसान बदल जाता है। उसके बदलते ही सब कुछ बदला हुआ लगने लगता है, और यह सोचने लगता है। सब कुछ बदल गया। बाहर से बदला हुआ और भीतर से बदला हुआ। दोनों में कौन ज्यादा बदला? दिखता तो बाहर वाला ही है, क्योंकि यह है ही बहुत दर्शनीय। मगर हकीकत कुछ और ही होती है।
भीतर की दुनिया। वहाँ चीजें किस तरह रखी हुई थी। कितने करीने के साथ रखा था सब कुछ। अभी जैसे दो दिन ही हुए। वहाँ धीरे धीरे कर कितना बड़ा बदलाव आ गया है। भीतर की दुनिया है संबंधों की। हर प्रकार के संबंध। लोगों के साथ, चीजों के साथ। अपने आप के साथ। अपने आप के साथ सब से दुखदाई यही है। दुखद है एक लम्बे अंतराल के बाद अपने आप के बारे में जानना कि आपके अंदर जो बैठा हुआ है, वह तो कोई और है। फिर अफसोस मनाते रहना कि क्यों इतना समय लगाया। समय तो सचमुच बहुत लगा। इतना अधिक कि वापसी की कोई उम्मीद ही नहीं बची। कैसे होते होंगे वे लोग जो समय पर खुद आगाह हो जाते होंगे। वह अपने आप से पूछता रहता है। उनका अस्तित्व कितना बढ़ा उत्सव होता होगा। लगातार चल रहा उत्सव। या क्या पता वह भी सिर्फ मरीचिका ही हो। इतना खुदआगाह तो कोई नहीं हो सकता। उस सीमा तक। ऐसा हो सकता है कि सब लोग ही अंधेरे में खोए हुए हो, मगर एक दूसरे को सब खुदआगाह दिख रहे हों। क्या में भी किसी को ऐसा दिखता हूँगा? वह अक्सर सोचता।
सफलता के जिस शिखर पर वह बैठा हुआ है, वहीं से इसकी संभावना काफी हद तक सघन होती चली जा रही है कि वह भी लोगों को एक आश्वस्त, खुदआगाह व्यक्ति लग रहा होगा। शिखर क्या, एक तरह से, अपने आप में, छोटी मोटी पहाड़ी ही हो गई है यह। हाँ, बहुत से अन्य लोग, जो उसकी इस ऊँचाई से ऊँचे ऊँचे पहाड़ों पर बैठे हुए दिख रहे हैं, उनके समान नहीं। कतई नहीं। मगर फिर भी यह एक संतोषजनक ऊँचाई। है कि नहीं? और उसने इस ऊँचाई के लिये कोई खास त्याग भी तो नहीं किया। कोई ऐसा आत्मविसर्जन? नहीं। जो आता गया, उसे अपनाता चला गया। बस, इत्ती सी हुनरमंदी उसकी रही। जो मिलता गया उसे स्वीकार करता गया। ऐसा करते-करते यहाँ तक आ गया। बिना खुद को समझे। बिना तय किये कि यह आखिर में चाहता क्या है। 'बेगर्स डोन्ट चूज' वाले तर्ज में इतनी जिंदगी बिताने के बाद यहाँ आ कर यह महसूस करना, कि मैं तो कोई और हूँ कि अंदर में कोई और था जो कुछ और चुनना चाहता था, मगर जिसकी आवाज तब सुनाई ही नहीं पड़ी। और अब, यह एक तेज चीख बन कर उसके अस्तित्व पर छा गई है।
अपने आप से संबंध का गड़बड़ाना। भीतर ही भीतर अव्यवस्थित होते चले जाना। भीतर की हर चीज का गलत जगह पर रख दिया जाना। महसूस करना। जाने कब से ऐसा करते करते यहाँ तक चले आना। एक चीज को उठाना, उसे गलत जगह पर रख देना, और भूल जाना। इस तरह धीरे-धीरे सारी चीजें गलत जगहों पर रखते चले जाना। और अब लगता है, वह खुद ही, किसी दूसरी जगह पर था। जहाँ था, जहाँ उसने सोच रक्खा था कि वह था, वहाँ वह था ही नहीं। न तो वहाँ, जहाँ उसने सोचा था कि उसे होना चाहिए था।
इसी का असर है यह सब। अब वह चीजों के बारे में बहुत अधिक सावधान हो गया है। उन चीजों के बारे में जो उसके वश में हैं। चीजें सही जगह पर रखी हुई हों। यह एक सनक हो गई है। किसी चीज को किसी चीज से उलझाया न जाय। किसी चीज का गलत इस्तेमाल न हो। किसी चीज की गलत तरीके से बर्बादी न होने पाए। ऐसी अनेक छोटी-छोटी महीन बातें।
और दूसरे लोग? दूसरे लोग तो अंदाज ही नहीं लगा पाए कि वह चाहता क्या था? कि उसकी मंशा क्या थी? उन्हें उसकी हरकतें बहुत उलझी हुई और बेतुकी लगती। कुछ तो मन ही मन उसे सनकी समझते। मगर कोई कुछ कहता नहीं। इतने बड़े पद पर होने के फायदे भी तो हैं। पद कितना ही बड़ा हो, खुद आपके लिये वह कभी इतना बड़ा नहीं होता कि उसमें आपका समूचा 'मैं' डूब जाय। या शायद होते हों, मगर वह उतने ऊँचे पद पर पहुँच नहीं पाया। उसके चारों ओर एक अव्यवस्थित जंगल था, जो हर जगह उसका पीछा करता रहता। पता नहीं, कब से ऐसा हो रहा था। जहाँ-जहाँ वह जाता, एक जंगल उसके पीछे पीछे चला आता।
पहले बहुत पहले, शायद बहुत बचपन में ही, इसकी शुरुआत हो गई होगी। वो हल्की धुंधली धुंधली-सी बातें अब भी उसे सालती है। यह एक छोटा सा घर था। बहुत बहुत-बहुत बिखरा हुआ। उसे सजाने संवारने की एक जिद, उस साज-सँवार के जरिये अपनी जिंदगी को संवारने की कोशिश, अंदर पनपी थी। मगर जिंदगी थी कि पुट्ठे पर हाथ ही रखने नहीं देती थी। जब-जब वह उस घर को समेटने सहेजने की कोशिश करता, सब कुछ बिखर बिखर जाता। मगर वह भी बेहद जिद्दी था, और साथ ही सहमा हुआ, और उसके साथ ही डरा हुआ। ज्यू-ज्यूँ घर उसकी कोशिशों से बाहर निकलता जाता, उसका गुस्सा ऊपर चढ़ता जाता, साथ ही घर के प्रति एक भय सा पैदा होता। लगता जैसे घर उस पर कुपित होता है। उसकी कोशिशें घर को नागवार गुजरती है। कभी लगता कि घर भी उससे डरा हुआ है, और शर्मिंदा है। यह खुद को सुधारना चाहता है, मगर हालात ऐसा होने नहीं दे रहे हैं।
उसी डर और गुस्से और जिद में समय बीतता गया। उसे एक कठोरता देता गया। जो आज तक कायम है, अब जब कि रस्सी जल गई है। इसी ऐंठन का नतीजा है कि आज वह जहाँ भी जाता है, दो दिन में बदनाम हो जाता है। मगर अब बदलने का वक्त ही खत्म हो चुका है। न उसे ऐसी कोई जरूरत ही है। क्योंकि अब यह काफी बड़ा आदमी बन चुका है। बड़ा आदमी बन जाने के साथ एक सहूलियत पैदा हो गई है, सबों को इग्नोर कर सकने की। ओपीनियन्स के मकड़जाल से बाहर निकल चुका है यह।
दूसरों के ओपीनियन्स की चाहें आप जितनी ऐसी तैसी करें, मगर खुद को कभी इग्नोर नहीं कर सकते। अब, जब खुद वही बदल गया है। बदल गया है, या नये सिरे से खुद को पहचानना शुरू कर दिया है? ऐसा लगता है यह अपने-आप से हाल-हाल का परिचय है। जुम्मा-जुम्मा दो दिन का परिचय। मगर यह तो अभी से जान का दुश्मन बन बैठा है। इतने समय के बाद खुद को पहचानना जब चिड़िया खेत को लगभग चुग चुकी है। अब ऐसा करके भी क्या हासिल किया जा सकता है। समय की ट्रेन तो स्टेशन छोड चुकी। बस, उसकी पूँछ भर स्टेशन के आखिरी हिस्से से निकल रही है। बहुत जल्द पूरी ट्रेन ही निकल लेगी। फिर आत्म साक्षात्कार का क्या अर्थ रह जाएगा? इस एहसास ने उसे शायद और अधिक क्रूर बना डाला है। अपने प्रति, और दूसरों के प्रति। दिक्कत यह है कि अपने प्रति की गई आपकी क्रूरता दूसरों को नजर नहीं आती, जबकि उनके खुद के प्रति की गई आपकी एक-एक हरकत उन्हें शीशे की तरह साफ-साफ इालक जाती है। नतीजा, एक मौन तिरस्कार। सबसे खतरनाक तिरस्कार मौन तिरस्कार होता है। मगर अपनी बात यह किसे बताने जाए। वहीं सुनने को बैठा ही कौन है?
कभी-कभी उसे लगता है कि लोगों के जिस्मों में सबसे अधिक अव्यवस्थित चीज कान है। कभी-कभी तो शक होता है कि ज्यादातर लोगों के कान हैं भी या नहीं, या अगर हैं, तो ये उन्हें कहीं रख कर भूल तो नहीं गए? और उसके बाद बड़े इत्मीनान से जी रहे हैं क्योंकि उन्हें वैसे भी उनकी कोई जरूरत नहीं थी। कान होने का मतलब, किसी अन्य की बात को सुनना, उसे समझना, और फिर उस पर अमल करना। अब, इतना झंझट कौन पाले? इससे तो भला कि कान को निकालो और झाड़-बुहार कर कहीं पर फेंक आओ, कूड़े कर्कट में डाल दो, नतीजा है, वह अर्से से कुत्ते के समान भौंक रहा है। भौंकते-भौंकते उसका गला फट गया है मगर किसी पर कोई असर नहीं हो रहा है।
और आँख? अगर आँख होती, तो चीजों को इतना बेतरतीब रखा हुआ देख कर इन्हें बुरा नहीं लगता? इनके सारे घरों में, देखो तो, कितने भद्दे ढंग से चीजें छितराई हुई है। और इनके बीच ये सारे लोग कितने आराम से हैं। इधर-उधर आते-जाते, सारे काम निपटाते। लोग खुद भी इनके बीच कितने बेतरतीब ढंग से रहते हैं। बिल्कुल निर्लिप्त भाव से, मानो सारी सृष्टि ऐसी ही हो। एक जंगल जैसी। बहुत कम ही उसे कोई घर मिलता है जो व्यवस्थित हो। जहाँ सभी चीजें तरतीब से हों। कई घर ऐसे होते हैं जहाँ चालाकी से इस अव्यवस्था को छुपाने की कोशिश रहती है। मगर वह इसे ताड़ जाता है। इन दिनों ज्यादातर ड्राइंग रूम को सजा संवार कर रखने का चलन जोर पर है। यह सोशल मीडिया की देन है, या ऑनलाइन बिक्री के प्रचार तंत्र की खुराफात। मगर इससे व्यवस्थित रखने का कोई तरीका विकसित नहीं हो सका है। बस, दिखावा भर बढ़ गया है। उसके बाद, जरा भी गहराई में जाइये, तो सब ढाक के तीन पात। बल्कि मामला और खराब हुआ है। लोग पहले से भी अधिक लापरवाह और बेतरतीब हो गए है।
तो सवाल है कि आँख ज्यादा जरूरी है कि काम? आँख किस काम की है अगर यह सुंदरता का अता-पता नहीं दे पा रही? आँख कान दोनों काम से गए, तेज सरपट दौड़ रही है तो सिर्फ जबान। और वह भी अव्यवस्थित ही दौड़ रही है। कहीं कोई नहीं जो ढंग से बोलचाल कर रहा है। ऑफिस को ही ले लीजिए, वह ऐसी जगह है जहाँ पहुँचते ही उसकी तो बस, आँख ही काम करना बंद कर देती है। एक तरह से। इतनी अव्यवस्था, इतनी बेतरतीबी। मत पूछिए, उसने तो ज्वाइन करने के बाद पहले दिन से ही उस बिगडैल घोड़े को साधना शुरू कर दिया था, और आज तक उसे साधता चला जा रहा है। उसकी इस हरकत के चलते समूचे ऑफिस में एक अनवरत अफरातफरी का माहौल रहता है। जिस समय भी जाइये, आपको कहीं न कहीं से ठोंक-पीट की आवाज सुनाई पड़ेगीः ठकठक पिटपिट धड़ाम घुडूम ।
मगर वह करे तो क्या? समूचा ऑफिस ही इतना गलत-सलत बना हुआ है। अब यही देखिये इस वर्तमान ऑफिस को। जब से आया है, इस ऑफिस को सुधरवा रहा है। काम करवाते करवाते यह तो धक्क गया मगर ऑफिस नहीं से नहीं सुधरा। इधर तुड़वाओ, तो उधर दूसरी तरफ कोई न कोई नुक्स नजर आ जाता। और यह नुक्स को ले कर बहुत कठोर है। इस मामले में खुद को भी माफ नहीं कर पाता है।
यह नहीं कि उसे इस बाबत लोगों की प्रतिक्रिया का पता नहीं है। उसे सब पता है। उसे पता है कि लोग क्षुब्ध हैं, इतने, कि उन्होंने इसी को एक इशु बना लिया है। वे अपनी प्रतिक्रिया को व्यक्त करते, दबे होठों हँसी ठठ्ठा करते, फिर अपने अपने घरों को, अपनी अपनी अव्यवस्थाओं की ओर लौट जाते। उन बेतरतीबियों की ओर जिनके बीच वे बड़े चैन से गुजर-बसर कर रहे हैं।
मगर वह जाए तो कहाँ जाए? जिसे आप घर कहते हैं, वहाँ भी तो ऐसी ही अव्यवस्था फैली हुई है। वहीं जाते ही उसे एक बार फिर से काम पर जुट जाना होता है। न घर में चैन, न ऑफिस में सुकून। और खासकर, किसी तबादले के बाद, जब वह एक शहर छोड़ कर दूसरे शहर जाता है। क्या होता है कि हर बार, तबादला होते ही, नए ऑफिस के साथ, नया घर भी आता है। मानो किसी सेल का गिफ्ट ऑफर हो, यह ले जाओ, तो साथ में यह भी मिल जाएगा।
ऑफिस की भीतरी संरचनाओं को बदलने की उसकी कोशिशों का असर घर की संरचना पर भी पड़ता है। जब भी वह ऑफिस में कोई तब्दीली करवाता है, तो साथ ही साथ उसे ऐसा लगने लगता है कि घर में भी कोई न कोई नुक्स है। ऐसा कैसे होता है, उसे खुद ही पता नहीं। मगर हर बार ऐसा होता है कि ऑफिस के साथ ही साथ घर की भी जबरदस्त तोड़फोड़ करवाई जाती है।
ठीक ऐसा ही उन मौकों पर भी होता है जब वह घर में कोई बदलाव करवा रहा होता है। तब उसे ऑफिस में अपने आप कोई न कोई नुक्स नजर आने लगता है, और बस, मामला शुरू हो जाता है। एक अजीब बात और है, उसे कुछ कुछ एहसास होता है कि जिन दिनों वह घर ऑफिस घर को पुनर्व्याख्यायित (हाँ, पुनर्व्याख्यायित ही सटीक शब्द है) करने के ख्याल से ताबड़तोड चारों तरफ बदलाव लाने में मश्गूल रहता है, उन दिनों वह कुछ अलग ही तरीके की भावुकता से ग्रसित भी हो जाता है। तब वह एक-एक कर समूची दुनिया, और दुनिया में अपने अस्तित्व, और लोगों से अपने रिश्ते-नाते, इत्यादि की नए सिरे से समीक्षा करने लगता है। उसे अब तक की अपनी सारी जिंदगी में नुक्स नजर आने लगता है। और एक बार यह प्रक्रिया शुरू हुई नहीं कि वह अपने वर्तमान और अतीत को भी उसमें शरीक करने लगता है। फिर धीरे-धीरे सभी चीजें एक दूसरे से जुड़ जाती हैं और एक बहुत बड़ी अस्त-व्यस्तता का माहौल बना डालती है। बस, वह तय कर लेता है, कि अब तक जो कुछ जैसा हुआ, हुआ, अब आगे से वह सभी चीजों को बिल्कुल आखिर तक सुलझा कर ही दम लेगा। सब कुछ व्यवस्थित कर डालेगा। भले ही इसके लिए उसे कुछ कड़े फैसले लेने पड़ें ,कुछ कठिन स्थितियों का सामना करना पड़े, मगर वह कठोरता से सब कुछ को सही करेगा।
और फिर, यह गलत को अपनी ओर से सही करने के अपने फैसले पर अमल करने में भिड जाता है। इस दरम्यान भगवान जाने कितनी ही बार उसने ऐसा किया होगा। इस कोशिश में वह लोगों से और अधिक शत्रुतापूर्वक बर्ताव करने लगता है। मगर उसकी तमाम कोशिशों का आज तक कोई नतीजा नहीं निकला। चीजें बेतरतीब की बेतरतीब रह गई। लोग भी वैसे ही, बल्कि और अक्खड़ और तकलीफदेह हो गए, सारे संबंध उसी तरह दुखदाई बने रहे। बस, कुछ हरकत जैसी हुई, और उसे एक बदलाव जैसा महसूस हुआ।
मगर अब जब ऐसा करते-करते यह थक चुका है, अब या तो सब कुछ ठीक हो जाए, या सब कुछ खतम हो जाए, सबको तोड-फोड कर नए सिरे से बनाया जाए। धीरे-धीरे यह भावना बढ़ती जा रही है। मजबूत हो रही है। बहुत खतरनाक होती जा रही है। पहले जहां महज थोडे-बहुत सुधार से वह संतुष्ट हो जाता था, अब छोटे-छोटे मामले को भी अंत तक ले जाना चाहता है। जब प्रतिरोध का सामना करना पड़ता, उसे क्रोध आता।
क्रोध एक बार पैदा हो गया, तो हर जगह साथ जाने लगता है। साथ आते-जाते गुस्सा आपको खाने लगा। आप बेजरूरत लडने-झगड़ने लगते हैं। आप एक ऐसी इमारत बन जाते हैं जिसे हर जगह रिपेयर की जरूरत रहती है। मगर आप समझ नहीं पाते और अपने बाहर चारों ओर रिपेयर की जरूरत को खोजते रहते हैं। बिना समझे कि खुद आपको भीतर के रिपेयर की जरूरत है। आपके ही अंदर की सारी चीजें अव्यवस्थित हो गई हैं। आप बाहर-बाहर तोड़-फोड़ करवाते जाते हैं, और आपके भीतर चीजें टूटती-फूटती जाती हैं। एक दिन वह सारी इमारत कूड़ा बन जाती है। वह बिना बुलडोजर की मदद के खुद भसकती जाती है। कई ऐसे कबाड़खाने हैं जहाँ ऐसे कबाड़ को सही कर के रिसाइकिल किया जाता है। आप कुछ चक्कर वहीं का भी लगा लेते हैं। फिर एक रोज इमारत में कबाड़खाने के लायक भी कुछ नहीं बचता।
और एक दिन आता है जब कूड़ा गाड़ी आपको लाद कर हमेशा के लिए ले जाती है। शहर के बाहर वहाँ जहाँ किसी बड़े गड्ढे को कूड़े कर्कट से पाट कर हाउसिंग कॉलोनी के लिए नयी जमीन तैयार की जा रही है।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 8103372201




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